गुरुवार, 9 जनवरी 2014

हम नहीं सुधरेंगे..

 क्या किया जाए, ऐसे प्राणी का...
* गीला तौलिया पलंग पर (कब तक बर्दाश्त किया जा सकता है..)
* गंदे कपड़े, बास्केट के कदमों तले ( निशान छोड़ना ज़रूरी है, न..कि देखो..हमारे पास वाली टोकरी में ही हमें रखना है)
* मोजे, जूते के अंदर न होकर हर असंभव जगह..और जूता? उसे शेल्फ को पार करते हुए सोफ़े के नीचे खिसका देना इनका परम धर्म है (वहाँ रखने से जूते अदृश्य हो जाते हैं क्या?)
* खाने की थाली सिंक के ठीक बाजू में कुछ इस तरह रखी जाती है, मानो थाली ने ही मना कर दिया हो,,कि "आप रहने दो जी, मैं खुद ही अंदर कूद जाऊंगी".
* सुबह उठते से ही चाय के लिए हंगामा, और जब बन जाए तो आधे घंटे बाद ऐसे पधारना, गोया कोई मजबूरी में दवाई पीनी पड़ रही हो.
* खुद के किसी कार्यक्रम में जाना हो, तो सुबह-शाम वक़्त पर तैयार होने का बुलेटिन जारी रहता है और हमारे साथ कहीं जाना हो, तो पूरे घर के तैयार होने के और समय पर पहुँचने की अपनी आदत की हज़ार दुहाईयाँ देने के बाद भी यूँ देखते हैं...."अच्छा, आज ही जाना था, मैं तो २ मिनट में तैयार हो जाता हूँ. तुम्हें ही वक़्त लगता है"! (सीधा-सीधा ताना है, जी)
* जब उनकी पसंद की कोई ख़ास डिश बनाओ, तो एन-डिनर के वक़्त फोन आता है...."मेरा आज बाहर खाना है"
  पर तुमने पहले क्यूँ नहीं बताया कि बाहर खाने वाले हो ?
  उत्तर- तुमने भी तो नहीं बताया, कि ये बनाने वाली हो!
  पर मैंने सोचा सरप्राइज़ दूँगी.
  उत्तर- हो गया ? कोई नहीं, कल खा लूँगा. फ्रिज किसलिए होता है! (हाँ, इसलिए होता है.कि आज बनाओ, रात भर सड़ाओ और अगले दिन खाओ...इससे विटामिन बढ़ जाते हैं न)
* शॉपिंग-मॉल में खुद की ड्रेस लेनी हो तो घंटों रिसर्च (जबकि लेना उन्हीं ४ गिने-चुने रंगों में से तय रहता है, और हमारी राय पर यूँ हिक़ारत से देखा जाता है, कि इसे रंगों की समझ न जाने कब आएगी). पर हमें कुछ लेना हो तो तुरंत ही जवाब.."सुनो, तब तक मैं दूसरे सेक्शन में होकर आता हूँ". दूसरा सेक्शन मतलब वही बोरिंग गेजेट्स वाला! जबकि अब तो सरकार ने भी घर को एक मिनी-इलेक्ट्रॉनिक स्टोर घोषित कर दिया है.
               उफफफ्फ़ ! सात जन्मों का वादा ? एक ही जन्म में दिमाग़ का दही हो गया! और सबसे ख़ास बात...ये लोग नियमित रूप से अनियमित होते हैं, बोले तो....'Regularly Irregular'
अब क्या ये भी बताने की ज़रूरत रह गई है, कि यहाँ किस प्रजाति की बात हो रही है !! 
जो हैं, वो इस वक़्त मुस्कुरा रहे हैं.
जिन पर बीत रही है, उन्हें भी थोड़ी तसल्ली हुई.....कि उनके अलावा भी बहुत से लोग हैं यहाँ !
और जिनकी समझ में ये बात आई ही नहीं..उनके भारतीय होने पर धिक्कार है, जी !

प्रीति 'अज्ञात'

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुधर गए तो भी दिक्कत ......... :)

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  2. जो पेड़ उगते ही टेढ़ा बढ़ने लगता है वह बड़ा होने पर कहाँ सीधा होता है ... है न !
    बातों बातों में बहुत काम की बातें ..

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  3. हा-हा-हा :) सही कहा कविता जी !

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