शनिवार, 26 मार्च 2016

ये उम्मीद इन दिनों तोड़ देती है......

डॉ. नारंग की हत्या न तो सांप्रदायिक है और न ही आतंकवादी हमला।
ये एक बार फिर 'इंसानियत' की मौत है। जहाँ लोगों के कानों तक किसी की चीख-पुकार नहीं पहुँचती। उनकी आँखों को किसी के जिस्म से बहता लहू नहीं दिखता। जहाँ भय के कारण उनकी आवाज किसी अंधे कुँए की तलहटी में छुपकर बैठ जाती है।

बारात में सड़क पर नाचते हुए लोग या फिर भारत की जीत पर जश्न में शामिल हुए चेहरे अचानक समाज से लुप्त हो जाते हैं और अगले दिन सुबह सरसराहट के साथ दरवाजे खुलते हैं। बाहर के दृश्य को भांपा-परखा जाता है और अचानक जलती हुई मोमबत्तियाँ रौशनी की उम्मीद में सड़कों पर चलने लगती हैं। कितना शर्मनाक है! धिक्कार है इन तमाशबीनों पर!

ये मोमबत्तियाँ अंधकार को दूर करती हैं आपके मन के भय को नहीं! उसे निकालो, तो कुछ हो सके शायद! वरना गर यही इलाज होता तो इनका कुछ तो, कहीं तो असर दिखता! वर्षों से इन मोमबत्तियों ने दिलासे के सिवाय और क्या दिया है हमें?

जब तक हम भयभीत और आत्मकेंद्रित रहेंगे, अपराधियों के हौसले बुलंद होते जायेंगे। ये तो पेशेवर अपराधी भी नहीं थे, पर सब जानते हैं कि 'इंसान' की कीमत कुछ भी नहीं! संवाद की क्या जरुरत, सीधे ख़त्म कर दो! क्योंकि यही दिखता आया है! ये सोच कौन बदलेगा और कैसे?

लाश और मोमबत्ती का रिश्ता तोडना होगा! जो बच्चा, अपने पिता की निर्ममतापूर्वक हुई हत्या का प्रत्यक्षदर्शी है, जाकर पूछो उसे कि इन मोमबत्तियों ने उसका दिल कितना रौशन किया है....!

इस मोमबत्ती का श्राद्ध करने के लिए, आज एक मोमबत्ती मैं भी जलाती हूँ। जब तक यहाँ हूँ, ये जलती रहेगी, कि कुछ संवेदनाएं भी जग उठें कहीं! आखिर दुनिया उम्मीद पर ही तो जीवित है अब तक! नहीं, क्या?
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 14 मार्च 2016

पहने तो करता है,चुर्र...


 आये दिन न्यूज़ चैनलों में ख़बरें रहतीं हैं कि फलाने, 'आम' आदमी ने ढिमके 'ख़ास' को जूता फेंककर मारा। ये बहुत गलत एवं निंदनीय व्यवहार है, अपनी बात कहकर भी तो समझाई जा सकती हैं। सुनकर बुरा तो हमें भी बहुत लगता है, जी! पर कभी-कभी दिमागी चिंटू न जाने क्यूँ रह-रहकर मस्तिष्क के मन-मंदिर में यह प्रश्न टनाटन बजाता है कि हाय रे, उस बेचारे को जब पुलिस पकड़कर ले जा रही थी तो उसका फेंका हुआ जूता ससम्मान उसके चरण-कमलों तक पहुँचाया गया या कि वो मजबूर बन्दा/बन्दी (स्त्री का बराबर का हक़ होता है, न) पैर घिसटते हुए ही काल-कोठरी तक गया। वैसे मोजा देना तो बनता है, भले ही मुँह पर फेंककर दो क्योंकि हम 'बदला युग' (exchange & revenge era) में रह रहे हैं।  

अचानक हमारे यादों के सागर में हमारे प्रेरणास्रोत प्यारे गुल्लू जी, बोले तो अपने 'गुलज़ार सर' की तस्वीर दिखाई देने लगी। उन्होंने जब "इब्न-ए-बतूता....बगल में जूता" लिखा था,तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा, कि लोग उनकी इस बात को इतनी गंभीरता से लेंगे. पर आजकल की खबरों में ऐसी बातें कितनी आम हो गईं हैं,कि हमें भी हैरत है!

हमने तो बचपन से ही "मुँह में राम, बगल में छुरी" वाली कहावत सुनी थी, ये 'जूता' तो आजकल बगल में आने लगा है। वैसे आइडिया ठीक-सा ही है...'मार भी दो और मर्डर भी ना हो' धत्त, छिः छि:,ये भी कोई बात हुई, घटिया सोच! "हे ईश्वर, हमें माफ़ मत करना...क्योंकि हमें पता है कि हम क्या कर रहे हैं!" :( 
पर सच्ची, हमें लगता है,कि आने वाले दिनों में इस विषय पर निबंध आ सकता है। ज़रा सोचिए तो! 'रामू ने राजू को जूता मारा' विषय पर कैसे लिख सकते हैं? घबराओ मत, हमरा जन्म इन्हीं समस्याओं को निबटाने को हुआ है, बताते हैं......

सबसे पहले तो इस खेल के नियम-
*सबसे ज़रूरी नियम तो ये है कि जूता हर पार्टी का होना चाहिए। बेईमानी नहीं कि हमारा टर्न ही न आए! 
*हर बार एक अलग पार्टी का बंदा दूसरे को मारेगा, जिससे मीडिया वालों को अच्छा और निष्पक्ष कवरेज मिले! 
*जूता देशी हो या विदेशी, पहले ही तय कर लो. वरना जनता विदेशी प्रभाव का आरोप लगा सकती है! 
*जूते का टाइप भी निश्चित हो, मतलब; बरसाती हो,लेदर का हो, स्पोर्ट्स हो या केनवास, क्यूँकि सबसे अलग-अलग तरह की चोटें लगती हैं। दर्द बांटना होता है, वो भी बराबर!इसलिए अनियमितता के चक्करों में कौन पड़े भाई! 
*मारे गये जूते 'राष्ट्रीय संपत्ति' का हिस्सा माने जाएँगे! 
*ज़रूरत पड़ने पर एक 'जूता-संग्रहालय' भी बनाया जाएगा, जिससे आम जनता को इसकी पूरी एवं सचित्र जानकारी हो..कि किसने, कब और कहाँ इसका प्रयोग किया था!

अब खिलाड़ी बनने के नियम -
*मारने वाले की लंबाई ज़्यादा होनी चाहिए, जिससे निशाना ठीक से दिखाई दे! 
*वो खुद कमज़ोर हो तो चलेगा, पर जिसे जूता पड़ना है, उसका सीना चौड़ा हो, ताकि लक्ष्य प्राप्ति में कोई अड़चन न आये। 
*अपनी बेइज़्ज़ती के लिए तैयार रहें, कई बार result, on spot declare हो जाते हैं। आपको लात-घूँसों का ईनाम मिल सकता है! जो आगामी चोटों के लिए आपके शरीर को सहनशक्ति प्रदान करता है। 

अदालत में पूछे जाने वाले सवाल -
*जूता नया था या पुराना? हां, रे..इससे मारने वाले की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा होता है! 
*जूते की गति क्या थी? 
*वह शरीर के किस भाग से टकराया? 
*क्या वहीं लगा,जहाँ निशाना साधा था(इससे पता चलता है, कि कहीं मुलज़िम के घर में ऐसी कोई पुरानी परंपरा या आनुवंशिक झोल तो नहीं)!

केस की बानगी -

जूता ही क्यों चुना? 
*जी, सर ! ये आसानी से उपलब्ध था! इसे अलग से ले जाना भी नहीं पड़ता! 
*इसकी ग्रिप भी अच्छी होती है और थ्रो भी! 
*लाइसेन्स भी नहीं लगता, सर! 
वजह क्या थी? 
*क्या ये जूता उसे काट रहा था, और वो दुनिया के सामने उसे नीचा दिखाना चाहता था? 
*कहीं इसने किसी और का जूता तो नहीं इस्तेमाल किया? 
कुछ भी हो सकता है मीलॉर्ड...मुझे तो ये एक सोची समझी साज़िश लगती है।
नहीं.... नहीं...नहीं   
*शायद इसे इस एक जूते से ज़्यादा प्यारी वो दो वक़्त की रोटी थी, जो जेल में मुफ़्त में मिल जाएगी!

विशेष -
हां-हां...यही सच है! 
सब तंग आ गये हैं, ग़रीबी से, बेरोज़गारी से, भ्रष्टाचार से, दंगों से, आगजनी से,
लूट-खसोट से, 
बेकार होते वोट से
तंग आ गये हैं अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने वाले राजनीतिक दलों से!
हम किसी पार्टी को नहीं, किसी धर्म को नहीं, बस देश की भलाई को चुनते हैं साहेब
साहेब, ए साहेब, सुनो न साहेब -

"कुछ करो, कि सुधार हो, निस्वार्थ जब सरकार हो!  
संसद चले तो शांति से, और दूर भ्रष्टाचार हो! 
पैसे की जब न मार हो, न कोई बेरोज़गार हो! 
फिर दूसरों के सामने, काहे को अपनी हार हो!"

बहुत हुई ये मारामारी! शांति से बैठकर बात कीजिए न! 'मानहानि' का भी ख़तरा नहीं और न ही 'मनी हानि' का! और क्या 'जूते' सस्ते थोड़े ही न आते हैं आजकल! महंगाई के इस दौर में एक जूता खो जाए, तो लंगड़ाकर कब तक चलेंगे साहेब? अब इस उमर में लंगड़ी खेलते हुए भी अच्छे न लगेंगे हम।  
"मेरा जूता नाम है बाटा 
पहनें इसको गोदरेज, टाटा 
काहे फेंके इसको भैया  
क्यों करवाएं अपना घाटा??"
ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल लला ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल लला ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल लला :P 
अब डर तो सिर्फ़ इसी बात का है,कि हमें जूते खरीदने का बड़ा शौक है! कहीं कल के अख़बारों में ये ख़बर न आ जाए, कि 'अज्ञात' जी के यहाँ से जूतों का एक बड़ा ज़ख़ीरा बरामद हुआ! उफ़...तब हमारा क्या होगा...??? मम्मीईईईईई, बुहु,बुहु ,सुबकसुबक ;)

 - प्रीति अज्ञात

मंगलवार, 8 मार्च 2016

मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे...

मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे...

'अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस' की शुभकामनाएँ, बोलना उतना ही आसान है जैसा कि 'स्वतंत्रता दिवस मुबारक़ हो' या अन्य कोई भी दिवस की बधाई देना। लेकिन सब जानते हैं, इस सब की सच्चाई, एक तिथि या अवकाश से ज्यादा कुछ भी नहीं। कभी गौर कीजियेगा, नब्बे प्रतिशत महिलाओं के मुँह से इस बधाई की प्रतिक्रियास्वरुप खिसियाता 'थैंक्स' ऐसे निकलेगा जैसे अस्पताल के बिस्तर पर पड़े किसी बीमार बच्चे को हैप्पी बर्थडे बोल दिया गया हो। पर एक बात यह भी है कि कोई 'विश' करे, अच्छा तो लगता ही है! सच समझे आप, 'स्त्रियों' को समझ पाना इतना आसान नहीं है। स्त्री मन की थाह का अंदाजा, शायद स्त्री को भी नहीं होता। फिर भी इन बातों को समझकर उसे शुभकामनाएँ भेजेंगे, तो उसे अच्छा लगेगा-

आज जिस इंसान पर कोई स्त्री आग-बबूला हो रही है, कल उसी के लिए नम आँखों से दुआ मांगती दिखेगी। क्योंकि उसे परवाह है अपनों की, क्रोध उस खिसियाहट का परिणाम है कि अपनों को उसकी परवाह क्यों नहीं? ये प्रेम है उसका। 
"जाओ, अब तुमसे कभी बात नहीं करुँगी" कहकर दस सेकंड बाद ही सन्देश भेजेगी, "सॉरी यार कॉल करूँ क्या?" क्योंकि वो आपके बिना रह ही नहीं सकती, उसे क़द्र है आपकी उपस्थिति की। ये रिश्तों को निभाने की ज़िद है उसकी।
रात भर सिरहाने बैठ बीमार बच्चे का माथा सहलाती है, कभी अपनी नींदों का हिसाब नहीं लगाती। ये ममता है उसकी।
हिसाब से घर चलाते हुए, भविष्य के लिए पैसे बचाती है और एक दिन वो सारा धन बेहिचक किसी जरूरतमंद को दे आती है। ये दयालुता है उसकी। 
कोई उसकी मदद करे न करे, लेकिन वो सबकी मदद को हमेशा तैयार रहती है। ये संवेदनशीलता है उसकी। 
अपने आँसू भीतर ही समेटकर, दूसरों की आँखें पोंछ उन्हें दिलासा देती है। ये दर्द को समझने की शक्ति है उसकी।
अपनों के लिए ढाल बनकर दुश्मन के सामने खड़ी हो जाती है। ये हिम्मत है उसकी।
बार-बार जाती है, जाकर लौट आती है। इश्क़ है, दीवानगी है उसकी।
एक हद तक सफाई देती है, फिर मौन हो जाती है। गरिमा है उसकी।  
स्वयं की तलाश में, खोयी रही अब तक....कुछ ऐसी ही ज़िंदगानी है उसकी।

स्त्री को कोई अपेक्षा नहीं सिवाय इसके कि उसे 'इंसान' समझा जाए। उसके साथ निर्ममता और क्रूरतापूर्ण व्यवहार न हो। नारी, 'नर' की महिमा है, गरिमा है, ममता की मूरत है, अन्नपूर्णा है, कोमल भाषा है, निर्मल मन और स्वच्छ हृदय है, समर्पिता है. और इन सबसे भी अहम बात वो सिर्फ़ एक ज़िस्म ही नहीं, उसमें जाँ भी बसती है। अपने हिस्से के सम्मान की हक़दार है वो। हमें बदलना ही होगा अपने-आप को, अपनी सोच को, अपने आसपास के माहौल को, नारी को उपभोग की वस्तु समझने वालों की कुत्सित सोच को..अब बिना डरे हुए सामना करना ही होगा उन पापियों का, समाज के झूठे ठेकेदारों का, बेनक़ाब करना है हर घिनौने चेहरे की सच्चाई को..साथ देना होगा, उस नारी का, उम्मीद की लौ जिसकी आँखों में अब भी टिमटिमाती है, जिसे अब भी विश्वास है बदलाव पर! 

वो फूलों को देख प्रसन्न हो जाती है,
हवाओं में मचलकर आँचल लहराती है,
तूफां से न हारी, देखो बिजली-सा टकराती है
बारिश में किसी फसल की तरह लहलहाती है,
खुशी में दीपक बन जगमगाती है
हल्की आहट से बुद्धू बन चौंक जाती है
अकेले में पगली बेवजह गुनगुनाती है 
हँसती है बहुत तो कभी
औंधे मुंह पड़ जाती है 
जाते ही इसके जाने क्यूँ 
घर की नींव हिल जाती है 
मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे....
तभी सामने से एक 'स्त्री' गुजर जाती है 
- प्रीति 'अज्ञात'
http://hastaksher.com/rachna.php?id=346

गुरुवार, 3 मार्च 2016

उन्हें पहले-सा कर दीजिये, प्लीज!

गीली तौलिया को
पलंग पर रखे बिना ही 
सुखा आते हैं आँगन में
चिड़ियों का पानी रखते हुए

सोफे के नीचे छुपे जूते की,
वो बदबूदार मोज़े 
अब चुगलियाँ नहीं करते
कि करें भी किससे  

सारे डिब्बों के ढक्कन भी 
पहले-से टाइट नहीं रहते
जितना वो चिढ़ाने के लिए
अक़्सर किया करते थे

उनकी टेबल व्यवस्थित 
अल्मारी भी सलीके से सजी 
किताबों के ऊपर रखा वो चश्मा
अब बिन कहे कवर में घुस जाता है

अखबार के पन्ने गायब नहीं होते 
रुकी घडी की बैटरी बदल जाती है तुरंत 
आरामकुर्सी पर बैठे हुए बेवक़्त
चाय, पकौड़ों की तलब कब की ख़त्म हुई 

आप लड़तीं थीं न जिनके लिए
देखो न! बग़िया में वही ढेरों गुलाब हैं
गुलमोहर भी खिल उठा है दोबारा
पर एक शिकायत है मेरी तुमसे 

माँ, तुम  क्या गईं 
पापा भी जैसे चले ही गए!
उन्हें पहले-सा कर दीजिये, प्लीज!
 - प्रीति 'अज्ञात'

नानी की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद लिखा था कभी, बचपन की डायरी में मिला. 
बनारस से मेरी कई यादें जुडी हैं. पहली बार वहाँ जाना तब हुआ था जब नानी जी को cancer था और मिर्ज़ापुर के डॉक्टरों ने उन्हें बी.एच.यू. ले जाने की सलाह दी थी. मैं और भैया, मम्मी के साथ वहाँ गए थे. डॉक्टर अंकल जब नानी के चेकअप को आते, तो हम दोनों उनके बेड के नीचे छुप जाते थे फिर हमें वहाँ से खदेड़कर निकाला जाता. हमारी उत्सुकता बस यही थी कि नानी को हुआ क्या है! नाना अकेले में रोते क्यों हैं? मैं अपने नाना की बेहद लाड़ली रही हूँ, इतनी कि आज तक मेरे मौसेरे भाई-बहिन इस बात का दुःख मनाते हैं. कुछ को तो नानी की गोद भी न नसीब हो पाई थी. इस मामले में बेहद भाग्यशाली हूँ कि वो सब भी मुझे इतना ही स्नेह देते हैं. खैर… तो मैं नाना से जब भी नानी के बारे में सवाल करती तो वो मुझे भींचकर और भी जोरों से रोने लगते. कहते कुछ भी नहीं थे. कुछ ही दिनों बाद नानी हम सबको छोड़कर चली गईं थीं और उस दिन नाना लिपटकर खूब रोये थे. बार-बार यही कहते रहे बेटा, लीला चली गई. वैसे नानी का नाम निर्मला था, लीला शायद उनका प्यार वाला नाम नाना ने ही कभी रखा होगा. संकोचवश कभी पूछा ही नहीं!

मेरी नानी की मृत्यु जब हुई, वो उम्र नहीं थी जाने की. उनके देहांत के बाद नाना जी, बेहद उदास रहने लगे थे. मन भीगता था मेरा, पर कुछ कह नहीं पाती थी. संभवत: ये मेरे जीवन का पहला हादसा था, जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था. उससे पहले कभी सोचा तक नहीं था, मृत्यु की क्रूरता के बारे में. फिर तो फ़ेहरिस्त लम्बी होती चली गई और जीवन, 'मृत्यु की शुरुआत' ही लगने लगा. किसी के दूर चले जाने की पीड़ा अब भी उतनी ही कष्टप्रद होती है, यादें पोटली में जमा होती चली जाती हैं. जिन्हें जब-तक खोल बैठने की मेरी आदत हर एक पल को, पलकों तक ले आती है. भारी ह्रदय, उन तस्वीरों से अपनी बात कहता है. उनकी अनुपस्थिति के लिए उनसे लड़ता भी है और फिर जिम्मेदारियों की एक पुकार सुनते ही उन्हें उठा, मन के किसी हिस्से में पुन: सुरक्षित रख आता है. 

नानी के निधन के समय बहुत छोटी थी मैं, पर उसका असर बहुत गहरा था. मम्मी, मौसी, मामा सबको उनकी याद में रोता देखती तो अपना मुंह कसकर भींच लेती. कुछ-न-कुछ फ़रमाईश कर विषय बदलने की कोशिश भी करती. बढ़ते समय के साथ, कुछ शब्द लिखे थे कभी, पर नानाजी को दिखाने की हिम्मत न हुई. अब तो उन्हें गुजरे हुए भी दो दशक होने को आये. आज भी उनकी याद आँखें नम कर देती है. मेरी उनसे बहुत जमती थी, हम दोनों एक-दूसरे को खूब पत्र लिखते थे. उन दिनों साप्ताहिक हिन्दुस्तान और धर्मयुग में जब मेरा लिखा छपा तो न जाने किस-किसको गर्व के साथ बताते थे. कई बार तो इतनी तारीफ करते कि मैं संकोच से गड जाती. गर्मियों की छुट्टियों की मेरी सबसे खूबसूरत यादें उन्हीं के साथ हैं.

वो पक्के दोस्त थे मेरे, हम एक-दूसरे से सारी बातें साझा करते. कितना कुछ शेष हैं, जो मैं उनसे कहना चाहती हूँ अभी. मैं जानती हूँ, वो एकदम से अपनी दोनों हथेलियों को मेरे कानों से चिपकाकर वैसे ही हँसते हुए मुझे हवा में उठा लेंगे और बोलेंगे 'सुर्री...सर्रर्ररर' फिर सब ठीक हो जायेगा.

* 'सुर्री' माने कुकर की सीटी का बजते हुए ऊपर उठ जाना. जहाँ तक मेरा मानना है, यह शब्द या तो नाना ने मेरे लिए ही बनाया था या फिर छोटे मामा ने. क्योंकि पिछले तीन दशकों से मैंने इसे कभी, कहीं नहीं सुना!
- प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

ताज्जुब नहीं!

"12 -14 वर्ष की लड़कियों के साथ सबसे ज्यादा बलात्कार होता है, आपको मौका मिले आप भी नहीं छोड़ेंगे" - पप्पू यादव 
जब तक इन महानुभाव जैसे लोग सत्ता में रहेंगे, 'स्त्री-अस्मिता' मजाक ही रहेगी इसके बाद उपदेश भी दे डालते हैं, "सिस्टम को बदलिये" 
साहेब, जनता की मति मारी गई थी जो सिस्टम बदलने को आप जैसों को चुन लिया! (बहुवचन का प्रयोग इसलिए कि इन जैसे सैकड़ों लोग हमारे ही बीचोंबीच घूम रहे हैं)
यानी इन्होने ये तो स्वीकार ही लिया कि इनके यहाँ इस मौके का खूब फायदा उठाया जाता है।

ताज्जुब इस बात का बिलकुल नहीं कि इतनी कुत्सित मानसिकता वाले वक्तव्य के बाद भी ये निर्लज़्ज़ की तरह हंस क्यों रहे हैं?
ताज़्ज़ुब ये भी नहीं कि वहाँ उपस्थित लोगों ने इनका विरोध कर इन्हें तभी धराशायी क्यों नहीं कर दिया?
ताज्जुब तब भी नहीं होगा, जब इन जैसे और लोग चुने जाते रहेंगे!
हाँ, ताज़्ज़ुब तब भी नहीं होगा जब इस वीडियो को देख ज्यादातर लोग चुप्पी धारण कर अगली पोस्ट के लाइक की ओर बढ़ जाएंगे।
ताज़्ज़ुब तब होता है जब लोग देश में बदलाव की उम्मीद कर, अपने घर का कचरा पडोसी के घर की तरफ उछाल देते हैं।
ताज्जुब तब होता है जब एक स्त्री के भाषण की धज्जियाँ उड़ाने में व्यस्त लोग, गैंगरेप की घटनाओं का ज़िक्र तक करना भूल जाते हैं। यहाँ इनके लिए किसी समस्या के समाधान से ज्यादा जरुरी किसी का मजाक उड़ाना है। 
ताज्जुब तब भी होता है जब दुःख भरी कविताएँ और घड़ियाली आँसू लिए डरपोक चेहरों को सर झुकाये देखती हूँ, जो सिर्फ अपनी बारी की प्रतीक्षा तक मौन हैं.....!
पर जानती हूँ, संवेदनाएं मरी नहीं....ऊँघ रही हैं कहीं, उनकी नींद में खलल होगा तो जागृत भी अवश्य हो जाएँगी। इन्हें दवा नहीं, दुआ की ही जरुरत है अब!

दुःख है कि अब अपराधी और नेता के बीच का दायरा सिमट रहा है और संभवत: इन्हें सह-अस्तित्व की तलाश है। 
डर इस बात का है, कहीं समाज का प्रबुद्ध वर्ग, इन सबसे आँखें चुराकर, स्वार्थ लिप्तता या मृत्यु भय से एक संज्ञा शून्य, भाव विहीन समाज की स्थापना में योगदान तो नहीं दे रहा?? फिर परिवर्तन की आस किससे और क्यों???
ख़ैर...ताज्जुब अब भी नहीं है!
प्रीति 'अज्ञात'
https://www.facebook.com/rakesh.k.singh.52/videos/10153462784717602/

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

रेलगाड़ी -रेलगाड़ी

सुना है रेल बजट आ रहा है, पूरा यक़ीन है कि रेल से जुडी यह एकमात्र बात है जो अपने निर्धारित समय पर होती है। बाकी जो है, सो हम और आप जानते ही हैं :)
जितनी नफरत हमें हवाई जहाज और बस के सफर से है उससे दस गुना ज्यादा ख़ुशी रेलयात्रा में मिलती है। इसीलिए इससे सम्बंधित कोई भी चर्चा होते ही, हमारे भीतर का जागरूक नागरिक और भी जागृत हो उठता है। राजनीति में दिमाग लगता नहीं, इसलिए पता ही नहीं चलता कि बजट बनना शुरू कब होता है? खैर...अब बन गया तो बन गया। हमारी कुछ बातें हैं, सुझाव भी हैं जो अगर उसमें शामिल न हों, तो कृपया विचार किया जाए। इससे सिर्फ हमारा ही नहीं देश का भी भला होगा। Now come to the point -

1. सबसे पहली और मुख्य बात, ये waiting list का फंडा ही ख़त्म कीजिये। टिकट या तो कन्फर्म रहे या नहीं रहे। इससे जो चिंता और समझदारी के मारे, ज्ञानी लोग कई ट्रेन में टिकट्स करा लेते हैं और उसके बाद भी अधर में लटके रहते हैं, उनकी ज़िन्दगी में कुछ साँसें और जुड़ जाएंगी। हम जैसे लोग ये दुआ ही करते रह जाते हैं, "हाय, अल्लाह! जा पाएंगे भी या नहीं!" :/ साथ ही ये बहाना भी ख़त्म हो जाएगा कि "क्या करें, पैकिंग तक हो गई थी पर मुई टिकट कन्फर्म न हुई।" बोले तो, सच्चाई में इज़ाफ़ा होगा। जिसकी आज देश को सख़्त जरुरत है। 

2. सिर्फ महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर ही जोर न दें, पुरुष भी मार्शल आर्ट का कोर्स करके सफर नहीं करते हैं। सभी aisle और gate के पास कैमरा लगवाये जाएं और ट्रेन में एक कंट्रोल रूम हो, जहाँ से सब पर नजर रखी जा सके। पर्याप्त महिला, पुरुष गार्ड भी हों।
इससे न केवल सुरक्षा ही होगी बल्कि गंदगी फैलाने वाले लोग भी पकडे जा सकेंगे। उन पर तुरंत ही डबल किराया का fine हो. मात्र समझाने से सुधरते तो डिब्बों की ये दुर्गति न होती! सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी आम जनता ही करती है और इसके लिए सफाईकर्मियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 

3. यह नियम बनाया जाए कि यदि कोई परिवार के साथ यात्रा कर रहा हो, तो उसे एक साथ सीट मिले। या कम-से-कम एक lower birth का वरदान तो मिले ही! और हाँ, upper birth पर चढ़ने के लिए थोड़ा आसान मार्ग बनाइये न! कितनी बार हवा में ही झूलते रह जाते हैं, कि फलाना-ढिमका निकल जाए तो चढ़ूँ! तकलीफ होती है, साब! :O

4. चाय वाले भैया को बोलिए कि same चाय बार-बार गरम करके न पिलाये वरना उसका लाइसेंस रद्द हो जाएगा! यलो वाले पानी में दाल के दाने होने चाहिए और रोटी, परांठों की thickness पिज़्ज़ा जैसी न हो pleeeeease! पनीर का तो आपको पता ही है।

5. एक अत्यधिक आवश्यक बात, जो यात्री इतना लगेज लाते हैं कि मानों घर shift कर रहे हों! उनसे अतिरिक्त charge लिया जाए और वो भी इस अनुरोध के साथ कि जो गरीब बेचारा बस एक ही बैग  लाया है, उसे वो बिना लड़ाई किये रखने देंगे। आपको क्या पता, एक बार हमने अपना बैग गोदी में रखकर यात्रा की है। दुष्ट लोग हमें ऐसे देख रहे थे, जैसे वो तो सरकार की परमीशन लेके बैठे और हम बिना टिकट! ये अन्याय हुआ न। :( 

5. अब आखिरी और सबसे मुश्किल बात, वो ये कि सर/मैडम जी कुछ ऐसा कीजिये कि अपनी ट्रेन जो है न, वो जरा टाइम पर पहुंचे। इससे यात्रियों को तो आराम होगा ही, अपना प्लेटफार्म जो 'कुम्भ मेले' में तब्दील हो जाता है, वो भी नहीं होगा जी। सब टाइम पर अपनी ट्रेन में जायेंगे तो भीड़ काहे होगी? कोई पिकनिक मनाने तो उधर जाता नहीं न!
जो ये काम दुष्कर लगे तो अइसन करो कि देरी होने पर यात्रियों के जलपान और आराम की व्यवस्था करवा दीजिये और भी ज्यादा देरी हो तो... हे-हे अगली ट्रेन का किराया भी सरकार आपही को देना होगा। :P

6. भीड़ तो कम होने से रही, तो जो गेट पर लटके लोग हैं उन्हें रस्से से बंधवा दीजिये। गिर जाते हैं तो उन्हें बड़ी चोट लगती है। या फिर उनके गले में ये तख्तियाँ कि "हमें अपनी जान प्यारी नहीं, इसलिए आज ये try मार रहे।" :( 

फिलहाल इतना ही। कुछ मुद्दों की ओर पिछले वर्ष ध्यान आकर्षित किया था, कृपया उन्हें भी दोहरा लें -  
* छोटे स्टेशनों पर रेल के रुकने का समय बढ़ाया जाए. कई बार सामान और यात्री में से कोई एक ही उतर / चढ़. पाता है. उसके बाद का तमाशा तो सबको पता है.
* पान, गुटका, तंबाकू और इस तरह के अन्य पदार्थों के क्रय-विक्रय पर सख़्त पाबंदी हो. ट्रेन क्या ९० % देश साफ हो जाएगा, जी ! यूँ भी ये धीमे जहर ही हैं.
* चादर, कंबल डिस्पोज़ेबल हों और हो सके तो तकिये के अंदर रखा पत्थर भी हटा दिया जाए. 
* ये आख़िरी वाले के लिए तो करबद्ध प्रार्थना है, कि हर स्टेशन पर होने वाली उद्घोषणा को सुनाने वाले यंत्रों की मरम्मत कराई जाए. क्योंकि 'यात्रीगण कृपया ध्यान दें'.........के बाद भले ही हम कितना भी ध्यान दें, श्रोणि-यंत्र भी लगवा लें...पर क्या मज़ाल है जो एक शब्द भी समझ में आ जाए !
शेष शुभ! :) 
© 2016 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

सलाम, नीरजा!

एक समय था जब मैं बहुत फ़िल्में देखती थी। अच्छी फिल्मों के शानदार सीन दिलो-दिमाग पर अगली अच्छी फिल्म देख लेने तक छाए रहते थे। किसी के गीत, गुनगुनाने लायक तो किसी का कोई डायलॉग सर पर सवार रहता था। एक्शन और हॉरर फिल्मों से हमेशा परहेज किया है मैनें। मैं सरदर्द लेने या भयभीत होने के लिए थिएटर में नहीं जाती।:P 
कुछ ऐसी फ़िल्में भी होती हैं, जिनका असर वर्षों रहता है। मेरे ख्याल से रियलिस्टिक सिनेमा में यह बात होती ही है।

उन दिनों जब दूरदर्शन ही अकेला दर्शन देता था, एक मूवी आई थी उस पर 'एक रुका हुआ फैसला'...आज भी याद करती हूँ तो बस एक ही शब्द दिमाग में गूंजता है,'वाह!' यह पंकज कपूर जी के फैन होने की शुरुआत थी। उसके बाद सारांश, डैडी ने ऐसा जादुई असर छोड़ा कि वो अनुपम खेर द्वारा अभिनीत, बेटे की अस्थियों के लिए टूटकर रोने वाला मार्मिक दृश्य हो या कि 'आईना मुझसे मेरी पहली-सी सूरत मांगे......!' गीत के समय दी गई स्पीच, आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भारतीय फिल्म उद्योग ने हमको ऐसी सैकड़ों फ़िल्में और कलाकार दिए हैं, जिनके नाम हम सदियों गर्व के साथ लेते रहेंगे। खैर..ये चर्चा फिर कभी!

समय के साथ फ़िल्में देखना कब छूट गया, पता ही न चला। ज़िन्दगी की बदलती तस्वीरों के साथ वक़्त बहता रहा। पर इधर बीते दो-तीन वर्षों में मैरी कॉम, कहानी, मांझी देखने के बाद महसूस हुआ कि अच्छी फिल्मों को न देखना मेरी सबसे बड़ी बेवकूफी रही। कितना कुछ सिखा जाती हैं ये फ़िल्में हमें। एक अलग-सी संतुष्टि भी मिलती है इनसे।

'नीरजा' की बातें और उसकी बहादुरी के किस्से बचपन की गलियों से होकर गुजरे हैं। उन दिनों की बहुत-सी बातें, अखबारों की सुर्खियां जेहन में अब भी ताजा हैं। आज जब इस फिल्म को देखने का मन बनाया तो अंदाज नहीं था कि थिएटर को सुबकियों में इस क़दर डूबा पाऊँगी। सुबह के शो में अलबत्ता तो दर्शक होते ही नहीं या फिर सात-आठ चेहरे ही नजर आते हैं। आज पचास से अधिक जोड़ी नम आँखें थीं और एक मिनी थिएटर में इस वक़्त, इतने लोगों को देख काफी तसल्ली मिली।

ओह्ह. नीरजा! तुम सामने होतीं तो आज तुम्हें गले लगा लेती। कितना रुलाया है तुमने यार! मेरा दिल रो रहा, उस माँ के लिए जिसके शब्दों में तुम्हारे लिए कितना गर्व था! मुझे भी है, बेहद गर्व है तुम पर! शबाना आज़मी जी ने ये क़िरदार बखूबी निभाया है, सोनम कपूर का कार्य भी सराहनीय रहा!
लेकिन वही अफ़सोस, वही शिकायत उस अदृश्य शक्ति से कि अच्छे लोगों को चैन से जीने क्यों नहीं देता?? दुनिया जहान के दर्द, तकलीफें उनके हिस्से ही क्यों?? तुम्हारी शहादत को सलाम नीरजा!
काश, अपने ही देश को आग में फूंकते लोग तुम-सा सोच भी पाते तो इंसान कहलाते!
-  © 2016  प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

सफ़र में....

ट्रेन की खिड़की से सर को टिकाये बैठी मैं झांकती हूँ बंद खिड़कियों से. वही खेत-खलिहान, कुछ कच्चे मकान, सदियों पुराने उन्हीं विज्ञापनों से रंगी हुई दीवारें उन घरों की ईंटों की दरारों को ढांपने की नाकाम कोशिश आज भी उतनी ही शिद्दत से कर रहीं हैं. ट्रेन की गति जीवन की तरह ही तो है, सब कुछ पीछे छूटता जा रहा, जैसे हाथ छुड़ाकर भाग रहा हो कोई. ये नीम-हक़ीम के नाम आज भी नहीं बदले, इतने ज्यादा हैं कि दौड़ती हुई ट्रेन के साथ भी इन्हें आसानी से पढ़ा जा सकता है. हम्म्म, याद भी तो हो गए हैं.

क्रॉसिंग पर रुके अधीर लोग अब भी माथे पर वही शिकन लिए खड़े हैं. इनकी फ़िक्र इनके साथ ही जाएगी. वहीँ कुछ बच्चे उल्लास-में, हाथ को जोरों से हिलाते हुए वैसे ही कूदते हैं और चिल्लाकर हँसते हुए "बाय-बाय, फिर मिलेंगे" कुछ इस तरह कहते हैं कि पूरा यक़ीन हो जाता है, दुनिया जीवित है अभी. एक मुस्कान चेहरे पर तैरने लगती है, मैं भी जोरों से हाथ हिलाकर अपने इस आश्वासन को पुख़्ता करती हूँ.

तभी ऊपर की सीट पर बैठे प्रेमी जोड़े की फुसफुसाहट असहज कर देती है.
लड़का, लड़की से पूछ रहा है, "मुझसे बियाह रचाएगी?"
मैं कानों को स्कार्फ़ से बाँध अनजान होने की कोशिश करती हूँ कि उनकी बातों में कोई व्यवधान न उत्पन्न हो, पर ये सामने सीट पर बैठी दोनों लड़कियाँ मुँह को हाथों से छुपा, अपनी बेताब हंसी इतनी बुरी तरह दबा रहीं हैं, कि मन घबराने लगा....कहीं उन दोनों की बात अधूरी न रह जाए!  
दूसरी तरफ बैठे अंकल जी ने भी कनखियों से अभी ही ऊपर देखा. न जाने क्यूँ बगल में बैठी उस महिला का चेहरा अचानक उतर गया. जैसे उन उदास आँखों ने भीतर की नमी को और भी सहेज लिया हो. शायद उसे याद आ गया कोई!

मैं अचानक उनसे अपनी सीट बदल लेती हूँ. जानती हूँ अकेले सफ़र में, ये खिड़कियाँ बड़ा सहारा हैं. बाहर देखने का भ्रम पालते हुए चुपचाप यादों के पन्ने कुछ इस तरह उलट दिया करतीं हैं कि वक़्त का अहसास ही नहीं होता. ट्रेन की मानिंद, ज़िन्दगी भी रफ़्तार पकड़ एक दिन अचानक किसी स्टेशन पर रुक ही जाने वाली है.
मैं अपने स्टेशन के इंतज़ार में फिर से घड़ी चेक़ करती हूँ....
- प्रीति 'अज्ञात'
* एक यात्रा के दौरान 

सोमवार, 4 जनवरी 2016

लेखन मेरी प्राणवायु

शब्द ही शब्द मंडराते हैं हर तरफ, सहेजना चाहती हूँ उन्हें, गागर में सागर की तरह, वक़्त की धूल कभी आँखों में किरकिरी बन नमी ला देती है, तो कभी इस धूल को एक ही झटके में झाड़ फटाक से खड़ा हो उठता है मन, जरा-सी ख़ुशी मिली नहीं कि बावलों-सा मीलों दूर नंगे पाँव दौड़ने लगता है, रेत में फूलों की ख़ुश्बू ढूंढ लेता है, घनघोर अन्धकार में भी यादों की मोमबत्तियाँ जला उजास भर देता है! पर उदासी में अपने ही खोदे कुँए में नीचे गहराई तक उतर जाता है, बीता हर दर्द टटोलता है, सहलाता है, भयभीत हो चीखता-चिल्लाता है! पुकार बाहरी द्वारों  से टकराकर और भी भीषण ध्वनि के साथ वापिस आ मुंह चिढ़ाने लगती है! दोनों हाथों को कानों से चिपकाकर, चढ़ने की कोशिश आसान नहीं होती। घिसटना किसे मंज़ूर है भला? चाहे हिरणी-सी मीलों दूर की दौड़ हो या जमीन के भीतर धंसी दुःख की खाई, दोनों ही जगहों से लौटना आसान नहीं होता, पर फिर भी, जिम्मेदारियों की रस्सी गले में फंदा बाँध ऊपर खींच ही लेती है! एक गहरी ख़राश, कुछ पलों का मौन, चीखता सन्नाटा और हारी कोशिशों का खिसियाता मुंह लिए लौट आता है तन, पुरानी दिनचर्या में शामिल होने के लिए! ठीक तभी मैं, स्वयं को भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिशों में जुटा पाती हूँ! मैं की-बोर्ड को अपना सबसे करीबी मित्र मान, अपनी हर बात उसके कानों में डाल थोड़ा मुक्त-सा महसूस करने लगती हूँ!

लेखन मेरी प्राणवायु है, ये कभी समाज की कुरीतियों और अपराधों के प्रति निकली हुई झुंझलाहट है तो कभी धर्मजाल के खेल में उलझते लोगों के लिए कुछ न कर पाने की बेबसी! ये घुटन को दूर करने की व्याकुलता है और नम आँखों पर हँसी बिखेर देने की ज़िद भी! कभी ये छोटे-छोटे पलों को जीने का अहसास बन एक मासूम बच्चे-सा मेरे काँधे पर झूलता हुआ बचपन है तो कभी खुशियों को कागज़ पर समेट देने की असीम उत्कंठा! पर इन सबके पीछे 'परिवर्तन' की एक उम्मीद आज भी कहीं जीवित है! लेखन मेरे लिए आत्म-संतुष्टि से कहीं ज्यादा 'प्रयास' है कि समाज में एक सकारात्मक और आशावादी सोच भी उत्पन्न कर सकूँ! संघर्षों से हारना मैंने सीखा ही नहीं, इसलिए यह यात्रा अब तक अनवरत जारी है क्योंकि जीवित हूँ अभी!
- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 3 जनवरी 2016

साँसों की पतवार

अहमियत 'साथ' की उतनी नहीं होती जितनी कि साथ होने के अहसास की होती है! 'मैं हूँ न' की आश्वस्ति से अधिक किसी को कुछ नहीं चाहिए होता.....क्या ये इतना मुश्किल है ????  
पर सवाल ये है कि  साँसों की पतवार को खेते रहने के लिए उम्मीद के सागर की तलाश क्यों है? वही क्यों चाहिये, जिसे आपकी जरुरत नहीं! खुद को परखा है कभी? अपने पीछे भागनेवालों को मन वितृष्णा से क्यों देखने लगता है? क्या फ़र्क़ है, उनमें और तुममें! सबको तलाश है किसी और की, जो सामने है उपलब्ध है, उस पर नज़र जाती ही नहीं और असंभव को पाने की जद्दोज़हद में ज़िन्दगी फिसलती जाती है!

मन खुद ही टूटता है, बिखरता है और तिनका-तिनका हो हवाओं में विलीन हो जाता है कहीं! ये भी मन ही है जो बोझिल हाथों से खुद को समेट फिर उठ खड़ा होता है! बार-बार लड़खड़ाना, चोट खाना, एक सहारे के लिए गिड़गिड़ाना और फिर खिसियाकर खुद ही उठ जाना.... ये नियति भी तो मन की स्वयं की ही चुनी है. क्यों नहीं, ये हर बार एक ही झटके में मजबूती से उठ खड़ा होता है, कभी न गिरने के लिए. आत्मसम्मान को बेचकर, उम्र भर का अहसान लेते हुए, भिक्षा-पात्र में गिरता रिश्ता कब तक टिक सकता है? भिक्षुक कभी सम्मान के पात्र हुए हैं भला? एक टूटी आस, खुद से ज्यादा इंसान को तोड़ देती है. उम्मीद नहीं, ख्वाब नहीं , उन्हें पूरा करने की ज़द्दोजहद भी नहीं.... …पर फिर भी जीवन बाकी है. सामने नीला खुला आकाश बाहें फैलाये खड़ा रोज दिखता है और याद आता है एक दिन उसने पूछा था....."कितना प्यार करती हो मुझे?" और मैंने हंसकर कहा था "आसमान से भी ज्यादा". उसे इस बात पर कभी यकीं न हुआ था और मुझे तो वो आसमान भी कम जान पड़ा था. पर आज जब उस ओर देखती हूँ , तो लगने लगता है कि उसे भी आश्चर्य नहीं हुआ था तब, शायद कम ही लगा होगा ये पैमाना! तभी तो कितनी बार इस पैमाने की खिल्ली उड़ाते हुए चला जाता था और मैं खिसियाती हुई अपने को ही दोष देने लगती थी.  आज मेघों का गर्जन मुझे मखौल बनाता लगता है, बारिश की बूँदें तेज़ाब सा गिरकर मेरे चेहरे का  रंग उड़ा देती हैं. मैं जान गई हूँ, ये आसमाँ मेरा न था! मेरे हिस्से की जमीं भी अपनी न रही... जिसके लिए मैंने अपनी हर चीज़ दाँव पर लगा दी, वो मुझे ही गुनहगार ठहरा गया. आज मेरा हर भ्रम चकनाचूर है और उससे जुड़ा हर घमंड भी. फ़िज़ूल था वो यक़ीन कि कोई मेरा भी हो सकता है. अधूरे इंसान का कौन, कब, कहाँ हुआ है? सदियों से उसका मजाक ही बनाया जाता रहा है. अधर में हूँ , पर शिक़ायत नहीं कोई! क्योंकि उसे मेरा यही होना मंज़ूर है!

'सौदामिनी, जीवन के आखिरी पन्नों से' का एक अंश 

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

सौदामिनी की याद में.....!


वो अपने पिता की सबसे दुलारी थी. माँ की आँखों का तारा थी. उसका भाई, उसके लिए सारी दुनिया से लड़ सकता था. सब दोस्त उसके हँसमुख स्वभाव के कारण उसे बहुत पसंद करते थे. वो सबकी मदद भी करती थी. यारों की यार थी, जिसका दुश्मन कोई नहीं! उसके प्रेमी ने पिछले तीन साल में चौथी बार उसे फिर प्रपोज़ किया और मुलाक़ात की जगह भी तय हो गई. बस एक कमी थी उसकी.....वो इस दुनिया को न समझ सकी, कई बार धोखा खाने के बावजूद भी वो सब पर आसानी से विश्वास कर लेती थी. पर इस बार के धोखे ने उसकी दुनिया बदल दी. उसके साथ....... 

अब पिता ने घर से निकलना छोड़ दिया था. मेहमानों के आने पर माँ उसे बाहर आने को मना कर देतीं. भाई उसे देख मुंह फेर चला जाता. प्रेमी ने उसे 'अछूत' समझ सदा के लिए नाता तोड़ लिया. 
वो उस दर्दनाक हादसे से उबर सकती थी अगर बाद में उसका इस तरह मानसिक बलात्कार न हुआ होता. जिन अपनों के लिए वो हमेशा डटकर खड़ी रही, आज वही उसे अकेला छोड़ गए. हर सवाल उसके दोषी होने की पुष्टि करता, उसके कपड़ों, तस्वीरों की चर्चा होती और चरित्र पर हजार लांछन लगते. बलात्कारी का चेहरा मीडिया ने भी नहीं दिखाया पर इसके हर रिश्ते की बघिया उधेड़कर रख दी. 

नए साल की दस्तक का स्वागत वो किस उम्मीद से करती? यही सोच उसने आज सुबह ही स्वयं को समाप्त कर दिया. अब वो अचानक महान बन गई है और उसकी याद में दिए जल रहे हैं....
ग़र विवाहिता होती तो शायद रोज तिल-तिलकर मरती....दुनिया उसे जीने नहीं देती और जिम्मेदारियां मरने! पति तलाक़ की तैयारियों में लग गया होता, ससुराल वालों की नाक कट जाती.

क्या दोष परिवार का है? सोच का है? 
ऐसा क्यों है कि पीड़िता को ही जीने की जद्दोज़हद करनी पड़ती है और गुनहगार आसान ज़िन्दगी जीता है?
क्यों स्त्री को अपने अधिकारों के लिए पुरुष का मुंह ताकना पड़ता है?
दोषी पुरुष क्यों आसानी से समाज में स्वीकारा जाता है?

क्या है इज़्ज़त की परिभाषा? जो कपड़े उतारने वाले इंसान से ज्यादा, पीड़िता से छीन ली जाती है. क्या ये कोई सामान है कि कोई लूटकर चला गया? ग़र है तो दोषी लूटने वाला हुआ या कि लुटने वाला?
धिक्कार है, इस तथाकथित सभ्य समाज पर जो पीड़िता के दर्द को समझने की  बजाय, उसके ज़ख्मों को और भी नोच देता है. 
लानत है उन अपनों पर भी, जो उसके साथ खड़े होने के बदले सदा के लिए उससे नाता तोड़ लेते हैं.

आत्महत्या करने से बेहतर है, अपने अपराधियों को उनकी सज़ा देना.
ध्यान रहे, "फूलन देवी, पैदा नहीं होती....समाज बनाता है!"
- प्रीति 'अज्ञात'

* अपवाद होते हैं पर सामान्य तौर पर समाज का यही दृष्टिकोण रहता है.

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

कुछ तो लोग कहेंगे..!

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक अधिकार बताया जाता है और यह है भी। परन्तु सच्चाई सुनने के बाद की तिलमिलाहट भी जगजाहिर है। आख़िर क्या किया जाना चाहिए? इन सब बातों का समाधान बिना चर्चा हुए निकल पाना संभव है क्या? संशय इस बात का भी उतना ही है कि चर्चा करने से भी कुछ परिणाम सामने आ सकेंगे। लेखकों की सरेआम ह्त्या होती है, उनके साथ मारपीट की जाती है, अपराधी खुलेआम घूमते हैं। तमाम शिकायतों के बावजूद कहीं कुछ नहीं होता। ऐसे में निराशा और क्षोभ से भर कुछ साहित्यकार दुखित हृदय से अपना पुरस्कार लौटाने का साहस करते हैं और चंद अति उत्साही लोग उन पर ऐसे टूट पड़ते हैं, जैसे ये पुरस्कार उन्हें उनका मुंह बंद करने के लिए दिया गया था। क्या 'पुरस्कार' पाने के बाद लेखक को उन सभी का ग़ुलाम बन जाना चाहिए, जिन्होंने उसे इस सम्मान के लायक समझा? अब अपनी कलम से उसे सिर्फ उन सबके लिए 'प्रशस्ति-पत्र' बांटने होंगे? (यहाँ बात सत्तारूढ़/ विपक्ष दोनों की है) वो गलत को गलत न कहे? अन्याय को देख आँखें मूँद ले? लेखक, लिखता है। प्रशंसा, उसके शब्दों की होती है और पुरस्कार भी इसीलिए ही मिलते रहे हैं(ऐसा विश्वास आम जनता का होता है), लेकिन जब उसकी लेखनी पर ही प्रहार होने लगें तो उसके पास विरोध का कौन सा माध्यम शेष रहता है? लेखनी तो उससे छूट नहीं सकती और वो भारी हृदय से उस पुरस्कार को लौटाने का निर्णय लेता है। इसका राजनीति से क्या और कैसा तआल्लुक? दुर्भाग्य से यदि कोई नाता है तो ये अपने-आप में उन सारी संस्थाओं और प्रतिभाओं के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरेगा, जिसकी जवाबदेही हर हाल में बनती ही है। यहाँ प्रश्न पाठकों, समर्थकों की आस्था और अटूट विश्वास का भी है। 

यदि कोई यह कह रहा है कि वो अपने देश में असुरक्षित महसूस कर रहा है तो क्या उसे समवेत स्वर में देशद्रोही क़रार कर देना सही है। क्या हम सचमुच इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में अपराध होते ही नहीं, न हत्या, न बलात्कार, न चोरी, न डाका, न लूटपाट, न झगडे, न आगजनी, न दंगे, न कोई खून-खराबा? क्या हम अन्याय को चुपचाप मुस्कुराकर हर बार झेल लेते हैं? कोई कभी कुछ नहीं कहता और न पलटवार करता है? हाँ, हम शांतिप्रिय हैं इसलिए हम अपराधियों को भी शरण देते हैं और सरेआम गोलियां बरसाने वाले आतंकवादी को भी वर्षों जेल में रख खूब-आवभगत कर उसकी सजा तय कर पाते हैं। कभी-कभी माफ़ भी कर देते हैं....पर इससे हौसले किसके बुलंद होते हैं? उन विघटनकारी ताक़तों और आतताइयों के ही तो!
दरअसल हमारी महानता ये है कि, हम अपनी दिनचर्या में यूँ वापिस लौट आते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो कहीं! इतनी सहिष्णुता और उदारता देखी है कहीं?

बीते माह भी 'बीफ-बवाल' ने ख़ूब बवाल मचाया। आम भारतीय का ह्रदय इस कुतर्क को सुन तआज्जुब से भर जाता है कि वेदों ने गाय की वकालत ख़ूब की है और इंसानी मौत का वहाँ कोई ज़िक्र नहीं! पर इस बीच यह सच धुंधला जाता है कि बताने वालों ने पृष्ठों का चुनाव अपनी सुविधा से किया है।
दुःख होता है ये देखकर कि किसी धर्म विशेष के उल्लेख के साथ ही अब हर बात की चर्चा होती है कि फलाने धर्म के इतने लोग मरे, उनके इतने! इन्होंने उनके लोगों का धर्मांतरण कराया और और उन्होंने इनका! अत्यंत चिंता और विमर्श का विषय है कि ये बात सिर्फ इन धर्मों का झंडा लहराने वाले धर्मगुरु या सीधे-सीधे कहूँ तो, हिमायती लोग ही नहीं कर रहे बल्कि हर दल किसी-न-किसी तरह से ये ज़िक्र छेड़ ही देता है।

क्या मृत्यु से होने वाली पीड़ा भी अब धर्म की मोहताज़ हो गई है? गुण-दोष अब कर्म नहीं, धर्म के हिसाब से देखे जाने लगे हैं। हमारे धर्म का नहीं, मतलब हमारा है ही नहीं! इंसानी मौत का क्या? ख़त्म होती इंसानियत का क्या? दुश्मनों से देश की रक्षा की बात तो बहुत दूर, अपनी रोटियाँ सेंकते इन देशभक्षकों का क्या? 
क्षमा चाहूँगी, धर्म के नाम पर अफवाह फैलाने वालों से; पर हुज़ूर ये 'आम सोच' नहीं है। वरना हम रोटियों को हाथ में लिए पहले यह तौलते कि उस खेत की माटी को न जाने किसने सींचा होगा! कौन उस बीज को रोपता होगा! न जाने किसने फसल काटी और बोरों में भरी होगी! कौन जाने किन-किनके हाथों से गुजरकर चक्कियों में पिस ये आटा हम तक पहुंचा है! साहेब, हम रोटी में अन्न-देवता को देखने वाली धरती के लोग हैं, जो इनका x-ray नहीं करते।

आम भारतीय तो, हिन्दू और मुसलमान की रोटियों के बीच की स्वादिष्ट filling* है। बिल्कुल, सैंडविच की तरह। कभी-कभी जब ये filling कम पड़ जाती है तो सुविधानुसार ब्रेड को घी लगाकर गरमा-गरम तवे पर सेंक खाया/खिलाया जाता है (दंगों की राजनीति में यही होता आया है).... सैंडविच का स्वाद सभी ले सकें, इसके लिए Filling का ब्रेड के समानुपाती होना अत्यंत आवश्यक है। वरना इस अवसर का लाभ उठा, अकेली ब्रेड को चबाने की ताक़ में बैठे लोग भी हमारे बीच ही उपस्थित हैं। इसलिए Filling को बढ़ाना अब हमारी नैतिक जिम्मेदारी और इस देश के प्रति कर्तव्य भी बनता है। 

हमारा देश अपनी सच्चाई के लिए अभी भी जाना जाता है, इसकी पवित्रता की दुहाई दी जाती है, यहां की विविधता आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती है। 
इसलिए कभी-कभी ये स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि हाँ, माहौल बिगड़ भी जाता है। 
ये भी निःसंकोच कह ही देना चाहिए कि हम आपको पूरी सुरक्षा का आश्वासन देते हैं और जो दोषी है ( भले ही मेरा अपना है) उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही होगी।
अपने देशवासियों को ढाँढस बंधाने में कोई परेशानी, कभी आनी ही नहीं चाहिए। 
सच बोलने वाले से दुश्मन की तरह का व्यवहार, कैसे सही ठहराया जा सकता है भला!

हमारे घर का कोई सदस्य कभी हमें कहे कि उसे अच्छा नहीं लग रहा या उसका मन ठीक नहीं, तो क्या हम उसे घसीटकर बाहर कर देते हैं? उसके सिर पर हाथ फेर उसकी समस्या को जानने-सुलझाने की कोशिश नहीं करते? सच की स्वीकारोक्ति और अपनों को आगे बढ़, हाथ थामकर रोकने से बड़ा सुख और कोई नहीं! 'अहंकार' से बड़ा दुःख भी कोई और नहीं! निर्णय हमें ही करना है!

इस पर भी यदि हमें महसूस होता है कि कोई गुनहगार है, तो ये नहीं भूलना चाहिए कि उसने यह बात अपने देश में, अपने ही लोगों के बीच बैठकर उनके पूछे जाने पर कही है…दूसरे देश में जाकर हमारी सभ्यता और संस्कृति का मख़ौल नहीं उड़ाया। भेड़चाल में घुसने से पहले अपने मस्तिष्क को भी इस्तेमाल होने का मौका अवश्य देना चाहिए। हम फिल्म नहीं देखेंगे, उस उत्पाद को इस्तेमाल नहीं करेंगे, जिसका विज्ञापन फलाने-ढिमके ने किया था। पर उस इंसान को तो अपने कार्य की कीमत मिल चुकी, क्या हम जाने-अनजाने में अपने ही देश का नुक़सान नहीं कर रहे? क्या यह ठीक वैसा ही मूर्खतापूर्ण कृत्य नहीं, जैसा कि कहीं दुर्घटना हो जाने पर उसके आसपास की गाड़ियों या राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट कर अपना रोष प्रकट किये जाने में होता रहा है? हमारे द्वारा चुनी गई उन मजबूत कुर्सियों पर विराजमान "हम तो लड़ाई करते ही नहीं" का वक्तव्य देने वाले राष्ट्र-भक्तों के बीच गाली-गलौज और जूतमपैजार को भी इसी श्रेणी में बेहिचक रखा जा सकता है।

किसी ने किसी बात पर अपनी राय दी नहीं कि "देश छोड़ दो" के नारे लगने लगते हैं। क्यों हम उस इंसान को समझ और पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही निष्कर्ष पर पहुँचने का धैर्य नहीं रख पाते? बात की पूँछ पकड़कर पीटना ओछी मानसिकता का परिचायक है और इस बात का भी कि आप हर उस इंसान को देश से बाहर निकालना चाहते हैं जिसकी राय आपसे अलहदा है। यही दुर्भाग्य है हमारे देश का, कि हम तथ्यों को जाँचे-परखे बिना ही कूदकर जज की कुर्सी पर बैठ जाना ज्यादा पसंद करते हैं और चुनिंदा मीडिया चैनल यहाँ उत्प्रेरक की सजग भूमिका निर्वहन के लिए सदैव तत्पर नज़र आते हैं। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब एक कोरा कागज़ी ढकोसला भर रह गई है? 

एक मजेदार बात भी! कोई नेता अपने विरोधी के गले मिल गया तो उसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया! लोग तो दुश्मनों के भी गले मिलते हैं, उनके विचार भी मिलने लगे हैं ये एक तस्वीर कैसे तय कर सकती है? आप गले मिलें तो भाईचारा, गर हम मिलें तो नागवारा?

आख़िरी बात : मेरी जमीं, मेरी मिट्टी, मेरा शरीर, मेरी सोच, मेरी मानसिकता, मेरा पर्यावरण, मेरा व्यक्तित्व, मेरा धर्म, मेरा समाज, मेरा प्रांत, मेरा देश और इसमें बसी मेरी रूह शत-प्रतिशत भारतीय है। इस पर कभी सवाल न उठाना! मैं विश्व-बंधुत्व भाव का भी हृदय से उतना ही सम्मान करती हूँ। गर्व है मुझे अपनी भारतीयता पर और मैं चाहती हूँ कि प्रत्येक भारतवासी अपने देश का सम्मान करे। लेकिन एक परिवार के सदस्य की तरह, जहाँ कमी लगे वहाँ बिना किसी भय के निःसंकोच बोलने का अधिकार भी उसे उतना ही है। सुधार की गुंजाइश कभी ख़त्म नहीं होती। सकारात्मक परिवर्तन के लिए, विचारों की सकारात्मकता भी उतनी ही आवश्यक है।

चेन्नई में जिस तरह सारा देश एक हो गया है, देखकर गर्व होता है। मुसीबत के समय देशवासियों ने हमेशा एक-दूसरे का साथ दिया है और आगे भी देते ही रहेंगे। ये हमारी अपनी संस्कृति है, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। कोई अदृश्य शक्ति गर है, तो उससे यही प्रार्थना है कि एकता दिखाने के लिए हमें कभी प्राकृतिक आपदाओं की आवश्यकता न पड़े। हमारे देश के गौरवशाली अस्तित्व की मिसाल सदैव कायम रहे।
नववर्ष की आहट, गुनगुनी सर्दी की मुस्कुराहट, सर्द-सी कुछ यादें, थोड़ी भुनी मूंगफली और एक कुल्हड़ गरम चाय के साथ
विदा दिसम्बर, विदा 2015 :)
 - प्रीति 'अज्ञात'
http://hastaksher.com/rachna.php?id=230
* Filling(भरावन) ही  लिखा है, feeling नहीं 

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आह.…मेरे सपनों का भारत!

इतिहास गवाह है, धार्मिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा पाप और अत्याचार होते आए हैं। 
अब 'प्रतिबंध' की राजनीति को लेकर सब कटिबद्ध हैं। सोशल-साइट्स पर बैन, फिल्मों पर बैन, पुस्तकों पर बैन और कुछ न बचा तो नौबत खाने-पीने तक आ गई है। वैसे ये शुरुआत 'मैगी' से हो चुकी है, पर तब कारण जायज़ था। इन दिनों शाकाहार बनाम माँसाहार का द्वंद्व, भारत/पाकिस्तान क्रिकेट मैच से भी ज्यादा टी.आर.पी. बटोर रहा है।
 
देखा जाए तो इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और कोई घटना हो ही नहीं सकती! जहाँ आपके पड़ोसी या राजनीतिक दलों को आपकी थाली में परोसे भोजन की परवाह है। यदि बर्दाश्त नहीं तो सब अपना-अपना खाइए। न तो एक पक्ष को दूसरे की रसोई में माँस का लोथड़ा घुमाने की आवश्यकता है और न ही दूसरे पक्ष को उनकी थाली से उठाकर बाहर फेंकने की। एक-दूसरे के बर्तनों में झाँकने की तुक ही क्या है? जब जी करे, साथ बैठकर खाईये; न करे तो एक-दूसरे को न तो उलटी करवाएँ और न ही निवाला छीनने की कोशिश करें। फिर भी न समझ आये तो साथ बैठकर खाने की सभ्यता और उल्लास स्कूल के बच्चों से सीखें।
 
सभ्यता, संस्कृति और विकास की बातों के बीच इस तरह की घटनाएँ मन विचलित कर देती हैं। अवसरवादी संगठनों का देशभक्ति की बीन पर, हर बार की तरह इस मुद्दे पर भी ज़हर उगलने का प्रयास जारी है। सिर्फ एक राज्य के जय-जयकारे से, न तो आप आगे बढ़ेंगे और न ही राष्ट्र को बढ़ने देंगे! सवाल यह है कि ओछी मानसिकता वाले इन लोगों पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगता? देश को सुधारने का ठेका लेने वाले कभी खुद 'सुधार-गृह' की सैर पर जाकर जरूर देखें। ताज़ा हवा, उनके मन-मस्तिष्क को एक नई ताज़गी देगी और सकारात्मक सोच की कलियाँ भी अवश्य प्रस्फुटित होंगीं। 
 
'धर्म' के नाम पर हत्या का समर्थन करने वाले लोगों की धार्मिकता का अंदाज़ा उनके इस व्यवहार और दक़ियानूसी सोच से ही लगाया जा सकता है। जिस 'धर्म' की आड़ में ये हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं, उन धार्मिक ग्रंथों के पन्ने भी तड़पकर रोज फड़फड़ाते होंगे और 'ईश्वर' स्वयं इनके गुनाहों को देख सन्न रह जाता होगा।
अपराधी, 'अपराधी' ही है। बहस, उसके जघन्य कृत्य पर होनी चाहिए। उसके नाम के पीछे क्या लगा है, वो उसे परिभाषित नहीं करता। दोषी या निर्दोष होना क्या अब धर्म तय करेगा? लेकिन अब तक की सभी घटनाओं का सर्वाधिक दुखद पक्ष यही है कि लोग अपराधी की ज़ात पर पहले गौर करते हैं और उसकी बर्बरता की चर्चा बाद में होती है। 
 
साधु, संत, बाबा, महात्मा, देवी और इस टाइप के सभी अति आदरणीय, महान एवं विशिष्ट देशभक्तों की बढ़ती पैदावार देखकर यह सिद्ध होता है कि इन्हें खाद-पानी देने वाले ज्ञानियों की भी कमी नहीं! इन महाऋषियों के शांत और संयमित स्वभाव का चित्रहार आये दिन किसी-न-किसी चैनल पर प्रसारित होता ही रहता है। बेहतर है इसे भी 'इंडस्ट्री' घोषित कर दिया जाए। जिसे जो बेहतर लगे, उसकी भक्ति में सराबोर होता रहे। फिर जनता को अपने 'लुटे' जाने का इतना अफ़सोस नहीं होगा। सब अपनी मर्ज़ी से फ़ीस चुकाकर बेवकूफ़ बनते रहेंगे। वैसे भी अंत में ये ठीकरा अशिक्षित और मूर्ख जनता के नाम पर ही फोड़ा जाता रहा है। शिक्षित वर्ग की 'क्लास' तो कभी ली ही नहीं गई।  
 
इधर एक दलित परिवार को सरेआम निर्वस्त्र करने की घटना जितनी शर्मनाक और घृणित है उतना ही इसे बार-बार सोशल मीडिया पर शेयर करना भी निंदनीय है। वर्षों से यही होता आ रहा है। जो उन्होंने एक बार किया, आप वही लगातार दोहराकर किस नैतिकता का परिचय दे रहे हैं? कुछ लोग इसके समर्थन में ये बोलते भी दिखाई दिए कि बिना ऐसा करे हमें इनका दर्द समझ नहीं आएगा। सोचिये, यदि ऐसा आपके परिवार के साथ होता तो क्या तब भी आप इतनी ही संवेदनहीनता दिखा पाते? क्या तब आप इन नग्न तस्वीरों और वीडियो से सहानुभूति बटोरने या न्याय मिलने की उम्मीद रखते? नहीं न! सुनते ही मन कैसे बौखला जाता है!
 
क्योंकि यह एक निर्धन और कमजोर वर्ग का किस्सा है, इसलिए इसका तमाशा बनाना सहज है। कोई बड़ा नेता, अभिनेता या उद्योगपति होता तो पैसों और ताक़त के बल पर इसे डिलीट करवा चुका होता। गरीबों का रहनुमा कोई नहीं होता! इस बार भी भीड़ न तो हटी, न ही किसी को रोकने की हिम्मत जुटा पाई। हाँ, निर्लज्जता से इस पूरी घटना को रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी उसे अच्छे से याद रही।

न तो किसी राजनीतिक दल को इस मुद्दे में दिलचस्पी होगी और न ही डिबेट के नाम पर दिन-रात चिंघाड़ने वाले मीडिया हाउस कोई पैनल बनाकर इस पर चर्चा करने वाले हैं। खुद को दबंग और जुझारू कहने वाले अधिकतर पत्रकार भी इन जगहों से चुपचाप निकल आना ज्यादा पसंद करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर और निर्बल वर्ग की चिंता सिर्फ एक चुनावी सुविधाजनक विषय है। चूँकि इसमें न तो आमदनी है और न ही ख़बरों को बेचने के लिए आवश्यक मसाला, इसीलिए ये ख़बरें अब अत्यधिक आम हो चली हैं। न तो इनकी जांच होगी, न अपराधी को जेल होगी और न ही यहाँ किसी मुआवजे की उम्मीद है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इनका केस लड़ने कोई वकील आगे नहीं आता, कोई F.I.R. दर्ज़ नहीं होती! चीरहरण करने वाले इन दुशासनों के बीच रहते हुए ऐसे न जाने कितने परिवार, कब ख़त्म हो जाते हैं, कब उस घर की महिलाओं की अस्मत के साथ खिलवाड़ होता है , कब उन्हें चाकू से गोदकर उनकी लाश वहीँ सड़ते रहने को छोड़ दी जाती है, इसकी फ़िक्र करने वाला कोई नहीं। इस तरह के 'हादसों' की कहीं कवर स्टोरी नहीं बनती!
 
'न्याय' अब एक बहुमूल्य शब्द है, बिलकुल कोहिनूर हीरे की तरह! इसे पाने की उम्मीद लिए न जाने कितने जीवन नष्ट हो चुके या मौन कर दिए गए! कोई नहीं जानता। जानने से होगा भी क्या? संख्या बढ़ती ही रहेगी और हम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों को पलट, कुछ पल शून्य की तरफ निहारते हुए, मौन हो, भारी मन से उस पुस्तक को पुन: जगमगाते काँच की अल्मारी में रख उदासी-उदासी का पुराना खेल खेलेंगे।
अभी ही टेलीविज़न पर एक 'ब्रेकिंग न्यूज़' फ्लेश हुई, जिसका सार है…"कहीं संगीत को सीमाओं में बाँधने का काम जारी है!"
सामने दिख रही उस पुस्तक का शीर्षक अभी भी अपनी सार्थकता तलाशने को मुँह बाए खड़ा है…'मेरे सपनों का भारत!'
- प्रीति 'अज्ञात'
 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, अक्टूबर, 2015 अंक का संपादकीय

शनिवार, 7 नवंबर 2015

नुक्कड़ वार्ता

(दो दोस्त, पॉपकॉर्न खाते हुए) 
उफ्फ, ये कचरा कहाँ फेंकूँ?
वो देख न उधर.…एक खाली रैपर पड़ा है, वहीँ डाल दे.
और नहीं तो क्या! एक हमारे डस्टबिन में डाल देने से कौन सी गंदगी साफ़ होने ही वाली है!
हम्म, वोई तो!
और बता, क्या चल रहा है? 
बस, जी रहे हैं. जैसे-तैसे!
अच्छा, सुन..... पिछले वर्ष जो अपहरण और बलात्कार वाली घटना हुई थी, उसका क्या हुआ ? 
कुछ नहीं, मामला अदालत में है!
हे,हे,हे.....अब तो इलास्टिक की तरह खिंचेगा रे भैया! जोर लगा के हईशा!
हा,हा,हा...पर बड़ी दया आती है न कभी-कभी?
एक हमारे अच्छे बनने से कौन-सा सुधार आने वाला है! जब हम नहीं सुधरे, तो देश क्या सुधरेगा!
सही पकडे हैं!
और वो उसके दो बरस पहले जो वृद्ध जोड़े को लूटपाट के बाद मार दिया था?
उसका भी वही हाल! तारीख़ें, बढ़ती जा रहीं हैं!
सात वर्ष पहले जो ज़िंदा जलाने वाला कांड हुआ था, किसको सज़ा मिली ?
पता नहीं, सुनते हैं एक गवाह मर गया और दूसरा मुक़र गया!
पच्चीस साल पुराना वो जघन्य हत्या का मुक़दमा?
अरे! उसके तो जज़ की ही हत्या हो गई और परिवार वाले न्याय के इंतज़ार में ही चल बसे!
ओह्ह्ह...क्या होगा, हमारे देश का?
हर दिन का अख़बार, अपराधों से भरा होता है.
अरे, फ़िल्में जिम्मेवार हैं इसकी!
पर वो तो समाज का आईना होती हैं न!
हाँ, सो तो है!
दरअसल, सारा दोष system का है, देखो न भ्रष्टाचार कितना बढ़ता जा रहा है? कोई कुछ करता ही नहीं! सब हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं.
तुम्हारे बेटे के एडमिशन का क्या हुआ?
होना क्या था, एक लाख दिए..हो गया! दूसरे लोगों ने तो दो-तीन लाख तक दिए थे!
ओह्ह, फिर तो सस्ते में हो गया!
न जाने रिश्वतखोरों से कब इस देश को मुक्ति मिलेगी?
क्या करें मित्र, बड़ी प्रॉब्लम हैं!
ग़रीबी, घटती नहीं और महंगाई बढ़ती जा रही है! 
उस दिन गाँव फ़ोन किया था, काका को?
किया तो था.
मैनें पूछा, क्या हाल हैं भाई? अबकी फ़सल तो अच्छी हुई न?
आँखों में पानी भर बोला...."हुई तो थी, पर बारिश ने सब लील लिया"
यहाँ 'सब' का मतलब मात्र 'फ़सल' ही नहीं...'आस', भी चली गई, वर्ष भर की रोजी-रोटी का जुगाड़ भी, अब वहां चूल्हा नहीं जलेगा, थका मन और शरीर loan को चुकाने की क़िस्तों में गुजर जाएगा !
कुछ घटेगा कहीं तो किसानों की संख्या!
सुना है, हर सरकार की प्राथमिकता सूची में पहला नाम इन्हीं का होता है!
इतने दशकों से सुन ही तो रहे हैं.
एक मिनट, घर से फ़ोन आ रहा है.
हाँ, मम्मी!
अच्छा, ठीक है. हाँ, सुपरस्टोर से ही लाऊँगा.
सुन, मॉल जा रहा हूँ. बाय
ओके, बाय
कल मिलते है. मैसेज कर देना मुझे.
हम्म्म, ओके बॉस!

चलिये, तब तक हम और आप अपने शहरी होने को celebrate करते हैं....बाक़ी फ़िक्र तब करेंगे, जब हमारी प्लेट खाली होगी!
हाँ, हेलो...Please, Take my order ! One large Mushroom Pizza with extra cheese........!
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 
Pic : Clicked By Preeti 'Agyaat'

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

'रिश्ते' या 'प्रशस्ति-पत्र?'

'रिश्ते' कुछ नहीं, एक प्रशस्ति-पत्र के सिवा! जब तक पढ़ते रहो, रहेंगे और पीड़ा बाँटते ही छिटककर दूर खड़े हो जाते हैं! या कि मानव-मस्तिष्क की बनावट ही कुछ ऐसी है जहाँ स्नेह के सैकड़ों पत्र एक सरसरी निगाह डाल डिलीट कर दिए जाते हैं और शिकायतें हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं! 
ये कैसी आभासी दुनिया है जहाँ अपनों का अपमान करते आप, जरा भी नहीं हिचकते 
ये कैसे लोग हैं जो अपना बनकर बात करते हैं और पलटते ही छुरा घोंप देते हैं 
ये कैसे रिश्ते हैं, जो रिश्तों की मर्यादा ही नहीं समझते 
तो क्या हुआ.…जो आपने उनके दुःख को समझा 
तो क्या हुआ....जो आप हर घडी, हर पहर  किसी को अपना समझ उसके लिए बाहें फैलाये तत्पर खड़े रहे 
तो क्या हुआ...जो आपने अपना जीवन उनके नाम कर दिया 
मकान दिखते हैं.....लेकिन पैसे कमाने में घर कहीं खो गया है 
सदस्य दिखते हैं..... पर gadgets की भीड़ में परिवार व्यस्त हो गया है 
ये  कैसे रिश्ते हैं, जहां आंसू पोंछने को कोई नहीं होता और पीड़ा पहुंचाने में किसी को जरा भी दर्द नहीं होता 
जहाँ आप सबके मंन के दुःख को समझें,  दूर करने की भरसक कोशिश भी करें पर 
आप की बात सुनने वाला....…कोई नहीं!
जब आप गिरें तो संभालने वाला....कोई नहीं!

दर्द अकेले ही सहना होता है! गैरों  की क्या कहिए, जब अपने ही रिश्तों में सिर्फ़ प्रशंसा सुनने को आतुर रहते है, उनकी एक ग़लती की तरफ इशारा तो कीजिये और सब कुछ ख़त्म.
आपकी तकलीफ का मोल....कुछ नहीं!
आँसुओं का मोल...कुछ नहीं!
खोई मुस्कानों का मोल...कुछ नहीं!  
जो अपना होने का भरम देता रहा, उसके ही द्वारा अकेला छोड़ जाने का मोल.....कुछ नहीं! 

गर दस्तक देनी है तो दिलों पर दो! 
जो रहना चाहते हो यादों में तो किसी के ह्रदय पर अपना नाम अंकित कर दो! 
दर्द देने का वक़्त  है तो बांटने के लिए भी निकालो!
क्या हमेशा ही हम सही और सामने वाला ग़लत होता है? आपके अलावा किसी में कोई भी अच्छाई नहीं? आप परफ़ेक्ट हैं और दूसरा इंसान एक डिफेक्टिव पीस? ग़लती न होने पर भी कोई 'रिश्ते' को बचाने की ख़ातिर हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी माँगता रहे और आप उसे कोसते रहें, झिड़कते रहें....इसका मतलब कि आपको न तो उस इंसान में दिलचस्पी है और न ही रिश्ते को बचाने में. ये भी संभव है कि आप सब कुछ ख़त्म करने के लिए सिर्फ़ एक बहाने की तलाश में हैं.

इसका यह तात्पर्य हुआ कि दरअसल कोई किसी का है ही नहीं..और न होगा कभी! संबंधों को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय 'मौन' ही है, जहाँ रोज ही घुट-घुटकर एक मौत होती है पर शरीर ज़िंदा रहता है; दिखाई देता है  आभासी मुस्कानों को लपेटकर अपने जीवित होने का भरम बनाए रखना भी तो आवश्यक होता है न! 
पर ये सवाल अब भी अनुत्तरित ही रहा ----
"क्या रिश्ते मात्र 'प्रशस्ति-पत्र' बनकर रह गये हैं?"
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

कवि को जूझना आता है.....

रचनाकार केवल उतना ही नहीं होता, जितना दिखाई देता है! उसकी रचनाएँ एक जीवन की पूरी कहानी कहती हैं, उसकी सोच उसके आसपास के वातावरण, सामाजिक व्यवस्था और संस्कारों का प्रतिबिम्ब होती है। यूँ ही कोई कवि / कवयित्री नहीं बन जाता, जब तक उसने संघर्षों को करीब से देखा न हो, महसूस न किया हो! कुछ लोग संघर्ष को आर्थिक परिस्थितियों से जोड़ लिया करते हैं पर बहुधा यह मानसिक और व्यवस्था के विरुद्ध चल रहा अंतर्द्वंद्व भी होता है।जहाँ कुछ न कर पाने की विवशता, मुट्ठी भींचने पर मजबूर कर देती है। इन हालातों से अकेले ही जूझते रहना, आसपास के लोगों द्वारा किये गए हर ताने को बर्दाश्त करना, अपनों का भयाक्रांत हो साथ छोड़ जाना और इन सबसे घायल ह्रदय और उसकी पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए अपने 'होने' को और इस 'जीवन' को सार्थक करने का जूनून ही सही मायनों में एक संवेदनशील और भावुक इंसान को रचनाकार में तब्दील कर देता है।

लेखक कभी आत्महत्या नहीं करते, हाँ उनकी हत्या अवश्य हो जाती है। कवि को जूझना आता है, टूटना आता है, हर पीड़ा को सहना आता है, वो जीते भले ही न पर मैदान छोड़ भागता नहीं, उसे डटकर खड़े रहना आता है और इन सबसे भी ऊपर एक और बात..उसे हर हाल में मुस्कुराना आता है! 
आह..यही उसके जीवन भर की कमाई और आय-व्यय का लेखा-जोखा है ! :D
भ्रम में बने रहने से बेहतर है डूबना या पार कर जाना! लेकिन उस पार पहुँचने के बाद आवाजों को अनसुना करना भी सीखना होगा. ये हुनर सबमें कहाँ, हमें डूब जाने का डर है और उन्हें उम्मीद! :)
-प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

बनारस

बनारस से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है, इतना कि मुझे खुद भी याद नहीं! पहली बार वहाँ जाना तब हुआ था जब नानी जी को cancer था और मिर्ज़ापुर के डॉक्टरों ने उन्हें बी.एच.यू. ले जाने की सलाह दी थी. वहीँ रहे थे हम लोग, अब तो मालूम नहीं लेकिन उन दिनों बी.एच.यू. का कैंपस खूब हरा-भरा हुआ करता था. वो एक उदास समय था, इसलिए तब उसमें खेलने-कूदने में कोई आनंद नहीं आता था.

उसके कई वर्षों बाद फिर जाना हुआ, तब नाना मिर्ज़ापुर कॉलेज से रिटायर होने के बाद यहाँ पीएचडी गाइड थे. मैं और मम्मी-पापा 'विश्वनाथ मंदिर' देखने गए थे. बहुत ही संकरी गलियों और अत्यधिक भीड़भाड़ के बीच चलते हुए हम वहां तक पहुंचे थे. दर्शन के बाद लौट ही रहे थे कि अचानक किसी ने मुझे खींच लिया. मैं जोर से चिल्लाई और तुरंत ही माँ-पापा ने भी देख लिया. वो भाग चुका था लेकिन हम सब घबरा गए और सीधे घर वापिस आ गये थे.

तीसरी बार की यात्रा अत्यधिक सुखद रही. वो भी स्कूल के दिनों की ही बात है. हम सब वहां दशाश्वमेध घाट पर गए, बहुत देर तक बैठे रहे थे. अच्छा लगा था वहाँ सीढ़ियों पर बैठे हुए पानी को उछालते रहना! कोई अस्सी घाट नाम से भी कुछ था. पर मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित वहां के तुलसी मानस मंदिर ने किया था. अगर मुझे ठीक से याद है तो ये वही स्थान है जहाँ मैनें पहली बार मंत्रोच्चारण और बोलती मूर्तियों को देखा था. तब कई दिनों तक उनकी स्मृतियाँ मुझे अचरज में डालती रहीं थीं और मैं सबका खूब दिमाग खाती. हर बार यही सवाल करके कि...वो मूर्तियां बोल कैसे रहीं थीं!

मैं मिठाई की शौक़ीन कभी नहीं रही लेकिन वहाँ जाकर लगा था कि मिठाई के बिना ये लोग जी ही नहीं सकते (ये अतिश्योक्ति हो सकती है, पर तब मैनें ऐसा ही पाया था). ये 30 वर्ष पुरानी बात है, आजकल तो नहीं खाते होंगे. मुझे ये मेले टाइप फीलिंग वाली जगहें बहुत पसंद हैं, छोटी-छोटी दुकानों, ठेले वालों के पास बहुत सुन्दर वस्तुएं होती हैं. लकड़ी के रंगीन खिलौने, कारीगरी के सामान और भी न जाने क्या-क्या! बनारस में ये सब कुछ हुआ करता था. हमने खूब खरीददारी भी की थी. वहाँ की बोली बड़ी ही मीठी, प्यारी-सी है. अगर मुझे कोई बात नापसंद थी तो वो वहां के लोगों का पान खाकर यहाँ-वहाँ पिचकारी बना देना. 
पता नहीं...तब और अब के बनारस में कितना अंतर आया होगा! आज न्यूज़ में वहाँ शांति की ख़बरें देखकर जहाँ मन को एक तसल्ली मिली वहीँ कुछ कच्ची-पक्की यादें भी ताजा हो आईं।
  
इसके साथ ही मिर्ज़ापुर भी याद आ गया...जाना है वहाँ एक दिन, कई दिनों के लिए! कब, कैसे और क्यों ये भी पता नहीं! बस, जाना है एक दिन! कुछ नहीं तो नाना-नानी के घर को और उस बगीचे को छूकर लौट आऊँगी, जहाँ की आवाज़ें इन दिनों बहुत पुकार रही हैं! 
मुझे कलकत्ता और बोध गया जाना है, लखनऊ, मुंबई भी जाना है....और इसी जीवन में जाना है, ऊपर जाने के बहुत पहले!
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 7 सितंबर 2015

'सच' तो ये.... 'सच' कुछ भी नहीं !

क्या मैं हमेशा सच बोलती हूँ ? या बोल पाती हूँ ? यह बात ही सच की सच्चाई को बयां कर रही है. हाँ, मैं सच बोलना पसंद करती हूँ, पर हर बार सत्य ही बोल सकूँ, यह संभव नहीं हो पाता, क्योंकि उसमें किसी को आहत कर देने का भय भी समाहित होता है. और यदि मेरे बोले सच से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचे तो मैं असत्य का सहारा लेने की बजाय मौन हो जाना ज़्यादा पसंद करती हूँ. पर यदि न्याय और अन्याय के बीच जंग छिड़ी हो, तो मैं बेझिझक सच का दामन थाम लेती हूँ, फिर चाहे सामने वाला इंसान कितना ही प्रतिष्ठित और ताक़तवर क्यूँ न हो !

'सच' की सबसे बड़ी सुंदरता यह है, कि वो एक ही होता है और स्थाई भी, उसके साथ कहानियाँ गढ़ने का परिश्रम नहीं करना पड़ता, उसे याद नहीं रखना होता ! 'झूठ' को हमेशा संभालना होता है, किन परिस्थितियों में किससे, कब, क्या और क्यों कहा था, इन सभी बातों से मस्तिष्क इतना ज़्यादा बेचैन हो जाता है कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति खुद भूल जाता है और आसानी से पकड़ में आ जाता है.

'सच' के साथ हमेशा रह पाना उतना आसान भी नहीं, मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूँ जो बड़े ही गर्व से खुद को 'सत्यवादी' कहलाना पसंद करते हैं. पर जब कोई और उनका सच कहे तो, तिलमिला उठते हैं. मेरी नज़रों में असली सत्यवादी वही है जो दूसरों का सच बोलने के साथ-साथ अपनी सच्चाई भी नि:संकोच स्वीकार कर सके. वरना वो 'सत्यवादी' नहीं 'आलोचक' ही कहलाएगा ! ध्यान रखने योग्य बात यह भी है, कि सच बोलने के पहले उसके होने की पुष्टि ज़रूर की जाए और जब यह तय हो जाए कि वही सामने वाले का सच है, उसे तभी ही बोला जाए ! कई बार लोग आधी-अधूरी बात से या पूर्वाग्रह से वशीभूत हो स्वयं ही पूरी कथा बुन लेते हैं, इससे बचना चाहिए. 'आधा सच' भी 'आधा झूठ' ही होता है !

सत्य की एक विडंबना यही है कि ये अक़्सर ही अकेला होता है, जबकि झूठ के साथ पूरा मेला होता है. सच बहुधा उदास हो, कोने में छुपा अकेला सूबकता है जब लोग झूठ की तलाश में व्यस्त रहते हैं ! सत्य कायर नहीं है ,ये ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही आशावादी हैं, तभी तो चुप हो बैठ जाता है, और झूठ की प्रतिरोधक-क्षमता इससे कहीं ज़्यादा दिखाई पड़ती है. जो दिखता है, उसे ही दुनिया भी सच मान लेती है, क्योंकि असली मज़ा तो उन्हें झूठ ही देता है. एक सरल, सच के साथ चलने वाला जीवन 'झूठ' की छत्रछाया में हताश और उम्र-भर संघर्षरत रहता है. आजकल 'झूठ' ज़्यादा बेबाक और 'इन' है, और 'सच' अकेला ही अपने अस्तित्व की तलाश में खिसियाता-सा हाथ-पाँव मारता दिखाई देता है. लेकिन मैंनें न हार मानी है और न मानूँगी, 'सच' के साथ, बिना किसी के सहारे, नि:स्वार्थ आगे बढ़ना है, जिसे जो सोचना है सोचे....वो उनकी स्वतंत्रता है. मैं लोगों के बार-बार झूठ से व्यथित अवश्य होती हूँ और बेहद विचलित भी, पर यही तो जीवन है !
वर्तमान परिवेश, समाज और व्यवस्था को देखते हुए यही कहना चाहूँगी कि - 

झूठ, झूठ और सिर्फ़ झूठ ! 
सारे रिश्ते-नाते...झूठ ! 
दोस्ती के वादे....झूठ ! 
अपनेपन के दिखावे..झूठ ! 
प्यार की वो बातें....झूठ ! 
सारे ख़्वाब सुनहरे....झूठ ! 
खुशियों के वो पल भी कृत्रिम, 
चेहरे की मुस्कानें......झूठ ! 
झूठी बस्ती, झूठा जमघट, 
ये लगता, रिश्तों का मरघट ! 
मायावी इंसान यहाँ पर, 
एहसासों की बातें.....झूठ ! 
स्वार्थ भरा, अब हर धड़कन में, 
दिल ना समझे, इनकी चाल ! 
कब तक गिनता, अपनी साँसें, 
ज़ज़्बातों का ये कंकाल ! 
झूठ ही सब पर हावी है,अब 
सच क्या है, मालूम नहीं, 
शब्दकोष का हिस्सा है, बस 
'सच' तो ये.... 'सच' कुछ भी नहीं !

You can also read it here -
http://parikalpnaa.blogspot.in/2015/07/blog-post_25.html

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

अनुशासन

दो दशकों से भी ज्यादा पुरानी बात है ! तब जो भी बच्चा कक्षा में ज्यादा बात (बोले तो disturb ) करता था, उसे या तो आखिरी में दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा कर दिया जाता था या फिर बेंच के ऊपर दोनों हाथ करके ! ज्यादा दिलदार टीचर जी हुए तो कान पकड़ के मुर्गे बनने का मनोरम दृश्य भी यदा-कदा दिखाई पड़ जाता था या फिर बच्चा सबकी नजरों से अदृश्य यानि कि सीधे कक्षा से बाहर!
उस समय वो बच्चा तो असहाय दिखता ही था, अंदर बैठे उसके दोस्तों को भी धुकधुकी लगी रहती थी....हाइला , कहीं हमारा नाम न बोल दे ! दुनिया का रिवाज़ है, कि "गेंहूँ के साथ घुन भी पिसता ही है ", सो कई मासूम चेहरे उस बच्चे के अपराध की भेंट चढ़ा दिए जाते थे ! अब जो बचे, उनसे न हँसा जाए और न ही रोया ! "इधर कुआँ उधर खाई टाइप सिचुएशन!"

खैर.... सुधरा कोई भले ही न हो ! पर टीचर जी और सर जी का ख़ौफ़ ज़बरदस्त रहता था ! दिक्क़त बस तभी होती थी, जब ये जिम्मेदारी निरीह 'मॉनिटर' के पल्ले पड़ती थी ! कुछ अपने दोस्तों को भारी डिस्काउंट के लालच (यहाँ इसका तात्पर्य नोट्स से है) में बचा लिया करते थे और कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी सबकी बराबर क्लास लेता था ! अपनी-अपनी क़िस्मत है भैया !

माराकूटी, बटन तोडना, पेन फेंक देना, पानी फैलाकर निकल लेना जैसी हिंसक और निकृष्ट घटनाओं के लिए एक नियत समय था ! जिसे 'ब्रेक' के आत्मिक नाम से जाना जाता था !
हर शहर, हर स्कूल में लगभग यही प्रथा थी ! वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार इनमें फेरबदल भी प्रचलन में था ! 

घर में बताओ तो डबल कुटाई का डर! सो, आपसी सहमति से सब चुप्पी लगा जाते ! माता-पिता भी ये तो नहीं कहते न कि"बेटा, ख़ूब टेबल-कुर्सियाँ तोड़ो! कॉपी-क़िताब के पन्ने फाड़ो और फिर अगले दिन शान से अपने टाइप के लोगों के साथ कक्षा में प्रवेश करो! उसके बाद मैम की शिकायत, प्रिंसिपल से कर आओ !"

MORAL :  'अनुशासन', आज भी उतना ही आवश्यक है जितना २० वर्ष पहले हुआ करता था ! ये अलग बात है कि लोग न तब सीखे और न अब कोई चांस हैं ! बच्चे इस कहानी से क्या शिक्षा लेंगे, पता नहीं …बस, आज यूँ ही याद आ गई ! हम कौन, एवीं खामखाँ मरे जा रहे !
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

इंटरनेट देवता जी

हमारे परमपूज्य श्री श्री 1008 इंटरनेट देवता जी का निवास-स्थान कहाँ है ? :O
मेरा उनसे विनम्र अनुरोध है कि वर्षा ऋतु में भी नियमितता बनाये रखें। जिससे कुछ गरीबों को सन्देश के आदान-प्रदान में असुविधा न हो ! आपकी उपस्थिति के बिना जीवन व्यर्थ है और दूरभाष पर होने वाले आर्थिक और मानसिक व्यय को बचाने में भी आप नितांत उपयोगी सिद्ध हुए हैं ! :)

हे, जन-जन के कष्ट निवारक! 
समीपता और दूरी के समानता से संचालक! 
मनोरंजनकर्ता, सबके मस्तिष्क के स्वामी ! 
आज के पावन दिवस पर आपको कोटिश: प्रणाम एवं ह्रदय से आभार ! :)

दक्षिणास्वरुप कुछ पुराने मोबाइल और माउस रख दिए हैं !
कृपादृष्टि बनाये रखना, बाबा !
आशीर्वाद दीजिये न बाबा ! :(
अरे हाँ,  वो कष्ट-निवारण मन्त्र का जाप करते समय समोसा, एक खाऊँ या दो ? :P
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मोरल : मेरा पूरे विश्व से निवेदन है कि आदरणीय सम्मानित श्री अंतर्जालीय देवता और सूचना संपादक परम भक्त श्रीमान गूगल देवता जी  की पूजा-अर्चना के लिए एक धार्मिक स्थल का  निर्माण किया जाए ! लेकिन :/ टेंशन यही है कि वो किस धर्म का होगा ! उफ्फ्फ, यहाँ तो सबका आना-जाना है, फिर अपन के लड़ने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं रहेगा ! हुँह, तो क्या फायदा रे ! :/ :(
- © 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

'सौदामिनी', जीवन के आख़िरी पन्नों से......

कितना आसान है ये कह देना, "बस तुम खुश रहो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए ! अगर ये मेरे बिना सही, तो वो भी मंज़ूर है मुझे!"
पर दिल क्या सचमुच मंज़ूर कर पाता है इसे ?
उसकी एक हल्की-सी आहट, उसकी मौज़ूदगी का अहसास भर सिहरा देता है ! उम्मीद और डर के बीच झूलता हुआ ये मन साँसे रोक कर इंतज़ार करता है कि अब कोई पलटकर पूछेगा, "कैसी हो तुम?"
अब कोई सिर पर हाथ फेरेगा और कहेगा, "अरे, उदास क्यों हो भई?" आँखें ये सोचकर ही भीगने लगतीं हैं, गला रुंध-सा जाता है और मस्तिष्क स्वयं को उन जवाबों के लिए तैयार करता है लेकिन तब तक वो चेहरा ओझिल हो चुका होता है ! 
मैं तो यही कहती कि "ठीक हूँ!" तुम्हारा पूछना भर ही मेरा दिन बना देता !
पर अब सचमुच अहसास होने लगा है कि तुम खुश हो मेरे बिना !
सॉरी,लेकिन मैं इतनी महान नहीं कि आसानी से कह सकूँ..."बस तुम खुश रहो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए! 
क्योंकि मुझे तुम्हारी मौज़ूदगी चाहिए!
तुम्हारी वो मुस्कान चाहिए जो मुझे देख ही तुम्हारी आँखों की झीलों में खुशबुओं-सी तैरने लगती थी !
मुझे मेरे इस दुनिया में होने की एकमात्र वज़ह चाहिए! 
हाँ, इसके अलावा मुझे वाक़ई कुछ नहीं चाहिए !
वो अगले जन्म के साथ का वादा भी नहीं! 
जो जीते-जी न मिल सका, मर जाने के बाद उसकी उम्मीद रखूँ; अब इतनी बेवक़ूफ़ भी नहीं रही मैं!
यूँ जानती तो ये भी हूँ कि मेरी बातों का कोई मोल नहीं!
याद है एक दिन तुमने गुस्से में कहा था कि "मैं पछतावा हूँ तुम्हारी ज़िंदगी का, प्रताड़ित करती है मेरी उपस्थिति तुम्हें !"
बहुत रोई थी मैं उस दिन... और अभी भी तो !
पर हर बार की तरह तुम्हें 'बेनेफिट ऑफ डाउट' दे दिया था ! तुम्हारा गुस्सा और मूड, तुम खुद भी कहाँ जान सके हो अब तक!
हर बार आखिरी पत्र मानकर लिखती हूँ! पर लौट आती हूँ खुद ही, बिन बुलाये !
न जाने क्या शेष है अभी !
उम्मीद नहीं है ये!
इंतज़ार भी नहीं!
चाहत तो यूँ भी दोतरफ़ा ही जायज़ होती है !
पीड़ा बेतहाशा है !
पता नहीं क्यों, दिल आज भी इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि "तुम सचमुच खुश हो मेरे बिना !"
तुम ख़ुद शांत मन से एक बार कह दो न मुझे, कुछ इस तरह कि विश्वास कर सकूँ और उसके बाद तुम देखना, आवाज़ तक नहीं दूंगी कभी!
हाँ, एक तसल्ली हो जायेगी हमेशा के लिए !
उसके बाद क्या होगा ?
क्या करोगे जानकर ?
"फ़टी-पुरानी, बिना ज़िल्द वाली पीली क़िताबों का आख़िरी पृष्ठ अक़्सर गायब ही रहता है !"
(एक अंश - 'सौदामिनी', जीवन के आख़िरी पन्नों से, से )
© प्रीति 'अज्ञात'
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