गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

नारायण दभालकर का परम परोपकार राजनेताओं औेर राष्ट्र के लिए शर्म का विषय!

एक खबर कई बार सामने आ चुकी है कि कैसे नागपुर में एक 85 वर्षीय बुज़ुर्ग नारायण दभालकर ने अस्पताल में अपना बेड एक युवक को दे दिया और उसके प्राणों की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया. इस खबर को राजनेता किस मुंह से सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रहे हैं? हर मरीज को बेड उपलब्ध न कराने वाला तंत्र शर्मसार क्यों नहीं होता? निश्चित तौर पर किसी की जीवन रक्षा हेतु अपने प्राण त्याग देना, संवेदनशीलता और त्याग की पराकाष्ठा है. यूं भी हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि वहां त्याग और बलिदान की कई कहानियां सुनने-पढ़ने को मिलती आई हैं.

भारत जैसे विशाल देश में इन कहानियों ने ही हमारे संस्कार और सभ्यता की नींव रखी है. चाहे वह श्रीराम हों, ऋषि दधीचि या फिर नचिकेता और ऐसे ही जाने कितने अनगिनत नाम, जिनकी कहानियों को सुनकर मन आश्चर्य से भर जाता है. हमारे स्वार्थी हृदय को तो सहसा विश्वास भी नहीं होता! लेकिन वो सब सच है परंतु सतयुग का!

कलयुग में ऐसा विरले ही देखने में आया है. स्व. श्री नारायण जी ने जो किया, उसके हम सब साक्षी बने हैं. यह घटना इसलिए भी उल्लेखनीय है कि इस समय कोरोना ने मनुष्य के सामाजिक मूल्यों और नैतिकता को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर रखा है. देश के कई स्थानों से नकली इंजेक्शन बनाने, दवाओं की कालाबाज़ारी, और मरीज़ों से दुर्व्यवहार की खबरें सामने आ रही हैं.

साथ ही हम ये भी देख रहे हैं कि एक बेड के इंतज़ाम में परिजन कैसे चक्कर काट रहे हैं और इस कठिन समय में मनुष्य सिवाय अपनी जान बचाने के और कुछ भी सोच नहीं पा रहा है, ऐसे में किसी का स्वेच्छा से अपना बेड छोड़ किसी और मरीज़ को दे देना, इस कृत्य को अत्यंत सराहनीय और उस व्यक्ति को ईश्वरतुल्य बना देता है. उन बुज़ुर्ग सज्जन के बड़प्पन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है.

नारायण जी की मौत, राजनेताओं के लिए डूब मरने वाली बात
निश्चित तौर से इस अतुलनीय त्याग की इस पूरी घटना पर हमारा भाव-विह्वल होना स्वाभाविक है. लेकिन हमें एक पल को भी नहीं भूलना चाहिए कि 'अगर बेड होता तो वे बच भी सकते थे'. त्याग और बलिदान अपनी जगह है लेकिन किसी भी देशवासी के लिए इससे अधिक शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है कि 'चूंकि अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं है, इस कारण कोई वृद्ध स्वेच्छा से मृत्यु-वरण कर ले!

एक तंत्र के लिए यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय होता है जब एक देह के त्याग करने से दूसरी देह की रक्षा का प्रबंध हो रहा हो! क्या मृत्यु को महिमामंडित करने के स्थान पर हमें 'सिस्टम' से सीधे-सीधे प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि इलाज के अभाव में किसी व्यक्ति की जान कैसे चली गई? क्या इस तरह की मृत्यु अनैतिक नहीं लगती?

इस पूरे घटनाक्रम में किसी का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता? क्या हर जीवन बहुमूल्य नहीं होता? तो फिर ये कैसा अद्भुत 'सिस्टम' है जो हर मृत्यु को उत्सव में परिवर्तित कर देता है! हम आयु के आधार पर जीवन की महत्ता का निर्धारण करेंगे? या कि इस अवधारणा को संपुष्ट समझें कि जब भी कोई गंभीर परिस्थिति आए तो बलि अधिक आयु वाला ही देगा?

डूब मर जाना चाहिए इस तंत्र को जो किसी की मृत्यु पर 'सॉरी' बोलने के स्थान पर आपसे केवल गौरवशाली अनुभव करने की बात करता है. यदि हम सब भी मात्र इसी भाव में डूब गदगद होते रहे तो व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद हमेशा के लिए भूल जाना बेहतर है. आइए, तंत्र की असफलताओं पर गर्व करें और त्याग के नए प्रतिमान गढ़ने को तैयार हो जाएं. 
नम आंखों से, स्व.श्री नारायण जी को विनम्र श्रद्धांजलि.
 - प्रीति अज्ञात 
29 अप्रैल 2021 

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क्या कोरोना को हराने में 'सिस्टम' से हुई ये 7 बड़ी भूलें?

जैसे ही नए ऑक्सीजन प्लांट लगने और उसकी आपूर्ति के समाचार आने शुरू हुए, भक्त लहालोट होने लगे हैं और उन्होंने 'मोहैतोमुहै' कहकर अपनी खींसे निपोरना शुरू कर दिया है. हाँ, हर बार की तरह इस बार भी वे भूल जाना चाहते हैं कि ये रायता माननीय का ही फैलाया हुआ है और अब वे उसे समेटने में लगे हैं. पर क्या करें? दरअसल गलती उनकी नहीं बल्कि  'सिस्टम' की है. 

सरकारी आंकड़ों का काला सच इससे भी पता चलता है कि जिन मरीज़ों की मृत्यु अस्पताल में हुई, बस उन्हें ही गिना जा रहा है. यानी यदि आप अस्पताल की देहरी पर बैठ इलाज़ के इंतज़ार में, एम्बुलेंस में या घर में इस बीमारी के चलते मृत्युलोक सिधार जाते हैं तो आप कोरोना के शिकार नहीं माने जाएंगे. परिजनों को ये मान लेना होगा कि आप हृदयाघात से मरे, मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) से मरे या क्या पता, आत्महत्या ही कर ली हो! मैं ये तो नहीं कहूँगी कि घर में बैठने की सलाह इसलिए ही दी जा रही है कि आँकड़े कम शर्मनाक हों और हम दुनिया को मुँह दिखाने के क़ाबिल रह सकें लेकिन इतना जरूर कहूँगी कि सतर्क रहिए क्योंकि आपदा प्रबंधन के नए पैमाने गड़े जा चुके हैं. 

आवश्यकता से अधिक उत्सव प्रेमी 
कोरोना ने जब इस देश में प्रवेश किया था तो थाली, ताली और मोमबत्ती के आयोजन किये गए, जिसमें हम सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही 'आपदा में अवसर' का सूत्र भी थमा दिया गया था. जिसे पहली लहर में मरीजों के अंग निकालकर बेचने, उनके गहने लूटने और दूसरी लहर में दवा और इंजेक्शन की कालाबाज़ारी ने एक शर्मिंदगी भरे जुमले में बदल दिया है. अब यह वाक्य नकारात्मक समाचार के साथ जुड़ चुका है. 
जब महामारी का असर कम होने लगा तो ये नहीं देखा कि बाकी देशों में दूसरी लहर का आगमन हो चुका है. यहाँ कोरोना को हराकर विश्व गुरु बनने का ताज पहना जाने लगा, वैक्सीन बनने की खुशियां मनाई जाने लगीं और इस गंभीर तथ्य को भूल गए कि हम कोरोनमुक्त देश तब बनेंगे जब 135 करोड़ भारतीयों को ये टीका लग जाएगा. लेकिन चुनाव की जल्दबाज़ी और विजेता के मद में, न तो टेस्टिंग बढ़ाने पर जोर दिया गया और न ही अन्य चिकित्सकीय व्यवस्थाओं को प्राथमिकता!

वैसे तो अपुनिच भगवान है!
जहां श्रेय लूटने की बात आती है, सरकार छाती ठोक 'हमने किया, हमने किया' का गीत गाने लगती है. मानो, वैसे तो ये काम किसी और का रहा होगा लेकिन हाय रे हमारा सौभाग्य! कि इन्होंने कर दिखाया. लोग तो इस खुशी में ही बावले हुए फिरते हैं. जनता नतमस्तक हो जाती है कि प्रभु! हम पर आपके द्वारा ये जो एहसान कर दिया गया है, उससे उऋण कैसे होंगे! 
भैया, ओ भैया! आपको काम करने के लिए ही बेहद विश्वास और बहुमत के साथ चुना गया है. तो जब नाकामी हाथ लगे तो इसका ठीकरा 'सिस्टम' पर मत फोड़ो! क्योंकि ये 'सिस्टम' आपके कहे पर ही चलता आ रहा है. 

जरूरत से सौ गुना अधिक मीडिया प्रबंधन 
सारे चैनल दिन-रात किसकी बंसी बजा रहे,अब ये कोई राज की बात रह नहीं गई है. कभी-कभार आत्मा धिक्कारे, तो सच बोलने की कोशिश भी करते हैं पर उनकी टर्मिनोलॉजी बदल जाती है. अब माननीय का नाम बदलकर 'सिस्टम' कर दिया जाता है. वैसे अन्य संदर्भों में सिस्टम वो शय है जिसे नेहरू जी ने खराब कर रखा है.  
बेचारा, मजबूर 'सिस्टम', स्तुतिगान का पक्षधर है और इस संगीत का भरपूर आनंद लेता है पर उसका दिल बड़ा नाजुक है जी! इसलिए सुर बदलते देख संबंधित विषय की पोस्ट पर प्रतिबंध लगा देता है. बोले तो, 'न रहेगा बाँस... न बजेगी बाँसुरी'. तभी तो, जब हालात बिगड़ने लगे और दुनिया भर में थू-थू होने लगी तो ऑक्सीजन पहुँचाने का ऑर्डर देने से पहले सोशल मीडिया पर कोरोना से सम्बंधित पोस्ट करने वालों पर कार्यवाही करने का ऑर्डर आ गया. अपने आलोचकों का मुँह बंद करने का यही एकमात्र खिसियाना और बचकाना तरीका रह गया है. हालांकि ये यूपी वाले बाबूजी के ठोकने और गाड़ी पलटाने के तरीके से कहीं बेहतर और अहिंसक है. अब भई, इतनी तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी. 
काश! ऐसे ही आपदा प्रबंधन भी कर लिया होता!

जनता की नब्ज़ पर तो हाथ रखा पर दिल टटोलना भूल गए!
वो जनता जो शिक्षा और रोज़गार की बात करती थी, जो भ्रष्टाचार और गरीबी से मुक्ति चाहती थी, जिसने अव्यवस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए थे और 2014 से अपनी आँखों में तमाम सपने भर एक बदलाव की अपेक्षा करने लगी थी, उस जनता की आँखें मूँद दी गईं. उन्हें देशभक्त और देशद्रोही की शिक्षा दी गई. आपस में भिड़ाया गया. फिर एक जगमगाते मंदिर की नींव रख ये यक़ीन दिलाया गया कि तुम यही तो चाहते थे. राष्ट्रवादी जनता फिर दीवानी हो उठी. 
आज वही जनता रोते-बिलखते हुए अस्पताल की मांग करती है, चरमराई चिकित्सा व्यवस्था को देख दिन रात तड़पती है पर शिकायत करे भी तो किस मुँह से? हमने अस्पताल कब मांगे? मंदिर ही तो मांगा था, सो मिल गया! 
हाँ, आप इसे भारतीयों की आस्था से न जोड़ लीजिएगा, यहाँ बात केवल और केवल प्राथमिकता की है
'अयोध्या की तो झांकी है/ मथुरा, काशी बाकी है' कहने वालों से मुझे कोई आपत्ति नहीं, न ही राम मंदिर या लौह पुरुष की भव्य मूर्ति से. ये हमारे देश और संस्कृति की पहचान हैं लेकिन अगली बार जब चुनाव हों तो भले ही यही लोग सत्ता में रहें पर आप उनसे अपना हक़ जरूर मांगना. अच्छे अस्पताल और शिक्षा की बात जरूर करना और ये भी याद दिलाना न भूलना कि जीवन चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, पर इस सिस्टम के हाथों ऐसी निर्दयी मौत कभी न हो!

मसीहा बनने का चस्का
'मोहैतोमुहै' का नारा यूँ ही नहीं बना है. अच्छी खासी रेसिपी है इसकी. पहले किसी समस्या को इतना बढ़ने दो कि देश में त्राहिमाम मच जाए. फिर 'अँधेरी रातों में, सुनसान राहों पर...एक मसीहा निकलता है' की धुन पर इठलाते हुए ठीक 8 बजे टीवी पर अवतरित हो जाओ. फिर एक ऐसी बात कह दो कि जनता स्वयं को धन्य महसूस करने लगे और सारे गिले शिकवे भूल जाए.  
ये ठीक ऐसा ही ही है कि 99 लोगों को मरने दो और 100 वें का नंबर आते ही हीरो स्टाइल में एंट्री लो और उसे बचा लो. फिर बचाने के महान उपकार का वर्णन कुछ इस तरह करो कि जनता अपने भाग्य को सराहने लगे. 
और जो ये प्रश्न पूछे कि उन 99 मौतों का हिसाब कौन देगा? तो उसे देशद्रोही कहकर अपमानित करने के लिए आईटी सेल पहले से ही चाक-चौबंद है. प्रजातंत्र का ऐसा अपमान पहले कभी नहीं देखा. 

कथनी और करनी में अंतर 
आप गमछा बाँधकर टीवी पर तो खूब आए और बहुत ज्ञान भी बांटा लेकिन अफ़सोस कि स्वयं उसे अपनाने में बुरी तरह से विफल हुए. 'दो गज की दूरी, मास्क जरूरी और सोशल डिस्टेंसिंग' का ब्रह्मवाक्य, बंगाल चुनाव की किसी भी रैली में आपके मुखमंडल से एक बार भी उच्चरित नहीं हुआ. क्योंकि आपको तो ठसाठस भरी भीड़ को देखने का सुख लेना था, उनकी तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी छाती को और चौड़ाना था. आप हों या आपके बाल सखा, सभी अहंकारी मुस्कान लिए, बिना मास्क लोगों के बीच घूमते रहे.  उस समय ऐसा लग रहा था जैसे आप किसी  कोरोना मुक्त ग्रह पर विचरण कर रहे हों. हाँ, ये बात अलग है कि वहाँ के आँकड़े जब आएंगे तो सारा ठीकरा दीदी के सर फोड़ दिया जाएगा. 
'छोड़ो दो गज की दूरी, अब चुनाव है जरूरी' के व्यवहार ने ये भी बता दिया कि आपने देश हित से ऊपर स्वयं को रखा. यही नहीं बल्कि इसके साथ-साथ कुंभ में लाखों लोगों को  एकत्रित कर जनता की आस्थाओं को भी सहलाते रहे. जनता ने पहले लॉक डाउन में आपके कहे अनुसार सब किया तो अब वो आपको यूं भीड़ में बोलता देख स्वयं भीड़ बनने से क्योँ सकुचाए?

'आत्मनिर्भर भारत' अब जुमला कम, श्राप अधिक लगता है! 
मात्र कोविड महामारी ने ही हम भारतीयों को दुख नहीं दिया बल्कि कई परिवारों ने उस दर्द को भी सहा है जिसका एहसास उनकी आने वाली पीढ़ियों तक शेष रहेगा. ये लोग पहले एम्बुलेंस की तलाश में दर-दर भटके, फिर अस्पताल की देहरियों पर माथा टेका, उसके बाद बेड की तलाश में नाक रगड़ते रहे, फिर दवाई और ऑक्सीजन सिलिन्डर के लिए गिड़गिड़ाए. कुछ ऐसे अभागे भी रहे जो सारी पूंजी खर्च करने के बाद किसी अपने की अर्थी लिए, श्मशान की प्रतीक्षा पंक्ति में टोकन लिए खड़े हो खून के आँसू बहाते रहे. 'आत्मनिर्भर भारत' के ऐसे अश्लील रूप की कल्पना भी न की थी हमने!
हम वाकई इस सिस्टम से हार चुके हैं. 
- प्रीति अज्ञात 
27 अप्रैल 2021 को iChowk में प्रकाशित

वो दिन हम ही ला सकते हैं!

 इन दिनों जिधर देखो, प्रतीक्षा है. एक ऐसी प्रतीक्षा, जो ईश्वर करे कि किसी के हिस्से में कभी न आये! आदमी बीमार है लेकिन बीमारी पता करने के लिए एक लम्बी लाइन है. टेस्ट हो गया तो उसकी रिपोर्ट के लिए भी प्रतीक्षा करनी होगी. कोरोना पॉजिटिव निकले तो अस्पतालों के दरवाजे खटखटाने होंगे, जहाँ बेड के लिए फिर उसी अंतहीन लाइन से जूझना होगा. हो सकता है किसी अस्पताल की लॉबी में या सड़क किनारे कहीं आपका ठिकाना बना दिया जाए. हालत गंभीर हुई तो इंजेक्शन और ऑक्सीजन के इंतज़ाम के लिए दर बदर ठोकरें खानी होंगी. एम्बुलेंस भी न जाने मिलेगी या नहीं! लेकिन इतने पर भी दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ने वाला क्योंकि जो साँसें टूटीं तो मृत्यु बाद भी यह प्रतीक्षा जारी रहेगी. लाश रखने की जगह अब कम पड़ने लगी है तो उन्हें सामान की तरह एक-दूसरे पर रखा जा रहा है. सड़ती हैं तो सड़ा करें, क्या करें अस्पताल वाले!

अभी तो कहानी और भी है क्योंकि इसके बाद श्मशान घाट पर भी आपकी मृत देह को एक टोकन मिलेगा और जब नंबर आएगा, तब ही आपका जैसे-तैसे अंतिम संस्कार हो सकेगा. कहीं पुरानी क़ब्रों को खोदकर किया जा रहा तो कहीं यूँ ही फेंक भी दिया जाता है क्योंकि अपनी जान सबको प्यारी होती ही है तो कभी-कभी घरवाले ही घबरा जाते हैं. कहीं लकड़ियों की भी कमी हो रही.
ये बात पढ़ने में जितनी क्रूर लग रही, सच्चाई उससे कहीं अधिक कठिन और भयावह है. लेकिन ऐसा असहाय मनुष्य पहले कभी न देखा होगा आपने! वो अस्पताल की देहरी पर दम तोड़ती उम्मीदों के साथ वहीं कहीं, दीवारों पर सिर मारते रह जाता है, चीखता चिल्लाता है. जाने वाले को पुकारता रह जाता है लेकिन जो गया है वो लौटकर कभी नहीं आ पाता! ये एक ऐसी बेबसी है जिससे लाखों परिवार जूझ रहे हैं.
बहुत सी बातें हैं जो इस समय दिमाग़ में घूम रही हैं. न जाने कितनी कह पाऊँगी और कितनी अनकही रह जाएंगी. लेकिन सच तो यह है कि जिस कोविड महामारी ने पिछले वर्ष दस्तक़ दी थी इस बार इसके क़हर से बच पाना मुश्किल हो रहा है. आप कितने भी बड़े तोप हों या किसी भी उम्र के, ये वायरस सबको निगलने को तैयार है. इधर आप अपनी तैयारियों में ढीले पड़े और उधर इसने सेंध बना ली.
हम हमारी जर्जर व्यवस्था पर आँसू बहा सकते हैं, स्वयं बीमार होने या परिजनों को लेकर भटकते हुए हम चिकित्सा व्यवस्था को कोस सकते हैं, प्रशासन पर प्रश्न उठा सकते हैं, सरकार पर आरोप मढ़ सकते हैं. हम मास्क, सैनिटाइज़र और सोशल डिस्टेंसिंग का मज़ाक उड़ा सकते हैं. उनसे होने वाली असुविधाओं पर घंटों बात कर सकते हैं. वैक्सीन न लगाने के पक्ष में ललित निबंध लिख सकते हैं. मोदी-राहुल, कुम्भ-तबलीगी ज़मात पर घंटों बहस कर सकते हैं, चुनाव होने, न होने पर पर गहरा वक्तव्य बाँच सकते हैं. लेकिन इससे हमें मिलेगा क्या? और अब तक क्या पा लिया है हमने? यक़ीन मानिए, कोविड वायरस इन सब बातों से बेअसर है. वो आपके राजनीतिक रुझान को समझ नहीं पाता और आपकी मूर्खताओं पर हँसते हुए पीछे से आकर चुपचाप आपका गला दबोच लेता है.
हमारे हाथ में इतना ही है कि हम वैक्सीन लगवाएं, मास्क का उपयोग करें, अपनी सुरक्षा पर स्वयं ध्यान दें. उसके बाद अगर बीमार हो भी गए तो इस वायरस को हराने की उम्मीद बढ़ जाती है. हमारी जान, हमारे अपनों के लिए बहुत क़ीमती है. हम इसे बचाने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. इस महामारी से मुक्त दुनिया में मनुष्य चैन की साँसें ले सकें, वो दिन भी हम ही ला सकते हैं. ईश्वर सबको सुरक्षित रखे. 🙏
18 अप्रैल 2021 को MP MediaPoint में प्रकाशित

Remdesivir Injection: कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी इंजेक्शन, दवाई भी-लड़ाई भी!

'दवाई भी और कड़ाई भी', कहने को तो देश के बच्चे-बच्चे को यह आदर्श वाक्य रट चुका है. लेकिन जब कोविड उपचार में जीवनरक्षक रेमडेसिविर (Remdesivir) इंजेक्शन की बात आए तो यह एकदम खोखला प्रतीत होता है. 'न दवाई है, न कड़ाई है'. जो सामने दिख रहा है, वो केवल 'दवाई के लिए हो रही लड़ाई' ही है. हालात ये हैं कि इस इंजेक्शन की एक डोज़ का मिलना भी मुश्क़िल दिख रहा है, जबकि गंभीर स्थिति वाले मरीज के लिए छह इंजेक्शन का डोज़ अनिवार्य है. ऐसे में इसे पाना कितना जरुरी है ये केवल उस मरीज़ के परिजन ही समझ सकते हैं. फिलहाल तो दुआ कीजिए कि चुनाव निबटें तो शायद सरकार की नज़र इन ‘छोटे-मोटे’ मुद्दों पर पड़ जाए!

विडंबना यह भी है कि एक तरफ मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है. कहीं तो मास्क न पहनने पर मार-मारकर अधमरा छोड़ देने तक की ख़बरें भी चर्चा में हैं तो वहीं इस बात की भी समुचित व्यवस्था है कि इस इंजेक्शन को पाने के लिए लोग कैसे टूट पड़ें और मारामारी पर उतारू हो जाएँ. बीते कुछ दिनों के समाचार इसके साक्षी हैं.  हाँ, हमारे देश में नेताओं के लिए कोई नियम क़ायदे लागू नहीं होते हैं, वो तो जहाँ जाएंगे छुट्टा मुँह ही! और आपका ये फ़र्ज़ बनता है कि ये साब लोग जहाँ भी मिलें, आप रुलबुक फाड़कर उन्हें सलाम करना न भूलें. देश में वायरस फैलाने के लिए इनके अतुलनीय योगदान के चर्चे अब सदियों तलक होते रहेंगे.

खैर! मुद्दा यह है कि कहने को तो देश की कई प्रमुख कंपनियाँ रेमडेसिविर इंजेक्शन बना रही हैं, लेकिन ये जा कहाँ रहे हैं इसकी सूचना से जनता बेख़बर है. धरातल पर इसे पाने के लिए आम आदमी के हिस्से एक बार फिर वही कड़ा संघर्ष ही आया है. क़ीमत की तो चर्चा ही अलग है! किसी के रेट हजारों को पार कर रहे, तो कोई कंपनी हज़ार से कम में भी इसे उपलब्ध कराने का दावा पेश कर रही है. उस पर तुर्रा ये कि यह वही इंजेक्शन है जो कोविड के पहले दौर में लाखों को पार कर गया था. कुल मिलाकर 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' वाला मामला है. सबके अपने-अपने रेट हैं और जो ब्लैक मार्केटिंग कर रहे, उन असुरों के टशन का तो भगवान ही मालिक है.

आपदा में अवसर! 

'आपदा में अवसर' का इससे सुनहरा रूप और क्या होगा कि इधर आपदा आई और उधर धंधे पनपने लगे. 'तुम मरो या जियो' उनकी बला से! जीवनरक्षक इंजेक्शन की मांग और आपूर्ति का अनुपात पूरी तरह से चरमरा चुका है. ऐसे में दवाई की कालाबाज़ारी करने वालों के अच्छे दिन फिर लौट आये हैं. क्योंकि इसे खरीदने को इच्छुक भीड़ का आलम वैसा ही है जैसा कि कभी थिएटर की टिकट खिड़की पर हुआ करता था. पर वो फ़िल्म थी, आज छूटी तो कल देख ली जाएगी! ज्यादा जल्दी हुई तो ब्लैक में टिकट ख़रीद ली. लेकिन साहिब, ये ज़िन्दग़ी है यहाँ खिड़की पर हाथ धरे हुए ही कब साँसों की डोर हाथ से छूट जाए, कौन जानता है! साँसों की कालाबाज़ारी करने से बड़ा पाप भी कोई और नहीं होता! किसी की मजबूरी का लाभ उठाने से बड़ा ग़ुनाह और कुछ नहीं! लेकिन पापियों को अपना पाप, दिखाई ही कब दिया है! दुर्भाग्य ये है कि पूरी प्रक्रिया में जनता ही पिसती है, वही बलि देती आई है, सरकारें ठुड्डी पर हाथ धरे तमाशा देखती रही हैं कि कब पानी सिर के ऊपर से गुज़रे और वे अपना अवतारी रूप ग्रहण कर जनता को धन्य करें. इस बार भी वही हो रहा.

लेकिन आपको इससे क्या लेना-देना!

जिसका कोई अपना जीवन-मृत्यु से जूझ रहा, वह उसे बचाने की ख़ातिर अपनी जान हथेली पर रख मेडिसिन काउंटर पर गिड़गिड़ा रहा है कि किसी भी क़ीमत पर इस इंजेक्शन को हासिल कर ले. लेकिन हालात ये हैं कि हर जगह निराशा, निराशा और फिर उसका अंत करते हुए एक सफ़ेद चादर से सामना होता है. हिम्मत है तो लाशों के ढेर पर बैठ, अच्छे दिनों की इस उजली तस्वीर को क्लिक कर लीजिए जिससे हम सबको भी एक-न-एक दिन रूबरू होना ही है. 

अरे! सराहिए अपने भाग्य को कि आप डॉक्टरी प्रिस्क्रिप्शन को लेकर शहर भर में नाक नहीं रगड़ रहे. ईश्वर को भी धन्यवाद दीजिए कि उन लाखों मृत शरीरों में आपका कोई अपना नहीं था. लेकिन क़ाश आप उस दर्द को महसूस करते तो कम से कम दवाई पाने के लिए सरकार की नाक में दम तो कर देते! हड़तालें करते, ढोल बजाते, अनशन करते! या कि हम केवल दिए जलाने और थाली पीट गौरवान्वित होने को ही बने हैं? कभी शर्मिंदा होंगे इन हालातों पर?

क्या हमने कभी ये 5 सवाल पूछे हैं?

*आख़िर ऐसा क्यों है कि एक ऐसी बीमारी जिसने पिछले डेढ़ वर्षों से पूरे विश्व को जकड़ रखा है, उसके लिए 'क्राइसिस मैनेजमेंट' के नाम पर ज़ीरो बटा सन्नाटा है?

*सरकारी व्यवस्था ऐसी क्यों होती है कि पहले भयावहता दिखाई जाए और फिर 'ये देखो! हमने कर दिखाया' कहकर अहसान की तरह, सम्बंधित दवाई या इंजेक्शन उपलब्ध कराया जाए. 

* किसी समस्या के विकराल रूप धारण करने तक की प्रतीक्षा क्यों होती है? आम आदमी क्यों दर-दर भीख माँगता फिरे? क्या इतनी महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवाई की उपलब्धता सहज नहीं होना चाहिए या हम हमेशा प्यास लगने पर ही कुंआ खोदते रहेंगे?

* क्या हर चीज़ के लिए 'जुगाड़ तंत्र' ही एकमात्र उपाय है? एक ही दवाई को पाने के लिए, अमीर-ग़रीब के लिए एक सा ही सीधा रास्ता क्यों नहीं होता?

* आम इंसान की लाचारी का फायदा क्यों उठाया जाता है? क्या वो जीवन भर कालाबाज़ारी के दुष्चक्र में पिसने को ही बना है? 

SMS वाले गणितीय सूत्र को कब-कब भूल जाना है?

एक तरफ़ सामाजिक दूरी की बात होती है और वहीं इंजेक्शन और दवाई की ख़ातिर लगी लम्बी लाइनों और मारामारी पर कोई चर्चा नहीं? क्या इस महामारी के दौर में ये सारी दवाइयां हॉस्पिटल के माध्यम से नहीं मिलनी चाहिए? या आम पब्लिक जो अभी इस वायरस से संक्रमित नहीं हुई है, उसे भी इसकी आग में झोंकना जरुरी है? क्या इससे संक्रमण का खतरा और बढ़ नहीं जाता है कि स्वस्थ आदमी  किसी की दवा लेने जाए और भीड़ में कुचलने के बाद संक्रमित होकर लौटे?  

ध्यान रहे, किसी के लिए आपकी मौत एक ख़बर जितनी भी महत्वपूर्ण नहीं है. वैसे ख़बर तो ये भी है कि कोरोना मरीज़ों की मृत्यु दर के आंकड़ों से भी खेला जा रहा है तो हो सकता है आप उन आंकड़ों से भी उड़ा दिए जाएँ. बदनसीब हुए तो क्या पता कि कल को दवाई लेने जाएँ और यही घिसे-पिटे जवाब सुनने पड़ें -

* स्टॉक खत्म हो गया है.

* ऑर्डर किया है, अभी आया नहीं!

* अब इंजेक्शन पेड़ पर तो उगते नहीं है न!

* जी, शिकायत सही मिली, तो काला बाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही की  जाएगी.  

ख़ैर! जितना हो सके, अपना और अपनों का ध्यान रखें. दवाई की नौबत ही न आने दें. अस्पताल मरीज़ों से पटे पड़े हैं लेकिन प्रशासन ने रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाकर कोरोना वायरस को धमका रखा है. अभी तो जहाँ चुनाव हैं, वहाँ के रुझान आने शेष हैं. चुनावी बिगुल में दवाई, कड़ाई, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियों पर कोई ज्ञान नहीं बाँटा जा रहा. शायद कोरोना वायरस के लिए बैरिकेडिंग कर फ़िलहाल उसे सीमाओं पर रोक लिया गया है.

- प्रीति अज्ञात 

8 अप्रैल 2021 को iChowk में प्रकाशित -

सोमवार, 1 मार्च 2021

आख़िर दुनिया में सुसाइड करने वाली हर तीसरी महिला, भारतीय ही क्यों है?


आयशा की आत्महत्या ने फिर से वही सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनसे हम बार-बार बचकर निकलना चाहते हैं. लेकिन क्या इस तरह की घटनाओं और आत्महत्या का ज़िम्मेदार वो समाज नहीं? जो बचपन से ही एक लड़की के दिमाग़ में यह कूट-कूटकर भर देता है कि "वह फूलों की डोली में बैठकर जिस घर में प्रवेश करेगी, उसकी अर्थी भी वहीं से उठेगी!" क्यों उठे उसकी अर्थी वहीं से? यदि वह उस घर में ख़ुश नहीं तो क्या वो उस घर को छोड़कर नया जीवन नहीं जी सकती? कब तक वो अभिशप्त जीवन जीती रहे? 

उसे ये भी समझाया जाता है कि "मारे या पीटे पर पति तो परमेश्वर होता है. थोड़ा तो सहन कर ही लेना चाहिए". हाँ, बिलकुल कर लेगी  लेकिन तब ही, जब पति भी उसके हाथ का थप्पड़ खाकर बर्दाश्त करना सीख जाए और चुप रहे. पढ़ते ही कैसे धक् से चुभ गई न ये बात?

यही होता है कि जब तक स्त्री सहन कर रही है, सब अच्छा है. वो मर भी गई, तब भी हम उन सारे कारणों को ढूँढने में लग जाते हैं जो हमें दोषमुक्त कर दे. लेकिन कब तक? आयशा तो एक नाम भर है जो हमारे समाज की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करता है. लेकिन आँकड़े जो सच्चाई बयान कर रहे हैं, उनसे आख़िर कैसे मुँह फेरा जा सकता है?

भारत में होने वाले तलाक़ की दर दुनिया में सबसे कम है -

प्रतिवर्ष यूनाइटेड नेशंस, ग्लोबल डिवोर्स रेट दर्ज़ करता है. इसके अनुसार पूरी दुनिया में भारत में होने वाले तलाक़ की दर सबसे कम है. यहाँ 1000 शादियों में से केवल 13 में तलाक़ होता है. यह आँकड़ा डेढ़ प्रतिशत से भी कम है. जबकि स्पेन, फ़्रांस, यूनाइटेड स्टेट में सर्वाधिक मामले दर्ज किये गए हैं.

लेकिन इसका मतलब ये क़तई नहीं कि हमारे यहाँ सभी खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं. दरअसल 'हैप्पी मैरिज लाइफ' एक मिथ्या है. हम लोग तोड़ने से बेहतर, बर्दाश्त करने को मानते हैं. समझौता मंज़ूर है हमें, पर अलग होना नहीं!

जो स्त्रियाँ वैवाहिक जीवन से तंग आकर आत्महत्या करती हैं, उन्हें पता है कि इस देश में तलाक़ लेकर जीना आसान नहीं. अकेली स्त्री को उपभोग की वस्तु की तरह देखा जाता है. वो अपने पिता और पति के अलावा और किसी पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाती. गृहिणियों को आर्थिक असुरक्षा का भय भी सालता है. ऐसे में उन्हें यही सही लगता है कि जैसे-तैसे इसी चारदीवारी में जीवन काट दें. वे तलाक़ के स्थान पर, सहजता से घुटन भरे जीवन में रहने के विकल्प को चुन लेती हैं. वे पितृसत्तात्मक समाज के इस सूत्र को अपना ध्येय वाक्य बना बैठती हैं कि 'सुहागन मरना सौभाग्य की निशानी है'.

दुनिया में सुसाइड करने वाली हर तीसरी महिला भारतीय है- 

विश्व की महिला जनसंख्या में भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की आत्महत्या के मामलों में यह 36 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. यानी घुट-घुटकर मरने वाली स्त्री, एक दिन मौत को ही चुन लेती है. दरअसल भारतीय समाज की मानसिकता ऐसी है कि विवाह के बाद बेटी पराया धन मान ली जाती है. मायके में उसका स्वागत तो सदैव होता है लेकिन यदि वो किसी परेशानी के चलते पति का घर छोड़कर आना चाहे तो उसके अपने ही, उसके लिए दरवाज़ा बंद करते नहीं हिचकते. उसे समझौते के लिए समझाया जाता है कि थोडा बर्दाश्त कर, सब ठीक हो जाएगा. समाज के सामने अपनी नाक का हवाला दिया जाता है कि तू मायके आकर बैठ गई तो लोग सवाल करेंगे. लड़की इशारे समझ जाती है और फिर कभी अपनी पीड़ा नहीं बाँटती. 

हर परिवार ऐसी ही संस्कारी लड़की और बहू की अपेक्षा रखता है. "लड़का चाहे कुछ करे, उसका चल जाएगा. पर तू तो लड़की है!"

"मैं तो लड़की हूँ!" यही बात उस लड़की के दिल में भी गहरे बैठ जाती है और फिर वो अपनी महानता, त्याग और बलिदान की पुस्तक भरने के लिए खुद ही अपना सिर, कलम करवाने को तैयार रहती है. क्योंकि वो तो लड़की है! उसे तो महान बनना ही होगा! दुनिया के सामने महान बनते बनते ये लड़की अपनी ही नज़रों में रोज़ गिरती है. सबको खुश रखने वाली ये लड़की, अकेले में रोज़ रोती है. 

हमारे तथाकथित संस्कार हमें हर दर्द को सहने की शक्ति सिखाते ही आये हैं. ऐसे में स्त्रियों के पास उसी नर्क में रहने के अलावा और कोई चारा नहीं होता! और फिर एक दिन जब पानी सिर से ऊपर निकलने लगता है तो वे हारकर इस दुनिया को अलविदा कह देती हैं.

सबसे अधिक सुसाइड के मामले 15 से 29 आयु वर्ग वाली युवतियों के - 

नई पीढ़ी में आत्महत्या की बढ़ती दर बेहद चौंका देने वाली है. प्रेम, बेमेल विवाह, उनके प्रति होने वाले अपराध के चलते युवतियां भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर एवं असहाय महसूस करती हैं. कई बार नौकरी में होने वाली परेशानियों से भी वे तंग आ जाती हैं. भविष्य के लिए देखे गए सुन्दर सपनों की तस्वीर, जब उनके वर्तमान से मैच खाती नहीं दिखती तो वे हताश हो जाती हैं. पापा की परी के भीतर जैसे ही सामाजिक चेतना जागृत होती है, उसके सामने कई भयावह चुनौतियां आ खड़ी होती हैं. उसमें लड़ने की हिम्मत और जज़्बा तो होता है पर धैर्य नहीं. कई बार इनके लिए विद्रोह का तरीका मर जाना ही होता है. वे इतने गहरे अवसाद में चले जाते हैं कि फिर लौट ही नहीं पाते. दोष सामाजिक और पारिवारिक वातावरण का ही है क्योंकि हमने अपने बच्चों को जीतना सिखाया है, सफ़लता पाने की सारी क़िताबें रटा रखी हैं लेकिन असफ़लता से जूझने का पाठ कभी नहीं पढ़ाया. उनके सिर पर हाथ फेरकर कभी नहीं कहा कि हारना भी उतनी ही स्वाभाविक प्रक्रिया है जितनी कि जीतना.

बढ़ती आत्महत्या के कई कारण हैं-

* बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हासिल कर लेने के बाद भी स्त्रियों में सशक्तिकरण का अभाव है. वे अपनी हर ख़ुशी को किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति से जोड़कर देखती हैं. अपना सारा जीवन उसी के इर्दगिर्द समर्पित कर देती हैं और जब एक दिन उससे अलग होने की सोच भी सामने आती है तो वे इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पातीं. उन्हें पुरुष के बिना रहना आया ही नहीं.

* पितृसत्तात्मक समाज में घरेलू स्तर पर वे, प्रारंभ से ही निचले दर्जे पर खड़ी नज़र आती हैं. अपने जीवन से जुड़े हर निर्णय के लिए बचपन में पिता, भाई, फिर पति और अंत में बेटे पर निर्भर. एक परजीवी सा जीवन उन्हें तथाकथित संस्कारों का संरक्षण करना ही सिखाता आ रहा है. अत्याचार सहना पर उफ़ न करना, बचपन में भाई और बड़े होकर पति, बेटे को बचाना, उनकी उम्र के लिए व्रत करना. उन्हें लगता है कि पिता. पति या भाई के अलावा दुनिया उन्हें नोच खाएगी.

* पहले महिलाएं अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार को अपना भाग्य मानकर जीवन काट देती थीं. "भला है बुरा है, जैसा भी है/ मेरा पति मेरा देवता है" को ब्रह्मवाक्य बनाकर जी लेती थीं. अब वे शिक्षित हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी. जब हल नहीं निकलता तो वे कुंठा से भर जाती हैं. कुछ रास्ता नहीं सूझता तो आत्महत्या कर जीवन समाप्त कर लेती हैं.  

कैसा दुर्भाग्य है कि हमने अपनी दुनिया को इतना बदसूरत और असुरक्षित बना डाला है कि स्त्रियाँ यहाँ अकेले जीना ही नहीं चाहतीं. हमें अपनी बेटियों, अपने आसपास की स्त्रियों को सबसे पहला पाठ यही देना है कि वे हर हाल में किसी से कमतर नहीं हैं. हमें उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाना है और धोखे से संभलना भी. उनके दर्द को बांटना, उनकी परेशानियों को सुनना भी सीखना है. उन्हें यह विश्वास भी दिलाना है कि हम उनके साथ खड़े हैं. 

और लड़कियों, तुम आत्मनिर्भर, निडर और सशक्त बनो. हर बात के लिए किसी का मुँह न ताको. जब तक तुम हो, ये दुनिया सुंदर है. तुम्हारी हार, इस दुनिया की हार है.

- प्रीति अज्ञात 

https://www.ichowk.in/society/ayesha-suicide-sabarmati-riverfront-video-every-third-women-committing-suicide-in-world-is-indian-major-women-suicide-reasons/story/1/19566.html

#आयशा #साबरमतीसुसाइड #दहेज़ #आत्महत्या #अहमदाबाद #भारतीयमहिला  #riverfront #Ahmedabad #Blogpost #PreetiAgyaat #iChowk

एक चिट्ठी, इस दुनिया की हर आयशा के नाम!

मेरी प्यारी आयशा 

अभी जबकि लगभग एक सप्ताह बाद पूरा देश मिलकर, महिलाओं को उनके दिवस की बधाई देने में जुट जाएगा, इस बीच तुमने साबरमती में कूदकर अपनी जान दे दी है. इतना ही नहीं बल्कि आत्महत्या से पहले एक वीडियो भी बनाया है जिसका एक-एक शब्द झकझोर कर रख देता है. जीवन के आखिरी पलों के दौरान भी अभिवादन की तुम्हारी तहज़ीब देखकर मैं हैरान हूँ. तुम अंत में थैंक यू कहना भी नहीं भूलतीं. लेकिन सच कहूँ तो तुम्हारी निडर आवाज़ और मुस्कान ने डरा दिया है  मुझे. न जाने वो कौन से पल रहे होंगे कि तुमने मृत्यु को सुख पाने का मार्ग समझ लिया.

मुझे बेहद दुःख और अफ़सोस है कि हम इस दुनिया को तुम्हारे जीने लायक बनाने में विफ़ल रहे.

हम एक ही शहर के हैं पर कभी मिले नहीं. मेरा तुमसे जो नाता है वो साबरमती का है, रिवर फ्रंट का है. ये जगह मुझे हमेशा से सुकून भरी लगती रही है. तुमने भी अपने वीडियो में सुकून की बात कही है. पर कितना फ़र्क है तुम्हारे और मेरे सुकून में! तुम कहती हो "मैं हवाओं की तरह हूँ, बस बहना चाहती हूँ और बहते रहना चाहती हूँ. किसी के लिए नहीं रुकना". और मैं चाहती हूँ कि काश तुम नदी के पानी से अठखेलियाँ करतीं और जीवन धार में बहती जातीं. हर संघर्ष का सामना करतीं. ये जीवन तुम्हारा अपना है, तुम्हें इसे पूरा और बेबाकी के साथ जीना था.

तुम्हारे चेहरे पर सहज मुस्कान है लेकिन आँखों में दर्द का इक सैलाब भरा है. एक ऐसा सैलाब, जिससे हर स्त्री किसी-न-किसी रूप में जरुर रिलेट कर सकेगी. तुम्हारे जो शब्द हैं, वो हमारे मस्तिष्क पर तमाचे की तरह पड़ते हैं. तमाचा, जो बार-बार यही याद दिलाता है कि तुम में और आयशा में कोई फ़र्क नहीं! 

लेकिन ये बताओ कि इतनी मानसिक पीड़ा के बावजूद भी तुमने महान बनने का वह नैसर्गिक गुण क्यों नहीं छोड़ा? जिसे हम स्त्रियों ने सदियों से किसी मंगलसूत्र की तरह दिल से लगाकर रखा है. तुम्हें एक बार को भी नहीं लगा? कि जब तक स्त्रियाँ अन्याय को सहती रहेंगी, उसके विरोध में आवाज़ उठाने की बजाय चुप्पी साध लेंगी और उफ़ तक न करेंगी, तब तक उनकी असमय मृत्यु का ये दौर अनवरत जारी रहेगा! तुम्हें बहुत हिम्मत दिखानी थी, गुड़िया. 

आयशा, तुम्हारी बातें सुन जितनी पीड़ा हुई है, उतना ही क्रोध भी आया है. यूँ भी दिल किया कि तुम्हें डांटकर कहूँ "पागल लड़की! तुम्हें निकल आना था, उस ज़हन्नुम से! डूबते हुए भी तुम एक दहेज़ लोभी इंसान को बचाना चाहती हो? उसे बरी करना चाहती हो? ये कैसी मोहब्बत है तुम्हारी कि जिसने तुम्हारा जीवन बरबाद कर दिया, तुम अपनी जान देकर उसे बचा रही हो?" तुम्हारे पापा-मम्मी ने तुम्हें कितना रोका, क़समें दीं, मिन्नतें कीं. यहाँ तक कि दहेज़ का केस वापिस लेने को भी तैयार हो गए, तब भी तुम हार गईं? तुम्हें नहीं पता कि तुम कितनी भाग्यशाली थीं कि तुम्हारे पेरेंट्स तुम्हारे साथ थे. 

पता है, तुम केवल मोहब्बत हो! और तुम्हें खोने वाले अभागे. तुम अपने पिता से आग्रह करती हो कि "कब तक लड़ेंगे अपनों से? आयशा लड़ाइयों के लिए नहीं बनी. प्यार करते हैं उससे, उसे परेशान थोड़े न करेंगे. अगर उसे आज़ादी चाहिए, ठीक है वो आज़ाद रहे".

काश! तुम्हारी ये बात दुनिया समझ ले तो हर चीज़ सुंदर हो जाए. जो तुम ठहरतीं तो दुनिया आसानी से समझ पाती.

जानती हो, तुमसे कोई गलती नहीं हुई थी और न ही तुम में या तुम्हारी तक़दीर में कोई कमी थी. बस, तुम अपने-आप को नहीं जान पाई. तुम उन अपनों को भी नहीं देख पाई जो तुमसे बेपनाह प्यार करते हैं. तुमने अपना जीवन एक ऐसे इन्सान की ख़ातिर गँवा दिया, जिसे पैसे से प्यार था. लेकिन सारे इन्सान बुरे नहीं होते! 

हाँ, तुम्हारी ये बात सच है कि "मोहब्बत करनी है तो दोतरफा करो एकतरफा में कुछ हासिल नहीं!" इसमें एक बात और जोड़ती हूँ कि मोहब्बत दोबारा भी हो सकती है. ये बात याद रखना अब. 

तुम्हारा आखिरी फोन कॉल दिल दहला देने वाला है, आयशा. तुम्हारे आँसुओं ने बेहद रुलाया है. तुम्हारे माता-पिता का सोचकर भी कलेज़ा कांप उठता है. मैं उस पिता की निरीह अवस्था और हताशा को सोचती हूँ जिसे फ़ोन पर पता चलता है कि अगले ही पल उसकी बेटी नदी में छलांग लगाने वाली है. उस माँ के दर्द को समझने की नाकाम कोशिश करती हूँ जो बार-बार तुमसे रुकने का अनुरोध कर रही है. मासूम लड़की, तुम्हें परिस्थितियों का डटकर सामना करना था. अपने आप को किसी से कम नहीं आंकना था. तुम अपार संभावनाओं से भरा चेहरा थीं.

तुम्हारी विदाई का गुनहगार ये समाज भी है जो तुम्हारे लिए ऐसा वातावरण ही नहीं बना पाया कि तुम स्वयं को अकेला न महसूस कर सको. या फिर इसे तुम्हें अकेले चलना सिखा देना चाहिए था. तुम्हें बता देना चाहिए था कि तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारे जीवन की तरह कितनी अनमोल है. 

मैं तुम जैसी तमाम लड़कियों से कहना चाहती हूँ कि आख़िर हम क्यों अपने सपनों और खुशियों को किसी और के जीवन से जोड़ें? हम क्यों न अपने हक़ की लड़ाई खुद लड़ें? किसी से इतनी अपेक्षा क्यों रखें कि उनके पूरा न होने पर हम ही टूट जाएँ. आत्महत्या, तो अवसाद की पराकाष्ठा है. हम इस राह से बाहर निकल, आत्मसम्मान के साथ जीना क्यों न चुनें? सब अच्छे लोग यूँ दुनिया को छोड़ देना चुन लेंगे, तो इसे संवारेगा कौन?

तुम जहाँ भी हो, हर ख़ुशी तुम्हारे साथ हो.

स्नेह तुम्हें 

प्रीति अज्ञात 

https://www.ichowk.in/society/ayesha-suicide-due-to-dowry-in-jalore-sabarmati-riverfront-in-ahmedabad-recorded-video-is-heart-breaking-open-letter-to-ayesha/story/1/19565.html

#आयशा #साबरमतीसुसाइड #दहेज़ #आत्महत्या #अहमदाबाद #riverfront #Ahmedabad #Blogpost #PreetiAgyaat #iChowk



रविवार, 28 फ़रवरी 2021

आम पत्रकार और रक्षित में जो सबसे बड़ा फ़र्क़ है, वह ज़मीर का है!

"जब सरकार और मीडिया, सत्ता की दौड़ में आपसी सौदा कर लेती हैं तो ख़बरें बनती नहीं, बनाई जाती हैं". कहने को तो ये अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म का संवाद भर है लेकिन इसका शब्द-शब्द सच से भरा है. निस्संदेह सत्ता किसी की भी रही हो, मीडिया के एक धड़े पर उनका कब्ज़ा हमेशा से रहा है. ये ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए वही लोग हैं जिनके लिए हम दलाल, बिके हुए या सरकारी भोंपू जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं. हाँ, इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि निष्पक्ष पत्रकारिता और सच को जस का तस रख देने वाले पत्रकार भी अभी जीवित हैं. रक्षित इसी कड़ी में जुड़ा एक और नया नाम हैं. यह वो नाम है जिसने किसी के आगे झुकने से बेहतर आत्मसम्मान से जीना चुना. यह वो हौसला भी है जिसने स्टूडियो में बैठ चीख-चीखकर झूठ परोसने के बदले, जनता के बीच में खड़े होकर सच्चाई कहने की हिम्मत जुटाई. 


दरअसल किसी भी ख़बर के प्रति हमारी सोच और समझ मीडिया के माध्यम से विकसित होती है. लेकिन जब प्रत्येक चैनल किसी एक घटना या आंदोलन को अपने-अपने नज़रिये से दिखाने लगे और आप किसी निश्चित निर्णय पर न पहुँच सकें, तो मान लीजिए कि अब ख़बर में झूठ का तड़का लगाया जा चुका है. आप बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि अरे उसे तो फ़लाने दल ने ख़रीद लिया है. लेकिन जब आप ये कहते हैं न, तो यक़ीन मानिए आप उस बात की भी पुष्टि कर रहे होते हैं कि जब तक सत्ता के हाथों में खेलते रहें तो 'बिकाऊ' नहीं माना जाता. दरअसल रक्षित ने एक अवसर दिया है मीडियाकर्मियों को आत्मविश्लेषण का. सोचकर देखिए क्या मुख्य अंतर है दोनों में?

* रक्षित कहते हैं कि "इस निर्णय तक पहुँचने में मुझे महीनों लगे. लेकिन जब मेरा बच्चा मुझसे पूछेगा कि बापू,जब देश में जब अघोषित इमरजेंसी लगी थी, तो आप कहाँ थे? तो मैं अपने बेटे से कहूंगा कि मैं सीना ठोक के किसानों के साथ खड़ा था. मैं भूखा मर सकता हूँ. हो सकता है मेरे बच्चे का एडमिशन भी न हो. हो सकता है मेरे परिवार का भी चरित्र हनन हो. मेरी बीवी, मेरी माँ का भी चरित्र हनन हो." 
यह केवल किसी विद्रोही पत्रकार की नहीं बल्कि भावुकता में भरे एक पिता, पति और पुत्र की आवाज़ भी है. इसके हर एक शब्द में हिम्मत है तो वो कसमसाहट भी झलकती है जिससे कई मीडियाकर्मी नित जूझते होंगे. ये मामला किसान आंदोलन से कहीं अधिक पत्रकारों की विवशता का है. 
 
* वे आगे कहते हैं, "पढ़ने के बाद मैंने जयपुर में जूते घिसे, उसके बाद दिल्ली में नौकरी की, ईमानदारी के साथ सब कुछ कवर किया. आज तक मेरे ऊपर कोई चवन्नी का आरोप नहीं लगा सकता. आज की तारीख में मेरा साल का पैकेज 12 लाख का है. इसके अलावा मुझे कुछ आता भी नहीं. मैं तो कुछ व्यापार भी नहीं कर सकता. घर का अकेला लड़का हूँ, कहाँ से पालूँगा?"
इस बात से पता चलता है कि रक्षित को अपने उत्तरदायित्व का ख़ूब ज्ञान है और यह केवल भावुकता में डूबा निर्णय नहीं है. उन्हें अपने उस सपने के डूबने का अपार दुःख है जो इस प्रोफ़ेशन को लेकर कभी उनकी आँखों में चमका करता होगा. अपने भविष्य को लेकर भी वे सशंकित हैं  न जाने कितनी मानसिक पीड़ा और क्षोभ से उभरे होंगे ये शब्द!

*रक्षित यह भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि "एफ़आईआर दर्ज होगी, मुकदमे दर्ज किये जाएंगे. मैं सड़क से जा रहा होऊं तो ट्रक का ब्रेक भी फेल हो सकता है. कुछ भी हो सकता है इस राज में, लेकिन 56 इंच का न सही, 5-6 इंच का सीना है. सीना तान के खड़े हैं. डरते नहीं है किसी से!" यानी वे इस बात को बख़ूबी समझते हैं कि सत्ता के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने वाले का हश्र क्या और कैसा होता है!

*"अगर सच दिखाना बंद कर देते हैं न! तो वो भी झूठ है और इस झूठ के मैं खिलाफ हूँ." रक्षित के वक्तव्य का पूरा सार यही है. आम पत्रकार और उनमें जो सबसे बड़ा फ़र्क़ है वह ज़मीर का है!

पता नहीं! चाटुकार, ग़ुलाम, दलाल, गोदी मीडिया जैसे तमाम लांक्षनों से युक्त पत्रकारिता अपनी खोई हुई इज़्ज़त और विश्वास कब वापिस ला पाएगी! लेकिन यह तो मानना होगा कि रक्षित जैसे पत्रकार इस उम्मीद को बरक़रार ज़रुर रखते हैं.   
लेकिन बात इतने से ही नहीं बनेगी! पत्रकारों की चुप्पी, बैंक बैलेंस बढ़ा सकती है पर भीतर ही भीतर खोखलापन भर देती है. हमें इस बेचैनी और दर्द को भी समझना होगा जिससे मीडियाकर्मी जूझ रहे हैं. उनके भय के भीतर उतर, उनका हौसला जीवित रखना होगा. जगमगाती रोशनी के बीच, अँधेरे में लिपटे मन को उम्मीद जगानी होगी. जब चार वर्षीय बच्चे का पिता यह साहसिक क़दम उठा सकता है तो कोई और क्यों नहीं? सच दिखाने की जो हिम्मत चाहिए उसकी मशाल जल उठी है. 

मैं मानती हूँ कि यह पत्रकारिता का सबसे असहाय दौर है. निर्भीक, निष्पक्ष, बेबाक लिखने वाले मुट्ठी भर लोग हैं. साथ ही यह भी जानती हूँ  कि सबको कटघरे में खड़ा नही किया जा सकता. मुझे तो इस बात का भी भय साल रहा है कि इस घटना में भी कुछ लोग ताली बजायेंगे, कुछ देशद्रोही के आरोप मढ़ने में जमीन-आसमान एक कर देंगे और फिर दोनों ही पक्ष अचानक गायब हो जायेंगे! रक्षित की कहानी पर हम जैसे बहुत लिखेंगे, फिर भुला दी जाएगी! रक्षित का क्या हुआ, कुछ माह बाद कोई जानना भी नहीं चाहेगा!
रक्षित, ईश्वर आपको एवं आपके परिवार को सदा महफूज़ रखे! 
- प्रीति 'अज्ञात'  
  #एबीपीन्यूज़ # रक्षित सिंह  #पत्रकारिता #प्रीतिअज्ञात #Newblogpost #Blog



रविवार, 21 फ़रवरी 2021

#IndianIdol


आज का #IndianIdol माँ को समर्पित था. शायद ही कोई दर्शक होगा जिसका जी न भर आया होगा, गला न अटका होगा!  उस पर मनोज मुंतशिर जी के शब्दों ने हर गीत की भूमिका को जैसे शृंगारित ही कर दिया था. यह विषय है ही ऐसा कि हर इंसान इससे जुड़ा हुआ महसूस करता है. लेकिन इस शो से दर्शकों के ज़बरदस्त जुड़ाव का एक और महत्वपूर्ण कारण है, वो है इसके तीन शानदार जज.

बहुत सारे रियलिटी शोज़ आते हैं और धीरे-धीरे सब एक ही ढर्रे को पकड़ लेते हैं. वही एंकर का किसी एक जज के साथ फ्लर्ट करना, कभी किसी कंटेस्टेंट के बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रैंड का किस्सा या फिर किसी के पापा या मम्मी की नाटकीयता भरी दीवानगी. ये इस हद तक होता है कि कोफ़्त होने लगती है. फिर या तो हम वो प्रोग्राम देखना ही छोड़ देते हैं या फिर उसे रिकॉर्ड कर फॉरवर्ड करते हुए, केवल पार्टिसिपेंट्स की परफॉर्मेंस देखते हैं. लेकिन  #IndianIdol  अकेला ऐसा शो है जो प्रतियोगियों के साथ-साथ उसके जजों के कारण भी देखा जाता है. इतने अच्छे, सच्चे और ईमानदार जज शायद ही किसी और शो में नज़र आते हों.
बात प्रतियोगी को प्रोत्साहित करने की हो, उसे मार्गदर्शन देकर सुधार की कहने की या खुलकर उसकी प्रशंसा करने की...तीनों अपना काम इतनी बखुबी से निभाते हैं कि प्रत्येक कंटेस्टेंट के साथ उनका स्पेशल कनेक्ट दिखता है.

मैं हमेशा से मानती हूँ कि किसी भी रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े होने वाले इंसान बेहद भावुक, संवेदनशील और भावनाओं को गहराई से समझने वाले होते हैं. यही गुण हैं जो इंसान को खूबसूरत बनाते हैं और भीड़ से अलग खड़ा करते हैं. मैं जब विशाल ददलानी, नेहा कक्कड़ और हिमेश रेशमिया को देखती-सुनती हूँ तो बस एक ही बात समझ आती है कि ये तीनों मिट्टी से जुड़े लोग हैं, संगीत और मोहब्बत में सिर से पाँव तक डूबे लोग हैं. अहंकार उन्हें छू भी नहीं गया है. सबसे अच्छी बात यह है कि इनकी बातों में बनावट नहीं है. बच्चों जैसे हँसते हैं और जमकर मस्ती भी करते हैं लेकिन अपने काम के लिए पूरी तरह समर्पित और एकदम संज़ीदा. ऊँचाई तक कोई यूँ ही तो नहीं पहुँच जाता न!

विशाल ददलानी को मैंने पहले भी कई बार निर्णायक की कुर्सी पर बैठे देखा है. उनकी स्पष्टवादिता, समझ, भाषा और संगीत के प्रति सम्मान की प्रशंसक रही हूँ. प्रेम से भरे हैं वे. 
नेहा किसी चंचल, भोली हिरणी की तरह इतनी प्यारी और मासूम हैं कि जब वे जरा सी भी उदास दिखती हैं तो बर्दाश्त ही नहीं होता! जी करता है कि दुनिया जहान की सारी खुशियाँ इस प्यारी लड़की की झोली में डाल दूँ! 
हिमेश रेशमिया को पहली बार इस रूप में देखा है और उनके व्यक्तित्व का सबसे सुनहरा रंग देखने को मिला है, उनके बारे में अलग जानने को मिला है. वे बेहद भावुक और प्यारे इंसान हैं. हाँ, एक बात और है कि उनकी और विशाल की आँखों मे कभी-कभी एक सूनापन भी दिखाई देता है. जैसे कोई गहरी उदासी हो, जैसे कोई अनकही कहानी वहीं ठहर गई हो, जैसे एक दरिया है जो खुद को बहने से रोक लेता है बार बार.  ईश्वर उन्हें जीवन की हर खुशी दे!

फिलहाल बस इतना ही कहकर अपनी बात को विराम दूँगी कि जिसका दिल बड़ा होता है, उसका कद और भी बड़ा हो जाता है. इन तीनों ही जजों का क़द मेरी नज़र में बहुत बड़ा है. 
- प्रीति 'अज्ञात'
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

इंजेक्शन से मर्द को भी दर्द होता है!

सबसे पहले तो मैं इस झूठी कहावत को तत्काल प्रभाव से खारिज़ करना चाहती हूँ कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता!’ भिया, होता है और बहुत जोर से होता है. इतना भीषण होता है कि उसकी चीख ही निकल जाती है. हाल ही में वैक्सीन लगवाते हुए कुछ पुरुषों ने इसके पुख्ता प्रमाण भी दे दिए हैं. वैसे भी एक डायलॉग के चक्कर में कोई कब तक फंसा रह सकता है? सच तो एक-न-एक दिन बाहर आना ही था. 

सच कहूँ, तो सदियों से ये कहावत पुरुषों के गले की हड्डी बन चुकी है. और इसे संभालते-संभालते बेचारों का जबड़ा भी दर्द करने लग गया है. अब तक तो इंजेक्शन के दर्द को पुरुष, अंदर ही अंदर खींच लिया करता था. या फिर कसकर मुट्ठी बाँध, चेहरे पर  अप्राकृतिक मुस्कान मेंटेन करे रहता था. लेकिन अब उसके सब्र का बाँध टूट चुका है और वह खुलकर खुली हवा में चीख पा रहा है.

खैर! अब जब बात छिड़ ही गई है तो मैं अपने देश के वैज्ञानिकों से ये अनुरोध करुँगी कि वे एक ऐसी वैक्सीन बनाएं जिससे वैक्सिनेशन के समय होने वाला दर्द महसूस ही न हो. वैसे सुनने में तो आया है कि अमेरिका वालों ने डाक टिकट के आकार का कोई इंजेक्शन बनाया है जिसे चिपकाकर दवाई भीतर पहुँचा दी जाती है. कोई कह रहा कि नेज़ल ड्रॉप्स टाइप वैक्सीन आ रही है. मतलब कोरोना वायरस को मेन गेट पर ही कुचल दो. अब अगर ये सच है तो आधा हिन्दुस्तान तो इसी बात पर उत्सव मना मिठाई  बाँट आएगा. पर हमारी जेनरेशन वाले लोग इस बात पर विश्वास करें तो करें कैसे? क्योंकि हमें जिस उपकरण से बचपन में वैक्सीन दी गई थी, नाम तो उसका भी इंजेक्शन ही था पर क़सम से उसका लुक और फील स्क्रू ड्राईवर से रत्ती भर भी कम न था. इस बात के गवाह बस हम ही नहीं बल्कि हमारे हाथों पर छपे हुए टीके के वो अठन्नी जैसे निशान भी हैं. आप चाहो तो अपने-अपने घरों के फ़ोर्टी प्लस सदस्यों के हाथ देख, अपनी निजी आँखों से इसकी पुष्टि कर लो.

अच्छा, इंजेक्शन लगवाते समय बच्चों को बुक्का फाड़कर रोते हुए सबने देखा है. ऐसे बच्चे भी इस दुनिया में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो हॉस्पिटल के दरवाज़े पर ही पछाड़ें खाकर फ़ैल जाते हैं. कुछ डॉक्टर को देखते ही मूर्छित हो जाते हैं तथा कुछ विशिष्ट प्रकार के बच्चे दुःख भरा नागिन डांस करते हुए भी पाए जाते रहे हैं. ऐसे पावन अवसरों पर हम, 'अरे! बच्चा है. थोड़ा डर गया है' कहकर टाल देते हैं. लेकिन जब बड़े और समझदार टाइप लोग भी सुई देखकर टसुए बहा, बिलखने लगें तो भई, फिर तो हम जैसे परोपकारी जीवों का इस पर विस्तार से चर्चा करना बनता है.

तो साब, इंजेक्शन की सुई का डर ही ऐसा है कि इसके आगे अच्छे-अच्छों के पसीने छूटने लगते हैं. उनके हॄदय की गति पाँच सौ किलोमीटर प्रति मिनट रफ़्तार से बढ़ जाती है. आँखों की पुतलियाँ चौड़ी होने लगती हैं या मुँह के साथ ही उन्हें कस के भींच लिया जाता है. सुई देखते ही, मस्तिष्क की सारी माँसपेशियाँ उद्वेलित हो, सभी अंगों तक यह दुखद समाचार पहुंचा आती हैं कि अब आप आत्मघाती दस्ते द्वारा चारों तरफ से घेर लिये गए हो. 

अब चाहे आप पुलिस वाले हों, आपकी अपनी बटालियन हो, कद्दावर नेता हों या आप फलाने ढिमकाने राजघराने के पोलो खेलते इकलौते वंशज हों. अजी, इंजेक्शन देखते ही बड़े से बड़े सूरमा भी ढेर हो जाते हैं. सॉरी टू इन्फॉर्म यू, पर वे इंसान जिनकी सुपर मैन टाइप इमेज आपकी आँखों में बसी थी, उन्हें मारे भय के नर्स के सामने गिड़गिड़ाते या आत्मरक्षा हेतु उसे तात्कालिक तौर पर भींचते भी देखा गया है. कुल मिलाकर सब हँसते-हँसते गोली खाने को तैयार हैं, चाहे दवाई वाली हो या बंदूक वाली. लेकिन इंजेक्शन देखते ही इनकी हवाइयां उड़ने लगती हैं और प्रथम दृष्टि में ही वह मासूम, जीवन रक्षक इन्हें तोप के इक्कीस गोलों के एक साथ दागने से भी अधिक मारक एवं भयंकर लगने लगता है. कारण साफ़ है कि गोली तो सीधे-सीधे जान ही ले लेती है न! उसमें सोचने-समझने की गुंजाइश ही कहाँ होती है! पर जानलेवा दर्द तो सुई ही देती है साहिबान! अब आप खींसे निपोरते हुए ये जरूर कहेंगे क़ि हमें तो दरद होता ही नहीं! तो हमारा जवाब बड़ा क्लियर है क़ि ज़नाब! डरते तो सब हैं पर भरी सभा में इसे स्वीकारता कोई-कोई ही है. 

अब इसमें मज़ाक उड़ाने जैसी कोई बात नहीं है. दर्द के बाद इंसान की सारी प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक ही होती हैं. फिर चाहे वो चीखना-चिल्लाना हो या हाथ-पैर फेंकना. लेकिन हम केवल एक जरुरी उपाय बता देते हैं, जिसे अपनाने के बाद रोना थोड़ा कम आएगा या शायद आए ही नहीं! बस, आम पब्लिक इस बात को गाँठ बाँध ले कि जब नर्स आपको इंजेक्शन लगाने आए तो आप उसको घूरें नहीं. (न नर्स को, न इंजेक्शन को). कुछ लोग इंजेक्शन को इस तरह घूरते हैं मानो वो सुतली बम हो कि अब फटा, तब फटा. आप सुई की नोक से ध्यान हटा कर इस बात पर गौर फरमाइए कि जिस वायरस ने पूरी दुनिया में त्राहिमाम मचा रखा है, आपके शरीर में उसे नष्ट करने के हथियार की पहली खेप पहुँच चुकी है. यह भी सोचिए कि जब आप सोशल मीडिया पर ये तस्वीर पोस्ट करेंगे तो कितनी बधाई और नमन इकट्ठा होंगे. देशप्रेमी कहलाए जायेंगे, सो अलग!

अच्छा सोचें और उत्तम फल पाएं. आज नहीं लग सकी हो तो क्या, कल वैक्सीन लगवाएं.

- प्रीति अज्ञात 

आप इसे यहाँ भी पढ़ सकते हैं-

https://www.ichowk.in/humour/coronavirus-vaccination-in-india-questions-is-covid-19-vaccine-injection-painful/story/1/19466.html

#CoronavirusVaccine #injection #मर्द्कोदर्दहोताहै #humour #iChowk #PreetiAgyaat

फोटो क्रेडिट: गूगल 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

#ProposeDay सुनो, मुझे तुमसे मोहब्बत है.


'मेरा दिल भी कितना पागल है/ ये प्यार तो तुमसे करता है

पर सामने जब तुम आते हो/ कुछ भी कहने से डरता है'

'साजन' फ़िल्म का ये गीत यूँ ही अमर नहीं हो गया है. यूँ ही नहीं इसे सुनकर आपकी धड़कनें बढ़ने लगती हैं और आप एक अलग ही दुनिया में चले जाते हो. ये धकधक तो इसलिए होती है क्योंकि आप इससे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. वो किसी को प्यार करने और न कह पाने का जो मलाल है न, असल में आप उससे अब तक उबर ही नहीं पाए हैं. और इस गीत को सुनते ही प्यार का यही मीठा-मीठा दर्द झिलमिलाने लगता है. प्रेम में डूबे प्यारे लोगों! आज Propose Day पर अच्छा मौक़ा है, अपने महबूब या दिलरुबा तक अपने दिल का हाल पहुंचाने का. वरना देख लीजिए, कहीं पहले आप, पहले आप के चक्कर में ये दिन 'मलाल दिवस' न बनकर रह जाए. 

मैं इस बात की प्रतीक्षा कभी न करूँ कि मेरा प्रेमी ही मुझे गुलाब दे या प्रेम का इज़हार वही पहले करे. ये काम तो मैं भी कर सकती हूँ. 'प्रेम' कोई प्रमेय थोड़े ही है कि उन्हीं चरणों से होता हुआ 'इति सिद्धम्' तक पहुंचेगा, जो श्री पायथागौरस महाराज जी समझा गए हैं. अजी, प्रेम का कोई प्रोटोकॉल नहीं होता. जब कोई अच्छा लगे तो उसे सीधे-सीधे बिना किसी लाग-लपेट के कह ही देना चाहिए कि 'यार, तुम बिन नहीं जिया जाता!' हर हाल में, उम्र भर के अफ़सोस से बेहतर, कह देना ही है.   

कोई आपको प्यार करता है, आपके साथ जीने के सपने देख रहा है. इससे ज्यादा प्यारी बात भी कोई हो सकती है क्या? ख़ुद से मोहब्बत होने लगती है, जी. मुस्कान डेढ़ इंच और चौड़ जाती है. मन, महबूब के सपने देखने लगता है और हर प्रेम गीत में वही तस्वीर नज़र आती है. कितनी ही बार दर्पण के सामने, जुल्फों को सँवारते हुए ख़ुद पर इठला लिया जाता है. पूरी क़ायनात तक ये समाचार पहुंचाने का जी करता है कि 'सुनो, उसे मुझसे मोहब्बत है'.

फिल्मों ने भले ही आपके दिमाग़ में ये भर कंफ्यूज कर दिया हो कि हीरो ही पहले Propose करता है  पर असल ज़िंदगी में इस फ़ॉर्मूला के चलते, कई रिश्ते मन के भीतर ही दबे रह जाते हैं. किसी के हिस्से के गुलाब की खुश्बू, बस नोटबुक के निर्जीव पन्ने को महकाती रह जाती है. तो कोई उन ख़तों के उत्तर न दे पाने के मलाल में डूब जाता है जो तमाम मुश्किलों से जूझते हुए उसकी साईकल की पिछली सीट पर अटके मिले थे. धीरे-धीरे गुजरता समय न तो इस खुश्बू को बाँध पाता है और न ही पंखुड़ियों का नर्म अहसास ही बचा पाता है. हाँ, इन सूखी हुई पंखुड़ियों को थामे हुए मन के किसी कोने में अफ़सोस उपजता है और एक आवाज़ भी आती है कि काश! हमने उसे कह दिया होता!   

कितनी अजीब सी बात है न कि प्रेम में डूबी लड़की की सारी सहेलियों को पता होता है कि उसके सपनों का राजकुमार कौन है. लड़के के दोस्त भी इस बात को जानते हैं कि कौन उसकी भाभी बनने वाली है लेकिन हाय रे संकोच और शर्म के मारे, बस उन दोनों को ही एक-दूसरे के दिल का हाल नहीं पता होता, जिनका इसे जानने का पहला हक़ बनता है. प्रिय के सामने आते ही धड़कनें बढ़ जाती हैं, ज़ुबान अटकने लगती है. सौ बातें कर ली जाती हैं, बस इक इश्क़ के सिवाय.

ये बात जरुर है कि लड़कियों की प्रवृत्ति ऐसी रहती आई है कि वे यहाँ भी लड़के की प्रतीक्षा करती हैं! साथ ही ये अपेक्षा भी रहती है कि वही पहल करेगा. मानती हूँ, अच्छा लगता है पर कभी उसे भी तो अच्छा लगाओ. किसी का भी हो, 'दिल' एक सी माँस पेशियों से ही बना है. तुम प्रेम में पहल कर सकती हो. लड़के के दिल का बोझ कुछ तो कम करो, उसे समझो और अपना 'हाल ए दिल' कह ही डालो उससे. 

बड़े से बड़े शूरवीर भी 'इज़हार ए मोहब्बत' के मामले में छुईमुई बन जाते हैं. यहाँ उनकी बात नहीं हो रही जो 'एक गई, दूसरी आएगी' के सिद्धांत पर चलकर प्रेम की झूठी क़समें खाने का ढोंग रचते हैं. बल्कि ये उन सच्चे प्रेमियों के लिए है जो एक-दूसरे की परवाह करते हैं. जो इस डर से कह ही नहीं पाते कि कहीं लड़के/लड़की को बुरा लग गया तो दोस्ती न टूट जाए! वे रिजेक्शन से कहीं ज्यादा एक रिश्ते को खोने से डरते हैं. लेकिन यक़ीन मानिए जहाँ दोस्ती सच्ची होती है, वहां लड़का हो या लड़की, उन्हें डरे बिना अपने दिल की बात कह ही देनी चाहिए. हो सकता है कि दूसरा पक्ष भी यही सोच रहा हो और न भी सोचे, तब भी दिल से जुड़े रिश्ते खोते नहीं, बल्कि ऐसी अभिव्यक्ति से तो और गहरा ही जाते हैं. 

पहले के समय में कबूतर और चिट्ठियों का दौर बेहद ख़ूबसूरत और नाज़ुक था. गलत पते पर पहुँचने के सौ ख़तरे भी थे उसमें. लेकिन इंटरनेट युग ने बहुत कुछ आसान कर दिया है. अब एक क्लिक पर इज़हार किया जा सकता है. यहाँ पहली टिक का मतलब आपके दिल का हाल पते पर पहुंचना है, दूसरा टिक होते ही लिफ़ाफ़ा टेबल पर है  और इन दोनों के नीले रंग में बदलते ही आप उलटी गिनती गिनना शुरू कर दीजिए. कुछ ही पलों में आपके भाग्य का फ़ैसला होने वाला है. यदि इतना भी सब्र नहीं तो सीधे फ़ोन उठाइए और वीडियो कॉल कर लीजिए. यूँ भी यह सबसे बेहतर तरीक़ा है. वरना बाद में यह अफ़सोस भी रह सकता है कि आपने अपने जीवन के सबसे ख़ूबसूरत पल को तस्वीर बनते नहीं देख पाया! मैं तो ये भी कहूँगी कि इन सबके चक्करों में भी क्यों पड़ना! उसके पास जाइए और कोमल हाथों को थाम आज Propose कर ही दीजिए उसे. जी लीजिये इस अहसास को और सुनिए इन धडकनों को. 💓
- प्रीति 'अज्ञात'  
#ProposeDay2021, #Valentineweek, #Propose, #Love #PreetiAgyaat

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

#Valentine week Rose day: गुलाब के साथ बात प्रेम में चुभने वाले कांटों की

आज Rose Day है, वैलेंटाइन वीक का पहला दिन. कई लोग हैं जो आज से प्रेम की जड़ों में मट्ठा डालने बैठ गए होंगे. दुनिया की रीत यही है कि किसी को चैन से जीने नहीं देना है और प्रेमी तो हरगिज़ ही बर्दाश्त नहीं होते. आलम यह है कि प्रेम को मिटाने की कोशिश में समाज अपनों को मिटाने से भी नहीं चूकता. हवाला, वही सदियों पुरानी तथाकथित इज़्ज़त का दे दिया जाता है. न जाने ये इज्ज़त का कौन सा टाइप है जो प्रेम का नाम सुनते ही डूबने, बिखरने और बिलबिलाने लगता है! खैर! कुल मिलाकर दुनिया तो कांटे ही चुभोने बैठी है.

पर ज़नाब! गुलाब को खिलने से भला कौन रोक पाया है. मोहब्बत को इस फ़ूल से जोड़ने का कारण यूँ ही नहीं तय कर लिया होगा! वो इश्क़ का मारा कोई पगला प्रेमी ही होगा या कोई दीवानी प्रेमिका ही रही होगी. इन दोनों ने जमाने भर से लड़, तमाम शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं से गुजरते हुए ही एक-दूसरे को पाया होगा. उन्हें पता है प्रेम की शुरुआत जितनी नरम, मुलायम अहसासों से भरी होती है, उसकी राहों पर चलना दिनों-दिन उतना ही दुष्कर होता जाता है. ये प्रेम ही है जो तमाम दुश्वारियों को रौंदते हुए अपने साथी का हाथ थामे, आगे चलने का हौसला देता है. कँटीली डालियों के बीच पनपता ये कोमल अहसास सुर्ख़ गुलाब सी महकती सुगंध ही देता है और अपने कोमल, मखमली रूप को भी बचाए रखता है. काँटों की हिम्मत नहीं होती जो गुलाब को छू भी सकें.

सोचिए, कितना भरोसा होता है प्रेमियों को एक-दूसरे पर, जो इसकी ख़ातिर जमाने भर की दुश्मनी भी मोल ले लिया करते हैं. सोचिए, कैसे होते हैं वो लोग! जो प्रेम की राह में काँटे बिछा दिया करते हैं. प्रेमियों को ताने देते हैं और अपने मन का सारा ज़हर उनके जीवन में भर देते हैं. यह भी सोचिये, कि कैसे होते हैं वे प्रेमी जो एक-दूसरे पर अथाह विश्वास करते हैं. फिर विचार कीजिए कि प्रेम से जीना अच्छा है या दिल में किसी के प्रति नफ़रत भरकर? 

अरे! चैन से जीने दीजिए प्रेमियों को. सच्चे प्रेमी चाहे जो करें पर किसी का नुक़सान कभी नहीं कर सकते! इनके पास वक़्त ही नहीं होता किसी की बुराई का. किसी को दर्द देने की तो ये सोच भी नहीं सकते. ये तो स्वयं ही एक-दूसरे का मरहम बनते हैं. इनसे चिढ़ने या ईर्ष्या करने की बजाय कभी किसी रोज इन्हें ध्यान से देखिए, इनकी आँखों में झांकिए, इनके चेहरे को पढ़िए. हर जगह बस एक ही नाम दिखाई देगा, मोहब्बत, मोहब्बत, मोहब्बत!

आप 'वैलेंटाइन-वीक' से चिढ़ सकते हैं, इसे अपनी संस्कृति का विरोधी भी कह सकते हैं. लेकिन जरा ग़ौर से देखिए और समझिए कि कोई भी संस्कृति 'प्रेम' की विरोधी हो ही नहीं सकती. एक सप्ताह ही क्यों, हमें तो 'वैलेंटाइन ईयर' मनाना चाहिए. नफ़रतों, लड़ाई-झगडे, मार-काट, ईर्ष्या और मालिक बने रहने की होड़ से भरी इस दुनिया में मोहब्बत की कमी सबसे ज्यादा है. किसी त्योहार की तरह जिया जाना चाहिए मोहब्बत को या यूं कहूं कि मोहब्बत में हर दिन त्योहार सरीखा स्वतः ही हो जाता है.

- प्रीति अज्ञात

https://www.ichowk.in/society/valentine-week-2021-and-celebrations-of-love-but-why-people-hate-lovers/story/1/19336.html

#वैलेंटाइन वीक, #Rose Day, Valentine Week, Valentine Week 2021 #प्रीतिअज्ञात #iChowk 

रविवार, 31 जनवरी 2021

दिल्ली शहर में म्हारो, ट्रैक्टरो जो घुम्यो, हां घुम्यो!



सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे ट्रैक्टर कहते हैं. वैसे उससे भूल ही क्या हुई थी? कब किसी ने सोचा था कि उसे यूँ किसी आंदोलन का हिस्सा बना दिया जाएगा. अपना संस्कारी बालक तो सदियों से दो बड़े, दो छोटे बेमेल पहियों के साथ भी जी ही रहा था न. क्या उसने एक बार भी शिकायत की कि पप्पा, हमको भी ट्रक के जैसे पहिये दिला दो न? खेतों पर चहलकदमी करते हुए उसने कई बार नजदीक से गुजरते हाईवे पर फर्राटा गाड़ियों को देखा. लेकिन कभी उन सड़कों पर चलने की ट्रैक्टर ने जिद न की. चुपचाप खेतों में अपना काम करता रहा. 'लाल किले पर गया ट्रैक्टर' कहकर आपने तो हाय तौबा मचा रखी है लेकिन कभी उस भोले प्राणी की आंखों में झांका? अरे, बचपन से ही जो मिट्टी में खेलता रहा. खेतों से यारियां रखने वाला ट्रैक्टर डीज़ल के लिए भी शहर की देहरी पर न गया. लेकिन, जब शहर में ले ही आया गया तो यहां पांव धरते ही उसकी तमन्नाएं जरा सी भी न मचलेंगीं क्या? लेकिन देखिये कि इस समय देश में सबसे ज्यादा बद्दुआयें जिसके हिस्से आ रहीं हैं वो 'ट्रैक्टर' ही है.

आख़िर होता ही क्या है एक मासूम ट्रैक्टर के पास? वाहनों में सबसे दीन-हीन प्रजाति बनाकर वैसे ही उपेक्षित रख छोड़ा है उसे. न AC है, न पॉवर स्टीयरिंग. कड़क सी सीट है, वो भी अकेली. एकदम सौतेला बनाकर रख दिया था उसे. इससे भी जी न भरा तो भीष्म पितामह वाला फ़ील भी दिया गया उसको. सस्पेंशन के नाम पर नीचे भाले लगा दिए कि बेटा झेल. मिट्टी में सना पड़ा रहा, गाय भैंसों के आसपास खड़ा रहा. सर्विसिंग के नाम पर कुएं के पानी से नहला दिया गया.

लेकिन वो तब भी अपनी गरीबी, फटेहाली को भुला मस्त रहा. बोनट के ऊपर लगे साइलेंसर से अपनी फ्रिक्र को धुएं में उड़ाता रहा. अब वक़्त ने उसे दिल्ली की सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया तो दरद होने लगा सबको. और ऐसा दर्द कि बर्दाश्त ही न हो पा रहा जी. कितने दोग़ले लोग हो यार कि सारा क्रेडिट अन्नदाता को और लानत-मलानत ट्रैक्टर की. भई, वाह! आप तो बम्पर ताली के हक़दार हैं जी.

बताइए, इतनी दूर से चलकर आया और आप कहते हैं कि 'सड़क किनारे चुपचाप खड़े रहो.' मतलब वो वही खेत देखता रहे, जिनसे उकताकर थोड़े चेंज के लिए वह घर से निकल भागा? ये कुछ ज्यादा ही एक्सपेक्ट न कर रहे आप उससे? आई मीन, टू मच हो गया है ये तो. अब ये आप पर है कि आप इसे मासूम के पक्ष में दलील समझें या बिना शर्त माफ़ीनामा.

लेकिन बीते दिनों की घटनाओं के बाद ट्रैक्टर की जो बेइज़्ज़ती हुई है उससे वह भारी दुःख में भर गया है. बेचारा, बस एक दिन के लिए तो दिल्ली आया था, चाह रहा था कि पूरी राजधानी देख ले. हमारा फ़र्ज़ बनता था कि उसे पूरे शहर की सैर कराते. लेकिन पुलिसवालों ने बैरिकेड लगा दिए. किसी को भी गुस्सा आ जाएगा. अब देखो न, अति उत्साह में अपने गांव का छोरा नाहक ही बदनाम हो गया.

आपको लगता है कि Tractor ने बदला character लेकिन एक बार भी सोचा कि उसका दिल कितनी बार रोया होगा? देखिए बेचारा कल से 'हम बेवफ़ा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके' गुनगुना रहा है. समय किसी को क्या से क्या बना देता है, साब! सोचने वाली बात ये भी है कि जिन्होंने ट्रैक्टर परेड की इजाजत दी, उनको देखना चाहिए था कि ये नन्हा फ़रिश्ता, शहर में चल पाएगा या नहीं.

सम्बंधित विभाग के अधिकारियों को राजधानी की चकाचौंध में उसके खो जाने का अंदेशा क्यों न हुआ पहले से ? भूल गये क्या बचपन के उस मेले को जिसमें लाल शर्ट और काली निक्कर पहने, खोया हुआ बच्चा पुलिस चौकी के पास पछाड़े खाता मिलता है. बस, डिट्टो ऐसे ही ये भोलू भी पाया गया. रास्ता भटक गया था तो लोगों ने उसे किले के पास पहुंचा दिया.
सबको पता था कि पुलिस उधरिच मिलेगी और इसे घर भिजवाने में दिल से सहायता भी करेगी. गांव में तो अलाव भी था. वहां सड़क किनारे बेचारा कडाके की सर्दी में ठिठुरता रहा. क्या पता, धूप सेंकने ही निकल गया होगा मेरा बच्चा. अब कोरोना काल में विटामिन-डी की महत्ता से तो आप भी इंकार नहीं कर सकते.

वो मासूम अभी अपने दुःख से बाहर निकलने का रास्ता खोज ही रहा था कि गांव से ट्रॉली मेम का कॉल आ गया. उन्होंने अलग ही लेवल का गदर मचा रखा है. इस मासूम के ज़ख्मों पर रुई का ठंडा फाहा रखने की बजाय, नमक नींबू निचोड़ एकदम मसलकर रख दिया है, बेचारे को.
सरसों के खेत में, धूप लेते हुए अपने चीनी मोबाइल से उन्होंने जो कड़वे स्वर निकाले हैं न कि भगवान बचाए ऐसी ट्रॉलियों से. कह रहीं हैं, 'पिताजी ठीक ही कहत रहे. बिना ट्रॉली वाला ट्रैक्टर छुट्टा सांड हो जाता है. वो का कहत हैं 'Men will be men.' तुमऊ शहर में जाके बैसे ही हो गए हो जी". अब उधर वो घूंघट में लजाय रहीं, इधर ये मारे गिल्ट के लज्जित खड़े हैं.

वैसे ये तो हमें भी लग रहा कि ट्रॉली साथ होती तो ट्रैक्टर को समझा बुझाकर घर ले आती और उसकी देश भर में यूं दुर्गति न हो रही होती. अब अकेले प्राणी को बहकने में समय ही कितना लगता है. लेकिन इन भटके हुए राहगीरों को कौन समझाए कि गृहस्थी की गाड़ी कभी अकेले चली है भला? देखो, जाकर नाक कटा आए न.

दुनिया ग़वाह है कि जैसे बिना डोर के पतंग या कि बिना बोगी के इंजन का कोई अस्तित्व नहीं, ठीक वैसे ही बिना ट्रॉली का ट्रैक्टर पूर्णतः औचित्यहीन है. अकेला जाएगा तो कुसंगति में पड़कर आवारागर्दी ही तो करेगा. मैं तो उस इंसान को भी ढूंढ रही हूं जिसने बिना ट्रॉली के ट्रैक्टर लाने की बात कही थी. ये सब कुछ उसी मनुष्य का किया धरा है. हमारे घर के बच्चे को बिगाड़ने का क्रूर इल्ज़ाम उस मानस के सिर पर तत्काल धरा जाए. 

ख़ैर. जो भी हुआ, अच्छा नहीं हुआ. ट्रैक्टर तो हमेशा से ही उदार प्रकृति का रहा है. वर्षों से अपनी उंगलियों से धरती को सहलाता रहा है. बीज रोपने में मदद करता है कि देश का पेट भर सके.
इसके कोमल हृदय में कभी कोई बुरे विचार आए ही नहीं. ये क्यों किसी बैरिकेड को तोड़ेगा या किसी को कुचल ही देगा. एक दुःख है जो अब इसके सीने में टीस की तरह चुभता रहेगा। एक मलाल है जो हम सबको सदा रहेगा. ट्रैक्टर, दोष तेरा नहीं परिस्थितियों का है. तू एवीं बदनाम हो रहा.
- प्रीति अज्ञात 
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#किसानआंदोलन, #किसान, #दिल्ली, FarmerProtest, Farmer, Delhi Violence #iChowk #प्रीतिअज्ञात 

रविवार, 24 जनवरी 2021

ड्रैगन फ्रूट को संस्कारी 'कमलम्' बनता देख हमारा 'कमल' सकते में हैं!

 

अभी हम ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाने की ख़ुशी में ठीक से गदगदा भी न पाए थे कि तब तक हमारे वीर पुरुषों द्वारा चीन को ऐसी पटखनी दे दी गई है कि उनकी नज़र उतार, मंगल आरती गाने को जी चाहता है.
आपको पता ही होगा कि ड्रैगन' शब्द का प्रयोग एक फल के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए ड्रैगन फ्रूट' का नाम अब 'कमलम' रख दिया गया है. नामांतरण संस्कार की यह पावन रस्म, गुजरात के मुख्यमंत्री जी द्वारा संपन्न हुई. आपने जन साधारण को यह भी सूचित किया कि चूंकि यह कमल की तरह दिखता है, अतः नामांतरण के बहाने इसका धर्मांतरण आवश्यक था. वैसे भी मूलतः अमेरिकन फल का चीनी नाम रखने की कोई तुक ही नहीं थी और जब उन्होंने बदल लिया था तो अपन ने भी गंगाजल छिड़क पवित्र कर दिया.  

अच्छा! मुझे इस समय अपने यू पी वाले नामबदलू चैंपियन जी की बहुत चिंता जैसा फ़ील आ रहा है. अब भइया, आपके बिज़नेस में कोई और घुस आए, तो बुरा तो लगता है. सो, उन्हें भी ये बात बहुत चुभी होगी. और वे ये समझने को छटपटा भी रहे होंगे कि आख़िर उनके मूल कार्यक्षेत्र में किसी और की दखलंदाज़ी करने की हिम्मत हुई तो हुई कैसे! अब चूँकि घर का मामला है इसलिए उनका मौन होना स्वाभाविक है. फिर भी The Nation wants to know कि वे इस पूरी घटना को किस तरह लेते हैं. क़सम से यह जानने को तो हमारे व्यक्तिगत कान भी बेहद फड़फड़ा रहे.

ख़ैर! हमको राजनीति से क्या लेना-देना! मुद्दे की बात ये है कि अब जब कमलम नाम तय कर ही लिया गया है तो हम भी मान लेते हैं. लेकिन भिया जरा उन माता-पिता से भी तो पूछ लेते जिन्होंने ओरिजिनल नाम रखा था. हमें हमारे अपने कमल की भी चिंता सता रही. बचपन से सुनते आ रहे कि 'कभी न भूल, कमल का फूल'. और आप लोगों ने अपने घर के बच्चे की ही सुध न ली? तनिक सोचिए, उसको कितना बुरा लगा होगा जब अचानक आप उसके सौतेले भाई को ले आये और कहा कि ' ये तुम्हारे भैया हैं. इनको प्रणाम करो'.  क्या बताएं साहब!  हम तो शर्मिंदगी के मारे उसी पल कुंए में छलांग लगाने वाले थे क्योंकि हमें तो यह फल हमेशा ऑक्टोपस जैसा ही दिखता आया था. अब ये भला उसका भाई कैसे हो सकता है! हो सकता है, कल को ऑक्टोपस महाराज भी स्वयं को उपेक्षित महसूस कर नामांतरण की पुकार कर बैठें और अष्टबाहु नाम से ही उनका खोया आत्मसम्मान पाने की मांग करें.

पर भक्क! ड्रैगन फ्रूट भी कोई नाम था भला? एकदम हिंसक लगता था. कहाँ वो आग उगलता, खूँखार ड्रैगन वाला नाम कि सुनकर मन दहल जाए.  अब देखो, अपना ये प्यारा, दुलारा, देशभक्त कमलम! सोचकर ही तबियत भगवा होने लगती है और दिल ठुनक ठुनक कर 'रंग दे तू मोहे गेरुआ' गुनगुनाता है.

अच्छा! अब तक भले ही आपने इस फल को न चखा हो और चखा भी हो तो शायद कंफ्यूज रहे हों कि ये कीवी और नाशपाती की खिचड़ी जैसा बेतुका स्वाद क्यों देता है! लेकिन अब देखिएगा, इसके जलवे. 'कमलम' बनते ही ऐसा हुस्न निखरकर आया है इसका कि देश के कोने-कोने में इसकी मांग है. हालात इस हद तक बेक़ाबू हैं कि सारे सब्ज़ी-फल रूठे पड़े हैं. इन सभी ने कह दिया है कि "पौधे पर लटके हुए ही प्राण तज देंगे लेकिन मंडी नहीं जाएंगे कभी. हमारी भी कोई इज़्ज़त-फ़िज़्ज़त है कि नहीं? या बस ज़लील होने को ही पैदा हुए हैं?" उनके दुःख की एक ख़ास वज़ह ये भी है कि तमाम भयानक देशी नाम होते हुए भी एक विदेशी को प्राथमिकता दी गई.

इधर पाइनएप्पल इस बात पर औंधे पड़े हैं कि मैं वर्षों से काँटों का मुकुट पहने घूम रहा हूँ, साब जी को उसकी चुभन और तड़पन काहे न महसूस हुई? स्ट्रॉबेरी की ये पीड़ा कि उसमें स्ट्रॉ तो है ही नहीं और वहीं चाऊमीन, ताऊमीन होना चाहते हैं. अरबी यह कह-कहकर बेसुध हुई जा रहीं कि वे सच्ची भारतीय हैं और आप उनकी देशभक्ति को संशय भरी निगाहों से न तौलें. उन्होंने तो अपने भीषण विलाप का वीडियो तक ट्वीटिया दिया है कि "उन्हें उत्तरप्रदेश में रहने से डर लगता है. कहीं कोई उन्हें मुग़लों का साथी समझ उसकी चरबी न उधेड़ दे."
अब इस भोली अरबी को कौन समझाता कि इस समय तो आदरणीय ख़ुद ही भयंकर वाले परेशान चल रहे. तेरे पे क्या ध्यान देंगे, पगलैट!

वैसे वर्तमान समय की मांग के अनुसार, बद्तमीज़ चीन के साथ ये कड़ी कार्यवाही जरुरी थी. मैं इसका कट्टर समर्थन करती हूँ कि उसको मुँहतोड़ ज़वाब देना बनता ही था. साथ ही यह भी आवश्यक था कि हमारी अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कार भी अक्षुण्ण बने रहें. अतः हमने उसके ख़िलाफ़ तगड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए, उसके पालतू ड्रैगन पर अपने संस्कारी, देशभक्त कमलम का जोरदार बाण छोड़कर उचित क़दम उठाया है.

फ़िलहाल हमने समस्त सब्ज़ी मंडी निवासियों को यह समझा बुझाकर शांत कर दिया है कि सबका नंबर आएगा और एक-एक कर सभी संस्कारी बनेगे. हम तो विनम्र अनुरोध करते हैं जी कि एक कमेटी बिठाओ जो सारे सब्ज़ी-फलों का संरचनात्मक अध्ययन कर उसकी रिपोर्ट जल्द से जल्द सरकार को सौंप दे. वो क्या है न कि बदला लेने को हमारी बाजुएं बुरी तरह फड़फड़ा रहीं हैं.

अच्छा! एक ताजा आईडिया हमारे इत्तु से दिमाग़ से महक़ रहा है कि आप न शेर का नाम बदलकर शायर कर दो! जिससे हम जंगल में जाकर उसकी ग़ज़लों का लुत्फ उठा सकें. खीखीखी, तबहि तो होगा न जंगल में मंगल! अच्छा, सॉरी! अब ज्यादा हो रहा है.
भिया, अंत में एक जायज़ चिंता भी है कि कहीं बदलाखोर चीन अपने नथुने फुला हमारे लोटस को ड्रैगन न कहने लगे! भौत दिक़्क़त हो जाएगी! बड़ी भद्द पिटेगी भई. काहे कि ये आईडिया तो हिन्दुस्तानी खोपड़ी से ही पहले निकला है.
- प्रीति 'अज्ञात'
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

थोड़ी प्रसन्नता एवं बहुत-सी खोई हुई संवेदनाओं के साथ, नववर्ष में प्रवेश करता भारत

 

नववर्ष का आगमन किसी सुबह की तरह होता है जो हर रोज़ नई लगती है. कहने को इसमें कुछ भी नया नहीं होता, दिन के वही पहर हैं और समय की सुई भी प्रतिदिन एक ही दिशा में घूमती है. लेकिन फिर भी आँख खुलते ही एक नए उत्साह का संचार होता है, रात के सपने हृदय में कुलबुलाते हैं और उन्हें पूरा करने की चाह से दिन प्रारम्भ होता है. नववर्ष से भी नई उमंगों के साथ, नई चाहतें, नई उम्मीदें जुड़ ही जाती हैं. यद्यपि 2020 में कोरोना की तांडव लीला से त्रस्त जनमानस के लिए प्रसन्नता की बस एक ही बात हो सकती थी कि कोरोना से मुक्ति मिले! 2021 की देहरी पर पग रखते ही यह शुभ समाचार मिला कि न केवल कोविड-19 से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए टीके का निर्माण हो चुका है बल्कि हमारे भारत में 16 जनवरी से टीकाकरण अभियान भी प्रारम्भ हो गया है. विश्व भर में किसी वैक्सीन को लेकर इतनी बेचैनी, ऐसी प्रतीक्षा और उत्सुकता पहले कभी नहीं देखी गई. हमारी पीढ़ी ने पहली बार ही किसी महामारी का प्रकोप झेला है. अतः स्वाभाविक ही था कि इसकी वैक्सीन का जनता के लिए उपलब्ध होना देश भर में उत्सव की तरह मनाया जाए और यही हुआ भी. लेकिन अति उत्साह में भर यह नहीं भूल जाना है कि ख़तरा अभी टला नहीं! प्रत्येक नागरिक तक इसे पहुँचने में और इतनी बड़ी संख्या में टीके के निर्माण में अभी लम्बा समय लगेगा. जिनका टीकाकरण हो चुका है, वे भी इसे लगाते ही कोविड-19 प्रूफ़ नहीं हो गए हैं. यूँ भी दो डोज़ लगनी है. अतः पहला टीका लगते ही हमें मास्क को उछालकर फेंक नहीं देना है. टीका विशेषज्ञ (वैक्सीन एक्सपर्ट) का कहना है कि "हमारे शरीर में एंटीबॉडीज बनने की प्रक्रिया में न्यूनतम तीन सप्ताह लगते हैं यानी यदि आप आज वैक्सीन लेते हैं तब भी आप पर अगले तीन सप्ताह तक संक्रमण का भय मँडराता रहेगा! यह संकट इससे अधिक समय के लिए भी हो सकता है". इसलिए ये बात गाँठ बाँध ही लीजिए कि मास्क, सैनिटाइज़ेशन, सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के तमाम नियमों का पालन अब भी उतना ही आवश्यक है जितना पहले था. जब तक देश के प्रत्येक नागरिक को टीका (दोनों डोज़) नहीं लग जाता, तब तक अपनी और अपनों की पूरी सुरक्षा का दायित्व केवल और केवल हमारा है. इधर कोरोना वैक्सीन के बनते-बनते 'बर्ड फ्लू' देश में पाँव पसार चुका है. पक्षियों की जान साँसत में है लेकिन इससे सबका इतना ही लेना-देना है कि हम अपनी जान कैसे बचा सकें! इन मासूम पक्षियों के ज़िन्दा दफनाए जाने का समाचार, बस एक समाचार मात्र ही बनकर रह गया है क्योंकि भावुकता, संवेदनशीलता और पीड़ा के सारे भाव तो मनुष्य ने स्वयं तक ही सीमित रख छोड़े हैं. कुछ लोग रोते दिखे, तो पल भर को भ्रम हुआ कि संवेदनाएं अभी मरी नहीं! लेकिन फिर देखने पर पता चला कि वे तो व्यापार में घाटे के लिए विलाप कर रहे थे. इन पक्षियों को मौत के घाट तो वे स्वयं ही उतारा करते थे, जिससे उन्हें अच्छे दामों में बेचकर सबकी स्वादेन्द्रियाँ तृप्त करने का पुण्य कमा सकें और साथ-साथ वित्तकोष भी बढ़ता रहे. अब जब ये मुर्गे-मुर्गियाँ बीमारी से मरे तो इनके दुःख की सीमा ही न रही. कर्तव्यनिष्ठ प्रशासन ने अपनी चुस्तता दिखाते हुए स्वस्थ पक्षियों को भी मारने का आदेश दे दिया. कौन इन मासूमों के परीक्षण के चक्कर में पड़े! ये कहाँ जाकर अपना रोना रोएंगे! नन्ही सी जान, कुछ देर तड़पकर दम तोड़ देगी. इनकी मृत्यु के लिए कौन आंदोलन करने वाला है! चिड़ियाघरों को कुछ दिनों के लिए बंद करने का आदेश दे दिया गया है और कुछ स्थानों पर वहाँ के पक्षियों को मारने का भी! यानी पहले तो आप मनोरंजन के नाम पर किसी से उसकी स्वतंत्रता छीन लेते हैं और फिर अपनी सुविधानुसार उसका जीवन समाप्त करते हुए भी आपका हृदय एक पल को नहीं पसीजता! बात इतने पर ही नहीं ठहरती, कुछ समय बाद किसी प्रजाति के विलुप्त होने का भीषण विलाप भी किया जाता है. फिर 'इस चिड़िया को बचाओ', 'उस चिड़िया को बचाओ' जैसे स्लोगन से देश की दीवारें पाट दी जाती हैं. ये कैसा विकृत, निर्लज्ज और मलीन रूप है मनुष्य और उसकी तथाकथित मनुष्यता का, कि जिसका जीवन छीन रहा, उसी को बचाने का खोखला आह्वान भी कर बैठता है! कहने को तो देश भर में मकर संक्रांति का त्योहार भी धूमधाम से मनाया गया लेकिन दुख तब हुआ जब अन्नदाताओं से जुड़ा यह पर्व कुछ किसान स्वयं नहीं मना सके. राजधानी दिल्ली की ओर जाने वाली सड़कों पर इस भीषण सर्दी में जमा किसानों को देखना त्योहार का उत्साह फीका कर गया. तीन कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच का गतिरोध हल होता तो नहीं दिखता. रूठे रहने की कसम खाए बैठे दोनों पक्ष न जाने क्या बात करते हैं, पता नहीं चलता. आंदोलनकारी अड़े हैं कि कानून वापस लो, और सरकार की जिद है कि इसके अलावा कुछ भी ले लो. अब तो सुप्रीम कोर्ट का दखल भी सवालों के घेरे में आ गया है. पक्ष/विपक्ष की राजनीति जो वैक्सीन में चली, वह यहाँ भी निरंतर जारी है. साथ ही किसानों को बरगलाने की बात भी प्रचारित की जा रही है. हाँ, ये तो माना जा सकता है कि देश की जनता को मूर्ख बनाना, लुभाना और एक तिलिस्म में घेर लेना राजनीतिज्ञों का शगल रहा है. लेकिन किसान आंदोलन के मामले में बात उतनी सरल नहीं है. कई किसान संगठन, कानून के पक्ष में समर्थन देकर खुद को आंदोलन से अलग कर चुके हैं. पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली किसान नेताओं और संगठनों से इतर ये आंदोलन जाता नहीं दिखता. लेकिन, जहां तक सरकार की बात है, तो उसका फ़र्ज़ होना चाहिए कि किसी भी स्तर के आंदोलन को जल्द से जल्द बातचीत से हल कर खत्म करवाए. लेकिन, किसान आंदोलन के मामले में वर्तमान सरकार का रवैया बेहद ढीला और उदासीन नजर आया. मानो परवाह ही नहीं है. इस आंदोलन के सही-गलत और तर्क-कुतर्क की समीक्षा भी होती ही रहेगी पर उससे इतर एक सच यह है कि कृषकों का दुःख, देश का दुःख है. हम सबका जीवन इनका ही ऋणी है और सदैव रहेगा. समस्या का हल अवश्य ही निकाला जा सकता है, काश! दोनों पक्षों को निदा फ़ाज़ली साहब का यह शे'र याद रहे- मुमकिन है सफ़र हो आसाँ, अब साथ भी चल कर देखें कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें टीकाकरण अभियान की प्रसन्नता, बेहाल किसानों की चिंता और मारे गए पक्षियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए इस वर्ष और आने वाले तमाम वर्षों से आशा रखते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करें, देशहित प्रधान रखें और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता के भाव जागृत कर, उनकी रक्षा हेतु अपने स्वर बुलंद करें. गणतंत्र दिवस की अशेष शुभकामनाएँ! जय हिन्द - प्रीति अज्ञात

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