रविवार, 31 जनवरी 2021

दिल्ली शहर में म्हारो, ट्रैक्टरो जो घुम्यो, हां घुम्यो!



सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे ट्रैक्टर कहते हैं. वैसे उससे भूल ही क्या हुई थी? कब किसी ने सोचा था कि उसे यूँ किसी आंदोलन का हिस्सा बना दिया जाएगा. अपना संस्कारी बालक तो सदियों से दो बड़े, दो छोटे बेमेल पहियों के साथ भी जी ही रहा था न. क्या उसने एक बार भी शिकायत की कि पप्पा, हमको भी ट्रक के जैसे पहिये दिला दो न? खेतों पर चहलकदमी करते हुए उसने कई बार नजदीक से गुजरते हाईवे पर फर्राटा गाड़ियों को देखा. लेकिन कभी उन सड़कों पर चलने की ट्रैक्टर ने जिद न की. चुपचाप खेतों में अपना काम करता रहा. 'लाल किले पर गया ट्रैक्टर' कहकर आपने तो हाय तौबा मचा रखी है लेकिन कभी उस भोले प्राणी की आंखों में झांका? अरे, बचपन से ही जो मिट्टी में खेलता रहा. खेतों से यारियां रखने वाला ट्रैक्टर डीज़ल के लिए भी शहर की देहरी पर न गया. लेकिन, जब शहर में ले ही आया गया तो यहां पांव धरते ही उसकी तमन्नाएं जरा सी भी न मचलेंगीं क्या? लेकिन देखिये कि इस समय देश में सबसे ज्यादा बद्दुआयें जिसके हिस्से आ रहीं हैं वो 'ट्रैक्टर' ही है.

आख़िर होता ही क्या है एक मासूम ट्रैक्टर के पास? वाहनों में सबसे दीन-हीन प्रजाति बनाकर वैसे ही उपेक्षित रख छोड़ा है उसे. न AC है, न पॉवर स्टीयरिंग. कड़क सी सीट है, वो भी अकेली. एकदम सौतेला बनाकर रख दिया था उसे. इससे भी जी न भरा तो भीष्म पितामह वाला फ़ील भी दिया गया उसको. सस्पेंशन के नाम पर नीचे भाले लगा दिए कि बेटा झेल. मिट्टी में सना पड़ा रहा, गाय भैंसों के आसपास खड़ा रहा. सर्विसिंग के नाम पर कुएं के पानी से नहला दिया गया.

लेकिन वो तब भी अपनी गरीबी, फटेहाली को भुला मस्त रहा. बोनट के ऊपर लगे साइलेंसर से अपनी फ्रिक्र को धुएं में उड़ाता रहा. अब वक़्त ने उसे दिल्ली की सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया तो दरद होने लगा सबको. और ऐसा दर्द कि बर्दाश्त ही न हो पा रहा जी. कितने दोग़ले लोग हो यार कि सारा क्रेडिट अन्नदाता को और लानत-मलानत ट्रैक्टर की. भई, वाह! आप तो बम्पर ताली के हक़दार हैं जी.

बताइए, इतनी दूर से चलकर आया और आप कहते हैं कि 'सड़क किनारे चुपचाप खड़े रहो.' मतलब वो वही खेत देखता रहे, जिनसे उकताकर थोड़े चेंज के लिए वह घर से निकल भागा? ये कुछ ज्यादा ही एक्सपेक्ट न कर रहे आप उससे? आई मीन, टू मच हो गया है ये तो. अब ये आप पर है कि आप इसे मासूम के पक्ष में दलील समझें या बिना शर्त माफ़ीनामा.

लेकिन बीते दिनों की घटनाओं के बाद ट्रैक्टर की जो बेइज़्ज़ती हुई है उससे वह भारी दुःख में भर गया है. बेचारा, बस एक दिन के लिए तो दिल्ली आया था, चाह रहा था कि पूरी राजधानी देख ले. हमारा फ़र्ज़ बनता था कि उसे पूरे शहर की सैर कराते. लेकिन पुलिसवालों ने बैरिकेड लगा दिए. किसी को भी गुस्सा आ जाएगा. अब देखो न, अति उत्साह में अपने गांव का छोरा नाहक ही बदनाम हो गया.

आपको लगता है कि Tractor ने बदला character लेकिन एक बार भी सोचा कि उसका दिल कितनी बार रोया होगा? देखिए बेचारा कल से 'हम बेवफ़ा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके' गुनगुना रहा है. समय किसी को क्या से क्या बना देता है, साब! सोचने वाली बात ये भी है कि जिन्होंने ट्रैक्टर परेड की इजाजत दी, उनको देखना चाहिए था कि ये नन्हा फ़रिश्ता, शहर में चल पाएगा या नहीं.

सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को राजधानी की चकाचौंध में उसके खो जाने का अंदेशा क्यों न हुआ पहले से ? भूल गये क्या बचपन के उस मेले को जिसमें लाल शर्ट और काली निक्कर पहने, खोया हुआ बच्चा पुलिस चौकी के पास पछाड़े खाता मिलता है. बस, डिट्टो ऐसे ही ये भोलू भी पाया गया. रास्ता भटक गया था तो लोगों ने उसे किले के पास पहुंचा दिया.
सबको पता था कि पुलिस उधरिच मिलेगी और इसे घर भिजवाने में दिल से सहायता भी करेगी. गांव में तो अलाव भी था. वहां सड़क किनारे बेचारा कडाके की सर्दी में ठिठुरता रहा. क्या पता, धूप सेंकने ही निकल गया होगा मेरा बच्चा. अब कोरोना काल में विटामिन-डी की महत्ता से तो आप भी इंकार नहीं कर सकते.

वो मासूम अभी अपने दुःख से बाहर निकलने का रास्ता खोज ही रहा था कि गांव से ट्रॉली मेम का कॉल आ गया. उन्होंने अलग ही लेवल का गदर मचा रखा है. इस मासूम के ज़ख्मों पर रुई का ठंडा फाहा रखने की बजाय, नमक नींबू निचोड़ एकदम मसलकर रख दिया है, बेचारे को.
सरसों के खेत में, धूप लेते हुए अपने चीनी मोबाइल से उन्होंने जो कड़वे स्वर निकाले हैं न कि भगवान बचाए ऐसी ट्रॉलियों से. कह रहीं हैं, 'पिताजी ठीक ही कहत रहे. बिना ट्रॉली वाला ट्रैक्टर छुट्टा सांड हो जाता है. वो का कहत हैं 'Men will be men.' तुमऊ शहर में जाके बैसे ही हो गए हो जी". अब उधर वो घूंघट में लजाय रहीं, इधर ये मारे गिल्ट के लज्जित खड़े हैं.

वैसे ये तो हमें भी लग रहा कि ट्रॉली साथ होती तो ट्रैक्टर को समझा बुझाकर घर ले आती और उसकी देश भर में यूं दुर्गति न हो रही होती. अब अकेले प्राणी को बहकने में समय ही कितना लगता है. लेकिन इन भटके हुए राहगीरों को कौन समझाए कि गृहस्थी की गाड़ी कभी अकेले चली है भला? देखो, जाकर नाक कटा आए न.

दुनिया ग़वाह है कि जैसे बिना डोर के पतंग या कि बिना बोगी के इंजन का कोई अस्तित्व नहीं, ठीक वैसे ही बिना ट्रॉली का ट्रैक्टर पूर्णतः औचित्यहीन है. अकेला जाएगा तो कुसंगति में पड़कर आवारागर्दी ही तो करेगा. मैं तो उस इंसान को भी ढूंढ रही हूं जिसने बिना ट्रॉली के ट्रैक्टर लाने की बात कही थी. ये सब कुछ उसी मनुष्य का किया धरा है. हमारे घर के बच्चे को बिगाड़ने का क्रूर इल्ज़ाम उस मानस के सिर पर तत्काल धरा जाए. 

ख़ैर. जो भी हुआ, अच्छा नहीं हुआ. ट्रैक्टर तो हमेशा से ही उदार प्रकृति का रहा है. वर्षों से अपनी उंगलियों से धरती को सहलाता रहा है. बीज रोपने में मदद करता है कि देश का पेट भर सके.
इसके कोमल हृदय में कभी कोई बुरे विचार आए ही नहीं. ये क्यों किसी बैरिकेड को तोड़ेगा या किसी को कुचल ही देगा. एक दुःख है जो अब इसके सीने में टीस की तरह चुभता रहेगा। एक मलाल है जो हम सबको सदा रहेगा. ट्रैक्टर, दोष तेरा नहीं परिस्थितियों का है. तू एवीं बदनाम हो रहा.
- प्रीति अज्ञात 
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रविवार, 24 जनवरी 2021

ड्रैगन फ्रूट को संस्कारी 'कमलम्' बनता देख हमारा 'कमल' सकते में हैं!

 

अभी हम ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाने की ख़ुशी में ठीक से गदगदा भी न पाए थे कि तब तक हमारे वीर पुरुषों द्वारा चीन को ऐसी पटखनी दे दी गई है कि उनकी नज़र उतार, मंगल आरती गाने को जी चाहता है.
आपको पता ही होगा कि ड्रैगन' शब्द का प्रयोग एक फल के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए ड्रैगन फ्रूट' का नाम अब 'कमलम' रख दिया गया है. नामांतरण संस्कार की यह पावन रस्म, गुजरात के मुख्यमंत्री जी द्वारा संपन्न हुई. आपने जन साधारण को यह भी सूचित किया कि चूंकि यह कमल की तरह दिखता है, अतः नामांतरण के बहाने इसका धर्मांतरण आवश्यक था. वैसे भी मूलतः अमेरिकन फल का चीनी नाम रखने की कोई तुक ही नहीं थी और जब उन्होंने बदल लिया था तो अपन ने भी गंगाजल छिड़क पवित्र कर दिया.  

अच्छा! मुझे इस समय अपने यू पी वाले नामबदलू चैंपियन जी की बहुत चिंता जैसा फ़ील आ रहा है. अब भइया, आपके बिज़नेस में कोई और घुस आए, तो बुरा तो लगता है. सो, उन्हें भी ये बात बहुत चुभी होगी. और वे ये समझने को छटपटा भी रहे होंगे कि आख़िर उनके मूल कार्यक्षेत्र में किसी और की दखलंदाज़ी करने की हिम्मत हुई तो हुई कैसे! अब चूँकि घर का मामला है इसलिए उनका मौन होना स्वाभाविक है. फिर भी The Nation wants to know कि वे इस पूरी घटना को किस तरह लेते हैं. क़सम से यह जानने को तो हमारे व्यक्तिगत कान भी बेहद फड़फड़ा रहे.

ख़ैर! हमको राजनीति से क्या लेना-देना! मुद्दे की बात ये है कि अब जब कमलम नाम तय कर ही लिया गया है तो हम भी मान लेते हैं. लेकिन भिया जरा उन माता-पिता से भी तो पूछ लेते जिन्होंने ओरिजिनल नाम रखा था. हमें हमारे अपने कमल की भी चिंता सता रही. बचपन से सुनते आ रहे कि 'कभी न भूल, कमल का फूल'. और आप लोगों ने अपने घर के बच्चे की ही सुध न ली? तनिक सोचिए, उसको कितना बुरा लगा होगा जब अचानक आप उसके सौतेले भाई को ले आये और कहा कि ' ये तुम्हारे भैया हैं. इनको प्रणाम करो'.  क्या बताएं साहब!  हम तो शर्मिंदगी के मारे उसी पल कुंए में छलांग लगाने वाले थे क्योंकि हमें तो यह फल हमेशा ऑक्टोपस जैसा ही दिखता आया था. अब ये भला उसका भाई कैसे हो सकता है! हो सकता है, कल को ऑक्टोपस महाराज भी स्वयं को उपेक्षित महसूस कर नामांतरण की पुकार कर बैठें और अष्टबाहु नाम से ही उनका खोया आत्मसम्मान पाने की मांग करें.

पर भक्क! ड्रैगन फ्रूट भी कोई नाम था भला? एकदम हिंसक लगता था. कहाँ वो आग उगलता, खूँखार ड्रैगन वाला नाम कि सुनकर मन दहल जाए.  अब देखो, अपना ये प्यारा, दुलारा, देशभक्त कमलम! सोचकर ही तबियत भगवा होने लगती है और दिल ठुनक ठुनक कर 'रंग दे तू मोहे गेरुआ' गुनगुनाता है.

अच्छा! अब तक भले ही आपने इस फल को न चखा हो और चखा भी हो तो शायद कंफ्यूज रहे हों कि ये कीवी और नाशपाती की खिचड़ी जैसा बेतुका स्वाद क्यों देता है! लेकिन अब देखिएगा, इसके जलवे. 'कमलम' बनते ही ऐसा हुस्न निखरकर आया है इसका कि देश के कोने-कोने में इसकी मांग है. हालात इस हद तक बेक़ाबू हैं कि सारे सब्ज़ी-फल रूठे पड़े हैं. इन सभी ने कह दिया है कि "पौधे पर लटके हुए ही प्राण तज देंगे लेकिन मंडी नहीं जाएंगे कभी. हमारी भी कोई इज़्ज़त-फ़िज़्ज़त है कि नहीं? या बस ज़लील होने को ही पैदा हुए हैं?" उनके दुःख की एक ख़ास वज़ह ये भी है कि तमाम भयानक देशी नाम होते हुए भी एक विदेशी को प्राथमिकता दी गई.

इधर पाइनएप्पल इस बात पर औंधे पड़े हैं कि मैं वर्षों से काँटों का मुकुट पहने घूम रहा हूँ, साब जी को उसकी चुभन और तड़पन काहे न महसूस हुई? स्ट्रॉबेरी की ये पीड़ा कि उसमें स्ट्रॉ तो है ही नहीं और वहीं चाऊमीन, ताऊमीन होना चाहते हैं. अरबी यह कह-कहकर बेसुध हुई जा रहीं कि वे सच्ची भारतीय हैं और आप उनकी देशभक्ति को संशय भरी निगाहों से न तौलें. उन्होंने तो अपने भीषण विलाप का वीडियो तक ट्वीटिया दिया है कि "उन्हें उत्तरप्रदेश में रहने से डर लगता है. कहीं कोई उन्हें मुग़लों का साथी समझ उसकी चरबी न उधेड़ दे."
अब इस भोली अरबी को कौन समझाता कि इस समय तो आदरणीय ख़ुद ही भयंकर वाले परेशान चल रहे. तेरे पे क्या ध्यान देंगे, पगलैट!

वैसे वर्तमान समय की मांग के अनुसार, बद्तमीज़ चीन के साथ ये कड़ी कार्यवाही जरुरी थी. मैं इसका कट्टर समर्थन करती हूँ कि उसको मुँहतोड़ ज़वाब देना बनता ही था. साथ ही यह भी आवश्यक था कि हमारी अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कार भी अक्षुण्ण बने रहें. अतः हमने उसके ख़िलाफ़ तगड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए, उसके पालतू ड्रैगन पर अपने संस्कारी, देशभक्त कमलम का जोरदार बाण छोड़कर उचित क़दम उठाया है.

फ़िलहाल हमने समस्त सब्ज़ी मंडी निवासियों को यह समझा बुझाकर शांत कर दिया है कि सबका नंबर आएगा और एक-एक कर सभी संस्कारी बनेगे. हम तो विनम्र अनुरोध करते हैं जी कि एक कमेटी बिठाओ जो सारे सब्ज़ी-फलों का संरचनात्मक अध्ययन कर उसकी रिपोर्ट जल्द से जल्द सरकार को सौंप दे. वो क्या है न कि बदला लेने को हमारी बाजुएं बुरी तरह फड़फड़ा रहीं हैं.

अच्छा! एक ताजा आईडिया हमारे इत्तु से दिमाग़ से महक़ रहा है कि आप न शेर का नाम बदलकर शायर कर दो! जिससे हम जंगल में जाकर उसकी ग़ज़लों का लुत्फ उठा सकें. खीखीखी, तबहि तो होगा न जंगल में मंगल! अच्छा, सॉरी! अब ज्यादा हो रहा है.
भिया, अंत में एक जायज़ चिंता भी है कि कहीं बदलाखोर चीन अपने नथुने फुला हमारे लोटस को ड्रैगन न कहने लगे! भौत दिक़्क़त हो जाएगी! बड़ी भद्द पिटेगी भई. काहे कि ये आईडिया तो हिन्दुस्तानी खोपड़ी से ही पहले निकला है.
- प्रीति 'अज्ञात'
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

थोड़ी प्रसन्नता एवं बहुत-सी खोई हुई संवेदनाओं के साथ, नववर्ष में प्रवेश करता भारत

 

नववर्ष का आगमन किसी सुबह की तरह होता है जो हर रोज़ नई लगती है. कहने को इसमें कुछ भी नया नहीं होता, दिन के वही पहर हैं और समय की सुई भी प्रतिदिन एक ही दिशा में घूमती है. लेकिन फिर भी आँख खुलते ही एक नए उत्साह का संचार होता है, रात के सपने हृदय में कुलबुलाते हैं और उन्हें पूरा करने की चाह से दिन प्रारम्भ होता है. नववर्ष से भी नई उमंगों के साथ, नई चाहतें, नई उम्मीदें जुड़ ही जाती हैं. यद्यपि 2020 में कोरोना की तांडव लीला से त्रस्त जनमानस के लिए प्रसन्नता की बस एक ही बात हो सकती थी कि कोरोना से मुक्ति मिले! 2021 की देहरी पर पग रखते ही यह शुभ समाचार मिला कि न केवल कोविड-19 से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए टीके का निर्माण हो चुका है बल्कि हमारे भारत में 16 जनवरी से टीकाकरण अभियान भी प्रारम्भ हो गया है. विश्व भर में किसी वैक्सीन को लेकर इतनी बेचैनी, ऐसी प्रतीक्षा और उत्सुकता पहले कभी नहीं देखी गई. हमारी पीढ़ी ने पहली बार ही किसी महामारी का प्रकोप झेला है. अतः स्वाभाविक ही था कि इसकी वैक्सीन का जनता के लिए उपलब्ध होना देश भर में उत्सव की तरह मनाया जाए और यही हुआ भी. लेकिन अति उत्साह में भर यह नहीं भूल जाना है कि ख़तरा अभी टला नहीं! प्रत्येक नागरिक तक इसे पहुँचने में और इतनी बड़ी संख्या में टीके के निर्माण में अभी लम्बा समय लगेगा. जिनका टीकाकरण हो चुका है, वे भी इसे लगाते ही कोविड-19 प्रूफ़ नहीं हो गए हैं. यूँ भी दो डोज़ लगनी है. अतः पहला टीका लगते ही हमें मास्क को उछालकर फेंक नहीं देना है. टीका विशेषज्ञ (वैक्सीन एक्सपर्ट) का कहना है कि "हमारे शरीर में एंटीबॉडीज बनने की प्रक्रिया में न्यूनतम तीन सप्ताह लगते हैं यानी यदि आप आज वैक्सीन लेते हैं तब भी आप पर अगले तीन सप्ताह तक संक्रमण का भय मँडराता रहेगा! यह संकट इससे अधिक समय के लिए भी हो सकता है". इसलिए ये बात गाँठ बाँध ही लीजिए कि मास्क, सैनिटाइज़ेशन, सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के तमाम नियमों का पालन अब भी उतना ही आवश्यक है जितना पहले था. जब तक देश के प्रत्येक नागरिक को टीका (दोनों डोज़) नहीं लग जाता, तब तक अपनी और अपनों की पूरी सुरक्षा का दायित्व केवल और केवल हमारा है. इधर कोरोना वैक्सीन के बनते-बनते 'बर्ड फ्लू' देश में पाँव पसार चुका है. पक्षियों की जान साँसत में है लेकिन इससे सबका इतना ही लेना-देना है कि हम अपनी जान कैसे बचा सकें! इन मासूम पक्षियों के ज़िन्दा दफनाए जाने का समाचार, बस एक समाचार मात्र ही बनकर रह गया है क्योंकि भावुकता, संवेदनशीलता और पीड़ा के सारे भाव तो मनुष्य ने स्वयं तक ही सीमित रख छोड़े हैं. कुछ लोग रोते दिखे, तो पल भर को भ्रम हुआ कि संवेदनाएं अभी मरी नहीं! लेकिन फिर देखने पर पता चला कि वे तो व्यापार में घाटे के लिए विलाप कर रहे थे. इन पक्षियों को मौत के घाट तो वे स्वयं ही उतारा करते थे, जिससे उन्हें अच्छे दामों में बेचकर सबकी स्वादेन्द्रियाँ तृप्त करने का पुण्य कमा सकें और साथ-साथ वित्तकोष भी बढ़ता रहे. अब जब ये मुर्गे-मुर्गियाँ बीमारी से मरे तो इनके दुःख की सीमा ही न रही. कर्तव्यनिष्ठ प्रशासन ने अपनी चुस्तता दिखाते हुए स्वस्थ पक्षियों को भी मारने का आदेश दे दिया. कौन इन मासूमों के परीक्षण के चक्कर में पड़े! ये कहाँ जाकर अपना रोना रोएंगे! नन्ही सी जान, कुछ देर तड़पकर दम तोड़ देगी. इनकी मृत्यु के लिए कौन आंदोलन करने वाला है! चिड़ियाघरों को कुछ दिनों के लिए बंद करने का आदेश दे दिया गया है और कुछ स्थानों पर वहाँ के पक्षियों को मारने का भी! यानी पहले तो आप मनोरंजन के नाम पर किसी से उसकी स्वतंत्रता छीन लेते हैं और फिर अपनी सुविधानुसार उसका जीवन समाप्त करते हुए भी आपका हृदय एक पल को नहीं पसीजता! बात इतने पर ही नहीं ठहरती, कुछ समय बाद किसी प्रजाति के विलुप्त होने का भीषण विलाप भी किया जाता है. फिर 'इस चिड़िया को बचाओ', 'उस चिड़िया को बचाओ' जैसे स्लोगन से देश की दीवारें पाट दी जाती हैं. ये कैसा विकृत, निर्लज्ज और मलीन रूप है मनुष्य और उसकी तथाकथित मनुष्यता का, कि जिसका जीवन छीन रहा, उसी को बचाने का खोखला आह्वान भी कर बैठता है! कहने को तो देश भर में मकर संक्रांति का त्योहार भी धूमधाम से मनाया गया लेकिन दुख तब हुआ जब अन्नदाताओं से जुड़ा यह पर्व कुछ किसान स्वयं नहीं मना सके. राजधानी दिल्ली की ओर जाने वाली सड़कों पर इस भीषण सर्दी में जमा किसानों को देखना त्योहार का उत्साह फीका कर गया. तीन कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच का गतिरोध हल होता तो नहीं दिखता. रूठे रहने की कसम खाए बैठे दोनों पक्ष न जाने क्या बात करते हैं, पता नहीं चलता. आंदोलनकारी अड़े हैं कि कानून वापस लो, और सरकार की जिद है कि इसके अलावा कुछ भी ले लो. अब तो सुप्रीम कोर्ट का दखल भी सवालों के घेरे में आ गया है. पक्ष/विपक्ष की राजनीति जो वैक्सीन में चली, वह यहाँ भी निरंतर जारी है. साथ ही किसानों को बरगलाने की बात भी प्रचारित की जा रही है. हाँ, ये तो माना जा सकता है कि देश की जनता को मूर्ख बनाना, लुभाना और एक तिलिस्म में घेर लेना राजनीतिज्ञों का शगल रहा है. लेकिन किसान आंदोलन के मामले में बात उतनी सरल नहीं है. कई किसान संगठन, कानून के पक्ष में समर्थन देकर खुद को आंदोलन से अलग कर चुके हैं. पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली किसान नेताओं और संगठनों से इतर ये आंदोलन जाता नहीं दिखता. लेकिन, जहां तक सरकार की बात है, तो उसका फ़र्ज़ होना चाहिए कि किसी भी स्तर के आंदोलन को जल्द से जल्द बातचीत से हल कर खत्म करवाए. लेकिन, किसान आंदोलन के मामले में वर्तमान सरकार का रवैया बेहद ढीला और उदासीन नजर आया. मानो परवाह ही नहीं है. इस आंदोलन के सही-गलत और तर्क-कुतर्क की समीक्षा भी होती ही रहेगी पर उससे इतर एक सच यह है कि कृषकों का दुःख, देश का दुःख है. हम सबका जीवन इनका ही ऋणी है और सदैव रहेगा. समस्या का हल अवश्य ही निकाला जा सकता है, काश! दोनों पक्षों को निदा फ़ाज़ली साहब का यह शे'र याद रहे- मुमकिन है सफ़र हो आसाँ, अब साथ भी चल कर देखें कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें टीकाकरण अभियान की प्रसन्नता, बेहाल किसानों की चिंता और मारे गए पक्षियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए इस वर्ष और आने वाले तमाम वर्षों से आशा रखते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करें, देशहित प्रधान रखें और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता के भाव जागृत कर, उनकी रक्षा हेतु अपने स्वर बुलंद करें. गणतंत्र दिवस की अशेष शुभकामनाएँ! जय हिन्द - प्रीति अज्ञात

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गुरुवार, 14 जनवरी 2021

Bird Flu की आड़ में पक्षियों की सामूहिक हत्‍या 'जलियांवाला बाग़ कांड' से कम नहीं!



'Bird Flu के चलते Kanpur Zoo के सभी पक्षियों को मारने का आदेश दे दिया गया है. जबसे यह ख़बर सुनी है, एक बेचैनी सी है. सहसा तो विश्वास ही नहीं होता कि इन मासूमों के प्रति कोई ऐसा बर्ताव करने की कल्पना भी कैसे कर सकता है. खैर! प्रशासनिक अधिकारियों ने यह निर्णय जो भी सोचकर लिया हो पर पता नहीं क्यों, ऐसा लगता है कि किसी भी समस्या से निपटने का जो अंतिम समाधान होता है उसे ही प्रथम पायदान पर रख दिया गया है. चिडि़‍याघर में रहने वाले पक्षी तो हम इंसानों की ही जवाबदारी थे, और यद‍ि उन्‍हें ही मारना पड़ रहा है तो इसका इल्‍जाम तो हम पर ही आना चाहिए. इस निर्णय को जानने के बाद मेरी आंखों में इतिहास की सबसे नृशंस तस्वीर तैरने लगी है जहां 'जलियां वाला बाग़' में जनरल डायर ने निर्दोष भारतीयों को गोलियों से भून, उनकी जघन्य हत्या कर दी थी. वहां की रक्तरंजित दीवारों में अब तक बसी यह घटना इतनी भयावह और दर्द भरी थी कि इसके घाव आज भी हम सबके दिल में गहरी टीस बनकर बैठे हैं. इसी पीड़ा में डूबकर मैं यह समझने की नाकाम कोशिश कर रही हूं कि मनुष्यों को मारा तो 'जलियां वाला कांड' हुआ और पक्षियों की बात आई तो महज़ एक समाचार भर बनकर कैसे रह गया है? निरीह प्राणी, जो न तो इस नृशंस फैसले के विरोध में धरने पर बैठ सकता है और न ही आपके महाआदेश के विरुद्ध में कोई याचिका ही किसी अदालत में जारी कर सकता है. क्या होगा ज्यादा से ज्यादा? कुछ देर फड़फड़ायेगा और वहीं दम तोड़ देगा!

ये मनुष्य की बराबरी भले ही न कर सकते हों पर क्या इन निरीह, बेज़ुबान पक्षियों के प्रति इतना संवेदनहीन होकर कुछ ज़्यादती नहीं हो रही? हम मनुष्य भी तो इस समय कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं लेकिन अपने लिए हमने कब और कहां ऐसा फ़ैसला कर पाया है. हमने ख़ुद की जान बचाने के लिए एड़ी चोटी एक कर दी. दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने एक वर्ष जुटकर इसकी वैक्सीन बना ली है.

तमाम उपाय अपनाकर हमने किया है न इंतज़ार, इसके बनने तक का और अभी इसके लगने की प्रतीक्षा भी कर ही रहे हैं. अपने लिए कितने धैर्यवान और संवेदनशील हो जाते हैं न हम. अब ये 'बर्ड फ्लू' कोई कोरोना की तरह अचानक पैदा हुई महामारी तो है नहीं, जिससे बचाव और रोकथाम के उपाय संभव न हों. दो दशक से देखने में आ रही है और बार-बार आ रही है तो क्या इससे बचने का बस यही एक उपाय रह गया है कि जैसे ही ये बीमारी दस्तक़ दे, पक्षियों की एक खेप मार दी जाए.

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि कुछेक पक्षियों में संक्रमण की आशंका के चलते, सभी पक्षियों को मार देना कहां तक उचित है? जबकि ये तय है कि उनमें से कई स्वस्थ होंगे ही. हम मनुष्य हैं, सबसे समझदार और बुद्धिमान प्राणी. इसीलिए हमको स्वतः ही यह अधिकार भी मिल गया है कि इस प्रकृति से जुड़ी हर सजीव-निर्जीव वस्तुओं के लिए निर्णय ले सकें. पर यह सोचकर भी मेरी रूह कांप  जती है कि ग़र हमसे ऊपर भी कोई शक्तिशाली प्रजाति होती तो? क्योंकि फिर वह प्रजाति भी हम कोरोना पीड़ित और स्वस्थ मनुष्यों को इसी क्रूर दृष्टि से देखती और एक साथ मानव जाति का ख़ात्मा कर देती.

शुक्र मनाइए कि हम सब बच गए. पर दुर्भाग्य से ये पक्षी, उतने भाग्यशाली नहीं हैं. अगली बार जब आप किसी चिड़ियाघर में जाएं तो वहां के पशु-पक्षियों को जी भरकर देख लीजिए और उन्हें सौ गुना स्नेह भी दीजिए. क्या पता, अगली बार किसी बीमारी के चलते इनमें से कोई बलि का बकरा बन जाए और फिर आप उससे दोबारा कभी न मिल सकें.अपने पालतू जानवरों को भी सीने से लगाकर, ख़ूब दुलार दीजिए उन्हें.

आज इन पक्षियों की बीमारी है, कल को कुत्ते, बिल्लियों में भी कोई बीमारी हो सकती है. सोचकर ही कलेजा कांप उठेगा, अगर किसी बीमारी के कारण, कोई हमारे पेट्स को ख़त्म कर देने की बात झूठे ही कह दे तो? क्योंकि ये पालतू जानवर नहीं, हमारे घर के सदस्य हैं. जीवन का बेहद प्यारा और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

फ़िलहाल तो यही कहूंगी कि हो सके तो उन पक्षियों को जी भरकर देख लीजिये, जिन्हें आप रोज प्यार से दाना खिलाते हैं. इनकी उस मधुर आवाज को रिकॉर्ड कर लीजिये जो आपकी सुबह में संगीत घोलती है, इन मासूमों की तस्वीर भी संजोकर रखिये जो आपकी दिनचर्या का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन चुके हैं. क्या पता. कल को, वे हों न हों!
- प्रीति 'अज्ञात'
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बुधवार, 13 जनवरी 2021

गुजरात: संक्रांत‍ि पर छतों की निगरानी का फैसला कटी पतंग जैसा!


गुजरात में मकर संक्रांति के दौरान छतों पर 4 से अधिक लोगों के एकत्र होने पर राज्य सरकार ने रोक लगा दी है. ड्रोन से छतों की निगरानी भी की जाएगी'. जब से यह ख़बर पढ़ने में आई है, मैं यह तय नहीं कर पा रही हूं कि इस निर्णय को लेने वाले की पीठ थपथपाऊं या अपना सिर धुनूं. हर मर्ज़ की एक दवा तो हम सदियों से सुनते आ रहे हैं. अब हर परेशानी का एक कारण भी इन दिनों ज़बरदस्त फ़ैशन में है. नाम है वही, हर दिल में नफ़रत की बत्ती सुलगाने वाला ज़ालिम कोरोना. जिसे लेकर इस त्योहार पर भी भरपूर रोना होगा. 'छत पर 4 से ज्यादा लोग एकत्र नहीं हो सकते!' अजीब मज़ाक है ये! जहां एक घर में 10 लोग पहले से ही रह रहे हैं. उस दिन उनके छत पर जाने से कौन सी कयामत आ जाएगी?

अब गुजरात जैसे राज्य में, जहां संयुक्त परिवार की परम्परा अभी भी बख़ूबी चलन में है, वहां इस तरह के बेतुके निर्णय का पालन कितना और कैसे होगा? पर ये तो एक तरह से यही बात हुई न कि 'यार! तुम लोग इकट्ठे क्यों रहते हो? संयुक्त परिवार की क्या जरूरत? एकल में रहो न!' या कि ऐसा है कि बस, छत पे इकट्ठे जाने से कोरोना फैलता है? बाक़ी नीचे आने के बाद साथ ही खाना खाओ, पलंग पर साथ लदकर टीवी भी देखो. अजी, आपको जो करना है, सो करो. पर भिया! तनिक हमको, हमारी तथाकथित जिम्मेदारी तो निभा लेने दो!

जरा सोचिए, जहां एक घर में 6 लोग हैं वहां वे कौन दो महात्मा होंगे जो अपने मनोरंजन की बलि देने को सहर्ष तैयार हो जाएंगे! दादी मां, बच्चों को सामने खड़ा कर समझा रहीं होंगीं कि 'बेटा, ड्रोन अंकल आ जाएंगे. फ़ोटू छप जाएगी कल के पेपर में. बड़ी बदनामी होगी कि हाय राम! देखो तो नासपीटे इकट्ठे पतंग उड़ा रहे थे!'
दादाजी कहेंगे, 'आपको एक दिन 'सब्र का फल मीठा होता है' वाली कहानी सुनाई थी न? तो मैं न, कल टाइमर सेट कर दूंगा. उसके बजते ही भैया का टर्न आएगा.'

इधर हम जैसे गोलुओं से भरे परिवार में यह चिंता व्याप्त है कि अपन तो 3 खड़े होंगे छत पर, लेकिन ड्रोन से क्षेत्रफल ज्यादा घिरा दिखेगा और ये 6 समझ लेंगे. बड़ी जगहंसाई होगी. तो अपन तो खुद को किचन में आइसोलेट कर मंगोड़े तलकर खाएंगे और टीवी पर उड़ती पतंगों को देख, कान से सुर्र सुर्र धुआं छोड़ेंगे. देश के लिए क़ुर्बान होने का थोड़ा सा फ़ील भी ले लेंगे. गणतंत्र दिवस वाली देशभक्ति अभी से दिखाने का यही उचित समय लग रहा है.

'पतंग महोत्सव' नहीं मनाया जा रहा, इस निर्णय का स्वागत किया जा सकता है क्योंकि वहां दूर-दूर से लोग आते हैं. पक्षियों के कारण भी प्रतिबंध समझ में आता है बल्कि हम तो ख़ुद ही कांच लगे मांज़े के विरोध में एक-एक किलोमीटर लम्बी पोस्ट लिखते आये हैं.
छत पर असावधानी के कारण हुए हादसों के भी हम और आप ग़वाह हैं. पर अब जरा गंभीरता से सोचकर ये बताइए कि कोरोना का, आपकी छत पर पतंग उड़ाने से क्या सम्बन्ध? बल्कि मुझे तो लगता है कि यही एक उत्सव है जिसे कोरोना काल में बिना किसी डर के मनाया जा सकता है. बस कांच वाला मांज़ा न हो.

लोग तो अपने रिश्तेदार या परिचित के साथ ही होते हैं. कोई मेला तो लगता नहीं कि खतरा हो उससे! छत पर गाना बजाना चलता है. पतंगें, आसमान का माथा चूमती इठलाती फिरती हैं और साथ में उंधियु, पूरी, जलेबी, चिक्की और तिल के बने तमाम व्यंजनों का स्वाद महकता है. यही तो होता है इस त्योहार में, जो हमें एक साथ, एक घर में बांधे रखता है. बल्कि इसी के कारण तो संक्रांति के दिन लोग घरों की छत पर होते हैं, कहीं बाहर नहीं जाते.

अब आप आसमान से लटक, ड्रोन से छतों की निगरानी करेंगे तो भई, ये तो उन प्रेमियों की निजता का हनन भी हो गया, जो बड़ी आस लगाए इस दिन के लिए अपनी पतंगें तैयार कर रहे थे. उनकी प्रेम नैया तो परवान चढ़े बिना ही, बीच भंवर में डूब जाएगी.

लोग वैसे ही कहीं आने-जाने को लेकर दुखी चल रहे. सबके चेहरे की रौनक़ उड़ चुकी है. जीवन में तनाव अब सौ गुना अधिक बढ़ चुका है. लॉकडाउन से व्यापारियों के पेट पर कोरोना की तगड़ी मार पहले ही पड़ चुकी है. अब जबकि सारा बाज़ार खुला है तो इनके लिए भी ये बेमतलब के विरोध जैसा ही है. क्या ये पहले से त्रस्त जनता के जले पर नमक छिड़कने जैसा नहीं?
- प्रीति 'अज्ञात'
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मंगलवार, 5 जनवरी 2021

#संन्यास विवाह से ट्विटर के कौवों को सीख लेनी चाहिए!

हाल ही में एक ख़बर वायरल हो रही है जिसमें संन्यास जीवन को अपनाने के बाद दो लोगों ने विवाह का निश्चय किया और अब वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर चुके हैं. कारण था मोहब्बत! विवाह की इससे अधिक ख़ूबसूरत वज़ह कुछ और होनी भी नहीं चाहिए! प्रेमियों का हक़ है ये कि वे उम्र भर साथ रहें! प्रेम में डूबे लोग, किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी को लूटते नहीं, परेशान नहीं करते. वे प्रेम से रहना चाहते हैं और इसी भाव की अपेक्षा दूसरों से भी रखते हैं.

अच्छी बात ये है कि इस शादी से वहाँ उपस्थित लोग भी प्रसन्न होते नज़र आ रहे हैं और किसी ने भी अब तक कोई ऊलजलूल बात नहीं की है बल्कि कई संन्यासी इस शादी के गवाह बने हैं. उस वीडियो को देखने-सुनने के बाद लगता है कि समाज के एक विशेष टेढ़े वर्ग को इन गाँव वालों से सीख लेनी चाहिए! ये वर्ग जो सोशल मीडिया पर अपने आपको कूल और अल्ट्रा मॉडर्न समझते नहीं थकता लेकिन अमृता सिंह से लेकर प्रियंका चोपड़ा और मलाइका अरोड़ा तक को अपने पति की माँ बोलने से नहीं चूकता! उन पर छींटाकशी और भद्दे मजाक करता है! उस पढ़े लिखे, नफ़रत पोसते वर्ग को बटेश्वर के इन लोगों से यह ज्ञान प्राप्त कर ही लेना चाहिए कि 'खग ही जाने खग की भाषा'. प्रेम का अर्थ केवल प्रेम ही होता है और यह उसके अलावा और किसी भी भाषा में यक़ीन नहीं करता. प्यार में उम्र तो कोई मायने ही नहीं रखती!

'न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नयी रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो'
इंदीवर के लिखे इस गीत को जगजीत सिंह ने हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि लगभग 40 साल बाद भी यह रीत अब तक इस समाज में सहजता से नहीं स्वीकारी गई है. बल्कि समाज तो शब्दशः  इसका उल्टा करके चलता है. वो उम्र देखता है, जन्म, जाति, पैसा सब में भरपूर दखल देता है पर मन देखना और उसे समझना इसने सीखा ही नहीं! दुनिया भर को प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले हमारे देश में सबसे ज्यादा गाज प्रेमियों पर ही गिरती आई है. सबसे अधिक प्रश्न प्रेमियों से ही पूछे गए हैं, सबसे अधिक तिरछी निगाहों का सामना उन्हें ही करना पड़ा है. सबसे अधिक हतोत्साहित (ज़लील ही पढ़िए इसे) उन्हें ही किया गया है, सबसे अधिक नफ़रत और बद्दुआ उन्हीं के पवित्र हृदय को पीड़ा देती आई है. धर्म और इज्ज़त के नाम पर हिंसा का ख़ूनी खेल, सबसे अधिक प्रेमी युगल के साथ ही खेला जाता है. 

हम जिस 'भद्र' समाज का हिस्सा हैं उसी में आज भी स्त्री की उम्र अधिक होने पर, पुरुष को फँसाने जैसे घिनौने इल्ज़ाम भी उसी के मत्थे मढ़ दिए जाते हैं. अक्सर ही प्रेम को किसी एक पक्ष की साज़िश कहकर, उसके ख़िलाफ़ नई क़िस्म की साज़िश रच दी जाती है. इस तरह के लोगों का लक्ष्य एक ही है, प्रेम को नष्ट करके, घृणा के बीज बोना और फिर ये उम्मीद भी करना कि इसका मैडल भी उनको नवाजा जाए कि कैसे वे  इस समाज के कट्टर रक्षक बन इस दुनिया में अवतरित हुए हैं.

बटेश्वर धाम के इस जोड़े का विवाह, निम्न मानसिकता से भरे लोगों की सोच के सामने एक सहज उत्तर बनकर प्रस्तुत होता है. ये हारे-घबराए हुए लोगों को उम्मीद का उजाला भी देता है. साथ ही समाज को ये उदाहरण भी देता है कि जीवन के किसी भी दौर में जब अकेलापन महसूस हो, बेहिचक उस अपने का हाथ थाम लो जिसे हमारे लिए ही बनाया गया है.
ईश्वर करे कि उसके दरबार में फलते-फूलते इस प्रेम को, विशेष आशीर्वाद प्राप्त हो. इस युगल का वैवाहिक जीवन इसी प्रेम की छाया में पल्लवित होता रहे और हमें प्रेम की इतनी कहानियाँ पढ़ने को मिलें कि हमारा मन अचरज़ से न भरे! 
अब समय आ चुका है कि प्रेम इस समाज का अभिन्न भाव बनकर रहे, उसमें भीतर तक समा जाए. प्यार, इश्क़, मोहब्बत की कहानियाँ इतनी आम हो जानी चाहिए कि इन्हें ख़ास समझ, इस पर चर्चा बंद ही हो जाए.  
- प्रीति 'अज्ञात' 
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गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

बुरा होते हुए भी बहुत कुछ सिखा गया, 2020

इस बात पर सभी एकमत होंगें कि कोरोना वर्ष 2020 को जितना भी कोसा जाए, कम है! यह काफ़ी हद तक सच भी है. लेकिन यदि गंभीरता से सोचा जाए तो इस वर्ष ने हमें अपने जीवन को समझने और उसके विवेचन-मनन का अवसर दिया है. हमें यह भी सिखाया कि जीने के लिए कितनी कम वस्तुओं की आवश्यकता होती है और बाज़ार दिखावा बेचता है. हमें यह भी पाठ मिला कि स्वच्छता कितनी आवश्यक है और यह न केवल कोरोना बल्कि कई अन्य बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है. इस कठिन समय में हमें प्रकृति के प्र्ति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ और उन लोगों के प्रति भी मन कृतज्ञता से भर गया जिन्होंने हर हाल में हमारा साथ दिया. असल में तो इस वर्ष ने हमें, हमारे अपनों की पहचान कराई है और हमें मोहब्बत से जीना सिखाया है.    

झूठ कम बोला गया 
हर बात पर या बेबात ही झूठ बोल देना सच्चे भारतीयों की निशानी है. लेकिन 2020 के लॉकडाउन ने मनुष्यों को सच्चाई का पुतला बनाकर छोड़ा. पहले तो फ़ोन पर उधारी वापिस माँगने वालों को बच्चे द्वारा कहलवा दिया जाता था कि "पापा घर पर नहीं है". अब कैसे कहें क्योंकि अगर घर पर नहीं तो क्या कोविड वार्ड में हैं?
झूठ, बच्चे अपने लेवल पर स्कूल में प्रयोग करते आ रहे थे. जब टीचर होम वर्क न करने का कारण पूछती थी तो दर्दनाक मुँह बनाकर कह दिया करते थे, 'मेम, मेरे पेट में बहुत जोरों का दर्द हो रहा था". अब डर ये है कि जैसे ही बोला और पीछे से मम्मी ने आकर तमाचा जड़ा कि "क्यों रे! कल तो पिज़्ज़ा खाने के लिए जमीन पर पछाड़ें मार-मारकर गिरे जा रहा था".
प्री-लॉकडाउन काल में पुरुष अपने बॉस को अलग ही दुखभरी कहानी से भावुक कर देते कि कल कैसे पत्नी मरते-मरते बची! और इस कारण से फाइल अधूरी रह गई! अब तो इधर कहा और उधर तलाक़ हुआ कि "हाँ, तुम तो चाहते ही यही हो कि मैं मर जाऊँ!" 
तो सच का बोलबाला बहुत रहा हालाँकि ऑनलाइन क्लास ने बच्चों के दिमाग में नए आइडियाज़ भी भर दिए हैं और वे "नेट स्लो है" कहकर कैमरा या माइक ऑफ कर देते हैं.

दिखावे पर लगी रोक 
शादी-ब्याह में साज-सज्जा के नाम पर ही लाखों रूपये खर्च दिए जाते थे. उपहार के नाम पर लेन देन भी हमेशा ही चलता आया है. कोरोना के कारण अब इन आयोजनों में उपस्थिति एक निश्चित संख्या तक ही सीमित कर दी गई है. एक तरफ तो इससे लोग खुश हैं तो वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस दुःख में अधमरे पड़े हैं कि "हमने तो वर्मा जी की बहू की मुँह दिखाई पर सोने की अंगूठी भेंट की थी और हमें बस डिजिटल बधाई वाला बुक़े मिला". 

बुरी आदतें ख़ुद-ब-ख़ुद कम हुईं 
वे किशोर जिन्हें माँ-बाप से छुप कर सिगरेट सुलगा अपने फेफड़ों को जलाने का शौक़ था, जो नशे में धुत हो अपने ग़म गलत किया करते थे, कभी- कभी सड़क पर गाड़ी को नागिन की तरह लहरा भी दिया करते थे; कोरोना माई ने उन्हें भी अपनी गिरफ़्त में लेकर उनके सारे स्वप्न ध्वस्त कर दिए. अब उनके पास ग़म को सही, गलत करने के लिए गरम पानी है, काढ़ा है, दिव्य पेय है. खून के घूँट पी-पीकर इन्हें गटकने की पीड़ा भी बहुत है जी!
पुलिस के डंडे के डर से पान-गुटका खाकर, मॉडर्न आर्ट बनाने वाले कलाकारों की संख्या में भी भारी कमी हुई है.

पुरुष गृहकार्य में दक्ष होते गए 
कई स्त्रियों को इस बात का बहुत दरद रहा करता था कि उनके मरद को पूजनीया सासू माँ ने कुछ न सिखाया! लॉकडाउन ने जैसे उनकी मनचाही मुराद पूरी कर दी. इस स्वर्णिम अवसर को भुनाने का इससे बेहतर समय और क्या हो सकता था. हेल्पर्स के न आने के दुःख में पतियों को मजबूरन शामिल होना पड़ा. उसके बाद उन्हें सब्जी काटने, वाशिंग मशीन लगाने, कपड़े आयरन इत्यादि का अनचाहा  त्रैमासिक कोर्स भी करना पड़ा. उन्हें ढंग से हाथ-पैर धोना भी आ गया. कुछ साहसी लोग कुकिंग भी सीख गए और निपुणता में पत्नी को टक्कर देने लगे. जो महान थे और अपने उसूलों के प्रति कट्टर भी, उन्हें यह लॉकडाउन भी प्रभावित न कर सका! आपके चरणों में विशेष रूप से नमन पहुंचे!

स्त्रियों को मेकअप के बिना रहना आया
जब आधे से अधिक फेशियल एरिया पर मास्क की तिरपाल चढ़ी हो तो पलस्तर करने को बचा क्या! न लिपस्टिक, न क्रीम, न पाउडर. सबका साथ छूट गया. उस पर घर के कामों में जुटी स्त्रियाँ, न तो कहीं आने जाने का सुख ही भोग सकीं और न ही उन्हें नए गहने और साड़ियों को दिखा पाने का सुअवसर ही प्राप्त हुआ. अब क्या कहें! घर में पति की लगातार उपस्थिति से "और क्या बताऊँ, बहिन!" कहकर उसकी बुराई करने के सुख से भी वंचित रहना पड़ा उन्हें.  

स्वास्थ्य बेहतर हुआ 
अब लोगों को अपना ख्याल रखना आ गया है और वे अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से कहीं अधिक सचेत हो गये हैं. अपनी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए वे तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं. योग के प्रति उनकी रूचि बढ़ी है. चूँकि बाहर का खाना-पीना भी लम्बे समय तक बंद रहा तो घर का भोजन खाने से उनके लगातार बढ़ते वजन पर भी रोक लगी है.

कुल मिलाकर 2020 के कठिन समय ने हमें संघर्ष करना और उससे जूझते हुए आगे बढ़ना सिखाया है. साथ ही हर विपत्ति से निबटने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी किया. दुखद पक्ष यह रहा कि इसने कई घरों से उनके अपने छीन लिए. रोज कमाकर, चूल्हा जलाने वालों का जीवन नष्ट कर दिया. देश की अर्थ-व्यवस्था तहस-नहस कर दी. इसके चलते लोग अपने घरों तक न पहुँच सके. लाखों को अपनी नौकरी, व्यवसाय से हाथ धोना पड़ा और भीषण मानसिक तनाव से भी गुजरना पड़ा. 
जिन्होंने अपनों को खो दिया उसकी भरपाई तो उम्र भर नहीं हो सकती लेकिन इतनी उम्मीद जरुर रख सकते हैं कि बाकी सब धीरे-धीरे पटरी पर लौट ही आएगा! कहते हैं न कि हर बात के दो पहलू होते हैं तो क्यों न इसके सकारात्मक पहलू को सोच, 2021 में प्रसन्न मन से प्रवेश किया जाए.
नववर्ष की शुभकामनाएँ!
-प्रीति 'अज्ञात'
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'कोरोनो-युक्त समाज' के लिए कैसा हो 2021

हम जिस दुनिया में रह रहे हैं वहाँ के लोगों ने अब तक हुई तमाम महामारियों के किस्से भर ही सुने हैं। लेकिन इन किस्सों को सुनना और उन्हें स्वयं जीना, उनका हिस्सा बनना एक अलग ही स्तर का अनुभव है। एक ऐसा दुखद अनुभव, जिसे कोई कभी भी नहीं जीना चाहेगा! सब चाहते हैं कि उनके जीवन की पुस्तक से, दर्द के तमाम पृष्ठ उखाड़ फेंक दिए जाएँ लेकिन कोरोना महामारी और इसकी पीड़ा, अब एक लिखित दस्तावेज़ की तरह हमारी जीवन दैनंदिनी में दर्ज़ हो चुकी है। ये एक ऐसा दुःख है जो न चाहते हुए भी सबके गले पड़ गया है। निश्चित रूप से 2020 में दुनिया भर के कई लोगों के जीवन में कुछ अच्छा भी हुआ ही होगा लेकिन कोविड-19 का प्रकोप हर खुशी पर भारी ही रहा! इसने न केवल सामान्य दिनचर्या को ही प्रभावित किया बल्कि मनुष्य को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। नियमों का उल्लंघन और 'जो होगा, देखा जायेगा!' की मानसिकता इसी कुंठा से उपजा व्यवहार है जिसे किसी भी मायने में सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके दुष्परिणाम भी मानव जाति को ही भोगने होंगे, हम भोग भी रहे हैं। 

लॉकडाउन ने, न केवल उस समय ही तमाम दुकानदारों की कमर तोड़ दी थी बल्कि अब तक भी वे इससे उबर नहीं सके हैं। उत्सवों की रौनक़ कम होने और विवाह एवं अन्य आयोजनों में सीमित संख्या के नियम से बाज़ार बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मुसीबत की सर्वाधिक मार निर्धन को ही झेलनी पड़ी।सबसे अधिक फ़ाका उस निम्न वर्ग के ही हिस्से आया है, जिन्हें रोज़ सुबह उठकर उस दिन के चूल्हे का इंतज़ाम करना पड़ता था। उनका रोज़गार छूटा और इस बीमारी ने उनके हाथों से रोटियाँ ही छीन लीं। संक्रमण न होते हुए भी वे इसकी चपेट में आ गए। 

'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है' की अवधारणा का सबसे पुष्ट प्रमाण इस वर्ष ही देखने को मिला, जब दूर शहर में रहने वाले लोग अपने प्रियजनों से मिलने की बेचैनी को महीनों जीते रहे। रोजी-रोटी कमाने गए लोग या विद्यार्थी अपने घर न जा सके! बेटियाँ मायके की दहलीज़ को छू लेने भर को तरसती रहीं! बच्चे, ददिहाल-ननिहाल के स्नेह आंगन से वंचित रहे। प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से मिलने की तीव्र उत्कंठा को ह्रदय में ही दबाए रहे! इसी सबके बीच मृत्यु का निर्मम तांडव भी चलता रहा। न जाने क्या-क्या बीता होगा उन दिलों पर, जो किसी अपने को खोने के बाद बिछोह के इस कठिन समय में उससे लिपटकर रो भी न सके, बिलखते हुए ये भी न कह सके कि 'तू हमें छोड़ यूँ चला क्यों गया?'  इतनी हताशा और निराशा का अनुभव पहले कभी न हुआ कि जब हमारा कोई अपना हमसे बिछुड़े और हम उसे स्पर्श तक भी न कर सकें,मृतात्मा के अंतिम दर्शन तक को भी तरस जाएँ! सच! बड़ा ही दुखद समय रहा उन घरों में, जहाँ उन्हें अपने प्रियजन की निष्प्राण देह तक न देखने को मिली! अंतिम विदाई में जो उसके साथ दो क़दम भी न चल सके! कैसा दुर्भाग्य है ये कि लाशें किसी सामान की तरह पैक की जानें लगीं। उन्हें छू लेना भर भी किसी बीमारी के विस्फ़ोट का कारण लगने लगा। 

बीमारी हो या मृत्यु, ह्रदय की तमाम संवेदनाओं को जागृत कर ही देती है लेकिन कोविड ने मनुष्य के इस भाव को भी लील लिया। एक-दूसरे के प्रति संदेह और दुर्व्यवहार की सैकड़ों घटनाओं से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। कल तक जो अपना था, आज उसके लिए ह्रदय कैसा निष्ठुर सा हो गया! कुछ मरीज़ जो शायद अपनी रोग प्रतिरोधक शक्ति के चलते इस बीमारी को मात दे भी सकते थे, वो अपनों की दुर्भावना के शिकार हुए। इसके साथ ही मानसिकता का सबसे कुत्सित भाव भी देखने को मिला।जहाँ लाशों के गहने चोरी, उनसे बलात्कार और उनके अंगों को निकाल बेचने की तमाम भयावह घटनाओं ने मनुष्यता को और भी बदरंग, शर्मसार कर दिया। एक ओर जहाँ इस बीमारी ने जैसे जीवन के सारे अच्छे-बुरे रंगों से एक साथ साक्षात्कार करा दिया है तो वहीं कुछ नाम किसी नायक की तरह उभरे और उनकी हृदयस्पर्शी कहानियाँ हमारा मन भिगोती रहीं। इंसानियत पर हमारा विश्वास बनाए रखने में उन सभी का योगदान भुलाए नहीं भूलता, जो इस दुरूह समय में पूरी कर्त्तव्यपरायणता के साथ डटे रहे। इसमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लाखों-करोड़ों नाम सम्मिलित हैं जिन्हें यह बीमारी भी विचलित न कर सकी और वे पूरी निष्ठा और समर्पण से अपना काम करते रहे। यही वे लोग हैं जो इस दुनिया को जीने योग्य बनाते हैं, मानव को उसकी मानवता से जोड़े रखने का सशक्त उदाहरण बन प्रस्तुत होते हैं। 

वैक्सीन की प्रतीक्षा का अंत बस होने को है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कोई संजीवनी-बूटी नहीं है। समस्त देशवासियों को उपलब्ध होने में ही एक वर्ष से अधिक का समय लग जाएगा। हमारे तंत्र में इसकी डोज़ पहुँचते ही ये हमें 'कोरोना-प्रूफ़' नहीं कर देती! पहले इक्कीस दिन तो रोगप्रतिकारक (एंटीबॉडीज़) बनने की प्रक्रिया को प्रेरित करने में लगते हैं और उसके बाद के तीन सप्ताह में इसका निर्माण प्रारम्भ होता है। यानी वैक्सीन लगने के बाद भी दो माह तक आप उतने ही असुरक्षित हैं जितने कि बिना इसके थे। कुल मिलाकर हमें यह मान लेना चाहिए कि मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइज़ेशन अब हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और अब ये जीवन इसके साथ ही सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सकता है। इस तथ्य को भी स्वीकारना ही होगा कि कभी-न-कभी तो हमें बाहर निकलना ही है, अब घर में और बैठना संभव नहीं। 

वज़न घटाना, योगाभ्यास करना, सुबह शीघ्र उठना जैसे तमाम संकल्पों को लेने के लिए नए साल के आने का इंतजार मत कीजिए। आज से ही शुरुआत कीजिए, ताकि 2021 आपको तरोताजा रूप में मिले। यह संकल्प सर्वाधिक आवश्यक है कि हम पूरी सुरक्षा अपनाते हुए एक जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय भी दें। कोरोना-मुक्ति का उपाय तो अभी निकट में दिखता नहीं, तो क्यों न 'कोरोनो-युक्त समाज' के लिए अपने आपको तैयार करें। मानसिक और शारीरिक रूप से अपने आपको तैयार करके ही इस महामारी को साधारण बीमारी में बदला जा सकता है।

- प्रीति अज्ञात

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'हस्ताक्षर' दिसंबर अंक में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/rachna.php?id=2658



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

Merry Christmas!

 



कहने को क्रिसमस भले ही ईसाई धर्म से जुड़ा  त्योहार है लेकिन दुनिया भर के बच्चे इससे कनेक्ट करते हैं. उन्हें पता है कि आज के दिन सैंटा क्लॉज आकर न केवल उन्हें चॉकलेट देते हैं बल्कि उनकी बहुत सारी wishes भी पूरी करते हैं. आप किसी बच्चे से पूछो कि तुम्हें क्या चाहिए तो सबसे पहले वो चॉकलेट ही बोलेगा. बच्चों की अपनी जितनी छोटी सी दुनिया है, उसमें पलती wishes भी उतनी ही मासूम हैं. वो सामने वाले की उम्र, पद, हैसियत के आधार पर अपनी इच्छाओं का गुणन नहीं बैठाते बल्कि अपने दिल की ही बात कहते हैं. ईश्वर करे, उनकी ये निश्छलता बनी रहे और सैंटा क्लॉज पर भरोसा भी. 

 

"दुनिया अब भी ख़ूबसूरत है", ये भरोसा हमें हमारे पेरेंट्स ने दिया और हमने हमारे बच्चों को. अब समय बदला है और बच्चों को पता चल चुका है कि सुबह तकिए के पास रखी चॉकलेट और उपहार मम्मी पापा ही रखते हैं. अचानक आया वो 'मैरी क्रिसमस' वाला केक उनके सबसे प्यारे दोस्त ने ही चुपके से भिजवाया है और दरवाजे पर चमचमाती नई साइकिल ददिहाल- ननिहाल से ही आई है.

 

"जिंगल बेल, जिंगल बेल, जिंगल आल द वे....." सुनते ही मन चहकने लगता है और यूँ महसूस होता है जैसे दरवाजे पर दस्तक़ होने ही वाली है और उस लाल सफ़ेद पोटली को लिए, उन्हीं रंगों से सजे वस्त्र धारण किये, टोपी पहने कोई देवदूत बस अब हो हो कर हँसने ही वाला है. 

आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दूँ. मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंगल बेल,  क्रिसमस गीत न होकरथैंक्सगिविंग गीत है जिसे डेढ़ सौ से भी अधिक वर्ष पहले जार्जिया के म्यूजिक डायरेक्टर जेम्स पियरपॉन्ट ने संगीत ग्रुप के लिए लिखा था. उन्होंने इसे 'वन हॉर्स ओपन स्ले' शीर्षक से लिखा था. पर थैंक्सगिविंग गीत है, तो भी क्या! गर कोई अपनी ख़्वाहिशों के आसमान में चाँद-तारे टांकने को इसे गुनगुना लिया करता है! ये गीत, उम्मीद देता है और इसे हर दिन गाया जाना चाहिए. 

 

बच्चों के साथ, क्रिसमस ट्री’ को सजाना मुझे आज भी अच्छा लगता है.  यूँ भी मेरा मानना है कि वक़्त कितना भी बदल जाए, हम कितने ही समझदार क्यों न हो जाएं, घर कितने ही साजो- सामान से क्यों न भर लें! पर एक सैंटा क्लॉज की दरकार तब भी है, वो सरप्राइज़ सबको चाहिए. किसी भी उम्र में ये अब भी उतना ही अच्छा लगता है और इसके लिए जरूरी है कि हम भी किसी न किसी के सैंटा क्लॉज बनें.  

Merry Christmas!

-    प्रीति ‘अज्ञात’

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शनिवार, 19 दिसंबर 2020

कोरोना को हराने वालों के लिए जानलेवा बनती #Mucormycosis बीमारी को भी जान लीजिए

 कोविड ने पहले से ही पूरी दुनिया को कम दुखी नहीं कर रखा है कि अब इससे जुड़ी एक नई जानकारी ने परेशानी खड़ी कर दी है. ख़बर आई है कि यदि आप कोविड से ठीक हो चुके हैं तो भी निश्चिंत होकर न बैठें! अपना ध्यान रखें क्योंकि कोविड मरीज के लिए नया खतरा बन म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis) नामक बीमारी ने दस्तक दे दी है. 

हाल ही में कम रोग प्रतिरोधक क्षमता (Weak Immunity) वाले तथा  कुछ कोरोना मरीज़ों में इसका संक्रमण (Infection) देखने को मिला है. इस घातक बीमारी के चलते अहमदाबाद में की मौत हो गई तथा अन्य की आंखों की रोशनी चली गई है. 

मुंबई के कोविड अस्पतालों में भी ऐसे मामले देखने को मिले  हैं. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा भी इस ख़बर की पुष्टि की गई है. टीवी चैनलों के माध्यम से उन्होंने बताया कि पिछले दो सप्ताह में ऐसे दर्ज़न भर मरीज़ सामने आये हैंजिनमें से पचास प्रतिशत अपनी आंखों की रोशनी खो बैठे हैं. 

 

क्या होता है श्लेष्मा विकार (म्यूकोरमाइकोसिस)?
म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis), कवकीय संक्रमण (Fungal  infection) का एक प्रकार है. इसे जाइगोमाइकोसिस या ब्लैक फंगस  भी कहा जाता है. यह रेयर बीमारी है. इसमें लोगों की आंखों की पुतलियां बाहर आ जाती हैं. अधिकाँश मामलों में मरीजों की आंख की रोशनी भी चली जाती है.

यह इसलिए भी विशेष रूप से खतरनाक है क्योंकि यह पूरे शरीर में जल्दी फैलता है. समय पर उपचार न होने से इसका संक्रमण फेफड़ों या मस्तिष्क तक पहुँच सकता है. इसके कारण  पक्षाघात (Paralysis), न्यूमोनिया और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है.

चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी से ग्रस्त मरीज़ों में जीवन-मृत्यु का आंकड़ा 50-50 है. इसमें और कोविड में मुख्य अंतर यह है कि ये कोविड की तरह संक्रामक (Contagious) नहीं है अर्थात् ये एक से दूसरे को नहीं हो सकता. 

 

कैसे फैलती है ये बीमारी?

Mucormyete मोल्ड्स के संपर्क में आने से म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis) होता है. ये सूक्ष्मजीव पत्तेखाद के ढेर ( piles of compost), मिट्टीसड़ रही लकड़ी (Rotting wood)  आदि पर पाए जाते हैं. इन स्थानों पर उपस्थित मोल्ड बीजाणु (mold spores) साँस के माध्यम से शरीर में पहुँच सकते हैं. जिसके कारण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system),आंखेंचेहरेफेफड़ोंसाइनस  में संक्रमण विकसित हो सकता है. 
ये कवक (Fungi) कटी या जली हुई त्वचा के माध्यम से प्रवेश करके भी  संक्रमित कर सकता है. ऐसे मामलों मेंघाव या जला हिस्सा संक्रमण का क्षेत्र बन जाता है.

 

किनके लिए हो सकती है, जानलेवा?

इस प्रकार के Molds या कवक (Fungi) सामान्य तौर पर उगते ही रहते हैं पर इसका ये अर्थ नहीं कि हर कोई इस बीमारी से संक्रमित हो जाएगा. इस  संक्रमण की आशंका उनमें सबसे अधिक है जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) किसी बीमारी के चलते या अन्य किसी स्वास्थ्य समस्या के कारण अपेक्षाकृत कमजोर हो. इन लोगों को भी विशेष ध्यान रखने की जरूरत है-

कैंसर/ एचआईवी/ मधुमेह रोगी

जिनका हाल ही में अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) या अन्य कोई शल्य चिकित्सा (surgery) की गई हो 

त्वचा जल गई हो (Burns)
किसी चोट के कारण घाव या cut हो 

लेकिन आमजन को भी सारी सावधानियां अपनाते हुए इससे बचकर रहना है.

 

नई नहीं है ये बीमारी !

सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ ENT सर्जन डॉ मनीष मुंजाल के अनुसार यह बीमारी नई नहीं है. इसे पहले भी कमजोर इम्युनिटी सिस्टम वाले लोगोंवृद्धों तथा डायबिटीज के मरीज़ों में देखा गया है. यदि आप इस श्रेणी में नहीं आते और वे मरीज़ जिन्हें कोविड ट्रीटमेंट में स्टेरॉयड की जरुरत नहीं पड़ीउन्हें अधिक घबराने की आवश्यकता नहीं है. बस अपना ध्यान रखें. 

नेत्र-विशेषज्ञडॉ जिगना कैसर का कहना है, ‘'कोविड से पहलेहज़ार मरीजों में पांच या सात ऐसे मामले देखने को मिलते थेलेकिन कोविड के बाद हज़ार में से बीस मरीज़ों में म्यूकोरमाइकोसिस देखा गया है.

वहीं अहमदाबाद के रेटीना एंड ऑक्यूलर ट्रॉमा सर्जनडॉ पार्थ राणा का भी कहना है कि पहले ये बीमारी पन्द्रह से बीस दिनों में फैलती थी लेकिन अब चार-पांच दिनों में ही मरीज़ की स्थिति गंभीर हो रही है यहाँ तक कि मृत्यु भी. 

 

कैसे पहचानें इस बीमारी को?

मुख्यतः ये बीमारी श्वसन तंत्र (respiratory System) या त्वचा (Skin) के संक्रमण के रूप में विकसित होती है. इसमें खांसीबुखारसिरदर्दनाक बंदसाइनस का दर्द देखने को मिलता है.

त्वचा (Skin) को संक्रमित करने के साथ ही ये शरीर के किसी भी हिस्से में फ़ैल सकती है. अतः त्वचा के कालेपनफफोलेसूजनकोमल हो जानाअल्सर  होने पर जांच करानी चाहिए. 

यदि आपको छींक वाला जुकाम नहीं है. आपकी नाक में पपड़ियाँ निकल रहीं या क्रस्टिंग हो रही है. साथ ही उस साइड के गाल में सूजन है या फिर सुन्न महसूस हो रहा तो तुरंत ही चिकित्सक के पास जाकर जाँच कराएं. आँखों का लाल हो जानाआँखों की रौशनी कम होनाआँखों या गालों में सूजन भी इसके लक्षण हो सकते हैं. 

 वैसे तो ये बीमारी शरीर के किसी भी भाग में हो सकती है पर सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव नाक एवं आंखों के आगे पीछे डालती है. नाक में यह फंगस बहुत तीव्र गति से वृद्धि करता है और तीन से पाँच दिन के अन्दर ही संक्रमण फैलने लगता है. सबसे पहले आंख के पीछेफिर आसपास और फिर ब्रेन में फ़ैल जाता है.  इसका मस्तिष्क तक पहुंचना ही जानलेवा बन जाता है. पर भूलें नहीं कि समय रहते इसका इलाज़ भी संभव है. अतः प्रारम्भिक अवस्था में ही जांच करा लें.

 

बचाव के लिए ये आसान तरीके अपनाएँ 

पूरे शरीर को ढकते हुए कपड़े पहनने चाहिए. 

ये जमीन में होता है अतः उसमें काम करते समय  हमेशा लम्बे शूज पहनकर रहें और त्वचा को मिट्टी के सीधे सम्पर्क में न आने दें.

हवा में भी उपस्थित होता है तो मास्क पहनना न भूलें. 
सफाई का पूरा ध्यान रखें. अच्छी तरह साबुन से हाथ-पैर धोएं. 


किसी भी प्रकार के संदिग्ध संक्रमण के लिए डॉक्टर को दिखाना चाहिए. लैब में टिश्यू सैंपल देखकर म्यूकोरमाइकोसिस का पता लगाया जाता है. इसके उपचार के पहले चरण में Intravenous (IV) एंटिफंगल दवाएं दी जाती हैं और सर्जरी के द्वारा सभी संक्रमित ऊतकों (Infected tissues) को हटा दिया जाता है. अनुकूल प्रतिक्रिया मिलने पर ओरल मेडिकेशन दिए जाते हैं.

 - प्रीति 'अज्ञात'

इसे यहाँ भी पढ़ सकते हैं -

https://www.ichowk.in/society/post-covid-19-threat-mucormycosis-fungal-infection-disease-big-worry-for-corona-patient-what-is-mucormycosis-symptoms-and-treatment/story/1/18933.html

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