सोमवार, 11 दिसंबर 2017

संपादकीय - जनवरी 2017 ( हस्ताक्षर वेब पत्रिका) : क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं?

ये कैसी होनी है, जिसे हम विधाता पर डाल निश्चिन्त हो जाते हैं! उन बच्चों ने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी। कितनों की अधूरी ड्रॉइंग उनकी कल्पनाओं के रंग भरे जाने की प्रतीक्षा कर रही होगी, किसी की माँ ने उसके स्कूल से लौटने के बाद उसकी पसंदीदा डिश बनाकर रखी होगी, किसी के पिता उसे सरप्राइज देने के लिए उसका वही खिलौना खरीदकर लाये होंगे, जिसके लिए उसने बीते सप्ताहांत पूरा घर सिर पर उठा रखा था, दादा-दादी ने आज उसे सुनाने के लिए परियों वाली कहानी सोच रखी होगी। कितना दर्दनाक होता है वो मंज़र, जहाँ बच्चे के इंतज़ार में बैठे माता-पिता को उसके कभी न आने की सूचना दी जाती है, जहाँ गूँजती किलकारियों की आवाज़ गहरे सन्नाटे में बदल जाती है, जहाँ पलंग पर पड़ा बेतरतीब सामान किसी की राहें तकता है, जहाँ प्रतीक्षा उम्रभर का दर्द बन घर की चौखट से लिपट जाती है। आह, कई बार शब्द ही नहीं होते, जो किसी का दर्द बयां कर सकें। वो शब्द भी कहाँ बने, जो किसी का दर्द बाँट सके हों कभी!

बस दुर्घटना, ट्रेन दुर्घटना, स्त्रियों के प्रति अपराध जब-जब होते हैं
हम दुःख जताते हैं, अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। इसके अतिरिक्त अभिव्यक्ति का और कोई माध्यम भी नहीं! उधर अधिकारी मामले की पूरी जाँच का आश्वासन देते हैं। यदि घटना से कोई बड़ा नाम जुड़ा है, तो जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा। हंगामा या आंदोलन हुआ, तो सरकार द्वारा मामले को जाँच के लिए सीबीआई को सौंप दिया जाएगा। पीड़ित को ढाँढस बंधाने के लिए कुछ रुपए दिए जाएँगे और इस तरह बात ख़त्म हो जाएगी। पर मेरा सवाल यह है कि समस्या कब ख़त्म होगी? क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं? या कि हम सभ्यता के पाशविक काल में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं?

किसी इंसान की उसके ही घर में घुसकर हत्या कर दी जाती है लेकिन उसकी मृत्यु और उस परिवार के प्रति संवेदना के स्थान पर चर्चा इस बात की होती है कि फ्रिज़ में रखा माँस किसका था? 'मृत्यु' एक तमाशा भर बनकर रह जाती है!
लड़कियों को भरे बाज़ार परेशान किया जाता है तो कहीं उनका बलात्कार होता है, तलाश अपराधी की नहीं इस बात की होती है कि आख़िर वो घर से क्यों, किसके साथ और किन वस्त्रों को धारण करके निकली थी। यानी हम यह मानकर ही चलें कि पुरुषों की जन्मजात प्रवृत्ति तो ऐसी ही है और उनके सुधरने की तथा कुत्सित मानसिकता को त्यागने की कोई उम्मीद नहीं। इसलिए स्त्रियाँ ही स्वयं को क़ैद करके रखें? क्या इस सोच का कभी अंत होगा या कि हर मुद्दा, भुनाए जा सकने के लिए ही जीवित रखा जाता है?

जलीकटटू हुआ या कि चिंकारा या कोई भी अन्य जानवर। उनके प्रति हिंसा का विरोध होता है, होना भी चाहिए! उनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा है, लगना ही चाहिए। ऐसे मामलों में पूरा देश एक साथ खड़ा होता है, ये उससे भी अच्छी बात है कि हमारी संवेदनाएँ अब तक जीवित हैं। लेकिन जब किसी इंसान की लाश न्यूज़ बन सड़क पर पड़ी रहती है, किसी को दिन-दहाड़े गोली मार दी जाती है, किसी बच्चे को बुरी तरह पीटा जाता है तब मनुष्यता कहाँ चली जाती है? हर मौत के विरोध में आवाजें कहाँ ग़ुम हो जाती हैं? काश, मानवीय हिंसा पर प्रतिबन्ध हो!....हैवानियत पर प्रतिबन्ध हो! हर मृत्यु को गंभीरता से लिया जाए!

दरअसल दोषी के सुधरने की उम्मीद तो तब हो....जब किसी को भय हो। यदि बलात्कार की सज़ा, तुरंत फाँसी हो और वो भी एक सप्ताह के भीतर ही तय कर दी जाए तो क्या मजाल किसी की हिम्मत भी हो, लड़की को छूने की। पर ऐसा होता नहीं और न ही होने वाला है क्योंकि आधे तो नेता ही इसमें लटक जाएँगे और बाक़ी उनकी छत्रछाया में जीने वाले।
नोटबंदी से कुछ अच्छा जरूर हुआ होगा, सहमत हूँ। पर अब बढ़ते अपराध और गंदगी को मिटाना आवश्यक है, ये भ्रष्टाचार से भी ज्यादा जहरीले हैं। देश के विकास के लिए नोटमुक्त से कहीं अधिक, भयमुक्त समाज की आवश्यकता है। जब आधी आबादी घर में बंद है, तो विकास पूर्ण रूप से होने की आशा करना बेमानी लगता है।

कितना हास्यास्पद है कि लोग शौचालय बनाने के लिए भी सरकार की मनुहार की प्रतीक्षा करते हैं। कचरे को कचरेदान में डालना भी अब दूसरों को सिखाना पड़ रहा है, वो भी इस उम्र में आकर! कोई सेलिब्रिटी समझाएगा, तो ही समझ पाएँगे। थूकना, पिचकारी मार सार्वजनिक स्थानों को दूषित करना बदस्तूर जारी है। पहले हम इस सब से उबरें, फिर बात बने!

नए वर्ष में आप साईकल चलाएँ, हाथ मिलाएँ या फूल खिलाएँ....बस घर से निकले को, शाम उसके घर तक सकुशल पहुँचाएँ।
फुटपाथ पर सोये, ठिठुरते बचपन को उसका मौलिक अधिकार शिक्षा दिलाएँ।
अपराध को पैसे नहीं, सजा के बल पर ख़त्म कराएँ।
वाहन चालन का लाइसेंस उन्हें मिले, जिन्हें सचमुच वाहन चलाना आता हो क्योंकि ये सिर्फ उनके ही नहीं, कई लोगों के जीवन का मामला है।
कंक्रीट होते शहरों में कहीं-कहीं मिट्टी छुड़वाएँ कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन और साँस चलती रहे।
आओ, भारत को हम-आप, सुरक्षित सुंदर बनाएँ!
इन्हीं चली आ रही कभी सूखी-कभी हरी उम्मीदों के साथ-
नववर्ष मुबारक़!
गणतंत्र मुबारक़!

चलते-चलते: जब कुंभ मेला लगता है तो तमाम चित्रों से सबकी टाईमलाईन भरी रहती है। व्यापार मेला लगता है, तब भी यही दृश्य देखने को मिलता है। विश्वकप में तो भावुकता अपने चरम पर होती है लेकिन पुस्तक मेले के लगते ही एक विशिष्ट वर्ग को साँप सूंघ जाता है। क्यों, भई? एक अभिनेता हर चैनल में जाकर अपनी फिल्म का प्रचार करता है। खिलाड़ी भी विज्ञापन के माध्यम से अपना चेहरा जनता को याद दिलाते रहते हैं। संगीतकार और गायक भी अब पार्श्व में नहीं रहे। कंपनियों के विज्ञापन के जिंगल सब एक सुर में गाते हैं। नेता अपनी पार्टी के प्रचार और दूसरी के दुष्प्रचार का कोई मौका कभी नहीं छोड़ते। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री जी भी रेडियो पर अपनी बात सुनाने लगे हैं। तो फिर इस 'पुस्तक मेले' से ही किस बात की चिढ़? जिसे जाना है, जाए। जिसे नहीं जाना, वो न जाए! आप इतने कुंठित क्यों हैं?
दुःख इस बात का है कि पुस्तक मेले का सबसे ज्यादा सम्मान जिस वर्ग को करना चाहिए (करते भी हैं), वही इसका अपमान करने में भी पीछे नहीं रहता। यही हाल कुछ लोगों ने हिंदी का भी किया है। जिसकी घर में ही इज़्ज़त न हो तो गैरों से कैसी उम्मीदें? दुःखद है, बाक़ी उन्हें सोचना है जिनके कारण सवाल उठते हैं।
- प्रीति अज्ञात

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

जब तक जीवन शेष है, हर बात की गुंजाइश शेष है।

पता है तुम्हें? प्रत्येक स्त्री के जीवन में वह क्षण एक बार तो आता ही है जब उसे यह लगने लगता है कि किसी को उसकी ज़रुरत नहीं और उसके चले जाने से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। वो अपने-आप को जी भरकर कोसती है कि कैसे इसके लिए, उसके लिए; उसने सब कुछ किया। अपने त्याग भी मन-ही-मन गिनती है और उदास रहने लगती है। इसे हॉर्मोन्स के मत्थे मढ़ तसल्ली भले ही कर ली जाए पर इस तनाव, चिड़चिड़ाहट के बाद का पड़ाव अवसाद ही है। जो उसके अंदर जीने की इच्छा को ख़त्म कर देता है या फिर उसकी उपस्थिति दूसरों का जीना भी दूभर कर सकती है। स्त्री की समस्याओं को समझने और उसके निवारण के लिए जितने समय, धैर्य और सहानुभूति की आवश्यकता होती है....ज़िम्मेदारियों से जूझते पुरुष से उसकी उम्मीद कर पाना बेमानी ही है। आख़िर वह भी तो एक इंसान ही है, उसे कोई अदृश्य शक्ति या सुपरपॉवर नहीं मिली हुई हैं। इसलिए स्त्री को स्वयं ही ख़ुश रहना सीखना होगा...किसी और को ख़ुश करने के लिए नहीं बल्कि अपने भीतर की 'पीड़िता' को दूर भगाने के लिए। उसे मज़बूरी के बस्ते में बंद अपनी पसंद को झाड़-पोंछकर बाहर निकालना होगा। घर-गृहस्थी की व्यस्त्तता को सुव्यवस्थित करना होगा। याद रहे जब चाहत हो तो हर काम के लिए समय निकल आता है। चाहे वो बाग़वानी हो, पेंटिंग हो, पॉटरी, पढ़ाई, लेखन, संगीत कुकिंग या कोई भी शौक़। उम्र के गणित में क्यों पड़ना? जब तक जीवन है, हर बात की गुंजाइश शेष है।

जब आप दिल से हँसतीं हैं न, तो सारी प्रकृति गुनगुनाने लगती है। जीवन पहले से सरल हो जाता है। फूल-पत्ती, चाँद-तारे सब बोलने लगते हैं। पक्षियों की भाषा समझ आती है। नदी, पहाड़, झरने सब बाहें फैलाये अपने-से लगते हैं। ह्रदय की दहलीज़ पर सुनहरे ख़्वाबों की बेरोकटोक आवाजाही शुरू हो जाती है। मन ख़ूब जोरों से खिलखिलाता है। मारकाट और ख़ुन्नस भरी दुनिया में इन मुस्कुराहटों की बड़ी आवश्यकता है।है, न!
- प्रीति 'अज्ञात' 
* अपनी मित्र के लिए स्नेह सहित 

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

उत्तर की तलाश सभी को है पर प्रश्न करने का जोख़िम कोई नहीं उठाना चाहता!

सारे राजनीतिक दल देशवासियों को एक साथ भ्रष्टाचार से लड़ने, देश को गरीबी से मुक्त करने, रोजगार उपलब्ध कराने के खोखले वायदे तो ख़ूब करते हैं पर क्या हमने इन्हें ख़ुद, किसी भी मुद्दे पर एक साथ खड़े देखा है? क्या इन्होंने देश की किसी भी समस्या का समाधान मिलजुलकर निकालने की कोशिश की है? नहीं, न क्योंकि इनका तो पूरा समय एक दूसरे पर कीचड़ उछालने, आरोप-प्रत्यारोप और बेतुकी बातों में जाया होता है। ये हमारे देश के दुश्मनों के नहीं बल्कि एक-दूसरे के ख़िलाफ़ सबूत ढूँढने में ज्यादा रूचि लेते हैं। इन्हें देश की नहीं अपनी कुर्सी की चिंता है और इनका पूरा समय उसे टिकाने की कोशिशों में और स्वयं को दूसरी पार्टी से बेहतर बताने में ही बीत जाता है। पार्टियाँ आती रहीं, स्वयं को श्रेष्ठ बताती रहीं और अपने कार्यकाल में विरोधी पार्टी की कमियाँ गिनाती रहीं। उनके बंद केस खुलवाकर जनता के सामने रखती रहीं। क्या इससे देश का विकास हुआ ? सत्तारूढ़ पार्टी के जाने के बाद आने वाली हर पार्टी ने भी यही प्रोटोकाल दोहराया। इतिहास को हर बार उल्टा-पलटा गया। जनता हर बार confuse हुई, हर बार ही उसने अपने निर्णय के लिए ख़ुद को धिक्कारा। और फिर अगली बार दिमाग़ से वोट डालने की सोची, पर हर बार वही ढाक के तीन पात। हम बेवकूफ़ से कहीं ज्यादा मजबूर हैं। राजनीति में सारे नेता ही बुरे हों, ऐसा भी नहीं!
दुर्भाग्य यह है कि इस 'व्यवसाय' में मात्र अच्छी सोच रखने से ही कुछ नहीं होता, सर्वसम्मति की आवश्यकता होती है जो कि मिलती ही नहीं क्योंकि दूसरे दलों को देश से ज्यादा अपनी नाक की फ़िक्र हैइसलिए समस्याएँ अब तक इसलिए नहीं जीवित हैं कि इनमें सुलझाने का माद्दा नहीं , समस्याएँ इसलिए जीवित हैं क्योंकि इनमें सुलझाने की चाहत ही नहीं!

कभी बीजेपी है, कभी कांग्रेस है , कभी आप है , कभी समाजवादी पार्टी। लेकिन इन सबके बीच मेरा देश कहाँ है? इनके मुद्दों में देश कहीं है ही नहीं।
जो देशवासियों से एकता का आह्वान करते हैं वे  संसद में खुद जूतमपैज़ार करते हैं। 

मीडिया हाउस में भी स्वयं को नंबर 1 देखने की होड़ है। कितना अच्छा होता यदि सारे चैनल मिलकर देश को प्रथम रख इसकी उन्नति के लिए कार्य करते। पर कुछ सत्ता के चाटुकार बने बैठे हैं और कुछ ने विपक्ष का मोर्चा संभाल लिया है। कुछेक को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी दूध पीने वाले पत्थर, चोटी काटने वाला भूत, मक्कार स्वामी ओम  और लोगों को बेवकूफ़ बनाती राधे माँ में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। राम-रहीम, हनीप्रीत टाइप तथाकथित लव स्टोरी या किसी मंत्री की सेक्स सी डी मिलते ही इनकी बांछें खिल उठती हैं। क्या इन समाचारों की देश को वाक़ई जरुरत है? 
अंधविश्वास की ख़बरों को दिखाकर उन्हें बुरा बोलने वाले ये सभी चैनल सुबह से आपकी राशि और भविष्य की दुकान खोल लेते हैं। दोपहर में कोई प्रायोजित शक्तिवर्धक या लम्बाई बढ़ाने का टॉनिक बेचता एक घंटे का विज्ञापन चलता है तो कहीं निर्मल बाबा जैसे 'सुधारक' और 'कल्याणकारी बाबा' लोगों की समस्याओं का इलाज समोसे-चटनी के साथ करते नज़र आते हैं। क्या इन चैनलों ने आम आदमी की समस्या और सुधार पर विस्तार से बात की है कभी?? यदि की है तो कितने मिनट? हत्या हो या कोई भी अपराध, उसकी लम्बी चर्चा भी ये तभी करते हैं जब वो हाई प्रोफाइल केस हो। आरुषि हत्याकांड में भी हेमराज का नाम लेने वाला कोई न था।

हाँ इतना तो जरूर मानना पड़ेगा कि मीडिया संवेदनशीलता का परिचय भले ही न दे पाता हो पर हम तक ख़बरें पहुंचाने के लिए धन्यवाद का पात्र तो बनता ही है स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ कैम्पेन को हम सब तक पहुँचाने में और पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी संदेशों के माध्यम से इन्होने देश के विकास में थोड़ा योगदान तो दिया है। ख़ुशी की बात है कि कुछ हैं जो सही स्टोरी दिखाते हैं, सच को सामने रखने का हौसला रखते हैं पर दुःख ये है कि ज्यादा सच बोलना देशद्रोह में गिना जाने लगा है। 
हम सहिष्णु भारत के सहिष्णु नागरिक हैं लेकिन जब अपनी पर आती है तो बर्दाश्त नहीं होता। कभी बैन लगा दिया जाता है तो कभी फ़तवे का ख़तरा लहराता है।

दुनिया के सामने हम एक हैं लेकिन चुनाव के समय कोई ठाकुर है, राजपूत है, शिया-सुन्नी है, यादव है, पंडित है, ईसाई है, पारसी है, सिख है, जैन है, पिछड़ा वर्ग है, अल्पसंख्यक है। 
एडमिशन के समय भी हम यूँ ही अलगअलग धर्मों में बँट जाते हैं।
दंगों में तो अलग-अलग होना नियम ही बन गया है। हम अपने ही देश की जमीं पर खड़े हो, उसी का सत्यानाश मिलजुलकर करते हैं।  तोड़फोड़ करते हैं, आग लगाते हैं। 
हम एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना पर मिल-बाँटकर खाने की बात करते हैं लेकिन एक राज्य जब दूसरे का पानी रोक ले तो हम अपनी-अपनी पाली में जाकर उसका समर्थन करने लगते हैं।
सर्व धर्म समभाव हमारा स्वभाव है और हमें सबके गुणों का आंकलन उनके कर्मों के आधार पर करने की सीख दी गई है लेकिन आजकल हम गुजराती, बिहारी, मराठी, पंजाबी, सिख, उत्तर-दक्षिण भारतीय बन एक-दूसरे की भाषा, बोली और त्यौहारों की धज्जियाँ उड़ाने लगे हैं। सेवन सिस्टर्स को तो हम भारतीय मानते ही नहीं! मुंबई से फ़रमान जारी होता है कि बिहारी और यू पी वाले चले जाएँ तो दूसरे प्रदेश अन्य प्रदेश को कोसने लग जाते हैं। पर इन सबके बीच में मेरा हिन्दुस्तान कहीं खो जाता है।

आख़िर हम कब अपने-अपने धर्म के खोलों से बाहर आएँगे ? कब हम हर राज्य और उसके निवासी को अपना मानेंगे? कब हम राष्ट्रीय संपत्ति को अपना समझ उसकी रक्षा में सहायक बनेंगे? कब हम अपने देश को स्वार्थ से ऊपर रखकर सोचेंगे? कोई कट्टर हिन्दू है तो कोई कट्टर मुसलमान। 
मेरा सवाल है....हम कट्टर भारतीय क्यों नहीं हो सकते? हमारा धर्म भारत क्यों नहीं हो सकता? देश के विकास के लिए सारे दल, सारे मीडिया हाउस एकजुट क्यों नहीं हो सकते? सिर्फ़ किताबी निबंधों में ही नहीं.....हम सच में एक क्यों नहीं हो सकते?
- प्रीति 'अज्ञात'
 © Copyright Preeti Agyaat 2017

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

मिर्ज़ापुर

आदरणीय डॉ. राजनाथ सिंह जी 
सादर अभिवादन 

पत्र उसे ही लिखा जाता है, जिससे हम परिचित हों और इस लिहाज़ से मेरा आपको पत्र लिखना बनता ही नहीं! लेकिन आपको भी कहाँ मालूम होगा कि मेरे और आपके बीच एक कड़ी रही है....आज नहीं लगभग तीन दशक पूर्व। समय का अनुमान भर ही है ये क्योंकि बचपन की बातें हैं इसलिए वर्ष ठीक से याद नहीं। लेकिन स्मृतियाँ कहाँ उम्र भर साथ छोड़ती हैं!

मिर्ज़ापुर मेरी स्मृतियों के पन्नों में सबसे चटख़ रंग भरता है। इस शहर में भी यहाँ का 'के. बी. पोस्टग्रेजुएट कॉलेज' मेरे दिल के बेहद क़रीब सदैव ही रहा है और मैं अब भी वहाँ एक बार और जाने की उम्मीद संजोये बैठी हूँ। यहाँ के बड़े-बड़े मैदानों में मेरे बचपन ने छोटे-छोटे डग भरना प्रारंभ किया था, यहीं के ऊँचे सुर्ख़ गुलमोहर के वृक्षों के नीचे मेरी उमंगें थक जाने पर कुछ पल साँस ले पुन: परवान चढ़तीं थीं, यहाँ के हर लहलहाते पौधे ने मुझे प्रकृति प्रेमी बनाने की पहली नींव रखी और इसी कॉलेज के बीचों-बीच बने सुंदर तालाब में मेरे स्वप्नों के कमल खिलना शुरू हुए थे। कुल मिलाकर मेरे बचपन की हर स्मृति यहाँ की हवाओं में दर्ज़ रही है। 

पूरे यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकती कि आप उन्हें जानते होंगे या नहीं, पर मेरे नानाजी डॉ. श्याम सिंह जैन यहाँ के प्रथम प्राचार्य थे (शायद 1957 से) नानाजी का घर कॉलेज कैंपस में ही था। छोटी उम्र थी, इसलिए मैं और मेरा भाई मनीष पूरे कैंपस को ही अपना घर समझ कूदते-फांदते थे। कॉलेज के मेन गेट वाली रोड पर हेल्पर्स (ठाकुर, दुर्गा) के जो एक कमरे के घर थे न, वहाँ भी हम चक्कर मार आते थे। घर में मामा, मौसियों, नानाजी, नानीजी के साथ ख़ूब मस्ती भी करते थे। मुझे ऐसा लग रहा है कि आप भी उन्हीं दिनों इस कॉलेज से जुड़े थे। नानाजी रिटायरमेंट तक यहाँ प्राचार्य के तौर पर पदस्थ थे। एक बार गर्मियों की छुट्टियों का थोड़ा-सा याद है मुझे, आप आदरणीय अटल जी के साथ आये थे। उस समय हम लोग घर के बाहर तीन-चार सीढ़ियों के दोनों ओर बनी फिसलपट्टियों पर फ़िसल रहे थे। समर मामा से भी आपका नाम सुना है। 

आज दोपहर NDTV में रवीश कुमार के कार्यक्रम में, मिर्ज़ापुर के इसी कॉलेज की दुर्दशा देखकर मन टूट-सा गया। नाना जी की भी बहुत याद आई। आज वो होते, तो कितना दुःखी होते। उनकी आत्मा भी कितना कष्ट पा रही होगी। इस कॉलेज को सर्वश्रेष्ठ बनाने में उन्होंने कोई क़सर नहीं छोड़ी थी। सबके आदर्श थे वो।
मेरा प्रश्न यही है कि समय के साथ जब हर जगह विकास की बात है तो ऐसे में शिक्षा के मंदिर का यह हाल क्यों?
यह सच है कि मैं इस ओर आपका ध्यान इसलिए आकृष्ट करना चाहती हूँ क्योंकि इस स्थान से मेरा विशेष लगाव है। आपने भी इस कॉलेज को अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दी हैं। लेकिन सर, सुधार तो हर जगह होना चाहिए। हर शहर, हर गाँव, हर गली के मोड़ पर किसी-न-किसी देशवासी की यादें बसती हैं। एक आम भारतीय की यही तो धरोहर हैं। हम विरासतों को संजोने की बात करते हैं, आगे जाने की बात करते हैं, लेकिन जो हमारे पास है....उसे कौन बचाएगा?? शिक्षा का बढ़ता स्तर ही तो अच्छे नागरिकों को जन्म देगा। 
गाँधीवादी हूँ और आशावान भी
इसलिए पूरी उम्मीद है कि कुछ सकारात्मक उत्तर अवश्य मिलेगा।
*रवीश कुमार जी और उनकी टीम को मेरा और मेरी मम्मी नलिनी जैन की तरफ से विशेष धन्यवाद!

सादर 
प्रीति 'अज्ञात' 

कार्यक्रम का वीडियो लिंक-
https://www.youtube.com/watch?v=77TWz-kqMLo

मेरे और उस शहर के रिश्ते की कहानी बयां करती कुछ लिंक्स -
  
http://preetiagyaat.blogspot.in/2016/03/blog-post_3.html
http://preetiagyaat.blogspot.in/2015/10/blog-post.html


http://agyaatpreeti.blogspot.in/2015/06/blog-post_81.html

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

#शहर से लौटते हुए

मैं अब भी उस छोटे से शहर की बड़ी राह जोहती हूँ. शहर जो हरियाते दरख़्तों से घिरी संकरी गलियों के इर्दगिर्द बसा था, इन दिनों कुछ चौड़ा नजर आता है. आदमियों से ज्यादा दुकानें हैं, लोग हैं, पर सब जल्दी में.  
अब कोई किसी से हंसकर बात नहीं करता. नाम जानती थी जिस दुकान वाले का; मैंने चहककर उसे आवाज़ दी "राजकुमार भैया, कैसे हो?"
वो हड़बड़ाकर हैरानी में इधर-उधर देखने लगा जैसे कि यह प्रश्न बेहद अप्रत्याशित था उसके लिए. मैंने भी अचकचाकर मुँह फेर लिया. 

स्कूल से जुडी कितनी ही यादें थीं. सारे टीचर्स, प्रिंसिपल, वो छुट्टी का घंटा बजाने वाली अम्माँ और बाहर पॉपिन्स, पिपरमेंट की गोली वाली दुकान. अरे हाँ, एक ठेला भी तो था चाट का. पच्चीस पैसे में आलू की दो गरमागरम टिक्कियाँ, वो भी चटपटी चटनी और चने के साथ. कैसे प्यार से फटाफट बनाता था.
स्कूल के प्रांगण में लगा वो नीम का पेड़, जिसके चबूतरे पर बैठ अजीब-सा सुकून मिलता था. यह सब सोचते हुए चलती जा रही थी कि जैसे धक्-से बैठ गया ह्रदय...स्कूल का वो बड़ा सा गेट और स्कूल का नामोनिशां तक न था. उसकी जगह एक बहुमंजिला काम्प्लेक्स ने ले ली थी. छूकर देखने को स्मृतियों के अवशेष तक न थे. गली ठसाठस भरी थी वाहनों से. उन्हीं के बीच बचती-बचाती निकलती कि अचानक ही एक दुपहिया वाहन से टक्कर हुई. वो चिल्लाया 
"दिखता नहीं है क्या?"
कहना चाहा मैंने भी चीखकर "हाँ, कुछ भी नहीं दिखता है अब 
न स्कूल है, न इमारत है, न वो ठेले और न ही हँसता दुकानदार,बताओ कहाँ गए सब!" 
पर मैं पनियाई आँखें लिए मौन, खिसियाकर रह गई
यूँ भी वो रुका ही नहीं था. 
भागते वक़्त में चीखने का समय सबके पास है, ठहरकर कौन सुनना चाहता है भला!
शहर भूल चूका है मुझे, इक मैं ही इसे क्यों न भूल सकी!
#शहर से लौटते हुए 
-प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

हम चाँद को छूने में खजूर पे हैं लटके

यदि आप सच्चे भारतीय रहे हैं और दूरदर्शन युग में जन्मे हैं तो उस्ताद ज़ाकिर हुसैन साब का वह विज्ञापन अभी तक न भूले होंगें जिसमें वे एक बच्चे के साथ तबला बजाते हुए उसे "वाह! उस्ताद" कहते हैं और बच्चा हँसते हुए ज़वाब देता है "अजी, हुज़ूर वाह ताज़ बोलिए"
ज़ाकिर साब के हाथ में ताज़ चाय का कप और बैकड्रॉप में ताज़महल, किसी रोमांटिक फ़िल्म के ख़ूबसूरत दृश्य सा उभरता था। कितने जवाँ दिल तो ज़ाकिर साब के घुँघराले, लहराते बाल और तबले की थाप पर फ़िदा होकर चाय पीने लगे थे...इश्क़ में पड़े सो अलग!

ये ताज़ है साहब! दुनिया जितना भारत को जानती है उतना ही 'ताज' को भी! ताजमहल किसी पहचान या कृपा का मोहताज़ नहीं है। कितने ही प्रेमी और वैवाहिक जोड़े इसी ताज़ के आगे साथ जीने-मरने की क़समें खाते हैं। कितनी ही आँखों में इसकी चमक मुहब्बत की रोशनियाँ बिखेरती हैं। कितनी धड़कनें इसकी दूधिया रौशनी में जवाँ होती हैं। कितनी यादें इसके परिसर की हरियाली में महक भरतीं हैं। प्रेम की निशानी बनी, चाँदनी बिखेरती ये इमारत हम भारतवासियों की आँखों ही नहीं, दिल में भी बसती है। 

देश से बाहर जाते हैं तो विदेशियों से परिचय के बीच में 'ताज़' ख़ुद-ब-ख़ुद चला आता है, जब वो कहते हैं "ओह इंडिया, नमस्ते। वी नो योर ताजमहल, इट्स ब्यूटीफुल!" तो न सिर्फ़ हमारा सीना गर्व से चौड़ा जाता है बल्कि चेहरे की चमक भी किसी ताज़ से कम नहीं होती।
जो टूरिस्ट, भारत आते हैं उनकी सूची में पहला स्थान ताज़ ही लेता है।ताज़ ने कितनों को रोज़गार दिया। कितने फोटोग्राफरों ने जीवन इसी के प्रांगण में गुज़ारा। उनकी रोजी रोटी और करोड़ों देशवासियों की सबसे सुन्दर स्मृतियाँ यहीं से होकर गुजरती हैं।

आख़िर इतिहास से छेड़छाड़ करने से वर्तमान को क्या लाभ मिलता है?
यूँ भी इतिहास कुरेदने पर आएँगे तो कुछ भी शेष न रहेगा। ये सारी मीनारें, किले, इमारतें सब युद्धरत राजाओं की ही देन हैं। एक ने बनाया, दूसरे ने कब्ज़ा किया, तीसरे ने छीना.... इस बीच कितनी लाशें गिरीं और किस-किसकी....उन्होंने भी इस angle से हिसाब न लगाया होगा जैसे आजकल बहीखाते खोले जा रहे। 
कहने का तात्पर्य यही है कि जब भी कोई इमारत मुद्दा बनी...... बिखरा देश ही है....नुक़सान हमारा ही हुआ और इस सबका हासिल कुछ नहीं! 
इनसे भी जरुरी कई विषय हैं जिन पर चर्चा की आवश्यकता देशहित होगी।

बाबरी से निकले अब ताज़ में हैं अटके
हम चाँद को छूने में खजूर पे हैं लटके 

ग़ज़ब की हैं दलीलें, सोच क्या कमाल है 
कहा था न मियाँ, ये साल बेमिसाल है 
आओ झुकाएँ मस्तक नव दीप अब जलाएं 
जरूरत थी जिनको, सारे वो मुद्दे भटके

खड्डे में कोई गिरता, नाले में बहता जाता 
पेपर में दबा ढक्कन, हर ज़ुल्म सहता जाता 
ये ज़ख्म है मुलायम, चलो मिलके भूल जाएँ 
लगे हैं धीरे-धीरे, पर जोर के हैं झटके 

अशिक्षा से हो लड़ाई, भूखों को मिले रोटी
इंसानियत की हत्या करके न नुचे बोटी 
राहत की चाशनी में कोई ज़हर न मिलाएँ
है इल्तज़ा यही बस, चाहे ये तुमको खटके

हम चाँद को छूने में खजूर पे हैं लटके

वैसे एक मज़ेदार आईडिया भी है - इससे तो अच्छा था कि इसका नाम श्रीमती चमेली देवी स्मृति स्मारक / श्री बनवारीलाल निर्मित स्मारक ही रख दिया होता! क्योंकि ये निवाले निगलने में तो जनता एक्सपर्ट हो चुकी है। :D :D
कोई न...लगे रहो!
- प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 16 सितंबर 2017

जीवन की पाठशाला से

"जब हम किसी से अपने लिए अपेक्षाएँ रखने लगते हैं तो एक बार पलटकर यह अवश्य देखना चाहिए कि हमने उसके लिए अब तक क्या किया या करना चाहा है! यहाँ बात मात्र सहायता की ही नहीं, समुचित व्यवहार भी मायने रखता है. इस मनन के बाद जो उत्तर सामने आए वही आपके अब तक के जीवन का सार है, अनुभव है, व्यक्तित्व को इंगित करता है.
भाग्यशाली हैं कि समय है और ये जीवन फ़िलहाल बीता नहीं....अभी भी अपार सम्भावनाएँ शेष हैं क्योंकि कितना कुछ है जो कहा ही नहीं, कितने कार्य हैं जिन्हें किया ही नहीं, कितने पल हैं जिन्हें जिया ही नहीं!" - प्रीति 'अज्ञात'
* जीवन की पाठशाला से