शनिवार, 12 अगस्त 2017

साँसों का किराया जो लगता है!

ख़बरों में पूरा क़ब्रिस्तान है....घर के एक कोने में निढाल, बेसुध पिता और आँसुओं की नदी में डूबती माँ....जिनके लिए अब भी इस सत्य को स्वीकारना संभव नहीं लगता। एक पल को भी साँस अटकती है तो कितनी घबराहट होती है, बुरी तरह छटपटाने लगता है इंसान। उन मासूमों पर न जाने क्या बीती होगी, सोचकर भी रूह काँप जाती है।
तमाम चीखों- चिल्लाहटों, माथा पटकते, छाती पीटते आक्रोश के बदले, इस बार भी वही कोरे आश्वासन और उच्च स्तरीय जांच के वायदे की बंधी-बंधाई पोटली उछाल दी गई है।
वो सपने जो आँखों में कबसे झूल रहे थे.....कभी न सच होंगे। हवाओं का किराया जो लगता है!
मायूस है उम्मीदों का बेबस आसमां.....आज भी सिर झुकाए, मौन, नि:शब्द!
कुछ भी तो नहीं बदला... राजनीति भी हर बार की तरह जारी है....
दोषारोपण का ठीकरा एक-दूसरे पर फेंकने का खेल भी वही पुराना .... जो अपने आँगन की किलकारी ही खो बैठा, उसे इन सबसे अब क्या मिलेगा?- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 6 अगस्त 2017

कलपने की भी एक मर्यादा होती है!

स्त्री-अस्मिता पर चोट करने वाले और उनके समर्थक वही लोग हैं जो अपनी नई, प्रगतिशील छद्म विचारधारा को परोसते फूले नहीं समाते। इस प्रश्न का उत्तर भी स्पष्ट ही है कि आख़िर उनकी छत्रछाया में पलती सैकड़ों जुबानें मौन और भयाक्रांत क्यों हैं! ये भी माना कि चलो अभिधा और व्यंजना के जाल में फाँसकर उन्होंने कुछ मछलियाँ अपनी तरफ खींच लीं हैं। लेकिन सर्वाधिक आश्चर्य इस बात का है कि सभ्य समाज की नैतिकता और सत्य का परचम लहराने वालों को एन उसी वक़्त पर काठ क्यों मार जाता है जबकि उन स्वरों की सर्वाधिक आवश्यकता होती है! धिक्कार है, उन तमाम महिला-पुरुष रचनाकारों को! जो किसी अन्य का कमेंट लाइक कर फिर इनबॉक्स में आकर कहते हैं कि आपने इस घटना का विरोध कर बहुत अच्छा किया पर हमारी तो मजबूरी है। क्या मजबूरी भाई? क्या चार लाइन लिख अपनी फोटो चेप देना ही लेखक का गुणधर्म रह गया है? समाज के प्रति उसका कोई दायित्व नहीं बनता?

कृष्णा कल्पित जी ने जो लिखा, स्त्री के लिए ऐसी निकृष्ट भाषा का प्रयोग लगातार हो रहा है जिसमें प्रयुक्त शब्दों का व्याकरण में भी कहीं उल्लेख नहीं मिलता पर इसको भी पसंद किया जा रहा है। इस दरबार में मत्था टेकने वालों का अपने घर की स्त्रियों के प्रति व्यवहार कैसा होगा एवं ये उन्हें किस दृष्टि से देखते होंगे, इसका भी अनुमान स्वत: ही लग सकता है। 


ये न सिर्फ़ यौन कुंठित और घृणित सोच से ग्रस्त लोग हैं बल्कि अपनी पितृ-सत्तात्मक सोच पर चौतरफा हमले से भी बौखलाए हुए हैं। यदि समवेत स्वर में इनका विरोध नहीं किया गया तो कल ये अनामिका जी के लिए बोले थे, फिर गीताश्री के लिए.....अगला नंबर किसी का भी हो सकता है। इन दिनों हम सोशल मीडिया के उस दौर के गवाह हैं जहाँ विवादों की आड़ में व्यक्तिगत खुन्नस भरपूर निकाली जाती है। स्त्री को चुप करने का सबसे सुलभ तरीका है कि आप उसके चरित्र पर हमला कर दें, सौभाग्य है कि ऐसे पुरुष, कुत्सित मानसिकता के इतने गहरे कुँए में जा गिरे हैं कि इनका तो चरित्र भी ढूंढे नहीं मिलता। इनके समर्थकों का कहना है कि कृष्णा कल्पित जी ने तो विरोध देखते ही अनामिका जी के लिए लिखी गई अपनी पोस्ट हटा ली थी पर इन अंधभक्तों को ये नहीं दिखा कि फिर उन्होंने गीताश्री के लिए भी वही विष वमन किया। यानी इन्हें अपने कृत्य को लेकर न तो कोई शर्मिंदगी है और न ही दुःख! और ये सिलसिला इन शब्दों के लिखने तक जारी है।

कविता का विरोध होना गलत कभी नहीं रहा पर व्यक्तिगत आक्षेप आपकी सड़ी सोच का उदाहरण देते हैं। ऐसे लोगों के स्तर तक तो नहीं उतरा जा सकता पर उन्हें निकास का द्वार तो दिखाया ही जा सकता है। गुटबाजी और स्वार्थ से बाहर निकल सत्य का साथ दें तो ही आपका लेखन सार्थक है। पुरस्कार न मिल पाने की या चयन समिति में जगह न बना पाने की कुंठा और उससे उपजा लावा कई 'बुद्धिजीवियों' की पोस्ट पर पढ़ती आई हूँ। दुःखी होना या निराशा भी चलो, स्वाभाविक है! पर जनाब, असहमति का भी एक सलीक़ा होता है।
विरोध अपनी जगह है पर मर्यादित भाषा की उम्मीद यदि एक साहित्यकार से भी न की जा सके तो जरा सोचिए वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को आप क्या देकर जा रहे हैं?
वरिष्ठता मान पाती है और उसके मार्गदर्शन का आशीष पा युवा निहाल हो उठता है। पर समय के साथ मानवीय मूल्यों में भारी गिरावट आती जा रही है। दुःख होता है यह देखकर कि घृणा और कुंठा से भरा ह्रदय, भाषा को किस तरह विकृत कर देता है।
वो समय बीत चुका जब हम साहित्यकार को उसकी पुस्तकों के माध्यम से ही जान पाते थे अब सोशल मीडिया में उनकी भाषा और व्यवहार भी दिखाई देता है। सभ्यता और असभ्यता का अंतर करना इतना कठिन भी नहीं, शेष जो कविता-शविता हैं, सब बाद की बातें हैं।
-प्रीति 'अज्ञात' 

शनिवार, 27 मई 2017

दिखाई दिया यूँ....कि बेसुध किया :D

'चश्मा' अब चश्मा लगता ही नहीं! शरीर का एक अतिरिक्त अंग हो जैसे. किसी के पांच की बजाय छः उंगली और हमारी आँखों के ऊपर आँखें...मनपसंद (इसे 'मजबूरी' के पर्यायवाची के रूप में लें) फ्रेम में गढ़ी. कहते हैं स्त्रियों को गहनों से प्यार होता है, हमारा तो यही गहना है जो हमने बाल्यावस्था से पहना है. हमारे पास ऐसे विविध गहने हैं और हम उन सभी को ख़ूब हिफाज़त से रखते हैं. सुनकर हंसी आये भी तो हम शर्मिंदा नहीं होंगे, पर हमने उन्हें लॉकर में रखा हुआ है. आपके लिए चश्मा हो सकता है पर हमारी आँखें है ये. इसे 'चश्मा' बोलना भी अपनी आवश्यकता को जलील करने जैसा लगता है, इसीलिए पिछले कई वर्षों से हम इसे पूरे सम्मान के साथ 'हमरी आँखें' कहकर पुकारते हैं. जब कभी खो जाती हैं तो बच्चों को ढूँढने में लगा देते हैं, वो माँ की टर्मिनोलॉजी अच्छे से समझते हैं. हमारी नाक और कान को भी हम उतने ही सम्मानजनक तरीके से देखते हैं और आँखों की बैसाखी मानते हैं, आख़िर इन्हीं पर तो ये टिकीं हैं. ये न हों तो आँखें पीसा की झूलती मीनारें बन जायेंगीं और फ़िलहाल इतिहास में नाम दर्ज़ कराने में हमें कतई इंटरेस्ट नहीं!

हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमारे पास नाना (इस शब्द का उद्गम कहाँ से और क्यूँ हुआ होगा क्या पता! पर मस्त लगता है) प्रकार के चश्मे हैं. एक सामान्य दिनचर्या के लिए आधे फ्रेम वाला, वही आना-जाना, फलाना-ढिमका वाला घटिया रूटीन, दूसरा पढने के लिए फुल फ्रेम वाला (ये अपुन की पसंदीदा जिंदगी है), तीसरा किसी कार्यक्रम के लिए, बिना फ्रेम वाला (ये सबसे high standard वाला होता है, इसमें फोटू पे बिजली न्यूनतम अनुपात में गिरती हुई दिखती है) चौथा आँखों पे आँखें पे आँखें टाइप माने आड़ी-टेड़ी टूटी खिडकियों पे चश्मा और उस चश्मे पे गॉगल्स. (अति उच्च वर्ग वाले इसे 'शेड्स' पढ़कर तसल्ली पा लें). ये बाउंड्री वाल के साथ आता है.इसे लेते समय विशेष ध्यान रखना होता है कि ऊपरी माले का आकार, कारपेट एरिया से ज्यादा हो. मल्लब. नीचे वाला चश्मा न दिखे, इसकी पूरी कोशिश करनी पड़ती है. क्या करें, हमरी पॉवर वाले शेड्स अभी ईज़ाद ही ना हुए! ये शेड्स बोलकर हमें अभी-अभी 'पॉवर पफ गर्ल' वाली फीलिंग हुई! खी-खी-खी!!

तो ये तो हुए चारों प्रकार और हमें इन सबकी डुप्लीकेट copy भी रखनी पड़ती है यानी कहीं जाएँ तो आठ हमसफ़र तो साथ होते ही हैं. ग़नीमत है टिकट एक की ही लगती है. वैसे हम एक पांचवी प्रकार की आँख भी बनवाये थे गुस्से में, कि बार-बार बदलना न पड़े. पढ़े-लिखे इसे bi-focal कहते हैं पर इसे पहनते ही हमारी दुनिया तो out of focus हो गई थी. हम कहीं के न रहे थे. बस यही लगता था कि किसी पहाड़ी इलाके में ट्रेन घूम-घूमकर चल रही और हम दिल हूँ-हूँ करे वाला गाना अपनी भद्दी आवाज में रेंक रहे. बस तबसे हमें उस टूरिस्ट स्पॉट से नफ़रत-सी हो गई. पर पहले प्रेम की तरह उसे भी संभाल के रखे हैं. हे-हे-हे 

अब कुछ ज्ञानी-ध्यानी अवश्य सोच रहे होंगे कि इत्ती ही आफ़त आ रई तो कांटेक्ट काहे नहीं लगवाये लेतीं. तो लो अब जे बालो किस्सो सुनो..जब हमारी शादी तय हुई तो कुछ शुभचिंतकों को चिंता हुई कि विंडस्क्रीन के साथ मेकअप जंचेगा नहीं, तो बड़ी मुश्किल से डाक्टर साब हमें उल्लू बना पाने में सफल हो पाए. हम भी थोड़े तो खुश हो ही गए थे. एकदम लल्लनटॉप टाइप फीलिया रहे थे. कि अब हमहू मेंगो पीपल की तरह दुनिया देख सकेंगे. पार्लर में टनाटन तैयार होके सीधा स्टेज पे आये. सिर झुकाके शर्माते हुए आने की और प्यारी बहिनों के हाथ थाम वहां तक पहुंचाने की परंपरा के चलते ज्यादा कुछ पता ही न चला. शुरू में तो सब ठीकठाक रहा, पर एक घंटे बाद ही हमारी लालटेन तो झिलमिलाने लगी. हालत बेहद ख़राब और मुस्कुराना उससे ज्यादा जरुरी. सो, 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो' से प्रेरणा लेते हुए ये समय कट गया. उसके बाद फेरों में वक़्त था. जब हम ब्रेक में गए तो सबसे पहले इन चायनीज़ मोमोस को बाहर निकाल फेंका और फिर गर्व से अपने स्क्रीनसेवर (चश्मा) को चढ़ा आये. फिर जो रामायण हुई, उसका इस विषय से कोई लेना-देना नहीं. पर इतना जरुर जान लें, कि कांटेक्ट लेंस हरेक के लिए नहीं होते. जिस बन्दे को बिना चश्मे के दिखता ही नहीं वो स्वयं कांटेक्ट लेंस लगा ही नहीं सकता...एक घंटा तो हथेली पे टटोलने में ही निकल जाता है कि मुआ रक्खा कित्थे है!

बचपन में हम बहुत frustrate हो जाते थे. वैसे तो स्कूल और दोस्तों में सबके फेवरिट थे लेकिन दुष्ट आत्माएं तो हर जगह पाई ही जाती हैं. ऐसी ही प्रेतात्माओं ने हम जैसों के लिए एक गीत बना रखा था "चश्मुद्दीन बजाये बीन, जूता मारो साढ़े तीन" कुछ सभ्य, बदतमीज इसे "घड़ी में बज गए साढ़े तीन" गाकर हमारी आँखों में थमे गंगासागर को भीतर ही फिंकवा दिया करते थे. ये सम्पूर्ण चश्मिश प्रजाति को समर्पित गीत था, जिसके रचयिता के बारे में कोई जानकारी आज तक उपलब्ध न हो सकी. वहां तो हम कुछ न बोल पाते थे, पर घर में घुसते ही ताला खोल सबसे पहले अपना चश्मा दीवार पे दे मारते और फिर शाम तक अफ़सोस करते. ये एक्स्ट्रा आँखें रखने की प्रेरणा हमें, हमारे बचपन के इन्हीं उच्च कर्मों ने दी है.

पहले ये सोच ख़ूब दुखी होते थे कि यार एक दिन तो नार्मल आँखों से दुनिया दिखा दे पर अब हम इसी बात पे हँसते हैं कि दिखानी होती, तो फोड़ता ही क्यों? उसे कोसते नहीं, वरना बची-खुची भी कहीं न निकल ले! रात को रोड क्रॉस करने में दिक्कत आती है, एक्स्ट्रा प्रोब्लम के कारण ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता, मोबाइल का बहुत कम उपयोग कर सकते हैं, गाडी से बाहर निकलते ही दो-तीन बार इसका ग्लास साफ़ न किया जाए तो बेमौसम कोहरा छा जाता है; इन बातों से कहीं ज्यादा कभी इस बात का अफ़सोस जरुर होता है कि बारिश में चलने का मजा नहीं लूट पाते, सो बगीचे में और पार्किंग में पानी भर, इसकी भी भरपाई कर लिया करते हैं.
एक मजेदार बात और ...दो दशक पहले जो चश्मे आते थे न, आधा किलो के तो होते ही होंगे. उसे पहन यूँ लगता था कि नाक वेट लिफ्टिंग का परमानेंट कोर्स कर रही. एकदम dumbell की तरह हो जाती थी. बीच में पिचकी और दोनों तरफ फूली. अब तो विज्ञान ने तरक्की कर इसका भी डाइट प्लान करवा इसे स्लिम बना दिया है. अब चश्मिश होना फैशन स्टेटमेंट है और कूल भी लगता है. हम बैकवर्ड जमाने के लोग ऐवीं फूल ( गुलाब नहीं, मूर्ख वाला) बनके दिन काटते रहे.

खैर...जो भी है. अपुन खुश हैं कि प्रकृति की सुन्दरता रोज अपनी आँखों में भर सकते हैं. किसी का हाथ थाम उसे सहारा दे सकते हैं. फिलहाल जितनी भी रोशनी है, लेखन और जीने के लिए काफ़ी है. दुनिया जैसी भी है, दिख तो रही है....उससे ज्यादा देखने की अब कोई ख्वाहिश बची भी कहाँ!

बोलो, तारा रारा, बोलो तारा रारा
हायो रब्बा, हायो रब्बा, हायो रब्बा
- प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 23 मई 2017

यात्रा और यादें

"बेटा, ऐसे pose बनाओ।"
"मुँह थोड़ा कम खोलकर हंसो।"
"हाँ, बस थोड़ा-सा इधर की ओर देखो।"
हद है भई! तस्वीर ले रहे कि स्क्रीन टेस्ट? :/
और सबसे ज्यादा बुरी तस्वीर तो मुझे नहाए हुए, राजा बेटा, रानी बिटिया जैसे up-to-date बच्चों की लगती है।
बच्चे अपने स्वाभाविक रूप में सबसे प्यारे लगते हैं। मुँह बनाते हुए, गला फाड़ चिल्लाते हुए, मिट्टी में खेलते, हँसते और बिखरे बाल के साथ। दोनों हाथ खाने से सने हुए, पर चेहरे की चमक इस बात का पक्का सबूत..कि उन्हें भोजन बड़ा स्वादिष्ट लग रहा है।
कुल मिलाकर, बच्चों को हर समय सलीके से रहने की कोई जरूरत नहीं। उम्र के साथ समझदारी स्वत: ही आती जाती है। सिखाना जरूर चाहिए, पर कुछ पल उन्हें बिंदास भी जीने देना चाहिए।ये दिखावा, बोले तो शो बाज़ी करने के लिए बड़े ही काफ़ी हैं। :P

* अभी-अभी एक बच्चा, फ़ोटो खिंचवा-खिंचवाकर irritate हुआ बैठा है। वैसे मुँह गोलगप्पे-सा बनाकर बड़ा प्यारा भी लग रहा। उसके मम्मी-पापा, फ़ोटो शॉप करके उसे और सुंदर बना रहे हैं। ;)  :D
छुट्टियाँ, बचपन और गुलाटियां...ज़िंदगी की सारी खूबसूरत अदाएं, इन्हीं लम्हों से होकर गुजरती हैं। :)
एल्बम पलटो, तो बड़ा गुस्सा आता है...बच्चे, इतनी जल्दी बड़े क्यूँ हो जाते हैं! :(
फिर याद आता है, उफ़्फ़ हम भी तो हो गए! :D
-प्रीति 'अज्ञात'
** यात्रा और यादें 

गुरुवार, 18 मई 2017

कृपया प्रकाश डालें

कृपया प्रकाश डालें-

प्रकाशकों के बारे में आपके अनुभव कैसे रहे? इसमें दोनों तरह के प्रकाशक शामिल हैं। एक वो, जो आपके लेखन में दम होने के बाद भी तगड़ी रक़म लेकर ही आपकी पुस्तक प्रकाशित करके आपको धन्य करते हैं और दूसरे वो, जो बिना कोई धनराशि लिए आपके शब्दों को पाठकों तक पहुँचाते हैं। वैसे एक तीसरा प्रकार भी है जो पैसे लेकर कुछ भी छाप देता है। कृपया इनके लिए एक अलग मुकुट की व्यवस्था की जाए। :D

इन तीनों प्रकारों से सम्बंधित प्रश्न एक ही प्रकार के हैं-
1. आपकी पुस्तक की कितनी प्रतियाँ छपीं?
2 . कितनी बिकीं ?
3. ऑनलाइन स्टोर्स में उनकी उपलब्धता/ अनुपलब्धता के संदर्भ में  जानकारी। 
4.  रॉयल्टी
5. या ऐसा कोई भी प्रश्न जहाँ उन्हें लेखक के प्रति उनके उत्तरदायित्व का स्मरण होने लगे।

अब ये बताइये -
1. क्या उपरोक्त पाँचों तरह के प्रश्नों के उत्तर देने से आपका प्रकाशन-समूह बचता है?
2. बिना पूछे ही जानकारी दे देते हैं। 
3. कभी नहीं देते हैं।
4.  मैसेज पढ़कर unread में परिवर्तित कर देते हैं। 
5.  व्हाट्स एप्प के टिक मार्क को नीला होने से पहले ही निगल लेते हैं।  
6. आपके पच्चीस मैसेज पढ़ने के बाद एक मरा हुआ-सा जवाब भेजते हैं कि 'बताता हूँ' उसके बाद ऐसे गायब होते हैं जैसे, 'गधे के सिर से सींग गायब हुए थे' 
नहीं, नहीं! सींग गायब होने में तो थोड़ा समय लग गया था न! :O 

मैं जानती हूँ कि इन प्रश्नों के उत्तर देने की हिम्मत हरेक लेखक में नहीं होगी। आख़िर उनकी अगली पुस्तक का भी सवाल है! मुझे उनसे नाराज़ होने या शिकायत करने का कोई हक़ ही नहीं! ईश्वर उन्हें सदैव सुरक्षित रखे! :)
पर कृपया उन प्रकाशकों के नाम जरूर लिखिए, जो आज के पूर्ण व्यावसायिक दौर में भी अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन पूर्ण रूप से कर रहे हैं। मैं 'प्रकाशक' को प्रकाश की राह पर ले जाने वाले के रूप में देखती आई थी। लेकिन बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, दिखने-सुनने में भी आ रहा है कि :( हर बार की तरह यहाँ भी मेरी राय गलत ही निकली। मैं सही होना चाहती हूँ, इसलिए आपके उत्तर अपेक्षित हैं।
ध्यान रहे, ये कुंठा नहीं जिज्ञासा है। आपके उत्तर आने वाले लेखक/ लेखिकाओं को सही प्रकाशन समूह चुनने में सहायता देंगे। यह भी संभव है कि निराश होकर वे पुन: डायरी लेखन तक ही सीमित रह जाएँ! 
यदि आप एक गंभीर साहित्यकार/प्रकाशक/ या किसी भी माध्यम से इस क्षेत्र से जुड़े हैं तो मैं उम्मीद रखती हूँ कि जवाब ईमानदारी से ही मिलेंगे। बाक़ी तो जो है सो हइये ही। एक पक्का वादा है, फ़तवा तो नहीं ही निकालेंगे जी! ;) :P 
- प्रीति 'अज्ञात'
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अनावश्यक सूचना-
यदि आप किसी ऐसे प्रकाशक की पोस्ट पढ़कर बलिहारी हुए जा रहे हैं जो अपने पसंदीदा लेखक के वीडियो /ऑडियो बड़े गर्व के साथ दनादन शेयर कर रहा है तो रुकिए जरा.....उस वीडियो /ऑडियो के बनने में जनाबेआली का कोई योगदान नहीं है। ध्यान रहे, ये बंदा अपनी जेब से इकन्नी भी नहीं खर्चता। उसे खर्च करवाना आता है, लेखक को भुनाना आता है और बात न जमे (माने लेखक पुस्तक के प्रकाशन की राशि के अतिरिक्त और खर्च देने में असमर्थता जताये तो) तो उसे देख न पहचानने का ढोंग करना भी उफ्फ!! क्या ग़ज़ब आता है। आप हॉलीवुड जाओ न पिलीज़। :D

निवेदन- कृपया अच्छे प्रकाशकों को टैग जरूर कीजिए। हमने किसी को भी नहीं किया, वरना ये होता कि सिर्फ़ अपनी पुस्तक की बात कर रही हूँ। यह एक सामान्य चर्चा है जिसका हरेक जीवित, मृत और मूर्छित इंसान से सीधा संबंध है। 

शुक्रवार, 5 मई 2017

बदलती राहें

"किसी शांत, ठहरे हुए पानी में फेंका गया एक छोटा-सा पत्थर ही कैसी हलचल पैदा कर देता है। ढप्प की आवाज़ सबको सुनाई देती है और फिर एक बिंदु के चारों तरफ गोलों का लगातार बनता जाना, जिसके गोले ज्यादा बने, वही जीता! खेल हुआ करता था। कई बार पत्थर कुछ इस तरह से फेंका जाता था कि वह पानी को दो जगह छूता हुआ अंदर जाता था।

पानी को चोट नहीं लगती, उसका काम तो बहते जाना है। कभी-कभी बस दिशा ही बदलनी होती है। वो पत्थर जिसने उसकी जमीं को भेद दिया है, काफी गहरा जाता है। धीरे-धीरे तलहटी में एक पहाड़ खड़ा होने लगता है, उसमें से दर्द जब भी रिसता है....जल-स्तर बढ़ता जाता है।
याद रहे, फिर एक दिन तूफ़ान भी आता है!"
- प्रीति 'अज्ञात' 
* 'बदलती राहें' कहानी से