मंगलवार, 31 जुलाई 2018

दो मिनट मौन

बकरी का किस्सा जब सुनने में आया तब समझ से बाहर था कि इसे क्या कहा जाए! क्योंकि इस घटना के सामने 'पाशविकता' एक सभ्य शब्द लगने लगता है और 'जानवर' इंसान से कहीं बेहतर नस्ल के प्राणी जान पड़ते हैं. दुःख यह है कि उनके पास  विरोध का कोई माध्यम नहीं.  न तो उन्हें गाली-गलौज़ कर अपना आक्रोश व्यक्त करना आता है और न ही उनमें पोस्टर लगा, मोमबत्तियाँ जलाकर शांतिपूर्ण तरीके से रैलियाँ निकालने की सभ्यता ही विकसित हुई है. संभव है यह भी कहा जाए कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं....तो चलो, मुज़फ्फ़रपुर की बात करते हैं. यूँ भी क्या फ़र्क़ है, इस बकरी और उन बच्चियों में! दोनों ही निरीह, दूसरों पर आश्रित, जिनके दुःख-दर्द से दस दिन बाद किसी को कोई वास्ता नहीं रहने वाला!  बड़ी-बड़ी घटनाएँ, हादसे, नृशंस हत्या, गैंगरेप के हज़ारों किस्से आसानी से गटकने वाले हम लोग अब चीख-चीखकर हार चुके हैं और मजबूरीवश ही समझिये पर पक्के हो चुके हैं. हमारी इस कमजोरी को आती-जाती सभी सरकारें और मीडिया तंत्र अच्छे से जान चुका है. तभी तो उस निर्लज़्ज़ अपराधी की हँसी यूँ ही नहीं है. यह धन का गरूर है, न्याय को खरीदने का दंभ है, ऊँची पहुँच का घिनौना प्रमाण है, आगे भी शोषण करते रहने का बुलंद दस्तावेज है.

सूरत, पानीपत, जींद, कठुआ, दिल्ली के उदाहरण तो बस अभी-अभी के हैं. अपराधी, अपराध करते समय एक बार भी नहीं सोचता होगा कि वह जिसके साथ कुकर्म कर रहा है वह एक मासूम बच्ची है, महिला या अधेड़ उम्र की महिला लेकिन 'न्याय-तंत्र' की व्यवस्था एकदम केयरिंग है वह पीड़िता की उम्र के आधार पर किसी वहशी की सजा 'एडजस्ट' कर अपनी महानता का परिचय देना नहीं भूलती. यूँ हम सभी जानते हैं कि भूले-भटके से कभी किसी को जेल की हवा खानी भी पड़ी तो पैसों की गर्मी उसे ससम्मान बरी कर ही देगी और न किया तब भी यहाँ 'दंड' का तात्पर्य वर्षों तक मुफ्त की रोटियाँ तोडना ही तो है, और इन्हें पालने-पोसने का खर्च करने को जनता है ही. उसे जब चाहे नोचा, निचोड़ा जा सकता है.

हम इतने आशावादी हैं कि तब भी सरकारों से उम्मीद रखते हैं और जुए  की तरह कांग्रेस, बीजेपी, आप की गोटियाँ फेंक जीतने की कोशिश करते हैं, जबकि राजनीति एक ऐसा खेल है जिसमें हर हाल में हार प्रजा के ही हिस्से आती रही है.
नेता बहुत बेचारे हैं, न छेड़िये उन्हें! उनके पास समय ही नहीं ... वे स्वयं को घोटालों और स्टिंग ऑपरेशन से बचाने की जुगत भिड़ायें या आपकी बकवास सुनें! आप ICU में तैरें या बाढ़ में डूबकर मर जाएँ, उन्हें तो हेलिकॉप्टर से बाढ़ पीड़ितों का दौरा कर ऊपर से टॉफियाँ उछालनी हैं, सभी बुरी घटनाओं की निंदा कर उसका ठीकरा अपने विरोधी पर फोड़ना है, विदेशों में अपनी महानता के पर्चे बाँट जयकारा लगवाना है. हम कहाँ गँवारों की तरह वही राग गाये जा रहे हैं! जबकि अब तक हमें आदत पड़ जानी चाहिए थी कि रोज सिर झुकायें और इंसानियत के नाम पर 'दो मिनट मौन की' श्रद्धांजलि अर्पित करें.
इस विषय पर मेरी यह आखिरी पोस्ट है.
- प्रीति 'अज्ञात' 
#मुज़फ्फ़रपुर

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

रोटी

'मृत्यु' बिकाऊ है और बेहद आसान भी! पैसों की गर्मी ने, संवेदनाओं को सोख लिया है। रुपया ही बोलता है, वही चलता है! जीवन उसी को कमाने की मशीन जो बन चुका है! भावनाओं का मूल्यांकन, संबंधों की सुंदरता, बचपन की मासूमियत, किशोरों की ठिठोली और मन की संतुष्टि अब ज़रूरतों की बाढ़ में डूबकर अपने अस्तित्व की खोज में भटक रही है! यहाँ जमीन के लिए लड़ाईयां होती हैं, इस सच को जानते हुए कि एक दिन इसी जमीन के अंदर गाड़े जाने वाले हैं, बम-विस्फोट की योजनाएं बनती हैं अपने ही देश को उड़ाने के लिए, कायदे-कानून की धज्जियाँ; खोए आदर्शों की तरह हर तरफ बिखरी दिखाई दे रही हैं। हड़ताल, अब अपनी जायज़ मांगों की पुकार न होकर सुनियोजित दंगे का भरम देने लगी है। अपने ही देश की संपत्ति को आग में झोंककर आखिर हम किस मुँह से अधिकारों की मांग करते हैं? 

गरीब बचपन चीखकर रोता है, एक बेबस पिता कहीं बोझा ढोता है, इधर रोटी की प्रतीक्षा में तीन भूखे पेट दरवाजे पर आँखें रख हमेशा-हमेशा के लिए वहीं गहरी नींद सो जाते हैं। जो रोटी न दे सके, वे उन्हीं भूखे पेटों को चीरकर मृत्यु के कारण तलाशने की कोशिशों में जुटे हैं। यह भूख का ही दोष रहा होगा कि वह कुछ नहीं कह पाती। सूखे हलक़ और आँतों से चिपककर सुन्न हो बैठ जाती है। इंसानियत को इन दिनों ज्यादा धक्का नहीं लगता। धक्के खा-खाकर हम सब भी तो अभ्यस्त हो चले हैं। काव्य की आँखों से दो बूँदें गिरती हैं; अदृश्य हो जाती हैं! चहुँ ओर एक मौन पसर जाता है, बीच में झिलमिलाती हुई मोमबत्ती थोड़ी देर जलकर, एक टूटी उम्मीद की तरह अंतत: वहीं हारकर बैठ जाती है! विरोध के स्वर भी उठते हैं और नया विषय मिलते ही उनकी दिशा ऐसे बदल जाती है जैसे किसी बच्चे को अगली कक्षा में प्रोमोट कर दिया गया हो और वो दौड़कर अपनी सारी पुरानी किताबें रद्दी वाले के लिए उठाकर एक कोने में पटक आता है। समय की एकत्रित हुई धूल. इसे पुराना घोषित कर देती है और इसमें रूचि समाप्त हो जाती है। 'मृत्यु अब एक समाचार भर है।'

मौतें रोज होती हैं, कारण बदलते रहते हैं! रोज हजारों लोग किसी-न-किसी अपराध की बलि चढ़कर अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं, परिवार ख़त्म हो जाता है, आँसू सूख जाते हैं, ह्रदय भीतर तक कसैला हो जाता है और एक परिवार समाज को घृणित भाव से देख अपनी सारी आशाएँ, किसी नदी में पार्थिव शरीर-सा प्रवाहित कर आता है! उसके विश्वास को किसने तोड़ा? इस समाज ने ही उसका सर्वस्व छीना है. इसीलिए जिस अनुपात में अपराध होते हैं, उसी अनुपात में उतनी ही नकारात्मकता समाज के प्रति बढ़ती जाती है।

विकास करना है, तो अपराध को रोकना होगा! रोते, उदास, मायूस चेहरों से परिवर्तन की उम्मीद न कीजिये साहेब ! उन्हें हौसला दीजिये, विश्वास दीजिये, उनकी खोई मुस्कान वापिस लौटाने की हलकी-सी कोशिश भी कुछ दिलों को रोशनी से भर देगी। और गर हमारे समाज में 'मौत' यूँ ही  सामान्य घटना बनकर रह गई तो फिर इस  'दर्पण' के टूटकर बिखरने में भी अधिक वक़्त नहीं लगेगा!

कवि ह्रदय और आम आदमी अब क्या करे? क्या लिखे? क्या पढ़े? क्या देखे? वेदना को मसोसते हुए झूठी तसल्लियाँ दे? या कि लाशों के ढेर से मुँह फेरकर, अपनी दो वक़्त की रोटियों की फ़िक्र करे!
- प्रीति 'अज्ञात' 
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बुधवार, 25 जुलाई 2018

मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे!

वे कहते थे, 'मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य'
यदि आपको कविता पसंद है तो आपने गोपालदास नीरज को अवश्य पढ़ा होगा, यदि संगीत के प्रेमी हैं तो उनके गीतों को भी ख़ूब सुना होगा। ख़ूब इसलिए क्योंकि जिसने एक बार सुन लिया तो वह उनका ही होकर रह गया और फिर एक बार से तो जी भरता ही कहाँ है! उनका जीवन जितने संघर्ष से गुजरा उतनी ही मजबूती से उन्होंने इसको जिया भी और अपनी मेहनत के दम पर उच्च शिखर तक पहुँचे। जिस दर्द को उन्होंने महसूस किया, वही शब्द बन काग़ज़ पर कुछ यूँ ढलता रहा कि जनमानस के दिलों को भीतर तक स्पर्श कर गया। उनकी कविताओं के हाथ में उन्होंने जो प्रेम रुपी दीपक थमाया था, उसी ने हिन्दी साहित्य के हर गलियारे को अपनी रोशनी की चमक से जगमग कर दिया। वे जनहित की बात करते थे, उनकी भाषा मानवीयता से परिपूर्ण थी और लेखनी भी इन्हीं गुणों की कुशल संवाहक बनी। समाज के प्रति उनकी चिंता, उनके संवेदनशील हृदय की परिचायक थी। धर्मनिरपेक्षता, उनके व्यवहार और लेखनी में कूट-कूटकर भरी थी। वे कहते थे, "अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए; जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।" वे राजनीतिज्ञों की टेढ़ी चाल भी ख़ूब समझते थे तभी तो जनता को सचेत कर बोल उठते थे, "हाथ मिलें और दिल न मिलें, ऐसे में नुक़सान रहेगा/ जब तक मंदिर और मस्जिद हैं, मुश्किल में इंसान रहेगा।"
उनके अवसान से साहित्य की बगिया का सबसे सुर्ख गुलाब मुरझाया-सा लगता है। सूरज की चमक में फीक़ापन है, चाँदनी ने उदासी का रंग ओढ़ लिया है। अब जबकि मैं उन्हें श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ कहना चाहती हूँ तो शब्द जैसे बिखर से रहे हैं, इन्हें समेटना असंभव जान पड़ता है।

नीरज जी को प्राप्त पद्मश्री, पद्मविभूषण, यश भारती सम्मान हिंदी साहित्य जगत में उनके अभूतपूर्व योगदान की गाथा स्वयं गाते हैं। तीन बार मिले फिल्मफेयर पुरस्कार, गीतकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा का यशगान करते नज़र आते हैं। वे कवि थे और गीतकार भी। अपनी दोनों ही पारियाँ उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बन खेली हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ- आसावरी, दर्द दिया है, कारवां गुजर गया, बादलों से सलाम लेता हूँ, गीत जो गाए नहीं, नीरज की पाती, नीरज दोहावली, गीत-अगीत,  पुष्प पारिजात के, काव्यांजलि, नीरज संचयन, बादर बरस गयो, वंशीवट सूना है, नीरज के संग-कविता के सात रंग, प्राण-गीत, फिर दीप जलेगा, तुम्हारे लिये इत्यादि रहीं। मंच पर भी उन्हें श्रोताओं का भरपूर स्नेह और सराहना मिली।

पद्मश्री गोपालदास नीरज मूलतः कवि ही थे पर गीतकार के तौर पर उनका हिन्दी सिनेमा को दिया गया योगदान अतुलनीय है। इंसानी भावनाओं के हर रंग को उन्होंने ख़ूब निखारा है। तभी तो प्रेम की शोख़ी में डूबकर वे लिखते हैं-
"याद अगर वो आये, कैसे कटे तनहाई /सूने शहर में जैसे, बजने लगे शहनाई/ आना हो, जाना हो, कैसा भी ज़माना हो/ उतरे कभी ना जो खुमार वो, प्यार है"
इन पंक्तियों में इस क़दर नशा है कि कई दशक बीत जाने पर भी इनकी ख़ुमारी प्रेमियों के दिलों पर अब तक चढ़ी हुई है। प्रेमिका के हृदय की धड़कन को उन्होंने 'आज मदहोश हुआ जाए रे' के तराने से अभिव्यक्त किया है तो उसकी याद में ख़त भी इश्क़ की गाढ़ी स्याही में डुबोकर, टूटकर लिखा है और उसे इतनी सुन्दर उपमाएँ दी हैं कि चाँद-तारों को भी उससे ईर्ष्या होने लगे। मदहोशी में ही सही, पर कोई यूँ भी प्रेमपत्र लिखता है क्या!
"कोई नगमा कहीं गूँजा, कहा दिल ने के तू आई/ कहीं चटकी कली कोई, मैं ये समझा तू शरमाई/ कोई ख़ुशबू कहीं बिख़री, लगा ये ज़ुल्फ़ लहराई" (लिखे जो ख़त तुझे)
प्रकृति की सारी सुन्दरता समेटकर इश्क़ की गहराई को उन्होंने "फूलों के रंग से, दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती" में भी इतनी खूबसूरती से व्यक्त किया है कि यह प्रेमियों का प्रतिनिधि गीत बन बैठा है। "खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को", "ओ मेरी, ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली" गीत भी यही रूमानी छटा बिखेर वर्षों से जवां दिलों के सरताज बन गए। "चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है/ देखो-देखो टूटे ना" में वे मनुहार कर अपने शरारतीपन का भी बड़ा प्यारा परिचय देते हैं।

नीरज, प्यार में भीतर तक डूब जाने की बात करते हैं तो टूटे हुए दिलों पर मरहम रख उसे सांत्वना भी देते आये हैं और उदासी भरे लम्हों में उनकी क़लम दर्द की जीती-जागती तस्वीर बन उभरती है। कभी यह भीतर तक टीस बन ठहर भी जाती है, जब वे कहते हैं-
"ये प्यार कोई खिलौना नहीं है/ हर कोई ले जो खरीद /मेरी तरह ज़िंदगी भर तड़प लो/ फिर आना इसके क़रीब" (दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है)
मात्र प्रेम ही नहीं 'दर्शन' भी उनकी लेखनी का आवश्यक तत्त्व बनकर उभरा है। 'ए भाई, ज़रा देखके चलो' जीवन-दर्शन से भरा हुआ गीत है। इसका एक-एक शब्द जीवन की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज है, जिसका सामना हम सब कभी-न-कभी करते आये हैं। उनके ये शब्द कितनी कटु स्मृतियों की धुंधली तस्वीर खींच देते हैं-
"जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है/ खाता है कोड़ा भी/ रहता है भूखा भी/ फिर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है/ और इन्सान? माल जिसका खाता है/ प्यार जिससे पाता है/ गीत जिसके गाता है/ उसके ही सीने में भोंकता कटार है।"
“कहता है जोकर सारा ज़माना, आधी हक़ीकत आधा फ़साना/ चश्मा उठाओ, फिर देखो यारो, दुनिया नयी है, चेहरा पुराना” भी इन्हीं अहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करता चलता है। 
उनके ये शब्द "बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ" भी वर्तमान परिस्थितियों के सन्दर्भ में एक क़सक छोड़ जाते हैं। इंसानियत की गुहार लगाने वाले नीरज जी की नज़र समाज के हर पहलू पर थी और वे मानवता को हर धर्म से श्रेष्ठ समझते थे। यहाँ इस बात की पुष्टि भी होती है कि जब तक इंसान इस धरती पर है उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

"ताक़त वतन की हमसे है" जैसा कालजयी गीत लिखकर उन्होंने न केवल सैनिकों का सम्मान किया बल्कि जनमानस की भुजाओं को फड़कने पर मजबूर कर उनमें देशभक्त की पवित्र भावना का संचार भी किया। उनके स्वर, चेतना के स्वर थे। 
पद्मभूषण गोपालदास नीरज जी प्रेम की बात करते थे, वीर रस से भरे ओजपूर्ण गीत लिखते थे, अपने दार्शनिक अंदाज़ से सबके चहेते बन बैठे थे। जीवन के हर रस का उन्होंने अपने शब्दों से शृंगार किया। हर भाव को उत्कृष्ट अभिव्यक्ति दी। अब जब गए हैं तो उनकी लेखनी की अमूल्य निधि हम सबके पास विरासत में छोड़ गए हैं, जिसे हम सदैव गुनगुनाते रहेंगे, जिसे हमारे पूर्व की पीढ़ी ने ख़ूब पढ़ा, सराहा और सम्मानित भी किया, आगे वाली पीढ़ियाँ भी इस धरोहर को संभालकर रखेंगीं।

नीरज जी के निधन ने जो शून्य उत्पन्न कर दिया है, उसे कभी भरा नहीं जा सकता; पर हम यह भी जानते हैं कि कलाकार कभी मरते नहीं! वे अपनी कृति के रूप में हम सबके हृदय में सदैव धड़कते हैं। उनके शब्द एक गहरी सीख बन साथ चलते हैं, प्रेरणा देते हैं, सच्चा मार्गदर्शन करते हैं।
"गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए/ साथ के सभी दिये, धुआं पहन-पहन गए/ और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके/ उम्र की चढ़ाव का उतार देखते रहे/ कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे"
नीरज जी जानते थे कि उनके कितने दीवाने हैं तभी तो उन्होंने कहा था "आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा/ जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा" (धर्म है..)
उन्हीं की लिखी पंक्तियों से श्रद्धासुमन अर्पित करती हूँ-

धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले
जब तलक ज़िन्दा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे
खो दिया हमने तुम्हें तो पास अपने क्या रहेगा
कौन फिर बारूद से सन्देश चन्दन का कहेगा
मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे

यूँ ही नहीं कोई देशराग गाता है, यूँ ही नहीं कोई प्रेम धुन बजाता है, सदियाँ लग जाती हैं उन-सा कुछ बनने में, यूँ ही नहीं कोई नीरज बन जाता है।
विदा, प्रिय कवि....शत शत नमन!
- प्रीति 'अज्ञात'
#नीरज #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका
http://hastaksher.com/rachna.php?id=1515

बुधवार, 18 जुलाई 2018

उम्मीदों की टूटती इमारतें

'रोटी, कपड़ा और मकान' जीवन की मूलभूत आवश्यकता है. मेहनत से रोटी और कपड़े की व्यवस्था तो हो जाती है पर दो दशक पहले तक मध्यमवर्गीय इंसान के लिए अपना मकान एक स्वप्न ही था. सारी कमाई खाने-पीने, बच्चों की स्कूल फ़ीस और घरेलू खर्चों में ही ख़त्म हो जाया करती थी. जैसे-तैसे करके कुछ धन जोड़ा भी जाता था, तो वह भी शादी-ब्याह में पल भर में स्वाहा हो जाया करता था. ऐसे में 'अपना घर' सोचना और मन-मसोसकर रह जाना ही इन परिवारों की नियति थी. भारतीय फिल्मों में भी इस इंसानी चाहत को ख़ूब भुनाया गया है और 'दो दीवाने शहर में......आशियाना ढूँढते हैं' हो या 'देखो मैंने देखा है ये इक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना' गीत दर्शकों की इसी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते रहे हैं.

बदलते समय के साथ सुविधाओं में भी वृद्धि हुई. बैंकों से लोन मिलने लगे और अपने घर तक पहुँचने की नई राहें खुलने लगीं पर यह ऋण भी ब्याज सहित चुकाना होता है. इसे चुकाने के लिए न जाने कितनी बार अपनी इच्छाओं में कटौती करनी पड़ती है, मन-मारकर रह जाना पड़ता है पर अपने सपनों के पल्लवित होने की आशा लिए यह सब सह जाता है आदमी.  
लेकिन वही सपनों का महल जब पल भर में धराशायी हो जाए तो उस इंसान के दिल पर क्या गुज़रती होगी यह समझना मुश्किल नहीं! मुश्किल ग़र कुछ है तो वो है भ्रष्टाचार से लड़ना, उस व्यवस्था से उम्र-भर जूझना जिसके आगे आप निरीह, लाचार नज़र आते हैं! ये कैसी नियति है कि वो घर जिस पर आपका मालिकाना हक था, उसका सुख भोगे बिना आप या तो मलबे के ढेर के नीचे दम तोड़ देते हैं या फिर आपके हिस्से आई वसीयत में न्याय की आस में अदालत-दर-अदालत चप्पलें घिसना लिखा होता है.
इमारतों का ढहना कंक्रीट और रेत की चादर का भरभराना भर नहीं है यह परिश्रमजनित उन स्वेद कणों की भी बड़ी निर्मम मौत है जिसके लिए किसी व्यक्ति ने अपना दिन-रात एक कर दिया था. ये लाशें उन उम्मीदों की अंतिम विदाई है जो एक हँसते-खेलते परिवार को कफ़न की श्वेत चादर ओढ़ा वहीं दम तोड़ देती हैं. जो शेष हैं उनके हिस्से वो कराहता, छटपटाता स्वप्न है जिसे देखने के लिए वे जीवन भर अपने-आप को कोसेंगे.

हम कड़ी निंदा, भर्त्सना करेंगे और प्रशासन आश्वासन देगा. उस मुआवजे की घोषणा भी अवश्य होगी जिसे पाने के लिए आपको तमाम कार्यालयों की देहरी पर वर्षों नाक रगडनी होगी. लेकिन तब भी मौत का यह खेल जारी रहेगा...इन कमजोर इमारतों, पुलों का बनना और गिर जाना कभी नहीं रुकेगा. क्यों रुके? कभी किसी बिल्डर को फांसी चढ़ते देखा है?लोकतंत्र की मोटी त्वचा में भ्रष्टाचार के नुकीले दांत इतना भीतर और गहरे धँसे हुए हैं कि जान लेकर ही बाहर आते हैं और फिर कहीं दूसरे शिकार को घोंपने चल पड़ते हैं.
चलो, सपनों का छोडो...इस दर्द की भरपाई कौन करेगा?
आम जनता की जान की क़ीमत क्या है?
जीवन भर खटने के बाद उसके हिस्से में क्या आया?
कोई बाढ़ में बह गया तो कोई आँसुओं की नदी में....
बात यहाँ आकर भी ख़त्म नहीं होती.  
अभी तो मुआवज़े की बंदरबाँट होना शेष है.
- प्रीति 'अज्ञात' 
#टूटती_इमारतें #भ्रष्टाचार 
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शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

मेरा शहर

यह प्रश्न कि आप कहाँ की हो या कि आपका शहर कौन-सा है? सदैव ही असमंजस में छोड़ जाता है मुझे, अजीब लग सकता है पर मैं जब-जब होती हूँ जहाँ-जहाँ, तब-तब बस वहीं की ही होकर रह जाती हूँ.
 प्रत्येक शहर में छूटता जाता है, कुछ-कुछ मेरा हिस्सा और कुछ मैं ही हो जाती हूँ ऋणी इसकी; क्योंकि ज्यूँ ही रखती हूँ क़दम उस धरती पर....ओढ़ लेती हूँ वहाँ की धूप, श्वांसों को मिलती है गति वहीं की वायु से, जीवित रखता है मुझे उसी शहर का जल और भोजन...तभी तो आज मेरी उपस्थिति कृतज्ञ है, हर बीते शहर की.

यूँ भी नहीं कि इतनी भाग्यवान हूँ और सुखद ही रही हों सारी स्मृतियाँ, किसी शहर, किसी यात्रा, किसी व्यक्ति से, कभी भी नहीं मिली हो पीड़ा.............मिली है, असहनीय मिली है, पर तब भी मैंने शहर को नहीं धिक्कारा और उन पलों को गिनती गई जिनमें सुख के तमाम जुगनू 
चमचमा रहे थे उत्साह से, मेरी निराशा, मेरी उदासी, मेरा दुःख 
खाना चाहता था मुझको पर मेरी आशा, मेरा विश्वास, मेरा साहस 
सदैव निगलता रहा उसको.

मैं जानती हूँ हर शहर मेरा है तो जब तुम पूछते हो कहाँ की हो?
मैं पड़ जाती हूँ सोच में, किसे याद करूँ? वो घर जहाँ मैंने जन्म लिया, माता-पिता की गोदी में खेली, पढ़ाई की या कि छुट्टियों में दादा -दादी, नाना-नानी का घर, जहाँ स्नेह की छाँव में ऊँची कुलाँचें भरता रहा मेरा बचपन. मेरी सखियों के घर, रिश्तेदारों-परिचितों के घर जहाँ तमाम उत्सवों, शादी-ब्याह का उल्लास भरता रहा जीवन का इंद्रधनुष.  
अहा! कितनी यात्राएँ, कितने शहरों में....अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़ाव, एकदम अपना सा ही तो लगता है सब कुछ.

अब बताओ मैं कहाँ की हूँ?  
मुझमें लखनवी सभ्यता है 
तो चम्बल की गर्ज़ना भी 
बनारसी मिठास है तो 
दिल्ली का ठसका भी 
मैं पंजाब का पनीर हूँ 
यू पी की खीर हूँ 
गुजरात की गांधीगिरी 
राजस्थान की शमशीर हूँ 
उत्तर में दर-बदर 
तय किये कितने सफ़र 
दक्षिण की बाँहों में भी
झूली हूँ कितने पहर  
हर जगह मेरे अपने 
वही मेरा जहान है 
पूरब में सूरज चचा 
पश्चिम में आसमान है 
कैसे चुनूँ किसी एक को 
जब दिल हुआ हिन्दुस्तान है 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 9 जुलाई 2018

संजीव कुमार: इस मोड़ से जाते हैं....!

"सुनो, आरती! ये जो फूलों की बेलें नजर आती हैं न; दरअसल ये बेलें नहीं हैं अरबी में आयतें लिखी हैं इसे दिन के वक़्त देखना चाहिए, बिल्कुल साफ़ नज़र आती हैं. दिन के वक़्त ये सारा पानी से भरा रहता है. दिन के वक़्त जब ये फ़व्वारे......"

निश्चित तौर पर गुलज़ार जी की ये पंक्तियाँ हर सिने-प्रेमी को शब्दशः याद होंगी और इसे  सुनते ही जो शानदार चेहरा उभरकर सामने आता है वह है - संजीव कुमार
किशोर दा, रफ़ी साब के गाये कितने ही गीतों को उन्होंने अपने जानदार अभिनय से अमर कर दिया. आम हीरो की छवि से एकदम अलग प्यारा सा, मुस्कुराता चेहरा लिए, शिष्टता की प्रतिमूर्ति थे संजीव कुमार, जिनकी विशिष्ट अभिनय शैली के हम सब हमेशा से क़ायल रहे हैं. खिलौना, शोले, आंधी, मौसम, अंगूर, अनहोनी, त्रिशूल, मनचली, अनामिका, कोशिश, नौकर, नया दिन नई रात, सीता और गीता, श्रीमान श्रीमती, पति पत्नी और वो, सिलसिला, शतरंज के ख़िलाड़ी, हमारे तुम्हारे, बेरहम, त्रिशूल और ऐसी ही कई फिल्मों में अपने हर किरदार को निभाते हुए उन्होंने अभिनय के नए मापदंड स्थापित कर उन ऊँचाइयों को स्पर्श किया कि वे इतने वर्षों बाद भी प्रशंसकों के दिलों में घर बनाये हुए हैं और पूरी शिद्दत से याद किये जाते हैं.

'खिलौना' के मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति का अत्यधिक भावुक, संवेदनशील अभिनय और वह गीत, "खिलौना जानकर तुम तो....." आज भी मन भिगो जाता है. एक तो रफ़ी साहब की दर्दभरी आवाज़ का जादू, उस पर संजीव कुमार का भावपूर्ण अभिनय; हिट तो होना ही था. याद है न! कैसे प्रतिशोध की ज्वाला में जलते 'शोले' के ठाकुर के मिसमिसाते डायलॉग, "सांप को हाथ से नहीं, पैरों से कुचला जाता है गब्बर." ने  सिनेमा हॉल को तालियों की गडगडाहट से पाटकर रख दिया था.
'सिलसिला', 'अनामिका','आँधी' में वे संज़ीदा पति/प्रेमी के रूप में नज़र आये और इनके गीत आज लगभग चार दशकों बाद भी उतने ही लोकप्रिय बने हुए हैं. 

अनामिका का 'मेरी भीगी-भीगी सी पलकों पे रह गए, जैसे मेरे सपने बिखर के....' और आँधी का 'तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...' आज भी लाखों उदास प्रेमियों की एकाकी रातों और तन्हाई के साथी बनते हैं.
'कोशिश' में मूक-बधिर इंसान के रूप में अपने उत्कृष्ट अभिनय से उन्होंने सबके ह्रदय पर ऐसी छाप छोड़ी कि इसके लिए उन्हें दूसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. पहला उन्हें फ़िल्म 'दस्तक' के लिए प्राप्त हुआ था. 'आँधी' के लिए भी उन्हें 'फिल्मफेयर' पुरस्कार मिला.

पर ऐसा नहीं कि संजीव कुमार ने केवल गंभीर भूमिकाएँ ही निभाईं. मस्तमौला प्रेमी और इश्कबाज़ पति के रोल भी उन्होंने बेहद ख़ूबसूरती से निभाये. पारिवारिक और जासूसी फ़िल्में भी कीं. वे नए प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते थे और उनकी फ़िल्म 'नया दिन नई रात में' उन्होंने एक साथ नौ विविध चरित्र निभाकर सबको अचंभित कर दिया था. यह उनकी असाधारण अभिनय क्षमता ही थी कि जीवन के हर रस को वे पर्दे पर बड़ी सहजता से जीवंत कर देते थे. 'अंगूर' में उन्होंने दर्शकों को खूब हँसाया और 'नौकर' में भी अपनी अभिनय प्रतिभा से सबको लाज़वाब कर दिया. इस फिल्म का 'पल्लो लटके' गीत तब ख़ूब बजा करता था और अब इसके रीमिक्स ने भी वर्तमान पीढ़ी तक इसकी लोकप्रियता की ख़बर पहुँचा ही दी है. यह संजीव कुमार का ही असर है कि 'पति, पत्नी और वो' का यह गीत, 'ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाना चाहिए' आज भी सबका प्रिय बाथरूम सॉंग बना हुआ है. उन दिनों सब माता-पिता अपने नन्हे-मुन्नों को यही गीत सुनाते हुए स्नान करने के लिए फुसलाया करते थे.

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन (मौसम), तुम आ गए हो नूर आ गया है (आँधी), इस मोड़ से जाते हैं (आँधी), ग़म का फ़साना बन गया अच्छा (मनचली), हवा के साथ-साथ (सीता और गीता) मनचाही लड़की कहीं कोई मिल जाए (वक़्त की दीवार) ... उनकी सुपरहिट फिल्मों और गीतों की फ़ेहरिस्त काफी लम्बी है.

हरिभाई के नाम से लोकप्रिय, अभिनेता संजीव कुमार की फिल्मों और उनके उत्कृष्ट अभिनय की ऐसी ही न जाने कितनी अनूठी स्मृतियाँ आँखों में तैर रही है. उन पर फिल्माए कई गाने भी सदैव साथ चला करते हैं. अभी उनकी फ़िल्म 'अनोखी रात' का ये सदाबहार गीत याद आ रहा है -
"ओहरे ताल मिले नदी के जल में,
नदी मिले सागर में,  
सागर मिले कौन से जल में
कोई जाने न....!'
कलाकार मरते नहीं! हमारी यादों में वे सचमुच अमर हो जाते हैं.
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

संजू: 'नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ को चली।'


'संजू' फ़िल्म प्रारम्भ में ही यह लिखकर अपनी सारी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ स्वयं को सुरक्षित कर लेती है कि "यह आत्मकथा नहीं है।" तो फ़िर टीज़र में इसे संजय दत्त की आत्मकथा कहकर क्यों प्रमोट किया जा रहा है? और रणबीर को संजू के अवतार में ढालने और इतने बवाल की क्या तुक थी? यहाँ तक कि कई इंटरव्यू में भी इस बात को स्वीकारा जा चुका है। 
संजय दत्त के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म मूलतः दो बातों के लिए याद रखी जायेगी, पहली रणबीर की शानदार परफॉरमेंस और दूसरी मीडिया की सच्ची तस्वीर खींचने के लिए। ख़बरों को मसालेदार, चटपटा बनाने के लिए उसे कैसे तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है और एक प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर क़ानूनी अड़चनों से कैसे बचा जाता है, इस तथ्य को यहाँ सटीकता के साथ उकेरा गया है। टी.आर.पी की अंधी दौड़ से तो हम सब वाक़िफ़ हैं ही। 

संजू का ड्रग्स की लत को छोड़ने और सुनील दत्त के सामने रोने का दृश्य निस्संदेह भावुक कर जाता है पर कुछ अन्य दृश्यों में अप्रत्यक्ष रूप से अपनी बुरी आदतों का ठीकरा दत्त साब पर फोड़ते हुए वे रत्ती भर भी संवेदना नहीं बटोर पाते। अरे, लड़का नालायक़ निकलेगा, बुरी संगत में पड़ेगा तो पिता टोकेगा नहीं? उनके समय में तो थप्पड़ ही मिलता था। वे चाहते तो दत्त साब से सेवाभाव सीख सकते थे, जैसा उनकी बहनों ने सीखा पर उन्होंने अपनी परेशानियों का हल ड्रग्स में ढूंढ निकाला तो पिता क्या करे? माँ मौत के मुंह में और बेटे को लड़कियों के साथ की और ड्रग्स की तलब उठ रही! कभी सुना, देखा किसी ने ऐसा!!

ग़लतियों पर सुपर रिन की चमकार मारते समय फ़िल्म में एक स्थान पर बताया गया है कि सुनील दत्त सिगरेट पीते थे और उन्हें ऐसा करते देख ही संजू बाबा ने बचपन में इसका क़श लगाना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी इन्हीं बिगड़ती आदतों के कारण उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेजना पड़ा। चलो, ये बात मानी जा सकती है। लेकिन फ़िर अंतिम दृश्य के लिए कोई माफ़ी नहीं, जहाँ सिगरेट सुलगाते हुए संजू अपने बच्चों से कहते हैं कि "तुम अपने पापा जैसा नहीं, मेरे पापा जैसा बनना।" ठीक है, पर आप कब सुधरेंगे जनाब? यदि यही बात उन्होंने सिगरेट को पैरों तले मसलते हुए या फेंकते हुए कही होती तो यह दृश्य प्रभावी बन सकता था।  

फ़िल्म की दो घटनाएँ अत्यधिक निंदनीय हैं एक में नायक अपनी पत्नी के सामने निर्लज़्ज़ होकर स्वीकारता है कि उसने 350 से अधिक स्त्रियों के साथ दैहिक सम्बन्ध बनाये हैं। वहीं दूसरी घटना में वह अपने मित्र के सो जाने पर उसकी गर्लफ्रेंड के साथ भी यही करता है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक उसका अपने मित्र को यह कहना कि "मैं चेक़ कर रहा था, लड़की में भाभी मटेरियल है कि नहीं! नहीं यार! इसका चरित्र अच्छा नहीं। मैनें तुझे बचा लिया।" उस समय थिएटर में उपस्थित लड़कों का ताली पीटकर सीटी बजाना यह सुनिश्चित कर देता है कि आदर्शवाद के तमाम ढोंग रचाने के बाद भी स्त्रियों की स्थिति वही है। शादी के लिए सबको वर्जिन चाहिए पर चरित्र प्रमाणपत्र देते हुए एक पल को भी इनकी नज़रें शर्मिंदगी से नहीं झुकतीं! ताली क्या एक हाथ से बजती है?  यदि ये दृश्य संजय दत्त की ईमानदारी और सच्चाई को बेझिझक बयां करने की नीयत से रखे गए थे तो इन्हें इतने हल्केपन से नहीं फ़िल्माना चाहिए था। फ्लैशबैक में आत्मग्लानि का बोध होते हुए भी दिखाया जा सकता था, पर वे तो यह बात मर्दानगी के घमंड में बोलते नज़र आये। सचमुच निर्माता विधु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजू हिरानी की फ़िल्म में ऐसे दृश्य बेहद खलते हैं क्योंकि ये दोनों अच्छे एवं संवेदनशील फिल्मकार माने जाते रहे हैं, उनकी कई फ़िल्में भी इस बात की साक्षी हैं पर लगता है कि उनकी इस संवेदनशीलता पर संजय दत्त की मित्रता भारी पड़ गई। तभी तो उन्होंने इस फ़िल्म में अश्लीलता से भरपूर, द्विअर्थी संवाद रखने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया। संजू फ़िल्म से किसी को लाभ हो या न हो पर अपनी इस सोच के कारण यह जोड़ी तो नुक़सान में ही रहेगी। 

रणबीर के अभिनय का लोहा अब सभी मानते हैं और यह फ़िल्म उनके लिए मील का पत्थर साबित होगी इसमें दो राय नहीं। जहाँ तक संजू का प्रश्न है तो उन्हें स्वयं को सही सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी। हो सकता है कि वे अपने पापा का नाम ख़राब करने के लिए अब राजनीति में भी प्रवेश को इच्छुक हों और अपनी छवि को स्वच्छ करने हेतु यह फ़िल्म बनवाई हो /अथवा अपने क़रीबी मित्रों की चाहत पूरी करने के लिए स्वीकृति दी हो। पर बेहतर यही होता कि वे ऐसा करने से बचते। उन पर हथियार रखने का जो आरोप था उसके लिए वे अपने हिस्से की सज़ा काट चुके हैं और उनकी फ़िल्मों के अच्छे आंकड़ों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि जनता उन्हें माफ़ कर चुकी थी। वरना मुन्ना भाई इतना रिकॉर्ड तोड़ बिज़नेस नहीं करती। इसलिए भले ही उन्होंने कितनी भी सच्ची और ईमानदार कहानी कहलवाने की कोशिश की है फिर भी अंत में उनके लिए एक ही बात उभरती है कि 'नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ को चली।' 
फ़िल्म का गीत-संगीत अच्छा और अनुकूल है। 'कर हर मैदान फ़तह' शानदार, प्रेरणात्मक गीत है जो वर्षों गुनगुनाया जाएगा। 'मैं बढ़िया तू भी बढ़िया' शादी-ब्याह में ख़ूब बजेगा। अखबार गीत भी सटीक है पर मीडिया उसके प्रचार से बचती नज़र आ रही है। 
परेश रावल, अनुष्का, सोनम, मनीषा सभी कलाकार अपनी जगह बेहतरीन है। मित्रता के भावपूर्ण रिश्ते को इस फ़िल्म में बहुत अच्छी तरह दर्शाया गया है और कमलेश के रोल को इतनी जीवंतता से निभाने के लिए विकी कौशल बधाई के पात्र हैं। यह फिल्म उनके लिए और भी कई रास्ते खोल सकती है।
यदि आप रणबीर कपूर के प्रशंसक हैं तो 'संजू' फ़िल्म आपको कहीं भी निराश नहीं करेगी। शानदार अभिनय और जी-तोड़ मेहनत के लिए रणबीर कपूर को पूरे 5 स्टार, सामान्य फ़िल्मों और विशुद्ध मनोरंजन के लिए इसे देखा जाए तो 3 और अच्छी-ख़ासी चलती ज़िंदगी में अतिरिक्त सहानुभूति बटोरने की संजू बाबा की बेतुकी कोशिशों के लिए ज़ीरो बटा सन्नाटा। 
- प्रीति 'अज्ञात'
#Sanju#Ranbir#Vicky_Kaushal
Pic. Credit: Google

सोमवार, 2 जुलाई 2018

मंदसौर रेप: ये सूची कब ख़त्म होगी?

मंदसौर की सम्पूर्ण घटना का विवरण इतना क्रूर और जघन्य है कि उसे बोलते समय आपकी ज़बान साथ छोड़ देती है. शब्द लड़खड़ाकर न बोले जाने की भीख मांगते हैं. पूरा शरीर कांपने लगता है और उस मासूम बच्ची की पीड़ा को महसूस कर हृदय चीत्कार कर उठता है.

यक़ीन मानिये इसे पढ़ते-सुनते समय आप दुःख और ग्लानि के इतने गहरे समंदर में डूब जाते हैं कि इस समाज में अपने होने का अर्थ एवं औचित्य तलाशने लगते हैं. अनायास ही उन तमाम खिलखिलाते बच्चों के चेहरे आंखों में घूमने लगते हैं, जिन्हें इस दुनिया के सुन्दर होने पर अब भी भरोसा है. जो अब भी बाग़ में खिलते फूलों पर भटकती तितलियों को देख हंसते हुए उनके पीछे दौड़ते हैं. जिन्हें चॉकलेट, आइसक्रीम, टॉफ़ी खाना ख़ूब सुहाता है और जिनका मासूम हृदय किसी अंकल की घिनौनी सोच और निकृष्टम कुत्सित इरादों को पढ़ नहीं पाता. ये इनकी नहीं, इस उम्र की स्वाभाविक असमर्थता है, क्योंकि हमारे जिग़र के ये टुकड़े बस इतना ही जानते, समझते हैं कि मनुष्य तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ समाज में रहता है और खूंखार जानवर जंगल में. अभी उनकी इतनी उम्र ही कहां हुई कि वे समझ सकें कि कुछ पुरुष शरीर के भीतर एक खूंखार, जंगली जानवर भी दांत निकाले चीर डालने को बैठा होता है.

रेप, बलात्कार, अपराध, कानून, सजा बच्चों को तो हर इंसान अपना-सा लगता है और इसी अपनेपन में वे अनजान शख़्स पर भरोसा कर उसकी उंगली थाम चल पड़ते हैं. किसी की नीयत पढ़ पाने का हुनर बचपन में नहीं आता! बचपन, छल-कपट से दूर भरोसे में जीता है. प्यार की भाषा ही बोलता-समझता है, ईमानदारी में विश्वास रखता है. जीवन की कड़वी सच्चाइयां तो इस पड़ाव के दो दशक पूर्ण होने के बाद ही समझ आती हैं. वरना हर मां अपने बच्चे को सिखाती ही है कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ कभी नहीं जाना चाहिए, लेकिन इस बात की समझ भी तो एक पकी उम्र की मांग करती है. आज जबकि हम उस समाज में रह रहे हैं जहां बलात्कारी छह माह की बच्ची से लेकर अस्सी वर्ष की वृद्धा तक को नहीं बख़्शता, तो ऐसे में हमारे बच्चे कहां जाएं? क्या जन्म लेते ही सबसे पहले उन्हें बलात्कार का मतलब समझाया जाए? उनके भोले बचपन को छिन्न-भिन्न कर अब तक हुई सारी अमानवीय घटनाओं को उन्हें पढ़ाया जाए कि देखो! तुम जहां जन्मे हो, वहां यह भी होता है. क्या हम हर समय एक सहमे, भयभीत चेहरे को देखने के लिए तैयार हैं? पर यदि बच्चों को बचाना है तो यह तैयारी तो अब हमें करनी ही होगी. उनके मस्तिष्क में यह ठूस-ठूसकर भरना होगा कि तुम्हारे आसपास कोई जंगली भेड़िया भी घूम रहा है. दुःखद है कि इतना सब कुछ बार-बार होने के बाद भी न तो अपराध रुके और न ही उस पर होने वाली राजनीति. कुछ निर्लज़्ज़ तो यह भी कहने में नहीं हिचकते कि "विधायक आए हैं, उन्हें धन्यवाद दीजिए." किस बात का धन्यवाद चाहिए था इनको कि

"धन्यवाद, आप और आपका प्रशासन निकम्मा है?"

"धन्यवाद, कि आज हमारी बेटी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रही है!"

"धन्यवाद, कि हमारी इस अथाह पीड़ा में भी आप मुस्कुराने का साहस कर पा रहे हैं!"

"धन्यवाद, कि आपको इस दर्द के राजनीतिकरण का एक और विषय मिल गया!"

धिक्कार है ऐसे लोगों पर और उनकी गिरी हुई सोच पर कि इन्हें किसी के दर्द से कोई मतलब नहीं. तुम और तुम्हारे जैसे सभी घटिया लोग, कान खोलकर सुनो और यदि थोड़ा भी शेष है तो उस दिमाग़ में ये बात अच्छे से गुदवा लो कि "ख़ून या दर्द कभी हिन्दू-मुस्लिम नहीं होता! 'हिन्दू-मुस्लिम' शब्द के नाम पर प्रायोजित दंगे होते हैं, यह चुनाव का मन्त्र होता है, वोट को भुनाने और मानवता की जड़ में ज़हर का बीज रोपने का वीभत्स तरीक़ा होता है." भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले तथाकथित देशभक्तों को हर बात में अपराधी की जात देखने के पहले अपराध को समझना होगा, उसके विरोध में बेझिझक खड़ा होना होगा. इन्हें सजा देने के लिए सत्ता-विपक्ष, धर्म-जाति के निंदनीय कुतर्कों से परे हो समवेत स्वर में आवाज़ उठानी होगी. यह भी समझिये कि जिस भी दल का झंडा थामे आप लोगों से निरर्थक भिड़ रहे हैं, उस दल के लिए आप एक प्यादे भर हैं जो केवल बलिदान के काम आता है.

बलात्कार जैसे कुकृत्य तब तक नहीं रुकेंगे जब तक कि अपराधियों को उनके किये का क्रूरतम दंड नहीं मिलेगा. इनके लिए कोई वक़ील नहीं होना चाहिए. इनके शरीर को कहीं भी जगह न मिले. इनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार हो. फांसी एक आसान सज़ा है. इन्हें भूखे शेर के आगे फेंक देना चाहिए. जंगली कुत्तों से नुचवाना चाहिए. इनके हाथ-पैर काट देने के बाद इन्हें किसी गहरी खाई में उछाल देना चाहिए कि इनकी आने वाली पीढ़ियां भी ये दुर्गति देख सदियों सिहरती रहें. समाज और प्रशासन को उन माता-पिता से हाथ जोड़ क्षमा मांगनी चाहिए, उनके पैरों में गिर जाना चाहिए कि "हम आपकी बेटी को इस पीड़ा से बचा पाने में असमर्थ रहे." यूं दर्द तो यह जीवन भर का है. किसी की सज़ा या किसी का गिड़गिड़ाना इसे रत्ती भर भी कम नहीं कर सकता. उन बदहवास माता-पिता के कानों में अपनी बेटी की चीखें गूंजती रहेंगी, उसका बहता लहू उनकी पलकों तले रिसता रहेगा. सरकार से यही विनती है कि हो सके तो, वो जो एक कानून बनाया है, उम्र के हिसाब से. उसी के तहत ही सही पर इस कुकर्मी, दरिंदे को दुनिया से हटा दो और जिन्हें इससे हमदर्दी है उन्हें भी.

ऐसे अपराध अब नहीं होंगे, यह सोच लेना भी मन को झूठा भरमाना ही है. ये क्रम कब और कहाँ रुकेगा, पता नहीं! 'मानवता' शब्द भी मज़ाक भर रह गया है. इंसानियत मर ही चुकी है.

क्या करें! क्या कहें!

बच्चों से उनका बचपन और सभी माँओं से उनके हिस्से की नींद छीन ली गई है. 
इधर एक सर्वे में 'भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश' कहा गया है. इस ख़बर से एक पक्ष शर्मिंदा और दुःखी महसूस कर रहा तो वहीं दूसरों का चेहरा तमतमाया हुआ है. वे चीखकर कहते हैं "तो फिर पाकिस्तान में रहो, सीरिया में रहो" लेकिन इस बात को स्वीकारने और मूल समस्या को समझने में उनको लकवा मार जाता है कि तमाम ख़ूबियों और सुंदरता के बाद भी यही वह देश भी है जहाँ विदेशी सैलानियों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार की ख़बरें आम हैं. जहाँ हर दूसरे दिन किसी न किसी शहर में एक स्त्री की लाश नाले में पड़ी मिलती है. हारे हुए तथाकथित प्रेमी द्वारा उसे कभी एसिड डालकर जला दिया जाता है तो कभी ससुराल पक्ष द्वारा पेट्रोल डालकर. कभी फ्रीज़र तो कभी तंदूर से उसके टुकड़े मिलते हैं. रेप के सरकारी आँकड़े देखकर ही पसीना छूट जाए जबकि उसके दोगुने तो भय और अपमान के कारण दर्ज़ भी नहीं होते. कन्या भ्रूण हत्या की बात भी किसी से छिपी नहीं रही. बेटे की आस में घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की तो अनगिनत; अनसुनी, अनकही कहानियाँ हैं. विकास के इस स्वर्णिम दौर में बाल-विवाह अब भी होते हैं. विधवाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं. अकेली स्त्री को उपलब्ध मान लिया जाता है. न्याय की गुहार लगाते हुए एक शिक्षिका सस्पेंड कर दी जाती है.

जी, हो सकता है कि यह सर्वे और उस पर आधारित रिपोर्ट पूर्ण रूप से सच न भी हो पर क्या हमारा सातवाँ नंबर ही रहता तो हम तसल्ली से हाथ झाड़ शर्मिंदा नहीं होते? सूची से आप इसलिए सहमत नहीं क्योंकि आपका नंबर पहला है पर क्या इस सूची में होना ही वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं?

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ परिवर्तन आया है और स्त्रियाँ भी पहले से अधिक जागरूक हो गई हैं. लेकिन जब तक निर्भया, आसिफा और मंदसौर की इस बच्ची के साथ ऐसे घृणित कुकर्म होते रहेंगे, तब तक आईना देखने के लिए इस सूची की भी कोई आवश्यकता नहीं! प्रयास इस सूची से बाहर निकलने का होना चाहिए न कि तमतमाने का. यह भी तय है कि यदि यही सूची सकारात्मक बात के लिए होती तो अभी यही सब लोग एक दूसरे की पीठ थपथपा रहे होते और तब इसकी विश्वसनीयता पर भी कोई संदेह नहीं होता. हम तारीफ़ पसंद लोग जो हैं. खैर! आप सब सुरक्षित रहें और अपने बच्चों का ध्यान रखें. किसी से कोई भी उम्मीद न रख, उन्हें सुरक्षित वातावरण देने की व्यवस्था स्वयं करें.
- प्रीति 'अज्ञात'
#Mandsaur #iChowk #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका #Rape 
iChowk में 01-07-2018 को प्रकाशित -
https://www.ichowk.in/society/rape-is-biggest-problem-in-india-need-to-take-strict-action/story/1/11554.html

रविवार, 1 जुलाई 2018

'संजू': संजू बने रनबीर को दर्शकों के प्यार से मालामाल करेगी या संजू बाबा को?

आज भारत में ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी रनबीर कपूर के प्रशंसकों की संख्या अपार है, और इसका कारण उनकी चाकलेटी छवि नहीं बल्कि 'रॉकस्टार' और 'बरफी' में किया गया शानदार अभिनय है जिसने लाखों सिनेप्रेमियों को उनका मुरीद बना दिया था. रोमांस और डांस भी वे अच्छा ही करते हैं. लेकिन खबरों में बने रहने और ठीक-ठाक अभिनय के बाद भी संजय दत्त के हिस्से इतनी लोकप्रियता कभी नहीं आई. हां, ये अलग बात है कि अधिक संख्या के कारण फिल्में शायद उनकी ही ज्यादा देखी गई हों. जब 'रॉकी' रिलीज हुई वो दौर ही कुछ अलग था. मनोरंजन के नाम पर सिनेमाघर ही थे, सो लोग वहीं चले जाते थे. उन दिनों पसंद से कहीं अधिक जाने का उत्साह हुआ करता था कि "चलो, ये भी देख आयें." उस पर यदि गीत-संगीत मधुर हुआ तो भी पब्लिक के पैसे वसूल हो जाते थे.

वैसे रॉकी का "क्या यही प्यार है" और साजन का "मेरा दिल भी कितना पागल है" आज भी सबके पसंदीदा रोमांटिक गानों की सूची में जगह बनाए हुए है. संजू ने सौ से भी अधिक फ़िल्में की होंगी पर चयन और अभिनय की दृष्टि से रॉकी, साजन, सड़क, नाम, खूबसूरत, मुन्नाभाई और परिणीता ही देखने योग्य रहीं.

पसंद होना तो बाद में, उनकी फ़िल्मों के नाम देखकर ही दिमाग़ ख़राब हो जाता था. कारतूस, जान की बाज़ी, मेरा हक़, मेरा फ़ैसला, कब्ज़ा, मर्दों वाली बात, हथियार, इलाका, ज़हरीले, यलगार, ख़तरनाक,प्लान, अनर्थ और ऐसे न जाने कितने हिंसक नामों वाली फ़िल्में कि मन ही घबरा उठे. अरे, ऐसे विध्वंसक नामों वाली फ़िल्में कौन करता है भई! ये तो ट्रेलर भर है पूरी सूची पढ़ते-पढ़ते तो हो सकता है आप ही हथियार उठाकर आक्रमण करने लग जाओ. न जाने उनकी ऐसी फ़िल्मों को हां करने के पीछे की वजह क्या रही होगी! आर्थिक कारण हो सकता है. खैर! कुछेक कॉमेडी फिल्मों में उनका अभिनय देखकर लगता था कि उन पर ऐसे रोल ज्यादा सूट करते हैं, पर वो दौर भी उतना चला नहीं.

यूं हम भारतीय फ़िल्मी कलाकारों के प्रति काफी भावुक और संवेदनशील हो जाते हैं और उनके विरुद्ध कोई भी बात सुनना हमें बिलकुल बर्दाश्त नहीं होता! लेकिन संजय दत्त के साथ ऐसा नहीं हो सका. शुरू से ही उनकी इतनी अधिक नकारात्मक बातें पढ़ने-सुनने में आती रहीं कि लोगों में उनके लिए सहानुभूति से कहीं अधिक इस बात का गुस्सा रहा कि सुनील दत्त और नरगिस जी जैसे आदर्शवादी माता-पिता के बेटे को अपने पेरेंट्स की इज्ज़त का जरा भी ख़याल नहीं आता! उन दोनों का सोच जनता का मन दुःख से भर जाता था. संजय का पक्ष जानने में किसी को कभी रुचि नहीं थी.

पर फिल्म संजू दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा रही है. इससे उनके जीवन के दूसरे पक्ष का भी पता चल रहा है. लोग जानना चाहते हैं कि उस इंसान ने कितनी पीड़ा झेली, जो आधे से भी अधिक जीवन अपने-आप से जूझता रहा. यद्यपि इस दुःख से उबरने के लिए किये गए उनके व्यवहार एवं बुरी आदतों को किसी भी स्थिति में तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता लेकिन अपने सच को स्वीकारने और एक दर्द भरी यात्रा को पर्दे पर उतारने की स्वीकृति देने के लिए वे अवश्य ही बधाई के पात्र हैं. संजू के रोल के लिए की गई मेहनत के कारण रनबीर भी खूब वाहवाही लूट रहे हैं.

उम्मीद है यह फ़िल्म दर्शकों को पसंद आएगी और बुरा काम करने से पहले इसकी सच्चाई युवाओं को दसियों बार सोचने पर मजबूर करेगी. आखिर, अपने लिए ऐसा यातना भरा जीवन कौन चाहेगा!
'संजू' न केवल रनबीर की शानदार परफॉरमेंस के लिए जानी जाएगी बल्कि इससे संजय दत्त के प्रशंसकों को उनकी ज़िंदगी को नए सिरे से समझने का अवसर भी मिलेगा. निश्चित रूप से फ़िल्म के ट्रेलर ने ही उनके प्रति सुगबुगाहट पैदा कर नई संवेदनाओं को जागृत करना शुरू कर दिया है.

संजू बाबा भी अब उस दुनिया से बाहर आकर ख़ुशहाल जीवन जी रहे हैं. अब उनके हिस्से में तमाम खुशियों और दुआओं के बरसने का समय है. जहां तक रनबीर की बात है तो यह तय ही है कि यह फ़िल्म उनके कैरियर में मील का पत्थर साबित होगी. देखना यह है कि इस फ़िल्म की सफलता किसकी झोली ज्यादा भरती है, खुद संजू की या संजू बने रनबीर की!
- प्रीति 'अज्ञात'
#Sanju#Pre release#iChowk
iChowk में 29-06-2018 को प्रकाशित -


बुधवार, 27 जून 2018

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे!

मोहम्मद रफ़ी का नाम जब-जब सामने आता है तब-तब स्मृतियों में उनका वह सादगी भरा मुस्कुराता चेहरा स्वत: ही घूमने लगता है. एकदम सहज, सरल, हंसमुख. शायद ही कोई भारतीय होगा जो उनके गीतों का दीवाना न रहा हो. आज जब गूगल ने अपना डूडल उन्हें समर्पित किया तो उनके सदाबहार गीत और सुमधुर आवाज की सुरमई रागिनी फ़िज़ाओं में झूमने लगी. उनका गाया कौन-सा गीत सबसे प्रिय है, यह तय करना उतना ही मुश्क़िल है जैसे कोई किसी मां से पूछे कि तुम्हें कौन-सा बच्चा अधिक प्यारा है.

रफ़ी साहब ने हर रंग, हर विधा, हर मूड के गीतों को अपने स्वरों की जो अनमोल सरगम दी है, वह संगीत प्रेमियों के लिए नायाब तोहफ़े की तरह है. अहा, क्या ख़ूब आवाज़ और कितनी सुन्दर अदायगी. उनके गायन का अंदाज़ ही कुछ ऐसा था कि श्रोता तुरंत समझ जाते थे कि यह गुरुदत्त पर फिल्माया गया है या देव आनंद पर. राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर, दिलीप कुमार, ऋषि कपूर, अमिताभ, शशि कपूर और न जाने कितने ही नायकों को शिखर पर पहुंचाने में इनकी आवाज का अतुलनीय योगदान रहा है. नौशाद, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, रवि, ओ पी नैयर, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमी और रफ़ी जी ने श्रोताओं के अगाध स्नेह के साथ-साथ कई राष्ट्रीय एवं फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त किये.

मोहम्मद रफ़ी गाते नहीं, शब्दों को जीते थे. उनके गीत युवाओं की धड़कन, उनके अहसास की अभिव्यक्ति का माध्यम थे. ये उनका जादू ही है जो अब तक हम सबके सिर चढ़कर बोलता है. उनकी आवाज़ के बिना आज भी न तो कोई बारात दरवाजे पहुंचती है और न ही दूल्हा घोड़ी से उतरता है. जब तक बैंड वाले 'बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है' नहीं बजा लेते. विदाई के भावुक पलों में उनका ही गाया 'बाबुल की दुआएं लेती जा' या 'चलो रे डोली उठाओ कहार' वातावरण को भाव-विह्वल कर देता है. समाज की भावनाओं का साक्षात प्रतिबिम्ब बन गई है उनकी आवाज़.

किसी भी प्रेमी की आशिक़ी उनके बिना अधूरी है और अपनी महबूबा के रूठने-मनाने से लेकर उसके हुस्न की तारीफ़ करने में वह इन्हीं का सहारा लेकर आगे बढ़ता है. याद कीजिये- तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को किसी की नज़र न लगे, ए-गुलबदन, चौदहवीं का चांद हो, हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं, तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है, तारीफ़ करूं क्या उसकी, यूं ही तुम मुझसे बात करती हो और ऐसे कितने ही सदाबहार गीतों के माध्यम से जवां दिलों की क़ामयाब मोहब्बत की नींव पड़ी है.

इनके आंदोलित करते गीतों ने भी प्रेमी-युगलों को समर्थन की ताजा सांसें उपहार में दी हैं. मुग़ल-ए-आज़म में जब ये अपनी बुलंद आवाज़ में 'ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद' गाते हैं तो उस दशक से लेकर अब तक के लाखों प्रेमी उनके साथ एक रूहानी सुकून महसूस कर कह उठते हैं, 'है अगर दुश्मन, दुश्मन.. जमाना ग़म नहीं, ग़म नहीं'हर जवां दिल ने 'एक घर बनाऊंगा तेरे घर के सामने' और 'अभी न जाओ छोड़कर...' से अपनी प्रेमिका की मनुहार की है. जहां 'एहसान तेरा होगा मुझ पर' से कठोर दिलों में नरमी भरी है वहीं 'झिलमिल सितारों का आंगन होगा' से आशाओं के सैकड़ों दीप भी प्रज्ज्वलित हुए हैं.

उदासी और विरह में रफ़ी जी के नग़मों के साथ बैचेनी भरे पल कटते हैं और प्रेमी-प्रेमिकाओं के आंसुओं की अविरल धार और प्रेम से उपजी पीड़ा की निश्छलता में भी इन्हीं के सुरों की प्रतिध्वनि गुंजायमान होती है. कौन भूल सकता है इन गीतों को, जिन्होंने विरह-काल में उसी महबूब की यादों की दुहाई दी है.... दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर, क्या हुआ तेरा वादा, मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम, तेरी गलियों में न रखेंगे क़दम आज के बाद.

मस्ती और शैतानी भरे गीतों से रफ़ी साब ने जो बिंदास और खिलंदड़पन भरे पल दिए हैं, उनका तो कहना ही क्या! तैयब अली प्यार का दुश्मन हाय हाय, नैन लड़ जईहैं तो मनवा मा कसक होइबे करी, बदन पे सितारे लपेटे हुए, हम आपकी आंखों में इस दिल को बसा दें तो, इशारों-इशारों में दिल लेने वाले... सूची ख़त्म नहीं होगी. इन जैसे समस्त गीतों की प्रशंसा के लिए एक ही शब्द है.. याहू!!!!

'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों' जैसे देशभक्ति गीतों को भी रफ़ी साब ने इतनी ही शिद्दत से गाया है कि आज भी उन्हें सुनकर शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है और मन भीतर तक भीग जाता है.

कहते हैं दुनिया में सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता या तो ईश्वर से होता है या फिर दोस्त से. यह हम श्रोताओं का सौभाग्य है कि इन दोनों ही रिश्तों को अपने शब्दों की प्राणवायु से पल्लवित करने में इनका कोई जवाब नहीं! तभी तो 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज', 'ओ दुनिया के रखवाले' ह्रदय को भीतर तक झकझोर कर रख देते हैं.

'दोस्ती' फ़िल्म का हर गीत इस सुन्दर रिश्ते की तरह हर राह साथ चलता है. कहते हैं कि यह फ़िल्म जिसने भी देखी थी, वह फूट-फूटकर रोया था. मैंने यह दस वर्ष की उम्र में देखी थी और तब से आज तक इस रिश्ते की शक्ति पर विश्वास क़ायम है. 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे', 'मेरा तो जो भी क़दम है', राही मनवा दुःख की चिंता क्यूं सताती है' जैसे गीतों की अमिट छाप आज तक ह्रदय पर अंकित है और उदासी के समय मन 'मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया' गुनगुनाने लगता है.

'आदमी मुसाफिर है' जैसे कितने ही दार्शनिक और हृदयस्पर्शी गीतों में इनकी ही स्वर-लहरियों का भावनात्मक संचार हुआ है. निराशा के भीषण पलों में 'ये दुनिया ये महफ़िल', गीत कितना सच्चा और अपना-सा लगता है. प्यासा और कागज़ के फूल फिल्मों का प्रत्येक गीत नए गायकों के लिए एक पाठ्यक्रम की तरह है. जिसने ये गायकी सीख ली वो तर गया.

दशकों बाद भी वर्तमान परिवेश में इस गीत की सार्थकता कम नहीं हुई है... ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया /ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया /ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया /ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है... वाह्ह, वाह्ह और फिर वाह्ह्ह!

चुरा लिया है तुमने जो दिल को, इतना तो याद है मुझे, चलो दिलदार चलो, तेरी बिंदिया रे, तुम जो मिल गए हो, आज मौसम बड़ा बेईमान है, दीवाना हुआ बादल.... जैसे हजारों गीतों की लम्बी श्रृंखला है जहां अपना सबसे प्रिय गीत चुन पाने से दुरूह कार्य और कुछ नहीं! छोड़ ही दीजिए.

सच तो यह है कि रफ़ी साब के युग को कुछ शब्दों में समेट लेना न तो आसान है और न ही संभव. यह तो बस स्नेहसिक्त प्रयास भर है, उनकी आवाज़ को दिल से सुनने, सलाम करने का!

ठीक ही कहा था आपने, 'तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे /हां तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे /जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे/ संग संग तुम भी गुनगुनाओगे'

गुनगुना रहे हैं, सर! हम सबका स्नेह और धन्यवाद क़बूल करें.
-#प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk में 24-12-2017 को प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/…/tribute-to-mohamm…/story/1/9278.html

भारतीय परिवारों के जानलेवा 'सिक्सर'

इसे सुनते ही आपके कानों से मवाद बहने लगेगा, हृदय चीत्कार करेगा, भावनाएं बेदम, आहत हो सर पीटेंगी, पर यदि आपने एक सच्चे भारतीय परिवार में जन्म लिया है तो भैया हर हाल में आपको ये सब सुनते-सुनते ही बड़ा होना पड़ेगा और वो भी साल के पूरे 350 दिन. वरना या तो आप भारतीय नहीं या आपके कान ही नहीं! अब आप सोच रहे होंगे कि 350 दिन क्यों? तो बात ये है भई कि 15 दिन इसलिए कम किये क्योंकि हमारे यहां राष्ट्रीय त्यौहार, होली, दिवाली, क्रिसमस, ईद, राखी आपका या घर के अन्य सदस्य का जन्म दिवस, मां-पापा की विवाह की वर्षगांठ पर भारी छूट मिलती है और माहौल को बिना डांट-डपट, टोका-टाकी वाला बनाए रखने की भीषण कोशिश की जाती है. हमारी परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन के उच्च कोटि वाले गुणधर्मों को ध्यान में रखते हुए प्रयासवश परन्तु अनौपचारिक तौर पर ये सभी दिवस भाईचारे से रहने के उत्तम दिवस मान्य किए गए हैं. इसके साथ-साथ अचानक ही अतिथियों के आकस्मिक आगमन के दिनों को भी इसी उच्च श्रेणी वाले विशिष्ट पारिवारिक सौहार्द्र उत्सव में स्थान दिया गया है. वो क्या है न कि हम बड़े भावुक, संवेदनशील और मुहब्बत पसंद बन्दे हैं जो संयोगवश ऐन वक़्त पर हंसमुख भी हो जाते हैं. आइए आपकी ज़िन्दगी के उन पृष्ठों को पलटते हैं जो इस समय आपके बच्चों का वर्तमान बन, आपके माध्यम से उनके नाजुक मन पर कुंडली मारे फ़ुफ़कार रहे हैं.

परिवार, ज्ञान, भारत, परंपरा

1. ताजमहल पे रूमाल रख देने से तुम्हारा हो जायेगा?

यही वह क्रूर एवं मारक डायलॉग है, जिसने बचपन से लेकर आज तक होने वाले हर भीषण embarrassment, बोले तो शर्मिंदगी में अहम भूमिका निभाई है. बात चाहे खिड़की की हो या डायनिंग टेबल की! जब भाई-बहन आपस में जगह के लिए लड़ रहे हों और उनमें से एक कहे कि थोड़ी देर पहले यहां वो ही बैठा/बैठी था, तो धिक्कार है उन माता-पिता की परवरिशपंती पर; ग़र उन्होंने यह कुख़्यात संवाद आपके ही मुंह पर न दे मारा हो! दुर्भाग्यवश दुःख का अनुपात तब और भी बढ़ जाता है जब वे इसकी उदाहरण सहित विवेचना भी कर बैठते हैं.

2. अच्छा, तुम्हारा दोस्त कुंए में कूदने को कहेगा, कूद जाओगे?

यही वह ब्रह्मवाक्य है जिसने आपके किशोर और उन्मुक्त हृदय की आवारागर्दी की उत्कृष्ट तमन्ना छीन ली थी. तभी तो आप इससे बाल्यकाल से घृणा करते आए हैं. उस समय संभवत: पैर पटककर, आंसुओं को भीतर-ही-भीतर गटकते हुए कमरे से बाहर निकल जाते होंगे! बस, एक बात मैं आज तक नहीं समझ सकी कि ये पिघलते शीशे से शब्द सुनते समय सब जमीन की तरफ मुंडी करके उसे इतनी बेदर्दी से घूरते क्यों है? अरे, इस पावन धरा का क्या दोष.. वह आप जैसे पापियों को बर्दाश्त कर तो रही है. अब क्या खोदकर अपनी क़ब्र उधर ही बनाओगे? नहीं, न! फिर मुंह लटकाकर नाख़ून से काहे खुरच रहे? क्या उंगलियों में फावड़े लगे हैं? जाओ, अगली बार सॉलिड बहाना लेकर पापा से कुच्चन पूछने का अभ्यास करो!

3. अभी बच्चे हो / कब तक बच्चे बने रहोगे?

यही वह परस्पर विरोधाभासी वाक्य-युग्म है जिसने आपका जीना मुहाल कर रखा था और अब आप श्रवण कुमार की तरह इसी पावन परंपरा को स्थापित करने के भरसक प्रयासों में लगे हुए हैं. मम्मी-पापा भी बड़े situational जीव बन जाते हैं न! जब अपना काम (मसलन सब्ज़ी लाना, बर्तन, सफाई) करवाना हो तो "कब तक बच्चे बने रहोगे?" और हम कहें कि दोस्तों के साथ सनीमा देखने चले जाएं तो "न, बिलकुल नहीं! अभी बच्चे हो!" हम खामखां नागरिक शास्त्र की पुस्तक से रट लिए थे कि अठारह वर्ष में वयस्क हो जाते हैं. भैया, हिन्दुस्तान में तो कभी न होते जी! यहां तो कॉलेज भी जाओ तो पूरा कुनबा विदा देने आता है.

4. हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो फलां ये ढिमका वो

अरे कम ऑन! आप तैरकर जाते थे, क्योंकि तब पुल नहीं थे. आप 10 पैसे की पॉकेट मनी से गुजारा कर लेते थे, क्योंकि तब महंगाई नहीं थी न! वैसे भी आपके पास विकल्प ही क्या थे?

एक दिन उत्तम मां का फ़र्ज़ निभाते हुए हमने भी अपने बेटे को यही डायलॉग सरका दिया जो मेरे माता-पिता मुझ पर बरसाते थे- "तुम्हें पता है, अब्राहम लिंकन स्ट्रीटलैम्प में पढ़ते थे और एक तुम हो." बेटे से जवाब मिला "अरे मम्मी, पर वो दिन में क्यों नहीं पढ़ते थे?" हैं!!! मैं समझ ही न पाई कि बेटे की होशियारी पर मुग्ध होऊं या तात्कालिक अपमान महसूस करूं! हमने तो इस एंगल से सोचा ही नहीं कभी. अभी इस झटके से उबरे भी नहीं थे कि बेटी बोली, "अरे भैया वो न शो ऑफ कर रहे होंगे." क़सम से मैं उस बेईज्ज़ती को अब तक न भूल सकी.

5. जरा एक गिलास पानी मुझे भी देना

आप चाहे कितना ही दबे पांव जाओ और अपनी सांस तक भी इस बात के लिए साधे रखो, चुपचाप फ्रिज़ खोलो या घड़े से पानी लो पर कोई न कोई कनखजूरा चिल्लाकर कह ही देगा, "जरा एक गिलास पानी मुझे भी देना" उस समय मुंह में गया पानी कुल्ले की तरह धचाक से बाहर निकलता है और exactly वही वाली फ़ीलिंग आती है जैसे किसी चोर को रंगे हाथों पकड़ लिया गया हो! उस समय चाहे जितनी भी चिढ़ मच रही हो पर कनपटी के पास किसी व्हाट्स एप्प सुविचार की तरह मां की यह बात तरन्नुम में आती ही है कि "बेटा, पानी के लिए दुश्मन को भी मना नहीं करते!" वैसे मेरा मानना है हमारे नौनिहालों और उनके जैसे समस्त आलसियों को पानी देने में कोई दिक़्क़त नहीं है. मौत तो इन्हें बोतल भरने में आती है!

6. बारहवीं में पढ़ लो, जीवन संवर जाएगा... वरना ठेला लेकर घूमना

इसे लेकर आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि यह सही राह दिखाने के लिए कहा जाता है या हमारी औक़ात बताने के लिए! ऐसे कौन प्रोत्साहित करता है, भई! आप मन में यह सोचकर कोसने की प्रथम पायदान पर अपने चरण बस रखने ही वाले होते हैं कि किसी फ़ॉलोअप या ट्विटर थ्रेड की तरह उनके तरकश से निकला ये वाला अगला भावनात्मक तीर आपको छलनी कर देता है.... "बेटा, हमें समझाने वाला तो कोई था ही नहीं! बस, इसीलिए कह रहे हैं कि जो गलतियां हमने कीं, वो तुम न दोहराओ." इसके साथ ही उनकी मुखमुद्रा देवदास के अपग्रेडेड मातृ-पितृ वर्ज़न में बदल आपके मन-मस्तिष्क पर अचूक संवेदनात्मक प्रहार करती है. यक़ायक़ आप स्वयं को भावुक अवस्था में प्राप्त कर ग्लानिबोध से भर उठते हैं. उसी समय आप स्वयं को भारतीय प्रशासनिक सेवा के उच्च पद पर बैठाने का अनमोल स्वप्न लेते हैं जो कि नववर्ष के प्रण की तरह अगली सुबह क्षत-विक्षत अवस्था को प्राप्त होता है.बाक़ी फिर कभी... वरना आज ही घर से निकाल दिए जाएंगे. :(
-#प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk में 11-03-2018 को प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/society/6-things-which-you-can-listen-in-any-indian-family/story/1/10140.html

चाय पे अराजनीतिक चर्चा

चाय का पहला घूंट, किसने कब लिया था, यह तो याद नहीं होगा. पर इतना तो आप सबको जरूर याद रह गया होगा कि बचपन में गर्मियों या दीवाली की छुट्टियों में जब-जब ददिहाल या ननिहाल जाना हुआ है, तब-तब भगोना भर खदकती चाय से सामना होता रहा है. चूल्हे पर चढ़ी चाय, घूंघट काढ़े परिवार की स्त्रियां, अपनी-अपनी मांओं का आंचल पकड़े घर के भुख्खड़ बच्चे और आसपास चहलक़दमी करते पुरुष; संयुक्त परिवार की यह सबसे ख़ूबसूरत और नियमित तस्वीर हुआ करती थी.

सर्दियों में अदरक वाली चाय की महकती ख़ुशबु का जादू ही कुछ ऐसा था कि हड्डियों को ठिठुरा देने वाली सर्दी भी बड़ी भली लगती थी. चाय के सामने आते ही स्वेटर की बाहों में कुंडली मारे छुपे दोनों हाथ रेंगते हुए बाहर आते और लपककर कुल्हड़ को थाम लेते. कुल्हड़ में आ जाने के बाद चाय की महक़ और स्वाद दोगुना बढ़ जाता. परिवार इकठ्ठा बैठता, ठहाके लगते और चाय का चूल्हे पर चढ़ना-उतरना, लगभग दो घंटे की शॉर्ट फिल्म की तरह चलता.

कुछ नवाबी सदस्य देर से उठते और अंगड़ाई लेते हुए सीधा रसोईघर या आंगन की तरफ खिंचे चले आते. उनकी अलसाई पलकों से एक ही प्रश्न झांकता, "चाय बन गई क्या? हां, मेरी छान दो." चाय के साथ थाली भर-भर घर के बने चिप्स, सूखा नाश्ता या गरमागरम पोहा परोसा जाता, तो कभी कचौड़ी-समोसे का लम्बा दौर चलता जो जलेबी के आने तक जारी रहता. अजीब लगते है न वो दिन, कैसे सब कुछ हज़म कर जाते थे! फिर उसके बाद भोली आंखों से यह पूछना भी कभी न भूलते कि 'आज खाने में क्या है?"

चाय के साथ सिर्फ़ बातें ही नहीं होती थीं, दिल भी जुड़ते थे. इस चाय ने घर को कैसे बांध रखा था! इसका हर सिप एक नई ताजगी देता था. चाय पर चर्चा, हंसी-ठट्ठा और कभी-कभी गंभीर वार्तालाप घर-घर की कहानी थी. बेहद सुहानी थी.

समय के साथ-साथ परिस्थितियों में परिवर्तन आया तो चाय पर इसका असर होना स्वाभाविक ही था. यह भी ठिठककर ग्रामीण कुल्हड़ से कंफ्यूज गिलास और फिर शहरी कप में आन बसी. बीते चार दशकों में इसकी जितनी वैराइटी आई हैं उतनी वैराइटी तो हमारे नेताओं में भी देखने को नहीं मिलती (यह सुखद है).

पहले चाय का मतलब सिर्फ़ चाय ही होता था. बढ़ती महंगाई ने इसकी ऊंचाई घटाकर इसे 'कटिंग' बना दिया और अब इस 'कटिंग' को भी रेलवे वाले 'चम्मच' बनाने पर तुले हुए हैं. दस रुपये में घूंट भर चाय पीकर ऐसा लगता है कि उन्होंने हमें सर्दी से बचाने के लिए दो चम्मच पत्ती वाला सिरप दे दिया हो. पहले हर स्टेशन पर चाय पीने की जो लत थी, वो टीवी चैनलों की कृपा से छूटती जा रही है. उन्होंने ही सबसे पहले यह ज्ञान दिया था कि हम चाय नहीं 'ज़हर' पी रहे हैं.

मिलावटी सामग्री और केमिकल के इस्तेमाल की ख़बर ने घर से बाहर उपलब्ध चाय के सम्मान में गिरावट लाई ही थी कि घरों में भी चायवादी गुट बन गए. सबकी अपनी मांगें हैं. किसी को ब्लैक टी चाहिए तो किसी को ग्रीन. किसी को कम दूध वाली तो किसी को ज्यादा दूध वाली. कभी स्ट्रॉन्ग (इसका तात्पर्य आज तक समझ नहीं आया पर इसका श्रेय लिप्टन 'टाइगर' चाय को ही जाना चाहिए) तो कभी मीठी. मधुमेह के रोगियों के लिए बिना चीनी वाली. 'आइस्ड टी' के प्रशंसकों की भी कमी नहीं. एक समय 'डिप' वाली चाय का गंभीर दौर भी चला था. हम जैसे चाय प्रेमियों ने इसे 'जैक एन्ड जिल' वाली राइम की तरह तुरंत ही याद भी कर लिया था. जो इतने वर्षों बाद भी आज तक याद है - "dip,dip... add the sugar & milk... and is ready to sip... do u want stronger, dip it little longer... dip, dip, dip."

वैसे चाय को मध्यम वर्ग का पसंदीदा पेय बनाने का श्रेय ज़ाकिर हुसैन को जाता है. चाय पीते-पीते मुंह से जो 'वाह' निकलती है, इस लफ्ज़ की अदायगी हम सबने ज़ाक़िर साब से ही सीखी है. बाद में उर्मिला मातोंडकर भी आईं, पर विज्ञापन में उनकी चाय का कप खाली होने का संदेह होता था. बल्कि दिखता ही था कि उन्होंने खाली कप ही उठाया है. लेकिन 'ताज' का असर और यादें आज भी ताजा हैं. कंपनियों ने चाय की बढ़ती ख़पत देख, शुगर-फ्री लांच कर दिया... यानी सबका साझा प्रयास यही रहा कि चाय का साथ कभी न छूटे... 'प्राण जाए, पर चाय न जाए' की तर्ज़ पर''.

कहते हैं जो पति, अपनी पत्नी को मॉर्निंग टी बनाकर देते हैं, उनका जीवन बड़ा ही सुखमय गुज़रता है.

बॉलीवुड ने भी चाय को हाथोंहाथ भुनाया है. "शायद मेरी शादी का ख्याल, दिल में आया है... इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है" गीत में टीना मुनीम, राजेश खन्ना को चाय पर बुलाने का सामाजिक अर्थ समझा रहीं हैं. तो "इक गरम चाय की प्याली हो, कोई उसको पिलाने वाली हो' में अनु मलिक, सलमान के माध्यम से सिने प्रेमियों को चाय की आड़ में गृहस्थ जीवन में प्रवेश का सुविचार बताते दृष्टिगोचर होते हैं.

चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित कर देना चाहिए-

निष्कर्ष यह है कि चाय के घटते-बढ़ते स्वरुप, पात्र के प्रकार और आकार, विविध विज्ञापनों का युग, स्वाद का ड्रास्टिक मेकओवर, ट्रेन में बार-बार उबालकर परोसे जाने के बावज़ूद भी, किटली कल्चर का आगमन इस तथ्य की ओर सीधा संकेत देता है कि इस गर्म पेय का भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल और सुनहरा है.

अतिथि के आने पर घर में कुछ न हो, कहीं जाने की जल्दी हो; तब भी हम इतना अनुरोध तो अवश्य ही करते हैं, "अरे, चाय तो पीकर जाइए." जब दो मित्र साथ बैठते हैं तो सबसे पहली बात यही, "चल, चाय पीते हैं."

अपने जीवन को रिवाइंड कीजिए, एक कप चाय ने कितने स्नेहिल दिलों से मिलवाया होगा.

चाय हमारी संस्कृति है, सत्कार का संस्कार है, एक तरल बंधन है जो मिल-बैठकर बात करने को उत्साहित करता है, स्नेह बढ़ाता है. रिश्तों को नई उड़ान देता है. चाय से सुबह की ऊष्मा है, दोपहर की ऊर्जा है और शाम की थकान को दूर भगाती तरावट है. चाय सच्चे साथी की तरह हमें अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करती है. चाय है, तो दिन है.. चाय नहीं, तो रात है! ये हमारे मन की बात है!
- #प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk में 17-12-2017 को प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/culture/tea-and-tales-indian-railway-tradition-village-joint-family/story/1/9171.html

The whole thing is that कि भइया... सबसे बड़ा रुपैया

सच कहूं तो, कर्नाटक में जो कर्रा नाटक चल रहा है उससे मुझे कोई लेना-देना नहीं. इसलिए नहीं कि मुझे राजनीति में कोई रुचि नहीं और यह रत्ती भर समझ नहीं आती बल्कि इसलिए भी कि परिणाम चाहे कुछ भी निकले, जनता को तो उल्लू बनना ही है.

सोचकर देखो, आख़िर चुनाव है क्या?

अब जान लो, “चुनाव वह परीक्षा है जहाँ दिल को सात फुट अंदर गाड़कर नेताओं के दिमाग की बत्ती इस सोच के साथ जलती है कि जनता के दिमाग़ की आशान्वित मोमबत्तियों को उम्मीदों की घुमावदार सीएफएल के साथ कैसे गुल किया जाए. यह झूठे वायदों की गहरी-अंधेरी खाई है जिसमें सिर के बल गिरने के बाद मतदाता को जैसे-तैसे, हाथ-पांव मार बाहर निकलकर अपनी मरहम-पट्टी स्वयं ही करनी होती है. यह एक बड़ी और शानदार दावत की तस्वीर दिखाकर हाथ में थमाई चूरन की चटपटी गोली है जो हमें खाली पेट ही हजम करना है”.

क्या है यह प्रक्रिया?

पूरी चुनावी प्रक्रिया का प्रारम्भ उम्मीदवारों के चयन (माने उठापटक) से होता है. सर-फुटौवल और प्यार-मनुहार, ये दोनों विरोधाभासी गुण इसी महत्त्वपूर्ण समय एक-साथ गलबहियां करते दिखते हैं और ब्याह में रूठे फूफा की तरह मुँह फुलाए कुछ लोगों की उपस्थिति कोने में भी दर्ज की जाती रही है. आपसी ख़ुन्नस निकालने और छीनाझपटी के बाद अंततः तय हो ही जाता है कि फलाने-ढिमके को ‘मैदान में उतारा जाएगा’. जी, हां. सही पढ़ा आपने, यह कुश्ती टाइप ही होता है. यह जंग का जंग खाया ऐसा मैदान है जहां कांटे की टक्कर से कहीं अधिक गुलाबी धन उछाल मारता है.

प्रचार, आवागमन, खान-पान, होटल इत्यादि की व्यवस्था में लगा पैसा कहां से आता है? यह जानकर हमारी आत्मा को क्षति पहुंच सकती है अतः किसी गणितीय सूत्र की तरह चलो यह मान लेते हैं (suppose) कि वह एक बड़े बरगद के वृक्ष से टपकता है. तो, इस बरगद की टपकन से आए पैसे को जी-भरकर इस तरह खर्च किया जाता है जैसे कोई पिता अपनी बेटी के ब्याह में ‘कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, भैया.’ की आत्मिक पुकार के साथ करता आया है.

इन सब तैयारियों के बीचों-बीच स्क्रिप्ट राइटर पूरी तन्मयता के साथ अपना काम लगातार कर रहा होता है. इस स्क्रिप्ट राइटर का प्रमुख गुण न केवल उसका उत्तम इतिहासकार होना है जिससे वह समय-समय पर हड़प्पा की ख़ुदाई की तरह विरोधी दल की सभी पीढ़ियों का ज्ञान उपलब्ध करा सके बल्कि अपशब्दों और गरिमाहीन शब्दों की जानकारी रखने वालों को भी चयन में प्राथमिकता दी जाती है. थोड़ी-बहुत कमी तो साब लोग बोलते समय पूरी कर लेते हैं. अब, आप उन्हें इतना कम भी न समझो. उनके पास भी अपना एकदम मौलिक शब्दकोष है भई.

खैर, इस सबके बाद वोटिंग, एडजस्टिंग, आरोप-प्रत्यारोप के बीच गिनती शुरू होती है. उसके बाद का मनभावन दृश्य बिल्कुल वही है जिसके लिए तमाम चैनल पलक-पाँवड़े बिछाए प्रतीक्षारत होते हैं. असाधारण प्रतिभा के धनी रायचंदों का एक समूह पूरी गंभीरता के साथ इस पर विस्तृत चर्चा करता है और फिर लड़ाई करते-करते वीरगति (बाहर निकाल दिया जाता है) को प्राप्त होता है. कभी-कभी बुद्धिमान एंकर, समय समाप्ति की घोषणा के साथ विराम लगा दिया करते हैं.

कुल मिलाकर अपार धन, मन, समय और मान हानि के बाद चुनाव का कोई परिणाम सामने आता भी है तो, वो मासूम जनता जो अब तक चुप थी, अब प्रश्न करती है. शक़ करने लगती है. यद्यपि इस सारे ड्रामे में उसकी भूमिका ‘अतिथि कलाकार’ की ही रहती है. जिसे फ़िल्म के हिट या फ्लॉप हो जाने पर एक कौड़ी का भी लाभ नहीं मिलता. लेकिन अब जनता की सुप्त इन्द्रियां चेतनावस्था को प्राप्त करती हैं.

मेरा कहना बस ये है कि इतना सब कुछ बर्बाद करने की आवश्यकता ही क्या है? जब ये तय है कि देश की किसी को पड़ी ही नहीं और न ही कोई देशसेवा के लिए यहां आया है. सबको पद की भूख है या पैसे की. तो फिर पहले ही सब लोग आपस में मिलकर सारा मामला क्यों नहीं सुलटा लेते? ‘बरगद’ तो सदैव तैयार रहता ही है उसके खींसे से दस-दस करोड़ (इतने में ही बिक जाओगे, सौ ज़्यादा लग रहे) खींचते रहो और प्रेम से बांट लो. यही लेने तो आये हो. सत्ता में आने का भत्ता.

ठीक है. अब जनता को माफ़ करो. क्योंकि हमारी नाक में तो दर्द (कृपया इसे ‘दम’ पढ़ें) होना ही है आप सीधे पकड़ो या घुमाके. उफ़्फ़. काहे सब टीवी से चिपके पड़े? कोई हारे-जीते, हमारी बला से. हमने तो बेवकूफ ही बनना है न, जी.. अब और कितनी सहिष्णुता चईये तुमको? हां, नहीं तो !

अचानक धरम पाजी और महमूद साब की बहुत जोर वाली याद आ रही है, एक कहते थे "चुन-चुन के बदला लूंगा". और दूसरे ने बताया था कि "The whole thing is that कि भइया...सबसे बड़ा रुपैया' आप अन्तर्यामी हो.

नमन
-प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk में  19-05-2018 को प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/humour/karnataka-election-floor-test-know-what-is-horse-trading/story/1/11021.html

भिया! हम यहाँ हैं!

भगवान जी ने जब हमें बनाया तो थोड़ा आननफ़ानन में ही निबटा दिया था. अब भई, बड़े लोग हैं, सौ काम होते हैं उन्हें. सो, कुछ पार्ट्स ठीक से फिट करना भूल गए और कुछ को उनकी ज़िम्मेदारी बताने से भी चूक गए. फाइन और फाइनल टच देने के चक्कर में ऐसी एडिटिंग करी कि हम अमिताभ से डेढ़-पौने दो क़दम पीछे ही रह गए. पर हमें इस बात का कोई मलाल नहीं रहा क्योंकि हमें पता है कि हम हैंडपंप सरीख़े स्मार्ट गैजेट हैं. मतलब, जितना जमीन के बाहर दिखते हैं उतना ही अंदर भी गड़े हैं. 😎तभी तो हममें प्रतिभा इतनी कूट-कूटकर भरी हुई है. पर ईश्वर को लगा होगा कि बड़े होकर कहीं हम उनसे ख़ुन्नस न निकालें सो उन्होंने हमारे मासूम जीवन में देश की बेरोज़गारी की तरह 4G की स्पीड से ताबड़तोड़ 128 GB की इतनी घटनाएँ भर दीं कि हम उन्हीं में उलझकर उफ़ तक न कर सकें. कहते हैं न कि "कोशिशें अक़्सर क़ामयाब हुआ करती हैं." सो, ये साब भी अपनी योजना में सफ़ल हुए. कभी घटनाओं पे हँसते, कभी रोते-जूझते भारतीय रेल की तरह हमारे जीवन की गाडी निर्धारित समय से थोड़ा देर से ही सही पर पहुँचती रही. इस बीच कभी-कभार ऐसे पल भी आये कि हमें बहुत गुस्सा आया और हमारे क्रोध के घने बादल के छींटे भगवान जी पर गरज़ के साथ गिरे तो, पर बरसे तब भी नहीं! अब उनसे क्या कहना, जो हो गया सो हो गया, हमारी लाइफ, डील तो हमें ही न करना पड़ेगा. अब जैसा कि हमने उल्लेख कर ही दिया है कि हैंडपंप हैं, सो दुःख में बुक्का फाड़ के बाल्टी भर-भर रो भी लेते हैं. सुना है, "पीड़ा का बह जाना सिस्टम के लिए सही होता है."😌

हाँ, तो बात किस्सों की थी. अच्छी-बुरी घटनाएँ तो सभी के साथ होती हैं लेकिन हमारे साथ ऐसी-ऐसी घटनाएँ घटित होती रही हैं कि अब तो बच्चे भी मना कर देते हैं, "मम्मी, किसी को बताना मत! कोई विश्वास नहीं करेगा!" उस समय हमारा यही गोलू चेहरा और आँखें और चौड़ जाती हैं, "नहीं करेगा से क्या मतलब? अरे! हमारे साथ हुआ है ऐसा."😠

भारतीय संस्कृति में कहानी-किस्से सुनाने की परंपरा तो सदियों से चली आ रही है लेकिन कहीं यह भी चिट्ठियों की तरह विलुप्त न हो जाए, इस आशंका को ध्यान में रखते हुए हम यह साहसिक कार्य करने का मन बना लिए हैं. यूँ तो हमने अपने किस्सों से आप सबको पहले भी ख़ूब पकाया है पर औपचारिक घोषणा और भूमिका के साथ सुनाया गया यह पहला किस्सा है. अभी बता रहे हैं -

तो हुआ यूँ कि आप सबकी ही तरह हम भी बचपन में गोलू और भारी क्यूट प्रजाति के प्राणी थे. मम्मी जहाँ भी जातीं तो एक आदर्श बच्चे की तरह हमारा साथ लटक लेना भी सुनिश्चित था. भला कौन माँ अपने प्यारे बच्चे का हाहाकार देखना चाहेगी! सो, ऐसे ही एक शुभ दिन अपन साथ हो लिए. अच्छा! हमारे साथ दिक़्क़त ये थी कि चार क़दम चलते ही धराशाई हो जाते और "मम्मी, थक गए. गोदीईई!" या "मम्मी, रिक्शाआ आ" की गुहार लगाने लगते. 😀उस पर अपनी भोली आँखों में थकान और मजबूरी की ऐसी गंगा-जमुना भरते कि वे इस आकस्मिक विपदा से निबटने के लिए तत्काल का बटन दबा देतीं. अब यह तो तय ही है कि हाथ में सामान और तमाम चीज़ों के साथ वे प्रायः दूसरा विकल्प ही चुनतीं. यूँ भी हम कोई मखाने तो थे नहीं, अच्छा-ख़ासा वज़न रखते थे, भई!

तो साब, ऐसे ही एक हसीन दिन हम बाजार से घर को लौट रहे थे. नौटंकी कर ही ली थी सो रिक्शे पर टंग गए. साथ में आंटी जी भी थीं. मम्मी और आंटी जी के बीच में हमें बिठाया गया और सुरक्षित रखने की सुन्दर सोच के साथ सामने सामान भी अड़ा दिया. पर हम तो हम थे, इतिहास तो रचना ही था. टनाटन पेट भरा, उस पर ठंडी हवा! सो अपन शीघ्र ही नींद को प्यारे हो गए और अनायास ढुलक लिए.

अचानक किसी के रोने की आवाज़ सुनकर आंटी जी और मम्मी चौंके कि "अरे, ये तो गुड़िया (हमहि) की आवाज़ लग रही है." देखा, तो गाँव की बिजली की तरह अपन उन दोनों के बीच से विलुप्त थे. चीखकर रिक्शा रुकवाया और दौड़कर हमें उठाया गया. अच्छा! बच्चों की एक मज़ेदार आदत ये भी होती है कि ख़ूब उठ सकते हों, पर देशव्यापी धरनों की तरह तब तक नहीं हिलेंगे जब तक कोई उन्हें आकर पुचकारे नहीं! वरना गिरने का फ़ायदा ही क्या?? 😉सो, अपन भी इसी परम्परा को फॉलो करते हुए पड़े रहे. जबकि मात्र दस सेंटीमीटर की दूरी पर ही ताजा उत्तम गोबर का बदबूदार ढेर था जिससे हमारी नाजुक, इत्तू-सी नाक सड़ी जा रही थी. उठने के बाद कपडे झाड़ते हुए उस ढेर पर भी हमने बड़ी हिक़ारत भरी नज़रें डालते हुए उम्दा टिप्पणी की थी. तब कहाँ पता था कि एक दिन इसी गोबर के छह गोले (उपले) AMAZON, 299 रुपये में बेचेगा. 

अबकी बार हमें बिठाकर इतना टाइट पकड़ा गया जैसे कि बेरोज़गारी ने हमारे युवाओं को थामा हुआ है. पर अब गिरने का चांस ही नहीं था जी क्योंकि हम तो अपनी POWER NAP ले चुके थे और गली में भटकते जानवरों की गिनती में मस्त थे.😛 कुत्ता, बिल्ली, गाय तो आज भी कॉमन हैं पर उस समय सूअर भी होता था जी! इस बीच एक मज़ेदार बात और हुई कि हमको रिक्शे पर पुनर्स्थापित करते समय इन दोनों ने रिक्शेवाले को बोला कि "भैया, तनिक देख के चलाया करो, बच्ची गिर गई थी." वो हँसा और कहने लगा "बहनजी, हम तो सामने देखकर ही चला रहे, बिटिया तो आपके साथ थी." खी, खी, खी😎 तब तक घर आ गया और हम पापा को देख इतिहास की तरह अपने टसुओं का रिपीट टेलीकास्ट करने में व्यस्त हो गए.

वैसे एक बात का मुझे पक्का विश्वास है कि हम सभी किसी न किसी रूप में गिरे हुए लोग हैं. 😜तात्पर्य यह कि सोते समय कभी तो पलंग से एक न एक बार गिरे ही होंगे. सब कुछ सरकार पर न छोड़ें, अपना और बच्चों का पूरा ध्यान रखें. यह बच्चों के मस्तिष्क और देश के भविष्य से जुड़ा नितांत आवश्यक मुद्दा है. अब सब कोई हमारी तरह थोड़े ही न हैं जी! कि सिर फुटा-फ़ुटाकर भी उनका मस्तिष्क फैलता जाए और अमीबा की तरह विकसित होता रहे.😍

चलो, जय राम जी की 
पूड़ी खाओ घी की 
- #प्रीति 'अज्ञात'
#संस्मरण 

मंगलवार, 26 जून 2018

#काला_दिवस

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे 
ख़ता-वार समझेगी दुनिया तुझे 
अब इतनी ज़ियादा सफ़ाई न दे 
(बशीर बद्र) 

प्रत्येक पद की एक विशिष्ट गरिमा होती है और व्यक्ति उसी के आधार पर व्यवहार करता ही शोभा देता है क्योंकि यदि वह स्वयं पद के अनुकूल भाषा का प्रयोग नहीं करेगा तो प्रत्युत्तर में उसे भी मर्यादित भाषा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. 
यूँ तो भारतीय राजनीति की छवि कभी भी अच्छी नहीं मानी गई और इसे भ्रष्ट, अति-महत्वाकांक्षी, सत्ता-लोलुप और झूठे वादों की कला के धनी  लोगों द्वारा धन और पद का दुरूपयोग करने वाले क्षेत्र के रूप में ही देखा गया है. देशसेवा का नाम सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है यह बात भी जगजाहिर है.

आजकल देश के असल मुद्दों को भुलाकर भारतीय सड़कों की तरह हर दूसरे दिन इतिहास खोदा जा रहा है. आननफानन में एक गड्ढा भरते हैं, तब तक कोई दूसरा खोद कर चला जाता है. जब-जब जनता ठीक से चलने की उम्मीद लिए क़दम बढ़ाती है तब-तब वह इन्हीं गड्ढों में अटककर चारों खाने चित्त गिरी नज़र आती है. विचारणीय बात यह है कि इन ऊबड़-खाबड़ राहों पर विकास की बुलेट चलने का दावा क्यों किया जा रहा है? अरे, विकास फिकास छोड़ो; पहले मानसून के आते ही जल निकास की व्यवस्था पर ध्यान दो! और हाँ, इतिहास हो या सड़क; कृपया कुछ दिन के लिए उसे खुला ही छोड़ दो. जिसे जो कहना हो कह लेने दो. भीतर का सारा कष्ट (ज़हर) निकल जाए, मन भर जाए फिर खड्डे भी भर देना.

हमारी तथाकथित मानसिक 'प्रगति' का मूल मन्त्र यही है कि या तो बीते हुए में भटकते रहो या फिर भविष्य के मुंगेरी सपने बुनो! यथार्थ के धरातल पर पैर टिका वर्तमान में जीना हमने सीखा ही नहीं! लेकिन गड़े मुर्दे उखाड़कर मूल बात से ध्यान भटकाने का यह खेल बेहद बचकाना और निंदनीय है.

हरे और भगवा की कबड्डी में अब काला भी रेफ़री बन शामिल हो गया. श्वेत का अस्तित्व तो सदैव ही दोनों पालियों के बीच खींची एक लाइन भर का रहा है. चाहे किसी भी पाली में हों पर यह तय है कि हर राजनीतिक कबड्डी में घसीटा जनता को ही जाता है. हर पटखनी की चोट का असहनीय दर्द भी उसके ही हिस्से आता है.

इधर ख़बर आई है कि भारत महिलाओं के लिए दुनिया में सबसे असुरक्षित देश है. इस पोल में अफगानिस्तान और सीरिया को क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान मिला है. यह सर्वे थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन की ओर से कराया गया है और इसमें महिलाओं के मामले से जुड़े विश्व के 550 विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया है. 'काला दिवस' मनाने का यह एक सार्थक कारण है जिस पर 'बोलो, है कि नहीं!" कहकर पब्लिक से तालियाँ नहीं पिटवाई जा सकतीं! हाँ, सर झुकाकर शर्मिंदा जरुर हुआ जा सकता है.
बोलो, शर्म आई कि नहीं?
बताओ न, शर्म आई कि नहीं?
- प्रीति 'अज्ञात'
#काला_दिवस

शुक्रवार, 22 जून 2018

आ_अमदावाद_छे!

यूँ तो हर मौसम के अपने-अपने दुखड़े और किस्से हैं लेकिन अहमदाबाद की गर्मी की तो बात ही निराली है. दरअसल इसे गर्मी कहना भी इस शब्द का अतिरेक सम्मान है क्योंकि यहाँ की गर्मी, गर्मी नहीं बल्कि 2000 डिग्री सेल्सियस की धधकती भट्टी है. आप आँगन में पापड़ रखकर दो मिनट मौन रखें, सिक जायेगा. बाल धोये हैं और पार्टी में जाना है? तो बस बालकनी से झांककर सब्ज़ी वाले को आवाज़ लगाइये, एक नया हेयर स्टाइल डेवलॅप हो चुका होगा. कपड़े तार के एक सिरे से डालना प्रारम्भ करें और फिर साथ-ही-साथ दूसरे सिरे से समेट भी लें. तात्पर्य यह है कि जो इंसान अपने मूल स्वभाव से विचलित हुए बिना यहाँ चैन से जी लिया, उसके चरणों की धूलि स्पर्श कर साष्टांग दंडवत बनता ही है क्योंकि इस प्रचंड गर्मी में सामान्यतः एक हँसमुख इंसान भी जब मार्केट जाता है तो आगबबूला होता हुआ, चिड़चिड़ा बनकर घर लौटता है. आप उससे पूछने की हिम्मत तो कीजिये कि "भई, सामान ले आये?" फिर देखिये वह कैसा ड्रैगन की तरह आग उगल फुफकारें मारेगा! स्त्री होगी तो पसीना पोंछते-पोंछते घर में घुसेगी और फिर सीधा ही सामने वाली कुर्सी पर धराशाई हो अचेतन अवस्था को प्राप्त हो जाएगी. सबसे अधिक परेशानी बच्चों को होती है. हँसते-खिलखिलाते, गोरे-चिट्टे बच्चे को सुबह बाय करके स्कूल भेजने वाली माँ दोपहर में उतरते मैले-कुचैले बच्चों से नज़र हटा यह सोच बस के अंदर तब तक झाँकती है कि "हाय! मेरा होनहार क्यों न उतरा!" जब तक बगल में खड़ा भुर्ते वाले बैंगन सरीख़ा खिसियाता बच्चा ख़ुद ही न बोल दे, "अरे, मम्मी! घर चलो न, बैग बहुत भारी है." दुपहिया वाहनों से आती सखियाँ भी तभी पहचान में आती हैं जब तक वो नाम लेकर न पुकारें. उफ़! पैकिंग ऐसी कि हवाई यात्रा के लगेज में रखे काँच के 'हैंडल विथ केयर' के सामान की भी न होती होगी. पैकिंग क्या जी, दस्तानों की लम्बी दास्तां है.मम्मियाँ, ममी की तरह पैक रहती हैं 😑😎पहचानने योग्य आँखों पर चढ़े गॉगल्स भी मुँह चिढ़ाते हुए पूछ रहे होते हैं, "पहचान कौन?"

अच्छा! एक बड़ी प्यारी बात भी होती है इस भीषण ऋतु में. वो ये कि चार रास्ते (चौराहा) पर किसी की गाड़ी से कुछ टच हो जाए, या चलते समय कोई साइड नहीं दे रहा हो न; तो उस समय भीतर कितना भी गुस्सा भरा हो पर बंदा कूल ही behave करता है. वो थके, निढाल चेहरे से आपकी ओर देखेगा और एक पल को आँखें बंद करेगा पर कहेगा कुछ नहीं! आप मन-ही-मन लड़ाई न करने वाले एक आदर्श नागरिक की कल्पना कर धन्य टाइप महसूस करते हैं पर दरअसल वह उस वक़्त इस चिलचिलाती गर्मी से लड़ रहा होता है और मारे कुढ़न के उसकी आवाज़ ही नहीं निकल पाती. सियाचिन के हमारे सैनिकों को सौ सलाम पर इस समय किचन में काम करने वाली गृहिणियाँ भी सादर, सप्रेम अभिनन्दन की सर्वाधिक हक़दार हैं. माथे, कमर, पीठ पर बहते हुए खारे जल स्त्रोतों और उनकी वाष्पीकरण की प्रक्रिया के विशुद्ध वैज्ञानिक फ़ील के साथ रोटियाँ बनाना भी हल्दी घाटी (कृपया मसाले के अर्थ में समझें) के युद्ध से कम नहीं होता जी!  

लेकिन जैसे पंडित जी के पास हर मुसीबत से निकलने के उपाय होते हैं वैसी ही अन्न व्यवस्था यहाँ पर भी है. हर अमदावादी एक क्विंटल आइसक्रीम तो अकेले खा ही जाता होगा! मैंने शोध तो नहीं किया पर अनुमान है कि पूरे विश्व में आइसक्रीम की सर्वाधिक ख़पत इसी शहर में होती होगी. यहाँ हर मौसम में सैकड़ों तरह की आइसक्रीम मिलती हैं और दनादन खाई भी जाती हैं. यही हाल आमरस का भी है. किलो-विलो में आम कोई न खरीदता जी, पेटी आती है पेटी और आते ही सब पिल पड़ते हैं. सिर्फ़ इतना ही नहीं, अगले मौसम के लिए भी इस आमरस को डीप फ्रीज़ किया जाता है कि कहीं ऐसा न हो कि पारा पचास के पार पहुँचे और ये ख़ास आम तब तक बाज़ार में आ ही न पायें! 

बहुत लिखा, थोड़ा समझना! हाँ, एक आख़िरी बात और......यदि आप जीवन से तंग आ गए हों और ये दुआ करते हों कि "हे, भगवान!अब तो उठा ले." तो ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस AC में 22 का तापमान सेट करके एक घंटा बेतक़ल्लुफ़ी से बैठिये और दोपहर 12 से 3 के बीच अचानक बाहर आ जाइए. बिना टिकट सारी व्यवस्था अपने-आप हो जाएगी. 
अतः हे, मानवश्रेष्ठ! आइये, पधारिए और कुछ दिन तो गुज़ारिए, गुजरात में! बस, गुज़र मत जइयो! 😝हेहेहे! ये मौसम का जादू है, मितवा 
#आ_अमदावाद_छे! 😍
-© प्रीति 'अज्ञात' 
#ahmedabad
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