रविवार, 17 जून 2018

भारतीय परिवार और पिता

हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पिता को यदि निर्णय लेने से सम्बंधित सभी अधिकार प्राप्त हैं और वह एक राजा की तरह प्रतीत होते हैं तो वहीं जीविकोपार्जन से लेकर परिवार की हर ख़ुशी के आगे वे अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं और इच्छाओं को कब ताक़ पर रख देते हैं इसका अनुमान स्वयं उन्हें भी नहीं होता होगा! कुल मिलाकर पिता घर का मुखिया भी है और दुखिया भी। वह चाचा चौधरी और साबू दोनों का रोल प्ले करते हैं। मुसीबत के समय वे ही घर के रॉबिनहुड और स्पाइडर मैन भी हैं। सुपर हीरो की तरह हर समस्या का समाधान उनके पास ही होता है। 

हमारे हिन्दुस्तानी परिवारों में लड़कियों को कुकिंग एवं अन्य घरेलू काम सीखने की उपयोगिता बताते समय ये ताना मारा जाता है कि "ससुराल में जाकर हमारी नाक़ मत कटवा दियो" या फिर वो सुप्रसिद्ध पर अजीब सा डायलॉग कि "पति के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है." गोया, पति न हुआ मगध साम्राज्य हो गया जिस पर राज करे और सम्पूर्ण प्रजा (ससुराल पक्ष) का दिल जीते बिना हम चक्रवर्ती नहीं बन सकते! पर ख़ैर, इस तरह की बातें लगभग सबने सुनी ही होंगी। मुद्दा यह है कि असल लानतें तो लड़कों के ही हिस्से में आती हैं। मसलन, "इस निकम्मे से कौन बियाह करेगा?", "सारा दिन मुफ्त की रोटी तुडवा लो बस", "बाप चप्पल घिसता रहे और ये साहबजादे, पलंग पर पड़े टीवी देखें", और सबसे क्लासिक "ख़ुद कमाओगे, तब पता चलेगा!"  

अस्सी के दशक तक पैदा होने वाले सभी लड़के यदि अपना बचपन याद करें तो उसमें आकाशगंगा की तरह उड़ती हुई चप्पल और उससे स्वयं को बचाने का प्रयास करती हुई एक तस्वीर अवश्य रोशन होगी। ये चप्पलें मम्मी-पापा या घर के किसी भी बड़े सदस्य की ओर से इन लड़कों की औंधी हरक़तों के एवज़ में तत्काल ईनाम स्वरूप प्राप्त होती थीं। यदि इनके पहले प्रहार से बच्चा उछलकर स्वयं को बचा लेता था, तो यह केस 'हाथ से गया' ही समझो! क्योंकि उसके बाद उसका कॉलर पकड़कर पीठ पर लात-घूंसों की जो सुनामी चलती थी उसकी आहें ये लड़के आज भी बचपन में ढूंढते हैं। 
इस हिंसक घटना के आफ्टर इफेक्ट की सबसे क्यूट बात ये होती थी कि कुटाई-पिटाई के बाद मम्मी उसका पसंदीदा खाना बनाती, बहिन अपने हिस्से का भी उसे ठूंसने को दे देती और बंदा लपर-लपर उसे खा भी लेता। पर पिता से उसकी खुन्नस हफ़्तों बरक़रार रहती। जैसे-तैसे बोलचाल शुरू होती भी, तब तक फिर धुनाई का नंबर आ जाता। मुझे लगता है कि लड़के इसलिए ही थोड़े ज्यादा जिद्दी और धुनी होते हैं। पिटते समय मुंह फाड़-फाड़कर इतना रोये हैं कि बड़े होने के बाद इन्हें ज्यादा रोना आ ही नहीं पाता क्योंकि इनके आँसुओं का स्टॉक बचपन में ही निबट गया था। 

आम भारतीय परिवारों में पिता और बेटी का जो रिश्ता होता है वैसा पिता-पुत्र का नहीं होता और एक अनकहा, अघोषित शीतयुद्ध दोनों में जारी रहता है। ये एक ही घर में दो कट्टर दुश्मनों के रहने जैसा है जिनके संदेशों का आदान-प्रदान करने के लिए स्त्री प्रजाति डाकिये की भूमिका निभाती आई है। जैसे, "अपने बेटे को बता देना, फलाना ढिकाना टाइप" या कि "आप पापा को बोल देना" इत्यादि। वैसे इतिहास की इक्का-दुक्का घटनाओं में ये दोनों प्राणी बिना आई कांटेक्ट के संवाद बोलते भी दृष्टिगोचर हुए हैं। 

पर जैसे माँ, बनने के बाद लडकियाँ बहुत कुछ समझने लगती हैं, वैसे ही पिता बनने के बाद लड़के भी सयाने हो जाते हैं। उनका अपने पिता के प्रति सम्मान बढ़ जाता है। बचपन की डांट और सारी बातों का अर्थ समझने लगते हैं। अपने पिता की बहुत परवाह करते हैं। बचपन का खोया जुड़ाव अब स्थापित होने लगता है। ये अच्छी बात है कि आजकल के बच्चे और माता-पिता के बीच अब पहले सी दूरियाँ नहीं होतीं और वे बेझिझक अपनी बात कह-सुन सकते हैं। लेकिन वे पुराने दिन भी कम हसीं नहीं थे। 

मेरे घर-परिवार के सदस्यों, मित्रों और आप सबको पिता-दिवस की असंख्य शुभकामनाएँ!
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 15 जून 2018

जो_था_अकबर


कई वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी, 'अमर, अकबर, एंथोनी'. ग़ज़ब की हिट रही थी, साब! क्या गाने, क्या अभिनय, क्या मस्त कॉमेडी और उस पर दोस्ती का सदाबहार विषय. सो, इसे जनता का भरपूर प्यार-दुलार मिला. जहाँ भी तीन दोस्त इकठ्ठा होते, तो इसी नाम की मिसाल देकर उन्हें 'अमर,अकबर, एंथोनी' बुलाया जाता. परस्पर भाईचारे और सौहार्द्र का भव्य समां बनता था जी. फिर जैसा कि होता आया है, कहानी में एक ख़तरनाक ट्विस्ट आया. सामान्यतः तो एक ही ट्विस्ट आता है न और वही झटका देने को काफ़ी होता है पर इस बार इस एक ट्विस्ट के साथ दो गब्दू ट्विस्टर और लटक लिए. ये तीनों भी क्यूटनेस में किसी से कम थोड़े ही न थे और उस पर ग़ज़ब ये, कि ये लल्लनटॉप बात इन्हें ख़ुद ही पता भी थी. फिर क्या था! जहाँ भी जाते, मीठी वाणी से सबको चपडगंजू बना अपनी डुगडुगी बजा आते. अब तक तो पूरा मामला सेट, फिटम फाट हो चुका था. ज़िंदगी मजे में कट रही थी. सैर-सपाटा, मौज़ के दिन थे. बीच-बीच में अपने स्वास्थ्य को तवज़्ज़ो देते हुए ढिंढोरा पीट व्रत किये जाते. लेकिन न जाने इस होनहार तिकड़ी को किसकी नज़र लगी कि घमंड से चूर इनके दिमाग़ पर त्रेतायुग के पत्थर गिरने लगे और वो इस हद तक गिरे कि कभी ये पत्थर पर तो कभी पत्थर इनके साथ लोट लगाने लगते. वैसे ये दृश्य लगता तो मनभावन था पर इनके इरादे स्पष्ट नहीं हो रहे थे कि अबकी इनकी अक़ल की दाढ़ क़हर बनकर किधर गिरेगी! अच्छा, एक बात के लिए इनकी ज़बरदस्त तारीफ़ बनती है कि ये थे, बड़े ही कट्टर चरित्रवान और इतिहास के अलावा किसी से भी छेड़छाड़ करना इन्हें सख़्त नापसंद था. 


ख़ैर! ये रात को गलबहियाँ कर सड़कों पर घूमते और भावनाओं में डूब अपनी-अपनी पसंद की सड़क को अपने पसंद का नाम दे देते. दयावान इतने कि यदि आज आदरणीय विनोद खन्ना जी जीवित होते तो उनकी आँखें भर आतीं. इनकी दयालुता के कई किस्से मशहूर हुए. होता यूँ था कि जब कभी मस्ती में ये तिकड़ी आसमान की तरफ़ सिर उठाती और कोई भोली, मासूम ऐतिहासिक इमारत बीच में उम्मीद भरी निगाहों से इन्हें देखती तो इनका भावुक दिल भर आता और ज़ज़्बातों में बहकर ये उस अनाथ को गोद ले लेते या फिर किसी और की गोद में धर आते. इसी प्रकार इन्होंने कई शहरों, रेलवे स्टेशनों और स्मारकों पर अपनी अगाध स्नेह वर्षा की फुहारें छोड़ीं जिसके लिए आने वाली पीढ़ियाँ इन्हें याद रखने वाली ही हैं. हम धन्य है कि हमने सतयुग से भी उत्तम 'इसयुग' में जन्म लिया जहाँ ऐसे सज्जन, संस्कारी और उत्कृष्ट सोचधारी युगपुरुषों का सानिध्य मिला. हे, धरती माँ! आज मैं तुम्हारे आगे नतमस्तक हूँ, ह्रदय भावविह्वल हुआ जा रहा है, अलौकिक प्रसन्नता से भरी मेरी आँखें डबडबा रहीं हैं पर फिर भी कलेजे पर मच्छर रखकर जाते-जाते अपने 'अमर,अकबर, एंथोनी' की स्मृति में इन युगपुरुषों को सादर अभिनन्दन के साथ पुष्पगुच्छ अवश्य भेंट करुँगी.

उफ़,अकबर जा रहा है और निर्देशक के आधार पर यह भी तय है कि अमर तो एन्ड तक रहेगा ही! हाय राम! कहीं मेरा एंथोनी गोंसाल्विस न चला जाए, वो तो वैसे भी दुनिया में अकेला ही है. बस यही एक डर है, जो रह-रहकर मुझे खाए जा रहा है. एंथोनी, तुम अपना ख़्याल रखना. 
#जो_था_अकबर 
- प्रीति 'अज्ञात'  

#अकबर#सहिष्णु_भारत#धर्मनिरपेक्षता 


बुधवार, 13 जून 2018

पहले प्रवचन देने वाले संत ख़ुद तो सुधरें!

राजस्थान सरकार की नैतिक मूल्यों वाली बात तो समझ आती है पर यहाँ एक गंभीर समस्या यह उभर सकती है कि प्रवचन देने वाले किसी धर्म विशेष पर ही फोकस करें और बच्चों के कोमल मस्तिष्क में उसी की महानता के गीत रच दिए जाएँ. इसलिए यह तय करना अत्यावश्यक है कि प्रवचन देने वाले धर्मगुरु केवल अपना झंडा न फहराते हुए सभी धर्मों के समर्थक हों और 'सर्व-धर्म-समभाव' में विश्वास रखते हों. अन्यथा ये विद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटककर 'धर्म प्रशिक्षण केंद्र' बनकर रह जायेंगे.

यूँ तो पहले भी विद्यालयों में नैतिक एवं शारीरिक शिक्षा एक विषय हुआ करता था तथा अब भी कई विद्यालय इस पक्ष की ओर ध्यान देते हुए मैडिटेशन करवाते हैं, विविध उत्सवों पर कार्यक्रम करते हुए छात्रों को उनसे सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी भी देते ही हैं. अतः इस क़दम से छात्रों को प्राप्त लाभ का अनुमान लगा पाना कठिन है पर चलो, रुटीन पढ़ाई से एक ब्रेक तो मिलेगा ही उन्हें और विद्यार्थियों के लिए ऐसी क्लासेज चैन की बंसी बजाने की तरह होंगीं.

पर क्या ऐसा नहीं लगता कि नैतिकता, ईमानदारी, सच्च्चाई, आदर्शवादिता और अच्छे संस्कार; परिवार और परिवेश से आते हैं! हर बात की जिम्मेदारी स्कूल ही क्यों ले? यह माता-पिता और परिवार का मूल कर्त्तव्य है कि वे अपने बच्चों को न केवल जीवन की सही राह दिखाएँ बल्कि स्वयं उन मूल्यों पर चलकर उनके आदर्श बनें.
यदि प्रवचन से ही ज्ञान प्राप्ति होती तो अपनी ही आवाज सुनकर शालीनता और भक्ति का नकली आडम्बर ओढ़े 'तथाकथित' बाबा आसाराम, राम पाल, राम रहीम, राधे माँ और इन जैसे कितने ही संत टाइप लोग स्वयं ही सुधर चुके होते और आदर्श संतों की छवि पर यूँ बट्टा न लगता.

हाँ, एक बात और....यदि प्रवचन से ही नैतिक मूल्यों का प्रादुर्भाव होता है तो क्यों न 'प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम' के अंतर्गत सबसे पहले नेताओं की ही क्लास ली जाये क्योंकि पतन की पराकाष्ठा और कट्टर प्रथा तो यहीं से प्रारम्भ हुई है. तो फिर सुधार का परीक्षण और अभ्यास भी यहीं से क्यों न हो!
वैसे एक मज़ेदार आईडिया और भी है  पहले शनिवार को भाजपा समर्थक महापुरुषों का, दूसरे शनिवार कांग्रेस, तीसरे में आप तथा चौथे, पाँचवे में अन्य दलों को स्थान दिया जाए. इससे बारहवीं पास करते-करते बच्चे यह भी तय कर लेंगे कि उन्हें किस तरह का नेता बनना या नहीं बनना है. ऐवीं पढ़ लिखकर वैसे भी क्या फ़ायदा होना है! बोलो तारा रा!
- प्रीति 'अज्ञात'
#प्रवचन#संत#स्कूल 

मंगलवार, 12 जून 2018

किस्से- कहानियाँ

प्रत्येक यात्रा में कितने चेहरे साथ चलते हैं और न जाने कितने नए चेहरे जुड़ते जाते हैं। हर चेहरा एक कहानी ओढ़े चलता है।  इन कहानियों को सुने जाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक इन्हें लिख पाना भी है। लेकिन हर बार होता यही है कि जितना सुना, समझा; उसका छँटाक भर भी लिखा नहीं जाता। समय और भी अधिक होने की मांग करता है, अनगिनत किस्से बस मस्तिष्क के प्रतीक्षा कक्ष में बैठे-बैठे ही अपने बाहर आने की बाट जोहते हैं और इस कक्ष की भीड़ लगातार बढ़ती जाती है। हर पल एक किस्सा साथ चलता है, हर घटना लिखे जाने की ज़िद पकड़ वहीं धरने पर बैठ जाती है। ऐसे में ख़ीज के अतिरिक्त और कोई भी भाव उत्पन्न नहीं होता। कभी -कभी 'जब समय मिलेगा, तब लिखूँगी' की उम्मीद के साथ की-वर्ड्स लिख लिए जाते हैं पर वो समय कभी नहीं आता और ग़र आता भी है तो पलटकर नहीं देख पाता; वो कुछ अलग ही विषय ओढ़ाकर चला जाता है। ड्राफ्ट्स की संख्या चार अंकों के आँकड़े को पार कर हताश कर देती है। हर बार इसी परिस्थिति से जूझती हूँ पर बाहर कभी नहीं निकल पाती और ऐसे में न जाने क्यों यही प्रश्न बार-बार कौंध जाता है कि क्या समंदर की उफ़नती लहरें किनारे पर वही रज-कण छोड़ जाती हैं या बार-बार नए ले आती हैं? तो उन पुरानों का क्या, क्या वे किनारे पर ठहर जम जाते हैं या कि भीतर गहराई में उतर अपनी पक्की जगह बना लेते हैं?
आख़िर हर क्रिया की प्रतिक्रिया क्यों है और हर बात को महसूस क्यों कर लिया जाता है। कुछ समय के लिए, नए पलों, नई यादों, नई घटनाओं पर रोक लगे या किसी बात का कोई अहसास ही न हो तो एक बार बीते दिनों में दौड़ लगा भाग जाना चाहती हूँ। 
- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 10 जून 2018

Strange things do happen!

On19th of April we lost our dear bird Sweetu. It was a severe heartache to our family as he was more like a child rather than just a pet Green cheek conure. Sweetu was very loving, caring and ofcourse talkative too! He was the joy of our family. For me, He was just everything, a part of me, without whom I never thought that I could survive. He used to keep me busy 24hrs and I loved every single bit of it. When he died in his sleep; it was the biggest shock of my life and I am still not able to deal with it.Though life moves on!

Yesterday (9/6/2018) we went to Fretta Pizza, Ahmedabad. It was our first visit to this restaurant. The food was delicious and the preparation was so clean. My husband ordered Coca-Colaand immediately I thought about Sweetu as he used to love it (let me clear, birds are not supposed to have any aerated drinks but Sweetu was allowed to take few drops of it occcassionally).

Well, when the can of coca-cola was served; all of a sudden my daughter got excited and told us to look at the can first.
We saw and got overwhelmed when we read-
     "Share a Coke with
           SWEETU 
      My beauty, My 24hr duty."
We rushed to the counter and asked the manager if he had more with the same name. He searched but that was the only can with that name on it!

Well! I don't believe in magic! I don't believe in any Jadu-tona or ghostly things! But, this incident is one of the most beautiful incident which I have experienced in past. And I strongly believe that there are some super-natural powers, positive vibes or some strange things that do happen, all for a reason; which allow us to keep going and stay connected with our loved ones. We call it CO-INCIDENCE!

Whatever it was, but a very big THANKS to Coca-Cola for writing my Sweetu's name and to Fretta Pizza to deliver us this momento. It sure did bring up a lot of lovely memories.
Love you guys!
- Preeti Agyaat
# Fretta Pizza# Coca-Cola


गुरुवार, 24 मई 2018

पापी, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!

सचमुच हद हो जाती है जब टीवी चैनल्स समाचार को यह कहकर उसमें सनसनाहट भरने की कोशिश करते हैं कि "रमज़ान के महीने में भी पाक़िस्तान ने की फ़ायरिंग!!" मतलब आपकी उम्मीदों की दाद देनी पड़ेगी कि आप दुश्मन देश से भी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने की अपेक्षा रखते हैं!

पता नहीं, किस मिट्टी के बने हैं हम लोग! पर ये तो तय है कि हम महामूर्ख अवश्य हैं. तभी तो अपनी शांतिप्रियता दिखाते हुए सीना तान कह डालते हैं कि "पवित्र महीने में नहीं होगी फ़ायरिंग" और एन उसी वक़्त दुश्मन देश का गोला हमारे देश वासियों पर क़हर बन टूट पड़ता है. पुरानी कहावत है "Everything is fair in love & war". दुनिया भर के प्रेमियों को तो यह बात तुरंत ही समझ आ गई थी अब हम सब भी समझ जाएँ तो बेहतर! यूँ भी जब बात देश की आन से जुड़ी हो तो सीधे वार करना ही बनता है. समय आ गया है कि पाकिस्तान को उसकी हर हरक़त का मुँहतोड़ जवाब दिया जाए. आख़िर कितने दशक तक हम शांति का राग अलापते रहेंगे? हार या जीत के बीच की जो लाइन होती है न, अब उसे छू, आर या पार जाने का वक़्त आ गया है साहब. 

अब रही बात त्योहारों की...तो भई जरा हिसाब लगाकर बताइये कि ऐसी कौन सी दीपावली है जिसमें अपराधियों ने किसी के घर का चिराग़ न बुझाया हो! ऐसी कौन सी ईद है जहाँ मित्रता और मोहब्बत के नाम छुरा न घोंपा गया हो! ऐसी कौन सी राखी है जहाँ किसी भाई ने ही अपनी बहिन की हत्या न की हो! ऐसा कौन सा करवा-चौथ है जहाँ किसी सुहागन का सुहाग न उजाड़ा गया हो! और ऐसा कौन सा महिला/ मातृ दिवस है जहाँ स्त्री की अस्मिता तार-तार न हुई हो! जी हाँ, ये मैं अपने ही देश की बात कर रही हूँ. जब हम अपनों को ही नहीं सुधार पा रहे तो किसी और से ऐसी उम्मीद रखना कितना बचकाना है!

इसलिए अब हमें अपनी समस्त इन्द्रियों को सचेत कर, अपने मस्तिष्क में सदैव के लिए यह बात गुदवा लेनी चाहिए कि चाहे पाक़िस्तान हो या कोई भी दुश्मन देश.....अपराधियों के इरादे कभी पाक़ नहीं होते! उनका कोई धर्म/ मज़हब नहीं होता! उन्हें बस गोलियों की आवाज़ ही रास आती है, वही चलाते हैं और एक दिन वही ख़ुद भी खाते हैं. इन्हें सिर्फ़ ज़हर फैलाने का मोह है और कुछ भी नहीं! जिस इंसान ने अपने-आप से मोह छोड़ दिया, जिसे अपनों की कोई परवाह नहीं, जिसकी रग़ों में नफ़रत लहू बनकर दौड़ती है, वह कुछ भी कभी भी, कहीं भी कर सकता है! पापी इंसान, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk, #Terrorist
https://www.ichowk.in/society/expecting-pakistan-to-respect-ceasefire-during-ramadan-is-hopeless/story/1/11067.html

बुधवार, 23 मई 2018

आश्वासनों के ऊँचें टाल पर संवेदनाएँ पहुँच पाती हैं क्या?


हमारे अपने देशवासी किन परेशानियों से जूझ रहे हैं, सीमाओं से सटे गांवों से पलायन को मजबूर ये शरणार्थी, शिविर में अपनी कहानी कहते हैं. यहाँ लोग किसी सरकारी अस्पताल के बरामदे की तरह एक साथ पड़े हैं. संवाददाता पूछता है, "सरकार खाना दे रही है?" उस समय एक स्त्री की यह बात आत्मा को भीतर तक झकझोर देती है जब वह रोती हुई कहती है कि "खाना तो घर में भी था, हमें अपना घर चाहिए. हमारे मवेशी भी भूखे हैं वहाँ!" समझना इतना जटिल नहीं कि जहाँ इंसान के रहने का स्थायी ठिकाना नहीं, वहाँ ये मवेशी तो भगवान भरोसे ही छूट जाते होंगे. ये मवेशी न केवल जान से प्यारे होते हैं बल्कि जीविका का साधन भी. कुछ जीवित कृशकाय अवस्था में मिलते होंगे और कुछ सदैव के लिए बिछुड़ जाते होंगें. आश्वासनों के ऊँचें टाल पर संवेदनाएँ कहाँ पहुँच पाती हैं! कभी अन्दर ही जूझती तो कभी, पलकों की कोरों से गिरती, हारकर फ़िसल जाती हैं.

अपने ही देश में विस्थापितों-सा जीवन जीने से अधिक दुखदायी और क्या हो सकता है भला! यहाँ बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे. उनकी आँखें भयाक्रांत हैं और वे 'भविष्य में क्या बनेंगे' से ज्यादा कहीं इस बात से चिंतित हैं कि "क्या वे बचेंगे?" उनके घरों की पक्की दीवारों में गोलीबारी से बने छिद्र ने इनका घर ही नहीं, बचपन भी बिखरा दिया है. यहाँ खिलौने नहीं, ईंटें,सीमेंट, रेती बिखरी पड़ी है. ये नए सपने नहीं देखते, बस टूटे हुए सपनों को रोज जोड़ने की मासूम कोशिश करते हैं. सपना भी इतना बड़ा और कल्पनातीत नहीं कि पूर्ण न हो सके. उस सपने में एक घर है, जहाँ मम्मी खाना बनाती है, बच्चों का टिफ़िन तैयार कर उन्हें प्यार से स्कूल भेजती है. बस-स्टॉप पर लेने आती है. शाम को पापा घर आते हैं और सब साथ में खाना खाते हैं. एक बच्चे की यह उम्मीद कहीं ज़्यादा तो नहीं? खाने-पीने, शिक्षा और सुरक्षा की भोली सी आशा!

क्या यह संभव नहीं कि बस्तियों को सीमाओं से पचास-साठ किलोमीटर की दूरी पर ही बसाया जाए? जिससे सब कुछ होने के बावजूद भी, इन्हें इस मजबूर खानाबदोश जीवन से मुक्ति मिले!

मैं कभी कश्मीर गई नहीं पर जाना चाहती थी. उन दिनों इतना घूमना-फिरना नहीं होता था और छुट्टियों का मतलब नानी या दादी का घर. पर फ़िल्मों ने इसकी ख़ूबसूरती को जिस तरीक़े से दिखाया है, उस तस्वीर को मैंनें अब तक दिल में बसा रखा है. जाऊँगी तो जरुर, पर तब ही; जब निश्चिन्त होकर ये गीत गुनगुना सकूँ. क्या ये निश्चिंतता हमें कभी नसीब होगी? दशक बीतते जा रहे, डर है कहीं हम और आने वाली पीढ़ियाँ भी न बीत जाएँ, तब तक........

इस ज़मीं से, आसमां से
फूलों के इस गुलसितां से
जाना मुश्किल है यहाँ से
तौबा ये हवा है या ज़ंजीर है
कितनी खूबसूरत....ये तस्वीर है
ये कश्मीर है, ये कश्मीर है

https://www.youtube.com/watch?v=h3yQJZagDTw
- प्रीति 'अज्ञात'