शनिवार, 27 मई 2017

दिखाई दिया यूँ....कि बेसुध किया :D

'चश्मा' अब चश्मा लगता ही नहीं! शरीर का एक अतिरिक्त अंग हो जैसे. किसी के पांच की बजाय छः उंगली और हमारी आँखों के ऊपर आँखें...मनपसंद (इसे 'मजबूरी' के पर्यायवाची के रूप में लें) फ्रेम में गढ़ी. कहते हैं स्त्रियों को गहनों से प्यार होता है, हमारा तो यही गहना है जो हमने बाल्यावस्था से पहना है. हमारे पास ऐसे विविध गहने हैं और हम उन सभी को ख़ूब हिफाज़त से रखते हैं. सुनकर हंसी आये भी तो हम शर्मिंदा नहीं होंगे, पर हमने उन्हें लॉकर में रखा हुआ है. आपके लिए चश्मा हो सकता है पर हमारी आँखें है ये. इसे 'चश्मा' बोलना भी अपनी आवश्यकता को जलील करने जैसा लगता है, इसीलिए पिछले कई वर्षों से हम इसे पूरे सम्मान के साथ 'हमरी आँखें' कहकर पुकारते हैं. जब कभी खो जाती हैं तो बच्चों को ढूँढने में लगा देते हैं, वो माँ की टर्मिनोलॉजी अच्छे से समझते हैं. हमारी नाक और कान को भी हम उतने ही सम्मानजनक तरीके से देखते हैं और आँखों की बैसाखी मानते हैं, आख़िर इन्हीं पर तो ये टिकीं हैं. ये न हों तो आँखें पीसा की झूलती मीनारें बन जायेंगीं और फ़िलहाल इतिहास में नाम दर्ज़ कराने में हमें कतई इंटरेस्ट नहीं!

हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमारे पास नाना (इस शब्द का उद्गम कहाँ से और क्यूँ हुआ होगा क्या पता! पर मस्त लगता है) प्रकार के चश्मे हैं. एक सामान्य दिनचर्या के लिए आधे फ्रेम वाला, वही आना-जाना, फलाना-ढिमका वाला घटिया रूटीन, दूसरा पढने के लिए फुल फ्रेम वाला (ये अपुन की पसंदीदा जिंदगी है), तीसरा किसी कार्यक्रम के लिए, बिना फ्रेम वाला (ये सबसे high standard वाला होता है, इसमें फोटू पे बिजली न्यूनतम अनुपात में गिरती हुई दिखती है) चौथा आँखों पे आँखें पे आँखें टाइप माने आड़ी-टेड़ी टूटी खिडकियों पे चश्मा और उस चश्मे पे गॉगल्स. (अति उच्च वर्ग वाले इसे 'शेड्स' पढ़कर तसल्ली पा लें). ये बाउंड्री वाल के साथ आता है.इसे लेते समय विशेष ध्यान रखना होता है कि ऊपरी माले का आकार, कारपेट एरिया से ज्यादा हो. मल्लब. नीचे वाला चश्मा न दिखे, इसकी पूरी कोशिश करनी पड़ती है. क्या करें, हमरी पॉवर वाले शेड्स अभी ईज़ाद ही ना हुए! ये शेड्स बोलकर हमें अभी-अभी 'पॉवर पफ गर्ल' वाली फीलिंग हुई! खी-खी-खी!!

तो ये तो हुए चारों प्रकार और हमें इन सबकी डुप्लीकेट copy भी रखनी पड़ती है यानी कहीं जाएँ तो आठ हमसफ़र तो साथ होते ही हैं. ग़नीमत है टिकट एक की ही लगती है. वैसे हम एक पांचवी प्रकार की आँख भी बनवाये थे गुस्से में, कि बार-बार बदलना न पड़े. पढ़े-लिखे इसे bi-focal कहते हैं पर इसे पहनते ही हमारी दुनिया तो out of focus हो गई थी. हम कहीं के न रहे थे. बस यही लगता था कि किसी पहाड़ी इलाके में ट्रेन घूम-घूमकर चल रही और हम दिल हूँ-हूँ करे वाला गाना अपनी भद्दी आवाज में रेंक रहे. बस तबसे हमें उस टूरिस्ट स्पॉट से नफ़रत-सी हो गई. पर पहले प्रेम की तरह उसे भी संभाल के रखे हैं. हे-हे-हे 

अब कुछ ज्ञानी-ध्यानी अवश्य सोच रहे होंगे कि इत्ती ही आफ़त आ रई तो कांटेक्ट काहे नहीं लगवाये लेतीं. तो लो अब जे बालो किस्सो सुनो..जब हमारी शादी तय हुई तो कुछ शुभचिंतकों को चिंता हुई कि विंडस्क्रीन के साथ मेकअप जंचेगा नहीं, तो बड़ी मुश्किल से डाक्टर साब हमें उल्लू बना पाने में सफल हो पाए. हम भी थोड़े तो खुश हो ही गए थे. एकदम लल्लनटॉप टाइप फीलिया रहे थे. कि अब हमहू मेंगो पीपल की तरह दुनिया देख सकेंगे. पार्लर में टनाटन तैयार होके सीधा स्टेज पे आये. सिर झुकाके शर्माते हुए आने की और प्यारी बहिनों के हाथ थाम वहां तक पहुंचाने की परंपरा के चलते ज्यादा कुछ पता ही न चला. शुरू में तो सब ठीकठाक रहा, पर एक घंटे बाद ही हमारी लालटेन तो झिलमिलाने लगी. हालत बेहद ख़राब और मुस्कुराना उससे ज्यादा जरुरी. सो, 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो' से प्रेरणा लेते हुए ये समय कट गया. उसके बाद फेरों में वक़्त था. जब हम ब्रेक में गए तो सबसे पहले इन चायनीज़ मोमोस को बाहर निकाल फेंका और फिर गर्व से अपने स्क्रीनसेवर (चश्मा) को चढ़ा आये. फिर जो रामायण हुई, उसका इस विषय से कोई लेना-देना नहीं. पर इतना जरुर जान लें, कि कांटेक्ट लेंस हरेक के लिए नहीं होते. जिस बन्दे को बिना चश्मे के दिखता ही नहीं वो स्वयं कांटेक्ट लेंस लगा ही नहीं सकता...एक घंटा तो हथेली पे टटोलने में ही निकल जाता है कि मुआ रक्खा कित्थे है!

बचपन में हम बहुत frustrate हो जाते थे. वैसे तो स्कूल और दोस्तों में सबके फेवरिट थे लेकिन दुष्ट आत्माएं तो हर जगह पाई ही जाती हैं. ऐसी ही प्रेतात्माओं ने हम जैसों के लिए एक गीत बना रखा था "चश्मुद्दीन बजाये बीन, जूता मारो साढ़े तीन" कुछ सभ्य, बदतमीज इसे "घड़ी में बज गए साढ़े तीन" गाकर हमारी आँखों में थमे गंगासागर को भीतर ही फिंकवा दिया करते थे. ये सम्पूर्ण चश्मिश प्रजाति को समर्पित गीत था, जिसके रचयिता के बारे में कोई जानकारी आज तक उपलब्ध न हो सकी. वहां तो हम कुछ न बोल पाते थे, पर घर में घुसते ही ताला खोल सबसे पहले अपना चश्मा दीवार पे दे मारते और फिर शाम तक अफ़सोस करते. ये एक्स्ट्रा आँखें रखने की प्रेरणा हमें, हमारे बचपन के इन्हीं उच्च कर्मों ने दी है.

पहले ये सोच ख़ूब दुखी होते थे कि यार एक दिन तो नार्मल आँखों से दुनिया दिखा दे पर अब हम इसी बात पे हँसते हैं कि दिखानी होती, तो फोड़ता ही क्यों? उसे कोसते नहीं, वरना बची-खुची भी कहीं न निकल ले! रात को रोड क्रॉस करने में दिक्कत आती है, एक्स्ट्रा प्रोब्लम के कारण ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता, मोबाइल का बहुत कम उपयोग कर सकते हैं, गाडी से बाहर निकलते ही दो-तीन बार इसका ग्लास साफ़ न किया जाए तो बेमौसम कोहरा छा जाता है; इन बातों से कहीं ज्यादा कभी इस बात का अफ़सोस जरुर होता है कि बारिश में चलने का मजा नहीं लूट पाते, सो बगीचे में और पार्किंग में पानी भर, इसकी भी भरपाई कर लिया करते हैं.
एक मजेदार बात और ...दो दशक पहले जो चश्मे आते थे न, आधा किलो के तो होते ही होंगे. उसे पहन यूँ लगता था कि नाक वेट लिफ्टिंग का परमानेंट कोर्स कर रही. एकदम dumbell की तरह हो जाती थी. बीच में पिचकी और दोनों तरफ फूली. अब तो विज्ञान ने तरक्की कर इसका भी डाइट प्लान करवा इसे स्लिम बना दिया है. अब चश्मिश होना फैशन स्टेटमेंट है और कूल भी लगता है. हम बैकवर्ड जमाने के लोग ऐवीं फूल ( गुलाब नहीं, मूर्ख वाला) बनके दिन काटते रहे.

खैर...जो भी है. अपुन खुश हैं कि प्रकृति की सुन्दरता रोज अपनी आँखों में भर सकते हैं. किसी का हाथ थाम उसे सहारा दे सकते हैं. फिलहाल जितनी भी रोशनी है, लेखन और जीने के लिए काफ़ी है. दुनिया जैसी भी है, दिख तो रही है....उससे ज्यादा देखने की अब कोई ख्वाहिश बची भी कहाँ!

बोलो, तारा रारा, बोलो तारा रारा
हायो रब्बा, हायो रब्बा, हायो रब्बा
- प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 23 मई 2017

यात्रा और यादें

"बेटा, ऐसे pose बनाओ।"
"मुँह थोड़ा कम खोलकर हंसो।"
"हाँ, बस थोड़ा-सा इधर की ओर देखो।"
हद है भई! तस्वीर ले रहे कि स्क्रीन टेस्ट? :/
और सबसे ज्यादा बुरी तस्वीर तो मुझे नहाए हुए, राजा बेटा, रानी बिटिया जैसे up-to-date बच्चों की लगती है।
बच्चे अपने स्वाभाविक रूप में सबसे प्यारे लगते हैं। मुँह बनाते हुए, गला फाड़ चिल्लाते हुए, मिट्टी में खेलते, हँसते और बिखरे बाल के साथ। दोनों हाथ खाने से सने हुए, पर चेहरे की चमक इस बात का पक्का सबूत..कि उन्हें भोजन बड़ा स्वादिष्ट लग रहा है।
कुल मिलाकर, बच्चों को हर समय सलीके से रहने की कोई जरूरत नहीं। उम्र के साथ समझदारी स्वत: ही आती जाती है। सिखाना जरूर चाहिए, पर कुछ पल उन्हें बिंदास भी जीने देना चाहिए।ये दिखावा, बोले तो शो बाज़ी करने के लिए बड़े ही काफ़ी हैं। :P

* अभी-अभी एक बच्चा, फ़ोटो खिंचवा-खिंचवाकर irritate हुआ बैठा है। वैसे मुँह गोलगप्पे-सा बनाकर बड़ा प्यारा भी लग रहा। उसके मम्मी-पापा, फ़ोटो शॉप करके उसे और सुंदर बना रहे हैं। ;)  :D
छुट्टियाँ, बचपन और गुलाटियां...ज़िंदगी की सारी खूबसूरत अदाएं, इन्हीं लम्हों से होकर गुजरती हैं। :)
एल्बम पलटो, तो बड़ा गुस्सा आता है...बच्चे, इतनी जल्दी बड़े क्यूँ हो जाते हैं! :(
फिर याद आता है, उफ़्फ़ हम भी तो हो गए! :D
-प्रीति 'अज्ञात'
** यात्रा और यादें 

गुरुवार, 18 मई 2017

कृपया प्रकाश डालें

कृपया प्रकाश डालें-

प्रकाशकों के बारे में आपके अनुभव कैसे रहे? इसमें दोनों तरह के प्रकाशक शामिल हैं। एक वो, जो आपके लेखन में दम होने के बाद भी तगड़ी रक़म लेकर ही आपकी पुस्तक प्रकाशित करके आपको धन्य करते हैं और दूसरे वो, जो बिना कोई धनराशि लिए आपके शब्दों को पाठकों तक पहुँचाते हैं। वैसे एक तीसरा प्रकार भी है जो पैसे लेकर कुछ भी छाप देता है। कृपया इनके लिए एक अलग मुकुट की व्यवस्था की जाए। :D

इन तीनों प्रकारों से सम्बंधित प्रश्न एक ही प्रकार के हैं-
1. आपकी पुस्तक की कितनी प्रतियाँ छपीं?
2 . कितनी बिकीं ?
3. ऑनलाइन स्टोर्स में उनकी उपलब्धता/ अनुपलब्धता के संदर्भ में  जानकारी। 
4.  रॉयल्टी
5. या ऐसा कोई भी प्रश्न जहाँ उन्हें लेखक के प्रति उनके उत्तरदायित्व का स्मरण होने लगे।

अब ये बताइये -
1. क्या उपरोक्त पाँचों तरह के प्रश्नों के उत्तर देने से आपका प्रकाशन-समूह बचता है?
2. बिना पूछे ही जानकारी दे देते हैं। 
3. कभी नहीं देते हैं।
4.  मैसेज पढ़कर unread में परिवर्तित कर देते हैं। 
5.  व्हाट्स एप्प के टिक मार्क को नीला होने से पहले ही निगल लेते हैं।  
6. आपके पच्चीस मैसेज पढ़ने के बाद एक मरा हुआ-सा जवाब भेजते हैं कि 'बताता हूँ' उसके बाद ऐसे गायब होते हैं जैसे, 'गधे के सिर से सींग गायब हुए थे' 
नहीं, नहीं! सींग गायब होने में तो थोड़ा समय लग गया था न! :O 

मैं जानती हूँ कि इन प्रश्नों के उत्तर देने की हिम्मत हरेक लेखक में नहीं होगी। आख़िर उनकी अगली पुस्तक का भी सवाल है! मुझे उनसे नाराज़ होने या शिकायत करने का कोई हक़ ही नहीं! ईश्वर उन्हें सदैव सुरक्षित रखे! :)
पर कृपया उन प्रकाशकों के नाम जरूर लिखिए, जो आज के पूर्ण व्यावसायिक दौर में भी अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन पूर्ण रूप से कर रहे हैं। मैं 'प्रकाशक' को प्रकाश की राह पर ले जाने वाले के रूप में देखती आई थी। लेकिन बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, दिखने-सुनने में भी आ रहा है कि :( हर बार की तरह यहाँ भी मेरी राय गलत ही निकली। मैं सही होना चाहती हूँ, इसलिए आपके उत्तर अपेक्षित हैं।
ध्यान रहे, ये कुंठा नहीं जिज्ञासा है। आपके उत्तर आने वाले लेखक/ लेखिकाओं को सही प्रकाशन समूह चुनने में सहायता देंगे। यह भी संभव है कि निराश होकर वे पुन: डायरी लेखन तक ही सीमित रह जाएँ! 
यदि आप एक गंभीर साहित्यकार/प्रकाशक/ या किसी भी माध्यम से इस क्षेत्र से जुड़े हैं तो मैं उम्मीद रखती हूँ कि जवाब ईमानदारी से ही मिलेंगे। बाक़ी तो जो है सो हइये ही। एक पक्का वादा है, फ़तवा तो नहीं ही निकालेंगे जी! ;) :P 
- प्रीति 'अज्ञात'
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अनावश्यक सूचना-
यदि आप किसी ऐसे प्रकाशक की पोस्ट पढ़कर बलिहारी हुए जा रहे हैं जो अपने पसंदीदा लेखक के वीडियो /ऑडियो बड़े गर्व के साथ दनादन शेयर कर रहा है तो रुकिए जरा.....उस वीडियो /ऑडियो के बनने में जनाबेआली का कोई योगदान नहीं है। ध्यान रहे, ये बंदा अपनी जेब से इकन्नी भी नहीं खर्चता। उसे खर्च करवाना आता है, लेखक को भुनाना आता है और बात न जमे (माने लेखक पुस्तक के प्रकाशन की राशि के अतिरिक्त और खर्च देने में असमर्थता जताये तो) तो उसे देख न पहचानने का ढोंग करना भी उफ्फ!! क्या ग़ज़ब आता है। आप हॉलीवुड जाओ न पिलीज़। :D

निवेदन- कृपया अच्छे प्रकाशकों को टैग जरूर कीजिए। हमने किसी को भी नहीं किया, वरना ये होता कि सिर्फ़ अपनी पुस्तक की बात कर रही हूँ। यह एक सामान्य चर्चा है जिसका हरेक जीवित, मृत और मूर्छित इंसान से सीधा संबंध है। 

शुक्रवार, 5 मई 2017

बदलती राहें

"किसी शांत, ठहरे हुए पानी में फेंका गया एक छोटा-सा पत्थर ही कैसी हलचल पैदा कर देता है। ढप्प की आवाज़ सबको सुनाई देती है और फिर एक बिंदु के चारों तरफ गोलों का लगातार बनता जाना, जिसके गोले ज्यादा बने, वही जीता! खेल हुआ करता था। कई बार पत्थर कुछ इस तरह से फेंका जाता था कि वह पानी को दो जगह छूता हुआ अंदर जाता था।

पानी को चोट नहीं लगती, उसका काम तो बहते जाना है। कभी-कभी बस दिशा ही बदलनी होती है। वो पत्थर जिसने उसकी जमीं को भेद दिया है, काफी गहरा जाता है। धीरे-धीरे तलहटी में एक पहाड़ खड़ा होने लगता है, उसमें से दर्द जब भी रिसता है....जल-स्तर बढ़ता जाता है।
याद रहे, फिर एक दिन तूफ़ान भी आता है!"
- प्रीति 'अज्ञात' 
* 'बदलती राहें' कहानी से  

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

बात निकलेगी, तो फिर दूर तलक़ जायेगी....!


'वंदना करते हैं हम'..... बचपन में रेडियो ceylon पर बजते इस भक्ति-गीत और हमारी आँख खुलने का बड़ा गहरा रिश्ता रहा है। 
सच कहूँ तो मैंने इसे कभी भी बैठकर तन्मयता से नहीं सुना होगा और न ही इसके lyrics याद हैं लेकिन फिर भी हमारी सुबह में यह गीत इस तरह घुल-मिल गया था कि जैसे दिनचर्या का एक हिस्सा हो बिल्कुल बिनाका( बाद में सिबाका) गीतमाला की तरह! इन दोनों में अंतर इतना ही था कि अमीन सयानी और गानों के चढ़ते-उतरते पायदानों की ख़ूब चर्चा होती। पहले पायदान के गीत के लिए बेफ़िज़ूल शर्तें लगतीं और प्रथम पायदान तक पहुँचते-पहुँचते साँसें यूँ अटक जातीं जैसे कि बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट निकलने वाला हो! उधर 'वंदना करते...!' पर चर्चा कभी नहीं हुई लेकिन इसकी ख़ुश्बू हम सबकी रूह में तब से अब तक बसी हुई है। बिनाका से जो प्रगाढ़ रिश्ता था, वही रिश्ता इस ख़ूबसूरत और पवित्र सुबह से भी जुड़ गया था। कुछ बातें साथ चलती हैं, हवाओं की तरह! होती तो हैं, बस बयां नहीं की जातीं!

समय के साथ जैसे-जैसे देश का विकास  होता गया, सुविधाएँ बढ़ने लगीं और उसी दर से व्यस्तता और जिम्मेदारियाँ भी। इस सब में रेडियो बहुत पीछे छूट गया। इतना कि मुझे याद भी नहीं कि आख़िरी बार ये दोनों कब सुने थे! परन्तु इतना जरूर याद है कि न तो मेरी किसी सुबह को इससे अड़चन हुई थी और न ही परीक्षा वाली कोई रात को। सब सुचारु रूप से चलता था। कहीं कुछ भी forced नहीं लगता था। हालाँकि रेडियो में तो यूँ भी ऑन/ऑफ़ अपने हाथ में होता है। हमारे घर में मरफी का ट्रांज़िस्टर था, जो एक चपत खाते ही सिग्नल कैच कर लेता था! कई बार अलग-अलग एंगल में भी रखकर शगुन करते थे कि अब सही बजेगा!

ख़ैर, फिर टीवी आया और उसके बाद सा-रे-गा-मा! इसी पर पहली बार सोनू निगम को सुना-देखा। लाखों देशवासियों की तरह उनके ज़बर्दस्त प्रशंसकों में एक नाम हमारा भी जुड़ गया। छोटा-मोटा क्रश भी कह सकते हैं। आज तक इतना तो तय है कि सोनू निगम, अमिताभ बच्चन, जगजीत सिंह, सचिन की बुराई का मतलब कि आप हमारी नज़रों में उसी वक़्त गिरकर हमारी डायरेक्ट घृणा के पात्र बन चुके हैं।
फ़िलहाल सोनू की बात करते हैं..... तो 'कल हो न हो', 'पंछी नदिया, पवन के झोंके' के बाद तो फिर किसी और को सुनने का मन ही नहीं करता था। 'दीवाना', 'जान' एल्बम दो-तीन हज़ार बार तो सुने ही होंगे मैंनें। 'अब मुझे रात-दिन तुम्हारा ही ख़्याल है' सुनकर भला कौन न दीवाना हो जाता!

आज सोनू निगम के एक tweet को पढ़कर गुस्से से कहीं अधिक दुःख हुआ। अभी भी लग रहा कि शायद किसी ने उनका अकाउंट हैक किया होगा! अगर नहीं किया है तो बताओ सोनू......
* चिड़ियों की चहचहाहट और मुर्गे की बाँग से सुबह संगीतमय नहीं लगती क्या? कि उन्हें भी चुप रहने को कहें?
* मस्ज़िद की अजान हो या मंदिर, गुरूद्वारे, किसी भी धार्मिक स्थल के घंटे की आवाज....ये ध्वनियाँ सुबह में पवित्रता नहीं घोलतीं?

अरे, दूधवाले की साइकिल की घंटी, बरामदे में गिरा अख़बार, सड़क पर मॉर्निग-वॉक को जाते लोगों की चहलक़दमी, दुकानों के खुलते शटर ये सब और न जाने ऐसे कितने ही पल हमारी-आपकी सुबह को ख़ुशनसीबी से भर देते हैं। इनसे मन उल्लसित होता है और रोज एक नई
रौशनी का आगाज़ भी।
इनसे शिकायतें तो हरगिज़ नहीं हो सकतीं, बल्कि हमें इन पलों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि सुबह की पहली चाय की, पहली चुस्की में जो मिठास है वो इन्हीं की उपस्थिति घोलती है।
वरना बंद खिड़कियों और चलते ए.सी. के बाद तो हवाओं की भी ज़ुर्रत कहाँ जो किसी की नींद में खलल डाल सके!

*हाँ, इस बात में कोई दो राय नहीं कि ईश्वर तक अपनी बात/ प्रार्थना पहुँचाने के लिए लाउडस्पीकर की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि वो अगर है तो हर जगह मौजूद है। सर्वदृष्टा है। हमारे, आपके भीतर ही है। लेकिन फिर तो ये बात बहुत बड़ी बहस में बदल जाने वाली है क्योंकि हम बैंड-बाजों के देश में रहते हैं। लाउडस्पीकर को लेकर ही कई और विषय उठेंगे। यहाँ बच्चे के जन्म से लेकर विवाह तक, हर कार्यक्रम में बिना शोरोगुल के बात हमें हजम ही कहाँ हो पाती है। जब तक सड़क पर नागिन-डांस न हुआ, कोई बियाह ही नहीं पूरा होता! सारे उत्सव धड़ाम-धुड़ूम करके ही मनाये जाते हैं। मैच जीते तो जुलूस, मिस यूनिवर्स बने तो आतिशबाजी, चुनाव जीते तो उम्मीदवार को 21 तोपों की सलामी, कोई विदेश से लौटकर आया तो ढोल नगाड़े ढमाढम बजते हैं। रतजगा होता है, गरबा चलता है, dj वाले बाबू गाने चलाते हैं।
अब हर मौके पर चुपचाप बैठकर तो सेलिब्रेशन होने से रहा! कहने का मतलब ये है कि जब कुतर्क की लाइन लगेगी तो ध्वनि के साथ, वायु प्रदूषण को भी लपेटे में लेकर माहौल को और प्रदूषित ही करेगी। 
- प्रीति 'अज्ञात'
17 April'2017      11.33pm

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

पूर्णा.... A COMPLETE FILM!


'पूर्णा' छोटे गाँव के बड़े हौसलों को सलाम करती, ईमानदारी से बनाई गई एक अत्यंत ही ख़ूबसूरत फिल्म है जो सच्चाई को बिना किसी तड़के के परदे पर सलीक़े से उतारने में पूरी तरह सफ़ल रही है। दो चचेरी बहनों की दिल को छू लेने वाली दोस्ती, परस्पर स्नेह और उनकी संवेदनशीलता  भीतर तक झकझोर के रख देती है। यहाँ दर्शकों की आँखें यह देख हैराँ भी होती हैं कि एक टूटता हुआ इंसान कैसे किसी को ज़बरदस्त हौसला दे सकता है! पर जब दिल साफ़ हो तो क्या नहीं हो सकता! आज जबकि इंसान एक-दूसरे को काटने और जलने-भुनने में व्यस्त है, ऐसे में स्वयं के हारते हुए किसी की आँखों में जीत का स्वप्न थमा जाना; उम्मीद की जानदार मरहम का काम करता है। दोनों युवा कलाकारों के अभिनय की निश्छलता देखते ही बनती है।

यह फिल्म एक छोटी लड़की द्वारा माउंट एवरेस्ट को फ़तह कर लेने की ही कहानी नहीं बल्कि इसके साथ-साथ यह कम उम्र में विवाह और उसके दुष्परिणामों को गंभीरता से सामने भी रखती है। यह स्कूलों और संस्थाओं में चल रही धाँधली, कागज़ी रिपोर्टों और मिड-डे मील की असलियत पर तीख़ा प्रहार करने से भी नहीं चूकती। निर्देशन इतना बेहतरीन है कि रोचकता एक पल को भी कम नहीं होती और अंत तक आप अपनी सीट से बँधे रहते हैं। 'पूर्णा' में जहाँ एक पिता के, समाज के नियमों के बीच रहने और बँधे होने की बेबसी भावुक कर देती है। वहीँ उसका अपनी बेटी के प्रति अगाध स्नेह और दृढ़ विश्वास दर्शकों को तालियाँ पीटने पर मजबूर कर देता है।

यह फिल्म इस सोच को भी पुख़्ता करती चलती है कि एक उत्कृष्ट फिल्म बनाने के लिए बड़े सितारों और नामों की नहीं बल्कि अच्छी स्क्रिप्ट, उम्दा अभिनय और समर्पित निर्देशन की आवश्यकता होती है। राहुल बोस की उपस्थिति और सहज अभिनय कौशल के तो हम सभी कायल हैं पर कभी-कभी अफ़सोस भी होता है कि खानों और घरानों की भीड़ में राहुल बोस, मनोज बाजपेई, इरफ़ान ख़ान और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी जैसे बेहतरीन कलाकारों को उनके हिस्से की उतनी ज़मीं नहीं मिलती जिसके ये सदैव हक़दार रहे हैं। ख़ैर, हीरा कहीं भी रहे...इससे उसकी श्रेष्ठता पर असर नहीं पड़ता।
बहरहाल, राहुल बोस और पूर्णा की टीम को इस फिल्म के लिए हार्दिक बधाई और इसी ज़ज़्बे के साथ जुटे रहने के लिए अशेष शुभकामनाएँ! 
फिल्म की tagline से सहमत हूँ.....YES, COURAGE HAS NO LIMIT! :) 
- प्रीति 'अज्ञात'


बुधवार, 5 अप्रैल 2017

ऐसी लागी लगन....


मैं बहुत ज्यादा धार्मिक नहीं हूँ पर नास्तिक भी नहीं। मुझे लगता है कि कोई तो ऐसा हो जिसके सामने अपने दुखड़े रोये जाएँ, कुछ अच्छा होने पर उसे 'थैंक्स' कहा जाए, अपने सुख की बातें बतलाई जाएँ, जमाने भर की शिकायतों का पुलिंदा उसके सिर पर रख उससे सवाल किए जाएँ और फिर लोगों को सुधारने का अल्टीमेटम एक डेडलाइन के साथ दिया जाए! बदले में न तो डाँट मिलने का डर हो और न पकाऊ बोरिंग प्रवचन सुनने का ख़तरा (पर आपको ये ख़तरा अब तक इस पोस्ट के माध्यम से बना हुआ है,:D खी-खी-खी)। इसके लिए 'ईश्वर' से बेहतर दोस्त और कोई नहीं! सो, उनसे सुबह पांच मिनट(अधिकतम) अगरबत्ती, दिया-बाती की हेल्लो, हाय हो जाती है। सभी धर्मों के ईश्वर की उपस्थिति और धार्मिक ग्रन्थ भी हैं। कुछ पढ़े, कुछ शेष हैं। बाक़ी तो मैं आपकी ही तरह अच्छे कर्म पर ही विश्वास करती हूँ। :)

एक बात है लेकिन, यदि आपके मन का मैल नहीं गया और आपके ह्रदय में किसी के प्रति दुर्भावना, ईर्ष्या या बदला लेने का भाव है या फिर आप स्वयं को लेकर ही किसी हीन भावना से ग्रस्त हैं तो सारे दिन धार्मिक स्थलों पर अपनी धार्मिकता का प्रचंड प्रचार करने के बाद भी आप ईश्वर के सबसे बड़े विरोधी/दुश्मन ही कहलायेंगे क्योंकि आपने उसके दिए हुए संदेशों को अब तक समझा ही नहीं! आस्तिक बनना है तो दिल से बनना चाहिए, है न ? So, Get up & Dance! 珞

मेरे नानाजी बहुत पूजा-पाठ किया करते थे और मैं उनकी सबसे बड़ी fan भी थी। स्वाभाविक था, उनकी संगत का असर भी मुझ पर ख़ूब पड़ा था। उन दिनों घर के मंदिर को भगवान की तस्वीरों (कैलेंडर से काटकर) से सजाया करती। मूर्तियाँ तो वहाँ पहले से ही थीं। सभी भगवानों की आरती, स्त्रोत भी ढूँढकर रख लिया करती थी। इसका धार्मिकता से कहीं ज्यादा, सीखने से लेना-देना था कि 樂हरेक भगवान की इश्टोरी पता तो चले। स्कूल के दिनों में ही क़िताबें पढ़-पढ़कर palmistry भी सीख ली थी, जो कि समय की लक़ीरों के गहराते-गहराते धुंधली पड़ती गई। अब सिर्फ़ जीवन रेखा, ह्रदय रेखा और मस्तिष्क रेखा की पहचान भर शेष है। 'व्रत' से मुझे कोई परेशानी तब तक नहीं, जब तक दूसरे उसे कर रहे हों। अब भगवान ने उनको यह शक्ति दी है तो हम का  करें? हमसे तो नहीं रहा जाता जी! वैसे पूरा दिन घर या बगीचे का काम करते हुए कब दो कप चाय के साथ ही पूरा दिन गुज़र जाए,पता नहीं चलता पर जो 'व्रत' की बात आई तो बस, केस बिगड़ा ही समझो! पाचन तंत्र के सारे अंग जन्मों के भुक्खड़ टाइप बनकर 'सामग्री भेजो बेन' की गुहार करने लगते हैं और हमसे उनकी ये बेचैनी देखी ही नहीं जाती सो तुरंत फ़ूड सप्लाई प्रारम्भ कर देते हैं।

वैसे जब ये पोस्ट लिखने बैठी थी तो अनूप जलोटा जी का नाम ज़ेहन में था। उनके गाये दो भजन 'जग में सुन्दर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम' और 'ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन' मेरे all time favourite हैं और अनूप जी को भजन के अलावा और कुछ गाते देखना ठीक वैसा ही लगता है जैसा कि  सोनू निगम का एक्टर बनना लगा था। कुछ लोग दिल में जिस तरह बैठे हुए हैं, उम्र-भर वैसे ही सुहाते हैं। और हाँ, इन दोनों ही गायकों का जवाब नहीं! देने की कोशिश भी न कीजियेगा! 
-प्रीति 'अज्ञात'