शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

बस...अब और नहीं

रेप का विरोध करने वालों और अपराधियों को दंड देने के लिए धरना देकर बैठने वालों को घसीटकर हटाया जाता है लेकिन बलात्कारियों के हाथ थाम, उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराते हुए बाइज़्ज़त उनकी ससुराल पहुँचाया जाता है। यहाँ वे मुफ़्त की रोटियाँ तोड़ते हुए सकुशल समय बिताते हैं और बाहर आते ही पीड़िता को ज़िंदा जला देते हैं। वे जानते हैं कि इस बार भी उन्हें वर्षों से चले आ रहे लचर न्याय-तंत्र का उत्तम संरक्षण प्राप्त होगा। 
 
पीड़िता का गुनाह यह कि उसने रेप की शिकायत पुलिस से कर दी। 
पीड़िता का गुनाह यह कि उसने न्याय-व्यवस्था पर विश्वास किया। 
पीड़िता का गुनाह यह कि उसने अपने जीवन को जीने की हिम्मत रखी और बलात्कारियों के विरोध में खड़े होकर सच कहने से नहीं हिचकिचाई!
पीड़िता का दुर्भाग्य यह कि जिस समाज के बीच उसने ये सच कहा, उन्हीं के सामने वह चीखती-जलती हुई चलती रही और सबने तमाशा देखा। 
पीड़िता का दुर्भाग्य यह कि उसी असहनीय पीड़ा के साथ उसने स्वयं सहायता के लिए फ़ोन लगाया। 
पीड़िता का दुर्भाग्य यह कि उसने उस शहर में आवाज उठाई जहाँ का विधायक स्वयं दुष्कर्म में लिप्त हो ठसके से घूमता रहा है।

झूठों और मक्कारों  की दुनिया में सच का कोई मोल नहीं!
आम इंसान के जीवन का भी कोई मोल नहीं!  
वे लोग जिनसे हम न्याय के लिए गिड़गिड़ाते हैं, उन्होंने ख़ुद को सबका ख़ुदा समझ लिया है।  
ये कैसा समय है कि सीमाओं पर सैनिक देश के लिए जान दे रहे हैं और सीमाओं के भीतर स्त्रियों की जान ली जा रही है। 

सौ बार सोचती हूँ कि अब कभी नहीं लिखूँगी। अच्छे से जान गई हूँ कि ये आक्रोश न तो ख़त्म होगा और न ही इससे कोई समाधान ही निकलेगा। पर इन दिनों स्त्रियों की जो मनःस्थिति हो रही है वो एक स्त्री से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता! उससे होता क्या है पर!! नहीं लिखना है अब कुछ और... 
- प्रीति 'अज्ञात'

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

दुर्योधन और दुःशासन का बोलबाला मगर कृष्ण नदारद!

हर 15 मि. में एक रेप
प्रति घंटे 4 रेप
प्रत्येक दिन लगभग 90 मुक़दमे दर्ज़
और प्रत्येक माह 2700 महिलाओं से रेप
क्या कीजियेगा, देश की बेटियों को बचाकर?
रेप????
और ये तो वे आंकड़े हैं जो लिखित हैं. वे जिन्हें कभी दर्ज़ ही नहीं किया गया, उनकी सोचें तो रूह काँप उठेगी.

नोटबंदी में पूरे देश को रातोंरात लाइन में खड़ा कर दिया!
चालान के भय से पूरे देश के लोग एक घंटे में नियम समझ दूसरों को समझाने लगे. 
GST सबके दिमाग में जबरन घुसा दिया गया.
सारे कानून को ताक़ पर रख सुबह तक नये मुख्यमंत्री का जन्म हो गया.
लेकिन वैसे कानून के आगे सबके हाथ बंधे हैं? 
क्या सरकारें, उनकी अकर्मण्यता के किस्से सुनने को चुनी जाती हैं? या हर समय उनकी तारीफ़ के झूठे पुलिंदे बाँध उनकी नज़रों में चमककर केवल अपना भला सोचने वाले चाटुकार बनना ही हम सबका कर्त्तव्य है?

आप अपराधियों के अंदर भय पैदा कीजिये, बलात्कारियों को सरेआम मृत्यु दंड दीजिये फिर स्वयं देखिये कि कमी आती है या नहीं!
मात्र कड़ी निंदा करने से समस्या नहीं सुलझ जाती! गहरा दुःख व्यक्त करना भी काफ़ी नहीं! मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात भी सुनिए, जनता की पीड़ा समझिए, उनके भय के अंदर झाँकिये.
बहुत हुआ मन्दिर-मस्ज़िद! यथार्थ के धरातल पर जनता को अब अपराधियों के ख़िलाफ़ एक्शन की दरकार है.
एक बार सारे अपराधियों को सामूहिक फाँसी देने की हिम्मत कीजिये.  पूरा देश और आने वाली पीढ़ियाँ आपको युगों तक याद रखेंगीं.

जिनके हाथों हम देश सौंपते हैं, बदले में वे हमें क्या देते हैं? असुरक्षा, भय और बेटियों की जली हुई लाशें!
सहिष्णुता की और कितनी परीक्षा दे आम आदमी??
यदि सरकार देश नहीं संभाल सकती, पुलिस सुरक्षा नहीं दे सकती और न्याय तंत्र अपने आँखों की पट्टी खोल वीभत्स अन्याय को भी नहीं देख पाता! अपराधी सामने खड़े होने पर भी वर्षों तक कानूनी पाठ पढ़े जाते हैं तो माफ़ कीजिये, ये आपके बस की बात ही नहीं रही! आप एक-दूसरे की दुहाई देकर राजनीतिक रोटियाँ सेकिए,अब जनता अपना हिसाब खुद ही कर लेगी!
दुर्भाग्य है कि इतिहास में यह समय 'बलात्कार युग' के नाम से जाना जाएगा. जहाँ दुर्योधन और दुःशासन का बोलबाला था और कृष्ण नदारद!
गाँधी के देश की ये कैसी तस्वीर है कि 'गाँधीगिरी' के कट्टर समर्थकों ने भी अब हाथ खड़े कर दिए हैं. सच यही है कि जनता की सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है जो अब समाप्त हो चुकी है. राजघाट पर आमरण अनशन पर बैठी महिलाओं को देख बापू का हृदय भी रोता होगा. आज यदि वे जीवित होते तो स्वयं आगे होकर भारत की बेटियों के हाथ में लाठी थमा उनसे अत्याचार का विरोध करने और अत्याचारी का सिर क़लम करने को कहते. 

कितना अच्छा होता यदि देश की शीर्षस्थ महिलाएँ, नेता, पत्रकार सब एकजुट हो आमरण अनशन पर बैठ, बलात्कारियों के लिए तुरंत दंड की माँग करते लेकिन क्यों बैठें, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जो आड़े आती है! सत्ता के विरुद्ध एक शब्द भी बोल दिया जाए तो राष्ट्रहित की बातें चीख-चीखकर सुनाई जाती हैं लेकिन बलात्कार के ख़िलाफ़ बोलने में इसी ज़ुबाँ को लकवा मार जाता है! ये राज्य के आधार पर बोलना तय करते हैं.
हिन्दू-मुस्लिम करते समय इनकी छवि चमकने लगती है क्या?

जनता भी ख़ूब समझती है कि ढोंगी नेताओं का एक ही मन्त्र है, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता'. 
वरना अगर ये सब वहाँ अड़ जायें तो क्या मजाल कि अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हों कि उन्हें किसी का डर ही नहीं! पर अपराधों के उन्मूलन से जुड़कर कौन अपने राजनीतिक कैरियर की अंत्येष्टि करेगा! यही इस देश का सच और जनता का दुर्भाग्य है!
देशवासियों की हिम्मत, दिल और विश्वास तीनों टूट चुके हैं. कौन जोड़ेगा इसे?
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

धरती स्त्रियों के लायक़ नहीं रही

बेटियों को सब पर संदेह करना सिखाओ। उन्हें हथियार चलाना सिखाओ और आवश्यकता पड़ने पर उसका तुरंत उपयोग करना भी। आती-जाती सरकारों ने आज तक कुछ नहीं किया, आप उनके भरोसे न रहें! अपनी रक्षा आप करें!  पुरुष मानसिकता में सुधार आने की सोच रखना एक भ्रम है, जिसे हम और आप वर्षों से पाल रहे हैं। 

जब अपराधियों को इस बात का पूरा यक़ीन है कि इस देश में बलात्कारी को फाँसी कभी नहीं होगी, तो उन्हें क्यों और किस बात का डर! ज़िंदा जलते शरीर से उठने वाला धुँआ देश की राजनीति के लिए लाभदायक नहीं इसलिए ऐसे मामलों की चर्चा दो मिनट के मौन से अधिक नहीं होनी है! सोचिये, सत्ता झपटने के लिए जो रतजगा करते हैं क्या आज भी रात भर जाग सबसे दस्तख़त करा, अपराधियों को सुबह तक फाँसी दे देंगें? न ही विपक्ष इसके लिए कोई आंदोलन ही करने वाला है।

'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' वाला स्लोगन किसी काम का नहीं! क्योंकि पढ़ लेने से भी बेटियाँ बच नहीं जातीं। वे तब भी ज़िंदा जला दी जाती हैं। उनका दोष यह है कि वे अब भी समाज पर विश्वास कर लेती हैं। समाज, जहाँ हवस के दरिंदे छुट्टा घूम रहे हैं। समाज, जहाँ बलात्कारियों पर वर्षों तक केस की नौटंकी कर उसे बचा लिया जाता है। समाज, जहाँ उन्नाव रेप के बलात्कारी विधायक लोगों के बीच सेलिब्रिटी की तरह हँसते हुए चलते हैं। समाज, जो कभी हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्ज़िद में उलझ लड़ता है तो कभी उन नेताओं के लिए जिनकी नज़रों में उसकी क़ीमत एक वोट से ज्यादा कुछ भी नहीं!
आलू-प्याज के दामों में उलझा समाज उनके कम होने की उम्मीद लिए आसमान की ओर तकता है। सब्जियों और पेट्रोल के महँगे दामों में उलझे समाज को पता ही नहीं चला कि बीते वर्षों में मौत कितनी सस्ती हो गई है! 

प्रियंका, तुम्हारा दर्द, तुम्हारी चीख़ें, तुम्हारा लहू, तुम्हारे आँसू और तुम्हारा चकनाचूर विश्वास....इस देश का प्रत्येक संवेदनशील नागरिक महसूस कर पा रहा है। ईश्वर तुम्हारे ज़ख्मों को मरहम दे। क़ाश! तुम इस पीड़ा को भूल जाओ। तुम जिस भी दुनिया में हो, वहाँ से हम बचे हुए लोगों के लिए दुआ करना और परमात्मा से कहना कि धरती स्त्रियों के लायक़ नहीं रही। सृष्टि के समाप्त होने का समय आ चुका है।
 - प्रीति 'अज्ञात'
#priyanka #प्रियंका_रेड्डी
Pic: Google

शनिवार, 23 नवंबर 2019

ट्रेलर किसी और फ़िल्म का, रिलीज हो गई कोई और!

A को लगता था कि B उसके साथ नहीं है तो हालात से हार मान उसका झुकाव C की ओर बढ़ने लगा. इधर C का मुँह पहले से फूला हुआ था तो उसने A को अपने पास फटकने भी नहीं दिया. B और C के नखरों से परेशान A के पास अब अपनी पुरानी प्रेमिका D की तरफ़ लौट जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. ये वही थी जिसे एक बार A ने B की ख़ातिर ठुकरा दिया था. पर पुराने प्रेमी को देख D मुस्कुरा दी और A ने उसके गले में बाँहें डाल नई ज़िन्दगी के स्वप्न सजाने शुरू कर दिए. यह सब देख C निराशा के गहरे भंवर में डूब गई क्योंकि उसके दिल में अब भी A के लिए 'कुछ-कुछ होता था', लेकिन अब उसने इन सबसे किनारा करने का कठोर मन बना लिया था इसलिए वह अपने टूटे हृदय की किरचों को जोड़ने के जतन में लग गई. 
इधर कहानी में एक नया ट्विस्ट आया. हुआ यह कि  A और D अपने बियाह की जोरदार तैयारी में लगे थे, तब तक पंडिज्जी को B ने किडनैप कर लिया. ये पंडिज्जी D के रिश्तेदार थे और उन पर बड़ा भारी कर्ज़ा चढ़ा हुआ था. B ने उनका कर्ज़ा उतरवाने का प्रॉमिस कर दिया था. अब मुआ पैसा क्या न करवाए! प्रेम-व्रेम का क्या वो तो इन्हें दुबारा भी हो सकता है! बस इसी सोच के साथ पंडिज्जी (Dवाले) ने B का ताजा एवं तत्काल प्रणय निवेदन स्वीकार कर लिया. ख़ुशी में बावरावस्था को प्राप्त D (वोई रिश्तेदार वाले)  B ने सोशल मीडिया पे अपनी DP बदल ली और अब वे अपनी बीड़ी सुलगा रहे. यह देख एक्चुअल D ने घबराकर ट्वीटिया दिया कि "जिन्ने हमें धोका दीया है. हम बिनके साथ नईं हैं. इनकौ सबक़ सिखानो परेगो." 
A ने भी गुस्से में भरकर श्राप देकर कहा, "मरे, जे तो पापी लोग निकरे! आग लगे सबन में."
 Dऔर B अपनी दुनिया में मशग़ूल बत्तीसी चमकाय रये और ख़ूब फोटू खिंचवान में लगे हैं और भक्तजन कुदकने में.

इस लघुकथा से यह सिद्ध होता है कि मोई जी ने जो AB वाला नया फॉर्मूला बताया था वो यही था! जो कि आज आख़िरकार सही सिद्ध हो ही गया!
जनता ने A को देख आह भरते हुए वही कहा जो उन्होंने बचपन में कहीं पढ़ा था, 'चौबे जी छब्बे बनने गए, दुबे होकर लौटे' (ये कहावत है कृपया दुबे जी एवं चौबे जी इसे दिल पर न लें). आज देख भी लिया. ओ मोरे राम! 
पता नहीं ये राजनीतिक कुटिलता है या कि ग़ज़ब राजनीति की अजब परिभाषा! पर इतना तो तय है कि आज यदि असली वाले चाणक्य जी जीवित होते तो आँख खुलते ही हृदयाघात से स्वर्ग सिधार जाते क्योंकि उनसे ज्यादा होशियार लोग इस धरती पर पैदा हो चुके हैं.

बेचारी वोट देने वाली भोली जनता को अब ये समझना होगा कि सच्चाई, ईमानदारी और पारदर्शिता का ढोल पीटने वाली राजनीति का असल चरित्र क्या है! 
सुनिए, सुनिए ये कानपुर वाले ठग्गू के लड्डू जैसे हैं, जिनकी tagline है "ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे हमने ठगा नहीं!"  
हे ईश्वर! उनका क्या होगा जिन्होंने ट्रक भर मोहनथाल ऑर्डर कर दिए थे! क्यों न डिलीवरी पॉइंट बदलवा लिया जाए?

उधर न्यूज़ एंकर हकबकाकर समझ ही न पा रहे कि क्या बोलें, क्यों बोलें और कब बोलें क्योंकि रात को तो दूसरी स्क्रिप्ट तैयार की थी. ये ठीक वैसा ही है कि फ्रेंडली स्क्रीनिंग किसी और फ़िल्म की और थिएटर में कोई और रिलीज़ हो गई! ये धोखा है, फ़रेब है पर लोकतांत्रिक देश में किसी चुटकुले की तरह बार-बार सुनाया जा रहा है. लोगों की आँखें फटी रह गईं और दूर कहीं नीरो बाँसुरी बजा रहा है.
-प्रीति 'अज्ञात'
#राजनीतिककुटिलता #चाणक्यपंती #महाराष्ट्र #बीजेपी #शिवसेना #कांग्रेस #ichowk#आईचौक 
इस पोस्ट को आप इंडिया टुडे की वेबसाइट ichowk की इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं-

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

मर्द को दर्द भी होता है!

ये तो हम जानते ही हैं कि 19 नवंबर को 'अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस' के रुप में विश्वभर में मनाया जाता है। इस विशिष्ट दिवस की संकल्पना पुरुषों के साथ होने वाली असमानता, हिंसा, उत्पीड़न, और शोषण को रोकने के लिए तथा उन्हें समान सामाजिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से की गई थी। प्रत्येक वर्ष इसकी थीम अलग होती है। इस बार है - "Making a difference for Men and Boys." 
चूँकि 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' कई वर्षों से चला आ रहा था अतः लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए इस दिवस की माँग उठी थी। अवसाद के मामलों में वृद्धि देखते हुए भारत में 2007 में पहला 'मानसिक स्वास्थ्य कानून' बना तथा इस दिवस को मनाना भी 2007 से ही प्रारम्भ हुआ।
यूनेस्को द्वारा सहयोग प्राप्त इस दिवस को मनाने के मूल में यह है कि घर, परिवार और समाज में उनके सकारात्मक सहयोग को सराहा जाए। उनके भावनात्मक पक्ष पर ध्यान दिया जाए तथा उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी एवं मानसिक परेशानियों पर भी चर्चा हो।


स्पष्ट है कि हम हर कार्य की अपेक्षा सरकार से नहीं कर सकते हैं और जब यह पारिवारिक स्तर पर प्रारम्भ हो तभी एक स्वस्थ, संतुलित और ऊर्जावान समाज की सोच सार्थक होगी।
हम अपना सहयोग निम्न प्रकार से दे सकते हैं -
* माँओं को चाहिए कि वे अपने बेटे को रोते हुए देख कभी ये न कहें कि "अरे! लड़का होकर रोता है!" रोने दीजिये उसे। ऐसे ही भावनाएँ निकलती हैं और दुःख बह जाता है। हमें उन्हें पाषाण एवं संवेदनहीन नहीं बनाना है कि वे किसी का दर्द समझ ही न सकें कभी।

*घर के कार्यों में भी पूरा सहयोग लें। जिससे बाद में बाहर जाएँ तो सब मैनेज कर सकें।

* उन्हें स्वस्थ रहने की सलाह दें, खलीनुमा बनने की नहीं। मजबूत दिखने के चक्कर में कई बार लड़के घातक दवाइयों एवं स्टीरॉइड के फेर में पड़  जाते हैं। ऐसे में जिम वाले इसका पूरा लाभ उठाने में नहीं चूकते!

* स्त्रियों को चाहिए कि वे पुरुष को अपनी हर समस्या का 'समाधान केंद्र' न समझें। कभी उनकी भी सुनें। परेशानियाँ उनके जीवन में भी उतनी ही हैं। आपकी समस्याओं और रोज के बुलेटिन में उलझ वे अपना ग़म बाँट ही नहीं पाते कभी! दर्द उन्हें भी होता है, डर उन्हें भी लगता है पर आपकी रोज की हाहाकार ने उन्हें सुपरमैन, बैटमैन और चाचा चौधरी बना डाला है।

* केवल स्त्रियाँ ही नहीं, पुरुष भी शारीरिक-मानसिक शोषण, घरेलू हिंसा, उत्पीड़न एवं भेदभाव के शिकार होते हैं। परन्तु हमारे समाज का ढांचा कुछ ऐसा है कि इनके दर्द भरे किस्से दबा दिए जाते हैं या फिर उनका उपहास उड़ाया जाता है। सुना होगा न, "अरे, कैसा मरद है रे तू? एक लड़की से थप्पड़ खा लिया!", "कहाँ गई तेरी मर्दानगी!" अरे भई! वो भी मनुष्य ही है कोई बुलेटप्रूफ़ जैकेट नहीं! उसके मस्तिष्क में अपने अनर्गल विचारों का कचरा मत डालिये। पुराने डायलॉग भूलकर समझ लीजिये कि 'मर्द को दर्द भी होता है' अतः उनकी पीड़ा को समझ उस पर प्रेम का मरहम रखिये। तानों का तम्बूरा न बजाइये।

*आत्महत्या और हत्या का अनुपात भी इन्हीं का सर्वाधिक है। आख़िर यह अवसाद कहाँ से उपजा है? इनकी कुंठाओं की जड़ों में जाना आवश्यक है और उससे पहले इन्हें समझना जरुरी है। देखिये कहीं आपकी भौतिक अभिलाषाओं का बोझ इन पर भारी तो नहीं पड़ रहा!

* आपके Vacation Plans  उन पर लादे नहीं! उनकी छुट्टियों से सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करें। इधर आप घूमने को लेकर झगड़ रहीं हैं और उधर वो बॉस से परेशान है। हाँ, यदि वे कामचोर हों और हर माह दस छुट्टियाँ लेकर घर बैठें तो उन्हें देश के विकास का पाठ अवश्य पढ़ाइये। :)


यूँ मैं स्त्रीवादी/पुरुषवादी सोच न रखकर मानववादी सोच की पक्षधर हूँ पर जब आप हमें दिल से शुभकामनाएँ देते हैं तो हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता है। इसलिए आप सभी को 'पुरुष दिवस' की अपार शुभकामनाएँ।
एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की ही उपस्थिति और सहयोग के बराबर मायने हैं। फ़िलहाल ऐसा समाज कल्पना भर है। 
- प्रीति 'अज्ञात'
#International_Men's_Day   #स्त्री_पुरुष #अंतरराष्ट्रीय_पुरुष_दिवस
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सोमवार, 11 नवंबर 2019

बुलबुल का ग़म और परेशान हम!



एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई कि ये चक्रवात वग़ैरह को identify करने के लिए जो नाम रखे जाते हैं, उसे तय कौन करता है? पंडित जी को बुलाकर नामकरण होता है या कि जो भी जी में आया बोल दिया!
मैं सुबह से बुलबुल चक्रवात का नाम सुनकर परेशान हूँ। मतलब बुलबुल ने आपका क्या बिगाड़ा है? अच्छे-ख़ासे, प्यारे पक्षी को आप कुछ भी कह दें तो कैसे चलेगा भई! जहाँ तक चक्रवात की बात है तो उसमें आसमान से पुष्प वर्षा तो होती नहीं है न! तो आप ऐसी बदमाश टाइप आपदा को सांभा कहें, गब्बर कहें, भूत, हौआ, ठांय-ठांय कहें। अठैन कहें, नासपीटा कहें, घनचक्कर कहें। अजी, कोई भी ख़राब-सा नाम चुन लें... पर प्लीज बुलबुल न कहें। किसी प्यारे पक्षी को बदनामी का मुकुट पहनाना बिल्कुल अच्छी बात नहीं है। बुलबुल का काम है गुनगुनाना। उसे हम सबकी बगिया में गुनगुनाते रहने दीजिये।

आज सुबह इसी बुलबुल को तार पर बैठे देखते ही मुझे चक्रवात याद आया। ये तो एकदम से बदतमीज़ी भरी एवं कोमल भावनाओं को बेमतलब आहत करने वाली बात हो गई है जी! आगे से ध्यान रखना मौसम विभाग जी के नामकरण वाले पंडिज्जी! सोचो, आँधी का नाम बज़रबट्टू  होता और बाढ़ का खीर, तो कैसा लगता!

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि cyclone के नाम नीलम, निशा, रश्मि, भोला भी रखे जा चुके हैं। हैलो, भोला का अर्थ पता तो है न आपको? cyclone भोला नहीं, बम का गोला होता है जी! अगर वो इतना ही भोला था तो इग्नोर मारते, देश से डिस्कस काहे किया!

आँधी/अंधड़ नाम सुनते ही आँखों के सामने उड़ते हुए टीनशेड, धड़ाम धुड़ुम की जोरदार आवाजें, इमारतों पर सहमे बैठे पक्षी और दौड़ दौड़कर सुबह की चमचमाती डस्टिंग को याद कर घर की सारी खिड़कियों को बंद करती, बड़बड़ाती स्त्री की तस्वीर तैर जाती है। आँधी हमारे सामने नुक़सान के साथ-साथ धूल से सने चेहरे, रूखे सूखे बाल और आंखों में किरकिरी से आँख मीड़ता मनुष्य भी छोड़ जाती है।तूफान (फिल्म नहीं) का तो मतलब ही है तबाही। इधर किसी ने नाम लिया और उधर तहस नहस की तस्वीर दिखने लगती है। बाढ़ शब्द भी बहते सामान, डूबते गाँव और नष्ट जीवन का खाका खींच देता हैं। सुनामी, विध्वंस का अट्टहास करता लगता है। ज्वालामुखी, हजारों डिग्री पर खदबदाते लावे की मुँह उगलती भयभीत कहानी कह देता है। ऐसे में शेक्सपीयर चचा की यह बात कि 'नाम में क्या रखा है!', अपन को ज़रा हज़म नहीं होती!

और हाँ! कृपया भूलियेगा मत Meteorological Department वाले सर जी/मैडम जी कि आज बुलबुल उदास है। ये वही बुलबुल है जिसके सामने उदास प्रेमियों ने टसुए भर-भर 'बुलबुल, मेरे बता क्या है मेरी ख़ता' गाना गाकर आरारारूआरारारू किया है। 
- © प्रीति 'अज्ञात'
  #MeteorologicalDepartment   @Indiametdept  #IndiaMetDept. #bulbul 

शनिवार, 2 नवंबर 2019

यात्रा

यात्राएँ, मनुष्य की मनुष्यता से मुलाक़ात हैं। ये मधुर आस्वादन है उन बातों का जो स्वतः ही कानों पर ठिठक जाती हैं। ये साक्ष्य हैं उन सुन्दर पलों की भी जो हैरत से ताक़ते, झाँकते मासूम बच्चों की शरारतें देख हँसी बन होठों पे लिपट जाते हैं।
यात्रा, आश्वासन भी है...सामान को सरकाते, बैठने की जगह बनाते, वृद्ध जोड़े का चार्जर लगाते उन युवाओं का कि इंसानियत जीवित है अभी!
यात्राएँ, मिलन है सभ्यता और संस्कृति का।
जहाँ एक ओर राजनीति केवल तोड़ने, बुराई करने और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ मात्र रह गई है; जो आपकी भारतीयता को उधेड़ बस हिन्दू-मुस्लिम धागे गिनाती आई है वहाँ ये यात्राएँ ही हैं जो आपको इन सबसे इतर केवल मनुष्य मान स्वागत करती हैं।
वर्तमान राजनीति ने इंसान से उसका ह्रदय छीन परस्पर द्वेष और घृणा करना ही सिखाया है। ये देशभक्ति नहीं सिखाती बल्कि देशवासियों को आपस में लड़ाने का कार्य करती है।
सार यह है कि राजनीति मनुष्य को तोड़ने का काम करती है और यात्रा जोड़ने का।
- प्रीति 'अज्ञात'