सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

इतिहास हमेशा ख़ुद को दोहराता है

बाल्यकाल से ही हम गाने सुनने के बहुत शौक़ीन रहे हैं. इतना मन लगाकर सुनते थे कि गीतों के बोल भी एकदम सही याद रहते थे. गायिका तो सपने में भी नहीं हैं पर कोई गलत बोल या उच्चारण के साथ गा रहा हो तो हम भीतर तक ज़बरदस्त आहत हो जाते हैं. पर फ़तवे के कारण चुप्प रहना पड़ता है जी! हमको क्या....गाओ गलत! श्राप लगेगा तुमको क्योंकि तुम्हारी आने वाली पीढ़ियाँ भी यही दोहरायेंगीं. बस और क्या!

हम तो सुरैया, तलत महमूद, शमशाद बेग़म, गीता दत्त, मुकेश, रफ़ी, किशोर, सोनू निगम तक चलकर अरिजीत पर ठिठके और अब फ़िलहाल पुरानी तरफ़ ही लौट रहे हैं. वैसे मूड के हिसाब से दलेर मेहंदी और मीका को सुनने में भी ख़ूब मज़ा आता है. पर एक बात full & final है कि अगर जगजीत सिंह नहीं होते तो फिर हमारा इस पावन धरा पर अवतरण और इन कर्णों की उपस्थिति व्यर्थ ही थी. यद्यपि चश्मा इन पर ही टिका है.

अपना अंग्रेज़ी गानों के साथ ठीक वही नाता है जो इस देश में सरकार और न्याय-व्यवस्था का रहा है। भैया, कोशिश तो बहुत करते हैं पर हो नहीं पाता!
ये गाने जरा कम समझ आते हैं, सो जिसे महसूस ही न कर सको तो सुनने का क्या फ़ायदा! पूरे समय दिमाग़ गूगल की तरह घटिया ट्रांसलेट करके देता है. सच, गूगल जी, बुरा मत मानियो पर आपके अजीबोग़रीब अनुवाद हमें अत्यधिक दुःख देते हैं. भय है, कहीं इस वज़ह से हम तीव्र मस्तिष्क विस्फ़ोट के शिकार न हो जाएँ! इसलिए ऐसा करो, हमको तत्काल जॉब पे रख लो. 
हाँ, Titanic का Theme song (My Heart Will Go On) बेहद पसंद है और मुझे लगता है कि ये आंग्ल भाषा का अब तक का सबसे प्यारा रोमांटिक गीत है. यहाँ यह बात बताना भी आवश्यक है कि यही वह इकलौता अंग्रेज़ी गीत है जिसके बोल हमें पहली बार में ही समझ आ गए थे. लगता है इसकी रचना हिन्दी माध्यम में पढ़े लोगों को ध्यान में रखकर की गई होगी. बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें ख़ुश करने के चक्कर में Lion King का Hakuna Matata, Aqua का Barbie Girl और Shakira का Waka Waka (This Time for Africa) इतना सुना कि फिर बाद में beats के साथ अपने-आप ही मुंडी हिलने लगती थी. अच्छा हुआ, जुरासिक पार्क में कोई गीत नहीं था, वरना उस पर झूमती खोपड़ी कुछ यूँ लगती जैसे कि अपने प्राणप्रिय देश में आत्मा/ देवी माँ के प्रवेश करने पर भयावह रंगारंग नृत्य एवं संगीत कार्यक्रम हुआ करते हैं. मुझे डरपोक बनाने में इन भुतहा ध्वनियों का सम्पूर्ण एवं अभूतपूर्व योगदान रहा है. वो कहानियाँ फिर कभी..... 

अब ये बताओ कि बचपन में समाचार इतने बुरे और नीरस क्यों लगते हैं? मुए तीनों टाइम चलते थे. वो 'जल बिन मछली' की तरह भीषण तड़पन का समय होता था, हम अपना दायाँ हाथ प्यारे मरफ़ी के कान के पास रख इतराते हुए पूछते, "पापा, स्टेशन बदल दें?" पापा जैसे ही कहते, "रुको ..हैडलाइन सुनने दो" ...क़सम से उस पल ऐसा लगता कि दो मिनट और सुना तो अभी आकस्मिक हृदयाघात से मौत आ जाएगी! भौंहे ऊपर चढ़ा जो अथाह वेदना भरा दुखियारा लुक देते थे वो एक दिन न्यूज़ सुनते समय जब हमारे बच्चों ने हमें return gift में दिया तो दरद समझ आया. 
MORAL: इतिहास हमेशा ख़ुद को दोहराता है. गया लुक लौट के आता ही आता है. 
* कई बार अपठित गद्यांश को पूरा पढ़ने की जरुरत नहीं होती. कथा का संदेश अंतिम पंक्तियों में ही मिल जाता है. हीहीही
समाचार समाप्त हुए!  
- प्रीति 'अज्ञात'

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ये आकाशवाणी है!

ये आकाशवाणी है! (विश्व रेडियो दिवस पर)

सोशल मीडिया का यह लाभ तो अवश्य हुआ है कि जिन तिथियों की तनिक भी जानकारी नहीं होती थी अब उनके बारे में सुलभता से ख़ूब ज्ञान मिल जाता है. वरना कितनों को मालूम था कि आज 'विश्व रेडियो दिवस' है. वे सभी लोग जिनका जन्म नब्बे के दशक से पहले हुआ है, तय है कि उनका और रेडियो का रिश्ता यक़ीनन बना ही होगा.

उन दिनों रेडियो की भी अपनी एक निश्चित दिनचर्या होती थी. सुबह, दोपहर, शाम के समाचार, गाने, नाटिका, किसान और फौजी भाइयों के लिए, सखियों, युवाओं, बच्चों सबके लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आते थे. वार्ता, साक्षात्कार प्रसारित होते थे. चिट्ठियाँ पढ़ी जातीं थीं. प्रादेशिक केन्द्रों के साथ घर-घर में विविध भारती बेहद लोकप्रिय हुआ करता था. उन दिनों की एक मज़ेदार बात है कि तब गूगल तो था नहीं और हम जैसे लोग जब ऊटकमंड से सीमा, बबलू, गोलू, मनोज और उनके मम्मी-पापा, झुमरीतलैया से रामप्रसाद,गेंदाबाई, इस्माइल ख़ान, जावेद अली और उनके परिवार के सभी सदस्य, गंजडुंडवारा से रेखा, अनीता, पिंकी और उनकी सारी सखियाँ....सुनते तो ये मानकर ही चलते थे कि ऐसे नामों वाली जगह असल में हैं ही नहीं और ये लोग हमें उल्लू बना रहे हैं.  खैर,अब पता चल गया कि वो मज़ाक नहीं करते थे, ये स्थान तो हैं और अपने देश में हीं! उस बात के लिए कान पकड़ के सॉरी है जी!

तब विश्वसनीयता के लिए बीबीसी पर आँख मूँदकर भरोसा किया जाता था. मुझे याद है, इंदिरा गाँधी की हत्या के समय किसी को इस दुखद समाचार पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था. जब बीबीसी पर इसकी पुष्टि हुई तो देश भर में शोक की लहर दौड़ गई. यही वो समय भी था, जब दूरदर्शन का मध्यम वर्ग के घरों में प्रवेश प्रारंभ हुआ था.

रेडियो ने जैसे लोगों को जोड़ रखा था. अमीन सयानी जी की बिनाका (बाद में सिबाका) गीतमाला के समय तो सब यूँ इकट्ठे होकर सुनते जैसे कि पहली पायदान वाली फिल्म के निर्माता-निर्देशक वही हों. शर्तें लगतीं और बाद में इतराया जाता, "देखो, मैनें बोला था न, पहली पायदान वाला गीत! तुम्हारा वाला तो तीसरी पायदान पर ख़िसक गया. टिलीलिलि." और वो बंदा इसी बात पर या तो लड़ बैठता या खिसियाकर खिसक लेता. ख़ूब मस्ती-शैतानियाँ होती थीं.
क्रिकेट और रेडियो का नशा भी अपने चरम पर था. मैच के समय हर घर से कमेन्ट्री की आवाजें आतीं, बाज़ार जाते तो दुकानदार भी रेडियो/ ट्रांजिस्टर से ही कान टिकाये मिलता. अगर आखिरी ओवर हुआ तो 'सामान गया तेल लेने', सब दम साधे सुनते और 'ये लगा सिक्सर' सुनते ही यूँ नाचते जैसे उनके बच्चे ने परीक्षा में टॉप किया हो! क्या गाँव, क्या शहर...सबको एकसूत्र में बाँधकर रखता था रेडियो.

एक समय वह भी आया जब टीवी के घर-घर में पहुँचने के बाद रेडियो चुपचाप रहने लगा. दृश्य और श्रव्य माध्यम को अब ज्यादा महत्ता मिलने लगी थी और रेडियो के दिन बीतने की ख़बरें भी अपनी जगह बना रहीं थीं. पर कहते हैं न कि 'समय के साथ चलने में ही समझदारी है'. रेडियो ने भी यही किया. एफएम रेडियो ने पुनः नई ऊँचाइयों को छुआ और एक बार फिर सबके दिलों में जगह बना ली. इसकी पहुँच और महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी अपने 'मन की बात' पहुँचाने के लिए यही माध्यम चुना!
रेडियो की जय हो!
- प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

सुनो, लड़कियों...क्रांति का उद्घोष करो!

डिस्क्लेमर - इस पोस्ट को बीयर प्रेमियों से किसी प्रकार का कोई बैर न समझा जाए. 
जब किसी को लड़कियों के बीयर पीने से डर लगता है तो मुझे भी यक़ायक़ बड़े जोरों से हँसने की तलब हो उठती है. फिर याद आता है कि उफ़ ये तो चरित्रहीन होने की उम्दा निशानी है. अत: मैं अपनी मुस्कान वाली माँसपेशियों को दो सेंटीमीटर से अधिक बाहर नहीं जाने देती और एक मृदु मुस्कान को हमेशा टिकाये रखती हूँ. वो क्या है न कि पुरुषों का जाहिल, हिंसक, अभद्र, अश्लील, विकृत और घिनौना रूप समाज में बड़ी सहजता से स्वीकार्य है और इसमें संतुलन स्थापित करने के लिए हमें संस्कारी, शांतिप्रिय, सभ्य, उत्तम विचार युक्त, सुंदर, सुशील छवि स्थापित करनी ही पड़ती है. इसके लिए हमें एयर इंडिया की होस्टेस की तरह सदैव स्वागत को आतुर नमस्कार मुद्रा में खड़े होने का प्रशिक्षण जन्म से ही प्राप्त है. आप अत्याचार करें, हम सहेंगे.
आपराधिक मानसिकता से परिपूर्ण पुरुषों (कु) में किसी स्त्री को थप्पड़ देने के एवज़ में थप्पड़ खाने की कला अभी तक विकसित नहीं हो सकी है. इसे सभ्य भाषा में 'पुरुषार्थ पर प्रहार' भी कहा जाता है. हाय, विकासशील देशों का यह कैसा दुर्भाग्य! जैसा कि ज्ञात ही है कि इस सभ्य, सुसंस्कृत समाज में पवित्रता की धारा बहाने और चरित्रता की मिसालें क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल स्त्रियों के कंधे पर है. सो, डरने की बात तो है, भैये! 

अब इसे मेरा मादक द्रव्य पदार्थों को समर्थन क़तई नहीं समझा जाए. विद्यार्थी जीवन में स्कूल से घर लौटने का जो शॉर्टकट था न, वहाँ एक 'देसी शराब का ठेका' पड़ता था. भीषण दुर्गन्ध के कारण साँस रोक निकलना होता था (रामदेव जी ने तो अब सिखाया पर प्राणायाम तो हमारा बाल्यकाल से ही प्रारम्भ हो गया था). डाकुओं के इलाके में रहने के कारण भय नामक तत्त्व भी कूट-कूटकर भरा था. तो अपन जैसे ही किसी लाल-लाल आँखों वाले को देखते, तुरंत ही सरपट भाग लिया करते. वैसे मूलत: इन शराबियों की वहीं एक गंदे नाले के पास गिर जाने की प्रथा भी उन दिनों अपने चरम पर थी. तो साब, नफ़रत का आलम तो समझ ही जाइए. 

वो तो भला हो प्रकाश मेहरा और लम्बू जी का, कि 'शराबी' फिल्म के बाद हमें इस क़ौम से सहानुभूति होने लगी और इस बात पर लगभग विश्वास ही हो गया कि 'दर्द की यही दवा है'. 'मुझे पीने का शौक़ नहीं, पीती हूँ ग़म भुलाने को' गाने ने भी हमारी इस सोच की पुष्टि की. कुछ फिल्मों ने यह भी ज्ञान दिया कि प्रेमी अपने सच्चे प्रेम की पुष्टि अक़्सर नशे की अवस्था में ही ईमानदारी से कर पाते हैं. पर इसके समर्थन में हम तब भी खड़े न हुए क्योंकि हमें पता था कि 'शराब, पीने से लिवर ख़राब हो जाता है'. 

हमारी सामाजिक व्यवस्था की क्यूटनेस इसी बात से मेन्टेन रहती है कि धर्म, जाति के नाम पर ही नहीं बल्कि लिंग आधार पर भी भेदभाव को उचित विस्तार दिया गया है. तात्पर्य यह है कि जो कार्य पुरुषों के लिए उचित, वही स्त्रियों के लिए सर्वथा अनुचित माने गए हैं. यथा- एल्कोहल सेवन, धूम्रपान, वेश्यावृत्ति, बीच सड़क खड़े हो कर गपशप, गालियों का धुँआधार प्रयोग, लड़ाई-मारकाट इत्यादि. यद्यपि इसमें गालियों के बीच महिलाओं को यथोचित स्थान देने का प्रयास किया जाता रहा है. 
परिस्थितियों के अनुसार ग़लत-सही की परिभाषाएँ परिवर्तित होती रहती हैं. हर आनी-जानी सरकार डिनर मीटिंग में एक कनस्तर एल्कोहल पीने के बाद आपको सूचित करती है कि "यह बुरी वस्तु है लेकिन हम बिकवाएँगे. आप बस ख़रीदियो मत! ख़रीद ल्यो तो घरवाली को मत बतइयो और जो लत पड़ जाए तो नक्को चिंता! सुधार-गृह का ठेका अपने पैचान वाले का ही है. हेहे, उसके भी घर में चार पैसे आएँगे".
जब सब पीने का ठेका तुमरा ही है साहेब जी, तो पिलीज़ एक काम करो, जरा ज़हर पीकर बताओ न! सच्ची हम बिल्कुलै try नहीं करेंगे.

मज़ाक बहुत हुआ पर मुझे सचमुच उस दिन की प्रतीक्षा है जब तुम (बुरे पुरुष) स्त्रियों का नाम सुन थर-थर कांपने लगो. 
किसी घर के बेसमेंट में खुद के लुट जाने के भय से छुप जाओ. 
रात को बाहर चार दोस्तों के साथ ही निकलो कि कहीं कोई लड़की  अकेले देख तुम्हारा फायदा न उठा ले. 
तुम अकेले सफर करने से घबराओ और ट्रेन में पुरुष डिब्बे की मांग करो. 
वो सुबह कभी तो आएगी!
सुनो, लड़कियों...क्रांति का उद्घोष करो!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowkमें प्रकाशित 

पहले उसकी जात पूछ लेना!

अंकित के साथ जो हुआ वह हमारे काले गुनाहों की सूची में एक और बदनुमा दाग़ लगाकर आगे बढ़ गया है. इस जघन्य कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, कम है और हमारे बस में कुछ रहा भी क्या है!
इन दिनों यही तो हमारी नियति बन गई है कि हम निंदा करते हैं, चौराहों, न्यूज़ चैनलों पर जमकर चर्चा होती है, आक्रोश दूध के उबाल की तरह निकल- निकल बाहर आता है और फिर अगले गुनाह के होने तक सभी अपनी-अपनी  व्यस्त दिनचर्या में लौट चुके होते हैं.

सरकार वही घिसा-पिटा आश्वासन देती है और प्रशासन क्षतिपूर्ति के नाम पर एक निश्चित धनराशि. यह मात्र मुँह बंद रखने की क़ीमत भर है इसे दर्द और आँसुओं से भरे इंसान के शेष जीवन से कोई लेना-देना नहीं! इसे उस हृदयविदारक दृश्य से भी क्या मतलब जब किसी के सामने उसके ही जिग़र के टुकड़े का बेदर्दी से गला रेत दिया जाता है. इसके बहरे कानों तक उस प्रेमिका की चीखें कभी नहीं पहुँच पातीं जो उसके चकनाचूर हुए स्वप्न और प्रेमी को हमेशा-हमेशा के लिए खो देने की पीड़ा से उपजी हैं.

ऊँचाई पर बैठे लोगों को वर्तमान से कहीं अधिक भूतकाल में रूचि है. इन्हें शहरों, गली-मोहल्ले के नाम बदल अपनी पीठ थपथपाना आता है. इनके माथे पर गहरी शिक़न तब आती है जब कोई किसी पर इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगा 'वोट बैंक' को डगमगाने की कोशिश करता है. ये तब चौंक जाते हैं जब कोई इनके लिए अपशब्द कह डालता है.
इनकी घबराहट तब देखने लायक होती है जब इनका कोई 'अपना' कहीं फंस रहा होता है.
ये अपनी हाँ में हाँ मिलाने वालों के मुरीद हैं और विरोधी से नफ़रत कर उसे देशद्रोही क़रार कर देने का एक भी मौका नहीं छोड़ते.
सार यह है कि अपने व्यक्तिगत हितों और सत्ता-लोलुपता की दृष्टि से सम्बंधित सभी विषयों पर इनकी समस्त इन्द्रियाँ जागृत हो जाती हैं और तब ही न्यायपालिका भी सावधान मुद्रा में खड़ी हो अपनी सचेत अवस्था की हास्यास्पद पुष्टि करती नज़र आती है.

वरना आप किसी तथाकथित 'संत' के जेल जाने पर शहर को आग में फूँक दें... इज़ाज़त है!
आप बीच चौराहे पर किसी को ज़िंदा जला दें  .... ये उफ़ भी न करेंगे!
धर्म के नाम पर इंसानों को टुकड़ा-टुकड़ा कर वीडियो वायरल कर दें, ये उस मुद्दे को भूनकर और सब तरफ़ से भुनाकर चबा डालने में माहिर हैं.
ये अपराधों को दूर करने से कहीं ज्यादा उसके सुलगते रहने पर यक़ीं करते हैं, शर्त यह है कि फ़ायदे का लडडू सीधा इनके मुँह में आ गिरे!
ये छह माह की बच्ची या चौरासी साल की वृद्धा के साथ हुए बलात्कार को सहजता से लेते हैं. किसी किशोर को उसकी उम्र की आड़ में बाइज़्ज़त बरी करते हैं और उसकी हवस का शिकार बनी स्त्री जाति के छोटे कपड़ों  पर दोष मढ़ हाथ झाड़ लेते हैं. इन्हें उसके ऊंचे कपडे दिखाई देते हैं पर अपनी नीची सोच पर फ़क्र महसूस होता है. इन्हें बलात्कारी को फाँसी देने में कोई रुचि नहीं बल्कि डर है कि कहीं इनके साथी ही उसके चपेटे में न आ जायें. ये चुप्पी यूँ ही नहीं है!

हम उस दुनिया में रह रहे हैं जो विध्वंस के बारूद पर खड़ी है. जहाँ क़ातिलों को सज़ा नहीं मिलती और 'Honor killing' अब लीगल लगने लगी है. जहाँ अधिकारों की मांग करते-करते 'भीड़' अपने कर्त्तव्यों को भूल राष्ट्र्रीय संपत्ति को नष्ट करने में एक पल भी नहीं हिचकती. 
हम ख़बरों को देख हताश हो उठते हैं. अपने परिवार के सदस्यों के बाहर जाने पर बेचैनी से समय काटते हैं, एक घबराहट और भय हर समय साथ चला करता है.
तमाम अच्छाइयों के बीच अब सर्व धर्म समभाव, अहिंसा गुरु और धर्म-निरपेक्षता की बातें सिर्फ़ क़िताबी हैं. सहिष्णुता दिखती है क्या कहीं? प्रेम, भाईचारा, अनेकता में एकता मजाक का विषय बन रह गए हैं.
असल दुनिया में सब तरफ़ अन्याय है, दुःख है, गहरी पीड़ा है और इस सबके साथ चलता एक बेबस जीवन है जो अब भी कभी-कभी मूर्खतावश सकारात्मक उम्मीद कर बैठता है जबकि आज के इस दौर में हमें सिर झुका, हाथ जोड़, नम आँखों से यह स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि नफ़रतों के इस दौर में प्रेम करना सबसे बड़ा गुनाह है.
धिक्कार है हम पर... 
हमारे नियमों पर...
और प्रेमियों इस वैलेंटाइन माह में तुम यूँ ही दिल न दे बैठना किसी को ...पहले उसकी जात पूछ लेना!
- प्रीति 'अज्ञात'
#वैलेंटाइन#iChowk में प्रकाशित 

ध्यान रहे कि 'गले लगना और गले पड़ना दो अलग अलग बातें हैं'


यदि भारतीय संस्कृति के मूलभूत नियमों और सभ्यता की बात करें तो यहाँ अपरिचित के गले लगना, आज भी असंस्कारी माना जाता है. यहाँ तक कि स्त्री-पुरुष का परस्पर गले मिलना भी संशय के दायरे में स्थान ग्रहण करता है. अत: हमारे यहाँ किसी महिला को महिला मित्र से गले लग और पुरुष मित्र से नमस्ते, हैलो, हाय कर मिलने की परंपरा चिरकाल से चली आ रही है. गले मिलना किसी एक पक्ष को असहज भी कर सकता है. पर फिर भी कुछ लोग ज़बरन गले मिलते हैं. ध्यान रहे, यहाँ नेताओं की बात नहीं हो रही!

कहते हैं, परिवर्तन संसार का नियम है. इसलिए अब लोगों की सोच बदल रही है. विशेष रूप से युवाओं में. वे इस बात को लेकर बेहद सहज हैं और इसे सामान्य तौर पर ही लेते हैं. वो जमाने गए जब लड़के-लड़की को साथ देख लोग मुँह फाड़े हौहौ किया करते थे. यदि अब भी ऐसे लोग जीवित हैं तो उन्हें अब अपनी सोच में बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि यदि मानसिकता सही हो तो फिर कुछ भी ग़लत नहीं होता!

ईद के त्यौहार में गले मिलकर ही बधाई देते हैं. माता-पिता अपने बच्चे को गले से लिपटाकर जो स्नेह वर्षा करते हैं, उससे सुंदर भी कोई अनुभूति हो सकती है, क्या? दो दोस्तों के बीच मित्रता का आलिंगन, एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है. आपके दुःख में कोई बढ़कर गले लगा ले तो आँसुओं का ठहरा सैलाब अचानक बह उठता है. गहन पीड़ा में मरहम की अनुभूति होती है. इसे 'जादू की झप्पी' यूँ ही नहीं कहा जाता! यह एक जरुरी स्पर्श है जो हर बंधन को और भी मजबूती देता है. अपनत्व का अहसास कराता है. अपार सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है ये स्नेहसिक्त झप्पी. 

हिन्दी फ़िल्मों के कई सदाबहार गीतों में 'लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो, शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो' आज भी कई आँखों को नम कर देता है. यह इसकी लोकप्रियता का ख़ुमार ही है कि अब इसका नया version भी आ चुका है. 'मुझको अपने गले लगा लो, ए मेरे हमराही; तुमको क्या बतलाऊँ मैं, कि तुमसे कितना प्यार है' भी जवां उमंगों को हवा देता है.
'चुपके से लग जा गले रात की चादर तले', 'आके तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी', 'बाँहों के दरमियाँ दो प्यार मिल रहे हैं' जैसे ख़ूबसूरत नगमों ने रोमांस को नई परिभाषाएँ दी हैं.
'आ लग जा गले दिलरुबा', 'बाँहों में तेरी, मस्ती के घेरे सांसों में तेरी खुशबू के डेरे' भी इसी अहसास से ओतप्रोत मस्ती भरे गीत हैं.
'आओ न गले लगाओ न, लगी बुझा दो न ओ जाने जाँ' में हेलन ने इसे एक अलग ही रंग देकर नए कीर्तिमान स्थापित किए. पति-पत्नी के बीच के रोमांस को दर्शाते हुए जया भादुड़ी और संजीव कुमार पर फिल्माए इस मधुर गाने को भी दर्शकों की ख़ूब वाहवाही मिली थी...'बाँहों में चले आओ हो, हमसे सनम क्या परदा'. सीधी-सी बात है जहाँ 'प्रेम' है वहाँ गले तो लगेंगे ही. आपकी हा-हू से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला!
बस, ये ध्यान रहे कि 'गले लगना और गले पड़ना दो अलग अलग बातें हैं'. 
- प्रीति 'अज्ञात'
#hug_day#वैलेंटाइन#valentine_day iChowkमें प्रकाशित 

भारतीय समाज और वादे का नाजुक शीशमहल


भारतीय समाज में वादा, प्रॉमिस, वचन की महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक वचन के कारण ही पूरी रामायण रच दी गई. 'प्राण जाय पर वचन न जाय' को लोगों ने अपना जीवन-सूत्र बना लिया. तमाम युद्ध और घटनाओं की जड़ में भी कहीं-न-कहीं ये वचन ही रहा. कोई राजा किसी रूपवती पर इस क़दर मुग्ध हुआ कि स्वयं को ही वचन दे डाला...."मैं इसे पाकर रहूँगा", उसके बाद की कहानी का तो  इतिहास में तुरंत स्थान पा लेना सुनिश्चित था ही. इधर वर्तमान में कुछ नासमझ अपनी पत्नी को वचन दे अपनी जान सांसत में डाल लेते हैं जबकि भारतीय समाज में आज भी पत्नी को वचन देने का मतलब, उम्रभर का ताना मोल ले लेना है. इसे 'कुल्हाड़ी पर डायरेक्ट पैर मारना भी कह सकते हैं. बड़ा भावुक दृश्य होता है जब वह अपने मायके वालों से आप ही के समक्ष बड़ी मासूमियत से कह रही होती है, "इनका तो का बताएं जिज्जी, 1989 में लाल किले पे घुमाने को कहा था, आज तक न ले गए. 1992 में गुप्ता जी की दुकान से साड़ी भी न खरीदने दी, बोले बाद में दिलवाऊंगा और फिर 93, 94 से लेकर 2018 तक की पूरी सूची से आपका साक्षात्कार हो रहा होता है. पति बेचारा अपनी पत्नी की उत्कृष्ट स्मृति-शक्ति पर गर्व करने का दुस्साहस भी नहीं कर पाता! इधर कुआँ, उधर खाई वाली मर्मस्पर्शी परिस्थिति होती है उसकी. 

पर इससे भी अधिक  ख़तरनाक है, बच्चों से कोई वादा करना. ओहोहो, ग़र आपने गलती से प्रॉमिस कर दिया कि "हाँ, बेटा कल वहाँ चलेंगे या  तुम्हारे लिए समोसे बनाऊंगी"आदि और इसके बाद निभा नहीं पाए तो दिन रात उनकी आग्नेय आँखों और तत्पश्चात आपके भीतर उत्पन्न होते घनघोर ग्लानि-भाव के लिए आप ही स्वयं ज़िम्मेदार हैं. यह प्रॉमिस, लोंग के तेल वाला टूथपेस्ट नहीं बल्कि किसी सघन दलदल में बिछे सूखे पत्तों पर चलने जैसा अभिशाप है जहाँ प्रत्येक क़दम फूँक-फूँककर रखना होता है. जान हथेली पर होती है.

अब ये मानकर भी नहीं चलना चाहिए कि वादा-खिलाफ़ी दूसरा पक्ष ही करता है. तनिक वज़न कम करने वाले गोलू मासूमों से पूछिए कि वो वीकेंड में पिज़्ज़ा-बर्गर का सात्विक भोजन करते समय, हर सोमवार के लिए स्वयं से क्या-क्या वादे कर रहे होते हैं! कितनी निष्ठा से वे सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाकर उठते हैं और स्वयं को सांत्वना देते हुए पाँच बजकर, पाँच मिनट को पुनः बिस्तर रुपी स्वर्ग धारण करते हैं. इस तरह इनके आलस्य के निवारण का सोमवार कभी नहीं आ पाता! लेकिन हिम्मती इतने कि हर वर्ष के इकत्तीस दिसंबर को निर्मित कार्यतालिका में 'वेट लॉस' का गोला प्रथम स्थान पाता है और जनवरी के प्रथम सप्ताह तक किसी निर्दयी इरेज़र से मिट, स्थानांतरित होता नज़र आता है.

अब जब घरेलू स्तर पर हम वादों के शीशमहल को बेधड़क चकनाचूर होते देख, हँसते हुए सह जाते हैं तो पक्ष / विपक्ष के नेताओं से चुनावी वादों को पूरा करने की उम्मीद क्यों कर बैठते हैं? उन पर तो पूरे देश का भार है, अत: हमें उनका आभारी होना चाहिए एवं उनकी 'वादीय क्षमता' पर अत्यधिक गर्व का अनुभव करना चाहिए. 

'वादे' नामक चुम्बकीय तत्त्व को बॉलीवुड ने भी ख़ूब भुनाया है. चाहे 'जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा' वाला सदाबहार गीत हो या अपने सल्लू - भाग्यश्री का "वादा किया है तो निभाना तो पड़ेगा" वाला क्यूट-सा, रोमांटिक डायलॉग. 
कभी मुस्काती, हेमा जी यह जताती रहीं कि "ओ मेरे राजा, खफा न होना देर से आयी, दूर से आयी, मजबूरी थी फिर भी मैंने वादा तो निभाया" तो कभी स्मित चेहरा लिए सुनील दत्त साब "तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ /तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो, मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ" कहकर लाखों दिल लूट ले गए. जीतू सर "कितना प्यारा वादा है, इन मतवाली आँखों का" पर सबको नचाते रहे तो "क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम, वो इरादा/ भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें" ने दर्शकों को बाल्टी भर-भर टसुए बहाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी. "वादा कर ले साजना" गीत पर विनोद खन्ना के साथ थिरकती प्यारी सिमी ग्रेवाल आज भी सबको याद हैं. इसके अतिरिक्त "तू- तू है वही, दिल ने जिसे अपना कहा", "मिलने की तुम कोशिश करना, वादा कभी न करना", "दोनों ने किया था प्यार, मगर मुझे याद रहा तू भूल गई", "वादा तेरा वादा","वादा करो नहीं छोडोगी, तुम मेरा साथ, जहां तुम हो वहाँ मैं भी हूँ", "वादा रहा सनम, होंगे जुदा न हम" और ऐसे सैकड़ों गीतों ने श्रोताओं के ह्रदय को, विविध भावों और संवेदनाओं के महासागर में डुबकी लगाने को बाध्य कर दिया है, साथ ही वादे के सभी मूर्त रूपों से उन्हें परिचित कराने में भी इनके अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.
लेकिन कई दशकों से अब तक,यह गीत  जीवन-दर्शन का प्रतिबिम्ब बनकर उभरता रहा है -
"देते हैं भगवान को धोखा, इनसां को क्या छोड़ेंगे/ अगर ये हिन्दू का है तो फिर,मंदिर किसने लूटा है /मुस्लिम का है काम अगर फिर,खुदा का घर क्यूँ टूटा है/ जिस मज़हब में जायज़ है ये, वो मज़हब तो झूठा है /कस्मे-वादे, प्यार, वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या/कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या!"

खैर, भावुक न होइए!
सायोनारा सायोनारा, वादा निभाऊंगी सायोनारा, इठलाती और बलखाती....कल फिर आऊँगी, सायोनारा!
- प्रीति 'अज्ञात'
#Promise_day #वैलेंटाइन #iChowk में प्रकाशित 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

चतुर्थ पावन प्रस्तुति (वैलेंटाइन यज्ञ)

'टेडी' नाम सुनते ही एक नरम, मुलायम, गुदगुदे फ़र वाले खिलौने की याद आ जाती है, जिसे कभी खिलौना माना ही नहीं गया. अपने बचपन और उसके बाद के समय में भी, कभी किसी बच्चे को जमीन पर पैर पटकते हुए यह कहते नहीं पाया कि  "ऊँऊँआआआं, मम्मीईईईई (इस अवस्था में हमारे नौनिहालों का गला प्राय: फटे बांस की तरह भरभराने लगता है) मुझे टेडी बीयर वाला खिलौना दिला दो!" वे तो बड़े प्यार से माँ का आँचल थाम, गोल-गोल आँखें मटकाते हुए बोलेंगे, "मम्मा, टेडी बीयर ले लें, प्लीईईईईज". गूढ़ चिंतन एवं सामाजिक दृश्यों के आधार पर यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि बच्चों से कहीं अधिक युवतियाँ एवं माताएँ इस पर वारी जाती हैं तथा कई स्थानों पर उन्हें इस निर्जीव, निश्छल, मुलायम भालू को मेरा कूचीकू, कुचु-पुचु, गुच्चू जैसे निरर्थक नामों से भी पुकारते हुए पाया गया है.
इस टेडी से आप बात कर सकते हैं, उसका तकिया बना सकते हैं और यदि आपका लालन-पालन ठीक से नहीं किया गया है तो आप दुष्टतावश इसकी एक आँख (बटन) निकाल उसे काना बनाने से भी पीछे नहीं हटते.

मज़ेदार बात यह है कि चाहे बंदर, कुत्ता, बिल्ली, उल्लू, पेंग्विन या चमगादड़ ही क्यों न हो पर सॉफ्ट टॉयज को हम 'टेडी बीयर' कहकर ही सभ्य एवं गौरवान्वित महसूस करते हैं. इसी प्रथा को मद्देनज़र रखते हुए मिनरल वाटर को बिसलेरी और सॉफ्ट ड्रिंक्स को कोकाकोला पुकारने की परंपरा भी विकसित हो गई थी. यह भी संभव है कि ये दोनों टेडी बीयर के प्रेरणास्त्रोत रहे हों! कारण जो भी पर साब जी, यह विकासशील LED के जमाने में बजाज बल्ब सरीख़ी बात लगती है. याद है न -
"जब मैं छोटा लड़का था, बड़ी शरारत करता था
मेरी चोरी पकड़ी जाती, जब रोशन होता बजाज 
अब मैं बिलकुल बूढ़ा हूँ, गोली खाकर जीता हूँ 
लेकिन आज भी घर के अंदर रोशनी देता बजाज"
अब रोशन तो ऋतिक हो गए और बाक़ी का जानने की हमने कोशिश ही नहीं की!
चलो, टेडी से कूची-पूची करके पूछते हैं, "बताओ, न तुम्हारा नाम टेडी किसने रखा?"
एक बात और नहीं समझ आई कि गिफ्ट की अपेक्षा हमेशा लड़कों से ही क्यों की जाती है? इस बार आप ही (बोले तो गर्ल्स) देकर देखो न! क़सम से उनका दिमाग़ झनझना जाएगा. बेचारे कह भी न पाएँगे कि काहे दिया! उसके बाद आग में घी डालते हुए 'हैप्पी टेडी डे' भी याद से बोल दियो!
-प्रीति 'अज्ञात'
#Teddy_day #वैलेंटाइन