यूँ होता....तो क्या होता!

यहाँ आपको कुछ जन की और कुछ मन की बातें मिलेंगीं। सबकी मुस्कान बनी रहे और हम किसी भी प्रकार की वैमनस्यता से दूर रह, एक स्वस्थ, सकारात्मक समाज के निर्माण में सहायक हों। बस इतना सा ख्वाब है!

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रविवार, 12 अप्रैल 2020

लौट आई हैं, ग़ुमशुदा छतों की रौनक़ें! #lockdownstories14

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"चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है"  हसरत मोहानी की लिखी इस ग़ज़ल को ग़ुलाम अली...
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Preeti 'Agyaat'
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