शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

ऐसे भी कोई जाता है क्या!

दस वर्ष से भी अधिक समय हुआ जब मैं उनसे पहली बार मिली थी। मिलना भी क्या, इसे टकराना ही कहना उचित होगा। ठीक पौने ग्यारह बजे मैं अपने घर से जिम को निकलती और रास्ते में हम एक-दूसरे को देखते। धीरे-धीरे मुस्कान का आदान-प्रदान भी होने लगा और फिर कभी जब वो चेहरा न दिखता तो चिंता होने लगती थी। एक अपनापन-सा हो गया था। एक बार ऐसा भी हुआ कि मैं अन्य प्राथमिकताओं के चलते दो दिन जा न सकी थी। फिर जब गई तो अचानक ही एक आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। "अरे, रुकिए न!" मैं अचकचाकर रुक गई। कुछ कहती, इससे पहले ही उन्होंने कहा "आप कितना प्यारा हँसती हो... और ये बाल कहाँ सेट करवाये? आप पर बहुत सूट करते हैं।" इस बात से भी ज्यादा उनके आँखें मचमचाकर कहने के अंदाज़ ने मेरा मन मोह लिया था और फिर बातों-बातों में ही पता चला कि हम दोनों एक ही जगह जाते हैं बस timings अलग हैं। धीरे-धीरे हम दोस्त भी बन गए। 

वो अपने सिर को स्कार्फ़ से ढका करतीं थीं। बाद में पता चला कि उनको breast cancer हुआ था। ट्रीटमेंट भी पूरा हो चुका था। पर फिर brain और शरीर के अन्य हिस्सों पर भी इसका असर होने लगा और बीते सत्रह वर्ष उन्होंने इसी बीमारी के साथ गुजारे। मुझसे बहुत सारी बातें शेयर करतीं थीं और बच्चों-सी छोटी-छोटी ख़्वाहिशें भी। जैसे कभी उन्हें फ़ूड कोर्ट में जाकर पिज़्ज़ा खाना होता था तो एक बार गांधी घड़ी लेने की धुन सवार हुई थी। और फिर हम दोनों साथ जाकर इच्छा पूरी करने के बाद ही चैन से बैठते। यहाँ ये जरूर बताना चाहूँगी कि उस गाँधी घड़ी का शौक़ मुझे भी था और उनके बहाने से मैं भी ले आई थी।

कई बार मेरे कॉल न करने या घर न जाने पर वो नाराज़ होती भीं तो ख़ुद ही कह देतीं कि देख, तू खिलखिलाकर हँसना मत, वरना मैं तुझे गाली नहीं दे पाऊँगी। जाहिर है, मैं हँस देती थी।हम दोनों ही जानते थे कि ये दिल का रिश्ता है जो बंधनों का मोहताज़ नहीं! अज़ीब-सा रिश्ता था ये, कि उन्हें मुझ पर गर्व होता था और मैं उनसे प्रेरणा लिया करती थी। उन्हें अपने कम पढ़े-लिखे होने का बहुत मलाल रहता था लेकिन उनसे बेहतर, सभ्य और ज़िंदगी को सकारात्मक तरीके से जीने वाला इंसान मैंनें आज तक नहीं देखा! हर काम स्वयं करतीं थी और वो भी बिना शिकायत। 

मैं जितना सरप्राइज़ से चिढ़ती हूँ, उन्हें उतना ही मज़ा आता था। ठीक से याद नहीं पर शायद सितंबर 2016 में कभी मैं अपनी फ्रेंड नीता के साथ (जो कि अमेरिका से आई हुई थी) उनके घर दोपहर अचानक ही पहुँच गई थी। मैडम जी चटखारे लेकर दालबडे (जिसे मैं मंगौड़े कहती हूँ) खा रहीं थीं, वो भी हरी मिर्च के साथ। उनकी कोई दोस्त लेकर आई थी। फिर हमने साथ में चाय बनाई। यादगार पल थे। सरप्राइज़ पाकर वो भी खिल उठीं थीं। 

उसके कुछ दिन बाद वो मेरे घर आईं। बेहद कमजोर हो गईं थीं। 
"देख लेना, एक दिन मेरी अर्थी तेरे घर के सामने से ही जायेगी और तुझे पता भी नहीं चलेगा।" स्नेह भरे उलाहने के साथ मेरे कंधे पर थपकी मारते हुए उन्होंने कहा था। 
"ऐसा करना, सुबह पौने सात पर निकलना। उस समय मैं बेटी को बाय करने बाहर वाले गेट पर ही होती हूँ।" उन्हें हँसाने के उद्देश्य से मैंनें मज़ाकिया लहजे में कहा। 
"ओये, मुझे कैसे पता चलेगा कि कब ले जाएँगे। चल, मैं अपने हसबैंड को बोल दूँगी कि जब बेसना की सूचना पेपर में दें, तो मेरे बड़े वाले फोटो के साथ दें।" इस बार उनके भाव में थोड़ी संज़ीदगी थी। 
मेरी आँखें भी भर आईं थीं। उनके गले लिपटते हुए बोली, "कुछ नहीं होगा आपको। अभी तो अगली बार मेरे साथ marathon में जाना है।"
इस बात से उनके चेहरे पर शैतानी भरी, प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी क्योंकि वो जानती थीं मैं रेस तो हमेशा पूरी करती हूँ पर अस्थमा के कारण अधिक दौड़ नहीं सकती।  खिलखिलाते हुए बोलीं, "फिर तो मेरी जीत तय है।"
"हाँ, आपकी जीत तो हमेशा से तय है....कुमुद बेन। आपसे ही तो मैं प्रेरणा लेती हूँ।" ये कहते हुए उनका हाथ थाम मैं उन्हें ड्राइंग रूम तक ले आई थी।

अब जो ख़बर मिली तो यक़ीन ही न हुआ। पता नहीं कैसे इस बार आप हार गईं! जबकि ये जीत तो बेहद जरुरी थी। आपकी वो बात भी सच हो गई, मुझे आपके जाने की ख़बर महीनों बाद ही मिली....!
आपसे इंटरव्यू का वादा था मेरा, दो बार कॉल भी किया। बात न हो सकी तो लगा व्यस्त होंगी। कहाँ पता था कि आप तो....!

इंटरव्यू तो न हो सका, पर आपकी बातें साझा की हैं मैंनें कि लोग मर-मर कर न जीएँ और आपसे प्रेरणा लें कि हर परिस्थिति में जीवन को मुस्कुराते हुए कैसे जिया जाता है। मुझे गर्व है कि मैं आपको जानती थी और आपसे कई-कई बार मिली थी।
आप सुन पा रही हो न? Really missing u yaar!
ऐसे भी कोई जाता है क्या! :(
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

हैप्पी वाला दिन

आज सुबह जब योगा क्लास जा रही थी तो मौसम बेहद ख़ुशगवार था। हल्की-हल्की ठंडी हवा पर तो मैं पहले से ही निहाल हुई जा रही थी उस पर रास्ते में मिलते हुए बच्चों की मुस्कानों ने दिन के ख़ूबसूरत होने की सूचना ख़ुद ही दे दी थी। उन सबके चेहरों पर अलग ही ख़ुशी थी। यूँ लग रहा था जैसे 10-12 किलो के स्कूल बैग के न होने से वे बेहद हल्का महसूस कर रहे हों। वैसे जिस दिन स्कूल में पढ़ाई की छुट्टी हो पर स्कूल जाना हो, तो और भी अच्छा लगता ही है। हम सबने भी इन दिनों का ख़ूब लुत्फ़ उठाया है। बच्चों की असल फ्रीडम यही तो है।

किसी की कार में जोरों से बजता गीत भी सुकून दे रहा था। 
"इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के....ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के" 
पर  मैं सोच रही थी कि बच्चों का ह्रदय तो हमेशा से कितना निर्मल रहा है। वो बिना लाग-लपेट के सदैव सच ही बोलते आये हैं। कभी उनकी राय ली जाए और कुछ पसंद न आए उन्हें तो तुरंत प्यारी, टुक्कू-सी नाक सिकोड़कर जोर से बोलेंगे ..."छी, कित्ता गन्दा है ये!" और पसंद की वस्तु हो तो, खिलखिलाते हुए "भौत बढ़िया!" :D

ऐसे वाले बच्चे राजनीति में जाते ही कितने हैं? या बड़े होकर जीवन से मिले अनुभव उन्हें मुखौटे पहनने को मजबूर कर देते हैं? प्रत्येक इंसान, हर परिस्थिति में कितना अलग-अलग व्यवहार करने लगता है। एक ही विषय पर दो अलग लोगों से बात करने का हमारा तरीका भी कितना भिन्न हो जाता है क्योंकि हम इंसान को देखकर, नाप-तौल कर ही कुछ कहते हैं। बच्चे कितने बिंदास! इन चक्करों (समझदारी) में पड़ते ही नहीं! तभी तो उनका साथ एक नई उमंग से भर देता है और हर बार ही कुछ नया सिखा जाते हैं ये छुटंकी लोग! :D

ख़ैर, विषय से भटकना मेरी आदत हो गई है। बात ये कहनी थी कि आज वर्षों बाद स्कूल जैसा फ़ील आया। योगा क्लास में पहुँचते ही अलग तरह की साज-सज्जा देख जी खुश हो गया। फिर उस पर राष्ट्रगान ने हर बार की तरह अपने देश के लिए गर्व से भर दिया। इसकी धुन और शब्दों में न जाने कैसा जादू है कि जितनी बार भी गाएं-सुनें...असर बढ़ता जाता है। ये अहसास प्रेम ही तो है। है, न! :)

राष्ट्रगान के साथ ही तिरंगे के रंग में रंगा नाश्ता और गपशप ने उस कसक को भी दूर कर दिया जो सुबह घर से निकलते समय दिल के किसी कोने में बस पल भर को ही खलबलाई थी। 
जय हिन्द! जय भारत!
गणतंत्र दिवस की अशेष शुभकामनाएं!
- प्रीति 'अज्ञात'
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एक तस्वीर नाश्ते की :)


 

सोमवार, 9 जनवरी 2017

AHMEDABAD FLOWER SHOW, 3-13 Jan. 2017

अहमदाबाद फ्लॉवर शो हमेशा से ही ख़ास रहा है। मेरे लिए इस बार इसका महत्त्व और भी बढ़ गया क्योंकि इसमें हमारे बोन्साई क्लब का स्टॉल भी लगा है। जहाँ विज़िटर्स को बोन्साई सीखने की प्रेरणा मिलती है क्योंकि हम प्लांट्स बेच नहीं रहे।

3 से 13 जनवरी तक चलने वाले इस मेले में आने के बाद समय का पता ही नहीं चलता। यहाँ लगभग 750 प्रजातियों के तीन लाख से भी अधिक पौधे हैं। फूलों और पौधों के प्रयोग से सुन्दर sculptures तैयार किये गए हैं। एक sculpture में लोहे के स्टूल का प्रयोग भी शानदार है। 20-22 nurseries भी हैं जहाँ जाने के लिए मन लालायित हो उठता है। फिर बाद में पौधों का बैग उठाने में जान जरूर निकलती है। बगीचे में काम आने वाले टूल्स और खाद वगैरह भी हैं यहाँ।

हैंडीक्राफ्ट, खादी, हर्बल प्रोडक्ट्स और जाने कितने स्टॉल्स हैं...जो हमने भी नहीं देखे अभी। बुक स्टॉल भी है।
कहते हैं, रात को ये और भी सुंदर दिखता है। लाइटिंग वाला वीडियो देखा तो यक़ीन हुआ कि लोग ठीक ही कहते हैं।

बाक़ी सारी सुविधाएँ तो हैं ही, जिनके लिए ये शहर कभी शिक़ायत नहीं करता। फूल-पत्ती प्यारे हों और साथ कैमरा भी हो तो हरियाली ज़िंदाबाद, दिल ज़िंदाबाद, शहर ज़िंदाबाद! और हाँ, कान खोलकर सुन लो; मेरा देश तो हमेशा से ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है और ज़िंदाबाद रहेगा। ये लास्ट वाली लाइन फ़िल्मी कीड़े की देन है पर सॉलिड है न!
- प्रीति 'अज्ञात'
Photos clicked by Preeti Agyaat













मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

ईश्वर आज भी हड़ताल पर था!

उनके घर पर हुई यह पहली मुलाक़ात थी पर इतना परिचय तो रहा है कि एक संस्था की मीटिंग्स में परस्पर अभिवादन होता था। उनके शब्द हमेशा भीगे हुए से लगते पर वो अपनी बात कह शांत हो जाते। मैं और जानना चाहती थी पर कभी हिम्मत ही न हुई। उम्र का लिहाज़ और फिर किसी की ज़िंदगी में झांकना उचित भी नहीं लगता।

संयोग कुछ ऐसा कि उन्होंने मेरी एक मित्र के साथ मुझे भी चाय पर आमंत्रित किया। वैसे इस समय, मेरे जाने का मूल उद्देश्य उनके बगीचे को देखना था। जाते ही उन्होंने बाहर आकर स्वागत किया। आलीशान घर.... कुछ ऐसा जो हम फिल्मों में देखते हैं। बगीचा.....इतना सुंदर कि वहाँ से उठने का मन ही न करे और वो इंसान भी इतने नेकदिल कि आपके हाथ ख़ुद उनके लिए दुआ को उठने लगें। वो न बहुत बड़े लेखक हैं, न कोई सेलिब्रिटी.....किसी मल्टीनेशनल कंपनी में बड़ी पोस्ट से चार वर्ष पूर्व ही रिटायर हुए हैं। मैं उनका परिचय नहीं देना चाहती, इसलिए इससे ज्यादा जानकारी भी नहीं दूंगी।

पंद्रह वर्ष पूर्व अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी को खो चुके हैं। घर वालों की ज़िद के बाद भी पुनर्विवाह नहीं किया। जरूरतमंद लोगों की हर संभव मदद करते हैं। सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं, स्वयं जाकर भी ढेरों काम करते हैं। हम जब पहुंचे तब, घर पर सिर्फ हेल्पर था और हर तरफ सन्नाटा पसरा पड़ा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनका एक पुत्र है जो अच्छे जॉब में है। उसे भी कैंसर हुआ और आखिरी स्टेज में है। प्रेम-विवाह किया है उसने। बहू इस दुःख से अवसाद में डूबती जा रही थी तो अब वो भी व्यस्त रहने के लिए नौकरी करने लगी है। चार वर्ष का एक पोता है। उसके बारे में बात करते हुए उनकी आँखों में नमी थी और चमक भी। हम बातें कर ही रहे थे कि वो तीनों भी बाहर से आ गए। वही मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ। थोड़ी देर बाद हमने उन सबसे विदा ली।

अँधेरा धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रहा था और उस विशाल गेट के दोनों ओर लगे लैम्पों में से झांकती सफ़ेद रौशनी सामने का लंबा रास्ता दिखा रही थी। शाम को खूबसूरत दिखते बड़े-बड़े वृक्ष अब भयावह लगने लगे थे। मन भारी था, शब्द मौन। क़ाश, कोई टूटता तारा इसी वक़्त मेरी झोली में आ गिरे!
कैसे गिरता!
ईश्वर आज भी हड़ताल पर था!
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इतना सब लिखने का मेरा क्या उद्देश्य है, ये तो मैं भी अभी नहीं समझ सकी हूँ। 
बस, एक बात कहना चाहती हूँ....अमीरों के लिए जो एक तरह का भ्रम या सोच हमारे समाज में बनी है। उससे थोड़ा ऊपर उठना चाहिए। अमीर और गरीब के बीच कोई गहरी खाई नहीं, ये सदा बुरे और अच्छे इंसान के बीच ही रही है। हर पैसे वाला अय्याश नहीं होता, बेईमान भी नहीं। न उसके बच्चे नशे में धुत होकर महँगी गाड़ियाँ चला फुटपाथ के लोगों को कुचलते हैं और न ही उनकी बीवियाँ किटी पार्टी और फैशन परेड में व्यस्त रहती हैं। वो सुखी ही हो, ये भी तय नहीं! एक बार अपनी मानसिकता से ऊपर उठकर इन घरों में भी झांकना बेहद आवश्यक है क्योंकि ये सामान्य लोगों जैसे ही हैं और आज जहाँ हैं अपनी मेहनत और लगन के दम पर पहुंचे हैं। इस बीच उन्होंने इतना कुछ खोया है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती! दुर्भाग्य ही तो है कि सब पैसा देखते हैं, संघर्ष की कहानी कोई नहीं सुनना चाहता!
- प्रीति 'अज्ञात'
(अगस्त'2016 की एक उदास शाम की असल कहानी)

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

मिट्टी के रंग



एक समय था, जब दिए सुनते ही मिट्टी की कटोरी से निकलती रौशनी बिखेरती बाती की तस्वीर आँखों में चमक भर देती थी। दीवाली से दिए का और कुम्हार से माटी का ये रिश्ता भी कितना अद्भुत है। पहले सड़क किनारे लगी दीवारविहीन दुकानों में घड़े, सुराही, चिड़ियों के पानी का सकोरा, कुल्हड़ बस गिनी-चुनी वस्तुएँ ही दिखाई देतीं थीं। भीषण गर्मी और दीपावली के समय पर इनका व्यवसाय चला करता था या यूँ कहिये कि उस समय की कमाई से ही पूरा वर्ष गुजारना होता था। 
लेकिन अब समय बदल चुका है। न जाने कितने आईडियाज़ यहाँ साकार होते हैं। मिट्टी अब रंगीन होकर हर सांचे में ढलने लगी है। घर हो या बगिया, सबकी सजावट के सामान यहाँ मिल जाएँगे। मैं गई तो थी डिजाईन और वर्क का आईडिया लेने.....पर न जाने क्या-क्या बटोर लाई और उस पर उन काका का आशीर्वाद, दीवाली के एडवांस बोनस की तरह मुझे ख़ुद ही नसीब हो गया। 

कालू भाई प्रजापति जी (काका) 40 वर्षों से यही कर रहे हैं, उनके पिता भी यही काम करते थे और अब काका के तीनों बेटों ने यह विरासत संभाल ली है। बारहवीं तक पढ़ चुका उनका पोता आकाश भी हँसता हुआ दिन भर साथ लगा रहता है। मिट्टी से बनी वस्तुएँ, तो नुक़सान होना भी तय है। मेरे इसी सवाल पर काका ने बड़ी सहजता से बताया कि पहले बहुत परेशानी थी पर अब हम एडवांस ले लेते हैं। महंगाई बढ़ रही और बनाने में भी बहुत खर्च होता है। मकान भी बनाना है उन्हें।
मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि उनके ग्राहक ट्रक भर सामान ले जाते हैं। कुछ इनकी पूरी टीम बनाती है और कुछ कच्चा माल  दिल्ली, गोरखपुर, कलकत्ता से आता है। जिसका रंगरोगन यहाँ होता है। कुल मिलाकर हमारे आपके घरों की रोशनी की पहली किरण यहीं से निकलती है। 

तमाम परेशानियों, स्वप्नों और अथक परिश्रम के बीच झलकती इनके चेहरे की तसल्ली ज़िंदगी की ख़ूबसूरती की आश्वस्ति देती प्रतीत होती है। अब और भला इस दुनिया में रक्खा ही क्या है। थोड़े सपने, थोड़ी उम्मीदें और फिर कुछ ईमानदार कोशिशें.....हो जायेगी सबकी दुनिया ज़िंदाबाद! 
-प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

एक क्लिक और खेल ख़त्म



जबसे महसूस करना शुरू किया, तभी से लेखनी साथी बनी हुई है। अच्छे-बुरे, सुंदर-बदसूरत, यादगार, यहां तक कि आत्मा की गहराईयों तक चीरकर रख देने वाले हर पल को भी लिखकर संजो लेने की ये अजीब-सी आदत कब पड़ गई; मैं भी नहीं जानती। जिगरी दोस्त की तरह कैमरा भी हर जगह साथ चलता रहा। घर-परिवार, स्कूल, मित्र, बच्चों के जन्म से लेकर उनका पहला क़दम, पहला जन्मदिन, स्कूल का पहला दिन, ईनाम, नटखट शरारतें, त्यौहारों की मस्ती, अलग-अलग स्थानों की यात्रा, पशु, पक्षी, नदी, समुद्र, रेत, प्रकृति की गोद में समाये अनगिनत खूबसूरत सजीव-निर्जीव लम्हों को हर क्लिक के साथ मन की और काग़जी एलबम पर तीन दशकों से चस्पा करती रही हूँ।
   
कम्प्यूटर क्रांति के उद्भव के साथ मेरी सोच में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया था और मैं अपने इस देसीपन से कभी लज्जित भी नहीं होती थी। बल्कि हरेक को टोकती, कि डिजिटल न बनो, इसमें वो फील नहीं आता। बहुत चिढ़ होती थी, जब कहीं लिखकर रखने के बजाय सबको उसे मोबाइल या कम्प्यूटर में 'सेव' करते देखती। तुरंत गुस्से में बोलती, "आलसीपन की हद है, लाओ मैं ही लिखे देती हूँ। मोबाइल खो गया तो!" हर तरफ मशीनी दुनिया में डूबते इंसानों को देखना अब अवसाद के करीब पहुंचने लगा था। न चिट्ठियों के उत्तर मिलते, न फोन पर पहले-सी लम्बी बातें होतीं। डिजिटल दुःख, डिजिटल हँसी, पसंद-नापसंद एक अंगूठे की मोहताज़, चार किताबों को पढ़ नया सीखने की जगह अब गूगल सब खोजने लगा था। संवेदनाओं का जैसे मशीनीकरण हो गया हो।
आश्चर्य इस बात का भी हुआ करता कि हर सुख-सुविधा के बीच रहते हुए समय का रोना अब और भी अधिक क्यों बढ़ता जा रहा है। लेकिन इन्हीं सबसे खीजते हुए मेरा स्वयं कब इस दुनिया में प्रवेश हो गया, पता ही न चला। शुरू-शुरू में यहाँ रहते हुए भी मैंनें पुरानी आदतें छोड़ीं न थीं। यही कहती,"जब इंसानियत से भरोसा उठ चुका तो इस मुई मशीन पे भरोसा काहे करूं?" पर कहते हैं न परिस्थितियों के आगे सिर झुकाना ही पड़ता है। मैंनें भी जल्दी ही झुका दिया था। यही व्यस्तता और समय न मिलने की जानी-पहचानी दुहाई देकर। 

धीरे-धीरे वही सब बातें जिनके लिए दूसरों को टोका करती थी, मैं भी करने लगी। सारे फोटोज कम्प्यूटर में अलग-अलग फोल्डर बना डाल दिए, पिछले दस वर्षों में कोई भी फोटो डेवेलप नहीं करवाया, सिवाय बच्चों के स्कूल में भेजे जाने वाले फैमिली फोटो के, क्योंकि ये तो मजबूरी था। फोटो को ट्रांसफर करते ही , कैमरा से डिलीट करना भी सीख गई, कि स्पेस बना रहे। एक अधूरा उपन्यास, कुछ कहानियाँ और सैकड़ों कविताओं की फाइल बनाकर सारे ड्राफ्ट भी ट्रैश में डाल सदा के लिए विलुप्त कर दिए। व्यवस्थित रहने और सफाई की ये बुरी आदत भी बचपन से ही है।

तमाम जिम्मेदारी, दुनियादारी, सुख-दुःख की छाँव तले कम-से-कम ये सब सुरक्षित बने थे और अब कुछ क़दम आगे बढ़ना था कि परसों ही सब उम्मीदों पर एक ही झटके में पानी फिर गया। दवाई का डिब्बा और पानी का गिलास बस अभी मेज पर रखा ही था, कि न जाने कैसे हाथ लगा और पूरा एक गिलास पानी, प्यासे की-बोर्ड ने एक ही झटके में गटक डाला। तुरंत ऑफ किया, न्यूज़पेपर से सुखाया, धूप में रखा, ड्रायर भी चलाया। बैटरी और हार्ड डिस्क को निकाल चावल में डाला...लेकिन हर एक कोशिश व्यर्थ ही गई। एक टूटते रिश्ते की तरह बेवफ़ा कम्प्यूटर ने मुझसे सदा के लिए अलविदा कह दिया।

हालत यह है कि आज मेरे पास मेरे ही बच्चों की पिछले सात-आठ वर्षों से खींची गई दो-तीन हजार तस्वीरों में से कोई तस्वीर नहीं, उनके स्पोर्ट्स डे, तमाम कार्यक्रमों, ऑडिओ, वीडियो के नाम पर शून्य हूँ अब। प्रकृति से जुड़े तीन सौ से भी अधिक बेहतरीन चित्रों का अलबम, तमाम यात्राएँ, वर्षों का लेखन सब कुछ खत्म हो चुका है। कितनी स्मृतियाँ, इन सबसे जुड़ी थीं। कुछ अफसोस भी थे, जो सामने आकर टीस दिया करते थे, लेकिन अपनों से मिला दर्द भी अपना ही होता है। उसे फेंका नहीं जा सकता। अरमान और सपनों को मारो गोली,तो भी कितना कुछ था इस कम्प्यूटर में, जो अपना था। लेखन भी जब तक जीवित हूँ, घर की खेती जैसा है पर उन तस्वीरों को कहाँ से लाऊँ, जिनकी उम्र निकल चुकी। सब कुछ जानते, समझते हुए भी मैंनें इन्हें कहीं और क्यूँ नहीं सहेजा; इस बात का दुःख किसी नजदीकी की मृत्यु जैसा है जो अब जीवन भर मुझे सालता रहेगा। 

लेकिन अफसोस से भी क्या होगा, क्या कर सकेंगे? उसी दिनचर्या के बीचोंबीच यकायक बुक्का फाड़ के एकाध हफ्ते रोना-धोना चलेगा, कुछ महीने तक उदासियाँ भीतर धंसी रह जायेंगीं, सालों इसका मातम मनाया जाएगा। जो कहते हैं 'जब ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़के देता है।' वो ये नहीं जानते कि ये छीनता भी इसी अंदाज़ से है। कम-से-कम मेरा पिछले तीन वर्षों का अनुभव तो यही कहता है।
हाँ, पर इतना जरूर है कि अब जब कैमरा कुछ क्लिक करेगा, तो उसका प्रिंट जरूर निकलेगा। कलम अब डायरी के पन्नों को इस स्क्रीन से पहले चूमेगी। उसके बाद ही इस धोखेबाज़ कम्प्यूटर को कोई दस्तक़ दी जाएगी, यूँ मतलबी लोगों की तरह, प्राथमिकता की पायदान से तो ये कबका उतर चुका है।

मैं अपनी पुरानी देसी दुनिया में ज्यादा खुश थी। यहाँ सब आभासी है। इश्क़ के डिजिटल अफ़सानों की तरह, एक क्लिक और खेल ख़त्म!   
- प्रीति 'अज्ञात'

*वैसे मैं आसानी से उम्मीद छोड़ती नहीं, हो सकता है कि जो खोया वो अब कभी न मिले, पर मिलने की सम्भावना भी उतनी ही शेष है। इस घटना को आप सबसे साझा करने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि ऐसा आपके साथ कभी न हो। इससे सीख लें, अपना ध्यान रखें और तक़नीकी दुनिया को जरूरत से ज्यादा भाव न दें। और हाँ, बैकअप जरूर रखें क्योंकि इस ग़लतफ़हमी से बाहर निकलना बहुत आवश्यक है कि जो अब तक न हुआ वो कभी न होगा। 
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गुरुवार, 30 जून 2016

'इमेजवा की फिक़र में'

"आसमान ने बदली करवटें जब से 
गिरती रही वादों पर बिजलियाँ
झुलसी उम्मीदों के पत्तों से झूलती डाली
बदहवास हैं ख़्वाबों की तितलियाँ"

उई माँ। कह दो ये झूठ है! या ख़ुदा, मुसीबतें पहले से यूं भी कम न थीं; अब ये क़हर क्यूँ ढा दिया। जुक्कु बाबू, बोलो ये तुमने क्या कर डाला? क्यूँ सबके मुखौटे नौचने पर तुले हो, यार! 
इतना बड़ा तहलका तो परमाणु बम भी न कर पाता, जो तुमने कर दिखाया! बाबा, रे बाबा! देखो तो जरा, कैसी बदहवासी छाई है। लोग हैरान-परेशान, बदहवास से इधर-उधर एक दूसरे की पोस्ट पर दौड़े जा रहे। की -बोर्ड पर कंपकंपाती उंगलियाँ हौले-से कहीं पूछ रही हैं "कहीं, ये सच तो नहीं" और उधर से मिलता हुआ ये असंतोषजनक जवाब कि 'क्या पता, मैनें तो सबको करते देखा तो पोस्ट कर दिया" उनकी पीड़ा को गहन चिकित्सा कक्ष के मुख्य द्वार तक जाकर छोड़ आता है।

भारत-पाकिस्तान के पिछले मैच के बाद आज हम फिर एक हैं। धर्म, जाति, क़द, ओहदा और तमाम वाहियात दीवारों को फांदकर 'मिशन पोस्टिंग' जारी है। जनाब, मोहतरमा पसीने से लथपथ हैं, हृदय की धड़कनें दुरंतो की गति पकड़ चुकी हैं। हर तरफ एक ही धुन, "जाने क्या होगा रामा रे! जाने क्या होगा, मौला रे!" दनादन बजे जा रही है। 

फेकबुक, तुमने अपनी बुक का कवर ही फाड़ दिया। कन्फेशन बॉक्स में जाए बिना सबको अपनी हर एक गलती का कैसा जबर अहसास दिला दिया रे! पर ये लिखवाने की क्या जरूरत थी कि "आखिरकार एक कापी पेस्ट से कौन सा खर्च होने वाला है?"
अरे, आज आपका ही दिन है। एन्जॉय करो, चिल्ल मारो! कितना भी मांग लो....सब देने को तैयार हैं। नाक का सवाल है, भई! इनबॉक्स की बातें बाहर आ गईं तो क़सम से हम 'नकटिस्तान' निवासी हो जाएँगे। तुमको क्या पता, उदास खिचडियों की तह में कितना मलाई पनीर दबा है।

वो अंकल जो पोस्ट पर संस्कार और मर्यादा की बात करते हैं, न जाने कितनों को अश्लील वीडियोऔर तस्वीर भेज ब्लॉक किए जा चुके हैं। तुमको उनकी महानता के आखिरी लम्हों की क़सम, ये जुलुम न करना!
जरा सोचो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की झलक देने वाले, सूरज बड़जात्या के हीरो-हीरोइन टाइप सुभाषित, सुशोभित, सुसज्जित, माननीय, आदरणीय चरित्रों का क्या होगा जब परिवारजन के सामने उनका तात्कालिक चरित्रहरण एपिसोड चलेगा। नहीं, नहीं, नहीं! उनको यूं अंधकार में धकेल उनके हिस्से की रोशनी लूटने का तुम्हें कोई हक़ नहीं। हाय, रब्बा अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ। 
उन शादीशुदा हीर-रांझाओं, लैला-मजनुओं का मनन करो, जिन्हें तुमने उम्र भर की आशिक़ी का इतना खूबसूरत स्पेस दिया हुआ है। क्या तुमसे उनकी खुशी देखी नहीं जाती? जलभुन्नू, जलकुकड़े कहीं के! 
आखिर तुम उन एक्सट्रा स्मार्टियों की पोल के बहीखाते दीवाली के पहले ही क्यों खोल रहे, जो एक भद्दा जोक और तीर एक साथ कई जगह ब्रह्मास्त्र की तरह फेंक रहे। उनकी मारक क्षमता का भेद न खोलो भाई! तुम्हें विभीषण चच्चा दी सौं। 
बताओ न, उनका क्या होगा, जो कहते कि हम ऑनलाइन आते ही नहीं कभी और तुम उनके तमाम प्रेम-संदेश सार्वजनिक कर उनके स्वाभिमान की धज्जियाँ, देश की गरीबी की तरह इधर-उधर बिखेर दोगे! इतना दर्द, इतनी आहें उफ्फ! कैसे बर्दाश्त कर सकोगे तुम?

बच्चे, बूढ़े और जवान ('पहने यंग इंडिया बनियान' याद आया न), पर सबकी आफ़त में है जान। 
आज गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, स्त्री-विमर्श गए एक साथ तेल लेने। सब जगह एक अंजान साया रामू जी के भूत की तरह मंडरा रहा है। दुआओं के लिए अरबों हाथ उठे, दोस्त हेलो करने से घबरा रहे, ख्यालों में ये कैसी उमस है, मुई बारिश है कि पसीना सब रूमाल से सटासट पोंछे जा रहे। खाना गले के नीचे उतरता ही नहीं। सांस हलक में पैर पटक-पटक खिंच रही। हर जगह एक ही बात, तुम्हारा ही चर्चा। अब बच्चे की जान न लो पगले! हमसे दुनिया का यह दुःख और नहीं देखा जा रहा, जी भर आया, पछाड़ें खा-खाकर इतना गिरें हैं जितना सेंसेक्स भी आज तक न गिरा होगा। 
"तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही.... लुट गएएए  हाँ लुट गएए, हम चेहरों की पुस्तक्क में"
बस, बहुत हुआ इमोशनल अत्याचार। अब कह भी दो न "ये झूठ था, बौड़म"
पर समाज को एक पल में संस्कारी बनाने का दोबारा जब भी दिल करे, तो आते रहना! बड़ा अच्छा लगता है जी!
तुम हो, तो सब है
तुझमें ही रब है  
पर ये दुनिया ग़ज़ब है!
- प्रीति 'अज्ञात'