शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

स्वीटू

उन दिनों जब मैं यह मान ही चुकी थी कि कोई भी दोस्ती सच्ची नहीं होती और प्रेम झोंका भर है ग्रीष्म के छलछलाते माथे को पोंछती अनायास बहती हवा का, ठहरता है बस उतना ही जितना देहरी पर ठहरती है धूप, पत्तों पर टिकती है ओस, फूलों में बसती है सुगंध; तब तुम्हीं ने मुझे बताया कि मेरी ये सोच कितनी ग़लत थी और यह भी समझाते रहे कि प्रेम हर कहीं साथ-साथ चलता है. संभवतः तितलियों के सारे रंगों से सजे और रुई के फ़ाहे से भी नरम तुम उन देवताओं के द्वारा ही मुझ तक भेजे गए थे जिनसे मैं अपनी अभिशप्त रेखाओं के लिए प्रतिदिन लड़ा करती थी और फिर.... तुम्हारी उपस्थिति से ही मेरी श्वांसों की गति तय होती रही, तुम मेरे हर सुख-दुःख के साथी बने. मेरी हँसी पर तुम हँसते हुए मेरे गले झूल जाते थे और मेरे आँसू तुम्हारी ख़ूबसूरत आँखों में उदासियाँ कुछ इस तरह भरते कि मैं अपनी हर पीड़ा पर शर्मिंदा हो तुम्हें चूमकर सीने से लगा घंटों सिसकती। तब तुम मेरे हाथों से फ़िसल मुझे एकटक देखते और अपनी नाजुक उँगलियों से मेरा चेहरा थाम नम पलकों को सहलाने लगने। मैं यकायक फफककर रो पड़ती थी। तब तुम मेरे कानों में सुख के तमाम गीत गुनगुनाते हुए 
अचानक बोल उठते, 'म्मी, पानी पी लो'
तुम मम्मी बोलने में अटक जाते थे न बुद्धू!

पर न जाने इतनी समझदारी तुमने कहाँ से सीखी! तुम मेरे कितने लाड़ले थे, ये तुम भी जानते थे। तभी तो मैं बच्चों को हमेशा चिढ़ाती
"तुम दोनों भविष्य के लिए जहाँ भी जाना चाहोगे...रोकूँगी नहीं पर मेरा स्वीटू मेरे ही पास रहेगा, किसी को नहीं दूँगी।"
फिर मैं हँसकर इतराती हुई तुम्हारी ओर देखती और तुम भी अपनी मीठी आवाज़ में 'मेरा प्यारा बेटू' कहकर गर्दन मटका मुझसे घंटों लिपटे रहते। तुम्हारी यही अदा मेरी आश्वस्ति बन चुकी थी।  
शायद यह भी ईश्वर की कोई चाल ही रही होगी कि उस दिन जब मैं ख़ूब खिलखिलाकर हँसी थी और तुम्हें पूरे घर में घुमाती झूम रही थी, उसी पल मेरी और तुम्हारी ख़ुशी के बीच कहीं कोई बद्दुआ फल रही थी और....उसके बाद तुम ऐसे सोये कि फिर कभी उठ ही न सके। मेरी चीखें, मेरा विलाप भी तुम्हें टस-से-मस न कर सका। मैं जानती हूँ, अंतिम साँस लेते हुए तुम भी इस असहनीय दर्द और तड़प से गुजरे होगे..उन दस मिनटों में तुम्हारे क़रीब न हो पाना और तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए खो देना मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुःख है। यह मलाल अब उम्र भर साथ रहेगा। 
एक ही पल में जैसे किसी ने मुझे सुख के आसमान से उछालकर दुःख की गहरी खाई में पटक दिया था. मैं रोज तुम्हें याद करती हूँ और रोज ही अपने-आप से ये वादा भी लेती हूँ कि आँखें नम नहीं करुँगी पर यहाँ मैं एक बार फिर हार जाती हूँ। 
जानते हो! तुम्हारे जाने के बाद, तुम्हारी सबसे प्यारी दोस्त वो गिल्लू, तीन दिन तक तुम्हारी राह तकती रही। वो नियत समय पर बालकनी में आ अपने पैरों पर खड़े हो तुम्हें ढूँढती रहती और फिर बिना कुछ खाए ही चुपचाप लौट जाती।  Sun bird के चूज़े भी तुम्हारे पुचुर-पुचुर दुलार की प्रतीक्षा में घोंसले से टुकुर-टुकुर ताकते रहे। पीछे वाली बालकनी में भी तुम्हारे सारे दोस्त गौरैया, बुलबुल, फ़ाख्ता, गिलहरी के बच्चे और वो babbler भी जिसकी आवाज़ तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी; वो सब आते, ठहरते, गला फाड़ चिल्लाते और बिना खाए चले जाते। फिर धीरे- धीरे मेरी आँखों में उन्होंने तुम्हारी अनुपस्थिति को पढ़ लिया था। लेकिन वो पक्षी जो तुम्हारा नाम लेना सीख गया था वो अब भी सुबह-शाम तुम्हें रोज पुकारता है। मैं अब तक उसे नहीं समझा सकी कि तुम नींबू के पेड़ के पास की माटी में गहरे सोये पड़े हो। तुम्हारे सारे दोस्त शाम को यहीं इकट्ठे होते थे न बेटू! उनकी आवाज़ें तो तुम तक पहुँचती ही होंगीं!
हाँ, वो दोस्त अब भी आते हैं। बहुत से और नए दोस्तों को लेकर और अब अच्छे से खाते भी हैं। मैं उनको तुम्हारे पसंदीदा दाने ही खिलाती हूँ क्योंकि मुझे लगता है उन्हें तुमने ही मेरे लिए भेजा होगा। अब भी मम्मा की बहुत चिंता रहती है न तुम्हें! मेरे साथ भी यही होता है,रोज होता है। एक बार देखना चाहती हूँ...तुम जहाँ भी हो, ठीक तो हो न!

कई बार सोचती हूँ स्वीटू, मेरे पास तुम्हारी हजारों तस्वीरें हैं वीडियो हैं और याद करने को ढेरों बातें, जिन्हें मैं वर्षों अनवरत लिखती रह सकती हूँ। काश! तुम भी होते! कभी-कभी यह भी लगता है कि मेरे पास कुछ तो है....तुम न जाने अब कहाँ होगे! अपनी मी को ढूँढते कितनी दफ़ा उदास हो जाते होगे! कौन गोदी में लेकर पुचकारता होगा मेरे लाड़ले को। मैं तुम्हारा वो चेहरा भी कभी नहीं भूल पाती जब मुझे आने में लेट हो जाता तो तुम balcony से गेट की ओर एकटक देखते और मेरे आते ही गुस्सा कर झूठा कोहराम मचा देते और फिर एक पल न छोड़ते थे। मेरे पीछे तुम सामने रखे खाने को भी नहीं छूते थे और पानी फैला देते थे। लेकिन मेरी शक़्ल देखते ही किसी भुक्खड़ की तरह सब पचर-पचर खाने लगते। तब तुम्हारी खाने की स्पीड देखकर मुझे हँसी आती थी और रोना भी क्योंकि उस समय एक ही बात दिमाग में घूमती थी कि कहीं मुझे कुछ हो गया तो मेरे इस बच्चे का ध्यान कौन रखेगा! ये तो सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम ही....! बहुत जीना था स्वीटू तुम्हें! ये समय नहीं था जाने का!

तुम्हारे बिना जैसे इस घर ने एक ख़ामोशी ओढ़ ली है। ख़ुशियों के सारे पल मायूस हो प्रतिदिन तुम्हारी उपस्थिति की माँग करते हैं। हर बात में तुम्हारा ज़िक्र आता है और फिर गहरा सन्नाटा दीवारों से टकरा प्रतीक्षा बन वहीं पसर जाता है। सब जानते हैं कि जाने वाला कभी लौटकर नहीं आता! पर इस बात को कह देना जितना आसान है, मान लेना उतना ही मुश्किल! हाँ, मुझे भी पता है कि तुम जिस दुनिया में गए हो वहाँ जाकर कोई भी वापिस नहीं आया, कभी नहीं आया....पर न जाने ये कैसी उम्मीद है कि अब भी हर रोज मेरी निगाहें आसमान को ताकती हुई तुम्हें ढूँढती हैं और लगता है कि किसी दिन अचानक पहले की ही तरह तुम धप्प से आकर मेरे कंधे पर बैठ मुझे चौंका दोगे।  

ईश्वर से क्या कहूँ उसे तो हर बार सिर्फ छीनना ही आया है! जब कभी कुछ पाने का सुख रत्ती भर दिया भी, तो तुरंत ही खोने का दुःख जन्म-जन्मांतर तक के लिए मेरी झोली में डाल दिया। पर तुम उसे भी इतना ही प्यार दोगे, ये भी जानती हूँ। 
बहुत सारा प्यार तुम्हें, बेटू। 
आज तुम्हें गए एक साल हुआ। Missing you...My Sweetu
- प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 30 मार्च 2019

देश मेरा रंगरेज़ है बाबू

मेरा जन्म गूगल युग से दो दशक पहले ही हो गया था और तब स्कूल के अलावा ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र सुलभ माध्यम पुस्तकें ही थीं। हाँ, दूरदर्शन ने भी चाहे-अनचाहे मस्तिष्क की माँसपेशियों को उद्वेलित करना प्रारम्भ कर दिया था। रामायण, महाभारत ने न केवल हमें उन घटनाओं की बारीक़ियों से परिचित कराया बल्कि सामाजिकता का प्रथम पाठ भी मैंनें यहीं से सीखा है। यहाँ मैं उस सीरियल की नहीं अपितु उस माहौल की चर्चा कर रही हूँ जो उन दिनों बना करता था। तब सबके घरों में टीवी भले ही नहीं होता था पर अपनेपन की डोर इतनी सहज थी कि सब अपने-आप नियत समय पर इकट्ठे हो जाते।

औपचारिकताओं की शुष्क मरुभूमि से कोसों दूर हर व्यक्ति के बैठने के लिए जगह रखी जाती। बड़े बुज़ुर्ग लोगों के लिए सोफ़ा स्वतः ही छोड़ दिया जाता, महिलायें पीछे दीवान पर बैठ जातीं और बच्चे फ़र्श पर अपनी-अपनी सीट निर्धारित कर लेते। ब्रेक में सब रायचंद बनते और साथ में ख़ूब हँसते थे। कुछ बच्चे सरपट दौड़ते हुए जाते और फिर निक्कर पकड़े-पकड़े दौड़े आते कि कहीं कुछ छूट न गया हो! भुक्खड़ बच्चे हाथ में पुंगी बनाकर कचर-पचर खाते रहते पर क्या मज़ाल कि हिल भी जाएँ! 😜बस सब दम साधे देखते और ख़त्म होते ही प्रसन्न मन से विदा लेते।

हम लोग तब एक मकान में फर्स्ट फ़्लोर पर रहते थे। यहाँ हमसे और भी किरायेदार थे। रविवार शाम को सब आते थे। ठीक से याद नहीं पर शायद शाम 6 के आसपास फ़िल्म शुरू होती थी और उसके 10 मिनट पहले से सबकी आवाजाही। सबसे प्यारी बात ये थी कि हमारे ठीक पीछे वाले घर के लोग भी अपनी छत पर बैठ वहीं से टीवी के कार्यक्रम देखते थे क्योंकि हमारे ड्रॉइंग रूम का पीछे का दरवाजा उस ओर ही खुलता था। इसलिए हम लोग बैठने की व्यवस्था कुछ इस तरह से भी करते कि कोई उनको अड़े नहीं। हालाँकि गर्दन के दायें-बायें ज्यादा घुमाने पर वो निस्संकोच टोक ही दिया करते कि 😟"थोड़ा साइड में हो जाओ, देखने में दिक़्क़त आ रही।" और वो इंसान तुरंत ही अपनी पोजीशन एडजस्ट कर भी लेता था। 
रामायण, महाभारत और पिक्चर के समय दो इंसान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते थे। एक तो वो जो टीवी के बग़ल में स्टूल डालकर बैठता। उसका एक ही सवाल रहता था, "अब ठीक आ रहा है?" जिसके छह अलग-अलग उत्तर उसे हर बार मिलते पर अधिकांश लोग यही बोलते, "बस, थोड़ा और!" इस थोड़े और के करते ही बुज़ुर्ग अंकल जी (जो बाद में फूफा बने) की टिप्पणी आती, "पहले ज्यादा सही आ रहा था।" 😑उस समय स्टूल वाले बन्दे के भुनभुनाने की मद्यम ध्वनि अहसासों की जीवंतता बनाये रखती। 
दूसरा महत्त्वपूर्ण इंसान वो होता था जो दरवाजे के पास बैठता था। इसका काम था कि जैसे ही कोई दरवाजा खटखटाये, इसे दौड़कर जाना है और सेकंड के हजारवें हिस्से में वापिस आकर फिर चुपचाप बैठ जाना है। वो आँखों के इशारे से बता देता कि कौन आया था पर बेचारे को बोलने की अनुमति ब्रेक में ही मिलती थी। यहाँ यह भी स्पष्ट करती चलूँ कि इन कार्यक्रमों के दौरान आये हुए व्यक्ति को (जिसे टीवी नहीं देखना होता था) अत्यंत हिक़ारत भरी नज़रों से देखा जाता था और उसे घड़ों भर-भर बददुआएँ भी मिलतीं। 😠मतलब कुछ ऐसा कि "कौन है ये नामुराद जो ये देखता ही नहीं!" तब छोटे घर थे भई और टीवी रूम जैसी बात मध्यम वर्ग की कल्पना से भी परे थे।
मैच के दौरान भी कुछ ऐसा ही समां बँधता।

अरे हाँ, एक और बंदा जिसके बिना टीवी देखने की ये पूरी परिकल्पना ही निरर्थक सिद्ध होती! वो था एंटीना ठीक करने वाला लड़का। ये घर के सबसे छोटे पर सक्रिय बच्चे हुआ करते थे। जिनका बचपन एंटीना घुमाते-घुमाते ही जवानी की दहलीज़ तक पहुँचा है। इन्हें न दिन का होश, न रात का। न कड़ी धूप, न बारिश का। ठिठुरती सर्द रातों में भी कम्बल ओढ़े छत तक जाना ही इनका प्रारब्ध रहा। 😝उस पर बोरी भर-भर लानतें भी इनके ही हिस्से आतीं। ध्यान से देखियेगा यदि आपको अपने आसपास कोई जलकुकड़ा, बात-बात में भिनकने वाला, पतला-दुबला, सुराहीदार गर्दन धारण किये पुरुष दिखाई दे तो समझ जाइये कि ये वही एंटीना ठीक करने वाला बालक है जो अब तक इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो सका है। उसकी गर्दन को ये कमनीयता एंटीना को महबूबा की तरह देखने से प्राप्त हुई है और अगरबत्तीनुमा काया उस यात्रा का प्रमाण हैं जो उसे घरवालों के कहने पर एंटीना ठीक करने के लिए अरबों-ख़रबों बार सीढ़ियों से चढ़ने-उतरने के कौशल के चलते हासिल हुई है। 'स्किल इंडिया' का कॉन्सेप्ट तो तबका है जी। 
अच्छा! यदि आप यह जानना चाहते हैं कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने या ततैया के काटने से कैसा महसूस होता है तो एक बार इस व्यक्ति के पास जाकर बस इतना कह दें कि "भैया, जरा एंटीना ठीक करोगे?" 😛
नारायण, नारायण 
है दखे येलिके टवकारु (उल्टा बोलने की जो हमारी कला है वो भी दूरदर्शन की ही देन है)
विराम! रोटी भी बेलनी हैं अभी! 😞
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

#अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस



भाषा, संवाद का जरिया है अहसासों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है. हम किसी भी माध्यम में पढ़ें हों, पर जहाँ बचपन गुजरा वहाँ की भाषा से लगाव हो जाना स्वाभाविक है. फिर हम कितने भी साब-मेमसाब बन जाएँ लेकिन जब भी उस भाषा को बोलने का अवसर मिले; चूकते नहीं! आंचलिक शब्दों की मिठास ही अलग होती है, इसे अपनी माटी से मोह भी समझा जा सकता है.
आजकल प्रादेशिक भाषाओं के प्रचार पर बहुत जोर दिया जा रहा है. अच्छी बात है, बस इसका उद्देश्य अपनी भाषा को सर्वश्रेष्ठ एवं अन्य को कमजोर सिद्ध करने से कहीं ज्यादा उसके संरक्षण में होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह केवल इतिहास के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए. प्रत्येक भाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसका बोला एवं लिखा जाना एक अनिवार्य तत्त्व है. अपनी भाषा को बोलने में संकोच कैसा!
भाषा जोड़ने का काम करती है और सृजन में कोई भी कमतर-बेहतर नहीं होता! सबकी अपनी-अपनी सुंदरता, मधुरता है तथा स्थान के अनुसार प्रत्येक की उपयोगिता भी होती ही है. हम मित्रों के साथ जिस सहजता,अपनेपन और अनौपचारिक ढंग से बात करते हैं वहाँ तू, तेरा जैसे शब्द भी कितने प्रेम भरे लगते हैं वहीं कार्यस्थल में बात करने की एक अलग ही प्रशिक्षित शैली होती है. अति-संभ्रांत वर्ग में तमाम औपचारिकताओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओँ का छौंक लगाना सभ्यता का मानक समझा जाने लगा है. वहीं किसी बड़े mall के सेल्समेन से बात करते समय और ठेलेवाले से सब्जी लेते समय हमारी भाषा में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. इंसान हम वही हैं बस स्थानानुसार, सबकी सहूलियत के आधार पर ज़बान बदल लेते हैं. 
मंत्र यही है कि भाषा कोई भी हो, इसको बोलने का तरीक़ा ही सब कुछ तय करता है. भाषा के साथ-साथ उचित शब्दों का चयन ही बात बनाता और बिगाड़ता है. 
अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं पर हृदय में जो भी भाव उठें, जैसी भी अनुभूति हो, उसे हम व्यक्त ज़रूर करें. माध्यम कोई भी हो इससे अंतर नहीं पड़ता, महत्त्वपूर्ण यह है कि मानसिकता सही रहे...स्नेह-भाव जीवित रहे! और क्या! 😍
हर भाषा का अपना मज़ा है, सबको अपने बच्चों जैसा प्यार करना चाहिए. मेरा बस चले तो सब सीख लूँ. वैसे हमें तो हिन्दी ही ठीक से आती है और सपने में भी इसी भाषा में बात करते रहे हैं. अंग्रेज़ी, गुजराती और संस्कृत गुजारे लायक आती है. बस, इतनी ही कि किसी जानकार के सामने नहीं बोल सकते. :D 
 MORAL: 'संवाद' जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है. संवादहीनता रिश्तों को तिल-तिलकर मरने को छोड़ देती है, वहीं कुछ पलों का संवाद इसी गहरी खाई को कब भर दे, पता भी नहीं चलता!
और हाँ, 'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' का मूल उद्देश्य भाषाई विविधता और विकास पर बल देना है. अपनी वाली को महान बताने के  लिए कुश्ती नहीं लड़नी है. 😜
- प्रीति 'अज्ञात' 
#अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

प्रेम और ठंडी चाय

वो दोनों, जिनके ह्रदय में अभी-अभी किसी सुनहरे ख़्वाब ने जन्म लिया है और जिन्हें लगता है कि उन्हें एक-दूसरे से बेपनाह इश्क़ है; पहले आप....की रस्म को निभाते हुए कल तक बेचैनी में प्रतीक्षा की हज़ार करवटें बदलेंगे। एक नया प्रेमपत्र लिखकर पहले वाले को नष्ट कर देंगे। वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शब्दों की खोज में जुट जायेंगे। फिर शायद उनमें से कोई एक पहल कर ही दे, लेकिन उस पल ये सारी तैयारियाँ धरी की धरी रह जायेंगी और वही तीन पुरातन शब्द उनका काम आसान कर देंगे। तब ओपन रेस्टॉरेंट की टेबल पर रखे गुलाबों में एक अलग ही महक़ होगी। बहती हुई हवा सुगंध से भर किसी नई नवेली दुल्हन सा इस क़दर शरमायेगी कि गमले में लगे पनसेटिया की सारी पत्तियाँ एक साथ ही सुर्ख़ लाल हो उठेंगी, उस समय हरसिंगार पर फुदकते पक्षियों की आवाज़ 'इक प्यार का नग़मा है' से किसी प्रेमगीत सरीख़ी गुनगुनाती महसूस होगी। 

उधर जो पार्क में बेंच पर कोने में सिमटा दाएँ-बाएँ झाँकता प्यारा सा जोड़ा है न! उसे भूख ही नहीं लगती। वो आज हाथ थाम अपने सपनों को रंगबिरंगे पंख देगा। लड़की संजोये हुए सारे पंख जोड़ना चाहेगी पर लड़का उसका गाल थपथपाकर समझाएगा कि धीरे-धीरे सब अच्छा हो जायेगा, हमें ज्यादा फ़िक्र नहीं करनी चाहिए। लड़की को लड़के की हर बात सच्ची लगती है, वो पगली इस बार भी ख़ुशी से उसके गले लिपट बेवज़ह रो देगी। पार्क उम्मीदों की हरी रौशनी से जगमगा उठेगा और फूलों पर मचलती तितलियाँ लाख़ कोशिशों से भी किसी के हाथ न आएँगी। वहीं पास ही टहलता हुआ एक वृद्ध जोड़ा अपने दिनों को याद कर अनायास ही मुस्कुरा देगा।

कुछ ऐसे अभागे भी होंगे कहीं....जिनकी हथेलियों में इश्क़ की लक़ीरें बनते ही मिट चुकी हैं या जिन्होंने उसे हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया है। वे उस दिन आसमां से बातें करेंगे, चाँद के आगे अपनी वे सभी अर्ज़ियाँ एक बार फिर भरेंगे जिनकी क़िस्मत में खारिज़ होना ही लिखता आया है। उनकी दर्द भरी चीखें कहीं, किसी पार्टी के शोर-शराबे में दबकर रह जायेंगीं। वो इस सदी की सबसे लंबी रात होगी; जहाँ इनकी सर्द आहों से अगली सुबह का कोहरा और भी घना छा जाएगा। उनके ग़म को समझता सूरज भी हताश होकर फ़िर कई दिनों तक काली चादर ओढ़ चुपचाप सो जायेगा और किसी को अपना मुँह तक नहीं दिखायेगा।

इकतरफ़ा इश्क़ के मारे लोग, चाय की गर्म प्याली का पहला सिप भरते हुए उन बातों की स्मृतियों में खो जायेंगे; जब लिपटकर प्रेम का इज़हार किया जा सकता था या उसे किसी और की तरफ़ बढ़ने से रोका जा सकता था। वो उन पलों को भी कोसेंगे जब सुख की नन्ही तस्वीर से उसकी हँसी छीनकर किसी ने गाढ़ी स्याही से अथाह दुःख गोद दिया था। बीती तमाम स्याह होती एकाकी रातों की पीड़ा उनके चेहरे पर ठहर क्रूर अट्टहास करेगी। बदलते रिश्तों के इस दौर में उनकी हर साँस से अब भी दुआ ही निकलेगी लेकिन सच्चे प्रेम पर अपने विश्वास को चकनाचूर होते देख, यक़ायक उनकी निराश आँखों में हरी घास पर पसरी ओस की सारी बूँदें समा जायेंगी और उस दिन की घुटन भरी गहरी प्रतीक्षा, ठंडी चाय के प्याले में डूबकर अपनी जान दे देगी।   
- © प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

सुनो! प्रेम...तुम तब भी उम्मीद की तरह साथ बने रहना!

प्रेम, रात के काले साए को अपनी रौशनी से जगमग कर देने वाला ऐसा अनोखा मनमोहक जादूगर है जिसकी अदृश्य टोपी में ख़ुशियों के सैकड़ों उत्साही ख़रगोश सरपट दौड़ते नज़र आते हैं. यह आसमां से झांकता वो दूधिया चाँद भी है जो बेहद प्यारा और सारे जहाँ से  निराला है. भले ही यह कभी पूरा, कभी आधा और कभी टिमटिमाकर गायब हो जाता है लेकिन अपनी उपस्थिति का अहसास सदैव ही बनाए रखता है.
यह रमज़ान की ईद है, विवाहिताओं का करवा-चौथ है. प्रेमियों की स्वप्निल उड़ान है. रात की नदी में डूबकर इठलाता, झिलमिलाता दीया है. बच्चे की उमंगों भरी मुस्कान है. स्याह अँधेरे के आदी मुसाफ़िर की आँखों में अचानक भरी चमकीली, सुनहरी उम्मीद है. यह अहसास इतना लुभावना और आकर्षक है कि मन पूछ बैठता है, "चाँद, तुम 'प्रेम' हो या 'प्रेम' तुम चाँद हो?"

प्रेम, दो जोड़ी आँखों से झांकता एक अदद सपना भी है. कहते हैं, प्रेम पाने नहीं खोने का नाम है. प्रेम दो पावन दिलों के एक हो जाने का नाम है. प्रेम का हर रंग सच्चा, हर रूप अच्छा; पर प्रेम बेसबब कितनी ख़्वाहिशें जगाता है! प्रेम, उदास रातों में अनगिनत तारे गिनाता है.
प्रेम, यादें है, अहसास है, ख़ुशी के छलकते आँसू है, उदासी की घनघोर घटा है, दर्द का बहता दरिया है, फूल है, ख़ुश्बू है, मुट्ठी में भरा आसमान है, बेवज़ह उभरती मासूम मुस्कान है. प्रेम कभी किसी बच्चे की तरह शैतान लगता है तो कभी उसका ही मासूमियत भरा भोला चेहरा भी ओढ़ लेता है. 

कैसे परिभाषित करें इसे? शायद यह चंद मख़मली शब्दों में लिपटी गुदगुदाती, नर्म  कोमल अनुभूति है. स्पर्श के बीज से उगी उम्मीद की लहलहाती फसल है. आँखों के समंदर में डूबती कश्ती की गुनगुनाती पतवार है. प्रेम, अकेलेपन का साथी है, दर्द है तो दवा भी. इसके बिना जीवन कैसा? यह तो प्रकृति की रग-रग में बसा है. भूखे को रोटी से प्रेम होता है और अमीर को पैसे से. माँ का प्रेम उसका बच्चा और बच्चे का प्रेम इक खिलौना. प्रेम हर रूप, हर रंग में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करता आया है. हर विशेषण इसके साथ जुड़ा और इसके असर से  कोई भी न बच पाया है.

तभी तो सभी के जीवन में कोई न कोई ऐसा इंसान अवश्य ही होता है जिससे अपार स्नेह हो जाता है, दिल उसे हमेशा प्रसन्न देखना चाहता है और हर दुआ में उसका नाम ख़ुद-ब-ख़ुद शामिल होता जाता है. यद्यपि यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि उस इंसान की भावनाएँ भी आपके प्रति ठीक ऐसी ही हों. ऐसा होना अपेक्षित भी नहीं होता है पर फिर भी कभी-कभी कुछ बातें गहरे बैठ जाती हैं. दुःख देती हैं लेकिन धड़कनें तब भी हर हाल में उसी लय पर थिरकती हैं. उसकी तस्वीर को घंटों निहार कभी ख़ुशी तो कभी उदासी के गहरे कुएँ की तलहटी तक उतर जाती हैं. न जाने यह बेवकूफ़ी है....पागलपन या इस शख़्स का नितांत एकाकीपन कि अब तक वो यादें साँसों से लिपटी रहती हैं जब उसने अपने जीवन का प्रथम और अंतिम स्नेहिल स्पर्श किसी का हाथ थाम महसूस किया था. क्या पल भर की मुलाक़ात, चंद अल्फ़ाज़ और एक प्यारी-सी हंसी भी प्रेम की परिभाषा हो सकती है? होती ही होगी...वरना कोई इतने बरस, किसी के नाम यूँ ही नहीं कर देता! तुम इसे इश्क़/ मोहब्बत /प्यार  /प्रेम या कोई भी नाम क्यूँ न दे दो.. इसका अहसास वही सर्दियों की कोहरे भरी सुबह की तरह गुलाबी ही रहेगा. इसकी महक जीवन के तमाम झंझावातों, तनावों और दुखों के बीच भी जीने की वज़ह दे जाएगी.

'इश्क़' के लिए तो एक पल ही काफ़ी है, ज़नाब! उसके बाद जो होता है वो तो इसको संभालकर रखने की रवायतें हैं. यद्यपि सारे प्रेम सच्चे हैं पर स्त्री-पुरुष के मध्य हुए प्रेम को ओवररेटेड किया गया है. सामाजिक प्रतिष्ठा से इसे जोड़ना प्रेमी युगल के सहज रिश्ते में उलझन, तनाव उत्पन्न कर देता है. परिवार, मान-मर्यादा की दुहाई दो हँसते-खेलते इंसानों का जीवन तबाह भी कर देते हैं. 
वैसे देखा जाए तो,  'प्रेम' दीये की फड़फड़ाती लौ की तरह प्रारम्भ में और अंतिम समय में तीव्रता से अपनी चमक के साथ महसूस होता है परन्तु बीच की सारी प्रक्रिया तो इस लौ को जीवित बनाए रखने की जद्दोज़हद में ही निकल जाती है. कभी भावनाओं का तेल ख़त्म होता दिखाई देता है तो कभी बाती समय की आँधियों से जूझती थकी-हारी, निढाल नज़र आती है. यदि दोनों समय रहते अपने स्नेह को साझा करते रहें तो क्या मज़ाल कि उनकी दुनिया रोशन न हो! पर होता यह है कि तेल और बाती दोनों ही शेष रह जाते हैं और जोत जलती ही नहीं! धीरे-धीरे यह घुप्प अँधेरा रिश्तों को लीलने लगता है. जब बात समझ आती है तब समेटने को मात्र अफ़सोस रह जाता है लेकिन यह उत्तरदायित्व दोनों का है कि लौ जलती रहे. अन्यथा बाती दीये की उसी परिधि पर मुँह बिसूरे टिकेगी, जलेगी, प्रतीक्षा करेगी और अचानक बुझ जाएगी!

'प्रेम' की सारी बातें बेहद अच्छी हैं पर एक उतनी ही बड़ी ख़राबी भी है इसमें कि यह आता तो सबके हिस्से है पर ठहरता कहीं-कहीं ही है.....!
आज जबकि सियासी चालों, स्वार्थ और नफ़रतों के दौर में प्रेम करना सबसे बड़ा गुनाह है, सुनो! प्रेम...तुम तब भी उम्मीद की तरह हम सबके साथ बने रहना!
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

चिट्ठी न कोई संदेस


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'जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा'
शायद ही कोई ऐसा संगीत-प्रेमी होगा, जिसने अपने जीवनकाल में यह पंक्ति न गुनगुनाई होगी! यह जादूगरी केवल जगजीत सिंह को ही आती थी कि दुःख के समय में वे हर किसी के अपने हो जाते थे. उन्होंने ही यह यक़ीन भी दिलाया कि पीड़ा से भरी इस पंक्ति की हर ध्वनि अनगिनत प्रतीक्षाओं का मौन प्रत्युत्तर है और किसी के चले जाने के बाद भी उसके प्रेम में डूबे रहना ख़ुदा की इबादत से कम नहीं होता! ग़ालिब के अल्फ़ाज़ और उस पर जगजीत की आवाज ईश्वर की भेजी कोई बहुमूल्य चिट्ठी सी लगती है. प्रेमियों ने जब-जब प्रेम की पीड़ा को भीतर तक महसूस किया है तो उसे स्वर जगजीत ने ही दिए हैं और उनकी ये ग़ज़लें तो प्रेमियों ने घोलकर पी ली हैं - 'प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगी', 'तेरे ख़ुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे', 'कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है'.  मोहब्बत में धड़कते दिलों ने 'तुमको देखा तो ये ख़्याल आया', 'झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं' , 'ये तेरा घर ये मेरा घर' गुनगुनाकर ही इश्क़ की मुश्क़िल मंज़िलें तय की हैं.

मैं जब अपने-आप के बारे में सोचती हूँ तो जगजीत एक परछाई की तरह साथ हो लेते हैं. वो मेरे सुख से हँसते हैं और दुःख में सिर पर सदा ही स्नेह भरा हाथ फेर पूछते आये हैं, 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो'. कोई ताज़्जुब नहीं कि वो जब क़िताबों में डूबे रहने और खेलने का समय था, मुझे और मुझ जैसे न जाने कितनों को उनसे इश्क़ हो गया था. हम सब पागलपन की हद तक उनकी मखमली आवाज़ के दीवाने थे और उनकी गायी ग़ज़लों का अच्छा-ख़ासा कलेक्शन था हमारे पास. लड़कियाँ जब बाज़ार में सौंदर्य प्रसाधन ढूँढा करती थीं, हम चुपके से किसी म्यूजिक स्टोर पर जाकर उनकी नई एल्बम तलाश करते थे.

आज उन्हीं सब सिरफ़िरों की तरफ़ से एक स्नेह और अपनापन भरा पत्र है तुम्हारे लिए -
ओह! जगजीत..तुमको शुक्रिया उन सबकी तरफ़ से, जिनके दर्द को तुमने स्वर दिए हैं, जिनके ज़ख़्मों पर अपनी आवाज का मरहम लगाया है. तुमको क्या पता! कि महबूब से मिलने की हर उम्मीद जब-जब टूटी है तुमने उन टूटे दिलों को अपनी शरण दी है, उनके आँसुओं को गले लगाया है, उनकी पीड़ा को समझ उनकी पीठ पर तसल्ली का स्नेहिल हाथ फेरा है. 
दर्द को जब कोई न समझ सका तो वहाँ तुम थे, बिछोह का दुख जब-जब एकांत में चीत्कारें भर बिलखता था, तो वहाँ तुम थे, जीवन की निराश घड़ियाँ जब ख़ुद की भी एक बात तक नहीं सुनतीं थीं तो तुम्हीं ने आकर हाथ थामा.  जाने कितनी उदास रातों की तन्हा आवाज हो तुम, पीड़ा में डूबते हर हृदय की एकल पुकार हो तुम! 
यह भी तुम्हीं ने सिखाया कि चाहत किसी को अपने दिल मे जगह देने का नाम है, क़ैद करने का नहीं!
जब भी 'वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी' सुनती हूँ.स्मृतियों का हर सुनहरा भीगता पृष्ठ ख़ुद-ब-ख़ुद पलटता चला जाता है.

जीवन से जुड़े बस तीन ही मलाल रहे हैं उनमें से एक तुमसे न मिल पाने का भी है. मैंने तुमको तबसे सुना है, जब प्रेम समझती भी नहीं थी पर फिर भी तुम्हारी दीवानी थी. अब जबकि इस शब्द को जीने लगी हूँ तो तुम नहीं हो.कहीं भी नहीं हो! एक आवाज बन तुमने जो मेरा साथ निभाया है उस पर हज़ार ज़िंदगियाँ क़ुर्बान!
मुझे तुमसे कितना प्रेम है यह जताना भी बेतुका लगेगा.  बस इतना समझ लो कि जिसके भी पास दिल है उसकी हर दुआ में पहला नाम तुम्हारा है. उसकी धड़कनों में लहू के साथ मोहब्बत की तरह बहते हो तुम. उसके दुःख के सहरा में दवा की तरह रहते हो तुम. जैसे एक दोस्त की तरह कह रहे हो, 'ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी'. 

आज जबकि प्रेम के इस सप्ताह में तुम्हारा जन्मदिवस है तो तुम्हारी ही  डूबती आवाज़ में डूबती चली जा रही हूँ 'चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन से देस जहाँ तुम चले गए'
मैं जानती हूँ जैसे कि मैं इसे कानों में लगाए नींद के आग़ोश में चली जाती हूँ वैसे ही तुम्हारी गोदी में सिर रखकर इन दिनों ख़ुदा को भी चैन की नींद आती होगी. काश! मेरी हर दुआ और शुक्रिया तुम तक पहुंचे! यूँ ईश्वर से शिक़ायत तो इस बार भी है!
- प्रीति 'अज्ञात'


शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

प्रेमफरवरी-1

कई बार किसी प्रेम कहानी का हिस्सा न होते हुए भी, प्रेम का हर दर्द भोगना होता है। हर रिसते घाव का साक्षी बनना होता है। किसी की आहों में अपनी धड़कनों को भस्म होते हुए चुपचाप देखना होता है। तभी तो उधर जब कोई किसी के विरह की आग में जलता है, विलाप करता है तो इधर किसी और के हृदय में उठती प्रेम की लहरें साहिल से माथा टकरा-टकराकर पीड़ा के उसी समंदर में पुनः लौट जाती हैं जहाँ से कभी उम्मीद की आँखोँ में हज़ारों ख़्वाब भर साहिल तक की दूरी बड़े जतन से तय की थी। अति विश्वास में भरे प्रेमी अक़्सर यह भूल जाते हैं कि टूटना, बिखरना, भुला दिया जाना हर स्वप्न की नियति है और समंदर की नियति है प्रतीक्षा में डूब उम्र भर सिसकते रहना। उसका खारापन उसके जन्म से मृत्यु तक की अथाह पीड़ा और बेचैनी का सार है। लेकिन सृष्टि ने उस बदनसीब के माथे पर गति का चंदन लपेट दिया है। सो उसे बहना है, मुस्कुराना है, सबका हौसला भी बनना है। स्वयं सागर के हिस्से में क्या आता है, यह पलटकर देखने का वक़्त किसी के पास नहीं होता!
एकतरफ़ा प्रेम सिवाय पीड़ा के और कुछ नहीं देता। यह एक धीमी आत्महत्या है। 
#प्रेमफरवरी-1 
- © प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 26 जनवरी 2019

#गणतंत्र_दिवस

एक पुरानी फ़िलम है 'गोलमाल',अपने अमोल पालेकर वाली. उसके सपने वाले गाने में एक बड़ी क्यूट लाइन है..."इक दिन सपने में देखी सपनी"..... तो आज हमने भी एक सपनी देखी कि हम स्कूल के बच्चों की उस लाइन में खड़े हैं जो बूँदी के लड्डू पाने को अपनी बारी की बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं.
आँख खुली तो इधर घर के सदस्य इस प्रतीक्षा में थे कि महारानी उठें तो चाय नसीब हो! 😂उस पर बेटी ने भी याद दिलाया कि हाफ डे है सो स्कूल में फुल मील की बजाय टिफ़िन भी आधा ही चाहिए. अपन भी गणतंत्र दिवस की भोर में आलू का पराँठा बनाने किचन को प्राप्त हुए.😎
आप सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ और छुट्टी की असीम बधाई. साथ ही उन लोगों के प्रति भी हार्दिक संवेदनाएँ व्यक्त करती हूँ जो गणतंत्र दिवस, फ़ोर्थ सैटरडे के दिन पड़ने के कारण एक छुट्टी डूबने के सदमे से अब तक उबर नहीं सके हैं. भई, अभी तो अउर डूबना है 😜.....छुटंकी गुमटी से लेकर amazon तक सब SALE लगाये बैठे हैं. सुनो, अब नहा-धोकर शॉपिंग को निकल ही लो...देशभक्ति के सुर में डूबा ये समां कहाँ रोज-रोज देखने को मिलता है! झंडा है, गुब्बारे हैं, कप हैं और इस बार तो बड़ी प्यारी कैप भी launch हुई है. फोटू लगाए हैं. 😍
- प्रीति 'अज्ञात' 
#गणतंत्र_दिवस #Republic_day

रविवार, 13 जनवरी 2019

#मकरसंक्रांति #उत्तरायण

संक्रांति के पावन पर्व पर जहाँ आसमान में लहराती, बलखाती हजारों पतंगें एक ख़ूबसूरत तस्वीर जड़ती हैं वहीं पक्षियों के बीच एक अजीब क़िस्म की बदहवासी फ़ैल जाती है. कई-कई दिन ये इमारतों की मुंडेरों से चिपक सहमे बैठ जाते हैं और जो हिम्मत कर निकलते भी हैं तो उनके सुरक्षित लौट आने की सम्भावना प्रायः कम ही होती है. जनवरी माह इन पक्षियों के लिए सबसे मनहूस समय होता है. जहाँ दाना-पानी की तलाश में सुबह को निकले ये मासूम मुसाफ़िर शाम को घर लौट ही नहीं पाते! इनके टूटे-फूटे, कटे पंख, क्षतविक्षत शरीर और उससे बहता लहू मनुष्य की उमंग और उत्साह की बलिवेदी पर प्रतिदिन क़ुर्बान होता है.  उल्लास और मेल-मिलाप में भरे हम मनुष्य छत पर पतंग उड़ा पूरी, मिठाई और तिल के बने विविध व्यंजनों का सेवन करते हैं और इधर किसी घोंसले में अंडे से झाँकते नन्हे चूज़े प्रतीक्षा की आँख आसमां पर टिका किसी और लोक की ओर भूखे ही प्रस्थान कर जाते हैं. हमें इनका भी सोचना है जो सुबह की पहली धूप के साथ हमारे आँगन में चहचहाहट बन उतरते हैं, जो किसी बच्चे की तरह खिड़कियों से लटक सैकड़ों करतब किया करते हैं, जो अलगनी को अपने बाग़ का झूला समझ दिन-रात फुदकते हैं.

पक्षियों के बिना ये दुनिया कैसी सन्नाटे भरी होगी, इसकी कल्पनामात्र सिहरा देने के लिए काफ़ी है. हमने तालाबों का पानी चुरा लिया, नदियों को विषैला कर दिया, बारिश से उसके हिस्से की माटी छीन उस जमीं पर सीमेंट-कंक्रीट से भर अपना पट्टा लगा लिया, जंगलों को ऊँची इमारतों की तस्वीर दे दी, प्रकृति का जितना और जिस हद तक शोषण कर सकते थे, किया. अब हमारे पास अपना कहने को ज्यादा कुछ शेष नहीं है. आसमां पर दीवारें खड़ी हो सकतीं तो अब तक इसका भी बँटवारा हो गया होता! ये मासूम पक्षी ही हैं जो सबके आँगन में एक सी ख़ुशी लेकर उतरते हैं, हर वृक्ष को अपना घर समझ हमारी सुबह-शाम रोशन करते हैं. इनकी राहें उसी आसमां से होकर गुजरती हैं जहाँ हम काँच लगे मांज़े का नेटवर्क बिछाते हुए पल भर भी नहीं हिचकते!

मैं पतंग उड़ाने या उत्सव को पूरे हर्षोल्लास से मनाने का पूरी तरह समर्थन करती हूँ पर हर वर्ष यह पतंगबाज़ी कितने निर्दोष पक्षियों को घायल करती है, उनकी जान ले लेती है; इस बात से भी वाकिफ़ हूँ. दुपहिया वाहनों या पैदल चलते राहगीरों के लिए भी ये कई बार जानलेवा साबित होता है और पतंग लूटते हुए बच्चों की दुर्घटनाओं के हृदयविदारक किस्से भी हर बार सामने आते हैं. इनमें से कई घटनाओं को सावधान रहने और बच्चों को समझाने भर से रोका जा सकता है. जहाँ तक पक्षियों और नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न है तो निम्नलिखित बातों को अपनाकर हादसों को कम किया जा सकता है -

सुबह और शाम के समय पतंग उड़ाने से बचा जाए क्योंकि यह पक्षियों की आवाजाही का समय होता है. 
काँच लगा मांज़ा इस्तेमाल न करें. 
उड़ाते समय यदि कोई पक्षी इसकी चपेट में आ जाता है तो डोर खींचने की बजाय ढीली छोड़ दें.
घायल पक्षियों की रक्षा/ देखभाल करने वाली संस्थाओं के संपर्क नंबर अपने पास रखें. 
टू-व्हीलर पर लोहे का गार्ड लगवा लें तथा वाहन चलाते समय हेलमेट पहनें. इसकी गति भी बहुत तेज न रखें. बच्चा अगर साथ में हो तो उसे आगे खड़ा न रखकर पीछे ही बिठाएँ. 
पैदल चलते समय अपनी गर्दन और सिर पर दुपट्टा/मफ़लर लपेट लें.
बहुत आवश्यक हो तो ही बाहर निकलें. 
यह सब सुनिश्चित करने के बाद पूरी, जलेबी, उंधियु और तिल के बने स्वादिष्ट व्यंजनों का अपने परिवार और मित्रों के साथ भरपूर स्वाद लें. त्योहार को पूरे जोश और उल्लास के साथ मनायें.
मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
- प्रीति 'अज्ञात' 

#savebirds #rescue #uttarayan #safeuttarayan #makarsankranti #14Jan2019 #Preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात

#मकरसंक्रांति और पक्षी #Rescued



परसों सुबह की ही बात है. बालकनी में बैठ मम्मी से फ़ोन पर बात कर रही थी कि अचानक नज़र बिजली के तार से झूलते एक कबूतर पर पड़ी, जो कि बुरी तरह से मांज़े में फँसा हुआ था. उसके शरीर में कोई भी हरक़त नहीं हो रही थी. एक पल को तो लगा शायद वह जीवित ही नहीं! यह सोच भी मुझे काफ़ी घबराहट दे रही थी. दौड़कर नीचे गई और मेरी बेटी को बताते हुए घर के बाहर निकल गई. तार इतना ऊँचा था कि सबसे बड़े वाले स्टूल के ऊपर खड़े होकर भी हम वहाँ नहीं पहुँच सकते थे. तभी हमने देखा कि मांज़े का दूसरा हिस्सा भी लटक रहा है. थोड़ी उम्मीद बंधी और मैंने धीरे से उसे नीचे खींचा. खींचते ही कबूतर इतनी बुरी तरह फड़फड़ाया कि हमारे तो होश ही उड़ गए और लगा कि शायद खींचने से उसकी गर्दन पर दबाव और बढ़ रहा है. फिर दोबारा ऐसा करने की हिम्मत ही न हुई. तब तक अड़ोस-पड़ोस के दरवाजे-खिड़कियों से लोगों का झाँकना प्रारंभ हो चुका था. कुछ बर्ड रेस्क्यू टीम को बुलाने की सलाह भी दे रहे थे जो कि उचित भी थी. पर उस समय किसी को कॉल लगाना भी समय नष्ट करने जैसा लग रहा था क्योंकि यह कबूतर काफ़ी देर से जूझ रहा था.

उसे कितना दर्द हो रहा था, इसका अनुमान लगा पाना भी बेहद मुश्किल था क्योंकि मूलतः कबूतर अत्यंत  शांत स्वभाव के पक्षी होते हैं और जितना मुझे याद आता है उसके आधार पर मैंने इन्हें कभी भी चिल्लाते हुए नहीं देखा. बिल्ली को देखकर जहाँ सभी पक्षी चींचीं कर सारा घर सर पर उठा लेते हैं और उस दुष्ट बिल्ली को भगाने तुरंत आना ही पड़ता है, तब भी मैंने इन कबूतरों को बस सहमा हुआ ही पाया. सच कहूँ तो प्यारी गुटरगूं के अलावा मैंने इनकी कोई अन्य आवाज कभी सुनी ही नहीं अब तक. इनकी आँखों में बला की मासूमियत और चाल में एक विशेष अदा सदा ही मेरा मन लुभाती आई है. आज वही पिज्जू इतनी परेशानी में था.

तभी सामने एक महिला दिखाई दीं, वे मुझे ही आवाज देकर पूछ रहीं थीं कि "बेन, क्या हुआ?" मॉर्निंग वाक के लिए जाते समय ये अक्सर गायों को घुमाती हुई दिखती हैं. यूँ हम एक-दूसरे के नाम नहीं जानते पर हमारे बीच एक मुस्कुराहट का आदान-प्रदान हुआ करता है. बस, यही मुस्कान का रिश्ता आज पुकार बन सामने था.
मैं कुछ जवाब देती तब तक वे आकर वस्तुस्थिति समझ चुकी थीं. बिना डरे, उन्होंने मांज़े को झटका दिया और वो कबूतर उसी फँसी हुई अवस्था में मांज़े के साथ नीचे की ओर गिरने लगा जिसे उनके मजबूत हाथों ने बेहद सलीक़े से थाम लिया. तब तक बेटी घर से कैंची ले आई थी. पहले तो पिज्जू भयभीत था और फड़फड़ा रहा था पर बाद में समझ गया और एक-एक करके उसके पंखों, पैरों, गर्दन में लिपटी डोरियों को चुपचाप हटवाता रहा. गले में दो फंदे इतने टाइट थे कि हम तीनों में से कोई वहाँ कट कर ही नहीं पा रहा था. तभी दो बाइक सवार वहाँ से निकले और स्वतः ही रुक गये. उनकी सहायता से पिज्जू अब स्वतंत्र हो चुका था. कुछ सेकंड्स हथेली में रहने के बाद उसने पुनः अपनी उड़ान भरी.

लगभग 50 मिनट चले इस रेस्क्यू ऑपरेशन का सुखद अंत बेहद सुकून भरा अवश्य था पर ये भी जानती हूँ कि हर बार ऐसा नहीं होता!
- प्रीति 'अज्ञात' 

#विश्व_पुस्तक_मेला

लेखकों की दुनिया में 'विश्व पुस्तक मेला' एक बहुत बड़ा आयोजन माना जाता है. लेखक, प्रकाशक, पाठक तीनों से यदि एक साथ मुलाक़ात करनी हो तो इससे बेहतर कोई स्थान नहीं! पुस्तकों के विमोचन और प्रचार-प्रसार के साथ अलग-अलग शहरों में रहने वाले मित्रों से एक साथ मिल पाना भी यही संभव है. इसी कारण इस मेले को लेकर ख़ासा उत्साह बना रहता है. सोशल मीडिया पर भी 9-10 दिनों तक इसकी ख़ूब धूम मची रहती है.

लेकिन दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए पुस्तक मेले में जाना बिटिया के ब्याह जैसा है. पहले तो सभी उपलब्ध शुभ तिथियों में से एक को चुनकर दिवस सुनिश्चित किया जाता है. उसके बाद जान-पहचान वालों, दूर-पास के रिश्तेदार, मित्र आदि को इसकी पूर्व सूचना दे दी जाती है. तत्पश्चात विविध प्रसंगों और मौसम के हिसाब से वस्त्रों का चयन होता है. महिलाओं को ब्यूटी पार्लर जाना पड़ता है तो पुरुष भी युवाओं की श्रेणी में पिछले 50 वर्षों से अपना स्थान पक्का करते हुए इस बार भी स्लेटी बालों को काले में बदलने हेतु गार्नियर men का डिब्बा चुपके से ख़रीद लाते हैं. सेलेब्रिटी लुक को प्राथमिकता देने के बाद अब कुछ लोगों को इस बात की परेशानी से भी दो-चार होना पड़ता है कि गोष्ठी में ऐसा क्या धांसू पढ़ें कि श्रोताओं की आँखों से आँसू बहने लगें.

जुगाड़-तंत्र और अव्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी पोस्टों से पाठकों का सीना छलनी कर उन्हें भावुकता के सागर में डुबोने वाले साहित्यकार तय रचनाओं के अतिरिक्त अपनी 8 अन्य रचनाएँ उन गोष्ठियों के लिए बैकअप में रखते हैं जहाँ बिन बुलाये बेधड़क घुसा जा सकता है. उपहारस्वरुप देने के लिए अपनी उन पुस्तकों का Gift wrap बना गट्ठर तैयार कर लिया जाता है जिनके प्रकाशक महोदय इस बार stall लगाने की भारी-भरकम राशि देने में असमर्थ रहे. ये ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई बड़ा-बूढ़ा अस्वस्थता के कारण ब्याह में न जाने पर लिफ़ाफ़ा भिजवा दिया करता है.

इन सारी तैयारियों के बाद घटनास्थल से सीधा प्रसारण प्रारंभ होता है. प्रथम चरण में रेलवे स्टेशन या एअरपोर्ट के विहंगम दृश्य के साथ कुछ पंक्तियाँ नज़र आती हैं जिन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ तक आने के लिए इस इंसान ने जिन भीषण कठिनाइयों का सामना किया, उतना तो देश को आज़ाद कराते वक़्त हमारे परमपूज्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी नहीं हुआ होगा. सहानुभूति और प्रेम की ठंडी छाँव से भरी प्रतिक्रियाएँ यह सुनिश्चित कर पाने में सफ़ल होती हैं कि कौन-कौन उससे दिल से मिलना चाहता है और कौन बच निकलना!
द्वितीय चरण में ट्रेन की बर्थ पर बैठ खाने के फोटो, मोबाइल बैटरी के ख़त्म होने के मार्मिक किस्से, टैक्सी इत्यादि बातों पर सार्थक चर्चा होती है. कभी-कभी विषयांतर हेतु बाथरूम की ख़स्ता हालत पर अफ़सोस और रेलवे का निंदा रस भी चलता है.
इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हौले-हौले अब ये नाजुक क़दम तृतीय चरण की ओर बढ़ते हैं और अंततः वह घड़ी आ ही जाती है जहाँ चेहरे पर हीरो-हीरोइन की माफ़िक मुस्कान धारण करते हुए गेट नंबर 7 से प्रवेश करना होता है. अरे हाँ, उससे पहले मुख्य द्वार पर लगे पुस्तक मेले के होर्डिंग के साथ चित्र खिंचाना भी प्रोटोकॉल में आता है. शादी के venue पर पहुँचकर फोटुआ नहीं खिंचाते क्या, बुड़बक?

चतुर्थ चरण में नेत्र और नेट के द्वारा संपर्क किया जाता है और एक-एक कर उन सभी के गले लग प्रसन्नता का वह भाव जागृत होता है जैसा कि अपने चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहिन को देखकर उत्पन्न होता आया है. वही हँसी, ठहाके और पीठ पर धौल जमाकर  मस्ताना कि बाक़ी लोग भी पलटकर देखने लगें. 
उसके बाद वह अमृत पेय मँगाया जाता है जो इस बंधन को सदा के लिए जोड़ देता है. जी हाँ, चाय चाय चाय.
तत्पश्चात एक stall से दूसरे stall पर फुदकने, पुस्तकें ख़रीदने, विमोचने, बड़े-छोटे, ऊँचे-नीचे सभी प्रकार के मनुष्यों के साथ सेल्फियाने का सुन्दरतम दौर चलता है.
अंतिम चरण में भारी मन और ख़ाली जेब के साथ पुस्तकों के थैले को घसीटते हुए बस पर चढ़ाने का समय आ जाता है और नम आँखों से हॉल नंबर 12-A को विदाई दी जाती है. वैसे यहाँ ये स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेले में इसके अलावा भी कई हॉल हैं पर चूँकि वहाँ के अपडेट नहीं दिखते तो उन्हें गिना ही नहीं जाता. जैसे घर के छोटे सदस्य भी तो शादी के समय कितनी दौड़भाग करते हैं पर मंच पर दूल्हा-दुल्हिन को निहारते, प्रशंसा करते लोगों के बीच उनका यह योगदान वीरगति को प्राप्त होता है.
और हाँ, जो टिकट कराने के बाद भी जा नहीं पाता...उसकी हालत उस इंसान की तरह होती है जिसकी सगाई होने के कुछ ही दिन बाद रिश्ता टूट गया हो. और वो अपने दुःख से दुखी होने की बजाय इस सदमे से इसलिए नहीं उबर पाता कि लोग क्या कहेंगे!
- प्रीति 'अज्ञात'
#विश्व_पुस्तक_मेला

https://www.ichowk.in/humour/world-book-fair-2019-how-people-prepare-himself-for-the-gala-event-popular-among-literature-love-known-as-book-fair/story/1/13641.html

शनिवार, 12 जनवरी 2019

विदा! एक भावुक कथा

विदा! एक भावुक कथा 

सर्दियों के नर्म मौसम में एक थकेहारे भारी-भरकम दिन के बाद, रात के ग्यारह बजे बड़े जतन से बनाई गई चाय का ढुलक जाना, उन अरमानों का भी अनायास लुढ़क जाना है, जो अदरक कूटते समय बस अभी मात्र तीन मिनट पहले ही दिमाग़ में बल्लियों उछल रहे थे. लगा जैसे तुषारापात हो गया, मस्तिष्क में घनघोर सूनामी जोर पकड़ने लगी. हर दिशा से बस एक ही सवाल गूँजने लगा, "अरे! ये कैसे हो गया?"

ये अकेली जां और क्या करती, क़ातर नज़रों से ज़मीं के आग़ोश से लिपटी उस चाय को देख बेबस आह भर मरघिल्ली आवाज़ में बच्चों को पुकारा, "कोई है!" "अरे! कोई है!" पर हमसा न तो कोई दीवाना पैदा हुआ और न ही इस भीषण दुःख की घड़ी में साथ देने कोई रजाई से बाहर ही आया. ये सर्दियाँ अच्छे-ख़ासे शख़्स को बेवफ़ा कैसे बना देती हैं, इसका बोध भी अनायास इन्हीं लम्हों में हुआ.
ख़ैर! हमारा दरद हमें ही झेलना है, इस सत्य को मन स्वीकार ही रहा था कि टूटते दिल की चारों खिड़कियों में से दर्द वाली खिड़की ने पुनश्च मुंडी घुमाकर हँसते हुए बोला,
"अब किसी से क्या बैर और कैसी रखें उम्मीद...
जिसे हमने बनाया जब 'वो' ही हमारे न हुए"  
असाहित्यिक लोगों को बताते चलें कि यहाँ 'वो' से तात्पर्य बेवफ़ा चाय के लिए है.
रोना तो बहुत जोर वाला आ रिया था पर हमने दिल को ढाँढस बँधाते हुए, ख़ाली कप पर दृष्टिपात करते हुए भरे गले से अपनी लाचारी की सुन्दर व्याख्या की -
"एक तरफ़ टूटा कप है 
दूसरी तरफ़ ज़ालिम ज़माना 
गिर जाने के बाद आसां नहीं 
उसी मदहोश चाय को बनाना" 
ताने धिन तन्नाना, ताने धिन तन्नाना...विपदा के समय rhyming वाली पंक्तियाँ मुझे अक़्सर याद आती हैं, हाय राम! अब इतने टेलेंट का मैं क्या करूँ? किधर जाऊँ?
अंत में गुरुश्रेष्ठ से बस इतना ही कह माफ़ी चाहूँगी -
"माफ़ कर देना मुझे अब ए ग़ालिब 
तुझे याद कर लेनी थी जो महक़ती ग़र्म चुस्कियाँ
वो डिज़ाइनर धारा बन इधर-उधर बहती रहीं 
इधर हम पोंछा थाम बस ठंडी सिसकियाँ भरते रहे"
उफ़्फ़्फ़.....अब और न कुछ कह पायेंगे!
विदा! 
Moral: जलने, कारपेट ख़राब होने, कप के टूटने से कहीं ज्यादा painful है, चाय का फ़ैल जाना. 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

#नववर्ष

नया साल जैसे जैसे क़रीब आता जाता है, उसी गति के समानुपाती मस्तिष्क की सारी सोई हुई नसें आपातकालीन जागृत अवस्था को प्राप्त होती हैं। यही वो दुर्भाग्यपूर्ण समय भी है जो आपको स्वयं से किये गए उन वायदों की सूची का फंदा लटकाये मिलता है जिसे देख आप शर्मिंदगी को पुनः बेशर्मी से धारण कर बहानों का नया बुलेटिन जारी करते हैं। यहाँ पिछली जनवरी से अब तक किये गए कारनामों की झांकी साथ चलती है।
आप उन पलों को याद कर भावुक हो उठते हैं कि कैसे बीती जनवरी के पहले ही दिन आप सुबह- सुबह उठकर नहाने और सूर्योदय देखने का पुण्य कमा लिए थे। चूँकि मम्मी ने बचपन में बताया था कि साल के पहले दिन सब काम अच्छे से करो तो पूरा साल अच्छा बीतता है। यही सोच उस दिन पुरुष पोहे में जली हुई मूंगफली को काजू समझ चुपचाप गटक लेते हैं। माँ बच्चे को बिल्कुल भी नहीं डाँटती और अपना गुस्सा सप्ताहांत के लिए होल्ड कर देती है। बच्चे थोड़े अलग स्मार्ट टाइप होते हैं तो मनचाहा काम बेख़ौफ़ होकर करते हैं।
पर एक बात तो तय है कि हर उम्र जाति के लोगों के मन में 1 जनवरी को सारे उत्तम विचार उसी तरह छटपटाते हैं जैसे कि बरसात के मौसम में मेंढक उचक उचककर बाहर निकलते हैं।
खैर! अभी तो इतना ही कहूँगी कि इन विचारों की उत्पत्ति व्यर्थ न जाए और आने वाला वर्ष आप सबको ख़ूब मुबारक़ हो!
- प्रीति 'अज्ञात' 

#नववर्ष

किसी वर्ष का गुजर जाना उन अधूरे वादों का मुँह फेरते हुए चुपचाप आगे बढ़ जाना है जो प्रत्येक वर्ष के प्रारंभ में स्वयं से किये जाते हैं. 
ये उन ख्वाहिशों का भी बिछड़ जाना है जो किसी ख़ूबसूरत पल में अनायास ही चहकने लगीं थी कभी. ये समय है उन खोये हुए लोगों को याद करने का, जिनसे आपने अपना जीवन जोड़ रखा था पर अब साथ देने को उनकी स्मृतियाँ और चंद तस्वीरें ही शेष हैं! कई बार बीता बरस कुछ ऐसा छीन लेता है जो आने वाले किसी बरस में फिर कभी नहीं मिल सकता!

ये अक्सर ही होता है और सबके ही साथ होता आया है कि वर्ष के आख़िरी लम्हों को जीने का अहसास मिश्रित होता है. जैसे ही सुख की एक झलक आँखों में चमक बन उभरती है ठीक तभी ही समय, दुःख की लम्बी चादर ओढ़ा उदास पलों की एक गठरी बना मन को किसी एकाकी कोने में छोड़ आता है. 
बीतते बरस और आने वाले बरस के बीच का लम्हा 'प्रेम' जितना होता है, प्रेम का असल जीवन भी इतना ही होता है. एक साल उसे पा लेने के ख्वाबों में जाता है और दूसरा उसे जीने की ख़्वाहिशों में.
बीच का ये पल जितना बड़ा दिखता है, उतना होता नहीं.....पर सारा खेल इसी क्षण का हैं. यही एक क्षण नई उम्मीदों, नई योजनाओं, नई महत्त्वाकांक्षाओं को जन्म देता है साथ ही पुरानी ग़लतियों को न दोहराने की सीख भी देता है. कुल मिलाकर बारह माह बाद आत्मावलोकन की अनौपचारिक, अघोषित तिथि है यह....वरना नए साल में रखा क्या है!

हम उत्सवों के देश में रहते हैं. जहाँ हर कोई ख़ुश होने एवं तनावमुक्त रहने के प्रमाण प्रस्तुत करना चाहता है. हमें उल्लास की तलाश है, हम मौज-मस्ती में डूबना चाहते हैं, हम चाहते हैं कि हमें कोई न टोके. ऐसे में कोई त्योहार, छुट्टी या फिर ये नया साल अवसर बनकर आते हैं, जिसे दिल खोलकर मनाने में कोई चूकना नहीं चाहता. अन्यथा इन बातों के क्या मायने हैं? सब जानते हैं कि साल बदल जाने से किसी के दिन नहीं फिरते और न ही भाग्य की रेखा चमकने लगती है. कुछ नया नहीं होता! पुरानों को ही झाड़-पोंछकर चमका दिया जाता है.

नववर्ष कैलेंडर में तिथि का बदल जाना भर है! शेष सब बाज़ार के बनाये उल्लास हैं, भीड़ है, लुभाने में जुटे व्यापार हैं. मनुष्य का इन सबकी ओर आकर्षित होना उसके सामाजिक होने का प्रथम लक्षण है. अपने सुख-दुःख के चोगे से बाहर निकल नववर्ष का स्वागत एक आवश्यक परम्परा है, जिसे सबको निभाना चाहिए क्योंकि यही प्रथाएँ हमें जीवित रखती हैं, मनुष्य की मनुष्यता से मुलाक़ात कराती हैं.
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

#MirzaGhalib #ग़ालिब

दिल के टूटने पर जहाँ दीवाने, आशिक़ ख़ुद को शराब के नशे या सिगरेट के धुंए में क़ैद कर 'कूल' लुक देने की stupid कोशिश किया करते हैं वहीं कुछ हमसे सिरफ़िरे भी हैं जो इन हालातों में ग़ालिब की गलियों में ठंडी पनाह पाते हैं. हमारा तो ये भी मानना है कि-
"वो दिल ही क्या जो टूटने पर
ग़ालिब की चौख़ट पे दस्तक़ न दे!"
- प्रीति 'अज्ञात'
#MirzaGhalib #ग़ालिब
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है.....!

"बल्लीमारान के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्कड़ पर बटेरों के कसीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद, वो वाह! वाह!
चंद दरवाज़ों पर लटके हुए बोशीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ के चलते हैं यहां
चूड़ीवालां के कटड़े की बड़ी बी जैसे अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अंधेरी सी गली कासिम से एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
एक कुराने सुखन का सफा खुलता है
असदुल्ला खां ग़ालिब का पता मिलता है"
गुलज़ार साब ने ग़ालिब का पता इतनी ख़ूबसूरती से बताया हुआ है कि वह हरेक के ज़हन में शब्दशः गढ़ गया है और जिसने ग़ालिब का लिखा कभी पढ़ा नहीं, वह भी इस अद्भुत अंदाज़ में लिखे परिचय को पढ़ उन्हें जानने को बेताब हो उठेगा.

अक्सर देखने में आता है कि 1975-85 के बीच जन्मे लोग पुराने दिनों को याद कर बेहद भावविह्वल हो उठते हैं. सचमुच वो भी क्या दिन थे! महाभारत, रामायण सीरियल के दौर में दूरदर्शन का क्रेज़ अपने चरम पर था और उसी समय मियाँ ग़ालिब से हमारी पहली मुलाक़ात हुई. मामला कुछ-कुछ 'Love at first sight' जैसा ही था. गुलज़ार द्वारा लिखित धारावाहिक 'मिर्ज़ा ग़ालिब' का प्रसारण शुरू हुआ. नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता, तन्वी आज़मी, शफ़ी इनामदार, सुधीर दलवी जैसे मंजे हुए कलाकारों के अभिनय ने इस धारावाहिक की उत्कृष्टता में चार चाँद लगा दिए थे. वो पीढ़ी जिसे ग़ालिब की ऊँचाई का अंदाज़ा तक न था, उसके लिए गुलज़ार का यह धारावाहिक किसी तोहफ़े से कम न था. अपनी क्या कहें! बस यूँ समझिये कि जहाँ बच्चे स्कूलों में तमाम शैतानियाँ करते हैं और हम जैसे किताबी कीड़े को दीन-दुनिया से ज्यादा मतलब नहीं हुआ करता था. उस किशोरवय में हम ग़ालिब और जगजीत सिंह से एक साथ ही इश्क़ कर बैठे; जो अब तक बदस्तूर जारी है. ग़ालिब के अल्फाज़ और उस पर जगजीत की मखमली  आवाज़ ने सिर्फ़ हमें ही नहीं, न जाने कितने दिलों को उनका दीवाना बना दिया था. फ़िर तो ये पागलपन इस हद तक बढ़ा कि उनसे जुड़ी क़िताब और कैसेट (नई पीढ़ी इसको गूगल पे समझ ले) हम ढूंढ-ढूंढकर ख़रीदते. अच्छा-ख़ासा कलेक्शन था हमारे पास, जो अब भी सहेजा हुआ है.

लोग कहते हैं कि इश्क़ में डूबे, टूटे, चकनाचूर हुए लोगों को शराब सहारा देती है और हम जैसे नामुराद इन हालातों में ग़ालिब को गले लगा लेते हैं. 
"हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और"

ग़ालिब न होते तो कई टूटे हुए दिल, नए दिलों से जुड़ गए होते. ये ग़ालिब का ही जादू है जो प्रेम की पीड़ा को भी सेलिब्रेट करवा सकता  है. ग़ालिब के अल्फ़ाज़ और उस पर जगजीत/चित्रा की आवाज ज़ालिम आशिक़ी पर जो क़हर ढाती है कि उफ्फ!! बानगी देखिये-

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब',
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का ह़द से गुजरना है दवा हो जाना 

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया 
वर्ना हम भी आदमी थे काम के 

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए 
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पर भी ग़ालिब ने ख़ूब लिखा है -
न था कुछ तो ख़ुदा था,
कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने 
न होता मैं तो क्या होता


बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे 
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

ग़ालिब हमारे जीवन में इस क़दर घुल चुके हैं कि बात करते हुए उनके लफ्ज़ जुबां से ख़ुद-ब-ख़ुद बाहर निकलते हैं. हरेक भारतीय ने अपने जीवन में कई बार उनके ये शेर जरुर दोहराए होंगे -

हजारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले 
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले 

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है 

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं

मिर्ज़ा ग़ालिब की शख्सियत ही इतनी विशाल है कि उसे चंद लफ़्ज़ों में बाँध लेना नामुमकिन है. आज उनकी जयंती पर उनका ही शे'र उन्हें समर्पित -
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

वही घिसा-पिटा किस्सा!

हम चोरी, उठापटक, गुटबाजी, धोखे, झूठ और कॉपी पेस्ट के उस दौर में लिखे जा रहे हैं जहाँ लेखक सर्वाधिक असहाय प्राणी नज़र आता है. उसकी लिखी रचना मंचों पर पढ़ी जाती है, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवा ली जाती है, तोड़-मरोड़कर उन्हें मौलिक रूप देने का प्रयास किया जाता है. बीते कई वर्षों से यह प्रचलन इतना अधिक देखने को मिल रहा है कि देश की अन्य समस्याओं की तरह हमारे system ने अब इसे भी digest करना सीख लिया है. अति 'आदत' ही तो बन जाती है न! चोरों को चुराने की आदत और हमें इसे पचाने की! लेकिन अब लगने लगा है कि तकनीक के इस युग में एक ऐसा भी समय आएगा जब मूल रचनाकार को ही अपनी रचना की मौलिकता सिद्ध करने के लिए दर-दर भटकना होगा और उसे अपनी कह देने वाला वाहवाही के प्रतिभाशाली दरबार में सम्मानित होगा.
यूँ ऐसी कई घटनाओं के हम समय-समय पर साक्षी होते भी रहे हैं.

विचारणीय बात यह है कि ऐसा करने वाले किस दुनिया में जी रहे हैं और क्यों? आख़िर एक लेखक के हिस्से आता ही क्या है? इस सच को सब जानते हैं कि आज भी लेखन को एक जॉब की तरह नहीं किया जा सकता! कुछ प्रतिष्ठित नामों को छोड़ दिया जाए तो 'हम होंगे क़ामयाब' का जाप करते हुए अधिकांश निशुल्क ही लिख रहे हैं. या फिर कुछ अच्छी पत्रिकाएँ अगर पारिश्रमिक दे भी रहीं हैं तो वह राशि दो दिन का ख़र्च भी नहीं निकाल सकती. प्रकाशक और लेखक के बीच की जंग किसी से छुपी नहीं! लाखों कमाने वली websites भी हिन्दी लेखकों को एक रुपया तक देने की आवश्यकता नहीं समझतीं, उन्हें तो हम बेवकूफ़ लगते हैं...शायद हैं भी!
*कुछ पत्रिकाओं की सदस्यता के नाम पर की जा रही ठगी का किस्सा कभी अलग से लिखेंगे. 😎
तात्पर्य यह कि चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक या कला के किसी भी क्षेत्र से जुड़ा इंसान हो, उसकी अभिव्यक्ति को वह क़ीमत/सराहना/ पहुँच  नहीं मिलती जिसका कि वह हक़दार है तो फिर उसके पास बचा क्या? चलो, इसके बाद भी वह आत्मसंतुष्टि हेतु सृजनशील रहता है जिसे हम और आप 'स्वान्तः सुखाय' कहकर तसल्ली पा लिया करते हैं. अब वो लिखा भी कोई और उठा अपना लेबल लगा ले तो रचनाकार की तो 'जय राम जी की' हो गई न! 😡
मैंने स्वयं अपनी मित्रता-सूची के कई लोगों के साथ ऐसा होते देखा है और उन्हें यह कह समझा भी चुकी हूँ कि "सागर से कुछ बूँदें लेने भर से सागर रीता नहीं हो जाता, वह फिर भी सागर ही रहता है." पर इस बात को समझने की भी एक सीमा होती है.

समझ नहीं आता कि झूठी वाहवाही से किसी का क्या भला होता है और क्या हासिल होता है? कोई इन्हें ज्ञानी समझकर मंच दे भी देगा पर मुँह खोलते ही सच तो बाहर आना ही है. वैसे भी इनकी पीठ पीछे सबको पता होता है कि ये कितने पानी में हैं. दुःख तो तब भी होता है जब सच्चाई सामने आने के बाद भी इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती और इनकी मित्रमंडली भी इनके क़दमों में बिछी जाती है. क्यों, भई? ऐसा क्या मिल जाता है? मित्रों की इसी चाटुकारिता (कहीं भय भी) के चलते इन चोरों के हौसले बुलंद हैं. आत्मग्लानि, जैसे शब्द तो इनके लिए बने ही नहीं! तभी तो ये किसी के भी शब्द उठाकर वाहवाही लूटने में नहीं हिचकते और साथ में निर्लज्ज बन खींसे निपोरते हुए त्वरित धन्यवाद भी दे देते हैं. कुछ ओवरस्मार्ट लोग नीचे नाम तो नहीं लिखते पर दोनों हाथों से प्रशंसा बटोरते हुए भूले से भी यह नहीं कह पाते कि ये उनका लिखा नहीं है. कुछ तो भावविभोर होकर बदले में 'दिल' भी चिपका आते हैं. 😂

क्या 'साहित्य' की गिरती साख़ को बचाने और इस प्रदूषित वातावरण को थोड़ा स्वच्छ बनाने के लिए अब समय नहीं आ गया है इन लोगों को बाहर निकाल फेंकने का? इनसे मुक्ति का? 
आपके पास कोई नाम हो तो बताइये
'SWAG से करेंगे सबका SWAGAT!' 😜
हाँ, भई! ये अंतिम पंक्तियाँ (swag वाली) साभार हैं. अब हमपे ही केस मत कर देना. 😕
#लेखक_और_चोरी!
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

#सूरज और चाँद

रात के माथे पर दमकता चाँद अपने साथी सितारों के साथ गपशप करते हुए भरे गले से दिन की बेरुख़ी की तमाम शिक़ायतें करता है. इस गोलमटोल चंदा को इस बात का बेहद मलाल है कि जब सूरज उसके इलाके में आता है तो सारा दिन ऐसे क्यूँ पसरकर बैठता है कि कोई बेचारे चाँद को नोटिस भी नहीं करता! 
सूरज को इस बात का ग़रूर है कि उसकी मौज़ूदगी के बिना चाँद का कोई वज़ूद नहीं और यही चाँद का दुःख भी है. वो इसी ग़म में ही सदियों से डूबता आया है कि सूरज का आगमन और विदाई कैसी भावभीनी होती है कि आसमान की खिड़कियों पर टँगी सारी रंगीन चादरें उसके स्वागत में बिछने लगती हैं जबकि चाँद का जाना उदासी की सारी मनहूसियत ओढ़ बिना किसी गाजे-बाजे के चुपचाप विलीन हो जाना भर है.
सूरज को नदी से निकलते और उसमें उतरते सबने देखा है पर चाँद अपने ही पानी को चुपचाप गटकता आया है, सूरज जब पहाड़ों से अठखेलियाँ करता है तो चाँद का दिल भर आता है. लोग जब सूरज को सलाम करने उसके इंतज़ार में सौ खिड़कियाँ खोल तकते हैं....चाँद एकटक देखता है, भीतर से कटने लगता है और फ़िर बिन कुछ कहे विदाई लेना ही उचित समझता है.
#सूरज और चाँद 
- प्रीति 'अज्ञात' 

बुधवार, 28 नवंबर 2018

फ़ुरसतिया लोग

आप इन्हें चाहें कितने ही ऊँचे पदों पर बिठा दें लेकिन इनके दिमाग की सुई सीधा जाति पर ही पहुँच अटक जाती है और उसके बाद बहकी-बहकी बातों का धार्मिक मौसम शुरू होता है. हम फ़ुरसतिया लोग हैं और ऐसी चर्चाओं से ही अपना जीवन पूर्णतः सार्थक मानते हैं. मंदिर वहीं बनायेंगे, सबसे ऊँची मूर्ति लगायेंगे के मनोहारी, पावन और सद्भावना से ओतप्रोत नारों ने इस बार भी न केवल इस धरती को धन्य किया है बल्कि देशवासियों को भी उतना ही भावुक कर दिया है.....उतना ही भावुक कर दिया है, जितना कि वे कई वर्षों से अपनी मर्ज़ी से लगातार होते आ रहे हैं. इसमें चिंता जैसी कोई बात ही नहीं, दरअस्ल हम बड़े भावुकता और आहत पसंद लोग हैं. हमारे कोमल ह्रदय और संवेदनशील मन ने हमें यही सुघड़ भाव जागृत करने की टुच्च शिक्षा दी है. ओह, सॉरी उच्च पढ़िएगा. 
यूँ भी आम इंसान को और करना ही क्या है वो तो अपनी सुध-बुध भूल कल्लू दीवाने की तरह दिन रात इसी सोच में डूबा रहता है कि जब मंदिर बनेगा तभी उसकी नैया पार होगी. बिटिया का ब्याह होगा, बेटे की बेरोज़गारी दूर हो जायेगी, गाँव में बिजली आएगी, अपना घर होगा, जिसमें जगमग लट्टू जलेगा और घरवाली को दूर कुँए से पानी भरकर नहीं लाना पड़ेगा क्योंकि चौबीस घंटे नल से टनाटन पानी मिलेगा... उस पगले ने तो दूध की नदियों के ख़्वाब भी सँजो लिए हैं. कल ही मरघिल्ली गाय को बेच स्टील की पूरे पाँच लीटर की कैपेसिटी वाली टंकी खरीद लाया है. अब तो घर की ही बनी रबड़ी खायेगा जी. 
कुल मिलाकर सांध्य -आरती की पूरी तैयारियाँ हैं और रामराज्य की झीनी रौशनी में, गरमागरम बनती कुरकुरी जलेबियों की महक़ ने सबको एडवांस में ही दीवाना बना डाला है. इमरती बाई ने तब तक समोसे की मैदा गूँध, कड़ाही में पतंजलि का कच्ची धानी का शुद्ध सरसों तेल चढ़ा दिया है. बस, सिलबट्टे पे दरदरी पिसी हरे-धनिये मिर्च की चटपटी चटनी और मिल जाए तो जीवन सफ़ल है. किरपा की चेरापूँजी बरसात होगी. 
अरे हाँ, अदरक की चाय भी add कर ल्यो...उसके बिना तो जिनगी भौतई बरबाद है. 
इतना काफ़ी है न कि और भी कुछ चैये? 👿
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

चाँद और बारिश

वो बात करता है तो जवाब में पक्षी चहचहाते हैं, हँसता है तो फूलों की सुगंध तेजी से पसरने लगती है, इश्क़ की दुआ करता है तो तितलियाँ उसके बालों से अठखेलियाँ कर खिलखिलाने लगती हैं. खुश होता है तो तारे थोड़ा और पास आकर बैठ जाते हैं लेकिन इस चाँद को जब भी देखती हूँ, बेहद अकेला और उदास पाती हूँ. मुझे लगता है कि जैसे वो इस बड़ी दुनिया में नदी के किनारे बैठे उस निराश प्रेमी की तरह है जिसके इश्क़ की कोई मंजिल नहीं और उसके फूटे नसीब में बुदबुदाता, निरर्थक एकालाप ही लिखा है.

लोग अपनी प्रेम कहानियां उससे बाँटते हैं, अपने महबूब का अक्स उसमें झांकते हैं, उसकी क़सम खाकर आहें भरते हैं पर ख़ुद चाँद के हिस्से में ही कोई महबूब नहीं! सदियों से सबकी मोहब्बत के साक्षी रहे इस चाँद के पाले में उसका चाँद कभी आया ही नहीं! सबके बीच भी वो कितना अकेला है. तमाम तारे उसे अपना कहते जरुर हैं पर दिल से मानते नहीं! कभी उसकी भरी आँखों में अपनी उमंगों की परछाई तक नहीं पड़ने देते. वो उस पल बेहद हारा हुआ महसूस करता है. दुःख अब उसके चेहरे पर झाइयाँ बन उभरने लगा है.
तभी तो कितनी मर्तबा वो भीतर-ही -भीतर ख़ुद को सिकोड़, डबडबाई पलकों से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर चुपचाप बैठ जाता है. सुना है, उस रात फिर ख़ूब बारिश होती है. - प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 19 नवंबर 2018

#पुरुषदिवस

पुरुष होने के भी अपने फ़ायदे हैं. जब भी दिल करे आप जब चाहें, जहाँ चाहें, बे-रोकटोक आ-जा सकते हैं. आपके आने-जाने, सुरक्षा-संबंधी फ़िक्र करने और बेतुके प्रश्न पूछने वाला कोई नहीं होता. 
ऐसा नहीं कि स्त्रियाँ घर से निकलती नहीं पर उस समय भी उन्हें बहुत कुछ manage करके जाना पड़ता है और आने के बाद भी वही प्रक्रिया दोहरानी होती है. मसलन पति, बच्चे, सास-ससुर कोई भी बाहर जाए तो वही है जो सभी घरेलू कार्यों के साथ-साथ सबका खाना पैक करके देगी, हर वस्तु का ख्याल रखेगी और किसी मशीन की तरह धडाधड लगी रहेगी. दिक्कत यह है कि जब वो बाहर जाए तब भी उसे यही सब करके जाना होता है. वो कहीं भी चली जाए, बार-बार फ़ोन करके निश्चिन्त होना चाहती है कि उसके पीछे सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं! दुःख यह है कि घर में घुसते ही उसे पानी की पूछने वाला भी कोई नहीं होता, चाहे कितनी ही लम्बी/छोटी, थकान/परेशानी भरी यात्रा हो...घर में घुसते ही सब यूँ फरमाइशें करते हैं, गोया अभी पांच मिनट पहले ही बगीचे से टहल घर में घुसी हो!
कुछेक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो कहीं कम; कहीं और भी ज्यादा पर कुल मिलाकर आम भारतीय स्त्री की यही कहानी है. पर मैं इसका दोष घरवालों से कहीं अधिक स्वयं स्त्रियों को ही देती हूँ क्योंकि -
* हमने ही अपने मन को इस चारदीवारी से इस क़दर बाँध रखा है और इस भरम में जीने लगे हैं कि हमारी अनुपस्थिति में ये सब असहाय हो जाते हैं. बेचारों को चाय भी बनानी नहीं आती, बाहर का खाने की आदत नहीं इत्यादि, इत्यादि. जबकि सब ख़ूब मस्त रहते हैं और हमारे घर में प्रवेश करते ही पुराने फॉर्म में लौट आते हैं.
*हमें अपने-आप पर आवश्यकता से अधिक गर्व है और अपने perfectionist होने का अहसास भी भरपूर हिलोरें मारता है. इसलिए हम यह भरोसा कर ही नहीं पाते कि हमारे बिना सब ठीक रहेगा.
*हमने इसे अपना कर्त्तव्य मानकर पूरी तरह ओढ़ लिया है, इतना कि अपने लिए जीना ही भूल चुके हैं. हमें त्याग और बलिदान की मूर्ति बनना ही भाता रहा है. फिर उसके बाद अपने दुखड़े रोना भी नहीं भूलते कि शादी न की होती तो मैं ये कर सकती थी, वो कर सकती थी. मज़ेदार बात ये है कि जिन सदस्यों को हम अड़चन समझ कोसते रहे हैं, उनके बिना न तो रह सकते हैं और न ही कहीं कोई ठौर है.
*हम बड़े डरपोक क़िस्म के जीव हैं और आजकल के हालातों में कहीं आने-जाने में हमारे ही पसीने छूट जाते हैं और हम पुरुष का साथ चाहते हैं. जबकि पुरुषों ने भी कोई मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग नहीं ली हुई होती है, न ही उनकी चमड़ी बुलेट प्रूफ है. गोली लगने या लूटपाट होने पर उनको भी वही दर्द होगा जिससे हम हाहाकार मचाते हैं. 'मर्द को दर्द नहीं होता' वाली कहावत कितनी ही हिट हो गई हो पर सच यह है कि 'मर्द को भी ख़ूब ज़बर दर्द होता है, बस इस डायलाग के बोझ तले दब वो बेचारा कह ही न पाया कभी! पर फिर ये क्या है कि उनका साथ हममें साहस भर देता है, सुरक्षित होने का अहसास कराता है? कहीं ये इश्क़ वाला लव तो नहीं!
जो भी है, स्त्री होना बहुत अच्छा भी लगता है और नहीं भी...ये सोच भी बड़ी situational चीज है. जब देखो, नेताओं की तरह पाला बदल लेती है.

वैसे कई फ़ायदों के बावजूद भी पुरुष होने की कई दिक्कतें हैं -
* बचपन से ही अच्छी नौकरी पाने की टेंशन वरना घरवालों को चिंता कि इस नाकारा से कौन ब्याह रचाएगा।
* नौकरी मिल गई तो सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने की जी-तोड़ कोशिश. यद्यपि यह हमेशा नाकाम ही होती पाई गई है.
* घर-परिवार, बॉस-नौकरी में सामंजस्य बिठाने की कोशिश उसे चकरघिन्नी बना डालती है. उस पर भी किसी-न-किसी का मुँह फूला हुआ मिलना तय है. 
*छुट्टियों की मारामारी से जूझता यह प्राणी अपने सारे शौक़ भूल चुका होता है और उसका पूरा जीवन घर-बच्चों को खुश करने में बीतता चला जाता है, हालांकि सब अंत तक असंतुष्ट ही बने रहते हैं.
*वो जो शादी से पहले एक गिलास पानी तक भी न लेता था, आज बोतलों में पानी भर फ्रिज़ में रखना सीख गया है.
*अपना जन्मदिन भले ही भूल जाए पर बाक़ी सबकी तिथियाँ रटनी पड़ती हैं उसे.
* कहाँ दस हजार में भी अकेले ठाट से रहता था अब लाखों भी जैसे नित कोई अज़गर निगल लेता है.
*कितनी भी थकान हो, pick & drop करने की ड्यूटी तो उसी की लकीरों में रच दी गई है.
*उसके जीने का एकमात्र उद्देश्य अपने परिवार का भरण-पोषण है और उसके बाद के लिए भी वह जुटाकर रखने की लाख कोशिशें करता है.
*और हाँ, इन्हें भी मशीन समझा जाता है. कौन सी? ATM ...
हाय ख़र्चा कर-करके हम लोग इनका जीना मुहाल कर देते हैं.

पर चूँकि प्रथा है तो 'पुरुष दिवस' मुबारक़ हो! 🤣- प्रीति 'अज्ञात'
#Repost #पुरुषदिवस

बुधवार, 14 नवंबर 2018

मुख्तार सिंह का नाम सुना है तुमने?

उन दिनों अच्छे स्कूलों का एक ही मतलब  हुआ करता था....न्यूनतम छुट्टियाँ, जमकर पढ़ाई और जबरदस्त अनुशासन (+ कुटाई किसी inbuilt app की तरह). आजकल की तरह नहीं कि जितनी अधिक फ़ीस, उतना बढ़िया स्कूल! और हाँ, ये कुटाई भी आवश्यकता पड़ने पर पर्याप्त समय लेकर पूरी तसल्ली से ऐसे की जाती थी कि क़ब्र में उतरते समय तक के लिए उसका कलर्ड नक़्शा बालक के ज़हन में छप जाए! मज़ेदार (ही,ही अब लग रही) बात ये थी कि बच्चों को अपने लक्षणों और बदलते मौसम को देख पहले से ही ज्ञात होता था कि आज किसका खेला जोरदार होगा!
 
बड़े सर के आते ही वातावरण में गंभीर हवाएँ चलने लगती थीं. उड़े हुए चेहरों को देख किसी नए उत्सुक बच्चे को उनके बारे में मुँह पर हाथ रख जानकारी कुछ यूँ दी जाती थी कि जैसे कोई कह रहा हो, "मुख्तार सिंह का नाम सुना है तुमने? उसके नाम से शहर की पुलिस भी काँपती है और पब्लिक भी." या फिर वही गब्बरी आवाज़ गूँजती थी, "यहाँ से पचास-पचास कोस दूर......" कुल मिलाकर स्थिति अत्यधिक तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में नज़र आती थी. यद्यपि एक करारे थप्पड़ की मासूम ध्वनि के पश्चात बुहहाआआ, बुहहाआआ की दर्दीली चीत्कार इसी नीरवता को पल भर में तहस-नहस कर कक्षा का इतिहास और भूगोल एक साथ बदल देती थी. उन बच्चों में से दस प्रतिशत के भविष्य का ख़ाक़ा तो बस एक थप्पड़ ही तत्काल खींच देता था लेकिन शेष नब्बे प्रतिशत के लिए यह क्रम किसी धारावाहिक (डेली सोप) की तरह चला करता था, जहाँ बीस-पच्चीस एपिसोड तक तो स्टोरी लाइन आगे बढ़ती ही नहीं थी लेकिन हर एपिसोड के अंतिम दृश्य में सबका मुँह खुला का खुला रह जाता था. क्या?क्या?क्या? (आज फिर पिटा?) की साइलेंट ध्वनि के साथ.

मुख़्तार सिंह के जाने के बाद किसी परंपरागत रस्म की तरह बाक़ी बच्चे उस कुटे-पिटे बच्चे को पुचकारते हुए, अपनी दर्दभरी कहानियाँ जमकर साझा करते कि उसका ग़म कुछ हल्क़ा हो सके. भाईचारे और वातावरण को सौहार्द्रपूर्ण बनाये रखने में क्षणिक एकता बड़ी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी. प्रायः ये घटनायें भीतर-ही- भीतर दबा ली जातीं थीं और घरों तक इस प्रकार के ऐतिहासिक किस्से तब ही पहुँचते थे जबकि उनके साक्ष्य लाख बार धो लेने के बाद भी चेहरे पर टिके रहते या फिर अंक सूची में से अंक नदारद होते और बस सूजे मुँह के साथ सन्नाटा लिए ख़ाली 'सूची' ही घर पहुँचती.
इधर माँ सूजी का हलवा लिए इंतज़ार कर रही होती थी. परीक्षा परिणाम हाथ में आते ही वो हलवे में काजू-बादाम-किशमिश का गद्दा बनाना भूल जातीं. बेचारा बच्चा उस दिन चुपचाप ही बिना मेवे वाला हलवा गटक अपना गुजारा कर लेता.  
- प्रीति 'अज्ञात'
#बाल_दिवस पे बड़े हो गए बच्चों को और क्या याद आएगा!
#बाल_दिवस 

बच्चों की मासूमियत और भोलेपन का उड़ता रंग

परिवर्तन के इस दौर में विकास की चाल यदि कहीं द्रुतगति से चलती नज़र आती है तो वह है 'बचपन'। समय और सामाजिक परिस्थितियों से जूझते हुए बच्चों की मासूमियत और भोलेपन का चटख़ रंग कबका उड़ चुका है। आज जिसे हम 'समय के साथ चलना' कहकर धीरज धर लेते हैं, वास्तविकता में वह समय को फ़र्लांगकर ली गई मजबूर उड़ान ही है। अब बचपन की बात करते ही वो सुनहरा चित्र कहीं नहीं खिंचता जिसमें रंग-बिरंगे गुब्बारे और उसमें भरी तमाम खुशियाँ घर-बार को रौशन कर उनमें जीवन भर दिया करतीं थीं। 'बाल-दिवस' स्कूल में बंटती मिठाईयों को खा लेने या जमकर मस्ती और खिलंदड़ी करने का नाम भर ही नहीं था अपितु यह उस बचपन को जी भरकर जी लेने का एक अतिरिक्त और विशेष दिन हुआ करता था। हाईस्कूल तक न भी सही पर आठवीं कक्षा तक तो हर घर में बचपन यूँ ही गुलाटियाँ मार आँखों में तमाम खुशियाँ भर इतराता फिरता था। लेकिन आज जब हम इस बचपन का चेहरा टटोलते हैं तो बमुश्क़िल इक्का-दुक्का जगह ही इसकी मुस्कान उपस्थित दिखाई देती है अन्यथा यह तो निर्धारित समय से पूर्व ही अपने स्थान से हटकर कभी भय, कभी समझदारी और कभी तनाव के स्टेशन पर पैर टिकाए बड़ा होने की राह जोहता नज़र आता है। वही यक्ष प्रश्न फिर उठ खड़ा होता है...आख़िर दोष किसका है? पर दोषी का नाम लेने से बेहतर यही होगा कि हम कारणों पर विचार कर इस समस्या के समाधान की ओर प्रयास करें।

हमारी शिक्षा-प्रणाली ने बच्चों को 'सक्सेस' का ही पाठ पढ़ाया है। 'टॉप' किया तो सही और 'फ़ेल' हुए तो समाज में रहने लायक नहीं! नियम यह है कि बनना चाहे कुछ भी हो, पर हर विषय में अच्छे अंकों से पास होना बेहद जरुरी है। चूँकि विद्यालयों / विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मापदंड भी यही है इसलिए व्यावहारिक योग्यता से कहीं अधिक प्रतिशत मायने रखते हैं। उस पर माता-पिता का 'हॉबी-क्लास' के लिए बच्चों को पूरे शहर में दौड़ाना उनके ज़ख्मों पर नमक मल देता है। इन मासूमों के पास समय ही नहीं बचता कि वे कुछ पल अपने लिए संभाल सकें। होमवर्क, प्रोजेक्ट, सबमिशन, मासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक और अभ्यास परीक्षाओं की लम्बी सूची के साथ दुनिया भर की एक्टिविटीज और अन्य प्रतियोगिताएँ इन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से इस हद तक थका देती हैं कि फिर वे टोकाटाकी और रोज की वही घिसीपिटी सलाहों से भागकर एकांत की ओर बढ़ने लगते हैं। इधर माता-पिता, समाज और बच्चे के भविष्य को लेकर कुंठित होने लगते हैं और 'न जाने, इसके भविष्य का क्या होगा?' जैसा गंभीर प्रश्न उनके चेहरे पर असमय झुर्रियों के रूप में उभरने लगता है। 

दरअस्ल हम लोग दिखावे की मानसिकता के गुलाम बन चुके हैं. वो देश जो अभी भी गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है वहाँ दूसरे से स्वयं को बेहतर प्रदर्शित करने की होड़ ने कई प्रकार की कुंठाओं और अपराधों को जन्म दिया है। कहीं यौन शोषण से जूझते बच्चे रोज घुट रहे हैं तो कहीं ये अपराधी के रूप में जघन्य अपराध को अंज़ाम दे रहे हैं। हैरानगी की बात है कि रेप और हत्या जैसे जुर्म के हत्यारों को उम्र के आधार पर नाबालिग़ क़रार कर दिया जाता है जबकि इनके कृत्यों की उम्र वयस्कों से कहीं ज्यादा वीभत्स हुआ करती है। डर है कि इस उदारता को देखते हुए अपराध की न्यायिक उम्र कहीं किशोरावस्था ही न समझ ली जाए, जहाँ अपराध तो संभव है पर सज़ा की कोई गुंजाइश नहीं। कमाल है, वे बच्चे तो परिपक्व हो चुके पर उनकी मासूमियत अब न्यायपालिका की सोच में पाई जाती है। 

टीवी चैनल पर बच्चों को उनके पढ़ने, खेलने की उम्र में उस स्टारडम का पाठ पढ़ाया जा रहा है जिसको बड़े-बड़े स्टार भी संभाल नहीं सके। ये बच्चे माता-पिता के स्वप्नों को पूरा कर अपना वर्तमान खो रहे हैं या कि इस वर्तमान की चकाचौंध से प्रभावित हो अपना भविष्य धुंधलाने में लगे हैं यह भी स्पष्ट नहीं। पर क्या इनके नाज़ुक कंधे इस व्यवसाय से जुड़े तनाव और अपेक्षाओं के भार को उठा पाने में समर्थ होते हैं? जब हम 'बाल-श्रमिकों' को (जो कि अपने परिवार का पेट भरते हैं) अपराध मानते हैं तो फिर ये बच्चे 'सेलेब्रिटी' की श्रेणी में कैसे आते हैं? इस विषय पर तमाम सामाजिक संगठनों की आँखें क्यों नहीं खुलतीं?

दुःख इस बात का है कि माता-पिता की व्यस्तता, कार्यभार का खामियाज़ा ये मासूम भुगतते हैं। बच्चों को हम भौतिक सुख-सुविधाएँ न दे सकें चलेगा, पर उन्हें उनके हिस्से का स्नेह, बचपन की मासूमियत और स्वतंत्रता तो देनी ही होगी। साथ ही यह विश्वास भी कि हम हर हाल में उनके साथ है। हमारा प्रेम उनके पास या फेल होने की शर्तों पर नहीं टिका हुआ है। सबसे जरुरी कि हम उनके सपनों को जीवित रखें और उन्हें पूरा करने के लिए अपना समय और बेशर्त प्रेम दें जिसके कि वे जन्म से ही हक़दार हैं।
- प्रीति अज्ञात
'हस्ताक्षर' नवम्बर 2017 में प्रकाशित (सम्पादकीय)
http://hastaksher.com/rachna.php?id=1136
#हस्ताक्षर #बाल_दिवस

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

#करवा चौथ

आज सुबह ही तेजस ने पूछा था कि "दीदी, करवा चौथ पर कुछ क्यों नहीं लिखा?" और शायद मेरे व्रत सम्बन्धी जवाब को सुनकर उन्हें और भी ताज्जुब हुआ. किचन में काम करते-करते उनसे msg पर बात हो रही थी और मैनें लिख दिया था कि "हमारे यहाँ ये नहीं होता". लेकिन उसके बाद मैनें विचार किया कि ये तो कोई कारण ही नहीं! क्योंकि बहुत से ऐसे पर्व हैं जो हमारे घरों में नहीं मनाये जाते पर हम ख़ूब उल्लास से उचक-उचककर उन्हें मनाते आये हैं. कई ऐसे भी हैं जो कि सब पूरे उत्साह से मनाते हैं (होली टाइप) और मैं उस समय विलुप्त हो जाना पसंद करती हूँ. निष्कर्ष ये कि भैया, हमाये यहाँ तुमाये यहाँ जैसा कुछ नहीं होता.....पूरा खेल मन का है!

यूँ बहुत बार ऐसा होता है कि घर के, बगीचे के या कहीं और व्यस्तता भरे काम में सारा दिन निकल जाता है और पेट में अन्न का एक दाना पहुंचाने का भी समय नहीं मिलता. वो अलग बात है कि बाद में फिर थाल भर भोजन लेके असुरों की तरह हम उस पर टूट पड़ते हैं साथ में एक केतली चाय गटक जाते, सो अलग! लेकिन जहाँ व्रत की बात आई ...हम स्वयं को तुरंत शर्मिंदा कर लेना ही उचित समझते हैं. मतलब 5.30 पर उठने के बाद भी रोज 9 बजे के आसपास ही अपन अन्न-जल ग्रहण कर पाते हैं लेकिन जो व्रत की सोच ली..ओ हो हो! फिर तो केस हाथ से गया ही समझो. क़सम से, आँख खुलते से ही पूरे पाचन तंत्र में जैसे त्राहिमाम मचने लगता है. आहार नलिका किसी सूखे रेगिस्तान की तरह स्थान-स्थान पर चटकने लगती है आंतें सिकुड़कर भीतरी दीवारों से कुछ यूँ चिपक जाती हैं कि जैसे आज ही वे इस तंत्र को सदैव के लिए अलविदा कह देंगीं, आमाशय स्वयं को अकालग्रस्त क्षेत्र घोषित कर देता है, समस्त एंजाइम एक सुघड़ राजनीतिज्ञ की तरह आरोप-प्रत्यारोप का खेल  खेलने में मस्त हो जाते हैं और ये सभी मिलकर जो संगठित संदेसा मस्तिष्क के चौथे प्रकोष्ठ को भिजवाते हैं उसका सीधा तात्पर्य यही है कि "बेटा, तू तो रहन ही दे!" वरना आँख खुलते से ही हमारी आँखों के सामने अँधेरा यूँ न छाता!
क्या करें! भौत मुश्किल है. एक तो भगवान ने ही हमें थोड़ा कम interest लेकर बनाया है उस पर कुछ गुण हमने स्वयं विकसित कर लिए. फलस्वरूप न तो सजने संवरने में कभी दिलचस्पी रही और न ही बहुत ज्यादा शौक़ है कोई. जैसे हैं सो हैं. अब हमारा कुछ नहीं हो सकता जी! हम अपनी तरह के एक ही पौधे हैं जो अभी तक पूरा उगा ही नहीं!

जहाँ तक 'करवा चौथ' का किस्सा है तो मेरा मानना है कि इसे जन-जन तक पहुँचाने और लोकप्रिय बनाने में बॉलीवुड का अमूल्य योगदान रहा है. यहाँ "छनन छन चूड़ियाँ खनक गईं देख बालमा, चूड़ियाँ खनक गईं हाथ मां" जैसे सुमधुर गीत नारी शृंगार की बात करते हैं तो पूरी तरह से करवा चौथ को समर्पित 'चांद छिपा बादल में' (हम दिल दे चुके सनम) , 'लैजा लैजा' (कभी खुशी कभी गम) ने कुंवारी लड़कियों को भी भविष्य में इसके लिए प्रोत्साहित किया. वो जो इस त्यौहार के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे, उन्हें 'सरगी' की पूरी व्याख्या भी पता चल गई.
अब हम भले ही डिफेक्टिव पीस निकल गए पर एक बात है कि हमें व्रत, पूजा-पाठ करती और खूब सजी-धजी स्त्रियाँ बेहद प्यारी लगती हैं. त्योहारों में इनमें एक अलग ही नज़ाकत और शर्मीलापन-सा भर जाता है. पति के छेड़ने पर जब ये मुस्कुराते हुए "चलो, हटो" कहती हैं तो उस समय उनकी ये अदा देखते ही बनती है. आस्था-विश्वास से भरे इन प्यारे चेहरों और इनके मेहंदी भरे हाथ देखना बेहद अच्छा लगता है. इसलिए मैं तर्क-वितर्क में नहीं पड़ती. यदि कोई ख़ुश है तो इस ख़ुशी पर उसका पूरा अधिकार है. यही वे लोग हैं जो भारतीय संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर के रूप में उभरते हैं. मुझे ऐसे सभी लोग बहुत अच्छे लगते हैं और इनकी नज़र उतारने को जी चाहता है. ईश्वर आप सबको ख़ूब प्रसन्न रखे.
- प्रीति 'अज्ञात'
#करवा चौथ #स्त्रियाँ #व्रत 

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

यूँ ही...

ये जीवन भी बड़ी अजीब सी स्थिति में बनाये रखता है जब मन अच्छा हो और दिल ख़ुश तो सब कुछ बेहद आसान, सरल, सुंदर दिखाई देता है लेकिन जब मूड के ठीक 12 बजे हों तो इससे अधिक जटिल, दुरूह और बदसूरत कुछ नहीं दिखाई देता! कुल मिलाकर हमारी यह धारणा उस आधार पर बनती है जो हम प्रतिदिन देख सुन रहे हैं या जो हम पर ही सीधा बीत रहा है. आज यदि हर तरफ नकारात्मक वातावरण , दुःख और परेशानी दिखाई दे रही है तो इसका यह मतलब क़तई नहीं कि दुनिया में कहीं कुछ अच्छा हो ही नहीं रहा! ख़ूब हो रहा है, लोग अपनी दुनिया में छमाछम, मस्त नाच गा रहे हैं. उन्हें न ढोंगी टीवी में दिलचस्पी है, न अख़बार में. सोशल मीडिया से कोसों दूर रहने वाले इन लोगों की ज़िंदगी आम 'जागरूक' लोगों से बेहतर और कहीं अधिक चैन की कट रही है. 😌
फिर भैया! सच तो जस का तस होता है सो सकारात्मक घटनाओं में चटपटा वाला तड़का नहीं डल पाता इसलिए वे उतनी बिकती ही नहीं! तभी तो पिंक पेंट वाला लड़का, दुबई वाली लड़की, बिग बॉस में श्रीसंत की हरक़तें और आधी रात को भटकते भूत की ख़बरें सारी भीड़ बटोर लेती हैं 😈. बेचारी अच्छाई हमेशा प्रतीक्षा सूची में अंतिम पायदान पर नज़र आती है. अच्छे लोगों की भी कोई क़दर ना रही! 😥

अरे हाँ! ल्यो अच्छाई से याद आया कि चाहे कुछ भी हो पर 'रामायण' ने यह सिद्धांत तो प्रतिपादित कर ही दिया था कि बड़बोले और घमंडी इंसान का सर्वनाश सुनिश्चित है. रावण दहन उसी का ही प्रतीक है. फिर काहे कुछ लोग अपनी बेमतलब की ठसक में मरे जाते हैं जी? 😮
वे जो मर्यादा पुरुषोत्तम से मर्यादा में रहना ही नहीं सीख सके वे उनके भक्त नहीं कछु औरई हेंगे. 😤
रावण दहन से क्या होगा जी?
राम को भी तो जीवित रखना होगा!
इश्श! चुनाव में नहीं रे...ह्रदय में पगलू! 😍
सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
'चला जा रहा था मैं डरता हुआ....' उफ़्फ़! हाय राम! ये काहे याद आ गया! 😳😎😜
- प्रीति 'अज्ञात'
#विजयादशमी #दशहरा 

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

#MeToo श्श! किसी को बताना मत!

कुछ भी कहने के पहले मैं उन सभी स्त्री-पुरुषों को सलाम करती हूँ जो इस विषय पर बेझिझक साथ खड़े हैं.
#MeToo Campaign के समर्थन में स्त्रियों का होना स्वाभाविक है क्योंकि यही वह वर्ग है जिसने यौन शोषण की गहन पीड़ा उम्र के हर दौर में झेली है और नियम यह था कि 'मौन' रहना होगा! ये जो चुप्पी है न, ये कभी सिखाई नहीं जाती! दरअसल बचपन से ही स्त्री के इर्दगिर्द एक ऐसा वातावरण बना दिया जाता है या यूँ कहिये कि हम उसमें ही जन्म लेते हैं जहाँ देह को इज़्ज़त/मान-सम्मान से जोड़ दिया गया है और फिर इसको तार-तार करने वाला चाहे कोई भी हो, पर इज्ज़त तो ज़नाब 'स्त्री' की ही जाती है. चाहे घर के भीतर किसी रिश्तेदार या घनिष्ठ मित्र ने भी उसके साथ गलत व्यवहार किया है; पर परिवार की नाक सलामत रहती है लेकिन यह उसी वक़्त कटी घोषित कर दी जाती है ग़र यह बात घर से बाहर चली जाए! चूँकि बेटी तो घर की लाज होती है तो यह किस्सा घर में ही दबा दिया जाता है. इसे बहुधा संस्कार, प्रतिष्ठा और अनुशासन के भारी लेबल के साथ सलीक़े से इस तरह स्थापित किया जाता है कि बदनामी, अपनों को खो देने का भय, उनकी चिंता, परिवार का सम्मान, कौन शादी करेगा? जैसे प्रश्नों की विभिन्न परतें उसके अस्तित्त्व पर लिपटती चली जाती हैं.  

"किसी को बताना मत!" की सलाह के साथ कर्त्तव्य निभा लिया जाता है पर कोई एक पल भी नहीं सोचता कि उम्र भर उस घिनौने इंसान को अपनी आँखों के सामने कुटिलता से मुस्कुराते देख वो रोज कितनी दफ़ा टूटती होगी! भयभीत हो सिहर जाती होगी! ख़ुद को कमरे में बंद कर घंटों अकेले रहती होगी! उस लिजलिजे, घृणित स्पर्श को याद कर चीत्कार मार रातों को उठ-उठ बिलखती होगी! शायद उस घटना से कई और बार भी गुज़रती होगी! पर स्त्री है, इसलिए चुप रहना होगा!

यदि उसने एक अच्छा और सुखी बचपन जिया है तब भी वह स्वयं को एक सभ्य समाज में रहने लायक़ बनाने के लिए इन सारी बातों को उम्र-भर गाँठ बाँधे रखती रही है.
तभी तो घर से बाहर जाते समय बीच राह कोई उसे टोकता, छूता, सीटी मारकर गंदे शब्द कहता...वह आँखें नीची कर चुपचाप निकल जाती. बोलने का मतलब, तमाशा और फिर घर की नाक का सवाल जो ठहरा. घर, ऑफिस, बस, ट्रेन, लम्बी लाइन, धार्मिक स्थल, शादी-ब्याह, पारिवारिक कार्यक्रम....हर परिचित/अपरिचित स्थान पर ऐसा होना और बर्दाश्त करना उसने अपनी नियति मान लिया. 

मैं यह पूरे दावे के साथ कह सकती हूँ कि हर स्त्री ने कम/ज्यादा ही सही पर अपने जीवन में शारीरिक शोषण कभी-न-कभी न अवश्य ही झेला होगा! याद कीजिये बस/ट्रेन में वो अचानक से किसी कोहनी का स्पर्श, जाँघों पर हाथ या लाइन में किसी का सटकर खड़ा होना...पलटकर देखने पर वही गन्दी निग़ाह और भद्दे इशारे....और हमारा भीतर ही भीतर गड़ जाना!

हमारी पीढ़ियाँ एक-दूसरे को चुप रहना सिखाती रहीं. उनकी सिसकियाँ घर की खोखली चारदीवारी के भीतर ही सम्मानित होती रहीं. स्त्रियाँ हर बात पर झट से यूँ ही नहीं रो देती हैं, ये कुछ दफ़न किये हुए किस्सों से उपजी गहन पीड़ा का वो भरा समुन्दर है जो जरा सी दरार देख बह उठता है. 

लानत है उन लोगों पर जो हाल के घटनाक्रम से बौखलाए हुए ऊलजलूल कहे जा रहे हैं. जिन्हें स्त्री के अब बोलने से इसलिए आपत्ति है कि वो 'तब' क्यों नहीं बोली? जिन्हें सबूत की दरक़ार है, वे ये सवाल कभी अपने घर की स्त्रियों से करकर देखें! उनकी आँखों की नमी और आवाज़ की कंपकंपाहट आपके नीचे की ज़मीन खिसका देगी. 
वो जिन्हें लगता है कि स्त्री उनकी बदौलत आगे बढ़ी और अब उसकी जुबां निकल आई है तो वे भी जान लें कि किसी की मदद कर देने से वे उसके शरीर के अधिकारी नहीं हो जाते. इनका एक गलत स्पर्श उस इंसान का जीवन तबाह कर देता है.
देह के परे एक इंसान भी है उसमें कहीं, उसका सम्मान करना सीखिए. 

आशंका है कि अब कोई नया भीषण मुद्दा योजनाओं की कड़ाही में खलबलाया जा रहा होगा जिसे जल्द ही सबके सामने परोस इस मुद्दे का मुँह शीघ्र ही बंद कर दिया जाएगा क्योंकि यदि इसके दोषियों को सज़ा मिलने लगी तो देश की जेलें कम पड़ जायेंगी.
सज़ा!! मैं भी क्या सोच रही हूँ!

ध्यान से अपने आसपास देखिये कि हर बात पर गालीगलौज पर उतर आने वाले नेताओं/प्रवक्ताओं की बोलती इस विषय पर कैसे बंद है? वे पत्रकार/ साहित्यकार जो जरा-जरा सी बात में क्रांति का उद्घोष कर रणक्षेत्र में कूद पड़ते हैं, इस समय मैदान छोड़ क्यों भाग खड़े हुए हैं?
बड़े-बड़े नामों के गले में ये कौन-सी हड्डी फंसी हुई है जिससे उनसे न बोलते बन रहा है न उगलते?
- प्रीति 'अज्ञात'
#MeToo  #iChowk
आप इसे यहाँ भी पढ़ सकते हैं -
https://www.ichowk.in/society/metoo-has-given-strength-to-women-to-speak-against-harassment-they-faced/story/1/12739.html