रविवार, 26 फ़रवरी 2023

जन्मदिन मुबारक़ अमदावाद!

मीठे नमकीन सा शहर है, अहमदाबाद

गुजरात का दिल यानी अहमदाबाद! 1960 से 1970 तक गुजरात की राजधानी रहने के कारण अब भी लोग इसे ही प्रदेश की राजधानी समझ बैठते हैं। यूँ इस शहर का ठाट-बाट और व्यवहार राजसी ही है। लोग घुमक्कड़ और खाने-पीने के बेहद शौकीन। वो गुजराती ही क्या जिसके घर रविवार को खाना पके। रेस्तरां में 40 मिनट का इंतज़ार भी सुखद है, उस पर पूरा कुनबा साथ हो तो वक़्त का पता भी कहाँ चलता है! उत्तरायण हो तब उंधियु, पूरी, चिक्की और मीठी जलेबियों के बगैर पतंगें आसमान नहीं चूमतीं। उस पर संगीत का साथ और मस्ती का चढ़ा रंग उत्सवों में जैसे भांग ही घोल देता है। दशहरे पर रावण दहन देखने जाओ न जाओ आपकी मर्ज़ी, पर  फाफड़ा जलेबी की दुकानों पर सुबह से लगी लंबी कतारें यह विश्वास दिला देती हैं कि सेनाओं ने आक्रमण की कमान संभाल ली है। खाखरा, ढोकला, खांडवी, हांडवा जैसे सारे सशक्त नाम यहीं के व्यंजनों के हैं। उस पर गुजराती थाली तो अहा! केवल बातों में ही नहीं, यहाँ के तो नमकीन में भी मिठास है।

एक समय था जब आप शहर के किसी भी हिस्से के निवासी हों, पानीपूरी खाने म्युनिसिपल मार्केट जाना तय रहता था।  अब हर सड़क सात-सात फ्लेवर के पानी वाले ठेले लिए सजी दिखती है। पुराने लोग अब भी जसुबेन का पिज़्ज़ा खाते हैं पर नई पीढ़ी, बाज़ार ने लूट ली है। बस एक परंपरा के चलते गुजराती थाली का लुत्फ़ उठाने किसी मेहमान को  गोरधन थाल ले जाया जाता है। यूँ इन थालियों का भी एक बहुत बड़ा बाज़ार लॉन्च हो चुका है। खाऊ गली अब 'हैप्पी स्ट्रीट' बन चुकी है। अशर्फी की कुल्फी अब भी पॉपुलर है। 

यहाँ की सबसे प्यारी बात कि हर घर में झूला झूलने का अवसर मिलेगा लेकिन जरा अपने एडिडास, नाइकी या वुडलैंड के ठसके से बाहर निकल आइएगा क्योंकि घर हो या दुकानचप्पल-जूते  बाहर उतारने का नियम सब जगह लागू है।   

लाड़ले अमदावाद में जीवन रस से परिपूर्ण नवरात्रि के नौ रंग जब सजते हैं तो पता चलता है कि यह त्योहारों को कलेजे से लगाकर चलने वाला शहर है। यहाँ के लोग गरबा में किसी अज़नबी के हाथों में भी डांडिया थमा अपने दिल के घेरे को थोडा और चौड़ा कर देते हैं। नवरात्रि की तैयारी घर के किसी ब्याह सरीखी होती है।  लहंगे (पारंपरिक चनिया) पर घुँघरू, मोती, सितारे टंकते हैं। कच्छी कढ़ाई वाला डिजाइनर ब्लाउज़ (चोली) बनता है। नौ दिन के हिसाब से मोजरी, दुपट्टा, गहने, टीका, बिंदिया सब चाहिए होता है। तभी तो लॉ गार्डन की कच्ची जमीन पर लगी पारंपरिक चनिया-चोली की तमाम दुकानों ने अब विकास का पक्का रंग ओढ़ लिया है। यूँ दाम बढ़ाकर आधे-पौने में देने का सिलसिला अब भी जारी है। वो तो भला हो, दूर देश से आए एनआरआई समूहों का, जो अब भी इनके चेहरे पर रौनक़ें भर जाते हैं।  

कभी बाढ़ का तांडव, कभी भूकंप का भीषण, भयावह मंज़र तो कभी लाशों के ढेर पर सिसकते, दंगों की आग से झुलसते  इस शहर को देख एक स्वप्न बिखरता सा भी लगता है। लेकिन उसके बाद सहायता हेतु बढ़ते हाथ और संवेदनशीलता, मृतप्रायः उम्मीद को पुनर्जीवित कर देती है। यहाँ के लोग जूझने, उठने और फिर चल पड़ने की जिजीविषा से लबरेज़ हैं। अहमदाबाद और उल्लासये दोनों संग-संग ही चलते  हैं सदा।

इस शहर में मेरा पहला दिन का और आज बाईस साल बाद का अहमदाबाद! यक़ीनन बहुत कुछ बदल गया है। पहले जो गलियाँ थीं, अब चार लेन वाली चौड़ी सड़कों का रूप धर इतराने लगी हैं। वो मॉल जो तब नए-नए खुले थे और जिन्हें बस देखने भर के लिए या एस्केलेटर का आनंद उठाने के लिए मन मचलता था, अब वहाँ बस फ़िल्में ही चलती हैं। जिन स्थानों को देख पहले आँखें भौंचक हो जाया करतीं थीं, अब उनसे जी ऊब सा गया है।

बढ़ती जनसंख्या ने मेट्रो की जरूरत ईज़ाद की तो शहर को खुदते रहने का श्राप ही मिल गया है जैसे। लोग बढ़े तो वाहन भी उसी अनुपात में जगह घेरने लगे। फ्लाईओवर का जाल इस समस्या का समाधान बन उभरा अवश्य लेकिन क्या इससे ट्रैफिक की समस्या हल हुई? तो बिल्कुल नहीं! एक परियोजना पूरी होती नहीं कि तब तक सारा अनुपात गड़बड़ा चुका होता है। 

कभी शहर के बाहरी इलाके कहे जाने वाले गाँव बोपल, घुमा, शिलज, शैला, थलतेज़ और इन जैसे कई अब लंबी दौड़ लगाते हुए शहर के हो गए हैं। इन्हें देख खुश होना चाहिए था लेकिन जिन जंगलों को रौंद इन्होंने कंक्रीट की चादर ओढ़ी है, उस हरियाली की अनुपस्थिति अवसाद से घेर लेती है। जरा बारिश क्या हुई कि बाढ़ का खतरा मँडराने लगता है। पक्की धरती पानी सोखती नहीं क्योंकि यह काम तो शुरू से माटी के जिम्मे रहा है। जब जंगल नहीं रहे तो माटी की भला क्या ही बिसात थी! छोटे पक्षियों ने तो गुजर-बसर के आसरे ढूँढ लिए लेकिन मोर, बंदर, लंगूर की मुश्किलें कम नहीं होतीं। ये अब भी अपने घरों को ढूँढते वहाँ जा पहुँचते हैं जहाँ मनुष्य दस्तावेज दिखा इन्हें भगा देता है। इनके घरों पर कब्ज़ा कर लिया गया है। 

शराबबंदी का सच

ड्राइ स्टेट होने के कारण यहाँ शराब नहीं मिलती, ऐसा नहीं है। जुगाड़ू लोग सफ़लता प्राप्त कर ही लेते हैं लेकिन अच्छी बात यह है कि यहाँ खुलेआम देशी, विदेशी ब्रांड की दुकानें और उनके बाहर लहराते लोग नहीं दिखते। नशे में गाड़ी चलाने वाले किस्से और उनसे जुड़े अपराध न्यूनप्रायः हैं। अन्य कई राज्यों की अपेक्षा यहाँ की स्त्रियाँ स्वयं को अधिक सुरक्षित अनुभव करती हैं। गाली कल्चर भी उतना नहीं कि सुनकर कानों से खून ही बहने लगे।

साबरमती का सलौना रूप

साबरमती किनारे बने नए नवेले रिवरफ्रंट ने युवा दिलों को धड़कने की एक नई जगह मुहैया करा दी है। यूँ यहाँ के तोते और कबूतर हर उम्र की मोहब्बतों के साक्षी हैं। लेकिन यहाँ की सुंदरता में खोते हुए भी यह क़सक मिटती नहीं कि इसे बनाते समय धोबियों, कलमकारी, माता नी पछेड़ी तथा ब्लॉक प्रिंटिंग से जुड़े कलाकारों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकी! इनका तो पूरा व्यवसाय ही इस नदी के बहाव पर निर्भर था। 

सुकून चाहिए?

सुकून के कुछ पल गुजारने के लिए आज भी अपने बापू के साथ से बेहतर कुछ नहीं। साबरमती आश्रम में पूरा दिन बहुत ही श्रद्धा और शांति से गुजारा जा सकता है। यहाँ का सुरम्य, पवित्र  वातावरण आपको बारम्बार आमंत्रित करता है। सकारात्मक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र है यह। लगभग यही आभास हथीसिंह मंदिर और अमदावाद   नी गुफा में भी होता है पर हरियाली के मामले में ये मात खा जाते हैं। 

धरोहरों से मुलाक़ात

यहाँ की वास्तुकला में इस्लामी और हिंदू शैली का अनूठा, अद्भुत मेल है। पुराने शहर और पोल जीवन से रूबरू होना हो तो दो घंटे की हेरिटेज वॉक यह इच्छा पूरी कर देती है। वाव माने ताल तलैया नहीं बल्कि कलात्मकता का बेजोड़ नमूना होता है, यह मैंने अडालज की वाव देखकर ही जाना। जब धरोहरों की बात चल ही रही है तो कर्णावती यानी अपने अमदावाद के पुराने शहर स्थित सिद्दी सैय्यद की जाली का ज़िक्र जरूरी है। यह एक मशहूर मस्जिद है। वास्तुकला की इस उत्कृष्ट धरोहर की नक्काशीदार जाली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसमें पत्थर की खिड़कियां, एक पेड़ की शाखाओं को आपस में जोड़े हुए दर्शाती हैं, जिसे 'द ट्री ऑफ लाइफ' के नाम से जाना जाता है। जो इस शहर में आता है, इसकी तस्वीर लेना नहीं भूलता। इसमें निहित संदेश भी आत्मसात कर ले तो बात ही क्या! ऐतिहासिक इमारतों में सारखेज़ रोज़ा, जामा मस्जिद भी दर्शनीय है। सिंधु घाटी सभ्यता का महत्वपूर्ण शहर और मिनी हड़प्पा कहा जाने वाला लोथल इस शहर में तो नहीं लेकिन यह और अक्षरधाम अपना ही लगता है।

चाय संग घुमक्कड़ी

चयक्कड़ों के दिल लूटने के लिए विश्व का पहला किटली सर्कल है यहाँ! अख़बार नगर सर्कल में, आग की लपटों से घिरे केतली के इस विशाल एवं प्रभावशाली मॉडल को देखा जा सकता है.  एक तस्वीर खींचिए, फिर चाय पीने के लिए कहीं और का रुख कीजिए। घुमक्कड़ों के लिए पूर्व के मैनचेस्टर कहे जाने वाले इस शहर में टेक्सटाइल का केलिको संग्रहालय है। कुतुबउद्दीन एबक द्वारा बनवाई गई कांकरिया झील और गलबहियाँ करता सामने बना चिड़ियाघर बच्चों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। इसके अलावा इस्कॉन मंदिर, भद्र किला, हिलती मीनारें, साइंस सिटी, वैष्णो देवी है। शहर से थोड़ा आगे बढ़ें तो नालसरोवर के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने और विलुप्तप्राय: प्रजातियों के पक्षियों से मिलने का आनंद भी उठाया जा सकता है।

आसमान की छत तले थिएटर का मज़ा 

वर्तमान समय में भले ही मल्टीप्लेक्स ने सोफ़े पर लेटते हुए फ़िल्म देखने की सुविधा उपलब्ध करा दी हो लेकिन तारों भरी रात में अपनी दरी, चटाई पर तकिये से टिके हुए फ़िल्म देखने का आनंद ही कुछ और है। ठंडी बयार बह रही, बगल में टोसा, हाथ में गरमागरम चाय और सामने एशिया की सबसे बड़ी स्क्रीन में से एक पर आपकी पसंदीदा फ़िल्म चल रही। जीने को और क्या चाहिए! 'सनसेट ड्राइव-इन-सिनेमा' आपको श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली ध्वनि से सजी इसी अद्भुत दुनिया में ले आता है। जी चाहे, तो दरी उठाकर वहीं कार में ही बैठ जाइए। 

कब्रों के बीच बैठ चाय नाश्ता किया है कभी?

नहीं किया तो लाल दरवाजा के पास स्थित न्यू लकी रेस्टोरेंटमें चले आइए। 12 कब्रें हैं और उन्हीं के इर्द गिर्द टेबल और बेंच लगाकर बैठने की समुचित व्यवस्था है। यहाँ की दीवारें मक़बूल फ़िदा हुसैन और उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की उपस्थिति की साक्षी हैं। हुसैन जी का तो इस स्थान से लगाव ही इतना था कि यहीं बैठ उन्होंने एक पेंटिंग बनाई और इस रेस्टोरेंट को उपहार में दे दी। वह पेंटिंग अभी भी यहाँ सुसज्जित है। 

जब रेस्तरां ही घूमने लगे!

जी हाँ, अहमदाबाद में घूमने वाला पतंग रेस्तरां भी है। इसकी डिजाइन पक्षियों को दाना खिलाने वाले चबूतरे से प्रेरित है। यह अपनी तरह का एक रेस्तरां है जो  90 मिनट में 360 डिग्री का चक्कर पूरा करता है। यह धीरे-धीरे घूमता है ताकि आप  डिनर करते हुए  पुराने और नए शहर  को देख सकें।

है न, अद्भुत, अकल्पनीय, अलौकिक આપણું અમદાવાદ!

प्रीतिअज्ञात

'आउटलुक' हिन्दी के 31 अक्टूबर 2022 अंक में प्रकाशित (शहरनामा: अहमदाबाद) 

'आउटलुक' के डिजिटल संस्करण में भी इसे पढ़ा जा सकता है -

https://www.outlookhindi.com/story/shaharnama-ahmdabad-by-preeti-agyat-3744?fbclid=IwAR3xWaNDeWC3GQSPmLzU8h0KJK4gZugOPix0GPEnc7DxONpK_NC6pj-vbkc

#आउटलुक #amdavad #अहमदाबाद #PreetiAgyaat #प्रीतिअज्ञात #जन्मदिनमुबारक़अमदावाद #Happybirthdayahmedabad 

विज्ञान और अध्यात्म, राजनीति का विषय नहीं!

‘विज्ञान के चमत्कार’ एक ऐसा विषय है जिस पर प्रायः सभी ने अपने विद्यालयीन जीवन में निबंध अवश्य लिखा होगा। बिजली के बल्ब के अविष्कार से लेकर अलेक्सा तक की यात्रा अचरज़ से भर देती है। वह समय जहाँ चिट्ठियों की प्रतीक्षा भी जीवन का सुख था और मन के तार से दो व्यक्ति जुड़ जाया करते थे, वहाँ एक दिन फोन की घंटी बजने लगी। फोन घरों में आया तो कई बार हँसी में यह भी कह दिया जाने लगा कि सामने वाले का चेहरा भी दिख जाए तो कितना अच्छा हो! लेकिन फिर स्वयं ही अपने इस ख्याल के सिर पर चपत मार खिलखिला उठते कि “ऐसा भी कभी हो सकता है भला! विज्ञान बहुत कुछ कर सकता है पर ये थोड़े ही न संभव है!” लेकिन तकनीक का कमाल देखिए कि तब जो कल्पनातीत था, आज वहाँ व्हाट्स एप है, वीडियो कॉल के तमाम माध्यम हैं। हम अब कृत्रिम बौद्धिकता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और आभासी दुनिया (मेटावर्स) के युग में प्रवेश कर रहे हैं। है न बिल्कुल परीलोक या किसी जादूगर की कहानी जैसा!

कहाँ तो रोशनी के लिए बल्ब के स्विच को ऑन करने के लिए उठना पड़ता था, अब लेटे-लेटे ही अलेक्सा को कह दिया जाता है। घर से बाहर निकलो तो पूरे शहर का नक्शा एक क्लिक पर साथ चलता है। जिस रास्ते को समझने के लिए दसियों जगह रुकना होता था, अब जीपीएस से पल भर में ज्ञात हो जाता है। यह वही विज्ञान है जिसने हमारी सुख-सुविधा हेतु वह सब बनाकर दिया जिसने मनुष्य का जीना अत्यंत सरल कर दिया, लेकिन ध्यातव्य हो कि घातक हथियार और परमाणु बम भी यही बनाता है। अब उससे रक्षा होगी या विध्वंस, यह प्रयोग करने वाले पर निर्भर करता है। तात्पर्य यह कि चमत्कार का प्रयोग कैसे किया जाता है, यह प्रयोगकर्ता की विचारधारा, बुद्धि और मानसिकता पर आधारित है। विज्ञान का काम तो सदा सृजन ही है, इसलिए इसने सब कुछ कल्याणकारी ही किया। यही कारण है कि किसी को बरगलाने का कार्य इससे न हुआ। किसी वैज्ञानिक ने स्वयं को ईश्वर के समकक्ष न रखा बल्कि खुलकर अपनी खोज की विधि बताई और सिद्धांत भी प्रतिपादित कर दिया जिससे आने वाले समय में उससे मार्गदर्शन भी प्राप्त हो सके।

कुल मिलाकर विज्ञान, विकास का पूर्णतः पक्षधर है और ईमानदारी तथा स्पष्टवादिता इसका सर्वश्रेष्ठ गुण है। कहीं कोई प्रयोग गलत भी हुआ तो कुछ वर्षों बाद किसी अन्य वैज्ञानिक द्वारा उसका संशोधित रूप भी हृदय से स्वीकार हुआ। लैमार्कवाद के ‘उपार्जित लक्षणों की वंशागति के सिद्धांत’ में कमी लगी तो सहज भाव से डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ को माना जाने लगा क्योंकि उसके तर्कों से सहमति बनी।

अतिशय चमत्कारी होते हुए भी विज्ञान, भ्रम और माया से स्वयं को कोसों दूर रखता है। दुर्भाग्य यह कि जब भी संकीर्णता, कुंठा और स्वयं को महाशक्तिमान समझने वाले व्यक्तियों के हाथ यह लगा, इसने विध्वंस ही किया। अध्यात्म भी ठीक ऐसा ही सृजनकारी है, यह आपको सत्कर्म एवं शांति की ओर प्रेरित करता है। गहराई से इसमें उतरो तो चमत्कार और गलत हाथों में गया तो कोरा ढोंग और शोर ही बनकर रह जाएगा।

ध्यान से देखें तो विज्ञान और अध्यात्म की दुनिया एक ही हैं। दोनों ही मानव कल्याण के पक्षधर हैं। ये परस्पर विरोधी नहीं अपितु सच्चे साथी हैं। एक आपको बाहरी दुनिया से जोड़ता है और दूसरा भीतरी अंतरात्मा तक ले जाता है। दोनों ही तार्किक ज्ञान की ऊर्जा से संचालित होते हैं। इनका लक्ष्य भी एक ही है, मानव का भौतिक और आत्मिक सुख। दोनों ज्ञान के रास्ते से बढ़ते हैं और परम की ओर ले जाते हैं। परंतु जब भी ये निम्न मानसिकता और संकीर्णता में घिर स्वार्थी हुए, मानो विनाश की रूपरेखा तय हुई। फिर उस मार्ग पर सुख के सारे द्वार बंद हो जाते हैं और उससे उत्पन्न हुआ अंतर्द्वंद्व एवं कोलाहल सब कुछ नष्ट कर देता है।

यही कारण है कि जब हम विज्ञान और अध्यात्म को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर उनकी सच्चाई परखने लगते हैं, तब परेशानी उत्पन्न होती है। जबकि उद्देश्य की दृष्टि से ये दोनों ही आपको सकारात्मक जीवन की ओर ले जाते हैं। यद्यपि उत्तम परिणाम और विकास के लिए आवश्यक है कि इनका प्रयोग करने वालों के हृदय में कोई खोट न हो अर्थात उनकी नीयत साफ़ और राजनीति से परे हो। इसे उनकी भाषा और व्यवहार से स्पष्टतः समझा जा सकता है।

सार यह कि विज्ञान हो या अध्यात्म, इसी दुनिया में पनपे और हमारी सुख शांति इनके संतुलन में ही निहित है। जो इस संतुलन में अड़चन लाए या अनर्गल तथ्य फैला वातावरण को अशांत करने का प्रयास करे, उसे संदेहास्पद और मानवता का दुश्मन समझिए।

एक बात और कि कोई बाबा को माने या विज्ञान को, यह मलीन राजनीति का विषय क़तई नहीं है। बल्कि दोनों ही स्थितियों में यह व्यक्ति विशेष की पसंद, श्रद्धा, विश्वास और अटूट आस्था का नितांत व्यक्तिगत मसला है। इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर दिन-रात उछाला जाएगा तो राजनीतिक हित भले ही सध जाए लेकिन इसकी आड़ में कई ढोंगियों को प्रश्रय मिल जाएगा और देश के विकास की गाड़ी एक स्टेशन पीछे चली जाएगी। यूँ भी देश में कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जो ध्यानाकर्षण की बाट जोह रहे।

चलते-चलते: फरवरी माह में हम ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाते हैं। इस वर्ष का विषय है- वैश्विक खुशहाली के लिए विज्ञान। उद्देश्य है वैश्विक संदर्भ में जागरूकता पैदा कर, वैश्विक एकीकरण का अवसर प्रदान करना। जब उद्देश्य इतना विशाल है तो युद्ध के साये में जीती इस दुनिया को भी ‘मेरा तेरा महान’ की गलियों से बाहर निकल प्रेम और सभ्यता से साथ चलना सीख लेना चाहिए।

 प्रीति अज्ञात

'हस्ताक्षर' फरवरी 2023 में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/science-and-spirituality-are-not-a-matter-of-politics-editorial-by-preeti-agyaat/

#संपादकीय #Preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका


कंझावला की घटना अंतिम नहीं है

इतनी देर रात घर से बाहर क्या करने गई थी?

होटल में कमरा क्यों बुक कराया था?
लड़की चरित्रहीन थी।
उसने शराब पी रखी थी।

ये वे वाक्य हैं जो खुलकर एक लड़की की दर्दनाक मृत्यु के बाद उछाले जा रहे हैं। इनके पीछे  का अर्थ समझ रहे हैं न! यदि वह चरित्रहीन थी, उसने शराब पी रखी थी और देर रात होटल में ठहरी तो काहे का बवाल! नाम कोई भी हो, ऐसी लड़कियाँ तो मारी ही जाती हैं! यही सोच है जो न्याय व्यवस्था की लचरता को बढ़ाती है। वे लड़कियों को सलाह देने से नहीं चूकते क्योंकि लड़के तो कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं पर लड़कियाँ अपनी रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं लें।

लेकिन यदि मृतक पुरुष होता तो क्या ये प्रश्न पूछे जाते?

नहीं न! लड़कों से कौन ऐसे प्रश्न करता है! यह सब करना तो उनका अधिकार है। लडकों का कार्यक्रम तो किसी चैनल या पोर्टल ने नहीं बताया। वे तो एन्जॉय करेंगे ही न! उनको चरित्र प्रमाण पत्र देने का कष्ट कोई क्यों उठाए? उन्हें तो खुली छूट है कि सारी रात सड़कों पर घूमें। लड़कियों को कुचलें और अनजान बन कई किलोमीटर तक गाड़ी से घिसटाते हुए मार डालें। उनकी रक्षा करने वाले नेताजी बगल में बैठे ही हैं। उनके घर की लड़की तो थी नहीं कि संवेदनाओं का एक क़तरा भी बाहर आए!

तो क्या अब लड़कियों की इस तरह की मृत्यु को न्यायसंगत मान लिया जाए?

क्या उसकी मित्र दोषी है

इस विषय पर न्यायाधीश बनकर बोलना अभी सही नहीं है क्योंकि उस पर क्या बीती , ये हमें नहीं पता। लेकिन प्रथम दृष्ट्या वह इस बात की दोषी प्रतीत होती है कि उसने इस घटना की सूचना नहीं दी। यदि आपातकालीन नंबर पर ही फोन लगा दिया होता तो अंजलि को बचाया जा सकता था। दुर्घटना के समय किसी का भी घबराना, डरना स्वाभाविक है लेकिन यदि सामने आपका साथी गाड़ी के पहिए में फंसा दिखाई दे और आप उसे, उसी हाल में छोड़ घर चले आएं तो यह दुखद एवं अमानवीय कृत्य है। यद्यपि जिस तरह का संवेदनहीन समाज इन दिनों फलफूल रहा है, वहाँ यह व्यवहार उतना आश्चर्यजनक भी नहीं लगता।

अचरज़ की बात

आश्चर्यजनक कुछ है तो यह वक्तव्य कि गाड़ी में सवार लोगों को पता ही नहीं चला कि उसमें एक जीता-जागता इंसान फंस गया है। एक लड़की ने कई किलोमीटर तक घिसट-घिसट लहूलुहान हो दम तोड़ दिया, उसके कपड़े फट गए, फेफड़े बाहर आ गए  और अंदर बैठे राजकुमारों को पता तक न चला! इसे सपोर्ट करने को एक सिद्धांत सामने आया कि वे नशे में थे। अच्छा! फिर गाड़ी कैसे सुरक्षित चलती रही?

गाड़ी नहीं रुकती क्योंकि किसी को कुछ सुनाई ही नहीं दिया। क़माल है! दिन के समय भरी सड़क पर चलते वाहन में एक पत्ता भी फंस जाए तो न केवल ड्राइवर बल्कि अंदर बैठे सभी सवारों को उसकी खड़खड़ाहट सुनाई देती है। लेकिन यहाँ देर रात, सुनसान सड़क पर भी उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया होगा? जबकि सन्नाटे में तो पानी की गिरती बूंद भी शोर लगती है। स्पष्ट है, अब उनके नेताजी फंसे हैं तो कान में रुई डालकर ही बैठना होगा।

अपने आकाओं को बचाने के लिए कई कुतर्क भी गढ़े जाएंगे। लेकिन पुलिस, सड़क सुरक्षा और सीसीटीवी कैमरा पर उठे प्रश्नों को तब भी दबा ही दिया जाएगा।

समाज के रटे रटाए पाठ और अपराधियों के बढ़ते हौसले

कंझावला की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। लड़कियों के साथ विभिन्न तरह के अपराध की दसियों भयावह घटनाएं प्रतिदिन हर शहर में होती हैं। तेजाब डालने की घटना के बाद, ‘तेजाब मत बेचो’ की मांग उठती है। इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है लेकिन यह बोतल उतनी ही सरलता से उपलब्ध हो जाती है जैसे ड्राई स्टेट में अल्कोहल। क्या इससे अपराध रुक जाएंगे? फिर तो मारपीट, हत्याओं को रोकने के लिए चाकू मत बेचो, डंडे, बैट मत बेचो।

लड़ना मानसिकता से है। नागरिकों को शिक्षित, सभ्य मनुष्य बनाना है। यह भी हो कि अपराध करते समय उनके भीतर सजा का इतना भय व्याप्त रहे कि वे गलत कार्य का दुस्साहस ही न करें। पर सारा कष्ट यही करने में तो है।

लड़कियों को सिखाया जाएगा कि ऐसे दोस्तों से बचकर रहो। देर रात मत निकलो। देह को पूरी तरह ढके हुए वस्त्र पहनकर चलो। लेकिन ऐसी मानसिकता में सुधार करने की आवश्यकता किसी को महसूस नहीं होगी जो लड़कों के हौसले बुलंद करती है। न ही अपराधियों को इस तरह से दंडित किया जाएगा कि लगे कोई न्याय हुआ है। हाँ, हर घटना के बाद ज्ञान पूरा दिया जाता है, निंदा भरपूर होती है, कड़े फ़ैसले लेने का आह्वान होता है लेकिन परिणाम के नाम पर जीरो बटा सन्नाटा ही सामने आता है।

चैनलों का महाभारत

चैनलों का किस्सा और भी अनूठा है। न्यूज चैनल अब विशुद्ध मनोरंजन परोसने वाले बन चुके हैं। इनका काम सूचना देना नहीं बल्कि सुविधानुसार एक तय सोच दर्शकों को थमाना है। किस घटना को दबाना और किसे बढ़ा-चढ़ाकर बताना है, ये इनके मालिक तय करते हैं। इसका समाज पर क्या और कितना प्रतिकूल असर पड़ेगा इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। यहाँ चर्चा में, चुन-चुनकर वही लोग बैठाए जाते हैं जिनसे आग  भड़कती रहे, भले ही हल कोई न निकले। विषय कोई भी हो, कैची टाइटल और बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ हुई ‘निष्पक्ष’ चर्चा में सभी दलों के प्रवक्ताओं को बुलाकर बिठा लिया जाता है। फिर मासूम एंकर कहती हैं कि यह संवेदनशील विषय है कृपया राजनीति न करें! अरे! राजनीति करने को ही तो ऐसे नेताओं को आमंत्रित किया गया है, जिनका विषय से कोई लेना-देना ही नहीं! ये केवल यही बोल सकते हैं कि जहाँ हमारी सरकार है वहाँ तो अपराध के आँकड़े कम हैं। उन्हें इस बात से कोई अंतर ही नहीं पड़ता कि किसी बेटी की जान गई, एक माँ ने अपने जिगर के टुकड़े को खो दिया, एक घर को चलाने वाला मार डाला गया।

मृतक के बदले, धनराशि और नौकरी का लालच देकर मुँह बंद किए जाने की प्रथा यूँ भी समाज में ‘सराहनीय’ मानी जाती रही है। उस भीषण, अकल्पनीय, असह्य पीड़ा से किसी को क्या करना और उसके बारे में क्या ही सोचना जो एक लड़की ने अपने शरीर को टुकड़ा-टुकड़ा समाप्त होते देख सही होगी! सड़क पर बिखरा खून भी धुल जाएगा और तत्काल हिन्दू-मुस्लिम का कार्ड खेलती एक नई कहानी मार्केट में लॉन्च कर दी जाएगी जिससे जनता शीघ्र ही यह घटना भूल जाए। आँख बंद कर सोचिए कि बीते माह की घटनाओं में कितनों को न्याय की उम्मीद शेष है! नाम भी याद न होंगे।

मासूम जनता क्या करे!

जनता भूल ही जाएगी! कोई एक किस्सा हो तो याद रखे न! जब दिन -रात लूट, हत्या, बलात्कार एवं अन्य अपराधों के सैकड़ों मामले सामने आते रहें तो कौन, कितना याद रखेगा भई! जब अपनी बारी आएगी, तब बोलेंगे, चीखेंगे और दीवारों पर सिर मार इस व्यवस्था को कोसेंगे जिससे न्याय की उम्मीद करना इस सदी का सबसे बड़ा मजाक होगा!

कहने को ‘न्याय व्यवस्था’ है लेकिन इसमें चहेतों अर्थात अपनी टोली को न्याय देने की ही व्यवस्था है। आम जनता पिसी है, पिसती रहेगी। मरी है, मरती रहेगी। अच्छे दिनों की यही परिभाषा है कि सच न बोलिए, जो हो रहा है उसे रामराज्य समझ हाथ जोड़ लीजिए। चुप रहिए और नववर्ष की शुरुआत में मनहूस बातें बोल किसी का दिमाग और वर्ष खराब न कीजिए। उन्हें पार्टी करनी है, करने दें। डिस्टर्ब न कीजिए। जब नशा उतरेगा तो होश भी आएगा, लेकिन प्रश्न यह है कि नशा उतरेगा कैसे? जब उसे चढ़ाने वाली भी ये जनता ही है।

चलते-चलते: अभी तो हम अभिव्यक्ति के रंगों में डूबे हुए हैं। किसी ने केसरिया थाम गर्व किया है तो किसी ने हरा! लेकिन विश्वास रखिए इनके मध्य का श्वेत वर्ण गणतंत्र दिवस के दिन अपनी सम्पूर्ण आभा लिए अवश्य दिखाई देगा। जी भरकर देख नमन कीजिएगा उसे। क्योंकि नेताओं को तो बस अपने रंग ही दिखाई देते हैं। लेकिन हमें तो केवल हमारे तिरंगे को ही अपना मानना है। यही देश को जोड़ता है। यह मृत्यु और अपराध की गंभीरता को रंगों से नहीं तौलता। हमें इसके तीनों रंगों को दिल में बसा, उन सबको करारा जवाब देना है जो जोड़ने की बजाय तोड़ने को अपनी विजय मान अकड़ते घूमते हैं।

जय भारत!

- प्रीति अज्ञात

'हस्ताक्षर' जनवरी 2023 में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/1kanjhaavala-kee-ghatana-antim-nahin-hai5182-2editorial-by-preeti-agyaat/

#संपादकीय #Preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका



निर्भया के 10 साल बाद, कितनी निर्भय हैं स्त्रियाँ?

 

16 दिसंबर 2021 की एक घटना पुनः लिख रही हूँ जिसमें एक व्यक्ति कहता है “एक कहावत है कि यदि आप रेप रोक नहीं सकते हैं तो लेटो और मजे लो!” यह सुनकर सामने कुर्सी पर बैठा तथाकथित सम्माननीय व्यक्ति ठहाका लगाने लगता है और फिर उसका साथ देने को इस हँसी में अनगिनत भद्दी आवाजें शामिल हो जाती हैं। यह किसी C- ग्रेड फ़िल्म की पटकथा नहीं बल्कि कर्नाटक विधानसभा से प्रसारित निर्लज्जता की जीती जागती तस्वीर थी। हाँ, हम स्त्रियाँ फिर एक बार इस अश्लील हँसी पर शर्मिंदा हुईं थीं, जो गाहे-बगाहे हमारे कानों में अक्सर पड़ती ही रहती है। इन आदमियों और संभावित बलात्कारियों के बीच में कितना अंतर था, यह आप तय कीजिए! मैं इतना ही बताना चाहूँगी कि उस दिन निर्भया कांड की बरसी थी! पर इन मरी हुई आत्माओं को इससे भी क्या ही लेना-देना रहा होगा!

निर्भया कांड (16 दिसंबर 2012) अर्थात वह वीभत्स और क्रूरतम घटना जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। प्रतिक्रिया स्वरूप देश भर में धरने और जन आंदोलन हुए। इस उभरे आक्रोश के चलते बलात्कार से जुड़ी, कानून की कई धाराओं में परिवर्तन किये गए। गलत तरीके से छेड़छाड़ एवं अन्य प्रकार के यौन शोषण को भी इन धाराओं में सम्मिलित किया गया। फास्ट ट्रैक कोर्ट की आवश्यकता महसूस की गई जिसमें फैसला आने में अपेक्षाकृत कम समय लगता है। इसी वर्ष ही लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण हेतु पॉक्सो एक्ट 2012 अस्तित्व में आया। साथ ही जुवेनाइल जस्टिस बिल भी पास हुआ।

कहने को तो निर्भया के अपराधियों को 20 मार्च 2020 को फ़ांसी की सजा मिली लेकिन अब जबकि इस माह उस अमानवीय घटना के दस वर्ष पूर्ण हो रहे हैं तो मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा है कि निर्भया के 10 साल बाद, कितनी निर्भय हैं स्त्रियाँ?

सतही तौर पर तो तस्वीर उजली ही नज़र आती है पर जरा यह भी जान लें –

क्या कहते हैं आँकड़े?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की इस वर्ष (2022) जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं के विरुद्ध अपराध की दर जो  कि 2020 में 56.5% थी, 2021 में वह बढ़कर 64.5 % हो गई है। यह दर प्रति 1 लाख जनसंख्या पर घटनाओं की संख्या के आधार पर निकाली जाती है।

इसके अनुसार वर्ष 2020 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 3,71,503 मामले सामने आए थे जबकि 2021 में 4,28,278 मामले पंजीकृत किए गए। इसमें बलात्कार की पंजीकृत घटनाओं में 13% वृद्धि हुई है। वर्ष 2020 में यह संख्या 28,046 थी जो कि वर्ष 2021 में बढ़कर 31,677 हो गई है।

महिलाओं के प्रति अपराध के इन दर्ज़ आंकड़ों में 7.40% बलात्कार, 17.66% अपहरण, 20.8% हमले तथा 31.8%पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं।

पंजीकृत अपराध की सूची में घरेलू हिंसा, अपहरण, हमला, हत्या, बलात्कार आदि सम्मिलित होते हैं।

आपको याद होगा कि 2020 में यह कहा जा रहा था कि कोविड के चलते घरेलू हिंसा में भी वृद्धि हुई है। लेकिन बढ़े हुए आँकड़े स्पष्ट बता रहे कि कोविड महामारी के बाद भी स्थिति निराशाजनक ही है।

कानून में परिवर्तन के बाद क्या अपराधी डरे?

क़तई नहीं! जिस तरह से नित नई घटनाएं सामने आ रही हैं उसे देख यह कहीं से नहीं लगता कि अपराधियों के अंदर पकड़े जाने या सजा को लेकर कोई भय है। बल्कि उन्हें तो कानून की लचरता और कच्छप गति पर दृढ़ विश्वास ही होगा जिसके सहारे हाल ही के दिनों में बलात्कारियों को रिहा कर दिया गया। यह क़माल ही है कि अपराध हुआ है पर अपराधी कोई नहीं! यह न्याय व्यवस्था का कितना कमजोर पक्ष है कि अपराधी, अपनी गलती स्वीकार भी कर ले, तब भी अदालतों में वर्षों तक केस घिसटता है। कितनी ही बार पर्याप्त साक्ष्य और साक्षी के न मिलने से दुर्दान्त अपराधी भी बच निकलता है।

पेशेवर अपराधी की तो बात ही अलग है लेकिन दुर्भाग्य से इस समय हम ऐसे पाशविक, जघन्य और बर्बरतापूर्ण व्यवहार के साक्षी भी बन रहे हैं जिसने अमानवीयता की सारी सीमाएं लांघ ली हैं। उससे भी अधिक आश्चर्य यह कि ये आम दिखने वाले ऐसे लोग हैं जिनकी क्रूरता का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते!

*हाल ही की घटनाएं लें तो बिहार के कैमूर जिले से एक बेहद शर्मनाक  समाचार सामने आया है। इसमें एक नाबालिग छात्रा के साथ कुछ लड़कों ने दुष्कर्म किया। विद्यालय के प्रधानाध्यापक को गुजरते देख छात्रा ने बचाने की गुहार लगाई लेकिन उस शैतान ने भी उसके साथ दुष्कर्म किया।

*दिल्ली में एक महिला ने बेटे के साथ मिलकर, अपने पति की हत्या कर दी और फिर दोनों रोज अलग-अलग स्थानों पर उसके टुकड़े फेंकते रहे। यह ठीक श्रद्धा हत्याकांड जैसी ही घटना थी लेकिन सुर्खियों में नहीं छाई क्योंकि यहाँ सनसनी फैलाने को कोई आफ़ताब नहीं था।

*आजमगढ़ में प्रिंस यादव नाम के युवक ने गला दबाकर, प्रेमिका आराधना प्रजापति की हत्या कर दी। उसके बाद लाश के पांच टुकड़े कर कुंए में फेंक दिए। क्योंकि प्रिंस के विदेश जाने के बाद लड़की ने कहीं और शादी कर ली थी। अब वह उस पर शादी को खत्म करने का दवाब बना रहा था।

*शहडोल जिले के करोंदिया गांव निवासी राम किशोर पटेल ने अपनी पत्नी सरस्वती पटेल की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी। उसके बाद उसका सिर और धड़ अलग-अलग स्थानों पर गाड़ दिया। कारण अवैध संबंध का संदेह बताया गया।

*मथुरा के पास यमुना एक्सप्रेस-वे पर सूटकेस में एक लड़की आयुषी चौधरी की लाश मिली जिसे उसके पिता ने ही मारकर फेंक दिया था। मामला ऑनर किलिंग का था।

*नवम्बर माह में ही एक और ऐसी घटना हुई जिसमें जबलपुर स्थित मेखला रिसोर्ट में एक युवक अभिजीत पाटीदार ने अपनी प्रेमिका शिल्पा झरिया की हत्या कर दी। बाद में उसी के सोशल मीडिया अकाउंट  का प्रयोग करते हुए, एक वीडियो बनाकर डाला। इसमें उसने लड़की पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया।

ये मात्र नवम्बर माह की घटनाओं की बानगी भर है, सूची अंतहीन है। तनिक विचारिए कि मीडिया का ध्यानाकर्षण केवल एक ही स्टोरी ने क्यों किया? क्या बाकियों के लिए न्याय की कोई उम्मीद नज़र आती है? अपराधी कितना डरे, उत्तर हमारे पास है।

कितना बदला समाज का रवैया?

न्यायिक व्यवस्था से असंतुष्ट होने के कारण बीते कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं  सामने आईं, जहाँ जनता ने ही अपराधी को दंड देना तय कर लिया और ‘मॉब लिंचिंग’ जैसे घातक शब्द का उदय हुआ। इस आदिम व्यवहार और मानसिकता का लाभ लेने में राजनीतिज्ञों ने जरा भी देर नहीं की और अपराधों का हिन्दू-मुस्लिमीकरण कर उन्हें अपने हित में साधना प्रारंभ कर दिया। किस मामले को कितना उठाना और कितना दबाना है, किसके नाम छुपाना और किसके चीख-चीखकर  उजागर करना है तथा किन घटनाओं पर मिट्टी डाल आगे बढ़ जाना है; उसके लिए कुछ मीडिया समूह और आई.टी. सैल पूरी तत्परता और समर्पण भाव से साथ देने को तैयार रहे ही। इसका उदाहरण ऊपर नवम्बर की घटनाओं के साथ दिया ही है।

*कई घटनाओं में तो बलात्कारी से ही विवाह कराने को न्याय की श्रेणी में रख दिया जाता है। एक बलात्कारी के साथ पूरा जीवन जीना, प्रतिदिन उस पल को जीना है जब उसके साथ दुष्कर्म किया गया था। लेकिन समाज के एक वर्ग को लगता है कि विवाह से उस लड़की का जीवन संवर गया जबकि यह स्पष्टतः एक बलात्कारी को बचाने की वैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा उपक्रम है।  जिसमें परिवार की तथाकथित ‘नाक’ भी बचा ली जाती है।

*बहुधा मोटी धनराशि देकर मामले को रफ़ादफ़ा करने का प्रयास होता है तो कभी शिकायत दर्ज़ करने पर पूरे परिवार को नष्ट करने की धमकी दी जाती है। कहीं-कहीं ‘समाज में इज़्ज़त या स्वयं की रक्षा’ के नाम पर परिवार तैयार भी हो जाता है। उन्हें यह भय भी सालता है कि बात फैल गई तो ‘समाज में मुँह दिखाने लायक़ नहीं रहेंगे!” समझ रहे हैं न आप? यहाँ अपराधी नहीं बल्कि पीड़ित इंसान को भय है कि कहीं किसी को पता न चल जाए!

*वह ताजा उदाहरण तो आपको भी याद होगा जिसमें लगभग एक दर्ज़न बलात्कारियों को उनके ‘अच्छे व्यवहार’ के कारण स्वतंत्र कर दिया गया। उनका स्वागत हुआ एवं इन ‘अद्भुत’ पलों की आरती भी उतारी गई। तो जब तक समाज का यह दृष्टिकोण है, अपराध में कमी आने की कल्पना ही निरर्थक है।

संभवतः यही कारण है कि हमने हैरान होना तो अब छोड़ ही दिया है कि जिस देश में हर रोज बलात्कार होते हैं वहाँ तमाम कानूनों के बाद भी बलात्कारियों को सजा क्यों नहीं होती! फाँसी तो बहुत दूर की बात है। अपराधों के प्रति यह संवेदनहीनता ही एक ऐसे समाज को जन्म दे रही है जिसे अब सिवाय अपने और किसी से वास्ता नहीं रहा! वह तब ही जागरूक होगा, जब वह स्वयं प्रभावित हो या उस विषय पर दुनिया बोल रही हो। अपराधियों के हौसले इससे भी बढ़ते हैं। अतः केवल प्रार्थना ही की जा सकती है कि स्त्रियाँ, सुरक्षित रहें।

राजनीतिक दलों और मीडिया का व्यवहार 

*कभी ध्यान से टीवी के समाचार सुनिए। वहाँ सौ समाचारों के मध्य लगभग पचास अपराधों से जुड़े किस्से किसी घरेलू सामान की सूची की तरह भावहीनता से पढ़ दिए जाते हैं। ये वही मशहूर एंकर हैं जो राजनीतिक समाचारों में नथुने फुलाते घूमते हैं, प्रिय नेता और अभिनेता की बलैयां लेते नहीं अघाते! इधर अभ्यस्त दर्शक भी स्वादिष्ट खाना गटकते हुए, बड़ी ही सरलता से सब घटनाएं लील जाते हैं।

*समाचार-पत्रों में भी महिला अपराध की खबरों का जिक्र पाँचवे-छठे पृष्ठ पर कहीं कोने में कर दिया जाता है कि “पढ़ो तो ठीक, नहीं तो ऐसी भी कोई बड़ी बात नहीं इसमें!” कहने का तात्पर्य यह कि एकाध हाई प्रोफाइल/ हाईलाइटेड केस के अलावा अन्य चर्चा योग्य भी नहीं समझे जाते! न ही किसी चैनल की डिबेट का हिस्सा बनते हैं। अब बिना हिस्सा बने, न्याय तो क्या खाक ही मिलेगा!

राज्य प्रमुखों का इस बात पर प्रसन्न होना समझ आता है कि उनके शासन में अपराध दर में कमी आई है लेकिन चर्चाओं के मध्य जब प्रवक्ता अपने विरोधियों को यह सुनाकर मुस्कुराते हुए तालियाँ पीटते हैं कि “देखो! तुम्हारे यहाँ तो इतनी हत्याएं और बलात्कार हुए जबकि हमारे यहाँ तो उससे कम हैं।’ तो हृदय दुख और क्षोभ से भर उठता है। नेताओं के इस तरह के संवेदनहीन वक्तव्य से स्पष्ट है कि उनके लिए अपराध, आंकड़ा भर है और पीड़िता कोई निर्जीव पड़ी वस्तु!

हमें वे अकड़ के साथ हँसते, घूमते अपराधी नेताओं के चेहरे भी याद हैं जो कि बलात्कार करने के बाद, उस लड़की के पूरे परिवार को खत्म करने से नहीं हिचकते। कभी लड़कों से हुई गलती का नाम देकर बात को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करते हैं तो कभी उसके छोटे कपड़ों को दिखा उसके चरित्र पर ही उंगली उठा देते हैं। महिला नेताओं के चरित्र को लेकर, तथाकथित स्वामियों के विचार भी कई बार सामने आए। याद पड़ता है क्या, कि किसी मामले में इन  स्वामियों/ नेताओं का कुछ बिगड़ा हो?

क्यों बिगड़ेगा भला! जब लगभग सभी की सोच इतनी ही छिछली और बजबजाती हुई हो! इस तरह की सारी घटनाएं, सभी दलों के लिए एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सुनहरा मौका हैं और कुछ नहीं! कांग्रेस नेता ने बोल दिया तो बीजेपी को मजे आ गए, बीजेपी ने बोल दिया तो कांग्रेसी खेमे में खुशी की लहर दौड़ने लगती है।

दंड की मांग, हमेशा सामने वाले के लिए ही की जाती है और अपने वाले पक्ष को बचाने की कोशिशें! यही राजनीति का चरित्र है और मीडिया की मजबूरी, जिसमें हम सबको पिसते रहना है।

यूँ भी जब दृष्टि अपराध से अधिक, अपराधी के धर्म और राज्य की खोज पर हो तो समझ जाइए कि न्याय देना उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं। केस की फ़ाइल खुलती है, बंद हो जाती है। इन सबके बीच कितनी ही निर्भयाओं की कहानी बेहिसाब दफ़न होती चली जाती है, पता भी नहीं चलता। जिस दिन अपराधी को धर्म, जाति और राजनीति से परे देखकर सजा दी जाने लगेगी, तब ही समझिएगा कि कहीं कुछ उम्मीद बाकी है। वरना स्त्री को उसका अधिकार दिलाने वाले, सम्मान की बात करने वाले, बेटी-बहन को पूजने की सोच दिखाने वाले अधिकांश स्वार्थी ढोंगी ही बैठे हैं।

बहरहाल, बात तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा जारी किये गए आंकड़ों की है, जिन पर हर जगह, विस्तृत चर्चा होनी चाहिए थी। यद्यपि उन घटनाओं का हिसाब लगाना तो अभी शेष है जो घर की चारदीवारी के भीतर क़ैद हैं और कभी दर्ज़ ही न हुईं।

- प्रीति अज्ञात 

'हस्ताक्षर' दिसम्बर 2022 में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/after-10-years-of-nirbhaya-incident-are-women-fearless-now-what-do-ncrb-figures-say/

#निर्भया #अपराध #संपादकीय #Preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका

शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

यह उत्तम भाव की विजय है

 #प्रसंगवश 

सम्मेद शिखर जी के पर्यटन स्थल बनाए जाने की योजना के विरोध के बाद, कल जो निर्णय सामने आया उससे सभी प्रसन्न हैं। यह हर्ष, स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से यह सीख भी ले लेनी चाहिए कि यदि आप सत्य के साथ खड़े होकर अपनी बात को सभ्य, अहिंसक तरीके से रखते हैं, तो वह अवश्य सुनी जाती है एवं परिणाम भी प्रायः सुखद होते हैं। हर धर्म इसी प्रेम भावना से ही तो जीवन जीने की बात करता है। यही बुद्ध ने भी कहा और गांधी जी ने भी। इसमें कुछ नया नहीं, बस हृदय से पालन करने की बात है।

वे जो अपनी बात मनवाने के लिए या धर्म की रक्षा का ढोंग कर तोड़फोड़, आगजनी और दंगे पर उतर आते हैं, राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं, अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं  इन सबको चिह्नित करते चलिए। क्योंकि ये सब कुछ हो सकते हैं पर इनका धर्म/ आस्था या देशप्रेम से दूर-दूर का नाता नहीं। अतः इन अराजक तत्वों पर ध्यान देना एवं उनसे प्रभावित होना बंद कीजिए। क्योंकि बेहतर समाज की स्थापना एवं देश की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा यही लोग हैं।

धर्म आपको शुद्ध करता है, समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है, सकारात्मकता की ओर ले चलता है। यह सबका मान करना भी सिखाता है। हृदय को इतना पवित्र बना देता है कि द्वेष, ईर्ष्या या कोई भी कलुषित, नकारात्मक भाव आपके पास फटके तक नहीं। धार्मिक स्थलों पर जाकर जिस असीम शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है, वह इसी उत्तम भाव से उपजती है। 

यह जरूरी है कि हम सदा याद रखें कि किसी धर्म के सम्मान के लिए, उसी में जन्मना आवश्यक नहीं होता! और यह भी कि धर्म की रक्षा के लिए आक्रोश की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह हमारे इस दुनिया में आने से पहले भी सुरक्षित था और जाने के बाद भी रहेगा। धर्म तो संयम सिखाता है। यदि हम आहत होने के नाम पर क्रोध में आ जाते हैं तो इसके संस्कार की प्रथम सीढ़ी पर ही ढेर हो चुके हैं। इस समय घोषित आस्था, कोरे दिखावे से अधिक कुछ नहीं होती और केवल किसी से हिसाब बराबर करने के उद्देश्य से प्रदर्शित की जाती है। जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं वे यह भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान सब देख रहा है। तो उसे शांति से अपना काम करने दीजिए और हम अपना करें। हमें मनुष्य रूप में इस धरती पर भेजा गया है। यक़ीन मानिए यदि हम अपने मानव रूपी संस्कारों को सुरक्षित रखेंगे तो यह दुनिया बेहद सुंदर हो जाएगी। हम स्वयं और आने वाली पीढ़ियों के लिए यही स्वप्न तो साकार होने देना चाहते हैं न!

- प्रीति अज्ञात 

#सम्मेदशिखरजी #धर्म #आस्था #प्रीतिअज्ञात #PreetiAgyaat


चित्र: विकिपीडिया से साभार 

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

तुम्हें दुपट्टा तो मैचिंग का चाहिए लेकिन पति..?


भैया, जरा इसकी मैचिंग का दुपट्टा निकाल देना। 

सुन, छोटू! ऊपर से जरा लाल वाला दुपट्टा निकाल दियो। कॉटन का। 

नहीं, भैया! जॉर्जेट, शिफॉन या सिल्क में हो तो अच्छा।    

जी, बहनजी। लीजिए, ये रहा आपका दुपट्टा। 

अरे! ये तो रानी कलर का है। ये कुर्ते का रंग तो देखो! कहाँ मैच कर रहा? 

अच्छा! और मँगवाता हूँ। छोटू, वो नीचे वाला गट्ठर ले आ। 

अरे, ये तो पिंक है। 

नहीं, दीदी। बेबी पिंक है। 

बहनजी, मरून भी चल जाएगा। रखकर देखिए। 

नहीं, भैया। इससे तो मैं गाजरी ले लूँ। नारंगी भी चल जाए शायद। कुर्ते में एक-दो फूल हैं उस कलर के। 

अच्छा भैया, सुनो क्रिमसन रेड या ब्रिक रेड में मिलेगा?

नहीं, दीदी। उस हिसाब से तो इस पर ब्लड रेड या टमाटरी ही जाएगा। 

ये लो जी, टमाटरी। पैक करा दूँ?

मज़ा नही आ रहा और दिखाओ। अच्छा, रुको। यही कलर नेट में मिलेगा क्या?

नहीं, आप डाई करवा लीजिए। मंडे तक दे दूँगा। 

नहीं, रहने दीजिए। हम कहीं और देख लेंगे। आपके यहाँ तो चॉइस ही नहीं है। 

शायद आपको भी कोई खरीद याद आ गई होगी! यह भी हो सकता है कि पापा या भाई से मंगाई कोई वस्तु का किस्सा दिमाग में घूम गया हो, जिस पर रंग के मारे चिक-चिक हुई थी। जहाँ पापा कह रहे कि 'हरा ही तो मंगाया था!' और भैया चिढ़ रहा, 'मैंने तो सी ग्रीन समझाया था पापा को। इन्होंने मेरी बात ही नहीं सुनी।' 

तब आप तुनककर बोलीं, 'नहीं इसे ऑलिव ग्रीन कहते हैं।' 

कहने को तो सात ही रंग हैं पर परेशानी यह कि उसमें सात सौ शेड्स निकल आए हैं। उससे भी बड़े दुख की बात यह कि हम स्त्रियों को न केवल इन रंगों की जानकारी है बल्कि मैचिंग मिलाते समय हम उसे पाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं। 

कुछ रंगों (सी ग्रीन, टरकॉइज़, पीच, ऑफ व्हाइट इत्यादि) के बारे में हमारी राय है कि उनका रंग रात को सही नहीं पता लगता। तो उसे दिन में ही लेने जाते हैं। उस पर भी दुकान से बाहर निकल सूरज की रोशनी में दो बार अतिरिक्त जांच करते हैं कि परफेक्ट मैच है या नहीं!

बात दुपट्टे की ही नहीं बल्कि ब्लाउज, पेटीकोट, चूड़ियाँ, जूती, लिपस्टिक, बिंदी, ईयर रिंग सबके मैचिंग की अपनी कहानी है। मैचिंग मिलाते समय जैसे एक जुनून सा छा जाता है कि अजी! ऐसे कैसे नहीं मिलेगा! ढूँढकर ही दम लेंगे! जबकि इस सच्चाई को हम सभी बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि एकाध शेड ऊपर-नीचे होने से कोई अंतर नहीं पड़ता! लेकिन हमें तो पड़ता है न! बस यही इक बात हमें पागल कर देती है और हम दीवानों की तरह उसकी तलाश में निकल पड़ते हैं। कितनी बार जरा सी चीज के लिए दस किलोमीटर तक चले जाते हैं। गली-गली भटक सौ दुकानों पर पूछते हैं या घर में किसी को दौड़ा दिया जाता है। 

सब्जी, फल, बेडशीट, सजावटी सामान, पौधे, फर्नीचर और तमाम घरेलू सामान हर वस्तु की खरीद के लिए हम अपनी पसंद-नापसंद को स्पष्ट रूप से बताते रहे हैं, अपनी ज़िद पर अड़ खूब बहस भी की है। जमकर चिकचिक की है कि 'ये वाला फोन चाहिए तो चाहिए ही', भले उसके लिए रात 12 बजे लॉगिन कर बुकिंग करनी पड़े।

तो लड़कियों, मैं तुम्हें हमारी प्रजाति के बारे में यह सब इसलिए याद दिला रही हूँ क्योंकि हमारी न कुछ आदतें बड़ी ही अजीब होती हैं। यूँ तो ये सामान्य ही लगती रहीं हैं।  पर गहराई से समझो तो लगता है कि हम कितनी अनावश्यक वस्तुओं पर अपना समय जाया करते हैं। वहाँ हम अपनी पसंद को लेकर बहुत स्पष्ट भी रहते हैं। कहीं कोई संशय नहीं! लेकिन जहाँ पूरा जीवन बिताने की बात आती है, जीवनसाथी चुनने की बात आती है, झट से एक दिन में निर्णय ले लिया करते हैं। बहुधा सामाजिक दबाव के चलते, मन-मस्तिष्क पर जैसे चुप्पी सी छा जाती है। 

आज भी कई लड़कियाँ ऐसी हैं जो घरवालों के बताए रिश्ते को चुपचाप सिर हिलाकर हामी भर देती हैं। पलटकर प्रश्न तक नहीं करतीं कि लड़के का स्वभाव कैसा है? उसकी रुचियाँ क्या हैं? यह सच है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए बेहतर ही सोचते हैं। लेकिन केवल अच्छे घर और अच्छी कमाई से ही जीवन नहीं चला करता! लड़का/लड़की की मानसिकता, सोच, स्वभाव, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार के बारे में भी जानना उतना ही आवश्यक है। अन्यथा विवाह, मात्र समझौता भर बनकर रह जाता है। परिवार की पसंद के लड़के से अवश्य विवाह करें पर उसे जान तो लीजिए। 

समय बदल रहा है। इस बदले हुए समाज और ढेर होती मान्यताओं के दौर में अब मन मसोसकर किये गए समझौते चरमराने लगे हैं और बात संबंध-विच्छेद तक पहुँच जाती है। तनाव और अवसाद घेर लेता है, सो अलग। कई बार स्थिति घातक भी हो जाती है। जब हम बिना विचार किये कुछ तय नहीं करते, तो अपना जीवन कैसे दाँव पर लगा देते हैं!

कभी सोचा है कि हमें दुपट्टा तो मैचिंग का चाहिए लेकिन पति..?

- प्रीति अज्ञात

राजधानी से प्रकाशित पत्रिका 'प्रखर गूँज साहित्यनामा' के दिसम्बर 2022 अंक में मेरे स्तम्भ 'प्रीत के बोल' में प्रकाशित

#प्रखरगूँजसाहित्यनामा #PrakharGoonjSahityanama #matchingdupatta  #प्रीतिअज्ञात #PreetiAgyaat #thechoicewemake 

हत्या का कारण ‘लिव इन रिलेशन’ पर थोप, कहीं हम अपना पल्ला तो नहीं झाड़ रहे?

'आउटलुक' हिन्दी के 12 दिसम्बर 2022 अंक में प्रकाशित -

आफ़ताब ने जो जघन्य अपराध किया, वह अक्षम्य है। हैवानियत की ऐसी तस्वीर कि इंसान भीतर तक सिहर जाए। इंसानियत से भरोसा उठ जाए! ऐसे अपराधी के लिए फ़ांसी की सजा भी कम ही लगती है। श्रद्धा की नृशंस हत्या के साथ- साथ यह उस विश्वास की भी हत्या है जिसे वह प्रेम के नाम पर जीती रही। लेकिन सोचिए कि वह लड़का किस हद तक शातिर और पाशविक प्रकृति का होगा जो अत्यंत क्रूरता और निर्ममता से इसी प्रेम और विश्वास के पैंतीस टुकड़े कर उन्हें फ्रिज़ में रख, धीरे-धीरे जंगल में ठिकाने लगाता रहा।

स्पष्ट है कि एक रिश्ता जिसका अंत इतना बर्बर हुआ हो, वहाँ सब कुछ रहा होगा सिवाय प्रेम के। प्रेम आपको सभ्य और सुंदर बनाता है हत्यारा नहीं! लेकिन वो लड़की उसके व्यक्तित्व को न समझ सकी, या फिर समझते हुए भी इस उम्मीद से रिश्ते में बंधी रही कि सब ठीक हो जाएगा। लड़कियां संकेत समझते हुए भी रिश्ते से बाहर निकल नहीं पाती हैं क्योंकि समाज की सीख उनका पीछा करतीं हैं।

दुख इस बात का ही नहीं कि एक लड़की इस बेरहम दुनिया से चली गई, अफ़सोस उसके बाद आई प्रतिक्रियाओं का भी उतना ही है। हिन्दू-मुस्लिम करने वालों को तो नया मसाला ही मिल गया। उधर अरैन्ज मेरिज के पक्ष में भी क़सीदे काढ़े जाने लगे हैं। जिस तरह से लिव इन और प्रेम को कोसा जा रहा है वह हैरान करने वाला है। मैं लिव इन के पक्ष में पूरी तरह से नहीं हूँ पर यह जरूर मानती हूँ कि दो वयस्कों को अपनी मर्ज़ी से रिश्ते में बंधने का पूरा अधिकार है।

श्रद्धा की हत्या के बाद यह कहा जाना कि 'उसके साथ तो यही होना चाहिए!' भी कहने वाले को हत्यारे के पक्ष में ही खड़ा कर देता है। यह ठीक उसी तरह की मानसिकता से निकली सोच है जिसमें दुष्कर्म पीड़िता पर ही छोटे कपड़े पहन, अपराधी को उकसाने का आरोप मढ़ दिया जाता है।

आखिर क्या हो गया है हमारी सोच को?

हमारी मानवीयता और संवेदनाओं को क्या होता जा रहा है? यदि कोई लड़की अपने माता-पिता की बात न मानकर अपने प्रेमी के साथ रहना तय कर लेती है तो क्या यह अपराध है? इतनी बड़ी भूल है कि उसकी हत्या होने पर आप नाक-मुँह सिकोड़ संवेदनशून्य हो जाएं? अपराधी के कृत्य को न्याय संगत बताने लगें? या यूँ कहने लगें कि 'सही सबक मिला उसे।' जो बच्चे अपने माँ-बाप के अनुभव, सीख को न सुनें-समझें,  क्या वे मृत्यु के हक़दार हैं?

बच्चे बड़े हो गए तो क्या परवाह चली जाती है?

माना कि किसी लड़की ने अपने माता-पिता की नहीं सुनी और अपने प्रेमी के साथ चली गई। चलो, उसने यह भी कह दिया कि 'वो मर गई परिवार के लिए', तो उसे सचमुच मरा मान उत्तरदायित्व से पल्ला झाड़ लें?

क्या परिवार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि अपने जिगर के टुकड़े का अपडेट लेते रहें? यदि अहंकार आड़े आता है तो कम-से-कम उसके दोस्तों के तो संपर्क में रहें। हम उस समाज में रहते है जहाँ बचपन में बच्चों को मारते-पीटते हुए कितनी ही बार माता-पिता गुस्से में कह जाते हैं कि 'मरते भी नहीं! परेशान कर रखा है। जीवन नरक कर दिया, इन बच्चों ने!' बच्चा फ़ेल हो जाए तो उसकी हड्डी-पसली एक कर देते हैं कि 'नाक कटा दी बदतमीज़ ने!' पर उसके बाद वही माँ बच्चों से लिपट खूब रोती है, वही पिता उनके सिर पर दुलार का हाथ रख कहता है कि 'कोई बात नहीं! अगली बार खूब मेहनत करना!' बच्चे, बड़े हो गए तो क्या परवाह चली जाती है?

लोग यहाँ तक कह रहे कि ‘ऐसी लड़कियों से क्या सहानुभूति रखना!’ कैसी लड़कियाँ भई?

क्या एक प्रेम भरे जीवन की कामना करना गलत है? लड़कियों की कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है जहाँ वे कहने को तो सशक्त हो गईं हैं पर उम्र के हर दौर में अकेले रहने से आज भी डरती हैं। उन्हें हमेशा एक साथी की तलाश रहती है जिसके गले लग वे अपने सुख-दुख बाँट सकें। जिसके साथ हँसी के पल गुज़ार सकें। जिसकी उपस्थिति उन्हें इस एक तसल्ली से भर दे कि इतनी बड़ी दुनिया में एक व्यक्ति तो ऐसा है जो मेरा अपना है, जो मेरे लिए जीता है, जिसे इंतज़ार है मेरा। यह किसी एक श्रद्धा की ही नहीं बल्कि हर लड़की की कहानी है। स्वार्थ से भरी दुनिया में एक निश्छल मन की तलाश। एक कंधे की तलाश, जिस पर सिर रख वे अपने भविष्य के तमाम सुनहरे ख्वाब सँजोती हैं। वे भाग्यशाली लड़कियाँ जिनके भाई, मित्र या पिता उन्हें इस तरह का भावनात्मक सहारा दे पाते हैं, वे कभी लाश बनकर घर नहीं लाई जातीं। मरती वहीं हैं जिन्हें यह अहसास कराया जाता है कि चूँकि उन्होंने अपनी पसंद से जीवनसाथी चुन लिया है तो वे पलटकर मायके का मुँह कभी न देखें।

हद है!

आप लिव इन या प्रेम विवाह के विरोधी हो सकते हैं पर इनके नाम पर माँ-बाप की मर्ज़ी से हुई सभी शादियों को सही नहीं ठहरा सकते। वे रिश्तों की प्रगाढ़ता का अंतिम सत्य नहीं हैं। क्योंकि इन्हीं तय की हुई शादियों में अनगिनत लड़कियाँ अचानक स्टोव में आग लगने की कहानी गढ़कर' ज़िंदा ही फूँक दी गईं, पिताओं की पगड़ी सड़क पर उछाली गई, कितनों ने स्वयं मृत्यु को गले लगा लिया कि उनके गरीब माता-पिता भेड़ियों को दहेज़ कब तक दे पाएंगे! कितनों ने इसलिए जीवन लीला समाप्त कर ली क्योंकि विदाई के वक़्त उनके कानों में यह मंत्र फूँक दिया गया कि 'लड़की की डोली मायके से उठती है और अर्थी ससुराल से!' उसके बाद गलती से लड़की घर आ भी गई तो समझा-बुझाकर लौटा दिया जाता है कि 'अब वही तुम्हारा घर है। थोड़े-बहुत झगड़े कहाँ नहीं होते!" 'पराया धन' का चाबुक दिन-रात उसे पड़ता है। क्षमा मांगते हुए संकोच के साथ कह रही हूँ कि 'यदि आपके लिए लिवइन या प्रेम विवाह गारंटी के साथ का रिश्ता नहीं है तो अरैन्ज मैरिज भी बिका हुआ माल वापिस नहीं होगा' जैसा ही है।

अब इस घटना का राजनीतिकरण होगा, हिन्दू-मुस्लिम ज़हर बोया जाएगा, विदेशी कनेक्शन, लव ज़िहाद और सौ बातें कह दी  जाएंगी लेकिन लड़कियों को ज्ञान बाँटता समाज अपनी जिम्मेदारी शायद ही कभी समझेगा। माना कि हम अपराधी को नहीं समझा सकते लेकिन सामाजिक, व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर नई पीढ़ी तक हमारी बात पहुँचाने और इन विषयों को समझाने की बहुत अधिक आवश्यकता है।

पर अपराध को धर्म से तौलने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के बीच, हमारे बच्चों को सामाजिक  व्यवहार, रिश्ते संभालने और उन्हें जीने का पाठ अब भी नहीं सिखाया जाएगा। जबकि हमें उनकी किशोरावस्था में यह बता देना चाहिए कि आँख मूँदकर साथी न चुनो, धोखा भी हो सकता है। उन्हें यह भरोसा भी देना चाहिए कि 'मेरे बच्चे, रिश्तों में खतरे का संकेत मिलते ही घर लौट आना। हमारा प्यार और आशीष सदा तुम्हारे साथ है।' जब तक हम अपनी इज़्ज़त और बच्चों में से ‘इज़्ज़त’ को बचाने पर आमादा रहेंगे, अपराधों में कमी का सोचना भी निरर्थक है।

-प्रीति अज्ञात

#आउटलुक #लिवइनरिलेशन #PreetiAgyaat #प्रीतिअज्ञात




सोमवार, 21 नवंबर 2022

तबस्सुम की मुस्कान हमारे साथ है

तबस्सुम के बारे में सोचती हूँ तो एक हँसता-खिलखिलाता चेहरा सामने आ खड़ा होता है। हँसी ऐसी कि जैसे सर्दियों की सुबह में धरती पर महकता हरसिंगार बिखरा हो। आवाज में इतनी मधुरता कि जैसे मीठे पानी का कोई झरना कलकल बहता ही जा रहा हो। उनकी तस्वीर भर भी देख लें तो एक उदास दिल को सुकून आ जाए, निराश हृदय में आस के तमाम दीप जल उठें! अब ऐसी शख्सियत का नाम 'तबस्सुम' न हो तो और क्या हो! मुस्कान की मूरत उन सी ही तो होती होगी न!  

वे नाम की ही नहीं, टीवी के दर्शकों के होंठों की भी तबस्सुम थीं। यहाँ 'थीं' लिखना खटक रहा है पर नियति पर किसका बस चला है! उसे तो सिर झुकाकर स्वीकार करना ही होगा। सबके दिलों में फूल खिलाने वाली तबस्सुम का दिल 18 नवम्बर 2022 की शाम अपने धड़कने की जिम्मेदारी निभाने से चूक गया और एक बुरी खबर उनके प्रशंसकों के हिस्से आ पड़ी। तबस्सुम नहीं रहीं।

बेबी तबस्सुम के नाम से फ़िल्मी दुनिया में अपनी शुरुआत करने वाली तबस्सुम ने कई भूमिकाओं को निभाया लेकिन भारतीय दूरदर्शन के पहले टॉक शो 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' की होस्ट बनकर वे हर दिल अजीज बन गईं। उनके बोलने का अंदाज़ तो निराला था ही लेकिन प्रस्तुति में जो मासूमियत और किसी बच्चे सी जो निश्छलता छलकती थी, वही बात उनके कार्यक्रम को जीवंत बनाती थी। 21 वर्षों तक इस कार्यक्रम का प्रसारित होना अपने-आप में एक मिसाल है। वे 15 वर्षोंतक महिलाओं की पत्रिका गृहलक्ष्मी की संपादक भी रहीं। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं।‘तबस्सुम टॉकीज’ नाम से उनका यू ट्यूब चैनल भी था।  

जीते-जी हम किसी के बारे में उसके काम से ही जानते हैं। लेकिन उसके चले जाने के बाद उसके जीवन से जुड़ी कुछ अन्य बातें भी पता चलती हैं। जैसे कि मैंने आज ही जाना कि उनका आधिकारिक नाम किरण बाला सचदेव था लेकिन इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। हाँ, इसके पीछे की कहानी बड़ी ही खूबसूरत है। तबस्सुम के पिता अयोध्यानाथ सचदेव स्वतंत्रता सेनानी थे तथा उनकी माता असगरी बेगम भी स्वतंत्रता सेनानी एवं लेखक थीं। तबस्सुम के जन्म के बाद, उनके पिता की भावनाओं का ध्यान रखते हुए असगरी बेगम जी ने अपनी बेटी का नाम किरण बाला रखना तय किया तो वहीं माँ की भावनाओं के मद्देनज़र पिता को 'तबस्सुम' नाम रखना सुहाया। तबस्सुम का विवाह, अभिनेता अरुण गोविल के बड़े भाई विजय गोविल से हुआ था। लेकिन 'तबस्सुम' नाम ही उनका पूरा परिचय बता देने के लिए पर्याप्त है। 

अब जबकि एक ज़िंदादिल शख्सियत ने इस दुनिया से अचानक ही रुखसती ले ली है, हमें यक़ीन है कि उनके चाहने वालों के  दिलों में उनकी मनमोहक मुस्कान सदा ज़िंदा रहेगी।

- प्रीति अज्ञात



रविवार, 13 नवंबर 2022

खेल भावना

जैसे कम अंक आने पर, कुटाई का खतरा महसूस होते ही बच्चा झट से अपने मम्मी-पापा को बताता है कि "वो शर्मा अंकल जी के गुड्डू के मार्क्स तो मुझसे भी कम हैं।" फिलहाल ठीक वैसे ही पाकिस्तान वाले अपना मन बहला रहे। 

हम भारतवासी फाइनल नहीं खेल सके तो क्या हुआ, पर ठीक इसी भाव ने ही हमारे सदमे को भी कम कर दिया है। हमारी हार, दुख और जलन पर जैसे बर्फ़ के ठंडे छींटे आ गिरे हैं कि "हीहीही पाकिस्तान भी तो नहीं जीता न! हुँह बड़े आए थे फाइनल वाले!" 😁

पाकिस्तान वाले भी अपनी हार के ग़म से कहीं अधिक इस बात से प्रसन्न होंगे कि भारत भी तो  नहीं जीता। इसी एक बात के बल पर, वो हारने के बाद भी अपने देश में अकड़कर चल सकेंगे और जनता की गालियों से बचते रहेंगे। शायद फूलमालाओं से स्वागत भी हो जाए। 😜
पुनः ठीक इसी बात ने ही भारतीयों को भी राहत दी कि कम-से-कम पाकिस्तान से तो नहीं हारे! हमारे खिलाड़ी भी आज मन में सोच रहे होंगे कि "भिया, अब तो..स्वागत नहीं करोगे हमारा!" 😎

इसी बीच इंग्लैंड वाले यह सोच हलकान हुए जा रहे कि उन्हें इतनी जबरदस्त बधाइयाँ क्यों मिल रहीं? पहले तो भारत उनसे हारकर दुखी था लेकिन अब उनकी जीत से प्रसन्न है! पाकिस्तान वाले भी हारने के बाद इतने कम दुखी क्यों लग रहे! 😕
तभी कुछ लोग फोन पर बताएंगे कि यही तो हमारी सच्ची 'खेल भावना' है। 
इस नवीन जानकारी को पाते ही भारत-पाकिस्तान अपनी महानता पर थोड़ा गर्व से इतराएंगे। लेकिन मंद मंद मुस्काये बिना भी न रह सकेंगे। लज्जा का यहाँ कोई स्कोप नहीं है। 😌

कल प्रमुखता से कुछ अखबारों में छपेगा कि कैसे सुनक जी भारत के लिए शुभ हैं। उधर वे (ऋषि सुनक जी) इंग्लैंड की टीम को बधाई देते हुए मन में एक बार तो सोच ही लेंगे कि "बेटा! जीत का असली हीरो तो मैं हूँ! बधाई की सौगात.. इधर भी है, उधर भी!" 😎
उफ़! ये मुझे चक्कर क्यों आ रहे! 😦
- प्रीति अज्ञात 

यूँ ही

 कहते हैं आपके अच्छे कर्म सदा आपके साथ चलते हैं। वो इंसान जिसने मन से एक पल को भी किसी का बुरा नहीं चाहा, ईश्वर उसके साथ ही रहता है। अब इस बात में कितना सच है, उसे संवेदनशील लोगों के अलावा कोई और नहीं समझ सकता।

इस दुनिया में अब भी ऐसे तमाम भावुक लोग मिल जाएंगे जो दूसरे के दुख को अपना समझते हैं। उनके दर्द को भीतर तक महसूस करते हैं। उनकी एक मुस्कान के पीछे सब कुछ लुटा देने को तत्पर रहते हैं। इनका स्नेह निस्वार्थ होता है पर किसी के निश्छल मन और ईमानदारी पर संदेह करने की रीत भी इसी दुनिया से निकली है। न हम उन्हें बदल सकते हैं, न वो हमें।

हमारी Good deed, हमारी kindness हमारी अपनी है , उसे दिखावे की आवश्यकता नहीं होती। इसे किसी पर थोपा भी नहीं जा सकता। यह एक ऐसा सकारात्मक भाव है जो किसी अनजान व्यक्ति के साथ भी हमें जोड़ देता है, एक रिश्ता सा बन जाता है जैसे। किसी के चेहरे पर खिलती मुस्कान का बिम्ब हमारे चेहरे पर भी उभरता है।

जीवन यही है, इतना सा ही तो है। न जाने क्यों बेवज़ह की बातों पर समय खर्च करते लोग इस बात को समझ नहीं पाते। इतिहास साक्षी है कि ईर्ष्या, द्वेष, बदले की भावना ने कभी किसी का भला नहीं किया बल्कि सब खत्म ही किया है। 

जीवन जो यूँ भी एक न एक दिन ख़त्म होने ही वाला है, हमारी कोशिश रहे कि हम उसका हर पल खूबसूरत बनाए। सबसे प्रेम करना सीखें, हर रिश्ते का सम्मान करें। यदि हम किसी के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम किसी का बुरा तो न ही चाहें।

एक कमरे में सब उदास बैठे हों तो वहाँ की हवा तक मायूस हो जाती है लेकिन हँसी का एक ठहाका जैसे माहौल में जान ही फूँक देता है। ' Smile is contagious' यूँ ही नहीं कहा गया है।

किसी को कुछ donate करें, किसी को treat देकर सरप्राइज करें, किसी के काम में उसके कहने से पहले ही मदद कर दें, किसी अपने का हाथ थाम बस कुछ पल बैठें। किसी को Thank you कहें।

आज World Kindness Day भी है। कुछ अच्छा, इसी बहाने ही सही ...

Let's celebrate it together! 💐

Facebook की दो वर्ष पुरानी पोस्ट 

https://www.facebook.com/photo/?fbid=3494473860606756&set=a.387983091255864



गुरुवार, 10 नवंबर 2022

कहीं ‘विज्ञान’ संवेदनाओं पर भारी तो नहीं पड़ रहा?

आज ‘विश्व विज्ञान दिवस’ है अर्थात मनुष्य के लिए स्वयं पर गर्व करके का दिन। आदिम सभ्यता से आधुनिक काल की यात्रा के मध्य इस पृथ्वी पर उपस्थित समस्त प्रजातियों में यह मनुष्य ही है जिसने अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर सर्वश्रेष्ठ होने का घमंड बरक़रार रखा है। विज्ञान के दम पर अपनी इस गौरव यात्रा में अनवरत चलता हुआ वह अत्यधिक प्रसन्न है। क्यों न हो! दो-तीन दशक पूर्व जो बातें स्वप्नलोक की कोई अनूठी पटकथा सी लगतीं थीं, आज वे बड़ी सहजता से उसके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। फिर चाहे वह किसी प्रिय से वीडियो कॉल के माध्यम से यूँ बात करना हो, मानो आमने-सामने ही बैठे हैं या फिर घर बैठे मात्र एक क्लिक भर से बिजली, टेलीफोन के बिल का जमा हो जाना। यही कारण है कि इंटरनेट पर नित नए विकास से लेकर, अंतरिक्ष की सैर तक की चर्चाएं भी अब उतनी आश्चर्यजनक नहीं लगतीं!

हम जिस काल के साक्षी बन रहे हैं, वह नवीन अनुसंधानों और अथाह संभावनाओं का युग है। यहाँ सब कुछ संभव है। ऐसे में मनुष्य के मस्तिष्क और उसके बनाए, समझे विज्ञान के प्रति सिवाय धन्यवाद के भला और क्या ही भाव उपज सकता है! लेकिन जब संवेदनाओं और मनुष्यता पर विचार करने बैठती हूँ तब हृदय ठिठक जाता है। क्या आपको नहीं लगता कि इतनी भौतिक सुविधाओं को भोगते और तकनीकी माध्यम से नित सरलीकरण की ओर अग्रसर जीवन को जीना, अब पहले से अधिक तनावपूर्ण और दुष्कर होता जा रहा है? न केवल सामाजिक तौर पर हम अपना जुड़ाव और संवेदनशीलता खोने लगे हैं बल्कि हमारे मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य पर भी इसके दुष्प्रभाव दिखने लगे हैं। विज्ञान की दी हुई सुविधाओं से हम इतने आह्लादित हो गए कि उन्हें भोगने की तमीज़ भुला बैठे!

बदलता सामाजिक व्यवहार

व्हाट्सएप अफवाह का तो कहना ही क्या! अब अध्ययन करने का कष्ट कौन उठाए! तो आँख मूँद राजनीति एवं स्वार्थ से प्रेरित लिखे गए हर शब्द पर विश्वास किया जाता है। इसके चलते चाहे परिवार के सदस्य हों या वर्षों पुराने मित्र, वे सब दुश्मनों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। जबकि व्हाट्सएप का मूल उद्देश्य रिश्तों को क़रीब लाना और जोड़ना था लेकिन सब बिखरने लगा। अब हर व्यक्ति संदेह के घेरे में है। यात्राओं में भी देखिए तो अब कोई, किसी से बात नहीं करता। सब मोबाइल में ही घुसे रहते हैं।

पहले कैमरा होता था तो फोटो खींचना भी एक ईवेंट होता था। अब मोबाइल में कैमरा आ जाने के बाद किसी को, किसी की जरूरत ही नहीं। बस सेल्फ़ी क्लिक किया और हो गया। जबकि सेल्फ़ी की सुविधा उस समय के लिए है, जब आपके साथ कोई न हो या समूह चित्र लेना हो।

टीवी एक बड़ी तस्वीर की तरह दीवार पर टंगा है क्योंकि ओटीटी ने मनोरंजन की जिम्मेदारी संभाल ली। अब साथ बैठकर कार्यक्रम देखने की परंपरा भी नष्टप्राय है। अपने-अपने कमरे में बैठ मोबाइल या लैपटॉप पर कार्यक्रम देख लिए जाते हैं। वो साथ में टीवी देखते समय की मस्ती और ठहाके अब नहीं सुनाई आते।

कोई आता-जाता तो स्टेशन लेने जाने या छोड़ने की रीत थी। उसका भी अपना एक आनंद था। उबर या ओला कैब की उपलब्धता ने बहुत सुविधा दी लेकिन वो अपनापन भरा साथ चला गया। अपनी गाड़ी से कहीं बाहर जाना हो तो यात्रा रोमांचक होती थी। साथ हँसते थे, मजे लेते थे। घूमते- पूछते हुए जाने में सामाजिक जुड़ाव भी बनता था लेकिन जीपीएस के आते ही हम पूरी तरह से उस पर निर्भर हो गए। जैसे स्वयं पर से विश्वास ही उठ गया।

सुविधायुक्त जीवन-शैली

रिमोट कितनी छोटी सी वस्तु है लेकिन इसके आने के बाद से हम सोफ़े पर और आराम से बैठने लगे हैं। टीवी, लाइट को ऑन-ऑफ करने के लिए एलेक्सा है ही। बस चादर तानी और सो गए। फिर स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के चलते मॉर्निंग वॉक पर डिजिटल घड़ी पहनकर जाना शुरू करते हैं जिससे हमारे क़दमताल का लेखा-जोखा मिलता रहे। मशीनें ही बता रहीं कि शरीर के घटकों का अनुपात क्या चल रहा। प्रत्येक व्यक्ति आधा डॉक्टर है। धड़कनों की गति और ऑक्सीजन प्रतिशत का हिसाब उसके पास है।

संतुलित भोजन को एक तरफ रख प्रोटीन शेक और मल्टी विटामिन की गोलियों को ‘फिटनेस मंत्र’ मानकर जीने लगे हैं। दिन-रात चौके चूल्हे में उलझी गृहिणियों के लिए भी अब किचन और घर के प्रबंधन हेतु मशीनें हैं। उस पर खाने की होम डिलीवरी से अब माँ के हाथ का खाना, ममता सब ज़ोमेटो और स्विगी ने संभाल लिया है। सोचना होगा कि इनके अधिकाधिक प्रयोग से कहीं हम पहले से अधिक अकर्मण्य और बीमारियों को न्योता देने वाले तो नहीं बन रहे?

सुविधाओं की तो अंतहीन सूची है। हमें बिल भरने की लंबी पंक्तियों में, घंटों खड़े रहने से आजादी मिली। अब किसी बाबू को नहीं कोसना होता है और बैंकिंग भी घर बैठे हो जाती है।

अमेजॉन, फ्लिपकार्ट सपनों की होम डिलीवरी करने लगे हैं। गोबर के उपलों से लेकर हीरों के हार तक सब ऑनलाइन उपलब्ध है। खरीदा जा सकता है, लौटाया जा सकता है। ऐसे में बाज़ार जाने की जरूरत ही नहीं। यहाँ डिस्काउंट तो मिलते ही हैं, साथ ही समय की भी बहुत बचत होती है। अभी ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ेगी ही।

समय कहाँ गया?

कुल मिलाकर कहना यह है कि विज्ञान ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया, समय की बचत की लेकिन यह बचा हुआ समय किधर है? क्या अब हमारे पास, अपनों से दो मीठे बोल बोलने का समय दिखता है कहीं? पहले तमाम असुविधाओं में रहते हुए भी किसी से भी मिलना हो, तो बेझिझक जाया करते थे लेकिन अब बिना सूचित किये जाना भी असभ्यता है क्योंकि सभी व्यस्त हैं।

तात्पर्य यह कि विज्ञान ने हमें सुविधा दी परंतु सामाजिकता की बलि हमने स्वयं ही चढ़ाई है। तभी तो मनुष्य इतना अकेला और अवसादग्रस्त हो गया है कि उसकी समझ ही खोती जा रही है। उंगलियों पर बड़ी सरलता से किये जाने वाले हिसाब भी वह अपने मोबाइल का केलकुलेटर खोलकर करता है। उसका आत्मविश्वास पहले सा नहीं रहा। तकनीक पर निर्भरता इस हद तक कि अब घरवालों के फोन नंबर भी याद नहीं रखे जाते।

कहीं उसकी बुद्धि छीनी तो नहीं जा रही? रोबोट और आर्टिफ़िशियल इन्टेलीजेंस का प्रवेश हो चुका है। इनकी बहुलता के बाद अपनी बुद्धि और संवेदनशीलता को गिरवी रखने वाले मनुष्य के पास अपनी मनुष्यता सिद्ध करने को बचेगा क्या? कहीं हम स्वयं मशीन में परिवर्तित तो नहीं हो रहे?

इधर मोबाइल, तमाम तरह के सूक्ष्म कैमरा के माध्यम से हुए अपराध तथा बढ़ते साइबर क्राइम ने विज्ञान के दुरुपयोग की भयावह तस्वीरें भी सामने रख दी हैं। कोई किसी को पीट रहा हो, दुर्घटनाग्रस्त हो, हत्या हो रही हो वहाँ उपस्थित अधिकांश लोग उसे बचाने के स्थान पर कंटेंट अपलोड करने में रुचि रखते हैं। इस दुष्चक्र से कौन, कब तक बच सकेगा, यह देखना होगा। लेकिन तकनीक के माध्यम से हमारी मानसिकता, सोच, संवेदनशीलता का जिस तरह अपहरण एवं क्षरण किया जा रहा है वह और भी भयाक्रांत कर देने वाला है!

विज्ञान ने तो जीवन को सरल बनाने के उद्देश्य से हमें सुविधाएं दीं लेकिन हमने ही उनका दुरुपयोग कर जीवन जटिल बना दिया है। हमें चाहिए था कि सुविधाओं को भोगते हुए, मानवीय मूल्यों को संरक्षित रखें लेकिन हम अपनी सामाजिकता और उत्तरदायित्व को विस्मृत कर उसे नरक के द्वार तक ले आए हैं। विज्ञान ने हमसे हमारी मनुष्यता नहीं छीनी बल्कि झूठे अहंकार और स्वार्थ के चलते हमने ही, उसे ताक पर रख दिया है। वस्तुतः हमने पाया विज्ञान से है और जो गंवाया, उसमें हमारी मूर्खता ही एकमात्र कारण है।

काश विज्ञान का कोई अविष्कार मनुष्य को धर्म, जाति, सम्प्रदाय की बेड़ियों से मुक्त कर जीना सिखा दे, प्रेमभाव से इस सृष्टि को पूजना सिखा दे! क़ाश कोई मनुष्य को उसकी मनुष्यता लौटा दे! राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक लगती हैं –

हम कौन थेक्या हो गये हैंऔर क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल करयह समस्याएं सभी

- प्रीति अज्ञात https://hastaksher.com/

'हस्ताक्षर' नवम्बर 2022 के इस संपादकीय को आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं -

https://hastaksher.com/14856-2is-science-overpowering-the-senses/ 

#हस्ताक्षरवेबपत्रिका #हस्ताक्षर #हिन्दीसाहित्य #हिन्दी #प्रीतिअज्ञात #संपादकीय

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

भ्रष्टाचार की आँखों देखी

ट्रेन में अपनी सीट पर बैठी हुई थी कि साइड लोअर वाली बर्थ पर बैठे व्यक्ति का मोबाइल बज उठा। बात करते हुए उन्होंने फोन करने वाले से कहा कि 'अरे! आप क्यों परेशान हो रहे हैं? आपका काम हो जाएगा। हमारी बात कभी गलत नहीं होती। आपको तो हमारा पूरा इतिहास पता ही है।' दो-तीन मिनट बाद हे हे हे की ध्वनि के साथ कॉल समाप्त कर उन्होंने गर्व भरी मुस्कान फेंकते हुए इधर-उधर देखा। जैसी कि उन्हें उम्मीद थी, उनकी बर्थ के ऊपर उपस्थित और आमने-सामने जमा कुल पाँच चेहरों में से दो की उत्सुक दृष्टि उन पर थी। उत्सुकता तो मुझे भी थी, बस जाहिर नहीं किया था। 


दरअसल सेकंड एसी के इस कूपे में चार पुरुष सहयात्री थे तथा ऊपर की बर्थ पर एक लड़की थी। कुछ पल पहले ही उसकी माँ ने आकर उसे रात ग्यारह  बजे तक दूसरी बोगी में आने का निर्देश दिया था। यहाँ उसके स्थान पर उसके पापा या भाई के आने की बात हो रही थी। डिब्बे में कोई परिवार के साथ हो, बच्चे वगैरह हों तो मुझे बहुत अच्छा लगता है अन्यथा सहज नहीं हो पाती। तो मुझे इस बात की भी चिंता हो रही थी कि अब नींद तो लगने से रही। खैर! मोबाइल गैलरी में तस्वीरों को देखने का नाटक करते हुए कान तो मेरे भी खड़े हो ही चुके थे।

तभी मेरे ठीक सामने वाले व्यक्ति ने, उन ठसके के साथ बैठे फोन सेलिब्रिटी से चर्चा प्रारंभ करते हुए पूछा,‘भाईसाब! ये आप अभी कुछ एग्ज़ाम क्लियर कराने की बात कर रहे थे न?’‘जी, जी। अब अपन किसी का भला कर सकते हैं तो उसमें बुराई क्या!’ उसने आत्ममुग्धता के सागर में हिलोरें मारते हुए उत्तर दिया। ‘हाँ, कोई बुराई नहीं! यह तो सेवा का काम है। किसी बेचारे का जीवन संवर जाए, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है!’ प्रश्नकर्ता ने विशुद्ध चमचे की तरह हुंआं हुंआं की। मैं समझ गई कि अब इन सहृदय, समाजसेवी बाबूजी का अगला प्रश्न क्या होगा। उन्होंने मेरी आशाओं की लाज रखते हुए ठीक वही पूछा। ‘वैसे भाई साहब, आप कौन-कौन सी कक्षाओं में पास करा देते हो? वो क्या है न, जाने कब जरूरत पड़ जाए!’ अपनी शर्मिंदगी पर समझदारी का ढक्कन लगाते हुए वे सहसा बोल उठे। 

उनके इसी प्रश्न की प्रतीक्षा में बैठे सेलिब्रिटी बाबू तो जैसे चहक ही उठे। तुरंत पुलकित भाव से उनके मुखारविंद से निकला, ‘अजी, आप तो ये पूछिए कि कौन सी नहीं करा सकते! दसवीं/ बारहवीं सेंट्रल बोर्ड अपने हाथ में है। पर भैया,परीक्षा में बैठना जरूरी है, उसके बिना मुश्किल होगी।‘ उनके शब्द सुनकर मुझे लगा कि अब और क्या ही जानना शेष रह गया है! एक भ्रष्टाचारी के भी नियम सख्त हैं कि ‘परीक्षा में बैठना जरूरी है!’ मेरे कान बस अब ढहने की ही तैयारी में थे कि उन महात्मा ने पुनः उवाचा,‘ग्रेजुएशन, इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. सब निकलवा देता हूँ। अब आजकल किसी लड़के/लड़की से रिश्ते के लिए सब डिग्री तो पूछते ही हैं, तो कर देते हैं दुनिया का भला!’ 

'हाँ, सो तो है ही। अपने हाथों किसी का अच्छा हो जाए तो क्या नुकसान!’ प्रश्नकर्ता ने उनकी महानता को बधाई देते

हुए, भाव विह्वल होकर कहा। इन उच्च विचारों के लेनदेन में अब आगे की बर्थ के यात्रियों की रुचि भी जागृत होने लगी थी। उन्होंने भी उनसे कई जानकारियाँ एकत्रित कर तुरंत ही उनका फोन नंबर सुरक्षित कर लिया। एक ने पूछा कि ‘भई, इसमें कोई रिस्क तो नहीं है न? बाद में कोई दिक्कत तो नहीं होगी?’ ‘बिल्कुल नहीं होगी। जैसे सबका आता है, वैसे ही ऑनलाइन रिजल्ट आएगा। कोई अंतर नहीं होगा। रिस्क कहाँ से होगी? मंत्रियों के ही तो कॉलेज हैं। हाँ, बस परीक्षा में बैठना जरूरी है। ऊपर से नीचे तक की सेटिंग है। सबके रेट फ़िक्स हैं।’ खींसे निपोरते हुए उनका बेशर्मी से भरा उत्तर सामने आया। चूँकि विषय उठ ही चुका था तो राष्ट्रहित को समर्पित इस चर्चा में उन महानुभाव ने निस्संकोच दरें भी बता दीं। दसवीं, बारहवीं का पचास हजार, ग्रेजुएशन का एक लाख बीस हजार तथा इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. का एक लाख अस्सी हजार रेट चल रहा है। 

अपने बेटे को कनाडा भेजने की अतिरिक्त जानकारी देते हुए इन सज्जन ने यह बताकर भी उपकार किया कि ‘वे चार वर्षों से इस ‘बिज़नस’ में हैं और जीवन आनंद से कट रहा है।’ उन्होंने यह भी ऑफर किया कि यदि किसी को उनके साथ आना हो तो वे इच्छुक व्यक्ति के राज्य में उसको हेड बना सकते हैं। 'अरे वाह! इनकी शाखाएं भी हैं! यह जानते ही चार-पाँच लोगों ने धड़ाधड़ उनका नंबर नोट कर लिया। एक ने पूछा कि ‘फिर तो कोचिंग इंस्टिट्यूट वालों से आपकी अच्छी सेटिंग होगी?’ उत्तर देते हुए वे तनिक मुस्कुराए कि 'नहीं! जो छात्र पढ़ाई करके अपने-आप परीक्षा पास कर लेते हैं उन्हें हम नहीं कहते। हमारा ऑफर बाकियों के लिए होता है।’


उनकी इस बात को सुनकर सबने धन्य महसूस किया कि ‘भाईसाहब आप तो दिल के बड़े नेक बंदे हैं।’ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इन समाजसेवियों के बीच क्या प्रतिक्रिया दूँ! मन बहुत ही क्षुब्ध हो उठा था। मुझे अच्छे से याद है कि पहले कभी जब फ़िल्म देखने जाया करती थी तो वहाँ ब्लैक में टिकट बेचने वाला भी धीरे से फुसफुसाता था लेकिन यहाँ तो सब पटाखे की तरह बज रहे थे। ऐसे बात हो रही थी जैसे कि इस सुनियोजित भ्रष्टाचार के लिए इन साहब की सरकारी नियुक्ति हुई हो। कहीं कोई अपराध बोध या भय का नामोनिशान तक न था। 

अकेली कुछ कहने की स्थिति में नहीं थी। इसलिए इसके आगे की यात्रा उदासी में कटी। दुख था और नंबर लेने वालों की प्रसन्नता देखते हुए शर्मिंदगी भी। जिन संस्कारों पर हम गर्व करते आए हैं उन्हें अपनी आँखों के सामने खत्म होते देख रही थी। 

ये कहाँ आ गए हैं हम?

- प्रीति अज्ञात

राजधानी से प्रकाशित पत्रिका 'प्रखर गूँज साहित्यनामा' के नवंबर 2022 अंक में 'प्रीत के बोल'

इसे यहाँ भी पढ़ा जा सकता है -

https://www.readwhere.com/read/3612338/Prakhar-Goonj-Sahitynaama/prakhar-goonj-sahityanama#dual/40/1

#भ्रष्टाचार #रेलयात्रा #प्रखरगूँजसाहित्यनामा #PrakharGoonjSahityanama #corruption #प्रीतिअज्ञात #PreetiAgyaat