शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

पुस्तक का मनोविज्ञान - 2

विश्व पुस्तक मेला- क़िताबें, बातें, मुलाक़ातें और जलवा-ए-सेल्फ़ी

हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास को खंगालेंगे तो राजेंद्र कुमार जी के दशक की फ़िल्मों में एक बात कॉमन थी कि नायक-नायिका के बीच की इश्क़ियाहट क़िताबों के गिरने और फिर साथ-साथ उठाए जाने से प्रारंभ होती थी. आंखों-आंखों में हुआ ये प्यार इतना सशक्त हो जाता था कि बगिया के फूलों की डाली को झुकाकर और नदी की बहती धारा से अठखेलियाँ करते हुए जमाने भर से लड़ने की ताक़त एकत्रित कर लेता था और फिर क्लाइमेक्स में उसे अपने क़दमों में झुकाकर ही मानता था.

राजधानी के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले की रौनक भी बारम्बार उसी युग में ले जा रही है. संयोगवश यहां भी नायक-नायिका की उम्र लगभग वही है. मतलब किशोरावस्था-सी कार्यशैली तो है पर उम्र... उफ्फ्फ, बहुत लेट हो गया न! पर ऐसा नहीं कि यह सोशल मीडिया से उपजी दोस्ती और फिर उस दोस्ती के प्रेम में बदल जाने के बाद मिलने की तमाम संभावित जगहों में सबसे सुरक्षित शरणस्थली है और यहां केवल प्रेमी युगल ही आते हैं.

न, न यदि आप ऐसा समझ रहे हैं तो अपनी सोच को दुरुस्त कीजिए (नहीं करेंगे, तो भी कोई ज़िद नहीं). हां, पर माहौल इतना ही ख़ूबसूरत और ज़ालिम लगता है. क़िताबें, सुंदर-प्रसन्नचित्त चेहरे, हरी-भरी घास, छायादार वृक्ष, फूल, कविताएं-कहानी.... "मेरे मेहबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम" की याद दिलाने लगते हैं. बदलते समय और पगले विकास के साथ अब इसमें चाय और दनादन सेल्फियां (बहुवचन यही होगा न) भी शामिल हो चुकी हैं.

पुस्तक मेला है तो स्पष्ट ही है कि वहां पुस्तकें होंगी. चर्चायें होंगी. लेखक-प्रकाशक होंगें. विमोचन, काव्य-पाठ के सैकड़ों दौर होंगे.

लेकिन इसके अतिरिक्त भी कई ऐसी बातें हैं जो संभवत: जनमानस को ज्ञात न होंगीं. कृपया धैर्य रखें, हम इस पवित्र धरा पर यही बताने को अवतरित हुए हैं. तो मेहरबानों और बेक़दरदानों-

* यही वो पावन स्थान है जहां से साथ-साथ मुस्कुराते हुए लेखक-प्रकाशक की दुर्लभ तस्वीर प्राप्त की जा सकती है.

* यहां आने वालों में लेखकों की संख्या का अनुपात पाठकों की संख्या का बीस गुना होना दर्ज़ किया गया है. तात्पर्य यह है कि मूलत: लेखकों को ही एक-दूसरे की पुस्तक खरीदनी होती है. कुछ-कुछ फेसबुक के लाइक, कमेंट, शेयर का मंचीय प्रस्तुतिकरण ही समझिए. अगर उसने आपको अपनी पुस्तक गिफ्ट दी थी तो स्वप्न में भी न सोचें कि वो आपकी खरीदने वाला है, इसलिए चुपचाप भेंटाय दीजिए. जो आपसे कहे कि "यहां से ले जाने में दिक़्क़त होगी, अमेज़न से मंगा लेंगे." समझ लीजिए कि उसने बड़े ही सलीक़े से आपकी आकस्मिक बेइज़्ज़ती कर दी है.

* विशुद्ध पाठक पूरी गंभीरता से अलग-अलग स्टॉल पर जाकर अपने पसंद की पुस्तकें तलाश करता था. परन्तु अब वह स्टॉल पर बैठे हुए भाई या भगिनी द्वारा जबरन अपनी पुस्तक की रसीद काट देने से आतंकित हो (दुर्भाग्य से इस विचित्र रसीदी दृश्य के हम स्वयं साक्षी रहे हैं) दो फुट की दूरी बनाकर रखता है. वैसे इन पाठकों की संख्या नगण्य के बराबर एवं विलुप्त होने के कग़ार पर है.

* मेले में आए हुए स्त्री-पुरुष लेखक स्वयं को सुपरस्टार से कम नहीं मानते. अपने पसंदीदा स्टॉल के कोने में खड़े होकर उनकी निगाहें उसी मुर्गे-मुर्गी (भक्त के प्रयोग से पॉलिटिकल लगेगा) के लिए बेक़रार नज़र आती है जो उन्हें देखते ही दौड़ा चला आए और कहे, "अरे, सर /मैडम आप! आज तो आना सफल हो गया." लेकिन इनकी बुभुक्षा इतने पर भी शांत नहीं होती और ये बड़े ही कोमल भाव से उसे याद दिलाते हैं कि सुनो, जब ये फोटो शेयर करो तो मुझे टैग कर देना. ये इनकी विनम्रता नहीं बल्कि वो ललक है कि लोगों को पता चले, "हम किसी से कम नहीं!"

* अगले ही मिनट में ये ऊपर वाले लेखक किसी असल बड़े लेखक को देखते ही अपना झोला उठा उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं. खींसे निपोरते हुए परिचय देते हैं और फिर अपनी पुस्तक उसे जबरन थमाकर वही निवेदन करते हैं जिसकी अपेक्षा पिछले बिंदु में ये स्वयं के लिए कर रहे थे. इस तरह छोटा, उससे बड़ा, बड़े से भी बड़ा और फिर सेलिब्रिटी तक ये खेला इसी क्रम में उलट-पुलट हो अनवरत जारी रहता है. वैसे अच्छा रोचक कार्यक्रम लगता है.

* सबसे अधिक आनंदित और गर्व के साथ अगर कोई यहां दिखाई देता है तो वो है प्रकाशक. प्रकाशक के क़द के हिसाब से लेखकों की भीड़ होती है. नए-नए 'तत्काल' टाइप लेखक इन बड़े प्रकाशकों के बैनर के आगे अपनी फोटुआ खिंचवाकर सपनों की नींव की पहली ईंट सरका आते हैं. उधर अंदर बैठे ये वरिष्ठ प्रकाशक आशीर्वाद की मुद्रा में निर्मल बाबा के समोसे विथ चटनी की याद दिलाते हैं. (सर/मैडम जी गुस्सा मत हो जइयो, हमउ उहां से छपेंगे एक दिन).

* यहां पत्रिकाओं के प्रचार के लिए भी सब आते हैं और जहां 4-5 ठीकठाक लोग दिखाई दिए, वहीं 'फटाफट पत्रिका वितरण समारोह' का आयोजन कर डालते हैं. फ्री में देने के कारण यह बहुधा सफ़ल ही होता है. लोग पेटदर्द की तक़लीफ तब जाहिर करते हैं जब बात सदस्यता तक पहुंचने लगे. अरे, भई... मंदिर का प्रसाद है क्या? मुफ़्त में ही चाहिए सब कुछ?

* देश के बाहर के हिन्दी रचनाकार भी आपको यहीं सुलभता से प्राप्त हो जाएंगे. यूं भी अपने यहां 'foreign return' को सम्मान से देखने की सुखद परंपरा सदियों से है ही. ये आप दोनों के लिए सुनहरा अवसर है, पूरा लाभ उठाएं.

MORAL: जरुरी नहीं कि सब मरने के बाद ही फ़ेमस होते हैं. यह मेला आपको जीते-जी इश्शटार बनाकर ही दम लेगा.

अत: दोस्तों से मिलने जाएं, स्नेह से जाएं, स्वार्थ से जाएं, सक्रियता दिखाने के लिए जाएं या कुनकुनी सर्दी की गुनगुनी चाय पीने जाएं.... खाली हाथ जाएं और ख़ूब किताबें लाएं... बीनकर नहीं, छीनकर नहीं, मांगकर तो बिल्कुलै नहीं, खरीदकर लाएं! फिर उस किताब के साथ सेल्फ़ी लें और क़हर ढायें.... SWAG से करेंगे सबका स्वागत!
- प्रीति 'अज्ञात' 
इसे ichowk की इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है -

https://www.ichowk.in/…/world-book-fair-2…/story/1/9443.html
#विश्व_पुस्तक_मेला #ichowk

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

पुस्तक का मनोविज्ञान - 1

पुस्तक से जुड़ी विशेष और सच्ची बात यह है कि प्रत्येक लेखक चाहता है कि उसकी पुस्तक न केवल प्रतिष्ठित साहित्यकारों द्वारा पढ़ी जाए बल्कि वे उस पर एक सार्थक प्रतिक्रिया भी अवश्य दें. संभवतः अपनी कृति के प्रति यह मोह ही उसे उन तक अपनी पुस्तकें पहुंचाने के लिए विवश कर देता है क्योंकि वह यह भी समझता है कि बिना नाम / जान-पहचान /प्रकाशक के कहे बिना नामी लोग उसकी पुस्तक खरीदने का सोचेंगे भी नहीं! यद्यपि भेंट की गई पुस्तकें भी प्राप्ति की सूचना से वंचित रह जाती हैं और लेखक संकोचवश मौन धारण कर लेता है. लेकिन अगली बार के लिए वह एक पक्का सबक़ सीख लेता है. यहाँ यह स्वीकार कर लेना भी बेहद आवश्यक है कि एक-दो प्रतिशत ऐसे लोग भी हैं जो इन खेमेबाज़ियों और 'तू मुझे क़बूल, मैं तुझे क़बूल' की प्रथा से दूर रहकर सतत निष्ठा एवं समर्पण से कार्य कर रहे हैं. इनका हार्दिक अभिनन्दन एवं धन्यवाद.


देखने वाली बात यह भी है कि इन वरिष्ठों में से कुछ यह भी चाहते हैं कि आप उनकी पुस्तकें खरीदें, पढ़ें और शीघ्रातिशीघ्र उन पर अपनी प्रतिक्रिया भी दें ही. लगे हाथों प्रचार भी करते जाएँ.


अब सबसे मज़ेदार बात यह है कि वे लोग (मासूम/स्वार्थी दोनों) जो इनके लिए ये सब कुछ करते आए हैं (कभी दिल से कभी जबरन), उनकी पुस्तकों पर 100 रुपए खर्च करना भी इन्हें जंचता नहीं लेकिन ये अपनी पुस्तक के लिए उनसे वही उम्मीद दोबारा रखना बिल्कुल नहीं भूलते.



MORAL-1: प्रतिक्रिया के लिए किसी से अपेक्षा न रखें. आपके पाठक और सच्चे मित्र सदैव आपके साथ रहते ही हैं. 


MORAL-2: पुस्तक मेले में जाएँ तो पुस्तकें खरीदें. उपहार की आशा न रखें. लेखक, पहले से ही प्रकाशक और इस दुनिया से निराश बैठा है. उस पर आप भी....! 


- प्रीति 'अज्ञात'


#विश्व_पुस्तक_मेला 

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दिलचस्प दिसंबर

दिसंबर बड़ा ही दिलचस्प महीना है। यही वो ज़ालिम माह है जिसमें सी.आई.डी. के आखिरी दो मिनटों की तरह बीते ग्यारह महीनों के सारे गुनाहों की लंबी फ़ेहरिस्त आँखों के आगे इच्छाधारी नागिन की तरह फुफकारती नज़र आती है और सभी झूठे/ धोखेबाज़ लोग अपने कानों को पकड़, उठक-बैठक करते हुए ये प्रण लेते हैं कि अब वे सज्जन बनकर ही रहेंगे।
* सभी सज्जन/ दयालु /संवेदनशील लोग इस बैरी दुनिया की चोटों से आहत हो दर्पण के सामने अपना उदास मुखड़ा लटकाते हुए गर्दन में अचानक ही भयंकर वाला ट्विस्ट मारकर खुद को लाचारगी से देखते हैं और बिन मौसम बारिश की तरह अकस्मात् ही अपनी दोनों मुट्ठियाँ भींचकर गुस्से टाइप नकली फड़फड़ाता मुंह लिए ये भीषण प्रतिज्ञा करते हैं कि अब तो प्रैक्टिकल बनके ही रहेंगे। खूब झेल लिए दुनिया के जुल्मो-सितम। ये इनका हर साल का fixed episode है। 
* सारे साल न पढ़ने वाले बच्चे आगामी बचे-खुचे महीनों में दिल लगाकर पढ़ने की विद्या क़सम खा लेते हैं। मार्च फीवर यहाँ से प्रारम्भ होने लगता है। 
* सभी मोटे-मोटियाँ (ऊप्स, अतिरिक्त स्वस्थ) मॉर्निंग वाक की शुरुआत की तिथि एक जनवरी तय करते हुए चुपचाप ही कैलेंडर पर पेंसिल से बिलकुल अपने ही जैसा एक प्यारा-सा गोला बना देते हैं, कुछ इस तरह कि बस उन्हें ही दिखे! :D
* हाफ़ सेंचुरी तक पहुंचे लोग अब नौकरी के बचे-खुचे दस वर्षों में नौकरी पर जाने से पहले नियमित रूप से ईश्वर को हेल्लो/हाय करने का महान धार्मिक फैसला लेते हैं कि फिर बाद में पेंशन की अर्ज़ियाँ खारिज़ होने की कोई आशंका शेष न रहे!
* लड़ाकू सास-बहू मन ही मन शांति वार्ता या चुप्पा-संधि का क्रांतिकारी उद्घोष करती हैं पर ये कश्मीर मुद्दे-सा उलझा मसला है कि चाहते तो हैं पर कर नहीं पाते। 
* शैतान बच्चे पड़ोसी की बगिया से फूल न तोड़ने और बेमतलब घंटी बजाकर उन्हें डिस्टर्ब न करने का और तुरंत ही इसके बदले कोई और नया तरीका ईज़ाद करने का खुसपुस प्लान करते हैं।
* भावुक लोग एक्स्ट्रा सेंटियाने लगते हैं। (जैसे हम अभी हो रहे) :P
* प्रेम में हारे बंटी और बबली अब भी हिम्मत नहीं हारते और वे अपने टूटे हुए दिल की बची-खुची इश्कियाहट को दोबारा भुनाने के लिए वेटिंग लिस्टेड मुरीदों के प्रोफाइल की दूरी बिना झिझक दिन में सैकड़ों क्लिक करके जस्ट चेक इन का आइसपाइस गेम खेलते हैं।
* फूडी बंदे, अब होम डिलीवरी में कम फ़ूड पैक मंगाने का लाचार, बेबस निर्णय लेते हैं.
* सिक्स पैक लिए इठलाता मेहनती मानव अब एट पैक बनाने की उम्मीद लिए फेफड़ों में जोरों से पसलियों के भीतर तक वर्ष के अंतिम दिन की अंतिम ऑक्सीजन खींच स्वयं को दर्पण में देख मुग्धावस्था प्राप्त करता है. 

मने जो भी हो, जनवरी में सबको नहा-धो के, चमचमाते चेहरों पे हंसी का पलस्तर चढ़ाके ही एकदम हीरो-हिरोइनी टाइप एंट्री मारनी है। थिंग्स टू डू एंड नॉट टू डू की सूची दिसम्बर की पहली तारीख़ से बनना शुरू हो जाती है और 31 दिसंबर तक तमाम मानवीय कम्पनों और हिचकिचाहटों से गुजरते हुए एक भयंकर भूकंप पीड़ित अट्टालिका की तरह भग्नावशेष अवस्था में नज़र आती है। मुआ, पता ही न चलता कि क्या फाइनल किया था और क्या लिखकर काट दिया था। आननफानन में एक नई तालिका बनाकर तकिये के कवर के अंदर ठूँस दी जाती है और फिर होठों को गोलाई देते हुए, उनके बीच के रिक्त स्थान से बंदा उफ्फ़ बोलते हुए भीतर की सारी कार्बन डाई ऑक्साइड यूँ बाहर फेंकता है कि ग़र ये श्रेष्ठतम कार्यों की सूची न बनती तो इस आभासी सुकून के बिना रात्रि के ठीक बारह बजे हृदयाघात से उसकी मृत्यु निश्चित थी। 
और इसी तरह भांति-भांति के मनुष्य अपने मस्तिष्क के पिछले हिस्से की कोशिकाओं का विविधता से उपयोग करते हुए अत्यंत ही नाजुक पर मुमकिन-नामुमकिन के बीच पेंडुलम-सा लटकता पिलान बना ही डालते हैं। तो भैया, जे तो थी Exam की तैयारी। अरे हाँ, exam अर्थात परीक्षा वह दुर्दांत घटना या कृत्य है जो जाता तो अच्छा है पर आता नहीं! ;)
-  प्रीति 'अज्ञात

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

बस, यही अंतिम इच्छा कि काश! प्रवेश द्वार पर ये द्वारपाल न हों!

अब चूंकि नववर्ष में प्रवेश तय है और हर बार की तरह सभी अपनी-अपनी योजनाओं में व्यस्त हैं (जिनका वैसे होना कुछ भी नहीं है), ऐसे में कुछ बिन्दुओं पर मेरी स्थिति अत्यंत ही चिंताजनक बनी हुई है. जब तक इनका निवारण नहीं हो जाता, मैं अन्नजल दो बार और ग्रहण करुँगी.
आह! दुख्खम-दुक्ख की अविरल धारा है ये! अब नया वर्ष क्या, किसी भी वर्ष में तनावमुक्त जीवन जी पाना संभव नहीं!
क्या आप जानते हैं कि इन दिनों अधिकांश लोग अचानक ही चिड़चिड़े, खूंखार और लड़ाकू गुणों से समृद्ध कैसे होते जा रहे हैं? क्यों वे हर बात में आपको काट खाने को दौड़ते हैं? दरअस्ल इस समस्या का मुख्य और एकमात्र कारण वह प्रजाति है जो स्वजनित, स्वचालित गतिविधियों को संचालित कर, दिन-प्रतिदिन अपने गुणसूत्रों का बहुविभाजन कर अमीबा की तरह फैलती ही जा रही है. यदि आप विज्ञान के विद्यार्थी न हों तो 'अमीबा' के स्थान पर इसका आपातकालीन पर्यायवाची 'सुरसा का मुँह' रखें, भावार्थ समान ही आएगा. ख़ैर, निम्नलिखित गुणधर्मों, वाक्यांशों और संदेशों के आधार पर आप इन्हें पहचान सकते हैं-

13 मेरा 7 रहे- ये यूरेका-सा अविष्कार और अलौकिक साथ की चर्चा तो अवश्य होगी पर पहले ये बताओ कि ऐसे जी मितलाने वाले सन्देश आखिर बनाता कौन है? वैसे मुझे आशंका है कि ये वही महापुरुष हैं जिन्होंने 12-12-12 को 12 के पहाड़े में लिखकर अपने आचार्य जी की चरण पादुकाओं का सर्वप्रथम रसास्वादन किया था. तत्पश्चात ये  9-2-11 होने का उच्चतम कीर्तिमान स्थापित कर पाने में सफल भी हुए थे और अब जब उस दौरे (टूर नहीं अचेतनावस्था) से उबरें हैं तो सीधे वाट्स एप्प की स्वछन्द, उन्मुक्त, ज्ञान-गंगा की पावन वादियों में आ गिरे हैं. यद्यपि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था है, पर हमें अपनी मानसिक शांति के लिए इन्हें स्वयं ही क्षमा कर आगे बढ़ जाना होगा. पर हे ईश्वर! इन्हें क़तई माफ़ नहीं करना क्योंकि ये जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं!

नंबर टच करो, मैजिक होगा - आज जबकि जन्म लेने के साथ ही बच्चा तक रिमोट और मोबाइल का उपयोग सीख जाता है, उस जमाने में आप ऐसे वाक्यों का प्रयोग कर किसे मूर्ख बनाने की कुचेष्टा कर रहे हैं? हाँ, माना कि धूम्रपान की तरह इस सम्बन्ध में दी गई वैधानिक चेतावनी की अवज्ञा करते हुए कुछ लोग फिर भी दी गई संख्या को टाइप या टच करते ही हैं पर इससे उनका यह कृत्य क्षम्य नहीं हो जाता. अत: यदि संभव हो तो कृपया अपना दाहिना गाल आगे बढ़ाएं और स्मरण रहे कि अगली बार टच लिखते ही एक हजार किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से किसी की दुरंतो इन पर पंचामृत की दुर्लभ, दैदीप्यमान छवि छोड़ जायेगी.

इसे कम से कम नौ समूहों में पहुंचाना, कोई इच्छा अवश्य पूरी होगी - बस, आपकी ही प्रतीक्षा में तो ये नयन पथराए हैं. क़सम से, उस समय तो प्रथम और अंतिम इच्छा यही होती है कि इसे भेजने वाले का गर्दन से कनेक्टेड एकमात्र शीश नौ-सौ बार पृथ्वी पर पटक-पटक एक ही झटके में समस्त पापियों का समूल विनाश कर दें कि 'न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी'

यदि सच्चे...हो तो इसे इतना शेयर करना कि यह बात हर देशवासी तक पहुंचे - अहा! इन्हें तो 'विष शिरोमणि' रत्न से अलंकृत करने का मन करता है. अरे, अपने धर्म का झंडा चिपकाकर देश का सत्यानाश कर राक्षसी अट्टहास करने वालों, आप जैसे तथाकथित भारतीय जब तक जीवित रहेंगे हमें दुश्मनों की क्या जरुरत? आप हैं न, हमारी हरियाली को झूमते गजराज की तरह तहस-नहस करने के लिए, आम भारतीयों के जीवन में उच्चरक्तचाप की दवाई की तरह प्रतिदिन का डोज़ देकर विषाक्त करने के लिए! आपकी झूठी देशभक्ति की जड़ों में जितनी जल्दी संभव हो, कीटनाशक डाल लीजिए, स्वयं पर भी छिड़क सकते हैं. पर एक बात अपने स्मृतिपटल पर सदा के लिए अंकित कर लो कि जो सच्चा भारतीय होता है न, वो तोड़ने नहीं...जोड़ने की बात करता है. आग बुझाता है, उसमें घी नहीं डालता. 

बच्चन जी की कविता - हर हाथ लगी कविता को अमृता प्रीतम, बच्चन जी और गुलज़ार के नाम से वायरल करवाने की निकृष्ट कोशिश करने वालों को 'दवा नहीं दुआ की जरुरत है.'  क्योंकि इनकी बौद्धिकता पर पाला पड़ते देख ककहरा भी पीला पड़ चुका है और बारहखड़ी खड़ी अवस्था में ही मूर्छित पड़ी है.

ये बच्चा खो गया है - क्षमा कीजिए पर वो खोया हुआ बच्चा अब शादीशुदा है और उसके बच्चे के गुमशुदा होने की उम्र आ चुकी. बल्कि अब तो उसने ही साक्षात् उपस्थित हो इस पोस्ट को जड़ से मिटाने की भरसक कोशिशों में स्वयं को समर्पित कर दिया है पर आम जनता!! 'न, जी न! ऐसे ऐसे छोड़ दें! हम तो मिलवा के ही मानेंगे!' वैसे ये अपने जूते की दुर्गन्धयुक्त कंदराओं में दुबके मोजे तक नहीं ढूंढ पाते और हर बात में मम्मी-मम्मी करते हैं पर इस बच्चे के बजरंगी भाईजान बन जाना इनका ध्येय वाक्य बन चुका है. इन शुभचिंतकों से दंडवत प्रणाम के साथ यही विनम्र अनुरोध है कि ये कृपया भगवान् के लिए बस एक बार ही बता कर और उसके पश्चात जीवन त्याग इस धरा को पवित्र कर दें..  ...'नासपीटों! कहाँ से लाएं वो बच्चा? जो अब बच्चा नहीं रहा.'

आप पिछले जन्म में क्या थे? - इस जन्म का तो अब तक क्लियर हुआ नहीं और ये पिछले का बताने आ गए. वैसे भी इस तरह की लिंक यह भ्रांति उत्पन्न कर रहीं हैं कि पूर्वजन्म में सभी या तो राजघराने से थे या फिर महापुरुष, वो न हुए तो सुप्रसिद्ध बॉलीवुड कलाकार.  इससे यह तात्पर्य भी निकलता है कि महान बनने से कुछ विशेष लाभ नहीं होता, क्योंकि अगले जन्म में फेसबुक, व्हाट्स एप्प पर स्वयं को ढूंढते ही नज़र आना है. भावार्थ यह है कि आपने इस समय 'कचरे' के रूप में जन्म लिया है जबकि स्वच्छता अभियान अपनी प्रगति पर है. स्पष्ट शब्दों में कहूं तो 'दुर्गति वही, जगह नई.' अब आप नीले डिब्बें में गिरेंगे या हरे में, यह निर्णय स्वयं लेने का सौभाग्य प्राप्त करें. 

कौन आपसे सच्चा प्यार करता है? आपकी तस्वीर आपके बारे में क्या कहती है? - सुभानअल्लाह! बस यही दिन देखने शेष रह गए थे. अब इन बातों के उत्तर जानने के लिए हमें इन लिंक्स पर निर्भर रहना होगा? इनके बारे में हमसे बेहतर और कौन जान सकता है! लेकिन एक सुझाव है कि ये लोग कुछ धनराशि लेकर ही जवाब बताएं. दो ही दिन में करोड़पति बन जाएँगे क्योंकि जनता इस हद तक उत्सुक रहती है. इश्श, भोली जनता!

कौन आपका प्रोफाइल चोरी-छुपे देखता है? पिछले जन्म में आपकी मृत्यु कैसे हुई थी? कौन आपको मारना चाहता है? - बहुत ख़ूब! यही जानने को ही तो हम इस धरती पर पुन: अवतरित हुए हैं. कर्णपटल की गुफाओं में धंसे रुई के फाहों को निकालकर ध्यानपूर्वक सुनो और समझो ... हमें बताने से एक ग्राम भी लाभ न होगा. इतने चिंतित हो तो कृपया इसकी रिपोर्ट सीबीआई को भेजो. वैसे उनको बताकर भी कुछ विशेष नहीं होने वाला! :P

इस लिंक पर क्लिक करो आपके एकाउंट में 299 आएंगे- अच्छा! अबकी बार आपने जले पर नमक ही नहीं छिड़का बल्कि नींबू भी कसकर निचोड़ डाला है. वैसे ही कड़की के दिन चल रहे, अब बचे खुचे सिक्के इन चोर-उचक्कों को और लुटवा दें! जिन बेचारों पर नोटबंदी ने क़हर ढाया था वे अब तक उसके भीषण सदमे से उबर नहीं सके हैं. सुनो, ये बताओ...तुम उन्हें सीधे ही गोलियों से भून क्यों नहीं देते??  

समस्याएँ और भी हैं अतएव जो इस 'टॉप टेन' में स्थान नहीं पा सके, वे प्रसन्न न हों एवं अपना जीवन विशुद्ध निरर्थक ही समझें. 
बस, यही अंतिम इच्छा है कि काश! जनवरी के प्रवेश द्वार पर ये द्वारपाल न हों! यक्ष प्रश्न...क्या, 2018 में इन संतापों से मुक्ति मिलेगी?
भारी ह्रदय से यही बताना चाहूंगी कि बेरोज़गारी का दुःख इतना विशाल नहीं, जितना यह बन गया है. अब कुल मिलाकर इन सबसे मुक्ति ही इस मासूम जीवन का एकमात्र लक्ष्य रह गया है इसलिए आप इस पोस्ट को 9 समूहों में भेजकर, इतना शेयर करो, इतना शेयर करो कि मेरा आपका 7, 7 जन्मों तक रहे..... और, हाँ ... इस लिंक पर क्लिक करके शेयर बटन को हौले-से टच करना, ग़ज़ब मैजिक होगा..... हीहीही  :D :D
- प्रीति 'अज्ञात'

#इंडिया टुडे ग्रुप के ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म, ichowk पर प्रकाशित
https://www.ichowk.in/humour/how-social-media-is-making-our-life-complicated-and-how-we-can-tackle-the-various-problems/story/1/9342.html

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

संपादकीय - जनवरी 2017 ( हस्ताक्षर वेब पत्रिका) : क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं?

ये कैसी होनी है, जिसे हम विधाता पर डाल निश्चिन्त हो जाते हैं! उन बच्चों ने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी। कितनों की अधूरी ड्रॉइंग उनकी कल्पनाओं के रंग भरे जाने की प्रतीक्षा कर रही होगी, किसी की माँ ने उसके स्कूल से लौटने के बाद उसकी पसंदीदा डिश बनाकर रखी होगी, किसी के पिता उसे सरप्राइज देने के लिए उसका वही खिलौना खरीदकर लाये होंगे, जिसके लिए उसने बीते सप्ताहांत पूरा घर सिर पर उठा रखा था, दादा-दादी ने आज उसे सुनाने के लिए परियों वाली कहानी सोच रखी होगी। कितना दर्दनाक होता है वो मंज़र, जहाँ बच्चे के इंतज़ार में बैठे माता-पिता को उसके कभी न आने की सूचना दी जाती है, जहाँ गूँजती किलकारियों की आवाज़ गहरे सन्नाटे में बदल जाती है, जहाँ पलंग पर पड़ा बेतरतीब सामान किसी की राहें तकता है, जहाँ प्रतीक्षा उम्रभर का दर्द बन घर की चौखट से लिपट जाती है। आह, कई बार शब्द ही नहीं होते, जो किसी का दर्द बयां कर सकें। वो शब्द भी कहाँ बने, जो किसी का दर्द बाँट सके हों कभी!

बस दुर्घटना, ट्रेन दुर्घटना, स्त्रियों के प्रति अपराध जब-जब होते हैं
हम दुःख जताते हैं, अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। इसके अतिरिक्त अभिव्यक्ति का और कोई माध्यम भी नहीं! उधर अधिकारी मामले की पूरी जाँच का आश्वासन देते हैं। यदि घटना से कोई बड़ा नाम जुड़ा है, तो जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा। हंगामा या आंदोलन हुआ, तो सरकार द्वारा मामले को जाँच के लिए सीबीआई को सौंप दिया जाएगा। पीड़ित को ढाँढस बंधाने के लिए कुछ रुपए दिए जाएँगे और इस तरह बात ख़त्म हो जाएगी। पर मेरा सवाल यह है कि समस्या कब ख़त्म होगी? क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं? या कि हम सभ्यता के पाशविक काल में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं?

किसी इंसान की उसके ही घर में घुसकर हत्या कर दी जाती है लेकिन उसकी मृत्यु और उस परिवार के प्रति संवेदना के स्थान पर चर्चा इस बात की होती है कि फ्रिज़ में रखा माँस किसका था? 'मृत्यु' एक तमाशा भर बनकर रह जाती है!
लड़कियों को भरे बाज़ार परेशान किया जाता है तो कहीं उनका बलात्कार होता है, तलाश अपराधी की नहीं इस बात की होती है कि आख़िर वो घर से क्यों, किसके साथ और किन वस्त्रों को धारण करके निकली थी। यानी हम यह मानकर ही चलें कि पुरुषों की जन्मजात प्रवृत्ति तो ऐसी ही है और उनके सुधरने की तथा कुत्सित मानसिकता को त्यागने की कोई उम्मीद नहीं। इसलिए स्त्रियाँ ही स्वयं को क़ैद करके रखें? क्या इस सोच का कभी अंत होगा या कि हर मुद्दा, भुनाए जा सकने के लिए ही जीवित रखा जाता है?

जलीकटटू हुआ या कि चिंकारा या कोई भी अन्य जानवर। उनके प्रति हिंसा का विरोध होता है, होना भी चाहिए! उनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा है, लगना ही चाहिए। ऐसे मामलों में पूरा देश एक साथ खड़ा होता है, ये उससे भी अच्छी बात है कि हमारी संवेदनाएँ अब तक जीवित हैं। लेकिन जब किसी इंसान की लाश न्यूज़ बन सड़क पर पड़ी रहती है, किसी को दिन-दहाड़े गोली मार दी जाती है, किसी बच्चे को बुरी तरह पीटा जाता है तब मनुष्यता कहाँ चली जाती है? हर मौत के विरोध में आवाजें कहाँ ग़ुम हो जाती हैं? काश, मानवीय हिंसा पर प्रतिबन्ध हो!....हैवानियत पर प्रतिबन्ध हो! हर मृत्यु को गंभीरता से लिया जाए!

दरअसल दोषी के सुधरने की उम्मीद तो तब हो....जब किसी को भय हो। यदि बलात्कार की सज़ा, तुरंत फाँसी हो और वो भी एक सप्ताह के भीतर ही तय कर दी जाए तो क्या मजाल किसी की हिम्मत भी हो, लड़की को छूने की। पर ऐसा होता नहीं और न ही होने वाला है क्योंकि आधे तो नेता ही इसमें लटक जाएँगे और बाक़ी उनकी छत्रछाया में जीने वाले।
नोटबंदी से कुछ अच्छा जरूर हुआ होगा, सहमत हूँ। पर अब बढ़ते अपराध और गंदगी को मिटाना आवश्यक है, ये भ्रष्टाचार से भी ज्यादा जहरीले हैं। देश के विकास के लिए नोटमुक्त से कहीं अधिक, भयमुक्त समाज की आवश्यकता है। जब आधी आबादी घर में बंद है, तो विकास पूर्ण रूप से होने की आशा करना बेमानी लगता है।

कितना हास्यास्पद है कि लोग शौचालय बनाने के लिए भी सरकार की मनुहार की प्रतीक्षा करते हैं। कचरे को कचरेदान में डालना भी अब दूसरों को सिखाना पड़ रहा है, वो भी इस उम्र में आकर! कोई सेलिब्रिटी समझाएगा, तो ही समझ पाएँगे। थूकना, पिचकारी मार सार्वजनिक स्थानों को दूषित करना बदस्तूर जारी है। पहले हम इस सब से उबरें, फिर बात बने!

नए वर्ष में आप साईकल चलाएँ, हाथ मिलाएँ या फूल खिलाएँ....बस घर से निकले को, शाम उसके घर तक सकुशल पहुँचाएँ।
फुटपाथ पर सोये, ठिठुरते बचपन को उसका मौलिक अधिकार शिक्षा दिलाएँ।
अपराध को पैसे नहीं, सजा के बल पर ख़त्म कराएँ।
वाहन चालन का लाइसेंस उन्हें मिले, जिन्हें सचमुच वाहन चलाना आता हो क्योंकि ये सिर्फ उनके ही नहीं, कई लोगों के जीवन का मामला है।
कंक्रीट होते शहरों में कहीं-कहीं मिट्टी छुड़वाएँ कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन और साँस चलती रहे।
आओ, भारत को हम-आप, सुरक्षित सुंदर बनाएँ!
इन्हीं चली आ रही कभी सूखी-कभी हरी उम्मीदों के साथ-
नववर्ष मुबारक़!
गणतंत्र मुबारक़!

चलते-चलते: जब कुंभ मेला लगता है तो तमाम चित्रों से सबकी टाईमलाईन भरी रहती है। व्यापार मेला लगता है, तब भी यही दृश्य देखने को मिलता है। विश्वकप में तो भावुकता अपने चरम पर होती है लेकिन पुस्तक मेले के लगते ही एक विशिष्ट वर्ग को साँप सूंघ जाता है। क्यों, भई? एक अभिनेता हर चैनल में जाकर अपनी फिल्म का प्रचार करता है। खिलाड़ी भी विज्ञापन के माध्यम से अपना चेहरा जनता को याद दिलाते रहते हैं। संगीतकार और गायक भी अब पार्श्व में नहीं रहे। कंपनियों के विज्ञापन के जिंगल सब एक सुर में गाते हैं। नेता अपनी पार्टी के प्रचार और दूसरी के दुष्प्रचार का कोई मौका कभी नहीं छोड़ते। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री जी भी रेडियो पर अपनी बात सुनाने लगे हैं। तो फिर इस 'पुस्तक मेले' से ही किस बात की चिढ़? जिसे जाना है, जाए। जिसे नहीं जाना, वो न जाए! आप इतने कुंठित क्यों हैं?
दुःख इस बात का है कि पुस्तक मेले का सबसे ज्यादा सम्मान जिस वर्ग को करना चाहिए (करते भी हैं), वही इसका अपमान करने में भी पीछे नहीं रहता। यही हाल कुछ लोगों ने हिंदी का भी किया है। जिसकी घर में ही इज़्ज़त न हो तो गैरों से कैसी उम्मीदें? दुःखद है, बाक़ी उन्हें सोचना है जिनके कारण सवाल उठते हैं।
- प्रीति अज्ञात

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

जब तक जीवन शेष है, हर बात की गुंजाइश शेष है।

पता है तुम्हें? प्रत्येक स्त्री के जीवन में वह क्षण एक बार तो आता ही है जब उसे यह लगने लगता है कि किसी को उसकी ज़रुरत नहीं और उसके चले जाने से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। वो अपने-आप को जी भरकर कोसती है कि कैसे इसके लिए, उसके लिए; उसने सब कुछ किया। अपने त्याग भी मन-ही-मन गिनती है और उदास रहने लगती है। इसे हॉर्मोन्स के मत्थे मढ़ तसल्ली भले ही कर ली जाए पर इस तनाव, चिड़चिड़ाहट के बाद का पड़ाव अवसाद ही है। जो उसके अंदर जीने की इच्छा को ख़त्म कर देता है या फिर उसकी उपस्थिति दूसरों का जीना भी दूभर कर सकती है। स्त्री की समस्याओं को समझने और उसके निवारण के लिए जितने समय, धैर्य और सहानुभूति की आवश्यकता होती है....ज़िम्मेदारियों से जूझते पुरुष से उसकी उम्मीद कर पाना बेमानी ही है। आख़िर वह भी तो एक इंसान ही है, उसे कोई अदृश्य शक्ति या सुपरपॉवर नहीं मिली हुई हैं। इसलिए स्त्री को स्वयं ही ख़ुश रहना सीखना होगा...किसी और को ख़ुश करने के लिए नहीं बल्कि अपने भीतर की 'पीड़िता' को दूर भगाने के लिए। उसे मज़बूरी के बस्ते में बंद अपनी पसंद को झाड़-पोंछकर बाहर निकालना होगा। घर-गृहस्थी की व्यस्त्तता को सुव्यवस्थित करना होगा। याद रहे जब चाहत हो तो हर काम के लिए समय निकल आता है। चाहे वो बाग़वानी हो, पेंटिंग हो, पॉटरी, पढ़ाई, लेखन, संगीत कुकिंग या कोई भी शौक़। उम्र के गणित में क्यों पड़ना? जब तक जीवन है, हर बात की गुंजाइश शेष है।

जब आप दिल से हँसतीं हैं न, तो सारी प्रकृति गुनगुनाने लगती है। जीवन पहले से सरल हो जाता है। फूल-पत्ती, चाँद-तारे सब बोलने लगते हैं। पक्षियों की भाषा समझ आती है। नदी, पहाड़, झरने सब बाहें फैलाये अपने-से लगते हैं। ह्रदय की दहलीज़ पर सुनहरे ख़्वाबों की बेरोकटोक आवाजाही शुरू हो जाती है। मन ख़ूब जोरों से खिलखिलाता है। मारकाट और ख़ुन्नस भरी दुनिया में इन मुस्कुराहटों की बड़ी आवश्यकता है।है, न!
- प्रीति 'अज्ञात' 
* अपनी मित्र के लिए स्नेह सहित 

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

उत्तर की तलाश सभी को है पर प्रश्न करने का जोख़िम कोई नहीं उठाना चाहता!

सारे राजनीतिक दल देशवासियों को एक साथ भ्रष्टाचार से लड़ने, देश को गरीबी से मुक्त करने, रोजगार उपलब्ध कराने के खोखले वायदे तो ख़ूब करते हैं पर क्या हमने इन्हें ख़ुद, किसी भी मुद्दे पर एक साथ खड़े देखा है? क्या इन्होंने देश की किसी भी समस्या का समाधान मिलजुलकर निकालने की कोशिश की है? नहीं, न क्योंकि इनका तो पूरा समय एक दूसरे पर कीचड़ उछालने, आरोप-प्रत्यारोप और बेतुकी बातों में जाया होता है। ये हमारे देश के दुश्मनों के नहीं बल्कि एक-दूसरे के ख़िलाफ़ सबूत ढूँढने में ज्यादा रूचि लेते हैं। इन्हें देश की नहीं अपनी कुर्सी की चिंता है और इनका पूरा समय उसे टिकाने की कोशिशों में और स्वयं को दूसरी पार्टी से बेहतर बताने में ही बीत जाता है। पार्टियाँ आती रहीं, स्वयं को श्रेष्ठ बताती रहीं और अपने कार्यकाल में विरोधी पार्टी की कमियाँ गिनाती रहीं। उनके बंद केस खुलवाकर जनता के सामने रखती रहीं। क्या इससे देश का विकास हुआ ? सत्तारूढ़ पार्टी के जाने के बाद आने वाली हर पार्टी ने भी यही प्रोटोकाल दोहराया। इतिहास को हर बार उल्टा-पलटा गया। जनता हर बार confuse हुई, हर बार ही उसने अपने निर्णय के लिए ख़ुद को धिक्कारा। और फिर अगली बार दिमाग़ से वोट डालने की सोची, पर हर बार वही ढाक के तीन पात। हम बेवकूफ़ से कहीं ज्यादा मजबूर हैं। राजनीति में सारे नेता ही बुरे हों, ऐसा भी नहीं!
दुर्भाग्य यह है कि इस 'व्यवसाय' में मात्र अच्छी सोच रखने से ही कुछ नहीं होता, सर्वसम्मति की आवश्यकता होती है जो कि मिलती ही नहीं क्योंकि दूसरे दलों को देश से ज्यादा अपनी नाक की फ़िक्र हैइसलिए समस्याएँ अब तक इसलिए नहीं जीवित हैं कि इनमें सुलझाने का माद्दा नहीं , समस्याएँ इसलिए जीवित हैं क्योंकि इनमें सुलझाने की चाहत ही नहीं!

कभी बीजेपी है, कभी कांग्रेस है , कभी आप है , कभी समाजवादी पार्टी। लेकिन इन सबके बीच मेरा देश कहाँ है? इनके मुद्दों में देश कहीं है ही नहीं।
जो देशवासियों से एकता का आह्वान करते हैं वे  संसद में खुद जूतमपैज़ार करते हैं। 

मीडिया हाउस में भी स्वयं को नंबर 1 देखने की होड़ है। कितना अच्छा होता यदि सारे चैनल मिलकर देश को प्रथम रख इसकी उन्नति के लिए कार्य करते। पर कुछ सत्ता के चाटुकार बने बैठे हैं और कुछ ने विपक्ष का मोर्चा संभाल लिया है। कुछेक को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी दूध पीने वाले पत्थर, चोटी काटने वाला भूत, मक्कार स्वामी ओम  और लोगों को बेवकूफ़ बनाती राधे माँ में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। राम-रहीम, हनीप्रीत टाइप तथाकथित लव स्टोरी या किसी मंत्री की सेक्स सी डी मिलते ही इनकी बांछें खिल उठती हैं। क्या इन समाचारों की देश को वाक़ई जरुरत है? 
अंधविश्वास की ख़बरों को दिखाकर उन्हें बुरा बोलने वाले ये सभी चैनल सुबह से आपकी राशि और भविष्य की दुकान खोल लेते हैं। दोपहर में कोई प्रायोजित शक्तिवर्धक या लम्बाई बढ़ाने का टॉनिक बेचता एक घंटे का विज्ञापन चलता है तो कहीं निर्मल बाबा जैसे 'सुधारक' और 'कल्याणकारी बाबा' लोगों की समस्याओं का इलाज समोसे-चटनी के साथ करते नज़र आते हैं। क्या इन चैनलों ने आम आदमी की समस्या और सुधार पर विस्तार से बात की है कभी?? यदि की है तो कितने मिनट? हत्या हो या कोई भी अपराध, उसकी लम्बी चर्चा भी ये तभी करते हैं जब वो हाई प्रोफाइल केस हो। आरुषि हत्याकांड में भी हेमराज का नाम लेने वाला कोई न था।

हाँ इतना तो जरूर मानना पड़ेगा कि मीडिया संवेदनशीलता का परिचय भले ही न दे पाता हो पर हम तक ख़बरें पहुंचाने के लिए धन्यवाद का पात्र तो बनता ही है स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ कैम्पेन को हम सब तक पहुँचाने में और पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी संदेशों के माध्यम से इन्होने देश के विकास में थोड़ा योगदान तो दिया है। ख़ुशी की बात है कि कुछ हैं जो सही स्टोरी दिखाते हैं, सच को सामने रखने का हौसला रखते हैं पर दुःख ये है कि ज्यादा सच बोलना देशद्रोह में गिना जाने लगा है। 
हम सहिष्णु भारत के सहिष्णु नागरिक हैं लेकिन जब अपनी पर आती है तो बर्दाश्त नहीं होता। कभी बैन लगा दिया जाता है तो कभी फ़तवे का ख़तरा लहराता है।

दुनिया के सामने हम एक हैं लेकिन चुनाव के समय कोई ठाकुर है, राजपूत है, शिया-सुन्नी है, यादव है, पंडित है, ईसाई है, पारसी है, सिख है, जैन है, पिछड़ा वर्ग है, अल्पसंख्यक है। 
एडमिशन के समय भी हम यूँ ही अलगअलग धर्मों में बँट जाते हैं।
दंगों में तो अलग-अलग होना नियम ही बन गया है। हम अपने ही देश की जमीं पर खड़े हो, उसी का सत्यानाश मिलजुलकर करते हैं।  तोड़फोड़ करते हैं, आग लगाते हैं। 
हम एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना पर मिल-बाँटकर खाने की बात करते हैं लेकिन एक राज्य जब दूसरे का पानी रोक ले तो हम अपनी-अपनी पाली में जाकर उसका समर्थन करने लगते हैं।
सर्व धर्म समभाव हमारा स्वभाव है और हमें सबके गुणों का आंकलन उनके कर्मों के आधार पर करने की सीख दी गई है लेकिन आजकल हम गुजराती, बिहारी, मराठी, पंजाबी, सिख, उत्तर-दक्षिण भारतीय बन एक-दूसरे की भाषा, बोली और त्यौहारों की धज्जियाँ उड़ाने लगे हैं। सेवन सिस्टर्स को तो हम भारतीय मानते ही नहीं! मुंबई से फ़रमान जारी होता है कि बिहारी और यू पी वाले चले जाएँ तो दूसरे प्रदेश अन्य प्रदेश को कोसने लग जाते हैं। पर इन सबके बीच में मेरा हिन्दुस्तान कहीं खो जाता है।

आख़िर हम कब अपने-अपने धर्म के खोलों से बाहर आएँगे ? कब हम हर राज्य और उसके निवासी को अपना मानेंगे? कब हम राष्ट्रीय संपत्ति को अपना समझ उसकी रक्षा में सहायक बनेंगे? कब हम अपने देश को स्वार्थ से ऊपर रखकर सोचेंगे? कोई कट्टर हिन्दू है तो कोई कट्टर मुसलमान। 
मेरा सवाल है....हम कट्टर भारतीय क्यों नहीं हो सकते? हमारा धर्म भारत क्यों नहीं हो सकता? देश के विकास के लिए सारे दल, सारे मीडिया हाउस एकजुट क्यों नहीं हो सकते? सिर्फ़ किताबी निबंधों में ही नहीं.....हम सच में एक क्यों नहीं हो सकते?
- प्रीति 'अज्ञात'
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