गुरुवार, 30 मार्च 2017

मॉनिटर, की-बोर्ड, माउस

बात इतनी पुरानी है कि यदि तिथि याद होती तो हम पक्का इस घटना की 'रजत जयंती' मना रहे होते। ख़ैर, अपन को तो किस्से से मतलब! हुआ यूँ कि तब 'कंप्यूटर' नया-नया आया था। सच्ची कहूँ तो मुझ गँवार ने तो ये नाम ही पहली बार सुना था। देश में 'कंप्यूटर क्रांति' आने वाली है, फलाना-ढिमका टाइप की बातें कानों में पड़ती रहतीं थीं। हम कुँए के मेंढक, समझ ही न आता था, ये मुआ है क्या? दिखता कैसा है? या ख़ुदा!इससे करते क्या हैं? एक बार दिखा तो दे कोई! दिमाग इतना पगला गया था कि एक दिन खुन्नस में आकर इसपे कविता भी लिख दिए थे। :D पूरी कविता बाद में कभी चेपेंगे, बस इत्ता जान लो कि वो हम श्री राजीव गाँधी जी को ही लिक्खे थे और वो प्रादेशिक समाचार-पत्र में प्रकाशित भी हुई थी।
फिर एक दिन वो सुरीली सुबह भी आई जब इस अज्ञात को ज्ञात हुआ कि शहर में एक कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र खुल रहा है। उफ़, फिर क्या था अपुन के ह्रदय के सारे तार झनझना उठे, मन मयूर नृत्य करने लगा, तमाम सपने आँखों में गुलाटियां लगाने लगे और एन उसी वक़्त इस टोटल फ़िल्मी सिचुएशन को सूट करता हुआ चित्रहार पर हर हफ़्ते नियमित परोसा जाने वाला कर्णप्रिय गीत बजने लगा "आज फिर उनसे मुलाक़ात होगी..."
हम भी अपना गर्दभ-राग तुरंत ही जोड़ सुर मिलाने लगे....."फिर होगा क्या, क्या ख़बर क्या पता" अब किसी को क्या बतायें कि राकेश रोशन की गोल-मटोल आँखों में हम एवीं थोड़े न डूबे थे और हमारी निष्ठता अब तक जारी है, उनके ग्रीक गॉड टाइप बेटे जी पर भी फ़िदा होकर परंपरा का पूर्ण निर्वहन धकाधक करे जा रहे हैं। :P

चलो, मुद्दे पे आते हैं.....एक पावन दिवस पर हमने धड़कते दिल से उस महान इंस्टिट्यूट(हलंत लग नहीं रहा) में एडमिशन लेकर स्वयं को पदोन्नत करने का सौभाग्य प्राप्त किया। शायद तीन माह का जावा, कोबोल, सी प्लस नाम का कोई कोर्स था। वो सब तो ठीक, पर अपन को तो कंप्यूटर जी के दिव्य-दर्शन की बेहिसाब तड़पन जीने नहीं दे रही थी। पहला दिन जैसे ही हम वहाँ पहुँचे तो मंदिर के बाहर जैसा दृश्य देख दिमाग झन्ना गया। वही तितर-बितर चप्पलें, बुनाई की सलाइयों सी एक उल्टी-एक सीधी, कोई सीढ़ी पे पड़ी तो कोई नाली में गिरने को तैयार! जैसे-तैसे ख़ुद की भावनाओं पे कंट्रोल कर अपनी जूतियाँ सलीके से रखीं और एक-दो और वहीं खिसकाकर पंक्ति  बनाने का बेहूदा और निष्फल प्रयास किया। इधर मिलन की प्रसन्नता अब भी चेहरे पे टपकी पड़ी थी। :D

अंदर पहुँचे। अबकी बार इंस्टिट्यूट इसलिए नहीं बोले क्योंकि वो कुल जमा एक कमरा ही था। घुसते ही क्लासरूम वाला फ़ील आया। "हाय, अल्ला...पढ़ना पढ़ेगा का? पहले कंप्यूटर तो दिखाओ न! हम कबसे मरे जा रहे!" ये सोच ही रहे थे कि आकाशवाणी हुई, "बैठ जाओ।" हम उसी पल सटाक से विराजमान हो गए। यूँ हम कुर्सीलोलुप इत्तू से भी नहीं, पर तब एकदम भयंकर वाला यक़ीन था कि मंज़िल हियाँ से ही मिलेगी। लेकिन ये क्या, बैठते ही सर जी ने एक-एक फाइल सबको पकड़ा दी। कत्थई रंग की उस बैगनुमा फाइल पर श्वेतवर्ण से तथाकथित संस्था का नाम चमक रहा था। अंदर हमरा id और कुछ प्रिंटेड मैटर था। इधर हमारी बेचैनी अपनी चरम-सीमा पर थी। निगाहों को 180 डिग्री पर घुमाकर कक्ष का जायज़ा लिया तो एक पर्दा नज़र आया। "अच्छा, तो कंप्यूटर महाशय उहाँ लजाय रहे।"अपने अंदर के सुप्त करमचंद पर गर्व करके हम उन ताज़ा टीचर की बात ध्यान से सुनने का टॉप क्लास नाटक करने लगे। ;)
उन्होंने ह्यूमन एनाटॉमी की तरह संगणक (कंप्यूटर ही है रे) के विभिन्न अंगों का सचित्र वर्णन किया। यहाँ हम स्पष्ट करते चलें कि ये आपका लैपटॉपवा जैसा नहीं, बल्कि डेस्कटॉप हुआ करता था। जो टेबल के ऊपर और नीचे की जगह ठसाठस भर देता था। और उसपे इत्ता भारी कि हाय दैया! का बताएँ!

सर से सारे नाम सुनकर याद भी कर लिए, मॉनिटर (उससे पहले हम सोचते थे कि ये कक्षा में हमहि हो सकते थे), की-बोर्ड (ही-ही, इसको भी हम तब तक बस चाबियाँ टांगने का कुंडा ही समझते आये थे) और माउस (इसपे तो हम ही नहीं पूरी क्लास चील-बिलइयों सी हँस-हँस लोटने लगी थी)। अचानक ही अनपढ़ से एजुकेटेड वाला फ़ील पाकर हम सब धन्य हो चुके थे। आज के लिए बहुतै ज्ञान लूट चुके थे। पर 'दिव्य-दर्शन' अभी शेष थे।

सर जी ने बोला कि पहले समझ लो, फिर दिखाएँगे। वैसे तो हम आज्ञाकारी ही हैं पर उस दिन नियम-भंग कर चिलमन में अपनी मुंडी घुसेड़ झाँक लिए थे। अहा, क्या ठंडा-ठंडा एसी चल रहा था और एक चौकोर टेबल पर कंप्यूटर जी किसी नई दुल्हनिया की तरह तमाम आवरणों में लिपटे हुए थे।अचानक पहली बार हमें अपने इंसान होने का दुःख हुआ और लगा काश, हम कंप्यूटर होते तो यूँ पसीने-पसीने तो न हो रहे होते। :(

उस दिन दर्शन-लाभ के बिना घर तो आ गए पर तुरंत ही अवैतनिक तौर पर इसका प्रचार प्रारंभ करने में हमने जरा भी कोताही नहीं बरती। "पता है, उसको एसी में रखना पड़ता है। बाहर का है न! गर्मी में ख़राब हो जाता है। बिना जाने छूना भी नहीं चाहिए। बहुत महंगा आता है।" हम कहते और सुनने वालों की पुतलियाँ जिज्ञासा में चौड़ा जातीं। "अच्छा!" :D

रोज पर्दा हटाकर दर्शन करा दिए जाते और इस तरह बिना समझे-बूझे और बिना टच किये कोर्स भी हो गया। वही एक आने का ज्ञान अंत तक टिका रहा.....मॉनिटर, की-बोर्ड, माउस! कंप्यूटर किसी मॉडल की तरह अपनी जगह रखा रहता और हम उसके तमाम अंगों के नाम घोंटते। अब हमारा दम भी घुटने लगा था। छोटे शहर के भोले-भाले बच्चों को उल्लू कैसे बनाया जाता है, इस बात से भी मन उदास रहने लगा था। एक दिन हमने अपने चकनाचूर ह्रदय से कंप्यूटर के इस्तेमाल का स्वप्न सदा के लिए उखाड़ फेंका। कागज़ों पर हम उत्तीर्ण थे पर असलियत भी खूब पता थी। लेकिन तीन दुष्ट नाम अब भी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में अबाध गति से बहते हैं, मॉनिटर, की-बोर्ड, माउस! :D 
- प्रीति 'अज्ञात'
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उसी दौरान भैया का MCA में चयन हुआ। बाद में कैंपस इंटरव्यू में भी सीधे ही जॉब मिला। यह विश्वविद्यालय का पहला बैच था और हम सभी खूब गौरवान्वित हुए। अब तक हैं। अब मुझे ये सब सीखने के लिए कहीं बाहर जाने की जरुरत नहीं थी। ये अलग बात है कि फिर मेरा ही मोह भंग हो चुका था और मैंनें अभी कुछ वर्ष पहले ही सीखा है। पर इतना नहीं आता कि किसी पे रौब झाड़ सकें। जरुरत भी क्या है? सीखते रहने की गुंजाईश भी तो बनी रहनी चाहिए! :)

सोमवार, 13 मार्च 2017

बुरा न मानो, होली है!

मुझे होली में इंटेरेस्ट सिर्फ़ गुजिया खाने के लिए ही है। 
ये अकेला त्यौहार है जिससे मैं भागती फिरती हूँ। दरवाजे की घंटी बजते ही जी घबराने लगता है। तरह-तरह के बुरे ख़्याल गुजिया के अंदर से कुदक सरपट बाहर दौड़ने लगते हैं। दिल हैंडपंप सा धचाक-धचाक ऊपर-नीचे शंटिंग करने लगता है। मस्तिष्क की तमाम तंत्रिकाएँ, शिराओं और धमनियों में एक भूचाल-सा आ जाता है। और रगों में सहमता लहू, समस्त ज्ञानेन्द्रियों को दस्तक देता हुआ पूछता चलता है, "हाय अल्लाह, कौन आया होगा? कहीं उसके पास कीचड़ या कोलतार से भरी बाल्टी तो न होगी? हमें सिल्वर पेंट लगाकर रोबोट तो न बना देगा। फिर हम खुद को कैसे पहचानेंगे? हमारी पहले से ही ड्राई पड़ी स्किन अब घड़ियाल-सी तो न हो जायेगी? फिर चश्मे का क्या होगा?" उसके बाद तो जैसे चक्कर ही आने लगते हैं...आँखों के आगे मुआ अँधेरा ही दिखाई देता है। इतने बुरे ख़्यालों से और ज्यादा सोचा ही नहीं जाता।

बड़ा गुस्सा आता है बचपन में देखी गई होली पर। ओ मोहल्ले के हुल्लड़ी लड़कों, तुम इत्ता भयानक कैसे खेल लेते थे कि खुद को शीशे में देखने के बाद तुम्हारी ही चीख निकल जाती थी। आंटी जी भी तो तुम्हें किसी और का बच्चा समझ बाहर से ही रफ़ा-दफ़ा कर देती थीं। फिर तुम्हारी खिसियाती आवाज़ से उनको पता चलता था कि हाय, ये तो हमरा बिटवा ही निकला। हम जैसे फटटू तो बिन खेले ही सबकी शक्लें देख यक़ायक़ बेहोश हो जाते थे। आँख खोलते ही तुरंत बीमार वाली एक्टिंग करने लगते थे। क़सम से, ऐसा भयानक डर बैठा हुआ है कि मार्च को टच करते ही हम सीधा अप्रैल में पहुँच जाना चाहते हैं।

हाँ,  सच्ची! हमें उस दिन  दरवाजे की घंटी बजते ही ऐसा लगता है कि बिलकुल अभी-का-अभी धरती फटे और हम उसमें समा जाएँ। हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारे जैसे और भी लोग जरूर होंगे, उन पर हमें एडवांस में ही बड़ा भयंकर वाला गर्व हो रहा है। तुमसे ही हमारा जीवन रोशन है।

और हाँ, जिनको होली खेलनी है, खूब खेलें। जमकर खेलें जी। संस्कृति का संरक्षण करना भी उत्ता ही जरुरी है। वैसे भी हमारा कोई बैर थोड़े ही न किसी से। सूखे रंगों से हमें भी कोई एतराज़ ना! बाक़ी सबसे डर लगता है तो अब हम का करें?

पर फिर भी हमारी इत्ती-सी एकदम ही टुच्ची टाइप सोच है कि रंग कैनवास पर ही अच्छे लगते हैं। बगिया के फूलों पर जंचते हैं और आसमान पर इंद्रधनुष फैले तो हाईला.....जैसे बौरा जाता है मनवा! पर ये क्या कि ख़ुद पर ही पोत लो। 
जाओ, अब मुँह न फुलाओ। हम सरकार थोड़े ही न, जो बन लगा देंगे। और सुनो, अगली पोस्ट पे मुँह धोकर आना। डेटॉल भी इस्तेमाल करना, हम माइंड नहीं करेंगे। हालाँकि हमें ब्रांड एंडोर्समेंट का एकहु रुपैया नहीं मिला है। ख़ैर....ज़िंदगी दुःक्खों का बड़का वाला पहाड़ बन गई है। 
चलो, कोई न! बर्दाश्त कर ही लेंगे जी। हमारी क्या? आधा किलो गुजिया के लिए सब कुछ मंज़ूर है हमका!
हैप्पी वाली होली, सबको। खूब खेलो...!
रंग दो सारा आसमान!
बुरा न मानो, होली है! बुरा मान भी जाओ, तो हम जिम्मेदारी काहे लें?
- प्रीति 'अज्ञात'


बुधवार, 1 मार्च 2017

'मेरे सपनों का भारत'..... ऐसा तो कभी न था!

जो जितना ढोंग करे वो उतना ही मैला है यहाँ!

यह कैसा दुर्भाग्य है कि बात को समझे बिना 'पाकिस्तान' नाम सुनते ही, उसे बोलने वाले पर आप तत्काल 'देशद्रोही' का टैग लगा देते हैं?
क्या है देशभक्ति? 
* किसी शहीद के निधन पर दो फूल चढ़ा एक सेल्फी खिंचा लेना?
उसके बाद उसके घर जाकर कभी न पूछना कि उसके परिवार का क्या हुआ?
* उसके माता-पिता किस हाल में हैं? उसकी विधवा पत्नी घर कैसे चला रही है? कितने चक्कर काट रही है?
* हाँ, आप गर्व महसूस करते हैं कि उसने अपने देश के लिए जान दी लेकिन उस फौज़ी की आत्मा यह सोच कितना तड़पती और बिलखती होगी कि उसने 'किन जैसों के लिए' अपना जीवन बलिदान कर दिया! उन जैसों के लिये जो उसकी बेटी के बहते आँसुओं और शब्दों में उसके अनाथ होने का दर्द नहीं देख पाते! जो उसके ज़ख्म पर मरहम रखने की बजाय उसका 'रेप' करने की धमकी दे डालते हैं। क्योंकि वह युद्ध का समर्थन नहीं करती। क्योंकि इस युद्ध ने ही उसे उसके पिता से ज़ुदा कर दिया। वाह, क्या ईनाम मिला है एक शहीद को अपनी जान गँवाने का!

क्या मिला है युद्ध से?
आपको 'पाकिस्तान' नाम सुनाई दिया पर वह भाव नहीं जो युद्ध को गलत ठहराता है? आख़िर क्या मिला है युद्ध से कभी? और क्या मिल सकता है आगे? मुद्दे तो अब तक जस-के-तस हैं। तो फिर क्यों सही है युद्ध? क्या आप इसे इसलिए सही ठहराते हैं-
* क्योंकि आपकी पिछली सात पीढ़ियों में से कोई भी आर्मी में जाने की हिम्मत न जुटा पाया?
* क्योंकि आप अपने आलीशान घरों में पलंग पर बैठ, टीवी देख 'ओह्ह' बोलकर अपनी देशभक्ति का नमूना दे पुनः बर्गर खाने में व्यस्त हो सकते हैं।
वाह री ढोंगी संवेदनाएँ!! जो किसी अपने को खो देने का दर्द तक महसूस नहीं कर सकतीं। पर हैं आप देशभक्त!!

देशभक्ति दिखानी है?
* देशभक्ति दिखानी है तो 'रेपिस्ट' को तत्काल फाँसी देने का कानून कागजों के बाहर लागू करवा के दिखाओ।
* तुम्हारी रगों में उस वक़्त देशभक्ति का लहू क्यों नहीं थरथराता जब स्त्रियों और छोटी बच्चियों को तुम जैसों की गन्दी निगाहें रोज नोच खाती हैं? जिन्हें अकेला देखते ही तुम्हारे 'हॉर्मोन्स' में उबाल आने लगता है। तुम ये कैसे भूल जाते हो कि तुम्हारे अपने घर में भी उसी समय तुम्हारी पत्नी या बेटी अकेली है?

'रेप' की धमकी देना या 'रेप' कर देना किसी को चुप कराने का सबसे कारगर उपाय बन चुका है क्योंकि न तो बलात्कारी को कोई सज़ा होती है और न ही धमकी देने वालों को। क्या ये 'देशभक्त' की श्रेणी में आते हैं???
नहीं न! तो फिर इनके खिलाफ़ कोई भी राजनीतिक दल आवाज़ बुलंद क्यों नहीं करता? इस विषय पर कभी गंभीरता से क्यों नहीं सोचता? क्यों अब तक कोई कुछ न कर सका है? सत्ताधारी दल के हाथ इतने दशकों से क्यों बंधे हुए हैं? क्या सचमुच इतना मुश्किल है, किसी रेपिस्ट को फाँसी देना? कहीं हर पार्टी को स्वयं के वीरान होने का डर तो नहीं सताता? इनके कारनामे तो जगज़ाहिर हो ही चुके हैं। 

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के भी गिने-चुने लोग ही इस मुद्दे पर बात करते हैं। बाक़ी के मुँह क्यों सिल जाते हैं? इस विषय पर इनका जोश ठंडा कैसे पड़ जाता है?
ज़ाहिर है चाहे नेता हो या खुद को नामी बताने वाले तथाकथित उच्चकोटि के पत्रकार, या किसी भी क्षेत्र से जुड़े नामी लोग। इनमें से 'कई' ऐसे हैं जो किसी-न-किसी तरह से स्त्रियों का शारीरिक शोषण करते आये हैं। हाँ, सरेआम उन्हें 'देवी' कहने से ये कभी नहीं चूकते होंगे। जो जितना ढोंग करे वो उतना ही मैला है यहाँ!

बधाई हो!
* बधाई हो! किसी ने अपने शब्द वापिस ले लिए!
* बधाई हो! कोई लड़की 'रेप' से डर गई। 
* बधाई हो! तुम्हें सच्चे देशभक्तों का समर्थन मिला है। अब जाओ, और अपने विचारों पर अमल की शुरुआत अपने ही घर से करना। आख़िर घरवालों को भी तो तुम्हारी देशभक्ति पर गर्व हो!
* बधाई हो! तुम्हारे घर से कोई सेना में नहीं!
* बधाई हो! तुम्हें उन नेताओं का समर्थन है जिन्हें जनता ने अपना हमदर्द समझकर चुना है।
* बधाई हो! तुम्हें उस क्रिकेटर का भी समर्थन मिला है जिसके लिए हमने लाखों तालियाँ पीटी हैं 
* बधाई हो! तुम्हारी जीत हुई!
* बधाई हो! तुमने सच को आज भी बर्दाश्त नहीं किया।
* बधाई हो तुम्हारी घृणित और गिद्ध निगाहें धर्म और देह के अतिरिक्त और कुछ देख ही नहीं पातीं। 
* बधाई हो! तुमने वही सुना जो सुनना चाहते थे। देखना, अब जब भी किसी शहीद की मृत्यु पर टीवी कैमरा ऑन होंगे और आँसू छलकाते उसके  माता-पिता ये कहते मिलेंगे कि वो अपने दूसरे बेटे को भी आर्मी में ही भेजेंगे। तो फिर से तुम्हारा एक सेंटीमीटर का सीना सवा सेंटीमीटर का तो जरूर हो जाएगा। लेकिन तुम उन बूढ़ी आँखों में अब ये नया पैदा हुआ 'भय' नहीं देख पाओगे कि कहीं तुम लाश पे बिलखती उस सैनिक की विधवा और उसकी अनाथ बेटी के साथ......!

चीरहरण करने वाले इन दुशासनों के बीच रहते हुए ऐसे न जाने कितने परिवार, कब ख़त्म हो जाते हैं, कब उस घर की महिलाओं की अस्मत के साथ खिलवाड़ होता है , कब उन्हें चाकू से गोदकर उनकी लाश वहीँ सड़ते रहने को छोड़ दी जाती है, इसकी फ़िक्र करने वाला कोई नहीं। इस तरह के 'हादसों' की कहीं कवर स्टोरी नहीं बनती!
सभ्यता, संस्कृति और विकास की बातों के बीच इस तरह की घटनाएँ मन विचलित कर देती हैं। अवसरवादी संगठनों का देशभक्ति की बीन पर, हर बार की तरह इस मुद्दे पर भी ज़हर उगलने का प्रयास जारी है।

निरंकुश समाज में 'न्याय' अब एक बहुमूल्य शब्द है, बिलकुल कोहिनूर हीरे की तरह! इसे पाने की उम्मीद लिए न जाने कितने जीवन नष्ट हो चुके या मौन कर दिए गए! कोई नहीं जानता। जानने से होगा भी क्या? 
संख्या बढ़ती ही रहेगी और हम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों को पलट, कुछ पल शून्य की तरफ निहारते हुए, मौन हो, भारी मन से उस पुस्तक को पुन: जगमगाते काँच की अल्मारी में रख उदासी-उदासी का पुराना खेल खेलेंगे।

आह! 'देशभक्ति' और 'देशद्रोह' की नई परिभाषाएँ गढ़ता और उन्हें नित दिन फुटबॉल की तरह उछालता मेरा भारत!
'मेरे सपनों का भारत'..... ऐसा तो कभी न था!
- प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

ऐसे भी कोई जाता है क्या!

दस वर्ष से भी अधिक समय हुआ जब मैं उनसे पहली बार मिली थी। मिलना भी क्या, इसे टकराना ही कहना उचित होगा। ठीक पौने ग्यारह बजे मैं अपने घर से जिम को निकलती और रास्ते में हम एक-दूसरे को देखते। धीरे-धीरे मुस्कान का आदान-प्रदान भी होने लगा और फिर कभी जब वो चेहरा न दिखता तो चिंता होने लगती थी। एक अपनापन-सा हो गया था। एक बार ऐसा भी हुआ कि मैं अन्य प्राथमिकताओं के चलते दो दिन जा न सकी थी। फिर जब गई तो अचानक ही एक आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। "अरे, रुकिए न!" मैं अचकचाकर रुक गई। कुछ कहती, इससे पहले ही उन्होंने कहा "आप कितना प्यारा हँसती हो... और ये बाल कहाँ सेट करवाये? आप पर बहुत सूट करते हैं।" इस बात से भी ज्यादा उनके आँखें मचमचाकर कहने के अंदाज़ ने मेरा मन मोह लिया था और फिर बातों-बातों में ही पता चला कि हम दोनों एक ही जगह जाते हैं बस timings अलग हैं। धीरे-धीरे हम दोस्त भी बन गए। 

वो अपने सिर को स्कार्फ़ से ढका करतीं थीं। बाद में पता चला कि उनको breast cancer हुआ था। ट्रीटमेंट भी पूरा हो चुका था। पर फिर brain और शरीर के अन्य हिस्सों पर भी इसका असर होने लगा और बीते सत्रह वर्ष उन्होंने इसी बीमारी के साथ गुजारे। मुझसे बहुत सारी बातें शेयर करतीं थीं और बच्चों-सी छोटी-छोटी ख़्वाहिशें भी। जैसे कभी उन्हें फ़ूड कोर्ट में जाकर पिज़्ज़ा खाना होता था तो एक बार गांधी घड़ी लेने की धुन सवार हुई थी। और फिर हम दोनों साथ जाकर इच्छा पूरी करने के बाद ही चैन से बैठते। यहाँ ये जरूर बताना चाहूँगी कि उस गाँधी घड़ी का शौक़ मुझे भी था और उनके बहाने से मैं भी ले आई थी।

कई बार मेरे कॉल न करने या घर न जाने पर वो नाराज़ होती भीं तो ख़ुद ही कह देतीं कि देख, तू खिलखिलाकर हँसना मत, वरना मैं तुझे गाली नहीं दे पाऊँगी। जाहिर है, मैं हँस देती थी।हम दोनों ही जानते थे कि ये दिल का रिश्ता है जो बंधनों का मोहताज़ नहीं! अज़ीब-सा रिश्ता था ये, कि उन्हें मुझ पर गर्व होता था और मैं उनसे प्रेरणा लिया करती थी। उन्हें अपने कम पढ़े-लिखे होने का बहुत मलाल रहता था लेकिन उनसे बेहतर, सभ्य और ज़िंदगी को सकारात्मक तरीके से जीने वाला इंसान मैंनें आज तक नहीं देखा! हर काम स्वयं करतीं थी और वो भी बिना शिकायत। 

मैं जितना सरप्राइज़ से चिढ़ती हूँ, उन्हें उतना ही मज़ा आता था। ठीक से याद नहीं पर शायद सितंबर 2016 में कभी मैं अपनी फ्रेंड नीता के साथ (जो कि अमेरिका से आई हुई थी) उनके घर दोपहर अचानक ही पहुँच गई थी। मैडम जी चटखारे लेकर दालबडे (जिसे मैं मंगौड़े कहती हूँ) खा रहीं थीं, वो भी हरी मिर्च के साथ। उनकी कोई दोस्त लेकर आई थी। फिर हमने साथ में चाय बनाई। यादगार पल थे। सरप्राइज़ पाकर वो भी खिल उठीं थीं। 

उसके कुछ दिन बाद वो मेरे घर आईं। बेहद कमजोर हो गईं थीं। 
"देख लेना, एक दिन मेरी अर्थी तेरे घर के सामने से ही जायेगी और तुझे पता भी नहीं चलेगा।" स्नेह भरे उलाहने के साथ मेरे कंधे पर थपकी मारते हुए उन्होंने कहा था। 
"ऐसा करना, सुबह पौने सात पर निकलना। उस समय मैं बेटी को बाय करने बाहर वाले गेट पर ही होती हूँ।" उन्हें हँसाने के उद्देश्य से मैंनें मज़ाकिया लहजे में कहा। 
"ओये, मुझे कैसे पता चलेगा कि कब ले जाएँगे। चल, मैं अपने हसबैंड को बोल दूँगी कि जब बेसना की सूचना पेपर में दें, तो मेरे बड़े वाले फोटो के साथ दें।" इस बार उनके भाव में थोड़ी संज़ीदगी थी। 
मेरी आँखें भी भर आईं थीं। उनके गले लिपटते हुए बोली, "कुछ नहीं होगा आपको। अभी तो अगली बार मेरे साथ marathon में जाना है।"
इस बात से उनके चेहरे पर शैतानी भरी, प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी क्योंकि वो जानती थीं मैं रेस तो हमेशा पूरी करती हूँ पर अस्थमा के कारण अधिक दौड़ नहीं सकती।  खिलखिलाते हुए बोलीं, "फिर तो मेरी जीत तय है।"
"हाँ, आपकी जीत तो हमेशा से तय है....कुमुद बेन। आपसे ही तो मैं प्रेरणा लेती हूँ।" ये कहते हुए उनका हाथ थाम मैं उन्हें ड्राइंग रूम तक ले आई थी।

अब जो ख़बर मिली तो यक़ीन ही न हुआ। पता नहीं कैसे इस बार आप हार गईं! जबकि ये जीत तो बेहद जरुरी थी। आपकी वो बात भी सच हो गई, मुझे आपके जाने की ख़बर महीनों बाद ही मिली....!
आपसे इंटरव्यू का वादा था मेरा, दो बार कॉल भी किया। बात न हो सकी तो लगा व्यस्त होंगी। कहाँ पता था कि आप तो....!

इंटरव्यू तो न हो सका, पर आपकी बातें साझा की हैं मैंनें कि लोग मर-मर कर न जीएँ और आपसे प्रेरणा लें कि हर परिस्थिति में जीवन को मुस्कुराते हुए कैसे जिया जाता है। मुझे गर्व है कि मैं आपको जानती थी और आपसे कई-कई बार मिली थी।
आप सुन पा रही हो न? Really missing u yaar!
ऐसे भी कोई जाता है क्या! :(
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

हैप्पी वाला दिन

आज सुबह जब योगा क्लास जा रही थी तो मौसम बेहद ख़ुशगवार था। हल्की-हल्की ठंडी हवा पर तो मैं पहले से ही निहाल हुई जा रही थी उस पर रास्ते में मिलते हुए बच्चों की मुस्कानों ने दिन के ख़ूबसूरत होने की सूचना ख़ुद ही दे दी थी। उन सबके चेहरों पर अलग ही ख़ुशी थी। यूँ लग रहा था जैसे 10-12 किलो के स्कूल बैग के न होने से वे बेहद हल्का महसूस कर रहे हों। वैसे जिस दिन स्कूल में पढ़ाई की छुट्टी हो पर स्कूल जाना हो, तो और भी अच्छा लगता ही है। हम सबने भी इन दिनों का ख़ूब लुत्फ़ उठाया है। बच्चों की असल फ्रीडम यही तो है।

किसी की कार में जोरों से बजता गीत भी सुकून दे रहा था। 
"इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के....ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के" 
पर  मैं सोच रही थी कि बच्चों का ह्रदय तो हमेशा से कितना निर्मल रहा है। वो बिना लाग-लपेट के सदैव सच ही बोलते आये हैं। कभी उनकी राय ली जाए और कुछ पसंद न आए उन्हें तो तुरंत प्यारी, टुक्कू-सी नाक सिकोड़कर जोर से बोलेंगे ..."छी, कित्ता गन्दा है ये!" और पसंद की वस्तु हो तो, खिलखिलाते हुए "भौत बढ़िया!" :D

ऐसे वाले बच्चे राजनीति में जाते ही कितने हैं? या बड़े होकर जीवन से मिले अनुभव उन्हें मुखौटे पहनने को मजबूर कर देते हैं? प्रत्येक इंसान, हर परिस्थिति में कितना अलग-अलग व्यवहार करने लगता है। एक ही विषय पर दो अलग लोगों से बात करने का हमारा तरीका भी कितना भिन्न हो जाता है क्योंकि हम इंसान को देखकर, नाप-तौल कर ही कुछ कहते हैं। बच्चे कितने बिंदास! इन चक्करों (समझदारी) में पड़ते ही नहीं! तभी तो उनका साथ एक नई उमंग से भर देता है और हर बार ही कुछ नया सिखा जाते हैं ये छुटंकी लोग! :D

ख़ैर, विषय से भटकना मेरी आदत हो गई है। बात ये कहनी थी कि आज वर्षों बाद स्कूल जैसा फ़ील आया। योगा क्लास में पहुँचते ही अलग तरह की साज-सज्जा देख जी खुश हो गया। फिर उस पर राष्ट्रगान ने हर बार की तरह अपने देश के लिए गर्व से भर दिया। इसकी धुन और शब्दों में न जाने कैसा जादू है कि जितनी बार भी गाएं-सुनें...असर बढ़ता जाता है। ये अहसास प्रेम ही तो है। है, न! :)

राष्ट्रगान के साथ ही तिरंगे के रंग में रंगा नाश्ता और गपशप ने उस कसक को भी दूर कर दिया जो सुबह घर से निकलते समय दिल के किसी कोने में बस पल भर को ही खलबलाई थी। 
जय हिन्द! जय भारत!
गणतंत्र दिवस की अशेष शुभकामनाएं!
- प्रीति 'अज्ञात'
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एक तस्वीर नाश्ते की :)


 

सोमवार, 9 जनवरी 2017

AHMEDABAD FLOWER SHOW, 3-13 Jan. 2017

अहमदाबाद फ्लॉवर शो हमेशा से ही ख़ास रहा है। मेरे लिए इस बार इसका महत्त्व और भी बढ़ गया क्योंकि इसमें हमारे बोन्साई क्लब का स्टॉल भी लगा है। जहाँ विज़िटर्स को बोन्साई सीखने की प्रेरणा मिलती है क्योंकि हम प्लांट्स बेच नहीं रहे।

3 से 13 जनवरी तक चलने वाले इस मेले में आने के बाद समय का पता ही नहीं चलता। यहाँ लगभग 750 प्रजातियों के तीन लाख से भी अधिक पौधे हैं। फूलों और पौधों के प्रयोग से सुन्दर sculptures तैयार किये गए हैं। एक sculpture में लोहे के स्टूल का प्रयोग भी शानदार है। 20-22 nurseries भी हैं जहाँ जाने के लिए मन लालायित हो उठता है। फिर बाद में पौधों का बैग उठाने में जान जरूर निकलती है। बगीचे में काम आने वाले टूल्स और खाद वगैरह भी हैं यहाँ।

हैंडीक्राफ्ट, खादी, हर्बल प्रोडक्ट्स और जाने कितने स्टॉल्स हैं...जो हमने भी नहीं देखे अभी। बुक स्टॉल भी है।
कहते हैं, रात को ये और भी सुंदर दिखता है। लाइटिंग वाला वीडियो देखा तो यक़ीन हुआ कि लोग ठीक ही कहते हैं।

बाक़ी सारी सुविधाएँ तो हैं ही, जिनके लिए ये शहर कभी शिक़ायत नहीं करता। फूल-पत्ती प्यारे हों और साथ कैमरा भी हो तो हरियाली ज़िंदाबाद, दिल ज़िंदाबाद, शहर ज़िंदाबाद! और हाँ, कान खोलकर सुन लो; मेरा देश तो हमेशा से ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है और ज़िंदाबाद रहेगा। ये लास्ट वाली लाइन फ़िल्मी कीड़े की देन है पर सॉलिड है न!
- प्रीति 'अज्ञात'
Photos clicked by Preeti Agyaat













मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

ईश्वर आज भी हड़ताल पर था!

उनके घर पर हुई यह पहली मुलाक़ात थी पर इतना परिचय तो रहा है कि एक संस्था की मीटिंग्स में परस्पर अभिवादन होता था। उनके शब्द हमेशा भीगे हुए से लगते पर वो अपनी बात कह शांत हो जाते। मैं और जानना चाहती थी पर कभी हिम्मत ही न हुई। उम्र का लिहाज़ और फिर किसी की ज़िंदगी में झांकना उचित भी नहीं लगता।

संयोग कुछ ऐसा कि उन्होंने मेरी एक मित्र के साथ मुझे भी चाय पर आमंत्रित किया। वैसे इस समय, मेरे जाने का मूल उद्देश्य उनके बगीचे को देखना था। जाते ही उन्होंने बाहर आकर स्वागत किया। आलीशान घर.... कुछ ऐसा जो हम फिल्मों में देखते हैं। बगीचा.....इतना सुंदर कि वहाँ से उठने का मन ही न करे और वो इंसान भी इतने नेकदिल कि आपके हाथ ख़ुद उनके लिए दुआ को उठने लगें। वो न बहुत बड़े लेखक हैं, न कोई सेलिब्रिटी.....किसी मल्टीनेशनल कंपनी में बड़ी पोस्ट से चार वर्ष पूर्व ही रिटायर हुए हैं। मैं उनका परिचय नहीं देना चाहती, इसलिए इससे ज्यादा जानकारी भी नहीं दूंगी।

पंद्रह वर्ष पूर्व अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी को खो चुके हैं। घर वालों की ज़िद के बाद भी पुनर्विवाह नहीं किया। जरूरतमंद लोगों की हर संभव मदद करते हैं। सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं, स्वयं जाकर भी ढेरों काम करते हैं। हम जब पहुंचे तब, घर पर सिर्फ हेल्पर था और हर तरफ सन्नाटा पसरा पड़ा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनका एक पुत्र है जो अच्छे जॉब में है। उसे भी कैंसर हुआ और आखिरी स्टेज में है। प्रेम-विवाह किया है उसने। बहू इस दुःख से अवसाद में डूबती जा रही थी तो अब वो भी व्यस्त रहने के लिए नौकरी करने लगी है। चार वर्ष का एक पोता है। उसके बारे में बात करते हुए उनकी आँखों में नमी थी और चमक भी। हम बातें कर ही रहे थे कि वो तीनों भी बाहर से आ गए। वही मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ। थोड़ी देर बाद हमने उन सबसे विदा ली।

अँधेरा धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रहा था और उस विशाल गेट के दोनों ओर लगे लैम्पों में से झांकती सफ़ेद रौशनी सामने का लंबा रास्ता दिखा रही थी। शाम को खूबसूरत दिखते बड़े-बड़े वृक्ष अब भयावह लगने लगे थे। मन भारी था, शब्द मौन। क़ाश, कोई टूटता तारा इसी वक़्त मेरी झोली में आ गिरे!
कैसे गिरता!
ईश्वर आज भी हड़ताल पर था!
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इतना सब लिखने का मेरा क्या उद्देश्य है, ये तो मैं भी अभी नहीं समझ सकी हूँ। 
बस, एक बात कहना चाहती हूँ....अमीरों के लिए जो एक तरह का भ्रम या सोच हमारे समाज में बनी है। उससे थोड़ा ऊपर उठना चाहिए। अमीर और गरीब के बीच कोई गहरी खाई नहीं, ये सदा बुरे और अच्छे इंसान के बीच ही रही है। हर पैसे वाला अय्याश नहीं होता, बेईमान भी नहीं। न उसके बच्चे नशे में धुत होकर महँगी गाड़ियाँ चला फुटपाथ के लोगों को कुचलते हैं और न ही उनकी बीवियाँ किटी पार्टी और फैशन परेड में व्यस्त रहती हैं। वो सुखी ही हो, ये भी तय नहीं! एक बार अपनी मानसिकता से ऊपर उठकर इन घरों में भी झांकना बेहद आवश्यक है क्योंकि ये सामान्य लोगों जैसे ही हैं और आज जहाँ हैं अपनी मेहनत और लगन के दम पर पहुंचे हैं। इस बीच उन्होंने इतना कुछ खोया है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती! दुर्भाग्य ही तो है कि सब पैसा देखते हैं, संघर्ष की कहानी कोई नहीं सुनना चाहता!
- प्रीति 'अज्ञात'
(अगस्त'2016 की एक उदास शाम की असल कहानी)