बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

बापू और शास्त्री जी बार-बार जन्म नहीं लेते!

आज जबकि सम्पूर्ण देश महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती को धूमधाम से मनाने की तैयारियों में लगा है, ऐसे में धोती, लाठी और चश्मे से अपनी पहचान बनाने वाले हमारे सादगी पसंद बापू न जाने क्या प्रतिक्रिया देते! संभवतः वे सबके स्नेह और भावनाओं का आदर करते हुए उनके सिर पर प्यार भरा हाथ फेरते और मुस्कुराते हुए कहते, "ये पैसा गरीबों के काम भी तो आ सकता था न!"बापू को जब भी सोचा तो वही स्मित मुस्कान लिए प्रिय दादू- सा कोई चेहरा दिखाई दिया जो सदैव सही राह पर चलना सिखाता है। जिसके पास प्रत्येक समस्या का समाधान है और वो भी बिना मारपीट के समर्थन के! जिसका निश्छल, शांत स्वभाव और शालीन भाषा ऐसे अपनेपन में बाँध लेती है कि पल भर को भी यह महसूस नहीं होता कि ये दुनिया के सबसे महान व्यक्ति हैं।

'राष्ट्रपिता' कोई यूँ ही नहीं बन जाता, संस्कारों को लहू के साथ घोल एक पूरा जीवन जीना होता है। सबका सम्मान करना, किसी को भी नीचा न दिखाना, विरोधियों को धैर्यपूर्वक सुनना और सहजता से उनकी हर जिज्ञासा को शांत करना भी इसके अपरिहार्य गुण हैं। जो वास्तविक 'शान्तिदूत' होते हैं वे इसकी चर्चा करने से कहीं अधिक इसे स्वयं के जीवन में ढाल एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जो स्वच्छता की बात करते हैं वे अपने परिसर को स्वच्छ बनाए रखने में पूरा योगदान देते हैं। तात्पर्य यह कि आत्मस्तुति से कोसों दूर रहने वाले, अपने जीवन से जग को प्रकाशवान करने वाले, सच्चाई के मसीहा और हम सबके बापू ने अपने आप को 'महात्मा' सिद्ध करने का प्रयास कभी नहीं किया लेकिन फिर भी वे दुनिया भर में 'महात्मा गाँधी' कहलाए। विश्वशांति के लिए एवं भारत के सही मायनों में उत्थान के लिए गाँधी आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि 'गाँधी' जी व्यक्ति भर ही नहीं बल्कि समग्र विचारधारा है।

एक समय था जब गाँधी जी, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का आह्वान करते और पूरा देश उनके साथ खड़ा हो जाता था। अब वही भीड़ हत्याओं का सामूहिक उत्सव मनाती है। बात श्रीराम के नाम से विमुख हो 'हे राम!' तक पहुँच चुकी है।  
आज अगर गाँधी जी होते तो देश में विज्ञान और तकनीक के विकास को देख एक क्षण को मंत्रमुग्ध भले ही हो जाते लेकिन उन्हें यह देख अत्यधिक दुःख एवं पीड़ा अवश्य होती कि सबको शिक्षा, बराबरी का अधिकार, ग़रीबी, बेरोज़गारी,अस्पृश्यता, भेदभाव से मुक्ति इत्यादि जिन-जिन मुद्दों के लिए वे उम्रभर संघर्ष करते रहे वे सब आज भी जस-के-तस मुँह बाए खड़े हैं। भौतिक विकास जितना हुआ उससे कहीं अधिक मानसिक एवं नैतिक ह्रास हो चुका है। 

गाँधी जी जिन सिद्धांतों पर चलने की बात करते थे, उस पर अभी भी कुछ लोग टिके हुए हैं। वे गाँधी जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। वे एक थप्पड़ के बाद दूसरा गाल भले ही आगे न करें, पर अपशब्द एवं हिंसा का प्रयोग नहीं करते एवं अपने सत्य के साथ अडिग खड़े रहते हैं। यही 'गाँधीगिरी' है जो अब यदाकदा ही देखने को मिलती है। जब गाँधी जी के हत्यारे के समर्थक राजनीति में प्रवेश करने लगें तो लोगों की गिरती मानसिकता और कुत्सित सोच समझने के लिए किसी अन्य जीवंत प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती है! दुर्भाग्य से उस समय ऐसा महसूस होता है कि अब सत्य और अहिंसा की विदाई का समय आ गया है. गाँधी जी यदि आज जीवित होते तो वे स्वयं ही आगे बढ़कर इन विजेताओं को बधाई देते और इस देश से चले जाते! 

गाँधी जी जिस सच के साथ खड़े होने का हौसला युवाओं में भरते रहे, आज वही सच बोलने में लोग लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि 'सच' को जेल जाते और 'झूठ' को ईनाम पाते सबने देखा है। बापू का वो भारत जहाँ सर्वधर्मसमभाव सबके ह्रदय में था, जहाँ सब बराबर थे, सबको जीने का हक़ था और जहाँ बुराई के रावण का दहन होता आया है। जहाँ  सत्य और अहिंसा को ही हथियार मान पूजा जाता है...उस भारत की तस्वीर में वो पहले सा नूर अभी नहीं दिखता पर इनसे सच्चे भारतीयों का हौसला टूट जाए, ऐसा भी नहीं! क्योंकि प्रिय बापू ने कहा था -
"जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।"
"मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार रहूँ।"
"आप मानवता में विश्वास मत खोइए। मानवता सागर की तरह है; अगर सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो सागर गन्दा नहीं हो जाता।"
गाँधी जी सशरीर तो नहीं रहे पर हम सबके भीतर वे सदैव कहीं-न-कहीं जीवित बने रहें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

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स्वतंत्रता पूर्व का किस्सा है।* "स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय जी ने 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाना था। आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री जी भी शामिल थे। उनको घरखर्च के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए प्रतिमाह दिए जाते थे। जब वे जेल में थे तो वहाँ से एक उन्होंने पत्र में अपनी पत्नी को पूछा कि क्या उन्हें ये रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घरखर्च के लिए पर्याप्त हैं? ललिता जी ने उत्तर दिया कि यह धनराशि उनके लिए पर्याप्त है क्योंकि वे तो केवल 40 रुपये ही ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बच जाते हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत 'सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी' को पत्र लिखकर सूचित किया कि उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में चल रहा है अतः उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और शेष 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएँ।"

ऐसे थे, देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर विराजमान, अत्यंत सरल स्वभाव एवं ईमानदार छवि वाले सर्वप्रिय शास्त्री जी। भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी, महात्मा गाँधी के विचारों तथा जीवनशैली से अत्यंत प्रभावित थे। 'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले शास्त्री जी के विचार एवं जीवनशैली देशवासियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं।
वे कहा करते थे,
''जो शासन करते हैं उन्‍हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर  किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। अंतत: जनता ही मुखिया होती है।''
उनका यह विचार आज भी कितना प्रासंगिक हैं -
'देश की तरक्की के लिए हमे आपस में लड़ने की बजाय गरीबी, बीमारी और अज्ञानता से लड़ना होगा।''

बापू और शास्त्री जी बार-बार जन्म नहीं लेते! सादर नमन
#महात्मा गाँधी #बापू #राष्ट्रपिता #लाल बहादुर शास्त्री जी
* शास्त्री जी का प्रसंग गूगल से साभार 

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

समय की क़ीमत #Indian_Time

हमें ट्रेन पकड़नी होती है तो आधे घंटे पहले स्टेशन पहुँच जाते हैं। फ्लाइट हो तो दो-तीन घंटे पहले। मूवी देखने जाना हो तो भी पॉपकॉर्न खरीदकर बैठने की गुंजाइश तो रखते ही हैं। कहीं SALE हो तो स्टोर खुलने के आधे घंटे पहले पहुँच जाना अपना फ़र्ज़ समझते हैं। रात 12 बजे यदि नया फ़ोन launch हो रहा हो तो 11.45 से ही log in करके तैयार बैठते हैं लेकिन कहीं जाना हो, किसी को समय दिया हो, कोई कार्यक्रम हो तो एकाध घंटे की देरी को तो कोई गिनता ही नहीं! कार्ड में जो भी नियत समय दिया गया हो, हम अपने दिमाग़ में उसे आधे घंटे खिसकाकर ही सामान्य महसूस कर पाते हैं।

नीचे सौ वर्ष से भी कहीं अधिक पुराना किस्सा साझा कर रही हूँ (यद्यपि यह किस्सा स्वावलम्बन पर है) ...तब और अब में इतनी प्रगति अवश्य हो गई कि अब देर से पहुँचने को 'Indian Time' कहा जाने लगा है। कुछ लोग इस बात पर भी गर्व कर अपनी पीठ थपथपा खींसे निपोरना नहीं भूलते। खीजने वाले खीजते रहें, समय पर पहुँच जाने का शोक़ मनायें या मोबाइल-मोबाइल खेलें! WHO CARES! 
- प्रीति 'अज्ञात'
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* एक बार ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को इंग्लैंड में एक सभा की अध्यक्षता करनी थी। उनके बारे में यह मशहूर था कि उनका प्रत्येक कार्य घड़ी की सुई के साथ पूर्ण होता है अर्थात् वे समय के बहुत पाबंद थे। वे लोगों से भी यही अपेक्षा रखते थे कि वे अपना कार्य समय पर करें। विद्यासागर जी जब निश्चित समय पर सभा भवन पहुँचे तो उन्होंने देखा कि लोग सभा भवन के बाहर घूम रहे हैं और कोई भी अंदर नहीं बैठा है। जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि सफाई कर्मचारियों के न आने के कारण अभी भवन की सफाई नहीं हुई है। यह सुनते ही विद्यासागर जी ने एक क्षण भी बिना गंवाए झाड़ू उठा ली और सफाई कार्य प्रारम्भ कर दिया। उन्हें ऐसा करते देख उपस्थित लोगों ने भी कार्य शुरू कर दिया। देखते ही देखते सभा भवन की सफाई हो गई और सारा फ़र्नीचर यथास्थान लगा दिया गया। जब सभा आरंभ हुई तो ईश्वर चन्द्र विद्यासागर बोले- "कोई व्यक्ति हो अथवा राष्ट्र, उसे स्वावलंबी होना चाहिए। अभी आप लोगों ने देखा कि एक-दो व्यक्तियों के न आने से हम सभी परेशान हो रहे थे। संभव है कि उन व्यक्तियों तक इस कार्य की सूचना न पहुँची हो या फिर किसी दिक्कत के कारण वे यहाँ न पहुँच सके हों। क्या ऐसी दशा में आज का कार्यक्रम स्थगित कर दिया जाता? यदि ऐसा होता तो कितने व्यक्तियों का आज का श्रम और समय व्यर्थ हो जाता।" सार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वावलंबी होना चाहिए और वक्त पड़ने पर किसी भी कार्य को करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
#ईश्वर_चन्द्र_विद्यासागर
*प्रसंग भारतकोश से साभार 

शनिवार, 7 सितंबर 2019

चंद्रयान-2 से उपजे चार भाव

चंद्रयान-2 से उपजे चार भाव 

दुःख - मंज़िलों पे आके लुटते हैं दिलों के कारवाँ
        कश्तियाँ साहिल पे अक्सर, डूबती हैं प्यार की
चाँद की धरती पर क़दम रखते-रखते अचानक ही सम्पर्क टूट जाने की जो असीम पीड़ा है उसे शब्दों में बयान कर पाना संभव नहीं! पूरा भारत इस मिशन की सफ़लता के पल का साक्षी बनने की उम्मीद लिए रतजगे पर था. समस्त देशवासी इस गौरवशाली समय को अपनी मुट्ठी में बाँध लेना चाहते थे. वे आह्लादित थे कि आने वाली पीढ़ियों को बता सकें कि "जब हमारा प्रज्ञान चाँद पर चहलक़दमी करने उतरा तो हमने उस अद्भुत क्षण को अपनी आँखों से देखा था." #ISRO के अथक परिश्रम एवं प्रतिभा पर पूरे देश को गर्व है और हमेशा रहेगा. जो अभी नहीं हुआ वो कभी तो होगा ही, इस तथ्य से भी हम भली-भाँति परिचित हैं. पूरे स्नेह और धन्यवाद के साथ हमारी शुभकामनाएँ, हमारे वैज्ञानिकों के साथ हैं. उन्हें उनके अब तक के प्रयासों और सफलताओं के लिए हार्दिक बधाई. विज्ञान की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यही है कि वह हार नहीं मानता और सफ़ल होने तक अपनी कोशिशें निरंतर जारी रखता है.

संबल - यूँ तो किसी भी बड़े तनावपूर्ण मिशन के समय राजनेताओं, प्रधानमंत्री या अन्य क्षेत्रों के प्रमुख की उपस्थिति व्यवधान की तरह ही होती है क्योंकि फिर न केवल सबका ध्यान उस ओर भी थोड़ा बँट जाता है बल्कि एक अतिरिक्त दबाव भी महसूस होने लगता है.
वैज्ञानिक,असफ़लताओं के आगे कभी घुटने नहीं टेकते और न ही कभी टूटते ही हैं. एक अनदेखे-अनजाने लक्ष्य की ओर बढ़ना उन्हें यही अभ्यास कराता है. सतत प्रयास करना और निरंतर जूझना....यही विज्ञान की परिभाषा भी है. इसलिए डॉ. सिवान के आँसू आश्चर्यजनक नहीं बल्कि उनकी टीम द्वारा सच्चे दिल से किये गए अथाह परिश्रम और परिणाम से उपजी पीड़ा का प्रतीक हैं. वैज्ञानिकता को इतर रख यह एक मानव की सहज प्रतिक्रिया है जो अपनी वर्षों की मेहनत पर पानी फिरते देख टूट भी सकता है! इस बार जब निराशा भरे पलों में प्रधानमंत्री जी ने इसरो प्रमुख डॉ. सिवान को गले लग ढाँढस बँधाया तो सबका मन भीतर तक भीग गया होगा. प्रायः मौन अभिव्यक्ति की ऐसी तस्वीर कम ही देखने को मिलती है. जब उदासी का घनघोर अँधेरा छाया हो तो एक ऐसी झप्पी संजीवनी बन महक़ उठती है. 

आक्रोश - हर बार की तरह इस बार भी मीडिया ने पहले से ही जय-जयकार शुरू कर दी. यहाँ तक कि अन्य देशों का उपहास उड़ाने से भी नहीं चूके! यही विश्व-कप के समय भी होता आया है. मीडिया का काम जानकारी देना है, आवश्यक सूचनाओं को जनमानस तक उसी रूप में पहुँचाना है, जैसी वे हैं.  लेकिन यहाँ तो हर बात को उछाल-उछालकर इतना बड़ा बना दिया जाता है कि हर तरफ यज्ञ-हवन, पाठपूजा का दौर प्रारम्भ हो जाता है. खुशियों की दीवाली मनाई जाने लगती है. आप घटना के पल-पल की खबर दीजिये पर परिणाम तक पहुँचने की जल्दबाज़ी मत कीजिये. यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि तमाम अंधविश्वासों के बाद भी भले ही नतीज़ा सकारात्मक न आये पर पाखंडियों का व्यवसाय फिर भी जारी रहता है. इन पाखण्डों से मुक्ति का भी एक अभियान चलाया जाना चाहिए. 

उम्मीद मुझे तो अभी भी लग रहा कि एक दिन मेले में खोए हुए किसी बच्चे के मिलने की उद्घोषणा की तरह हमारे #ISRO के पास भी इस सन्देश के साथ सिग्नल आयेंगे कि "6 सितम्बर देर रात (7 की सुबह) चाँद की सबसे ऊँची पहाड़ी के पीछे रात के घुप्प अँधेरे में कोई प्रज्ञान बाबू टहलते पाए गए. उन्होंने पीले-कत्थई रंग की शर्ट और स्लेटी कलर के जूते पहन रखे हैं. पूछे जाने पर अपने पिता का नाम विक्रम और माँ पृथ्वी को बताते हैं. इनका अपने परिजनों से सम्पर्क टूट चुका है. जिस किसी का भी हो कृपया चाँदमहल के पास बनी पुलिस चौकी से आकर ले जाए. ये बच्चा कुछ भी खा-पी नहीं रहा है." 

देखना, एक दिन ये सम्पर्क जरूर होगा! सलाम, #इसरो ....हमें आप पर बेहद गर्व है!
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 19 अगस्त 2019

#विश्व_फोटोग्राफी_दिवस #लघुकथा #कैमरा

एक मासूम व्यथा 
पढ़ें, कैमरे से लघुकथा 



उठो, मम्मा 
भूख लग रही 😔




कान में बोलकर देखता हूँ. 😜
मम्मा तो नहीं उठ रहीं रे! 😟
पापा, भैया, दीदी सब आओ न जल्दी से! 😦

अरे! क्या हुआ बेटा! जरा आँख लग गई थी. 😮
कुछ नहीं! अब ठीक है! 😍😄

...और इस तरह बच्चों को चैन मिला! 😥😂😎


#WorldPhotographyDay #विश्व_फोटोग्राफी_दिवस
कॉपीराइट © प्रीति 'अज्ञात'  

सोमवार, 12 अगस्त 2019

योगा कैसे होगा जी!

बात उन दिनों की है जब हम भी आम जनता की तरह आसानी से बेवकूफ़ बनने के असाध्य रोग से पीड़ित थे (वैसे बनते अब भी हैं, बस थोड़ा टाइम लगता है) और उस पर महंगाई की तरह बहुगुणित होता मोटापा! हाय,अल्लाह! ये मुआ मोटापा भी क्या-क्या न करवाए! हर जगह मुश्क़िलों से घिरे हम लेडी देवदास वाला चेहरा लिए घूमते थे। जीन्स पहनना अब बोझिल हो चला था, कपड़े छोटे हो गए थे (ऐसा बोला जाता है पर एक्चुअली तो हम ही मोटे थे न!) खाना-पीना भी कभी छूटता और कभी हम स्वाद कलिकाओं की मनुहार पर झट से झपट लिया करते थे। मित्र-मंडली और परिवार के सदस्य ढांढस बंधाने को झूठ ही कह देते, "अरे, मोटी कहाँ! खाते- पीते घर की लगती हो!" अब हम ही जानते हैं कि उनकी आँखों का सच उन्हें "छुपाना भी नहीं आता...जताना भी नहीं आता!" (बाज़ीगर और विनोद राठौर याद आए न!) अब अपनों की आँखें तो मुँह फेरकर भी पढ़ी जा सकती हैं, सो अपन का सच तो अपन जानते ही थे। 
वो तो भला हो बाबा रामदेव जी का कि उनकी कृपा से अनुलोम विलोम और कपाल भाति सीख लिए हैं। आप सब तो जानते ही हैं कि भय के समय हनुमान चालीसा और फोटू खिंचाते समय प्राणायाम की बड़ी जोर वाली जरुरत पड़ती है। हम भी अपने बगल वाले गोलुओं को ये प्रक्रिया समझा देते हैं। सब जैसे-तैसे 'पनीर' या 'श्री' बोल पेट को अन्दर खींचते हुए होठों पर डेढ़ इंची मुस्कान भले ही बिखेर लेते हों पर भीतर-ही-भीतर श्वांसों का जो त्राहिमाम मचता है उसकी अलग दर्द भरी कहानी है! वो तो अच्छा है कि प्रश्वांस के समय कार्बन डाई ऑक्साइड निकलती है....कहीं हाइड्रोजन निकलती तो वायुमंडलीय ऑक्सीजन से मिलकर सब किये कराये पर पानी फेर देती! ख़ुदा क़सम! क्लिक होते ही रुकी सांसों का ऐसा जलजला बाहर निकलता है कि सामने अगर पाकिस्तानी सेना खड़ी हो तो पलक झपकते ही उसका सर्वनाश हो जाए!

खैर, ये उन दिनों की बात है, जब हम सब कुछ करके हार चुके थे पर चूंकि जीना चाहते थे इसलिए ठूँसने में कोई कसर बाक़ी न थी। यूँ भी भैया, हम जीने के लिए तो खाते नहीं है! खाने के लिए जीने वाले लोगों की श्रेणी में आकर अलग-सा प्राउड फील करते चले आ रहे हैं। तो ऐसी ही एक सुहानी भोर को हमारी प्रिय सखी ने अचानक बौराते हुए आकर घंटी बजाई और बोली "अरे, जल्दी आ!!" हम सब काम छोड़छाड़ दरवाजे की तरफ सरपट भागे। देखा, तो वो सामने एक थैला लिए खड़ी थी। "अबे! कहाँ जा रही है तू?" हमने दोस्ताना लहज़े में उसके थैले में लगभग घुसते हुए पूछा। 
"ज्यादा बात न कर, चल! एक मशीन आई है उस पर लेटने से सारी बीमारियाँ दूर हो जातीं हैं।"
"हैं!!" मारे प्रसन्नता के हमारी चीख़ निकल गई। चक्षु अपनी कोटरों से बाहर ही लुढ़क पड़े। "वज़न भी कम होता है क्या!" अब उत्सुकता मचल-मचलकर शब्द बन थिरकने लगी थी। 
"और नहीं तो क्या! दो महीने में स्लिम-ट्रिम। उस पर अभी फ्री भी है।"
"फ्री,फ्री,फ्री!" यह शब्द किसी डेली सोप की तरह हमारे कर्णपटल पर तीन बार झनझना हर भारतीय की तरह हमें भी अपार उल्लसित कर गया। अबकी बार हम दोनों गालों पर मिस यूनिवर्स की तरह हाथ रख बड़ी अदा से हँसे। वैसे मन-ही-मन तो "हाय दैया! ऐसा भी होता है!" टाइप के भाव तीव्र गति से हिलकोरे मार रहे थे। 
अब दोस्त से प्रश्न कौन करता है भला! आनन-फ़ानन में चादर लेके चल पड़े। रास्ते भर चहकते हुए गए। उमंगें अपने चरम पर थीं।

कुछ ही मिनट बाद हम उस अद्भुत दुनिया के दरवाजे पर थे जहाँ 'विश्व-सुंदरी' बनने के सपनों की अपनी उड़ान भरनी थी। लेकिन ये क्या! बाहर चप्पलों की टाल लगी थी। इतने लोग??? अंतरात्मा जी ने उत्तर दिया, "बेटा, आप अपनी स्मार्टनेस दिखाने में जरा लेट हो गए हैं।" 
ख़ैर! समझदारी से कोने में जूते छुपाकर कक्ष में प्रवेश किया। सामने खड़े एक अकड़ू इंसान से बात हुई जो स्वयं को सुपर हीरो से रत्ती भर भी कम नहीं समझ रहा था। उस पर घुन्नू जैसा चेहरा बनाकर बोला, "बैठिये...वेटिंग है चालीस मिनट लगेंगे।"
यूँ तो लोग रेस्टॉरेंट में इतना वेट भी कर लिया करते हैं पर हमें ये बात अखर गई। "चालीस!!! इतनी देर में तो घर के सौ काम निबटा लेती। भैया, चालीस मिनट बाद आयें क्या?" 
"नहीं! फिर दोबारा नंबर लगेगा।"
"अच्छा! ठीक है। रुक ही जाते हैं।" कहकर हम चुप हो गए और उचककर पहले कमरे में झाँकने लगे। उन कमबख़्तों ने ऐसा इंतज़ाम किया था कि न सुन सको, न समझ सको। अंदर बैठे लोगों के चेहरे इतने गंभीर जैसे IAS के mains में बैठे हों। 
"पक्का! ये लोग योगा और एक्सरसाइज का ही प्रवचन दे रहे होंगे!" अपनी ये बात सोच हमें ख़ुद ही घबराहट होने लगी। दिल को तसल्ली दी, "नहीं, नहीं! इतना ज़ुलम तो नहीं हो सकता!"

पूरे पचास मिनट बाद प्रवेश की शुभ घड़ी आई तो पता चला कि अभी प्रवचन की बाधा पार करने के बाद ही मशीन दर्शन होंगे। 50-60 लोगों का बैच था। हम लपककर प्रथम पंक्ति में बैठ गए जिससे देखने-सुनने में कोई असुविधा न हो। तभी एक मनुष्य ने कुटिलता के साथ सबको हिक़ारत की दृष्टि से देख मुस्कुराने की ओवरएक्टिंग की। तत्पश्चात उसने श्रोताओं को ज्ञान बाँटना प्रारम्भ किया ...."कि हम भारतीय कितने परले दर्ज़े के मूरख हैं और जापान में ये, जापान में वो।"
जापान से कोई दिक़्क़त नहीं हमें; पर हमारे सामने ही कोई हमें इस क़दर कोसे और हम चुप रहें? तो लानत है हम पर!...हम वहीं भिड़ 
गए कि "आप प्रोडक्ट की बात करें, देश को कोसते हुए बोलने की क्या जरुरत है?" बन्दा बौखला गया और उसी पल से हम परस्पर अघोषित दुश्मन भी हो गए। पहले दिन के हिसाब से ये अठैन थी पर अब जो हो गया सो हो गया!

उन सर जी की बातों को झेलने के बाद अंततः वह पल आया जिसके लिए हम बेक़रार थे। कमरे में एक पलंगनुमा संरचना दिखाई दी, जिसके आसपास कुछ गैजेट्स से लगे थे।  एकदम ICU वाली फ़ीलिंग आ रही थी। हम अपनी चिंता को मन में मारकर शवासन को प्राप्त हुए। धीरे-धीरे तापमान बढ़ने लगा और हम हाय, हाय का जाप कर पसीना-पसीना हो गए। मन किया उसको जाकर बोलें कि "ऐसे ही पतला करना है तो हमको भरी दुपहरिया में सूरज के सामने तार पर लटका दो। इस मशीन की क्या जरुरत थी? या फिर हम खुद ही 48 डिग्री में छत पर जाकर लेट जायेंगे जैसे माँ पापड़ सुखाती हैं।" थोड़ी देर पहले ही उससे बहस हुई थी इसलिए चुप ही रह गए। 
अब तो रोज़ यही क़िस्सा! पूरी सुबह ख़त्म हो जाती और हम " हम होंगे क़ामयाब .O deep in my heart, I do believe.." का mixed version गुनगुना अपनी खीज मिटाते।

दो माह तक ये खेल चलता रहा और वज़न वहीं का वहीं। एक दिन हम थोड़े ज्यादा ही खिसिया गए और सीधे उसी जानी दुश्मन से जाकर प्रश्न किया कि "आख़िर इस मेहनत का फ़ल कब मिलेगा?" उसने जो उत्तर दिया; उसे सुनकर हम पर तो बिज़ली ही गिर पड़ी। बोला, "अरे मैडम! ये तो प्रोडक्ट प्रमोशन के लिए है। डेढ़ लाख की मशीन आती है, ख़रीद लीजिये, समय की बचत होगी। साथ में एक्सरसाइज कीजिये और डाइटिंग भी।"
उधर वो कहता जा रहा था और इधर हमारे सपने बिलख-बिलख हमारे ही पैरों में साँप की तरह लोट हमें डसे जा रहे थे। दिल कह रहा था कि उसका कॉलर खींच के कहें कि फिर झूठ काहे बोला कि "फ़लानी- ढिमकी बीमारी ठीक हो जाती है इससे। फिर याद आया, प्रथम प्रवचन में ही उसने बेवकूफ़ होने की बात नगाड़े की ताल पर की थी।"
हम चुपचाप अपना झोला उठा झुकी नज़रों, भारी मन और लुजलुजे क़दमों के साथ घर की ओर लौट चले। सामने देखा एक माँ अपने बच्चे के कान खींचती हुई कह रही थी, "और जायेगा फ़्री के चक्कर में?" और वो मासूम "नहीं, मम्मी! अब नहीं करूँगा। सॉरी, ग़लती हो गई। मम्मीईई, लगता है।" जाने क्या सोचकर हमारा हाथ, अपने ही कानों को सहलाने लगा।
- © प्रीति 'अज्ञात' 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

#Amul अमूल


प्रिय #अमूल 
सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि आप हम सबके favourite हमेशा से रहे हैं। अब भी इसमें कोई कमी नहीं आई है। 
अब ये बताइये कि ये 'कढ़ाई' दूध क्या होता है और आपकी हिन्दी टीम में कौन-कौन है?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि #'कढ़ाई' का मतलब Embroidery होता है। जैसे - सिंधी कढ़ाई, लख़नवी कढ़ाई, कच्छी वर्क। इसके लिए सुई-धागे और कपड़े की आवश्यकता होती है। 
#'कड़ाही' वह पात्र है जिसमें दूध को ख़ूब औटाकर उसके महकने तक गाढ़ा किया जाता है। पहले लोहे की कड़ाही का ही इस्तेमाल होता था और अब जो हो जाए सो कम है। 
कृपया पैकेजिंग में बदलाव कर दीजिये। Vacancy हो तो हिन्दी टीम में हमें ही रख लीजिए। 
- प्रीति 'अज्ञात'
#अमूल #Amul #Amul_the_taste_of_india

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

विज्ञान अपनी जगह है और मुहब्बत अपनी जगह!

चाँद पर हमारे इसरो के वैज्ञानिकों ने अभूतपूर्व फ़तह का जो झंडा फ़हराया है वो यक़ीनन पूरे देश के लिए गर्व और प्रसन्नता की बात है. हमारा तिरंगा वहाँ लहराने के लिए समस्त देशवासियों की ओर से इसरो की पूरी टीम को बधाई और इन स्वर्णिम पलों का साक्षी बनाने के लिए धन्यवाद भी बनता ही है! यह दिन हमें और आनेवाली पीढ़ियों को सदा गौरवान्वित करता रहेगा.

चाँद के बारे में सोचती हूँ तो न जाने कितनी बातें याद आने लगती हैं. "चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसको ये चकोर!"
पता नहीं, दूसरे देशों में इसे लेकर क्या-क्या कहा गया है! लेकिन हम भारतीयों का तो ये क़रीबी रिश्तेदार ही रहा है. कितना प्यारा अहसास है यह कि "चंदा मामा दूर के, पुए पकाएँ बूर के" वाले हमारे बचपन के प्यारे मामाजी अब दूर के नहीं रहे! अब हम दौड़कर उनकी गोदी में जा बैठे हैं और वो बूढ़ी अम्माँ जो वहाँ बैठ रात-रात भर सूत काता करती हैं; अब उनके बच्चे उनकी देखभाल के लिए वहाँ पहुँच गए हैं कि अम्माँ को इस उम्र में जरा आराम तो मिले. हमारे कितने अपने जो चाँद के आसपास सितारा बन मौजूद हैं, अब ख़ुशी में कैसे जगमगाते होंगे न!

चाँद को लेकर हम भारतीयों की कल्पनायें भी कितनी क़माल की रही हैं. हम अपने-अपने मूड के हिसाब से इससे रिश्ता जोड़ते रहे हैं. जन्म हुआ तो माँ ने अपने लाड़ले को गोदी में उठा गुनगुनाया- "चंदा है तू मेरा सूरज है तू". बचपन में जो मामा थे, युवावस्था की दहलीज़ पर क़दम रखते ही उन पर भी यौवन छा बैठा और अनगिनत गीत बने. 
कभी नायक को अपनी प्रियतमा का चेहरा चाँद सा लगा और वो कह उठा- "चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया-सितारा", तो कभी उसके लजाने के अन्दाज़ को उसने यूँ बयां किया -"चाँद छुपा बादल में, शरमा के मेरी जानां".  कभी उलाहना भी दिया -"ए चाँद, तुझे चाँदनी की क़सम", "चाँद सिफ़ारिश जो करता हमारी", "वो चाँद खिला, वो तारे हँसे".
जब-जब किसी ने कहा, "चाँद के पास जो सितारा है, वो सितारा हसीन लगता है", तो प्रेमियों ने प्रेमिकाओं को चाँद-तारे तोड़ने के ख़ूब वादे किये. एक ने तो यहाँ तक कह दिया- 'चाँद चुरा के लाया हूँ, चल बैठे चर्च के पीछे." हुस्न की तारीफ़ करने में भी ये चाँद ख़ूब काम आया- "चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो", "चाँद सी महबूबा हो मेरी कब, ऐसा मैंने सोचा था", "जून का मौसम मस्त महीना, चाँद सी गोरी एक हसीना", "चाँद मेरा दिल, चाँदनी हो तुम", "ये चाँद सा रोशन चेहरा", "चाँद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना".
किसी ने चाँद के प्रति सजग किया - "चाँद से परदा कीजिये, कहीं चुरा न ले चेहरे का नूर". कभी चाँद को ठहरने की गुजारिश की गई - "धीरे-धीरे चल, चाँद गगन में" तो कभी ये तमाम उदासियों और निराशा भरे पलों का सबब भी बना- "चाँद फिर निकला, मगर तुम न आये", "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला", "ये रात, ये चाँदनी फिर कहाँ" तो कभी इसके सहारे प्रश्न भी पूछे गए- "खोया-खोया चाँद, खुला आसमां...तुमको भी कैसे नींद आएगी".

रक्षाबंधन पर ये चंद्रमा बहिन का स्नेह बन उमड़ पड़ता है -"मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन" तो करवाचौथ पर इसके दर्शन सुहागिनों के व्रत खुलवाते आये हैं. 
ईद के पावन पर्व पर भी ये उल्लास का रूप धर मस्ती से झूमता गाता है -"देखो, देखो, देखो चाँद नज़र आया", "चाँद नजर आ गया,अल्लाह ही अल्लाह छा गया". 

चाँद से हम भारतीयों की मुहब्बत की दास्ताँ बहुत पुरानी है जो इतनी आसानी से जाने वाली नहीं! प्राचीन कवियों से लेकर वर्तमान के ग़ज़लकारों, गीतकारों, चित्रकारों तक चाँद के बिना किसी की बात न बनी! चाँद है तो ख़ूबसूरती है, करवाचौथ का इश्क़ है, ईद का जश्न है. चाँद की इतनी बातें हैं कि लगने लगा है - "आधा है चंद्रमा रात आधी, रह न जाए तेरी-मेरी बात आधी". 
चाँद पर पहुँचकर भी इससे जुड़ी प्रेम कहानियाँ सलामत रहेंगीं क्योंकि विज्ञान अपनी जगह है और मुहब्बत अपनी जगह!
"चलो, दिलदार चलो! चाँद के पार चलो!....हम हैं तैयार चलो!" 
 पार्किंग में से चंद्रयान निकाला जाए! तब तक हम पृथ्वी पर लॉक मारते हैं. :) 
- प्रीति 'अज्ञात'
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