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रविवार, 14 जून 2020

एक जादू की झप्पी की तलाश सबको है!


हम सबके मन के भीतर एक कोना ख़ालिस अँधेरे से भी भरा होता है. इस कोने में तमाम टूटे सपने, दबी हुई ख्वाहिशें, खोए हुए रिश्ते और कुछ ऐसी  विषाक्त तस्वीरें ठसाठस भरी होती हैं जिन्हें इंसान चाहकर भी भुला नहीं सकता. उदासी और निराशा भरे दौर में इसी  कोने की खिड़कियाँ अनायास ही धीरे-धीरे फिर खुलने लगती हैं. इससे जुड़ी बुरी स्मृतियाँ चारों ओर से घेर बेतहाशा प्रहार करती हैं. अब मन ये मान लेना चाहता है कि 'मेरा कोई नहीं!' यही वो पल है जब इंसान अपने जीवन का सबसे मुश्किल और ख़तरनाक निर्णय ले लिया करता है. अपने-आप से दूरी बनाने की इस सोच में उसे 'आत्महत्या' ही एकमात्र तरीक़ा नज़र आता है. वो यह भूल जाता है कि उसके जाने के बाद उन लोगों का क्या होगा, जिन्होंने अपना जीवन उससे जोड़ रखा था! क्या मृत्यु सभी शंकाओं का समाधान है? क्या जीवन से हार मान लेना, मृत्यु पर विजय का संकेत है? क्या आत्महत्या संघर्ष से मुँह छुपाकर भागना नहीं होता? लेकिन इस सबके साथ एक प्रश्न और भी उठता है कि इंसान किन परिस्थितियों में मौत को गले लगाता होगा? मर जाना इतना आसान होता है क्या?

आत्महत्या का निर्णय लेते समय, आँखों के सामने माता-पिता का बिलखता चेहरा जरुर झूलता होगा. मन जरुर सोचता होगा कि माँ जाने कब तक आकाश को ताक बादलों में मेरी तस्वीर तलाशेगी. बेसुध हो घंटों रोएगी और एक दिन पागल हो मर ही जाएगी.  पिता के सारे सपने भी उन्हीं की तरह उम्र भर के लिए बिखर जाएंगे. दोस्त फूट-फूटकर रोएंगे और उलाहना देते हुए कहेंगे, "कमीने, एक बार तो गले लग दिल का हाल बताता यार!' कितने सपने जो एक इंसान अपने-आप के लिए देखा करता है, क्या वे सब उस एक पल में आँखों के पानी से न बह जाते होंगे! ख़ुशी के मुट्ठी भर पल ही सही, एक बार तो याद आते होंगे. इन सारे पलों से जीतकर, ऊपर उठ व्यक्ति मर जाने की चाह रख पाता है; तो यह भी हिम्मत का ही काम है. मैं इसे महिमामंडित नहीं कर रही पर क़ाश! यही हिम्मत उसने जीने के लिए जुटा दी होती! 

दिक्कत यही है कि हम सब अपने दुखों को बांटने के लिए एक कंधा तलाश रहे होते हैं कि कोई तो ऐसा हो जो हमें समझे. हमारे सुख-दुःख में साथी बन साथ खड़ा हो. एक ऐसा इंसान जिसके गले लग दुनिया भर के ग़म सदा के लिए अलविदा कह दें. एक ऐसा साथ, जिसका हाथ थाम चल हर यात्रा छोटी लगे. एक ऐसी मुस्कान जिस पर सारे जहां की खुशियाँ क़ुर्बान हो जाएँ. ये ख्व़ाब हम सब देखते हैं. रोज़ देखते हैं.
पैसा, पद, भौतिक सुख-सुविधाएँ ये सब बातें बेमानी हैं यदि आपके जीवन में आपको प्यार करने या समझने वाला शख्स न हो. हर वो ख़ुशी खोखली है जब आप उसे किसी के साथ सेलिब्रेट न कर पाएँ. वो हँसी भी फ़ीकी ही है जिसमें साथी की आवाज़ मिल ठहाकों में तब्दील न हो जाए. दुःख में झरते उन आंसुओं का भी क्या, जो कोई आगे बढ़ उन्हें पोंछ यूँ न कहे कि 'मैं हूँ न!' एक जादू की झप्पी की तलाश सबको है.

ये अपेक्षा ही इंसानों को भीतर से तोड़ रही है. जबकि होना ये चाहिए कि कोई हमारा न भी बन सका तो क्या! हम तो लोगों के जीवन में खुशियाँ भर दें. किसी ने हमें मुसीबत में बीच राह भले ही छोड़ दिया, हम तो किसी की सहायता कर सकें. दूसरों के सुख-दुःख को अपना समझ जिस दिन जीने लगेंगे, उस दिन सारी परेशानियाँ बौनी नज़र आएंगीं. 
समय का रोना सबके पास है. तनाव सबके जीवन में है. डिप्रेशन से बहुत लोग जूझ रहे हैं. इन्हें अपने दुःख का साझेदार न मिला. आसानी से मिलता भी नहीं! ख़ुद को प्यार करना ही इससे निकलने की सरल, सुलभ दवा है. मन कहे तो ढूंढिए किसी ऐसे शख्स को, जो आपकी ख़ुशी का मोल समझे, कुछ लोग आप ही की तरह होते हैं. ग़र  ख़ुशकिस्मती हुई तो अनायास मिल भी सकते हैं. न हों तो आप किसी की ख़ुशी बन जाइए. जीवन ऐसे ही जीता जा सकता है. 
मैं बार- बार आपको कह रही हूँ कि कभी नाउम्मीद न हों. जीवन में रहकर ही इसकी मुश्किलों से लड़ा जा सकता है. समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है. ‘जीवन से बेहतर कोई विकल्प नहीं!’ किसी हाल में नहीं!
 - प्रीति 'अज्ञात'
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#सुशांत_सिंह_राजपूत #क़िरदारों में जान फूँक देने वाला अपनी जान कैसे ले सकता है?


Actor Sushant Singh Rajput Suicide news: जी हाँ, सुशांत सिंह राजपूत नहीं रहे! यह चौंका देने वाली दुखद ख़बर तुरंत ही यक़ीन में नहीं बदल पाती. लगता है जैसे हादसों की एक गहरी खाई है और एक-एक कर सब उसमें डूबते जा रहे हैं. कौन, किसको कब और कैसे बचा पाएगा, ये कोई नहीं जानता.
वो शख़्स जो क़िरदारों में जान फूँक देता था वो अपनी जान कैसे ले सकता है? अब ऐसे में ये क़यास कि कुछ दिनों पहले ही सुशांत की मैनेजर ने भी आत्महत्या की और सुशांत की आत्महत्या की कहानी के तार भी इससे कहीं जुड़े हुए हैं,  मेरा मन ये मानने को अब भी तैयार नहीं! कहते हैं उनकी मैनेजर की मृत्यु के कारणों का भी कुछ पता नहीं चला. जाने वाले तो चले गए, शेष लोगों के हिस्से कहानी के कुछ टुकड़े भर रह जाते हैं जिन्हें जोड़ कारण ज्ञात हो जाए शायद. पर उससे जाने वाला कहाँ लौट सकेगा!  
यूँ कहने को जाना तो हम सबको है, एक न एक दिन. लेकिन यूँ असमय, अचानक किसी का अलविदा कह देना स्तब्ध कर देता है. इस ख़बर को पचा पाना जरा भी आसान नहीं है.

आख़िर सुशांत की मृत्यु पर कैसे विश्वास कर लिया जाए. जबकि हम ये जानते हैं कि वे इस समय बॉलीवुड के सबसे प्रॉमिसिंग कलाकार थे. इनके कैरियर के ग्राफ़ को सबने ऊपर उठते ही देखा है. अपनी सफ़लताओं से जाने कितने युवाओं की आँखों में सुनहरे सपने के बीज बो दिए होंगे सुशांत ने. फ़ौलादी इरादे, आत्मविश्वास और अपार संभावनाओं से भरा चेहरा था उनका. आप वो इंसान भी थे जिसने जीवन के कठिनतम संघर्षों से जूझकर आगे बढ़ना सीखा. अपनी एक पहचान हासिल की. टूटते हौसलों के आगे दम तोड़ते नए कलाकारों के लिए एक जीता-जागता उदाहरण था कि ग़र प्रतिभा हो तो हर हाल में बेहतर मुक़ाम पाया जा सकता है.

इन दिनों कोरोना वायरस के भय और इससे जुड़ी ख़बरों ने यूँ भी भीतर से तोड़ ही रखा है. अवसाद भरे इस काल में मन भविष्य को लेकर तमाम अनिश्चितताओं और आशंकाओं से घिरा हुआ है.बुरी ख़बरों की जैसे बाढ़ सी आ गई है और एक अच्छी ख़बर पाने को दिल तरस रहा है. ऐसे में सुशांत के आत्महत्या करने की न्यूज़ तमाम उम्मीदों पर गहरे तुषारापात सी नज़र आती है. मृत्यु तो वैसे भी नकारात्मकता ही लाती है. बेहद हैरान हूँ और दुखी भी कि अपनी तमाम फ़िल्मों से सकारात्मक संदेश देने वाला, ख़ुशदिल इंसान आख़िर किन परिस्थितियों में जीवन को अलविदा कह देने का निर्णय ले लेता होगा!

कुछ समय पहले सुशांत ने ट्वीट किया था, "पुरुषों में भी भावनाएं होती हैं इसलिए रोने में संकोच न करें. इनको अंदर न रख, बाहर उड़ेल देना सही है. यह कमजोरी नहीं बल्कि ताकत का प्रतीक है. मानव हैं तो महसूस करें. अनुभूति मानवीय होती है."
कितना सही कहा था. इसे पढ़कर लगा था कि ये हम सा ही इंसान है जो हँसता-रोता है और जीवन की ख़ूबसूरती को समझता भी है.
उसके बाद अभी जून में ही सुशांत ने अपनी स्वर्गीय माँ को याद करते हुए एक भावनात्मक इंस्टाग्राम पोस्ट साझा किया था. उन्होंने लिखा, "धुंधला अतीत आंसुओं से वाष्पीकृत हो रहा है. कभी न ख़त्म होने वाले सपने मुस्कुराहट और एक क्षणभंगुर जीवन को गढ़ रहे हैं. दोनों के मध्य बातचीत चल रही है, माँ."
यह पोस्ट अवसाद से कहीं अधिक माँ के प्रति उनका असीम स्नेह कह रही थी. न जाने इस सितारे के मन में क्या था जो किसी से बाँट न सका!

मौत से यूँ कोई कैसे हार सकता है. सुशांत तुम भी नहीं कर सकते थे ऐसा. सौ परेशानियों के बीच भी जीवन कहाँ रुकता है. हजारों किलोमीटर पैदल चलते कामगारों का हौसला भी कहाँ टूटा था. भूख से रोज़ लड़ते हुए लोग भी जी ही लेते हैं एक नई सुबह की आस में. वे लोग जो आधे-अधूरे हैं, वे स्त्रियाँ जिनका मन या चेहरा झुलस गया है वे भी जीवन में उजास भरना जानती हैं. जीवन आसान तो किसी का नहीं होता. सब अपने हिस्से की लड़ाई लड़ ही रहे हैं. तुम तो इन सबसे कहीं ऊपर थे फिर यह कमजोर निर्णय क्यों और कैसे? बहुत से प्रश्न हैं जो अब मन को लम्बे समय तक मथते रहेंगे.  
- प्रीति ’अज्ञात’ #iChowk
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