हस्ताक्षर वेब पत्रिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हस्ताक्षर वेब पत्रिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

जब रावण की लगी लंका!

कल का दिन रावण के लिए कुछ ठीक नहीं गया। माना कि उसकी पुण्यतिथि की शुभकामनाओं वाला दिन था पर इसका ये मतलब थोड़े न कि हर कोई उसे लपेटे में ले ले। जिसे देखो, वही ज्ञान दिए जा रहा था। चलो, ज्ञान वाली बात तो फिर भी क़ाबिले बर्दाश्त है लेकिन उसके व्यक्तित्व से जो खिलवाड़ हुआ, उसका क्या? जो भी हुआ, पूरा घटनाक्रम उसकी मर्यादा के घोर विरुद्ध था। विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि उक्त घटना के बाद, कल रात्रि से लंकेश न केवल आहत अनुभव कर रहे थे बल्कि उन्होंने इस कृत्य की कड़ी निंदा भी की। संवाददाताओं से चर्चा के दौरान नम आँखों से उन्होंने अपना दुख व्यक्त किया। साथ ही यह भी स्वीकार किया कि वे नाहक ही अपनी बुद्धि और शक्ति पर घमंड कर बैठे थे और भगवान जी से पंगा लेने की धृष्टता कर डाली थी। तब उन्हें क़तई इल्म नहीं था कि कलयुग में उनसे भी बड़े सूरमां जन्म लेंगे और बड़ी बेदर्दी से उन्हें भिगो-भिगोकर मारेंगे!
भिया! ये कोई मुहावरा नहीं है! सौ फ़ीसदी सच्ची बात है! बताइए तो, पहले कागजों पर लाखों खर्च कर माचोमैन वाला लुक देने के लिए खपच्चियों का फ्रेम बनवाया गया। उस पर बढ़िया रंगरोगन कर उन्हें खूब सजाया भी गया। चेहरे पर गुरूर का जो भभका पसरा था, उसकी छटा ही निराली थी लेकिन मुई बारिश ने पुतले के साथ हुए सौतेले व्यवहार और भ्रष्टाचार की सारी कलई खोल दी! रावण के दुख की कोई लक्ष्मण रेखा ही न थी। बोला,"कैसे अभियंता हो? इत्ते रुपैया में तो मैंने लंका खड़ी कर दी थी। तुम खर्चने के बाद भी मुझे ठीक से खड़ा नहीं कर पा रहे हो! असुर मित्रों ने बताया कि एक जगह तो मैं खड़े-खड़े ही लुढ़क लिया। यहाँ गल रहा हूँ, वहाँ ढह रहा हूँ। ये कौन सा युग है भाई! हमारी कोई इज़्ज़त फ़िज़्ज़त बची है कि नहीं? कहीं लोग ठेले पे लिए घूम रहे, कोई कौड़ी के भाव बेच रहा तो कोई लाखों में! हमारी डिग्निटी तो मेंटेन करो। ग़ज़ब स्यापा मचा रखा है! क्या यही दिन देखना बाकी रह गया था।" एक किशोर जो ध्यानपूर्वक सारी बातें सुन रहा था, सवा दो इंच की दूरी बनाते हुए उसने रावण जी के घुटने टच कर चरण स्पर्श वाला पोज़ दिया और बड़ी गंभीरता से बोला, “अब इज़्ज़त फ़िज़्ज़त आउटडेटेड हैं बाउजी। विकास के दौर में पूर्वजों की फ़ज़ीहत का जमाना है। किसी की जयंती हो या पुण्यतिथि, हम तो इसी भाव के साथ सेलीब्रेट करते हैं अब। आप तो वैसे भी सत्यापित बुरे प्राणी हो।“
“ओह! मेरे राम ने भी ऐसा न कहा था कभी।“ रावण रुँधे गले से बोला। अब दुख तो जायज था। उस पर इधर दस में से 8 सिरों के हेलमेट (मुकुट) गलकर, पीठ पर चिपक, समय पूर्व ही सामूहिक रूप से भगवान को प्यारे हो गए। देह पर लिपटी रंगीन पन्नियों ने भी अनायास ही विलुप्त होकर सारे तंत्रों का पर्दाफाश कर दिया। हृदय, फेफड़े, यकृत, आमाशय, पित्ताशय एक दूसरे को हैलो करने की नाकाम कोशिश कर एक दूसरे से यूँ टकराते रहे जैसे इंटरव्यू की पंक्ति में लगे बंदे एक-दूसरे से टकराते हैं। कुल मिलाकर परस्पर संशय भाव और अपने अस्तित्व के संघर्ष की पूरी कहानी उस खोखले ढांचे के हर हिज्जे से बयां हो रही थी। अपनी यह गत देखकर माननीय रावण जी स्वयं लज्जित मुद्रा में थे। पूरे समय वे यह कामना करते रहे कि कब धरती फटे और उन्हें अपनी पनाह में ले ले! आत्महत्या का कुत्सित विचार रह-रहकर उनके तंत्रिका तंत्र को उद्वेलित किए जा रहा था। लेकिन ऐसे कैसे! अभी तो अपमान का सीक्वल आना शेष था।
एक-एक कर बारिश उनके वस्त्रों को लीलती रही और फिर वह समय भी आया जिसकी कल्पना भी उनको सिहरा रही थी। अब उनकी देह पर कुछ भी शेष न था। वो अभिमान, वो चमक, वो अट्टहास सब एक बारिश के आगे मिमियाए पड़े थे। उसने तो जल निकास की उत्तम व्यवस्थाओं को देखा था, सो इस बुरेमानुस को क्या पता कि इत्ती बारिश में तो हियाँ बाढ़ में अपन मय रसोई बह लेते हैं।
खैर! रावण जी के नाम पर फिलहाल 300 से 2000 रुपये प्रति फुट (शहरानुसार) की दर से बना जो ढिशक्याऊं ढाँचा सामने दृश्यमान था, उसमें और ट्रेन से यात्रा करते समय रास्ते में कान के बाले से पहने हुए बिजली के जो बड़े-बड़े खंभे मिलते हैं न; में कोई फ़र्क़ न था। दूर कहीं गीत बज रहा था, "बाबूजी, जरा धीरे चलो/ बिजली खड़ी यहाँ बिजली खड़ी" अंकल जी ने दबे स्वर में कहा कि "जी बिजली नहीं, जे तो हम हैं। एक जमाने में हमारे नाम का जलवा था। पूरी लंका थरथर कांपती थी। युगों का जुलम देखो, हमारी ही लंका लग गई।"
उस पर सितम यह कि जिन मुख्य अतिथि महोदय को तीर-ए-नाभि के अभूतपूर्व प्रदर्शन हेतु पधारना था, उनकी दूर-दूर तक कोई ख़बर न थी। रावण अचंभे में था कि कैसा जमाना आ गया है! कहाँ तो सदियों पूर्व मुझ तक पहुँचने के लिए समुद्र पर पुल निर्मित कर लिया गया था और इन ससुरों से एक बारिश न संभल रही! क्या खाक तरक्की की है इन मानुसों ने! हमारे वनमानुष इनसे ज्यादा बुद्धिमान थे। उसने मन ही मन भन्नाया, 'तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं!" तत्पश्चात ईश्वर को पुनः याद करते हुए उनके कमेंट बॉक्स में नमन लिखा। इनबॉक्स में संदेसा भेजा कि अब और प्रतीक्षा न करवाओ, और इम्तिहान मत लो न पिलीज़! बस जल्दी से छाता देकर नेता जी को भिजवाओ। ऊ का है न कि बारिस में हमार नाभि तो न मिलिहे पर साहिब पधारें तो हमका तनिक मोक्ष ही मिल जाही!
कहीं खेत में खड़े बिजूके की तरह उसकी प्राण प्रतिष्ठा भी की गई। उसे स्वयं, अपने निजी व्यक्तित्व को देख जोर की हँसी आ गई कि काश! मैं सचमुच इतना हँसमुख, छरहरा और क्यूटी पाई होता तो कोई मेरी लंका न लगाता! उसने वहाँ खड़े एक युवक से पूछा कि "भई,जब करोड़ों में राशि आबंटित की गई है तो मुझे सैकड़ों में क्यों निबटा दिया? देखो, कितना कुपोषित लग रहा हूँ! सब मेरा उपहास उड़ा रहे!" युवक ने अट्टहास करते हुए कहा कि "तुम्हारा तो दहन ही होना है। इतना पैसा बर्बाद करने की क्या जरूरत?" उसके इतना कहते ही सब हँसने लगे। हर दिशा से अट्टहास की गूँज वातावरण को और अश्लील बना रही थी। जिधर देखो, उसे स्वयं से भी अधिक भयावह चेहरे नज़र आ रहे थे। अब रावण के दुख का पारावार न था।
क्रोधाग्नि और अपमान की ज्वाला में धधकते हुए उसने बगल में खड़े पुलिस वाले की जेब से कट्टा निकाल अपने कान संख्या क्रमांक 1 में डाल ट्रिगर दबा दिया। कुल जमा 19 कनपुरिया मार्गों से गुजरती हुई गोली जब 20 वें कर्णपटल से बाहर निकली तो उसके होश फाख्ता थे। पसीने से लथपथ हाँफते हुए गोली बोली कि “भिया कौन गली में भेज दिए थे हमको? एक तीर से दो शिकार तक तो बात समझ आती है, तुमने 20 की बैंड बजवा दी! अब हमको एनर्जी ड्रिंक लगेगा।” तभी जमीन पर लहराते, गश खाते रावण जी बोल उठे, “क्षमा करें मैम! पर मैं एक ही हूँ। न जाने किस ग्रह पर मेरी आत्मा विचरण कर रही है कि अब तक शांति न मिल सकी! हे राम! अब मुझे इस ब्रह्मांड से मुक्ति दे दो!”
रावण के मुखारविंद से 'हे राम' की ध्वनि उच्चरित होते ही आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी और एक बार फिर रावण को अपार जनसमूह के साथ विदाई दी गई। सभी ने बुराई पर अच्छाई की जीत को महिमामण्डित कर मामले को रफ़ा दफ़ा किया।


गुरुवार, 8 सितंबर 2022

विलुप्तिकरण की अगली श्रृंखला में अब नष्ट होने की बारी मनुष्य की ही है

मई माह के प्रारंभ होते-होते तापमान 40 को पार कर चुका है। भीषण गर्मी से तो लोग त्रस्त हैं ही, उस पर बिजली में कटौती के समाचारों ने रही-सही क़सर भी पूरी कर दी है। एक समय था, जब बिजली चले जाने पर लोग घर के बाहर निकल किसी वृक्ष के नीचे या लीपे हुए आँगन में आकर बैठ जाते थे, हाथ का पंखा झलते थे। प्राकृतिक हवा और प्रकाश से भी काम चल जाता था। लेकिन अब हम विद्युत पर इस सीमा तक निर्भर हो चुके हैं कि इसके बिना दिनचर्या सुचारु रूप से चल ही नहीं सकती! पूरी व्यवस्था ही ठप्प हो जानी है। अभी तो पानी के लिए भी परिस्थितियाँ गंभीर होंगी। आज नहीं तो कल, हम मनुष्यों को यह भीषण मंज़र देखना ही होगा! परंतु तब हमारे पास स्वयं को बचाने और जीवित रखने का क्या कुछ उपाय शेष होगा? इसका उत्तर जानने, समझने में किसी की रुचि नहीं!

यह पावन धरा, जिसे हम बड़ी शान से धरती माँ कहते नहीं अघाते, इसे सहेजने के लिए हमने किया ही क्या है? बस रौंदते ही तो चले जा रहे हैं। हमको छह लेन वाली सड़कें चाहिए, फिर भले ही उसके लिए जंगल के जंगल नष्ट कर दिए जाएं! हम बीच में एक पतली पट्टी पर कुछेक पौधे लगाकर क्षतिपूर्ति का झूठा ढोंग रचते रहते हैं। जबकि सैकड़ों वर्ष पुराने वृक्षों को उखाड़कर कागजी  बोगिनविलिया की एक पंक्ति लगा देना खुद को धोखे में रखने से अधिक और कुछ भी नहीं! एक पौधे को लगाते हुए नेताजी और उनकी पूरी फौज की तस्वीर जरूर छपती है परंतु उस पौधे का कोई अपडेट देखने को नहीं मिलता!
हमने विकास की अंधी दौड़ में अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए नरक तैयार कर दिया है। न पहले से  छायादार वृक्ष रहे और न ही उनसे मिलने वाली प्राणवायु बचेगी। धीरे-धीरे समस्त औषधीय स्त्रोत भी समाप्त हो जाएंगे। भूमि क्षरण यूँ ही बढ़ता रहेगा और जमीन के अंदर का पानी भी सूखता चला जाएगा। प्रदूषण की भयावह स्थिति से नित सामना हो ही रहा है।

कच्ची सड़कें पक्की होती जा रहीं हैं। गाँव शहर बनने की अंधी दौड़ में हैं। सबको ही सुविधा चाहिए। हमने आंदोलन करते किसानों को तो खूब भला-बुरा कहा लेकिन उस किसान पर एक पल को भी ध्यान नहीं गया जो कि प्रत्येक वर्ष मौसम की मार से झींकता, छाती पीट रो-रोकर अब थक चुका है, उसके पास अब तक ऐसे माध्यम नहीं उपलब्ध हो सकें हैं जिससे वह अपनी तैयार फ़सल को रातों-रात बारिश, आग या टिड्डियों से बचा सके। उसे कहीं सुरक्षित रूप से स्टोर कर सके। तंग आकर वह भी अब फैक्ट्री लगाने वालों को अपनी जमीन बेच रहा है।  प्रतिदिन का तनाव कम करके वह एक मोटी रक़म के ब्याज से ही गुजर-बसर कर लेगा!
लेकिन खेती-बाड़ी ऐसे ही बंद होती रही तो हम खाएंगे क्या? कंक्रीट से पटी धरती के भीतर का पानी सूखता रहा, तो पिएंगे क्या? क्या अपने-अपने झंडे लहराने और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ठहराने के बाद हम जब पलटकर देखेंगे तो कुछ बचेगा जीने लायक़? कुछ मिलेगा ऐसा, जिस पर सचमुच गर्व किया जा सके? लाठियाँ और हिन्दू-मुस्लिम राजनीति काम आएंगी क्या?

पर्यावरण संरक्षण पर संगोष्ठियाँ करने से हमारी धरती नहीं बचेगी! ओज़ोन परत में छेद हो या ग्लेशियर के पिघलने की बात, वैज्ञानिक हमें वर्षों से सचेत करते आ रहे हैं। हमें और जंगल बसाने चाहिए थे कि प्रकृति के कोप का भाजन न बनना पड़े लेकिन हमने उन्हें उखाड़ नई इमारतें खड़ी कर दीं। प्राकृतिक संसाधनों को सहेजना था, लेकिन उन्हें नष्ट कर, हमने गगनचुंबी पत्थरों पर गर्व किया। हम कभी ‘सेव टाइगर’ तो कभी ‘गौरैया बचाओ’ के नारे लगाते हैं, खोखली चिंता व्यक्त करते हैं  लेकिन इमारतों के बनने के समय इन्हीं चिड़ियों के बसेरे को उजाड़ने में एक क्षण भी नहीं गँवाते! वो सारे पक्षी और जानवर कहाँ जाएं अब, जिनका घर हमने नष्ट कर दिया? जंगलों में जब आग लगती है तो बस लगती है। इसमें वन संपदा जलकर खाक हो जाती है, तो बस हो जाती है। हमने सदियों से उससे बचने के कोई उपाय सोचे ही नहीं! क्यों सोचें, हमने उन्हें अपना माना ही कहाँ! तभी तो न जाने कितने वन्य जीव भी उस आग में झुलस जाते होंगे, तड़प-तड़पकर मरते होंगें पर हमारा कलेजा एक बार भी नहीं काँपता! उनकी मौत किसी समाचार की हेडलाइन कभी नहीं बनी!
माना कि जब किसी नई परियोजना के चलते किसी गाँव के खेत नष्ट किए जाते हैं तो उन किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा दे दिया जाता है लेकिन उस स्थान के पक्षियों और जानवरों को कहीं बसाया जाता है क्या? उनके लिए कोई परियोजना बनी है क्या? हाँ, खबरें आती हैं कि फलाने साहब के बंगले में चीता घुस आया, जंगली जानवर आ गए! जबकि सच यह है कि उन साहब ने चीते के घर में अपना बंगला घुसेड़ दिया है! जानवर को गोली मार, घसीटकर ले जाया जाता है, ये सोचे बिना कि उसका दोष क्या है? कहाँ रहेंगे वे? उन्हें किस बात का दंड दिया जाता है? किसी दिन यदि वे भी ‘सभ्य’ मनुष्यों की तरह लाठी, दंगे और बुलडोज़र संस्कृति की भाषा सीख गए तो सब तहस-नहस हो जाएगा! लेकिन इतने अत्याचार के बाद जानवरों का हक़ बनता है कि वह मनुष्य प्रजाति से प्रश्न करे।

पारिस्थितिक तंत्र से यह खिलवाड़ ही सारी समस्या की जड़ है। हमें बढ़ती गर्मी की बहुत चिंता है लेकिन हमने हमारे गाँव के कुंए को पाट दिया, नदियों को सूखने दिया। पहाड़ों को काटते जा रहे हैं। हम सारी दुनिया के समक्ष गर्व से धरती माँ को पूजने की बात करते हैं, गंगा और तमाम नदियां हमारी माँ हैं, तुलसी जी भी मईया हैं, नीम-पीपल और तमाम औषधीय वृक्षों पर देव का वास मानते हैं, उनसे विवाह की परंपरा भी रही है, मन्नत का धागा बांधते हैं परंतु जब स्वार्थ की बात आती है तो इन पर कुल्हाड़ी चलाने में जरा भी गुरेज़ नहीं करते!
इतिहास कहता है कि पुराने शासकों ने खूब बावड़ी बनवाईं, वृक्ष लगवाए, मुसाफ़िरों के ठहरने को सराय बनवाईं, जानवरों के लिए भी ठहरने की व्यवस्था होती थी, पक्षियों को दाना-पानी रखने के लिए सुंदर स्थान बनाए जाते थे। लेकिन हमें तो आपस में लड़ने से ही फुरसत नहीं। जिन महाशक्तियों को बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन पर ध्यान देना चाहिए, संतुलन के उपाय खोजने चाहिए थे, उनका सारा ध्यान तो युद्ध पर केंद्रित है। विनाश के पक्षधर देशों से निर्माण की आशा रखना निरर्थक है।
सब अपना-अपना प्रभुत्व जमाने और सत्ता स्थापित करने में लगे हैं। वे इस बात को भूल रहे हैं कि विलुप्तिकरण की अगली श्रृंखला में अब नष्ट होने की बारी हमारी ही है।

चलते-चलते: 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में इसलिए मनाया जाता है कि हम श्रमिकों की उपलब्धियों का सम्मान करें और उनके योगदान का स्मरण रखें। इसका मूल उद्देश्य मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना एवं उनके शोषण को रोकना है।
साथ ही मई महीने के पहले रविवार को ‘विश्व हास्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन लोगों में हँसी के स्वास्थ्य लाभ और उसके सकारात्मक चिकित्सीय प्रभावों को इंगित करने के लिए भी होता है। संयोग से आज 1 मई को ही हास्य दिवस भी है। लेकिन कुछ लोगों ने हर बार की तरह ‘मजदूर दिवस’ को पति/पत्नी के किए गए कार्यों की सूची से जोड़कर इसे ही ‘हास्य दिवस’ बना दिया। हास्य का यह प्रकार अत्यंत क्रूर, हल्का और बेढंगा है। कुछ दिवस अतिरिक्त संवेदनशीलता की माँग करते हैं।

- प्रीति अज्ञात  १ मई २०२२ 

'हस्ताक्षर' मई २०२२ अंक संपादकीय इसे यहाँ भी पढ़ा जा सकता है -
https://hastaksher.com/in-the-next-series-of-extinction-now-it-is-humans-turn-editorial-by-preeti-agyaat/