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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

नारायण दभालकर का परम परोपकार राजनेताओं औेर राष्ट्र के लिए शर्म का विषय!

एक खबर कई बार सामने आ चुकी है कि कैसे नागपुर में एक 85 वर्षीय बुज़ुर्ग नारायण दभालकर ने अस्पताल में अपना बेड एक युवक को दे दिया और उसके प्राणों की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया. इस खबर को राजनेता किस मुंह से सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रहे हैं? हर मरीज को बेड उपलब्ध न कराने वाला तंत्र शर्मसार क्यों नहीं होता? निश्चित तौर पर किसी की जीवन रक्षा हेतु अपने प्राण त्याग देना, संवेदनशीलता और त्याग की पराकाष्ठा है. यूं भी हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि वहां त्याग और बलिदान की कई कहानियां सुनने-पढ़ने को मिलती आई हैं.

भारत जैसे विशाल देश में इन कहानियों ने ही हमारे संस्कार और सभ्यता की नींव रखी है. चाहे वह श्रीराम हों, ऋषि दधीचि या फिर नचिकेता और ऐसे ही जाने कितने अनगिनत नाम, जिनकी कहानियों को सुनकर मन आश्चर्य से भर जाता है. हमारे स्वार्थी हृदय को तो सहसा विश्वास भी नहीं होता! लेकिन वो सब सच है परंतु सतयुग का!

कलयुग में ऐसा विरले ही देखने में आया है. स्व. श्री नारायण जी ने जो किया, उसके हम सब साक्षी बने हैं. यह घटना इसलिए भी उल्लेखनीय है कि इस समय कोरोना ने मनुष्य के सामाजिक मूल्यों और नैतिकता को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर रखा है. देश के कई स्थानों से नकली इंजेक्शन बनाने, दवाओं की कालाबाज़ारी, और मरीज़ों से दुर्व्यवहार की खबरें सामने आ रही हैं.

साथ ही हम ये भी देख रहे हैं कि एक बेड के इंतज़ाम में परिजन कैसे चक्कर काट रहे हैं और इस कठिन समय में मनुष्य सिवाय अपनी जान बचाने के और कुछ भी सोच नहीं पा रहा है, ऐसे में किसी का स्वेच्छा से अपना बेड छोड़ किसी और मरीज़ को दे देना, इस कृत्य को अत्यंत सराहनीय और उस व्यक्ति को ईश्वरतुल्य बना देता है. उन बुज़ुर्ग सज्जन के बड़प्पन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है.

नारायण जी की मौत, राजनेताओं के लिए डूब मरने वाली बात
निश्चित तौर से इस अतुलनीय त्याग की इस पूरी घटना पर हमारा भाव-विह्वल होना स्वाभाविक है. लेकिन हमें एक पल को भी नहीं भूलना चाहिए कि 'अगर बेड होता तो वे बच भी सकते थे'. त्याग और बलिदान अपनी जगह है लेकिन किसी भी देशवासी के लिए इससे अधिक शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है कि 'चूंकि अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं है, इस कारण कोई वृद्ध स्वेच्छा से मृत्यु-वरण कर ले!

एक तंत्र के लिए यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय होता है जब एक देह के त्याग करने से दूसरी देह की रक्षा का प्रबंध हो रहा हो! क्या मृत्यु को महिमामंडित करने के स्थान पर हमें 'सिस्टम' से सीधे-सीधे प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि इलाज के अभाव में किसी व्यक्ति की जान कैसे चली गई? क्या इस तरह की मृत्यु अनैतिक नहीं लगती?

इस पूरे घटनाक्रम में किसी का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता? क्या हर जीवन बहुमूल्य नहीं होता? तो फिर ये कैसा अद्भुत 'सिस्टम' है जो हर मृत्यु को उत्सव में परिवर्तित कर देता है! हम आयु के आधार पर जीवन की महत्ता का निर्धारण करेंगे? या कि इस अवधारणा को संपुष्ट समझें कि जब भी कोई गंभीर परिस्थिति आए तो बलि अधिक आयु वाला ही देगा?

डूब मर जाना चाहिए इस तंत्र को जो किसी की मृत्यु पर 'सॉरी' बोलने के स्थान पर आपसे केवल गौरवशाली अनुभव करने की बात करता है. यदि हम सब भी मात्र इसी भाव में डूब गदगद होते रहे तो व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद हमेशा के लिए भूल जाना बेहतर है. आइए, तंत्र की असफलताओं पर गर्व करें और त्याग के नए प्रतिमान गढ़ने को तैयार हो जाएं. 
नम आंखों से, स्व.श्री नारायण जी को विनम्र श्रद्धांजलि.
 - प्रीति अज्ञात 
29 अप्रैल 2021 

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क्या कोरोना को हराने में 'सिस्टम' से हुई ये 7 बड़ी भूलें?

जैसे ही नए ऑक्सीजन प्लांट लगने और उसकी आपूर्ति के समाचार आने शुरू हुए, भक्त लहालोट होने लगे हैं और उन्होंने 'मोहैतोमुहै' कहकर अपनी खींसे निपोरना शुरू कर दिया है. हाँ, हर बार की तरह इस बार भी वे भूल जाना चाहते हैं कि ये रायता माननीय का ही फैलाया हुआ है और अब वे उसे समेटने में लगे हैं. पर क्या करें? दरअसल गलती उनकी नहीं बल्कि  'सिस्टम' की है. 

सरकारी आंकड़ों का काला सच इससे भी पता चलता है कि जिन मरीज़ों की मृत्यु अस्पताल में हुई, बस उन्हें ही गिना जा रहा है. यानी यदि आप अस्पताल की देहरी पर बैठ इलाज़ के इंतज़ार में, एम्बुलेंस में या घर में इस बीमारी के चलते मृत्युलोक सिधार जाते हैं तो आप कोरोना के शिकार नहीं माने जाएंगे. परिजनों को ये मान लेना होगा कि आप हृदयाघात से मरे, मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) से मरे या क्या पता, आत्महत्या ही कर ली हो! मैं ये तो नहीं कहूँगी कि घर में बैठने की सलाह इसलिए ही दी जा रही है कि आँकड़े कम शर्मनाक हों और हम दुनिया को मुँह दिखाने के क़ाबिल रह सकें लेकिन इतना जरूर कहूँगी कि सतर्क रहिए क्योंकि आपदा प्रबंधन के नए पैमाने गड़े जा चुके हैं. 

आवश्यकता से अधिक उत्सव प्रेमी 
कोरोना ने जब इस देश में प्रवेश किया था तो थाली, ताली और मोमबत्ती के आयोजन किये गए, जिसमें हम सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही 'आपदा में अवसर' का सूत्र भी थमा दिया गया था. जिसे पहली लहर में मरीजों के अंग निकालकर बेचने, उनके गहने लूटने और दूसरी लहर में दवा और इंजेक्शन की कालाबाज़ारी ने एक शर्मिंदगी भरे जुमले में बदल दिया है. अब यह वाक्य नकारात्मक समाचार के साथ जुड़ चुका है. 
जब महामारी का असर कम होने लगा तो ये नहीं देखा कि बाकी देशों में दूसरी लहर का आगमन हो चुका है. यहाँ कोरोना को हराकर विश्व गुरु बनने का ताज पहना जाने लगा, वैक्सीन बनने की खुशियां मनाई जाने लगीं और इस गंभीर तथ्य को भूल गए कि हम कोरोनमुक्त देश तब बनेंगे जब 135 करोड़ भारतीयों को ये टीका लग जाएगा. लेकिन चुनाव की जल्दबाज़ी और विजेता के मद में, न तो टेस्टिंग बढ़ाने पर जोर दिया गया और न ही अन्य चिकित्सकीय व्यवस्थाओं को प्राथमिकता!

वैसे तो अपुनिच भगवान है!
जहां श्रेय लूटने की बात आती है, सरकार छाती ठोक 'हमने किया, हमने किया' का गीत गाने लगती है. मानो, वैसे तो ये काम किसी और का रहा होगा लेकिन हाय रे हमारा सौभाग्य! कि इन्होंने कर दिखाया. लोग तो इस खुशी में ही बावले हुए फिरते हैं. जनता नतमस्तक हो जाती है कि प्रभु! हम पर आपके द्वारा ये जो एहसान कर दिया गया है, उससे उऋण कैसे होंगे! 
भैया, ओ भैया! आपको काम करने के लिए ही बेहद विश्वास और बहुमत के साथ चुना गया है. तो जब नाकामी हाथ लगे तो इसका ठीकरा 'सिस्टम' पर मत फोड़ो! क्योंकि ये 'सिस्टम' आपके कहे पर ही चलता आ रहा है. 

जरूरत से सौ गुना अधिक मीडिया प्रबंधन 
सारे चैनल दिन-रात किसकी बंसी बजा रहे,अब ये कोई राज की बात रह नहीं गई है. कभी-कभार आत्मा धिक्कारे, तो सच बोलने की कोशिश भी करते हैं पर उनकी टर्मिनोलॉजी बदल जाती है. अब माननीय का नाम बदलकर 'सिस्टम' कर दिया जाता है. वैसे अन्य संदर्भों में सिस्टम वो शय है जिसे नेहरू जी ने खराब कर रखा है.  
बेचारा, मजबूर 'सिस्टम', स्तुतिगान का पक्षधर है और इस संगीत का भरपूर आनंद लेता है पर उसका दिल बड़ा नाजुक है जी! इसलिए सुर बदलते देख संबंधित विषय की पोस्ट पर प्रतिबंध लगा देता है. बोले तो, 'न रहेगा बाँस... न बजेगी बाँसुरी'. तभी तो, जब हालात बिगड़ने लगे और दुनिया भर में थू-थू होने लगी तो ऑक्सीजन पहुँचाने का ऑर्डर देने से पहले सोशल मीडिया पर कोरोना से सम्बंधित पोस्ट करने वालों पर कार्यवाही करने का ऑर्डर आ गया. अपने आलोचकों का मुँह बंद करने का यही एकमात्र खिसियाना और बचकाना तरीका रह गया है. हालांकि ये यूपी वाले बाबूजी के ठोकने और गाड़ी पलटाने के तरीके से कहीं बेहतर और अहिंसक है. अब भई, इतनी तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी. 
काश! ऐसे ही आपदा प्रबंधन भी कर लिया होता!

जनता की नब्ज़ पर तो हाथ रखा पर दिल टटोलना भूल गए!
वो जनता जो शिक्षा और रोज़गार की बात करती थी, जो भ्रष्टाचार और गरीबी से मुक्ति चाहती थी, जिसने अव्यवस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए थे और 2014 से अपनी आँखों में तमाम सपने भर एक बदलाव की अपेक्षा करने लगी थी, उस जनता की आँखें मूँद दी गईं. उन्हें देशभक्त और देशद्रोही की शिक्षा दी गई. आपस में भिड़ाया गया. फिर एक जगमगाते मंदिर की नींव रख ये यक़ीन दिलाया गया कि तुम यही तो चाहते थे. राष्ट्रवादी जनता फिर दीवानी हो उठी. 
आज वही जनता रोते-बिलखते हुए अस्पताल की मांग करती है, चरमराई चिकित्सा व्यवस्था को देख दिन रात तड़पती है पर शिकायत करे भी तो किस मुँह से? हमने अस्पताल कब मांगे? मंदिर ही तो मांगा था, सो मिल गया! 
हाँ, आप इसे भारतीयों की आस्था से न जोड़ लीजिएगा, यहाँ बात केवल और केवल प्राथमिकता की है
'अयोध्या की तो झांकी है/ मथुरा, काशी बाकी है' कहने वालों से मुझे कोई आपत्ति नहीं, न ही राम मंदिर या लौह पुरुष की भव्य मूर्ति से. ये हमारे देश और संस्कृति की पहचान हैं लेकिन अगली बार जब चुनाव हों तो भले ही यही लोग सत्ता में रहें पर आप उनसे अपना हक़ जरूर मांगना. अच्छे अस्पताल और शिक्षा की बात जरूर करना और ये भी याद दिलाना न भूलना कि जीवन चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, पर इस सिस्टम के हाथों ऐसी निर्दयी मौत कभी न हो!

मसीहा बनने का चस्का
'मोहैतोमुहै' का नारा यूँ ही नहीं बना है. अच्छी खासी रेसिपी है इसकी. पहले किसी समस्या को इतना बढ़ने दो कि देश में त्राहिमाम मच जाए. फिर 'अँधेरी रातों में, सुनसान राहों पर...एक मसीहा निकलता है' की धुन पर इठलाते हुए ठीक 8 बजे टीवी पर अवतरित हो जाओ. फिर एक ऐसी बात कह दो कि जनता स्वयं को धन्य महसूस करने लगे और सारे गिले शिकवे भूल जाए.  
ये ठीक ऐसा ही ही है कि 99 लोगों को मरने दो और 100 वें का नंबर आते ही हीरो स्टाइल में एंट्री लो और उसे बचा लो. फिर बचाने के महान उपकार का वर्णन कुछ इस तरह करो कि जनता अपने भाग्य को सराहने लगे. 
और जो ये प्रश्न पूछे कि उन 99 मौतों का हिसाब कौन देगा? तो उसे देशद्रोही कहकर अपमानित करने के लिए आईटी सेल पहले से ही चाक-चौबंद है. प्रजातंत्र का ऐसा अपमान पहले कभी नहीं देखा. 

कथनी और करनी में अंतर 
आप गमछा बाँधकर टीवी पर तो खूब आए और बहुत ज्ञान भी बांटा लेकिन अफ़सोस कि स्वयं उसे अपनाने में बुरी तरह से विफल हुए. 'दो गज की दूरी, मास्क जरूरी और सोशल डिस्टेंसिंग' का ब्रह्मवाक्य, बंगाल चुनाव की किसी भी रैली में आपके मुखमंडल से एक बार भी उच्चरित नहीं हुआ. क्योंकि आपको तो ठसाठस भरी भीड़ को देखने का सुख लेना था, उनकी तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी छाती को और चौड़ाना था. आप हों या आपके बाल सखा, सभी अहंकारी मुस्कान लिए, बिना मास्क लोगों के बीच घूमते रहे.  उस समय ऐसा लग रहा था जैसे आप किसी  कोरोना मुक्त ग्रह पर विचरण कर रहे हों. हाँ, ये बात अलग है कि वहाँ के आँकड़े जब आएंगे तो सारा ठीकरा दीदी के सर फोड़ दिया जाएगा. 
'छोड़ो दो गज की दूरी, अब चुनाव है जरूरी' के व्यवहार ने ये भी बता दिया कि आपने देश हित से ऊपर स्वयं को रखा. यही नहीं बल्कि इसके साथ-साथ कुंभ में लाखों लोगों को  एकत्रित कर जनता की आस्थाओं को भी सहलाते रहे. जनता ने पहले लॉक डाउन में आपके कहे अनुसार सब किया तो अब वो आपको यूं भीड़ में बोलता देख स्वयं भीड़ बनने से क्योँ सकुचाए?

'आत्मनिर्भर भारत' अब जुमला कम, श्राप अधिक लगता है! 
मात्र कोविड महामारी ने ही हम भारतीयों को दुख नहीं दिया बल्कि कई परिवारों ने उस दर्द को भी सहा है जिसका एहसास उनकी आने वाली पीढ़ियों तक शेष रहेगा. ये लोग पहले एम्बुलेंस की तलाश में दर-दर भटके, फिर अस्पताल की देहरियों पर माथा टेका, उसके बाद बेड की तलाश में नाक रगड़ते रहे, फिर दवाई और ऑक्सीजन सिलिन्डर के लिए गिड़गिड़ाए. कुछ ऐसे अभागे भी रहे जो सारी पूंजी खर्च करने के बाद किसी अपने की अर्थी लिए, श्मशान की प्रतीक्षा पंक्ति में टोकन लिए खड़े हो खून के आँसू बहाते रहे. 'आत्मनिर्भर भारत' के ऐसे अश्लील रूप की कल्पना भी न की थी हमने!
हम वाकई इस सिस्टम से हार चुके हैं. 
- प्रीति अज्ञात 
27 अप्रैल 2021 को iChowk में प्रकाशित