शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

:)

कितने छुटकु से तो वाक्य हैं, 'कैसे हो?', "अपना ध्यान रखना". अँग्रेज़ी में बोले तो How are you ?, Take Care. पर इन शब्दों का एहसास कितना बड़ा होता है, यह सिर्फ़ सुनने वाला ही महसूस कर सकता है. एक अजीब सी खुशी दे जाते हैं, जीवन के ये सामान्य-से दिखने वाले, पर अदभुत पल. लगने लगता है, कि हमारे अलावा भी कोई और है; जिसके कारण ज़िंदा रहना ज़रूरी है. एक अजीब सी खुशी मिलती है और खुद पर इतराने को जी चाहता है. कुछ इस तरह की बातों को पागलपन भी समझते हैं, हुन्ह समझा करें, अपने को क्या ! :P

लेकिन ये भी सच है, कि जीवन की भागदौड़ी में हरेक के पास इतना पूछने का भी वक़्त कहाँ ! सुनते हैं, आजकल महँगाई बहुत है, सबके भाव बढ़ गये हैं. शायद शब्दों के भी.....या फिर....... ?
लोगों के ???? :/  :P  मैनें तो ऐसा नहीं कहा, वैसे कभी-कभी इल्ज़ाम लगाने में भी बड़ा मज़ा आता है. :D

बुधवार, 15 जनवरी 2014

कैसा ये इश्क़ है

'प्यार' बड़ा ही अनमोल सा शब्द लगता है, सिर्फ़ तभी तक; जब तक हुआ न हो. कुछ फिल्मों का प्रभाव और कुछ कल्पनाओं की उड़ान जब एक साथ परवान चढ़ते हैं. तो होशो-हवास ही गुम हो उठते हँ. मन अपने प्रिय के विचारों में खोया रहता है. चाहे . उम्र के किसी भी दौर में हो, पर असर वही रहता है. सोते-जागते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते कमोबेश हर वक़्त एक वही चेहरा जेहन में छाया रहता है. दुनिया उसी के आसपास ही सिमट आई हो जैसे, समझ ही नहीं आता कि इसे उस शख़्स को कैसे बयाँ किया जाए. कभी आसमाँ से भी ज़्यादा, कभी ज़िंदगी से भी ज़्यादा, तो कभी खुदा की बंदगी सा लगने लगता है इश्क़. पर इस मोहब्बत को अगर कायम रखना है, तो यहीं पर रुक जाना चाहिए......
एक बार इज़हार-ए-मोहब्बत कर दिया, बस उसी पल से हक़ीक़त की मुश्किल ज़मीं से सामना होना शुरू हो जाता है. अपेक्षाएँ जुड़ने लगती हैं और उन्हीं सही-ग़लत सी अपेक्षाओं के पूरा न होने पर दर्द पनपता है, जो कभी ईर्ष्या तो कभी अवसाद के रूप में आँखों से रिसा करता है. खुशकिस्मत हैं वो लोग, जिनके प्यार को उनके हर दर्द का अहसास हुआ करता है और वो उसकी खुशी के लिए अपने व्यस्त लम्हों में से कुछ पल चुरा लिया करते हैं.
वरना उम्र-भर का वादा निभाने का दावा करने वालों को भी प्राप्य के बाद कोफ़्त होने लगती है, उसी इंसान की बातों से; जिसके साथ घंटों वक़्त का पता तक न चलता था. घुटन देने लगता है उन्हें वही साथ; जो कभी सुकून हुआ करता था.जिन शब्दों और भावों की तारीफ़ में वो कसीदे पढ़ते नहीं थकते थेअचानक वही बेहद बचकाने और अपरिपक्व लगने लगते हैंउन्हें एक ही झटके में अनदेखाअनसुना कर दिया जाता है. कहते हैं, प्यार का दर्द बड़ा मीठा हुआ करता है, लेकिन ये भी तो सच है कि इस मिठास को सहन करने की भी एक सीमा होती है. वरना अंत में अक़्सर ही लोग ये क्यूँ कहा करते हैं...इश्क़ वही है, जो मैंने उससे किया और उसने किसी और से, और रह गया ये सिर्फ़ एकतरफ़ा जुनून बनकर, हाँ, जुनून ! जिसकी अगली सीढ़ी पर पागलपन आपका इंतज़ार कर रहा होता है...जाइएअगर हालातों ने यहाँ तक पहुँचा ही दिया हैतो मिल लीजिए इससे भीख़ुदाआप सभी को सलामत रखे और किसी के इश्क़ में गिरफ्तार भीजीने की यह एक खूबसूरत वजह भी तो है !
."कैसा ये इश्क़ है, 
 ग़ज़ब का रिस्क़ है".

 प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

हम नहीं सुधरेंगे..

 क्या किया जाए, ऐसे प्राणी का...
* गीला तौलिया पलंग पर (कब तक बर्दाश्त किया जा सकता है..)
* गंदे कपड़े, बास्केट के कदमों तले ( निशान छोड़ना ज़रूरी है, न..कि देखो..हमारे पास वाली टोकरी में ही हमें रखना है)
* मोजे, जूते के अंदर न होकर हर असंभव जगह..और जूता? उसे शेल्फ को पार करते हुए सोफ़े के नीचे खिसका देना इनका परम धर्म है (वहाँ रखने से जूते अदृश्य हो जाते हैं क्या?)
* खाने की थाली सिंक के ठीक बाजू में कुछ इस तरह रखी जाती है, मानो थाली ने ही मना कर दिया हो,,कि "आप रहने दो जी, मैं खुद ही अंदर कूद जाऊंगी".
* सुबह उठते से ही चाय के लिए हंगामा, और जब बन जाए तो आधे घंटे बाद ऐसे पधारना, गोया कोई मजबूरी में दवाई पीनी पड़ रही हो.
* खुद के किसी कार्यक्रम में जाना हो, तो सुबह-शाम वक़्त पर तैयार होने का बुलेटिन जारी रहता है और हमारे साथ कहीं जाना हो, तो पूरे घर के तैयार होने के और समय पर पहुँचने की अपनी आदत की हज़ार दुहाईयाँ देने के बाद भी यूँ देखते हैं...."अच्छा, आज ही जाना था, मैं तो २ मिनट में तैयार हो जाता हूँ. तुम्हें ही वक़्त लगता है"! (सीधा-सीधा ताना है, जी)
* जब उनकी पसंद की कोई ख़ास डिश बनाओ, तो एन-डिनर के वक़्त फोन आता है...."मेरा आज बाहर खाना है"
  पर तुमने पहले क्यूँ नहीं बताया कि बाहर खाने वाले हो ?
  उत्तर- तुमने भी तो नहीं बताया, कि ये बनाने वाली हो!
  पर मैंने सोचा सरप्राइज़ दूँगी.
  उत्तर- हो गया ? कोई नहीं, कल खा लूँगा. फ्रिज किसलिए होता है! (हाँ, इसलिए होता है.कि आज बनाओ, रात भर सड़ाओ और अगले दिन खाओ...इससे विटामिन बढ़ जाते हैं न)
* शॉपिंग-मॉल में खुद की ड्रेस लेनी हो तो घंटों रिसर्च (जबकि लेना उन्हीं ४ गिने-चुने रंगों में से तय रहता है, और हमारी राय पर यूँ हिक़ारत से देखा जाता है, कि इसे रंगों की समझ न जाने कब आएगी). पर हमें कुछ लेना हो तो तुरंत ही जवाब.."सुनो, तब तक मैं दूसरे सेक्शन में होकर आता हूँ". दूसरा सेक्शन मतलब वही बोरिंग गेजेट्स वाला! जबकि अब तो सरकार ने भी घर को एक मिनी-इलेक्ट्रॉनिक स्टोर घोषित कर दिया है.
               उफफफ्फ़ ! सात जन्मों का वादा ? एक ही जन्म में दिमाग़ का दही हो गया! और सबसे ख़ास बात...ये लोग नियमित रूप से अनियमित होते हैं, बोले तो....'Regularly Irregular'
अब क्या ये भी बताने की ज़रूरत रह गई है, कि यहाँ किस प्रजाति की बात हो रही है !! 
जो हैं, वो इस वक़्त मुस्कुरा रहे हैं.
जिन पर बीत रही है, उन्हें भी थोड़ी तसल्ली हुई.....कि उनके अलावा भी बहुत से लोग हैं यहाँ !
और जिनकी समझ में ये बात आई ही नहीं..उनके भारतीय होने पर धिक्कार है, जी !

प्रीति 'अज्ञात'

PROUD TO BE AN INDIAN !

India is a SECULAR country ! Oh, yeah..We all know that ! How ?? Coz it is written in our constitution. The Bitter Truth....It's only on paper ! We all have seen it, again n again that whenever a person does something wrong or any kind of crime, the so called intellectual people start blaming on his/her religion. Sometimes, they also give examples, that...look, last time the other person did the same crime, but did not get any punishment, coz; he/she belong to a perticular religion. How mean n shameful !!

Why don't we understand this simple thing, that NO RELIGION TEACHES OR SUGGESTS US TO BECOME A CRIMINAL OR SUPPORT TO INDULGE IN ANY KIND OF SUCH ACTIVITY. IT'S THE PEOPLE, WHO ARE BAD, NOT THE RELIGION !

Come on INDIA, WAKE UP ! Few people (Read Politicians) of our society are spreading rumours and taking full advantage of innocent Janta's Mind. They are doing it for their own good. In true hindi."Rajneetik rotiyan seki jaa rahi hain". Identify them. Do not believe in whatever they say.Negative thoughts from such people are only destroying India, Our Own Country, The Motherland !

Let India Shine, in it's original form. Spread positiveness in your area. Come together, unite !
PROUD TO BE AN INDIAN !
JAI HIND !
Preeti 'Agyaat'

ऐसा भी होता है...The Frustrated One !

ये पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ना होकर, एक समुदाय के बारे में है. एक ऐसा वर्ग जिसने इस समाज को बुरी तरह से निराशावाद के गर्त में धकेल दिया है. ये लोग हमारे-आपके जैसे ही दिखते हैं. सर्व-व्याप्त हैं, और हमारे अपने घर, गली- मोहल्ले में पर्याप्त मात्रा में पाए भी जाते हैं. क्षमा चाहूँगी, पर आज मैं 'कुंठाग्रस्त लोगों' की बात कर रही हूँ, The Frustrated One !  
इनका गुस्से में धधकता चेहरा, आँखों में छलकता रोष, और मुस्कान तो ढूँढे से भी ना मिले, यही इनके पहचान-चिह्न हैं. मुझे इन लोगों से कोई भी परेशानी तब तक नहीं, जब तक ये अपने गुस्से का और उससे निकलने वाली ऊर्जा का प्रयोग किसी सकारात्मक कार्य में करें. जैसे घर की सफाई, बगीचे का काम या फिर कार्यालय के कामों को शीघ्र ही निबटा देना. अपनी परेशानी किसी अपने से ही साझा करें. इस ग़रीब जनता ने आपका क्या बिगाड़ा है, जो इस तरह बरसते हैं.
 
'बॉस' घर से नाराज़ होकर आया है, और बरसेगा अपने जूनियर्स पर, और वे बेचारे सर झुकाए सुनते रहेंगे, कि कहीं नौकरी पर ना बन आए. फिर ये लोग खुद भी बिल्कुल वही करेंगे अपने पति या पत्नी के साथ ( हाँ, जी..जमाना बदल गया है. पत्नियाँ भी बराबर टक्कर देती हैं :P ) उसके बाद बारी आती है, निरीह, अबोध बच्चों की. माँ-बाप उनके हाथों से रिमोट छीनकर तुरंत टी. वी. बंद कर देते हैं, और साथ में प्रवचन तो जाहिर तौर पर जारी रहता ही है. ये बच्चे भी कम नहीं, भाई-बहिन एक दूसरे पर मारामारी या खिलोनों की तोड़ाफोड़ी से तुरंत ही बदला लेना शुरू कर देते हैं. अंतत: भुगता किसने ???और शुरुआत कहाँ से हुई थी ??? और ये प्रक्रिया अनवरत चलती ही रहती है. फिर हम एक सुर में गाते हैं, हो रहा 'भारत-निर्माण'.हो गया जी, बस 'स्वर्ण युग' आने ही वाला है. हुह्ह्ह्ह.... इस माहौल में पले-बढ़े बच्चे भी भविष्य में यही सब करेंगे. रुकना बड़ों को ही होगा. अपने अंतर्मन में झाँकिए, टटोलिए अपनी ग़लतियों को, फिर किसी और को दोषी ठहराने की ज़हमत उठाइए !
 
बचपन की स्कूल की कुछ घटनाएँ आज भी झकझोर के रख देती हैं. हमारे यहाँ एक 'बड़े सर' हुआ करते थे. (नाम भी याद है मुझे उनका, पर वो अब इस दुनिया में नहीं, सो जाने दीजिए) उनका बड़ा ख़ौफ़ हुआ करता था. वो कभी-कभार ही कक्षा में आया करते थे. पर उनकी छवि बच्चों के बीच एक आतंकवादी से कम नहीं थी. आते ही तीन-चार बच्चों को मुर्गा / मुर्गी बना देना उनका सामान्य शिष्टाचार हुआ करता था. फिर अतिरिक्त सम्मान हेतु वो कुछ लड़कों को छड़ी से भी मार दिया करते थे, ये कतई ज़रूरी नहीं था, क़ि उन लड़कों ने कोई शैतानी की ही हो, बस उन बेचारों की इमेज खराब थी और सर का मूड. एक लड़के को तो हर बार उल्टा लटकाकर डराया करते थे, और पूरी क्लास सहम जाया करती थी. किसी में हिम्मत नहीं थी, क़ि उनके खिलाफ एक शब्द भी कह सके. वैसे भी ये तब आम बातें ही हुआ करती थीं.
 
कुछ मुझ जैसे प्राणी भी थे वहाँ, जो केवल पढ़ाई से ही मतलब रखा करते थे. पर हम पर भी उनकी कृपादृष्टि अक़सर हो ही जाया करती थी. वो हमारी जगह बदल दिया करते थे. यानी अपने दोस्तों के पास से उठकर दूसरी जगह बैठने का निर्देश. हम उदास मन से बस्ता उठाए चले तो जाते थे, पर फिर दूर से ही सब अपने-अपने दोस्तों को टुकूर-टुकूर देखा करते. दिल करता था, चीख-चीखकर कह दें...' क्यूँ बदली मेरी जगह ?? मुझे मेरा वही स्थान चाहिए, मैने आख़िर किया ही क्या है ? मेरा कोई भी दोष नहीं, नाराज़ आप हो, किसी और ही बात से, पर बदला मुझसे ले रहे हो !" पर टीचर की कड़कती आँख और 'बड़े सर' द्वारा पुन: अपमान के डर से चुप ही रहते. आखों में आँसू ज़ज़्ब किए, वहीं ज़मीन पर उंगलियों से चित्र उकेरा करते. बुरा तो तब भी लगता है, जब अभी भी वही सब कुछ होते हुए देखती हूँ.....प्रगति सिर्फ़ इतनी सी हुई है, कि अब शब्दों में ढाल लिया करती हूँ. पर उससे क्या होता है, अगर फ़र्क ही ना पड़े तो........ :( 
बाकी तो क्या...सब कुशल-मंगल है !
 
प्रीति 'अज्ञात' 

मैं पागल..मेरा मनवा पागल

ये मन बड़ा अज़ीब सा होता है. जब कोई दुख आए, तो हमेशा यही सोचा करता है,कि हाय ! मेरी तो किस्मत ही खराब है. सिर्फ़ मेरे ही साथ ऐसा क्यूँ होता है. बस यही दिन और देखना बाकी रह गया था, मुझे आज ही उठा ले, इस दुनिया से ! और भी ना जाने, क्या-क्या ऊलजलूल सी बातें ! मैं तो भगवान के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने से भी नहीं झिझकती. मान ही लेती हूँ, कि वो हैं ही नहीं ! लेकिन उससे भी ज़्यादा आश्चर्य की बात ये है कि, जब हमारा कोई अपना बेहद परेशान, दुखित, व्यथित होता है. उस वक़्त हम खुद ही ये दुआ कर रहे होते हैं, कि उसकी परेशानी हमें मिल जाए, क्योंकि हम तो कुछ भी झेल सकते हैं. इतने मजबूत हृदय वाले हैं, काश, वो दर्द हम बाँट पाते ,पर उसके चेहरे की उदासी देखी नहीं जाती ! मतलब यही हुआ ना, कि हम सभी बड़े-से-बड़े तूफ़ानों से भी टकरा जाने की हिम्मत रखते हैं, गर हमारे साथ कोई हो और उसे भी इस बात पर इतना ही यकीन हो. दुनिया के किसी भी कोने में , कहीं भी कुछ भी ग़लत हो, उसपे सबसे पहले बैठ के मैं रोया करती थी, ये उदासी बेमतलब की तो कतई नहीं थी. अभी भी हुआ करती है. पर जो हमारे बस के बाहर है, उस पर रोने से क्या फायदा ?? बेहतर यही है, हम एकजुट होकर उससे लड़ने के उपाय तलाशें. बस यही सोचकर, आज से मैने भी बेवक़्त की उदासी को उछालकर बाहर फेंक दिया है. सूबक रही है, वो खुद एक कोने में खड़ी, मातम मना रही है अपने अकेलेपन का ! मालूम हो गया अब उसे भी, कि पास आई तो धज्जियाँ बिखेर दूँगी उसकी ! और तुम तक तो पहुँचने ही नहीं दूँगी उसे !!  
* उम्मीद है, मेरे अपने भी यही करेंगे !  
* तुम्हें भी धन्यवाद ! 
 एक गीत की हत्या की है, अभी-अभी ----- 
"जब भी मिलती है, अजनबी लगती क्यूँ है ! 
ओये, ज़िंदगी !! तू इतनी ओवर-एक्टिंग करती क्यूँ है !" 
 
प्रीति 'अज्ञात' 

Planet Facebook

फ़ेसबुक की माया 

आज हम यादों की वादियों में भटक रहे हैं और स्मृति-पटल पर अंकित हो रहा है,वह दिन; जब इस नीलगगन के तले (मतलब फ़ेसबुक) हमारी एक नई दुनिया बसी थी! बड़ी ही अनोखी है ये दुनिया, जो यहाँ चैन से रह लिया वह विश्व के किसी भी कोने में आसानी से, शांतिपूर्वक जीवन बिता सकता है. हाँ-हाँ, ऊटॅकमॅंड, झुमरीतलैया और गंजटिनबारा में भी( ये विविध-भारती वाली याददाश्त जाती ही नहीं). 
 अब हम आपको बताते हैं, कि इस ग्रह पर किस-किस तरह के प्राणियों से सामना हो सकता है. हमने उन्हें कुछ श्रेणियों में विभाजित कर दिया है, जिससे नये विद्धयार्थियों को समझने में थोड़ी सुविधा हो!
  
1. नशेड़ी टाइप - ये फ़ेसबुक को पूरी तरह समर्पित लोग हैं. इसकी वज़ह से ये अपना खाना-पीना, दीन-दुनिया सब भुला देते हैं. होशो-हवास भी बस इसी क्षेत्र तक ही सीमित रहते हैं. कोई इंसान दिन में या रात में चाहे जितने भी बजे, जो भी स्टेटस डाले उसे सर्वप्रथम लाइक करने का गौरव इन्हें ही प्राप्त होता है. हर चार घंटे में प्रोफाइल फोटो बदलना इनका प्रमुख शौक होता है ( गोया किसी ने कह दिया हो कि, हर चार घंटे बाद आपके चेहरे पर एक अलग सा नूर छाता है). इन्हें दोस्त अवश्य ही बनाइए.
 
2. दीवाने टाइप - इसमें बहुत ही खास वर्ग और सोच वाले प्राणी शामिल किए गये हैं. ये काफ़ी अलर्ट रहते हैं, ज्यों ही किसी खूबसूरत लड़की ने 'हेलो' लिखा..एक सेकेंड के अंदर उसके अपडेट पर लाशें बिछ जाया करती हैं ,जी! 'मिस यू', 'लव यू', 'कब मिलोगी' जैसी भावनाएँ उमड़-उमड़ के आती हैं. ये बड़े ही दिलदार टाइप के होते हैं, पर कुछ अपनी असली पहचान छुपा के रखते हैं! अरे, माँ-पापा के डर से नहीं, बाकी गर्लफ्रेंड्स के डर से! हे-हे-हे !
 
3. दुखेड़ी टाइप - इन्हें हम प्यार से दुखी आत्माएँ भी कहते हैं.अपने हर ग़म में सबको शामिल करने की प्रथा इस समाज में वर्षों से चली आ रही है. काँटेदार पेड़, सूखे फूल, मुरझाया गुलाब, टूटा दिल जैसे प्रोफाइल चित्र देखकर इनकी पहचान आसानी से की जा सकती है. इनको 'आरक्षण' देना बनता है जी !! हम इस वर्ग को इसका हक़ दिलाकर रहेंगे. कृपया, इन्हें भूलकर भी इग्नोर ना करें!
 
4. शहंशाह टाइप - ये उच्च वर्ग के लोग हैं. इनकी हर छोटी-बड़ी, उल्टी-सीधी, घटिया-बेहतरीन बात को लाइक करना, शेअर करना और सकारात्मक कॅमेंट करना हम सभी का परम कर्तव्य है. शायद कभी इनकी नज़रें आप पर पड़ जाएँ और आपके भाग्य का ढक्कन खुल जाए. इसलिए ये अगर आपको धन्यवाद  भी ना दें , तो बुरा मत मानिए. व्यस्त लोग अपनी तारीफें पढ़ सकते हैं, पर जवाब का समय
उनके पास नहीं होता रे!
 
5. लवेरिया टाइप - फ़ेसबुक की असली रौनक, शानोशौक़त सब इन्हीं से है. ये बेहद भोले-भाले, निरीह जीव हैं, क्या करें...इनका खुद पर बस ही नहीं चलता! इन बेचारों को हर हफ़्ते एक नया प्यार होता है, ऐसा-वैसा नहीं, एकदम सच्चा वाला !!!! ये स्वभाव से बेहद मेहनती होते हैं. और नहीं तो क्या...पहले लड़की को फॉलो करो, फिर उसके सारे रिश्तेदारों, दोस्तों के कमेंट लाइक करके इंप्रेशन जमाओ. बड़ा ही मेहनत-मशक्कत वाला काम है जी ! क्या करें 'प्यार' चीज़ ही ऐसी है. वैसे इस सच्चे वाले प्यार की न्यूनतम अवधि एक सप्ताह, और अधिकतम ??? हा-हा-हा...आप तो सीरीयस ही हो गये !
 
6. महान आत्माएँ - ये दुखेड़ी समाज के ठीक विपरीत कार्य करते हैं. ये अपने अलावा सभी को बेहद तुच्छ नज़रों से देखते हैं. ये कभी किसी का कोई भी स्टेटस लाइक नहीं करते. वर्ष में एक-दो बार किसी को कमेंट देकर  धन्य महसूस करा देना इनकी प्रमुख विशेषता है. बड़े लोगों की बड़ी बातें, समझा कीजिए, जनाब! अब अगर आपको अपनी सहनशक्ति की परीक्षा लेनी हो, तो इन्हें दोस्त अवश्य बनाएँ. वैसे, हमने चेतावनी दे दी है!
 
7. बंद दरवाजे - इन पर बड़ा तरस आता है,हमें! ये 'ब्लॉक्ड वर्ग' है. ये इस श्रेणी में कब और कैसे आए, इस पर गहन अनुसंधान चल रहा है. पर, ये बेचारे किसी को भी 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' भेज पाने में असमर्थ पाए जाते हैं. इनकी मदद ज़रूर कीजिए! भगवान, आपका भला करेंगे !
 
8. चिपकू लोग - यह वर्ग समाज के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. हरेक की वॉल पर अपने प्रॉडक्ट या कंपनी की जानकारी चेप देना इनकी दिनचर्या का एक प्रमुख अंग है. कई बार ये दूसरे तरीके भी अपनाते हैं. जैसे कि...'शेअर कीजिए, भला होगा', 'एक लाइक तो बनता है' अजी, हम तो दो बार भी क्लिक कर दें..पर डिसलाइक हो गये तो हमें दोष मत दीजिएगा !! इन पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है, ताकि समस्या को जड़ से उखाड़ा जा सके !
 
9. सन्यासी टाइप - इस समाज के लोग फ़ेसबुक पर होते हुए भी लुप्तप्राय: लगते हैं. ये अपने शहर की हर लड़की / लड़का (एक ही क़ौम को क्यूँ दोष दिया जाए) को फॉलो करते हैं, दोस्त बनाते हैं, बातें भी करते हैं. पर ये लोगों की दृष्टि में आने से बचते हैं. कई लोगों को तो पता भी नहीं , कि ये बंदा / बंदी इस साइट पर अक़सर आया करते हैं. इनकी इस प्रवृत्ति को समझने के लिए शोध-कार्य जारी है. तब तक आप, ज़रा संभल के......!
 
10. नन्हे-मुन्ने राही - ये सबसे प्यारा और खूबसूरत वर्ग है. इसमें बच्चे आते हैं. 'बुक' भले ही ना 'फेस' की हो कभी, पर ये 'फ़ेसबुक' पर बहुतायत में पाए जाते हैं. इन्हें सिर्फ़ अपने लाइक्स की संख्या बढ़ाने में रूचि होती है. कृपया, इनका उत्साहवर्धन करें और इन पर पूरा ध्यान भी दें.

11.नौटंकी वर्ग - ये वर्ग बाद में जोड़ा गया हैइसके सभी सदस्यों का मुख्य कार्य उल्टे-सीधे स्टेटस डालकर सबका ध्यान आकर्षित करना होता हैये अपनी हँसीखुशीबीमारी और अपने पास-पड़ोस की खबरें देते हुए सक्रिय बने रहते हैं चाहते हुए भी एक बार तो आपकी नज़र इन पर पड़ेगी हीयही इनकी दिली-तमन्ना भी होती हैकृपया इन्हें पूरी तवज़्ज़ो दें.
  
मेरा भारत सरकार से निवेदन है, कि बच्चों को 'नेट-शिक्षा' में पारंगत करने के लिए शीघ्र ही एक विधेयक बनाए, वरना हम 'भूख-हड़ताल' कर देंगे. साथ ही 'मार्क्स फॉर नेट' भी हमारी लड़ाई का एक अहम मुद्दा रहेगा! :))) 
ये तो सिर्फ़ एक झलक भर है, इस दुनिया की ! पर, सच्ची बोलूं ना!! हमारा तो जी ही भर गया, इस दोगली दुनिया से ! 'झूठे लोग-झूठी पसंद' .....हमने तो इसका यही नाम रखा है! 'जो तेरा है, वो मेरा है' सुना है ना आपने भी...सब झूठ !! सबको सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र है यहाँ पर! स्वार्थ से भरे हुए, गरूर से दबे हुए..लोगों का शहर बन गया है !! 
सब 'फ़ेसबुक' वालों की चाल है, बेवकूफ़ बना रहे हैं..वो हमें और हम खुद को ! खैर..हमारा फ़र्ज़ था आपको समझाना! आगे आपकी मर्ज़ी!  
सब मोह-माया है , जी का ज़ंजाल है ! इसके झाँसे में मत आओ ! इस दुनिया का त्याग करो, या इसे अपना लो! हमने तो सिर्फ़ आपके भले की ही बात की है! खुदा, आपको हमेशा सलामत रखे !
  
अधिक जानकारी के लिए मुझे 'add' करें या 'msg' करें ! नीचे 'like', 'comment', 'share' के भी विकल्प मौजूद हैं. उनका भरपूर इस्तेमाल करें. वैसे मैं 'twitter', 'google+' पर भी हूँ. अलविदा, दोस्तों..अब ना जाने कब मुलाक़ात हो.  
वैसे मेरा e-mail id है - preetiagyaat@gmail.com 
हा-हा-हा-हा-हा :)))))))))))) 
प्रीति 'अज्ञात' 

अधूरी सी वो 'ज़िंदग़ी'........

आज सुबह से ही वातावरण में अजीब सी स्तब्धता पसरी हुई है. वह भी बहुत शांत, उदास सी, सूनी आँखों से दीवार पर लटकी हुई तस्वीर को एकटक देखे जा रही है. भीतर के कोलाहल का अंदाज़ा लगा सकना हरेक के बस की बात कहाँ !
 
नन्हा सा दिल कितने सपने संजोता है. फिल्मों का असर है या ख़ुद के ही दिमाग़ की उपज़, पर सभी ने अपने सपनों के राजकुमार की तस्वीर ज़रूर बनाई होती है. उसने भी बनाई थी ! सोचती थी, कि एक दिन कोई शहज़ादा, आँखों में आँखें डालकर गुलाब का फूल पेश करेगा और वो इठलाते, शरमाते हुए उसे क़बूल कर लेगी ! ना गुलाब मिला ना शहज़ादा, हाँ सपनों का आना जारी रहा. इक अजनबी को लेकर बुने हुए सारे ख़्वाब किश्तो में चकनाचूर होते रहे ! दर्द बढ़ता गया, लहू रिसता रहा, रिश्ता घिसटता गया
'प्यार' और 'दर्द' दो ऐसे एहसास हैं, कि जब ज़रूरत से ज़्यादा हों तो अभिव्यक्ति के लिए शब्दों के मोहताज़ नही होते. आँखें ही सब कुछ बयान कर देती हैं. किसी के दर्द को सुन लेना एक बात है और महसूस कर पाना दूसरी. मैं उन कम्बख़्त दूसरे लोगों में से हूँ...जो महसूस भी कर लिया करते हैं ! उसकी लाचारी पर अफ़सोस भी जाहिर किया और तक़लीफ़ को दूर करने की नाकाम कोशिश भी ! 

अधूरे से सपने हमेशा 
अधूरी सी कुछ ख्वाहिशें 
क्यूँ बनी ऐसी ये दुनिया 
खारिज़ जहाँ फरमाईशे !
 
अधूरी सी शरारतें वो 
अधूरी ही किल्कारियाँ 
प्रसुप्त सी धरा तले 
दबती रहीं चिंगारियाँ !
 
अधूरे हैं रिश्ते यहाँ पर 
हैं बहुत मजबूरियाँ 
चल रहे हैं साथ फिर भी 
बढ़ती जाएँ दूरियाँ ! 
 
अधूरी सी उम्मीद थी 
अधूरी ही वो आस थी 
बिखरी हुई साँसों को लेकिन 
जाने किस की तलाश थी !
 
अधूरी वो नाज़ुक सी टहनी 
दरख़्त से जब जुदा हुई 
हालात से अवाक थी वो 
पर लफ्ज़ इक भी कहा नहीं !
 
दर्द के दरिया में इक दिन 
एक मोती था गिरा 
हताश, वो तलाशती अब 
वो भी उसको ना मिला !
 
शायद अधूरी थी वो कोशिश 
या अधूरा कोई वादा 
रेत सा अक़सर ही ढहता 
जो भी दिल करता इरादा !
 
कहाँ है ये, ख़ुदा..कहो ना 
करें क्यूँ उसकी बंदगी 
गुजर गई जहाँ से कल ही 
'अधूरी' सी वो 'ज़िंदगी' !!
 
आज बरसी है, उन टूटे सपनों की, उन बिखरे हुए ख्वाबों की, उम्मीदों के गुजर जाने की ! बरसी है उन पलों की..जो बरसों से भीतर ही दफ़न होते रहे ! ये तक़लीफ़ वही समझ सकता है, जिसने कभी ना कभी कोई दर्द महसूस किया हो ! आज उन सभी के अरमानों की बरसी है......!!
 
प्रीति 'अज्ञात'

तू ना जाने, आसपास है...ख़ुदा !!

"तू ना जाने आसपास है, ख़ुदा"....कितना खूबसूरत गीत है. उदासी के लम्हो में किसी के भी दिल को झकझोर के रख देने की पूरी काबिलियत है, इसके अल्फाज़ों में. गीत- संगीत के बिना जीवन ?? कोई सोच भी नहीं सकता !! इतनी आसानी से गानों ने हर एक की ज़िंदगी में प्रवेश कर लिया है...कि गाए हुए हर शब्द को हम खुद से जोड़ लिया करते हैं. मस्ती वाला गाना हो तो मन मयूर हो नाच उठता है, रोमांटिक गानों का तो कहना ही क्या..सिवाय खुद के किसी और की तो कल्पना करने से भी पाप लगता है जी ! और जब गमगीन हो, फिर तो ग़ज़ब ही समझो...चेहरा यूँ लटक जाता है, जैसे दोनों गालों पे किसी ने दस-दस किलो वज़न टाँग दिया हो !!
 
अरे, पर मुद्दा तो ये है ही नहीं...हां, तो दो-तीन दिन पहले मैं बेहद खराब और उदासी वाला लुक लेके इस गाने को सुने जा रही थी. कि अचानक ही पेड़ के नीचे बैठे बिना जैसे ज्ञान की प्राप्ति हो गई. वातावरण में बिज़ली सी कौंधी , दिमाग़ में घंटियाँ बज उठीं.....सारा माहौल खुशनुमा हो गया. हां, जी हमें इस गाने का सीधा तात्पर्य जो समझ में आ गया. उफ़,ओ..तो ये बात है..हा-हा-हा....!!
 
अजी, ये गीत तो भारत सरकार द्वारा जनहित में जारी होना चाहिए. हर शहर, हर गली-मौहल्ले, हर चौराहे पर दिन-रात बजना चाहिए. जिससे आम जनता भी इस चेतावनी को समझ सके और अपने बचाव में खुद आगे आए. आप खुद ही देख लीजिए.....
 
"तू ना जाने, आसपास है...खुदा" 
अरे, इसका इशारा हमारी सड़कों पर पाए जाने वाले गोल-मटोल प्यारे-प्यारे गड्ढों से है. तो जी, ज़रा संभल के ! फिर ना कहना कि हमने सावधान नहीं किया !! 
आगे की लाइन...."तेरी क़िस्मत तू बदल दे " 
कवि कहना चाहते हैं, कि तू ऐसा बंदा है,जिसका कोई भरोसा नहीं, ना जाने कब अपनी टाँगें खुद ही तोड़ दे. इसलिए आँखें खोल के चल ! 
"रख हिम्मत साथ चल दे" 
कवि ने पुनः समझाने की कोशिश की है, कि अगर गिर भी गया है तू, तो 'इट्स ओके, बेटा ! पर भविष्य में अपना ध्यान रखना, दोबारा ऐसी ग़लती ना हो ! 
"मेरे साथी, तेरे कदमों के हैं निशान" 
कविराज आगे कहते हैं..कि ये जो मिट्टी पर निशान देख रहे हो, ये उन बेचारी अभागी चप्पलो के हैं, जिन्होनें यहीं अपना सफ़र ख़त्म किया !
 
इसलिए, हे ख़ुदा की बनाई इस दुनिया के नमूनों....डरो मत ! ये अपना ही देश है, गड्ढों से मत घबरा, एक दिन ये ज़रूर भरेंगे. बस, ज़रा लोगों की ज़ेबें तो भर जाने दे ! " इक दिन आएगा, गड्ढा भर जाएगा......." 
इससे पहले कि इस गाने के गीतकार हमारे ख़िलाफ फ़तवा जारी कर दें, हम तो निकल लेते हैं, उनसे क्षमा-याचना सहित ! हमारा इरादा, किसी को चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि उन उदासी भरे लम्हों में घिरे कुछ अपनों के चेहरे पे मुस्कान लाना है ! ठीक ऐसे ही, जैसे आप अभी मुस्कुरा उठे...! 
प्रीति 'अज्ञात'@ :))))))))))))))))))))))) 

Love can happen anytime....

In today's world, everything is changing so fast. Daily we see the launch of a new product, new technology, new gadgets and so on....no wonder there is a vast change in means of communication too ! Forget the old 'kabootar way'...now people meet, chat and play games on social networking sites. Needless to say...they fall in love too !! Hard to believe, how a simple chat can change someone's whole view towards life ! But, it does happen...! Time has changed....so as love !! Sharing a true story, which  just came across through a very dear friend of mine. Here it is.... 

 Boy: hi 
 Girl: hi...how are you? 
Boy: Good, Thanks for accepting my friend request :) 
Girl: Oh..ok ! you look like a sweet boy. Usually i don't accept stranger's friend request (with a touch of attitude) 
Boy: Hey, now we are friends dear ! 
Girl: Hmmm 
Boy:Noooooo.. 
Girl: What happened ?? 
Boy: I hate that hmmmm 
Girl: Hmmmmmmmmmmmmmm 
Boy: Ok..tell me your favourite food. I like Mexican, chinese 
Girl: Ditto 
Boy: Really ??? 
Girl: Yeah (with smile)! 
Boy: Your favourite past-time ? 
Girl: Listening to music.  

  .......and then there was a long list of things...which they both liked. Both were amazed and obviously happy by finding so many similarities between them.
Boy: What's happening dear ?  
Girl: Never experienced this before ! Feeling a strong connection with you now ! Describe yourself.... 
Boy: I am a sweet,romantic, fun-loving person.  
Girl: Hey, don't describe me! you copycat !! hehehe 
Boy: Really ?? You mean...you too !! 
Girl: Yeah...why this is happening to us? 
Boy: Destiny 
Girl: Hmmm 
Boy: Hey..don't do that! hahaha.. 
        I tell you baby...four more things common and i will fall in love with YOU ! 
Girl: I had cabbage in lunch today. what about you? 
Boy: 1 
Girl: I like the smell of soil after the first rainshower. 
Boy: 2 
Girl: Oh my God ! unbelievable...now this is for sure , can't be the same! The only festival i don't like is Holi. 
Boy: Bye... 
Girl;  What?  
Boy: Seriously bye... 
Girl:  But why....Ohhhh.. ! Is this same too?? 
Boy: Yeah..Please don't force me to fall in love with you dear !! 
Girl:  This is scary! I can never forget this day!! won't tell you the fourth 
Boy: Come on baby...just say it! 
Girl:  Nope 
Boy: Ok...i will tell. I am sure, what i'm going to tell you can't be the same. so you will get rid of me. Here it is.....I LIKE YOU !  
        It can't be same na!! 
Girl: IT IS 
Boy: Then , can i say.. 
Girl:   What ? 
Boy:   I 
Girl:    ya... 

           ........... 
Boy:   You 
Girl:    Hey..you didn't say one word 
Boy:   I ONE YOU 
Girl:    Ok...I won't talk to you now 
Boy:   come on...you know that ! 
Girl:   What? 
Boy:  "I LOVE YOU" 
Girl:  " I LOVE YOU TOO" 
          
End of the story. I named It MAGGI LOVE...happened in few minutes. 

on FACEBOOK...where else !! 

A short story by...Preeti 'Agyaat'

कुछ पहचाने से दृश्य....

जब भी घर से बाहर निकलते हैं ,कुछ घटनाएँ रोज़ ही हुआ करती हैं. हम सभी लापरवाह से अपनी ही धुन में या काम पर पहुँचने की जल्दी में उन्हें दरकिनार कर दिया करते हैं या फिर देखते हुए भी कंधे उचकाकर, ज़्यादा हुआ तो अफ़सोस ज़ताकर आगे बढ़ जाते हैं. उन सपनों पर गौर ही नहीं किया कभी, जिनके पूरे होने की आशा तो शायद उन्हें देखने वालों को भी नहीं...पर फिर भी वो पलकों तले उन ख्वाबों को संजोए हुए हैं. हम उन्हें हौसला क्या देंगे; जीने का ज़ज़्बा तो उन आँखों में है,जिनमें उम्मीद की पतंगें अब भी उड़ा करती हैं. और एक तरफ़ हम जैसे लोग हैं जो ज़रा-ज़रा सी बातों पर दिल को दुखा लिया करते हैं. लेकिन जब किसी के लिए कुछ करने का वक़्त आया, तो निगाहें फेर लेते हैं. ज़्यादा नहीं बोलूँगी, कुछ पंक्तियाँ आप सभी के लिए......... 
 
गली में या गलियारों में 
मंदिर की सीढ़ियों तले 
रोज ही हर चौराहे पर 
या किसी पार्किंग में मिले 
कभी ट्रेन के डिब्बों में 
तो कभी फ़ुटपाथ पर 
सिनेंमाघरों के बाहर 
या होटलों की चौखट पर 
कभी सिर पर बोझा ढोते 
कभी सड़क के गड्ढों में सोते 
रेत के टीलों में शंख है, तलाशती 
ईंटों के टुकड़ों को,बेफिक्री से उछालती
 अक़सर ये बिलखती है 
अक़सर ये तरसती है 
आसमान के छज्जे से लटके 
तारों को गिना करती है 

आम सी हो गई है 
हर कदम पर पाई जाती है 
हमें देख,कितनी दफ़ा 
उम्‍मीद से मुस्कुराती है 
बरसों से हर राह में भटकती 
जीने का सपना संजोती 
हर आते-जाते को देख,अब भी 
दौड़ती आती है...वो नन्ही सी 'ज़िंदगी' !!
 
प्रीति'अज्ञात' 

मच्छर की शोभायात्रा....

कुछ ही दिनों पहले की बात है, हमारी एक मित्र ने 'पहले तो करता है...' पढ़ने के बाद हमसे कहा कि "यार, मच्छर पर लिख कभी! बड़ा परेशान करते हैं!" ये उन मित्रों में से हैं,जो ना सिर्फ़ हमारा लिखा पढ़ते हैं,बल्कि उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी ज़रूर व्यक़्त करते हैं. तो, जाहिर सी बात है.....कि उनकी बात के हमारे लिए काफ़ी मायने हैं. सो, हम भी कह गये शान में....."हाँ-हाँ, क्यूँ नहीं; दो दिन में लिखती हूँ". मुझमें और सलमान में यही तो समानता है..."कि एक बार जो अपुन ने कमिटमेंट कर दी, तो अपने आप की भी नहीं सुनते". फिर क्या था,ख़ुदा गवाह है;हम दो रातों से सो भी ना सके!! जिस बंदे को आज तक ना ग़ौर से देखा और ना ही मारने तक की हिम्मत जुटा पाए(आपने ठीक ही समझा,हम थोड़े डरपोक टाइप हैं),उस पर क्या लिखूं और कैसे?? कम्बख़्त पे प्यार भी तो नहीं आता!!इसी सोच में वज़न भी घटना शुरू हो गया था, कि अचानक समाचार सुनकर हमारी आँखें चमक उठी, दिमाग़ में जल तरंग वादन शुरू हो गया( ये सिर्फ़ दूरदर्शन पर ही आता है, हे भगवान! इस नई जेनरेशन का क्या करें?) देखो तो, वैसे भगवान ने हमारी हर एक फ़रियाद को बेफ़िज़ूल समझकर खारिज़ किया है; पर ये वाली कैसे झट से समझ गये और मान भी ली!!  

जी, हां ! समाचार हमारे राष्ट्रीय अतिथि श्रीमान कसाब(कसाई) जी की मच्छर द्वारा कटाई का ही था. दिल से कह रहे हैं..."पहली बार हमें मच्छर जाति पर फ़ख़्र हुआ"! पहली बार सही टारगेट जो चुना है. सरकार तो अभी तक मूड ही बना रही है, और 'भोलू' ने कर दिखाया! हां,जी हम अब उसे प्यार से 'भोलू जी' कहने लगे हैं! 

लोग इस बेचारी जाति को ग़लत तरीके से इस्तेमाल करते हैं. 'अबे,मच्छर..तेरी ये औक़ात' और भी ना जाने क्या-क्या कहकर बदनाम किए जाते हैं. 

पर आपको क्या ख़बर! यहाँ तक पहुँचने के लिए भोलू को किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा. और नहीं तो क्या, जिसने इतने लोगों का खून पिया हो,उसका खून पीना कोई आसान काम थोड़े ही ना है! बेचारा भोलू तब से उल्टियाँ करे जा रहा है, खाना-पीना सब हराम हो गया; बेचारे का!

दो महीने से ट्रेनिंग ले रहा था. कितनी रैलियों में जाकर 'सेम ग्रुप' का खून पिया. अपनी कई प्रजातियाँ तैयार की.'जस्ट इन केस,टारगेट मिस हो जाए तो'! भई,प्लानिंग तो करनी पड़ती है ना!! "कोई ओलिंपिक थोड़े ही ना है, कि जाओ जी, फॉरिन घूम आओ".......!! 

सुना है'मच्छर-समाज' में भोलू जी की वीरता के बड़े चर्चे हैं. कल उन्हें परमवीर-चक्र से सम्मानित किया जाएगा. पड़ोसी देश से 'मादा एनोफेलेज़' भी शिरक़त कर रही हैं. बाकी बॅक्टीरिया, वाइरस, फंगस को भी आमंत्रित किया गया है. बड़ी शान से शोभायात्रा भी निकलने वाली है. 

वो सब तो ठीक है, पर इस सबके चलते 'भोलू जी' में कहीं 'ईगो' ना आ जाए!! सर जी, अभी तो बहुत लोग बाकी हैं, ध्यान रखिए अपना ! मैं तब तक बाकी लोगों की लिस्ट बनाती हूँ........! 

*अमित जी ने ठीक ही कहा था, "कोई भी इंसान छोटा नहीं होता"! हम तो इस बात पर वैसे भी यकीन करते हैं..और आप???? 

प्रीति 'अज्ञात' 

पहने तो करता है,चुर्र....

 हमारे प्रेरणास्रोत 'गुलज़ार सर' ने जब "इब्न-ए-बतूता....बगल में जूता" लिखा था,तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा, कि लोग उनकी इस बात को इतनी गंभीरता से लेंगे. पर आजकल की खबरों में ऐसी बातें कितनी आम हो गईं हैं,कि हमें भी हैरत है! 
 हमने तो बचपन से ही "मुँह में राम, बगल में छुरी" वाली कहावत सुनी थी, ये 'जूता' तो अब बगल में आने लगा है. वैसे आइडिया ठीक सा ही है...'मार भी दो और मर्डर भी ना हो'! छि:,ये भी कोई बात हुई,घटिया सोच! पर हमें लगता है,कि आने वाले दिनों में इस विषय पर निबंध आ सकता है. ज़रा सोचिए तो ! 'रामू ने राजू को जूता मारा' विषय पर कैसे लिख सकते हैं ? चलिए हम बताते हैं...... 
 सबसे पहले तो इस खेल के नियम -

*सबसे ज़रूरी नियम तो ये है कि जूता हर पार्टी का होना चाहिए. ये नहीं कि हमारा टर्न ही ना आए! 
*हर बार एक अलग पार्टी का बंदा दूसरे को मारेगा,जिससे मीडिया वालों को अच्छा कवरेज मिले! 
*जूता देशी हो या विदेशी, पहले ही तय कर लो. वरना जनता विदेशी प्रभाव का आरोप लगा सकती है! 
*जूते का टाइप भी निश्चित हो, मतलब; बरसाती हो,लेदर का हो, स्पोर्ट्स हो या केनवास, क्यूँकि सबसे अलग-अलग तरह की चोटें लगती हैं जी! अनियमितता के चक्करों में कौन पड़े भाई! 
*मारे गये जूते 'राष्ट्रीय संपत्ति' का हिस्सा माने जाएँगे! 
*ज़रूरत पड़ने पर एक 'जूता-संग्रहालय' भी बनाया जाएगा, जिससे आम जनता को इसकी जानकारी हो..कि किसने कब और कहाँ इसका प्रयोग किया था! 
अब खिलाड़ी बनने के नियम- 

*मारने वाले की लंबाई ज़्यादा होनी चाहिए, जिससे निशाना ठीक से दिखाई दे! 
*वो खुद कमज़ोर हो तो चलेगा,पर जिसे जूता पड़ना है, उसका सीना चौड़ा हो,ताकि लक्ष्य प्राप्ति आसानी से हो सके! 
*अपनी बेइज़्ज़ती के लिए तैयार रहें, आपको लात-घूँसों का ईनाम मिल सकता है! 

अदालत में पूछे जाने वाले सवाल -
*जूता नया था या पुराना? हां, रे..इससे मारने वाले की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा होता है! 
*जूते की गति क्या थी? 
*वह शरीर के किस भाग से टकराया? 
*क्या वहीं लगा,जहाँ निशाना साधा था(इससे पता चलता है, कि कहीं मुलज़िम के घर में ऐसी कोई पुरानी परंपरा तो नहीं)! 
जूता ही क्यों चुना? 
*जी, सर ! ये आसानी से उपलब्ध था! इसे अलग से ले जाना भी नहीं पड़ता! 
*इसकी ग्रिप भी अच्छी होती है और थ्रो भी! 
*लाइसेन्स भी नहीं लगता, सर! 
वजह क्या थी? 
*क्या ये जूता उसे काट रहा था, और वो दुनिया के सामने उसे नीचा दिखाना चाहता था? 
*कहीं इसने किसी और का जूता तो नहीं इस्तेमाल किया? हो सकता है मीलॉर्ड...ये एक सोची समझी साज़िश हो! 
*शायद इसे इस एक जूते से ज़्यादा प्यारी वो दो वक़्त की रोटी थी, जो जेल में मुफ़्त में मिल जाएगी ! 
विशेष -
हां-हां...यही सच है! सब तंग आ गये हैं, ग़रीबी से, बेरोज़गारी से, भ्रष्टाचार से! तंग आ गये हैं अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने वाले राजनीतिक दलों से!  

"कुछ करो, कि सुधार हो,निस्वार्थ जब सरकार हो!  
संसद चले तो शांति से,पर दूर भ्रष्टाचार हो! 
पैसे की जब ना मार हो,ना कोई बेरोज़गार हो! 
फिर दूसरों के सामने,काहे को अपनी हार हो!" 
बहुत हुई ये मारामारी ! शांति से बैठकर बात कीजिए ना! 'मानहानि' का भी ख़तरा नहीं और ना ही 'मनी हानि' का! और क्या 'जूते' सस्ते थोड़े ही ना आते हैं आजकल! 

अब डर तो सिर्फ़ इसी बात का है,कि हमें जूते खरीदने का बड़ा शौक है! कहीं कल के अख़बारों में ये ख़बर ना आ जाए, कि 'अज्ञात' जी के यहाँ से जूतों का एक बड़ा ज़ख़ीरा बरामद हुआ! उफ़...तब हमारा क्या होगा...??? :(

प्रीति'अज्ञात' 

बस यूँ ही....

बड़ा ही अज़ीब सा मूड है आज...कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा ! एक उदासीनता सी है, "जीवन क्या है, क्यूँ है? किसके लिए जीना है?", जैसे सवालों ने दिमाग़ को घेर रखा है. कुछ सवाल उम्र भर अनुत्तरित रहने के लिए ही बने होते हैं, उनके जवाबों की खोज में इंसान खुद भी गुम हो सकता है. फिर भी हम सब अपनी आदत से मज़बूर हो तलाशते रहते हैं. जीवन का एक सच और भी है, जो मैनें महसूस किया है..."दूसरों के लिए जीना बेहद आसान है, बजाए इसके कि हम अपने बारे में सोचने लगें". ना जाने स्वार्थी लोग साँस कैसे ले पाते हैं? पर ये उनकी परेशानी है, अगर इस पर भी हम सोचने लगे, फिर तो गये काम से ! 
 
अपने और पराए की परिभाषाएं ही बदल चुकी हैं. जिस पर आपको अपने आप से भी ज़्यादा विश्वास होता है, वो बड़ी ही आसानी से पलट जाते हैं और जिन्हें हम अपनों में नहीं गिनते, वो अचानक ही अपनापन दे जाते हैं ! जीवन की राहों में कई बार किसी से हुई मुलाक़ात, सपनों को नया रूप देने लगती है..और कभी-कभी उन्हीं सपनों को चकनाचूर करने में भी कोई परहेज़ नही करती ! किस्मत आपके साथ है या बदक़िस्मती ने अब भी आपका दामन थामे रखा है, ये तभी तय होता है. पर कहते हैं ना.."उम्मीद पे दुनिया कायम है" तो फिर डर किस बात का ! लगे रहो, जुटे रहो...कम से कम कोशिश करने की खुशी तो रहेगी ! 
 
जब दिमाग़ घूम रहा हो, तो अपने दोस्तों से ज़रूर बात कर लेनी चाहिए, पर आज की व्यस्त दुनिया में हम ही फालतू से प्रतीत होते हैं. घर की ज़िम्मेदारी, बाहर का सारा काम, कुछ समाज-सेवा भी; इसके बाद भी ना जाने क्यूँ दोस्तों के लिए समय निकाल ही लेते हैं. लोग कहते हैं कि फ़ुर्सत के पलों में टी. वी. देख लेना चाहिए, पर हमें लिखने की ऐसी लत लगी है कि और कुछ सूझता ही नहीं !! हाँ, दोस्तों के पास वक़्त का बड़ा अभाव है. कृपया इसे मेरी शिक़ायत मत समझिएगा, बस यूँ ही लिख दिया है. आप सबकी मज़बूरियों से हम भी वाक़िफ़ हैं !कुछ पंक्तियाँ बन गयी हैं, यकायक..जिनका इस विषय से कोई लेना-देना ही नहीं, फिर भी लिख रही हूँ -
 
"सबसे ज़िक्र किया, उनकी हर इक अदा का 
बस उनसे ही,अपनी बात नहीं होती ! 
यूँ मिला करते हैं,ख्वाबों में आके हमें 
वैसे आजकल हमारी मुलाक़ात नहीं होती !" 

बाहर मौसम का मिज़ाज़ भी बदल रहा है. सुबह-शाम की ठंडी हवा के साथ डालियों पर झूलते फूल-पत्ते माहौल को कैसा 'रोमांटिक लुक' देते हैं! पर रात को खिड़की से झाँकती वही डाली, अचानक ही भयावह लगने लगती है! जैसा कि मुझे जानने वाले समझ ही गये होंगे, मैने खिड़की बंद कर ली है !
 
प्रीति'अज्ञात' 

ज़िंदगी....कब ज़िओगे !


"ज़िंदगी"! एक खुशनुमा शब्द 
    जिसके नाम से ही,जीने का 
 एहसास हो जाता है ! 
    उल्लास का,खुशी का, लुत्फ़ उठाने का 
 नाम ही तो ......"ज़िंदगी" ! 
    लेकिन...वो क्या था....?? 
 जब मैने, जीते हुओ को भी 
    घुट-घुटकर मरते देखा था.. 
 कहीं "ज़िंदगी"......................... 
    "मौत की शुरुआत" तो नहीं???? 

कई बरस पहले लिखी मेरी ये पंक्तियाँ, आज भी कितनी प्रासंगिक लगती हैं ! कितने ही लोग हैं,जो रोज़ सुबह एक सपने के साथ जागते हैं; और सूर्यास्त होने तक अपने उस नन्हे सपने के साथ उदासीन से नींद की गोद में समा जाते हैं. अगली सुबह फिर वही रोना....! जी तो रहे हैं, पर जी नहीं पा रहे ! सब इस "जी" का ही खेल है ,जी ! लग जाए, तो भी मुश्किल और ना लगे तो और भी ! बहरहाल, यहाँ हम काम के सन्दर्भ में "जी" का इस्तेमाल कर रहे हैं ! आपने, कुछ और ही समझा था ना !! चलेगा, होता है !!! 

अपना काम ज़िम्मेदारी से निभाना तो बहुत ही अच्छी बात है, पर उसमें डूबकर अपने आसपास की दुनिया की तरफ जो नज़र भी उठाकर नहीं देख पाए, तो ये जीना भी क्या जीना !! पैसा कमाना ही ज़िंदगी का एकमात्र उद्देश्य रह गया दिखता है. हर वक़्त, हर इंसान के दिलो-दिमाग़ पर बस यही धुन सवार है...पैसा,पैसा,पैसा.... 

ग़रीब होना ज़्यादा अच्छा! उन्हें सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी की ही चिंता होती है. मिल गई; तो बड़े ही चैन की नींद सो जाते हैं. उन्हें सोने के लिए नींद की गोलियों का सहारा नहीं लेना पड़ता. ना ही बैंक-बैलेंस की चिंता!  जीने के लिए चाहिए ही क्या ? खाना,एक घर, बीमारी में लगाने को कुछ पैसे और चलो घूमने के लिए एक गाड़ी भी !मेरे लिए तो एक कार का होना ही बहुत है, काम ही क्या है उस कार का;आपको सर्दी, गर्मी, बारिश के प्रकोप से बचाना! अब वो मारुति हो या फ़ेरारी क्या फ़र्क पड़ता है! अंततः है तो वही चार पहिए वाला आवागमन का साधन! यहाँ मेरा इरादा किसी ब्रांड का अपमान करना नहीं, सिर्फ़ व्यक़्तिगत राय है! तरह-तरह के फोन आ गये हैं मार्केट में. कुछ फल के नाम लगते हैं और कुछ दवाई से ! ब्लेकबेरी और टेबलेट. ये भी कोई नाम हुए! अब सच में ही 'दुनिया अपनी ज़ेब में' आ गई है. पर समझ नहीं आता,कि ये वाकई ज़िंदगी की ज़रूरतें हैं...या कि यूँ ही बस चाहिए! 

परिवार और दोस्तों से हम तब भी जुड़े थे, शायद और बेहतर तरीके से जुड़े थे; जब इन तथाकथित उत्पादों का जन्म भी नहीं हुआ था. पत्र के इंतज़ार में दस-बारह दिन आसानी से काट लिया करते थे और अब अगर दस मिनिट में मेसेज का जवाब नहीं आए, तो लोगों के ब्रेक-अप हो जाया करते हैं. मेसेज भी क्या हैं, टुकड़े हैं..समझ आ जाए तो किस्मत है जी. इसीलिए रिश्ते भी 'एस एम एस' बन गये हैं. मेरी भाषा में 'सब मुरझाए से' ! 

लीजिए...फिर विषय से भटक गये. बात पैसे कमाने की थी...तो मेरा तो यही मानना है. कोई भी हो सब आटे की ही बनी रोटी खाते हैं, किसी के में भी सोने-चाँदी का पाउडर नहीं लगता. फिर दिन-रात की मारामारी क्यूँ? तनाव में क्यूँ जीना? फ़िक्र किस बात की? होड़ किससे से है? चैन से जियो, खुशियाँ बाँटो! सोचो ज़रा..क्या मतलब ऐसे जीने का..जिसमें वक़्त ही नहीं,किसी से बात करने का, पलटकर देखने का, खुशी के पल साथ बिताने का, यूँ ही बेवजह मुस्कुराने का! क्यूँ हम सभी सिर्फ़ पैसा कमाने में मस्त हैं, और आज अपनों तक पहुँचने की सारी लाइनें व्यस्त हैं........!!

साथ ना जाएगा तेरे, कुछ भी
ज़मीन,ज़ायदाद या झूठी शान. 
जीकर भी क्या जिए वो 
जो बन ही ना सके,'इंसान' ! 

दिलों में रह जाएँगीं, बस 
यादें ही होकर, अमर. 
और खाली पड़ा रहेगा,ये 
टूटा,खंडहर सा मकान !  

राज करेंगें वो ,तुम्हारी ही 
मेहनत की भूमि पर.
जिनके लिए, ता-उम्र तुम 
देते रहे हर इम्तिहान ! 

क्या फ़र्क रहा,फिर तुझमें 
और उस ग़रीब में ? 
अंत में,तेरे हिस्से भी तो 
वही राख और वही शमशान..!

प्रीति'अज्ञात' 

छोटी-छोटी खुशियाँ......

             
रात से ही आसमान में कुछ अज़ीब सा समाँ है. काले घने फैले बादल उम्मीद जता रहे हैं, कि आज तो हम बरस ही जाएँगे. बारिश का इंतज़ार तो सभी को रहता है, हाँ..सबकी वज़ह अलग-अलग हो सकती हैं.किसान को फ़सल की चिंता सताती है,आम जनता को महँगाई की फिक्र,सरकार को सड़क पर भरे गड्ढों की पोल खुल जाने की, किसी को उस खुशबू की...जो कि पानी की बूँदों के मिट्टी पर गिरते ही सारे वातावरण को  एक सुगंध से सराबोर कर देती है. पर सबसे ज़्यादा भोली और निर्दोष इच्छा होती है...उस बच्चे की, जो पूरी रात बार-बार खिड़की से बाहर झाँककर ये देखा करता है,कि "कहीं बारिश रुक तो नही गई!". उसे तो अपनी 'रेनी-डे' की छुट्टी से मतलब होता है, बाकी दुनिया की सोचने की उम्र अभी नहीं हुई उसकी !! 
 
 बरसात से जुड़ी कितनी ही यादें है,हम सबकी! कितने ही खूबसूरत पल थे वो, जब हम काग़ज़ की नाव चलाया करते थे. यूँ तो आज भी वही हाल हैं,पानी निकास के.....पर तब पानी कुछ ज़्यादा ही भर जाया करता था. माँ के लाख मना करने के बावज़ूद भी कोई ना कोई बहाने से खिसक लिया करते थे. चेहरे की चमक देखते ही बनती थी, जब हमारी नाव शान से आगे बढ़ती थी,और पड़ोसी के बच्चे की नाव का काग़ज़ गल जाया करता था. कैसी शान से कहा करते थे.."तू ना, अगली बार से थोड़े मोटे काग़ज़ की बनाना..फिर अच्छा रहेगा"! एक गर्व भरी मुस्कान भी बारिश की बूँदों की तरह चेहरे से टपक जाया करती थी.

चप्पलें कीचड़ में फँस जाया करती थी. कभी उस टूटी चप्पल को हाथ में लेकर आते थे या कभी पैरों से घसीटकर! पर लक्ष्य तक तो ले ही आते थे. माँ की डाँट सुनते और बेशरम से खी-खी करके हँसते! पता जो रहता था कि, अभी गरमा-गरम पकोडे ये माँ ही बनाके खिलाएँगी. अपने माता-पिता की क़ीमत का एहसास अक़सर एक उम्र के बाद ही हुआ करता है! जिसे जितना जल्दी समझ आए, बेहतर!! 
 
स्कूल से लौटते समय दिल तो करता था कि उस एक छाते में पूरी क्लास को ही छुपा लें, पर चिंता सबको अपने बॅग की होती थी. ऐसा कुछ नहीं...वो तो इसलिए कि दोबारा ना लिखना पड़े! वैसे उन दिनों ये भी आराम था...लाइट चली जाया करती थी, और हम बेचारे मज़बूरी में नहीं पढ़ पाते थे !ही-ही-ही.... 
 एक फ़र्क ज़रूर आया है, तब और अब में...उस समय चाहे कितनी भी गंदगी या कीचड़ होती थी..तो भी उसमें आराम से यूँ चले जाया करते थे, गोया फूलों के बाग़ में धँस के जा रहे हों. 'लुक' की इतनी परवाह नहीं हुआ करती थी,उन दिनों! 
लीजिए, इस बीच बारिश शुरू भी हो गई...पर अब हमारी चिंताएँ कुछ अलग हैं....
 
जब से नहीं तुम,घर है सूना 
आँखों से है,मेघ बरसता! 
काश! अब आ जाओ फिर से 
घर हमारा है, तरसता!!
 
खो गये तुम हो कहाँ, 
संदेश भी आता नहीं! 
ढूँढा किए, हर घर में तुझको  
क्यूँ खबर,भिजवाता नहीं!!
               
यूँ तो पहले भी,था तुमने 
कई बार ऐसा ही किया! 
पर लौट के आए थे,जब तो 
झूम गया था,ये हिया!!
 
बहुत हुआ,अब आ भी जाओ 
दीवारों को कुछ दो दिलासा! 
कह दो ना, कल दर्शन दोगे 
हे! हमारे काम वाले काका!!
 
दूर रेडियो पर भी हमारी भावनाओं को सहारा देता हुआ, गीत बज रहा है.... 
"आएगा, आएगा,आएगा,आएगा......आने वाला...आएगा..आएगा" ये रेडियो सिटी को भी हमारे मूड की खूब ख़बर रहती है, सोचते हुए हम उठ खड़े हुए......!
 
प्रीति'अज्ञात'