गुरुवार, 6 अगस्त 2020

आख़िर क्यों अनुत्तीर्ण हुए उत्तरप्रदेश में हिन्दी के विद्यार्थी?



बीते दिनों उ.प्र. माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा हाईस्‍कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम घोषित किये गए. जिसमें लगभग 8 लाख परीक्षार्थी हिन्दी विषय में फेल हो गए. उधर परिणाम आए और इधर उनकी स्वाभाविक विवेचना प्रारम्भ हुई. इन लम्बी-चौड़ी बहसों में अधिकांश का जोर इसी बिंदु पर था कि हिन्दी भाषी राज्‍य होते हुए भी भाषा की ये दुर्गति!
प्रश्न उठता है कि हिन्दी की दुर्दशा कहाँ नहीं हैं? किस प्रदेश में उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है?

यह दयनीय स्थिति क्यों है?
जब आप संभ्रांत मनुष्यों की भाषा का मुकुट आंग्ल भाषा को पहनाते हैं, उसी समय आप अपनी भाषा का दुखद भविष्य निश्चित कर देते हैं.
घर में अतिथियों के आने पर बच्चों का ज्ञान प्रदर्शन करवाते समय उनसे अंग्रेजी भाषा की लघु कविताएँ सुनवा, माता-पिता बलिहारी हुए जाते हैं; परन्तु इन बच्चों को ककहरा सिखाने का कष्ट कोई नहीं उठाता! उन्हें स्वयं याद होगा, यह तथ्य भी संदेह के घेरे में ही समझिये. दोष इन दोनों का नहीं अपितु उस शिक्षा व्यवस्था का है जो प्रतिदिन हमें यह स्मरण कराती है कि आंग्ल भाषा ही आपका उज्ज्वल भविष्य निर्धारित करेगी.
प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यही प्रधान भाषा के रूप में दर्शित होती है.
किसी के सामने अंग्रेज़ी में बात करने का अलग ही रौब समझा जाता है. तो बच्चा क्यों नहीं, हिन्दी छोड़ इस भाषा को प्रधानता देगा! उसे भी तो इसी समाज का हिस्सा बनना है. अपने भविष्य को सुनहरा होता हुआ वह भी देखना चाहता है. ज्ञातव्य हो, यह सोच हमने ही उसे दी है.

कमी यहाँ रह जाती है
भूल यह भी हो जाती है कि हम अपनों को बड़े ही हल्के में ले लेते हैं. 'अरे! तुम तो अपनी ही हो! तुम तो समझोगी ही!' या कि 'ये तो घर की बात है, बाद में देख लेंगे!' जब हम रिश्तों को इस मानसिकता के साथ जीने लगे हैं तो भाषा की बिसात ही क्या! बड़े भी कहते हैं कि "शेष विषयों पर ध्यान दो, हिन्दी में क्या सीखना! ये तो रोज की भाषा है." बच्चे जिन्हें पहले से ही इसे पढ़ना 'कूल' नहीं लगता, वे भी यह मान बैठते हैं कि "रोज़ तो बोलते हैं. इसमें क्या! उत्तीर्ण तो हो ही जाना है." उनका सारा ध्यान अन्य विषयों पर केंद्रित हो जाता है. यही अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबता है. वे मौखिक और लिखित भाषा का मूल अंतर भूल जाते हैं. व्याकरण की अल्पज्ञता का प्रभाव उनकी अंकसूची पर चिह्नित होता है.

दोष किसका है?
अब इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा क्या है? एक तो बच्चे को पहले से ही हिन्दी में रुचि जागृत नहीं हुई, उस पर इस विषय की उपयोगिता भी हम सार्थक सिद्ध नहीं कर सके! ऐसे में उसका झुकाव अन्य विषयों की ओर होना तय ही है. हमारा सामाजिक ढाँचा और शैक्षणिक नीतियाँ ही ऐसी हैं; जहाँ अंग्रेज़ी को, हिन्दी से अधिक सम्मान हर क्षेत्र में दिया जाता है. फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी न बोलने वाले प्रायः उपेक्षित ही होते रहे और हीन भावना का शिकार हुए. दोष उस व्यवस्था का है जिसने अपनी ही भाषा का अपमान कर दूसरी के सिर पर ताज रख दिया.  अंग्रेज़ी से कोई आपत्ति नहीं परन्तु प्रश्न यह है कि उसके सामने हिन्दी कमतर क्यों आँकी जाती है?

वर्तमान स्थिति क्या है?
ऐसा नहीं कि हिन्दी की प्रिंट पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध नहीं. सोशल मीडिया पर भी इनकी संख्या पर्याप्त है लेकिन वर्तमान पीढ़ी में इस भाषा के प्रति रुझान न्यूनतम ही देखने को मिलता है. कारण ऊपर उल्लिखित किये ही जा चुके हैं.
मानकर चलिए कि बच्चों में जो थोड़ी-बहुत हिन्दी शेष है, उसके लिए बॉलीवुड फ़िल्मों और गीतों का बड़ा योगदान है.  
हिन्दी सेवा के नाम पर प्रतिवर्ष संगोष्ठी, परिचर्चा इत्यादि कार्यक्रमों के माध्यम से लाखों फूँका जाता है पर हिन्दी की स्थिति जस-की-तस बनी हुई है. कारण यही कि काग़ज़ी भाषणों में बड़ी-बड़ी बातें कह दी जाती हैं, तालियाँ पिटती हैं, रंगीन तस्वीरें सुर्ख़ियों के साथ प्रकाशित होती हैं. बस, सेवा यहीं समाप्त हो जाती है. जमीनी तौर पर कोई कारग़र नीति भूले से भी दृष्टिगोचर नहीं होती! 
भाषा, हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है, अब इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता आन पड़ी है.
- प्रीति 'अज्ञात'
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प्रखर गूँज 'साहित्यनामा' के अगस्त' 2020 अंक में मेरे नियमित स्तम्भ 'प्रीत के बोल' में पढ़ें-

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