गुरुवार, 24 मई 2018

पापी, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!

सचमुच हद हो जाती है जब टीवी चैनल्स समाचार को यह कहकर उसमें सनसनाहट भरने की कोशिश करते हैं कि "रमज़ान के महीने में भी पाक़िस्तान ने की फ़ायरिंग!!" मतलब आपकी उम्मीदों की दाद देनी पड़ेगी कि आप दुश्मन देश से भी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने की अपेक्षा रखते हैं!

पता नहीं, किस मिट्टी के बने हैं हम लोग! पर ये तो तय है कि हम महामूर्ख अवश्य हैं. तभी तो अपनी शांतिप्रियता दिखाते हुए सीना तान कह डालते हैं कि "पवित्र महीने में नहीं होगी फ़ायरिंग" और एन उसी वक़्त दुश्मन देश का गोला हमारे देश वासियों पर क़हर बन टूट पड़ता है. पुरानी कहावत है "Everything is fair in love & war". दुनिया भर के प्रेमियों को तो यह बात तुरंत ही समझ आ गई थी अब हम सब भी समझ जाएँ तो बेहतर! यूँ भी जब बात देश की आन से जुड़ी हो तो सीधे वार करना ही बनता है. समय आ गया है कि पाकिस्तान को उसकी हर हरक़त का मुँहतोड़ जवाब दिया जाए. आख़िर कितने दशक तक हम शांति का राग अलापते रहेंगे? हार या जीत के बीच की जो लाइन होती है न, अब उसे छू, आर या पार जाने का वक़्त आ गया है साहब. 

अब रही बात त्योहारों की...तो भई जरा हिसाब लगाकर बताइये कि ऐसी कौन सी दीपावली है जिसमें अपराधियों ने किसी के घर का चिराग़ न बुझाया हो! ऐसी कौन सी ईद है जहाँ मित्रता और मोहब्बत के नाम छुरा न घोंपा गया हो! ऐसी कौन सी राखी है जहाँ किसी भाई ने ही अपनी बहिन की हत्या न की हो! ऐसा कौन सा करवा-चौथ है जहाँ किसी सुहागन का सुहाग न उजाड़ा गया हो! और ऐसा कौन सा महिला/ मातृ दिवस है जहाँ स्त्री की अस्मिता तार-तार न हुई हो! जी हाँ, ये मैं अपने ही देश की बात कर रही हूँ. जब हम अपनों को ही नहीं सुधार पा रहे तो किसी और से ऐसी उम्मीद रखना कितना बचकाना है!

इसलिए अब हमें अपनी समस्त इन्द्रियों को सचेत कर, अपने मस्तिष्क में सदैव के लिए यह बात गुदवा लेनी चाहिए कि चाहे पाक़िस्तान हो या कोई भी दुश्मन देश.....अपराधियों के इरादे कभी पाक़ नहीं होते! उनका कोई धर्म/ मज़हब नहीं होता! उन्हें बस गोलियों की आवाज़ ही रास आती है, वही चलाते हैं और एक दिन वही ख़ुद भी खाते हैं. इन्हें सिर्फ़ ज़हर फैलाने का मोह है और कुछ भी नहीं! जिस इंसान ने अपने-आप से मोह छोड़ दिया, जिसे अपनों की कोई परवाह नहीं, जिसकी रग़ों में नफ़रत लहू बनकर दौड़ती है, वह कुछ भी कभी भी, कहीं भी कर सकता है! पापी इंसान, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk, #Terrorist
https://www.ichowk.in/society/expecting-pakistan-to-respect-ceasefire-during-ramadan-is-hopeless/story/1/11067.html

बुधवार, 23 मई 2018

आश्वासनों के ऊँचें टाल पर संवेदनाएँ पहुँच पाती हैं क्या?


हमारे अपने देशवासी किन परेशानियों से जूझ रहे हैं, सीमाओं से सटे गांवों से पलायन को मजबूर ये शरणार्थी, शिविर में अपनी कहानी कहते हैं. यहाँ लोग किसी सरकारी अस्पताल के बरामदे की तरह एक साथ पड़े हैं. संवाददाता पूछता है, "सरकार खाना दे रही है?" उस समय एक स्त्री की यह बात आत्मा को भीतर तक झकझोर देती है जब वह रोती हुई कहती है कि "खाना तो घर में भी था, हमें अपना घर चाहिए. हमारे मवेशी भी भूखे हैं वहाँ!" समझना इतना जटिल नहीं कि जहाँ इंसान के रहने का स्थायी ठिकाना नहीं, वहाँ ये मवेशी तो भगवान भरोसे ही छूट जाते होंगे. ये मवेशी न केवल जान से प्यारे होते हैं बल्कि जीविका का साधन भी. कुछ जीवित कृशकाय अवस्था में मिलते होंगे और कुछ सदैव के लिए बिछुड़ जाते होंगें. आश्वासनों के ऊँचें टाल पर संवेदनाएँ कहाँ पहुँच पाती हैं! कभी अन्दर ही जूझती तो कभी, पलकों की कोरों से गिरती, हारकर फ़िसल जाती हैं.

अपने ही देश में विस्थापितों-सा जीवन जीने से अधिक दुखदायी और क्या हो सकता है भला! यहाँ बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे. उनकी आँखें भयाक्रांत हैं और वे 'भविष्य में क्या बनेंगे' से ज्यादा कहीं इस बात से चिंतित हैं कि "क्या वे बचेंगे?" उनके घरों की पक्की दीवारों में गोलीबारी से बने छिद्र ने इनका घर ही नहीं, बचपन भी बिखरा दिया है. यहाँ खिलौने नहीं, ईंटें,सीमेंट, रेती बिखरी पड़ी है. ये नए सपने नहीं देखते, बस टूटे हुए सपनों को रोज जोड़ने की मासूम कोशिश करते हैं. सपना भी इतना बड़ा और कल्पनातीत नहीं कि पूर्ण न हो सके. उस सपने में एक घर है, जहाँ मम्मी खाना बनाती है, बच्चों का टिफ़िन तैयार कर उन्हें प्यार से स्कूल भेजती है. बस-स्टॉप पर लेने आती है. शाम को पापा घर आते हैं और सब साथ में खाना खाते हैं. एक बच्चे की यह उम्मीद कहीं ज़्यादा तो नहीं? खाने-पीने, शिक्षा और सुरक्षा की भोली सी आशा!

क्या यह संभव नहीं कि बस्तियों को सीमाओं से पचास-साठ किलोमीटर की दूरी पर ही बसाया जाए? जिससे सब कुछ होने के बावजूद भी, इन्हें इस मजबूर खानाबदोश जीवन से मुक्ति मिले!

मैं कभी कश्मीर गई नहीं पर जाना चाहती थी. उन दिनों इतना घूमना-फिरना नहीं होता था और छुट्टियों का मतलब नानी या दादी का घर. पर फ़िल्मों ने इसकी ख़ूबसूरती को जिस तरीक़े से दिखाया है, उस तस्वीर को मैंनें अब तक दिल में बसा रखा है. जाऊँगी तो जरुर, पर तब ही; जब निश्चिन्त होकर ये गीत गुनगुना सकूँ. क्या ये निश्चिंतता हमें कभी नसीब होगी? दशक बीतते जा रहे, डर है कहीं हम और आने वाली पीढ़ियाँ भी न बीत जाएँ, तब तक........

इस ज़मीं से, आसमां से
फूलों के इस गुलसितां से
जाना मुश्किल है यहाँ से
तौबा ये हवा है या ज़ंजीर है
कितनी खूबसूरत....ये तस्वीर है
ये कश्मीर है, ये कश्मीर है

https://www.youtube.com/watch?v=h3yQJZagDTw
- प्रीति 'अज्ञात'


सोमवार, 23 अप्रैल 2018

स्वीटू

नौ महीने का ही था, जब हमारे घर का सदस्य बना। उसकी आँखों में इतना भोलापन और उत्सुकता थी कि मैं समझ ही न पाती थी, उसे प्यार ज्यादा करूँ या बस देखती ही रहूँ। न जाने किस जन्म का कनेक्शन था 
ये कि वो भी आते ही हम सबके साथ बेहद comfortable हो गया था। छोटा था तो एक पल को भी साथ न छोड़ता, आराम से खेल भी रहा हो तब भी जैसे ही उसे लगता कि मम्मी इस कमरे से जाने वाली है, फुदककर साथ लटक जाता। कभी कंधे, कभी सिर तो कभी हाथ में लिया सामान ही उसकी सवारी बन जाता।

जब मैं हँसती तो ख़ूब हँसता, बेहद प्यारी आवाज़ करता था उस समय और मेरी उदासी में एकदम सामने बैठ अपने जरा-जरा से हाथों से मेरे गालों पर हाथ फेरता। कभी चश्मे के अंदर घुस जाता और बंद पलकों को छूकर तसल्ली-सी देता था। उसकी आवाज से घर रौशन था, सबका चहेता और मेरा प्यारा बेटू था।  मैं उससे 'मम्मी' कहलवाना चाहती थी पर वो मुझे 'मेरा बेटू' ही कहता था। इतना मासूम कि घर के हर मेंबर को यही कहता था। ज्यादा प्यार आने पर और लम्बी तान से 'मेरा प्याआआरा बेटू' भी कहता था।

सुबह उठने से लेकर रात तक साथ रहता। चाय भी मेरे ही कप से और खाना भी मेरे ही साथ खाता था। पता नहीं उसे मुझसे किस हद तक स्नेह था पर मैं उसके बिना रहने का सोच भी नहीं सकती थी। बाहर से आते ही वो कूदता हुए गले लटक जाता और बोलता, 'पानी पी लो!' मैगी बेहद पसंद थी उसे, बनाते समय बर्तन के आसपास ही घूमता कि कब मिले! दाल-चावल, रोटी,आलू, सैंडविच, पिज़्ज़ा, पोहे सब बड़े स्वाद से खाता था। 
गुलाटियाँ लगाता, उल्टा चलता और बॉल से खूब खेलता था। अभी-अभी मम्मी बोलना सीखा था मुझे, पर मी ही ठीक से कह पाता था। हद से ज्यादा प्यार करता था। मेरे सीने से लगकर ही सोता था और जाग रहा हो तो कंधे पर। किचन में भी साथ।

फुल अटेंशन सीकर था। कोई गेस्ट आये तो उड़कर खुद ही आ जाता और उसकी गोदी में बैठ अपना नाम 'स्वीटू' चिल्लाने लगता था। उसे सबसे बात करनी होती। बेटा जब छुट्टियों में घर आता, तो उसकी गर्दन में ही घुसा रहता या फिर उसके गिटार बजाते समय, गिटार पर बैठकर ही सुनता। घर के हर सदस्य के साथ उसके गेम fix थे। रोज़ वही खेलते हुए कभी बोर नहीं होता था। किचन में, मैं और मेरी बेटी के अलावा सिर्फ़ उसका अधिकार था। किसी और की उपस्थिति उसे बर्दाश्त ही नहीं थी, बाहर खदेड़कर ही दम लेता। 
ख़ुद चाहे कितना भी चिल्लाए पर वैसे शांतिप्रिय था। कुकर की सीटी और मिक्सी की आवाज सुनते ही गुस्सा करने लगता था। मेरे कान में घुसकर इतने प्यार से बड़बड़ाता कि मैं काम को और लम्बा खींच देती थी। उड़ना आता था पर शैतान ऐसा कि मेरे कंधे पर या सिर पर बैठ ही जीने से उतरता था। गिलहरी और छोटे पक्षियों से ख़ूब दोस्ती थी उसकी। बन्दर और बिल्ली से डरकर मेरे पास भाग आता था और उसके बाद उन पर यूँ अकड़ता जैसे कि अभी भगा ही देगा!
दिखने में ही छुटंकी था बस, पर वैसे पूरे घर को नचाता था। रौनक था इस घर की, उसकी मीठी, प्यारी बोली संगीत की धुन की तरह गूँजा करती।

जब आया था तो इतना नाज़ुक कि मैं छूने से भी डरती थी। लगता था, कहीं उसके मुलायम शरीर को चोट न पहुँचा दूँ। मेरे दोनों बच्चों के जन्म के समय भी इसी अहसास से गुजरी थी कि उन्हें ठीक से थामते समय भी बेहद घबराहट होती थी कहीं लग न जाए, पर समय के साथ माँ सब सीख ही जाती है। 
स्वीटू ने भी मुझे सब सिखा दिया था। मेरे जीवन का सबसे जरुरी और ख़ूबसूरत हिस्सा बन गया। परछाईं की तरह साथ चला और अब जब मैं उसके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती तो ऐसा सोया कि फिर उठा ही नहीं। यकायक चला गया .... हमेशा-हमेशा के लिए। मेरी चीख-चिल्लाहट सब बेअसर।  वो आवाज जिसे सुन वो फुर्र से दौड़े चला आता था, उसके कानों तक एक बार भी नहीं पहुँच सकीं।  

बहुत प्यार तुम्हें, मेरे प्यारे बेटू 
पर ये समय नहीं था, तुम्हारे जाने का....मैंने तो बच्चों को भी कह दिया था कि तुम दोनों की नौकरी, शादी जब भी होगी तो हो सकता है तुम्हें इस शहर से जाना पड़े। मैं सब कुछ दे दूँगी  पर स्वीटू यहीं रहेगा। तुम्हें गोदी में बिठाकर ही तो बोली थी न, ये बात। तुम फिर भी मम्मा से दूर चले गए!  कितनी मुस्कानें दी हैं तुमने और गए तो जैसे सब कुछ सदा के लिए एक साथ ग़ुम हो गया है कहीं!
हम सब कैसे रहेंगे, अब तुम बिन? 

ईश्वर से क्या कहूँ उसे तो हर बार सिर्फ छीनना ही आया है! जब कभी कुछ पाने का सुख रत्ती भर दिया भी, तो तुरंत ही खोने का दुःख जन्म-जन्मांतर तक के लिए मेरी झोली में डाल दिया। पर तुम उसे भी इतना ही प्यार दोगे, ये भी जानती हूँ। 
लव यू, मेरा प्यारा बेटू
Missing you...My Sweetu
- प्रीति 'अज्ञात'

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

आज आवाज उठी है, तो कल क़दम भी उठेंगे!

तीन दिन बाद अभी-अभी फेसबुक log in किया और आते ही वही सब तस्वीरें फ़िर सामने हैं जिन्हें देखने भर से  आप उस भीषण पीड़ा को सोच सिहर उठते हो। ऐसे में कुछ अजीबो-ग़रीब पोस्ट मन विचलित कर रहीं हैं जो प्रोफाइल तस्वीर को ब्लैक रखने वालों के विरुद्ध लिखी गई हैं। हद है! यह भी कोई मुद्दा है??
अपनी प्रोफाइल में तस्वीर के स्थान पर काला रंग रखें या मोमबत्तियाँ, मैं इनके समर्थन में न भी रहूँ पर विरोधी तो क़तई नहीं हूँ। संवेदनाएँ व्यक्त करने, दुःख जताने का सबका अपना तरीक़ा होता है, इसकी खिल्ली उड़ाना भी स्त्री-भावना का अपमान ही होगा। अपनी चौखट से ही सही, पर कम-से-कम वह साथ तो खड़ी है! आख़िर कितने लोग हैं जो घर-बार छोड़कर धरने पर बैठ सकते हैं?
जो इसे दिखावा कह रहे हैं, क्या वे बीते दिनों में एक बार भी हँसे नहीं? भूखे रहे? अपने नियमित कामकाज छोड़ बैठे रहे?
सच बात तो यह है कि इस असहनीय और इस जैसी कई घटनाओं के बाद भी सबकी दिनचर्या सामान्य ही चल रही है। यही नियति है हम सबकी। 

वो जो विरोध के साथ अपने व्यक्तिगत जीवन के कुछ पल साझा कर रहीं हैं आप चाहें तो उनकी ख़ुशी में ख़ुश हो सकते हैं। आप उनकी ईमानदारी के क़ायल भी हो सकते हैं कि वे जो हैं, वही दर्शा भी रहीं! 
भारतीय गृहिणियाँ, घटनाओं के विरोध में अपनी आवाज उठा पा रहीं हैं, यह भी कोई कम तसल्ली की बात नहीं! इंतज़ार कीजिए, अब वो समय भी दूर नहीं जब ये बाहर निकल अपनी समस्याओं से निबटना भी स्वयं सीख जाएँगीं और अपराधियों को सबक़ देना भी!
आज आवाज उठी है, तो कल क़दम भी उठेंगे!

अच्छी सोच वाले और स्त्री को इंसान समझने वाले पुरुषों की भी कोई कमी नहीं और वे इस मुद्दे पर खुलकर बोल भी रहे हैं। इन काली डीपियों को देखकर यह जरूर सोचती हूँ कि कितना अच्छा होता ग़र यह विरोध उन पुरुषों द्वारा किया जाता! जो किसी भी विषय पर बोलने से बचते रहे हैं, वे अपना पक्ष स्पष्ट करने का कोई तो सशक्त माध्यम चुनें!

इधर एक ख़बर पढ़ने में आई कि किसी गाँव में पंचायत के निर्णय का पालन करते हुए वहाँ की लड़कियाँ न मोबाइल रख सकती हैं और न स्कर्ट पहन सकती हैं! बात तो तब होती जब सरपंच महोदय पुरुषों के मोबाइल रखने पर पाबंदी लगाते, उन्हें घर से बाहर निकलने की मनाही करते पर वे ऐसा क्यों करते! उन्हें भी ख़ूब पता है कि पुरुष तो जन्म से ही......    
मैं उन अपराधियों के घरों का भी सोच रही हूँ जो पुलिस के शिकंजे से बाहर हैं। कैसे उनके परिवार के लोग उन्हें बर्दाश्त कर पा रहे होंगे? खाना बनाते समय उनकी बीवियाँ क्या सोचती होंगी? उनकी माँ और बहिन क्या उनकी सलामती की दुआ अब भी माँगती होंगी और ईश्वर न करे! पर यदि उनके घर में कोई बेटी है तो उसे नींद कैसे आती होगी? क्या वो भय से चीखने- चिल्लाने न लग जाती होगी? ख़तरा तो इन्हें भी अब महसूस होता होगा। क्या पता कितनी पीड़ा के ये स्वयं साक्षी रहे हों! आख़िर ये लोग अपने-अपने घरों के अपराधी का पेट भरने के बजाय उसे स्वयं ही मौत के घाट क्यों नहीं उतार देते??? 
- प्रीति 'अज्ञात'

मोमबत्तियों की उजास क्या इस स्याह अँधेरे को रोशन कर पाएगी?

निर्भया,आयलान, आसिफ़ा और इन जैसे तमाम मासूम, निर्दोषों की दर्दनाक चीखें यहाँ की आबोहवा में बस गई हैं. स्वयं को दोषी ठहराती हवाएँ भारी शर्मिंदगी और गुस्से से गर्म हैं. सूरज की आँखें लाल हो दहक रही हैं. ये प्रकृति, ये हरे-भरे वृक्ष भी मुँह झुकाए, उदास चुपचाप खड़े हैं. कुछ डालियों ने सहमकर, नन्ही कोपलों को आहिस्ता से भीतर खींच लिया है और पल्लवित होने को बेताब कलियाँ स्वत: ही सूखकर इस माटी की गोदी में समा गई हैं. पहाड़ निःशब्द, स्तब्ध हैं और आसमां समंदर में अपना मुँह छुपाए बिलख-बिलख भीग रहा है. पक्षियों की चहचहाहट में अपने मनुष्य न हो पाने का उल्लास है या कि कुछ न कर पाने की बेबसी, स्पष्टत: कह नहीं सकती पर पशुओं को अब स्वयं के सभ्य होने का पूरा यक़ीन हो चला है.

मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा! वह धर्म और राजनीति की आड़ में अपनी हवस को बुझाने का रास्ता ढूँढ ही निकालता है. दानवी तर्क़, राजनीति को न्यायसंगत और लुभावने लगते हैं क्योंकि तिरंगे का स्थान दो अलग-अलग रंगों ने ले लिया है. साहस, बलिदान, सम्पन्नता और हरियाली से भरे इन दोनों रंगों ने मिलकर एकता के प्रतीक हमारे प्रिय राष्ट्रध्वज की ख़ूबसूरती को नष्ट कर एक स्याह काला रंग ओढ़ा दिया है, जिसमें घृणा है, ईर्ष्या है, द्वेष है. अब देश इन्हीं दो रंगों की पिचकारियों से ख़ून और बदले की होली खेलने लगा है. एक श्वेत रंग जो शांति का प्रतीक हुआ करता था, अब भी छटपटा रहा है. दशकों से उसकी पताका दूर-दूर तक भी देखने को नहीं मिल सकी है और अब यह केवल पुस्तकों, तस्वीरों, नम आँखों में छुपी दुआओं और सहमी, भयभीत चुप्पियों में नज़र आता है! अथाह वेदना से भरा हर ह्रदय यही कह रहा है कि बस! अब बस भी करो! अब और सुनने, देखने की शक्ति शेष नहीं रही! नींद, अब ख़्वाब हो गई है। बेचैनी, घबराहट और दुःख से उपजा अवसाद लीलने को आतुर है.

मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अँधेरे को रोशन कर पाएगी? ये पोस्टर, ये नारे, ये क्रांति क्या सुन्न हुए मस्तिष्कों पर अपना असर छोड़ पाएँगे? क्या हर अपराध के बाद प्रजा को राजा से यूँ ही न्याय की गुहार लगानी होगी? क्या प्रजा की प्रसन्नता और सम्पन्नता, राजा और उसके दरबारियों का उत्तरदायित्व नहीं? न्याय तंत्र का काम न्याय करना है या उसकी पुकार करते लोगों की प्रतीक्षा करना?...कि आप चीखें, तो हम सुनने का प्रयास करें?

इधर गलियारों में राजनीति की तरीदार, महक़ती हांडी चढ़ चुकी है, संवेदनाओं की मीठी खीर अक्षयपात्र से गिरने को है. मौक़े की गरमागरम क़रारी रोटियाँ दोनों तरफ से सेकी जा रहीं हैं. शब्द, नमक की तरह सुविधानुसार हैं. आओ, स्वाद लें इस शुद्धिकरण भोज का! महकते गुलाबी कागज़ों में लिपटे सांत्वना के फूल भी बस आते ही होंगे!

मानवता आज भी किसी जीवित लाश की तरह बेसुध, औंधे मुँह उदास  पड़ी है!
हो सके, तो इसे अपने-अपने घरों में ज़िंदा रखें कि आने वाली पीढ़ियों को मनुष्यता गाली न लगे!
- प्रीति 'अज्ञात'
## iChowk में प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/society/candle-light-march-for-gang-rapes-are-worthless/story/1/10557.html

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

बस,बहुत हुआ!!

मस्तिष्क की सारी नसें फटने लगती हैं, मुट्ठियाँ भिंचती हैं, कलेजा मुँह को आता है. अपना ही सिर दीवार से मार फोड़ देने का मन करता है कि आख़िर हम इस देश में क्यों रह रहे हैं? किसलिए रह रहे हैं? आख़िर कब तक सुनें कि सब ठीक हो जाएगा? कब तक हम अपने आप को घरों में क़ैद सहमे बैठे रहें कि बाहर भेड़ियों की फ़ौज है? उन आवारा जानवरों को अंदर क्यों नहीं किया जाता? उन राक्षसों को गोलियों से भून देने में तुम्हारे हाथ क्यों कांपते हैं जो ऐसा जघन्य कृत्य बार-बार लगातार करते रहने में भी आनंद प्राप्त करते हैं?? क्या इंसानियत की क़ीमत एक वोट भर रह गई है? जिसके एवज़ में तुम अपनी संस्कृति, सभ्यता और बची-खुची मानवता की भी बोली लगाने से नहीं चूकते??

हाँ, हम सहिष्णु बने रहें... देशभक्त कहलाए जाने की यह पहली शर्त है.
आप गाय बचाएँ क्योंकि वो आपकी माता है लेकिन सामने खड़ी स्त्री का चीरहरण देखते रहें, उसकी लाश को धर्म और राजनीति के कैमरे से क़ैद करें, बेचें, भुनाएँ! कहानियाँ बना दें! आपकी कौन लगती है भला!
आप तो विलुप्त होती प्रजातियों को बचाएँ, उनके संरक्षण की डींगें भरें, 'मेरा भारत महान' बोल स्त्रियों को देवीतुल्य मानने का ड्रामा करें लेकिन उसी हिरणी-सी चंचलता लिए एक मासूम बच्ची की आत्मा तक को कुचल-कुचलकर आग में झोंक दें. क्या जरुरत है उसे बचाने की!!! बहुतायत में जो है!!!
किसी की भी सरकार रही हो, बलात्कारियों और दरिंदों को बचाने में सत्ता हमेशा सफ़ल रही है. बल्कि ऐसे लोगों के क़दमों में लोटती नज़र आई है. यही तो वो लोग हैं जो हथियारों के दम पर इनका वोट बैंक का खाली कटोरा भरवाते हैं.
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' कहने में ही अच्छा भर है, असलियत में हम उस राक्षसी, असुर युग में रह रहे हैं जहाँ अपराध, हत्या और .. छी शर्म भी नहीं आती तुम जैसों को तो! स्त्रियों को पूजा की कोई अभिलाषा नहीं, बस उसे इंसान समझ लो, इतना ही काफ़ी है.

अब वह दिन दूर नहीं जब हर घर में एक फूलन देवी पैदा होगी और एक झटके में तुम सबको ख़त्म कर देगी. तुम सब इसी लायक हो कि तुम्हें घसीटकर सड़क पर लाया जाए, जनता तुम पर लात-घूंसे बरसाए और उसके बाद तुन्हें ज़िंदा जला दिया जाए! तुम्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, न्याय को अपनी जेब में रखकर घूमते हो, जब चाहे जिसे उठवा सकते हो तो अब डरो! लड़कियों से डरो! अब तुम्हारी शल्य-क्रिया के लिए इनकी सेना तैयारी पर है! ध्यान रखना तुम जैसे लोगोंका खात्मा होगा अब और गर भूल जाओ तो सारी देवियों की तस्वीरें याद कर लेना!
- प्रीति 'अज्ञात'

https://www.youtube.com/watch?v=o_m8AQ2c2bY&t=1s

गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक बिहारी सबपे भारी

मेरी मित्रता-सूची में सबसे अधिक संख्या में यदि कोई राज्य नज़र आता है तो वो है बिहार/ झारखंड। पता नहीं, यह महज़ संयोग है या कि यहाँ के लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय हैं।
जहाँ हर तरफ़ इस राज्य (मैं अब भी दोनों को एक ही मानती हूँ) को लेकर नकारात्मकता फैली हुई है, वहीं मैं न केवल इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए ही प्रसन्न होती हूँ बल्कि इसे बौद्धिकता और साहित्य के प्रति अगाध प्रेम से पटा हुआ भी पाती हूँ। यहाँ के पठन-पाठन में रुचि रखने वाले लोग जमकर लिखते हैं और अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के खुलकर कहने में जरा भी नहीं झिझकते। ये अच्छे मित्र हैं, मिलनसार हैं, बातूनी हैं, मस्तीखोर हैं, आशिकमिजाज़ हैं, बिंदास हैं। लेकिन अगर आपकी बात नहीं जँची या फिर आपने कोई बेफिज़ूल बात कह दी तो आवश्यकतानुसार ये दादागिरी पर उतर आने  में भी नहीं चूकते। अभी-अभी ही कुछ मित्रों को याद कर 'दादागिरी' को मैंने 'लड़ाकू और अकडू' के सम्मिश्रण के अर्थ में लेने की गुस्ताख़ी कर दी है।

आज देश भर में त्यौहारों की चमक भले ही धूमिल पड़ती जा रही है,  लेकिन यहाँ के लोगों के भीतर का उत्साह अब भी जीवित है। बल्कि बिहार, उन इक्का दुक्का राज्यों की श्रेणी में आता है जहाँ आज भी उत्सवों को धूमधाम, पारंपरिक तरीक़े और पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कम-से-कम मुझे तो यही महसूस होता है। 

इस राज्य के साथ जब हम ग़रीबी, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध, अन्याय और विकृत शिक्षा प्रणाली की बात करते हैं तब हम उस लचर और बेलगाम तंत्र व्यवस्था की चर्चा करना भूल जाते हैं जिसके सुधार के बिना इन समस्याओं से मुक्ति पाना असंभव है। पर यह मात्र बिहार ही नहीं, शेष राज्यों में भी इतना ही विकराल रूप धारण किए उपस्थित हैं। हाँ, बिहारी इन बातों को लेकर अत्यधिक भावुक एवं संवेदनशील हो जाते हैं..यहाँ उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण और आत्मशोधन की आवश्यकता है। 
अपनी जन्मभूमि से स्नेह होना स्वाभाविक है, होना ही चाहिए! तभी तो 
हमें नालंदा पर गर्व है, बुद्ध पर अभिमान है, देश को सर्वाधिक प्रशासनिक सेवा अधिकारी देने की प्रसन्नता है, जमीन से जुड़े रहने की ज़िद है पर यदि हमारी कमी को लेकर कोई कुछ इंगित करता है तो उसे सहज स्वीकार कर बदल देने का जुझारूपन भी और बढ़ाना होगा। किसी बहस में उलझने से कहीं ज्यादा प्रयास करने होंगे कि हमारे राज्य की तस्वीर और भी ख़ूबसूरत बने। अंततः हैं तो हम भारतीय ही। देश का हर कोना हमारा अपना ही तो घर है।

आज जबकि मैं यह लिख रही हूँ तो मेरी मित्रता सूची के तमाम प्यारे चेहरे मेरी आँखों में तैर रहे हैं। वे शानदार लेखक, लेखिका, संपादक, पत्रकार, अध्यापक, समाज सेवी, व्यापारी, सरकारी नौकरी में सेवारत और लगभग हर व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़े हैं। सबकी अपनी विशिष्ट    पहचान है। इन सबमें अगर कोई बात कॉमन है तो वो है इनका साहित्य के प्रति मोह, अधिकाधिक एवं अच्छा पढ़ने की लालसा और भीड़ में एक अलग पहचान बनाने की अदम्य इच्छाशक्ति।

मैं आप सबको 'बिहार दिवस' पर ख़ूब शुभकामनाएँ और बधाई देती हूँ कि आप अपने राज्य के साथ हम सबको गौरवान्वित करें। मित्रता-सूची में जुड़े होने का शुक्रिया भी क़बूल कीजिए। कई लोग हैं जिनके नाम मैं लेना चाहती हूँ पर संभव है कि इस प्रक्रिया में कई नाम रह भी जाएँ। 
वैसे भी आप लोग कहते हैं न कि 'एक बिहारी सबपे भारी' तो इस बात पर गौर फरमाते हुए और अपने-आप को भावी दुविधा से सुरक्षित रखने  हेतु मैं किसी को टैग न करना ही उचित समझती हूँ।
और हाँ, सुनिए... यदि बिहार देश के गले का हार है तो आप उस हार के गुलाब और गुलाबो हैं। इसी बात पर दिल करे तो दो गुलाबजामुन खा लीजिएगा। 
शेष शुभ ही शुभ है। 
पर सबसे मज़ेदार बात ये है कि हम आज तक बिहार ही न गए। :D 
- प्रीति 'अज्ञात'