रविवार, 1 अगस्त 2021

#FriendshipDay: दोस्ती के अटूट बंधन की पाठशाला है फ़िल्म 'दोस्ती'

दोस्ती की जब-जब बात आती है तो मेरे मन में दो बेहद प्यारे लड़कों की तस्वीर तैर जाती है. मृदुल मुस्कान, सौम्य व्यक्तित्व, रेशम-सा हृदय लिए ये दोनों, दोस्ती के सबसे उत्कृष्ट मानदंडों की सूची मेरे हाथों में थमा गए थे जैसे. बचपन के इस सपने को मैंने हृदय में सँजो लिया था कि जब मित्रता करुँगी तो यूँ ही निभाऊँगी जैसे रामू और मोहन ने निभाई थी. मन ही मन कल्पनाओं के सारे रंग चुनने लगती थी.  'मित्रता दिवस' हो और 'दोस्ती' फ़िल्म को याद न करूँ, हो ही नहीं सकता!

स्मृति-पटल पर उस समय की मेरी आयु तो दर्ज़ नहीं हो रही पर हाँ, मैं किशोरी ही रही होऊँगी. बात अलीगढ़ (उ. प्र.) की है. गर्मी की छुट्टियों में वहाँ ताईजी-ताऊजी के पास हम सब प्रतिवर्ष जाते थे. वहाँ खूब धमाचौकड़ी होती और फिर अचानक से बच्चे फ़िल्म देखने का कार्यक्रम तय कर लेते. ऐसी ही एक ग्रीष्म दोपहरी में 'दोस्ती' फ़िल्म देखने का योग बना. 

सिनेमा-हॉल में प्रवेश करते समय मुझे एक क्षण को भी यह भान न था कि मैं आज अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ दस फ़िल्मों में से एक देखने जा रही हूँ. लेकिन इस अद्भुत और कालजयी फ़िल्म ने जैसे चौंका दिया मुझे. इसे देखने के बाद जाने कितने महीनों तक इसकी पटकथा मेरे साथ चलती रही. इसने मेरी भावनाओं को इस हद तक उद्वेलित किया कि मैं आज भी इस फ़िल्म को याद करती हूँ. इसे देखने के बाद मैंने अपने व्यक्तित्व को आकार देना प्रारंभ किया. और हाँ, पहला माउथ ऑर्गन भी खरीदा.

यह फ़िल्म सच्ची मित्रता के सभी आयामों को अनूठे ढंग से चित्रित करती है. मूल रूप से यह दो गरीब लड़कों, मोहन और रामू की अटूट दोस्ती की कहानी है. उनमें से एक दृष्टिहीन और एक अपंग है. सड़कों पर भटकते हुए रामू की मुलाकात मोहन से होती है. रामू माउथ ऑर्गन बहुत अच्छा बजाता है, पढ़ने की भी बहुत इच्छा रखता है. मोहन अच्छा गाता है. साथ में वे एक-दूसरे की कठिनाइयाँ समझते हैं, एक-दूसरे को सांत्वना देते हैं और भरसक साथ निभाते हैं. ये दोनों एक ऐसे जीवन को स्वाभिमान के साथ जीने को प्रयासरत हैं जिसे दूसरे दयनीय समझते हैं. मोहन को अपनी खोई बहन की तलाश है, और रामू को शिक्षा की. ये दोनों दोस्त किन-किन कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए जीवन जीते हैं, इनकी मित्रता कैसे धर्मसंकट से होकर गुजरती है. कैसे नए रिश्तों के कारण ये बिछुड़ने के कगार पर आ जाते हैं. यही फिल्म में दिखाया गया है. लेकिन इसके अन्य पात्र भी पटकथा में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. फिर चाहे वो बहन-बहनोई हों, शिक्षक-छात्र हों या एक गुड़िया जैसी बच्ची.

इस फ़िल्म में मनुष्य की प्रत्येक भावना को इतनी सरलता से, लेकिन वृहद रूप से चित्रित और रेखांकित किया गया है जो लगभग 6 दशक बीत जाने के बाद भी कहीं देखने को नहीं मिलता. मित्रता पर ऐसी कोई फ़िल्म आज तक बनी ही नहीं जिसने मुझे इस हद तक भावुक कर दिया. इससे पहले मैं किसी फ़िल्म में एक पल भी नहीं रोई थी लेकिन इसमें तो जैसे बाँध बह निकला था.  मानवीय संबंधों के सबसे शुद्ध और प्रबल भाव का चित्रण है इसमें. दोस्ती और मानवता की इस उल्लेखनीय कहानी में दोनों अभिनेताओं सुधीर कुमार और सुशील कुमार ने ऐसा अभिनय किया है जैसे कि वे इस भूमिका के लिए ही जन्मे हों. दृष्टिहीन लड़के की भूमिका निभाने वाले सुधीर कुमार की आँखें तो इतनी सुंदर हैं कि बयान नहीँ किया जा सकता. पूरी फ़िल्म में यह बेचैनी साथ चलती है कि ये लड़का देख क्यों नहीं सकता!

दोस्ती का गीत-संगीत रिश्तों के धागे में मोती की तरह पिरोया गया है. मजरुह सुल्तानपुरी द्वारा रचित गीतों में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने संगीत से जान फूँक दी है. इन शानदार गीतों के सरल और अर्थपूर्ण बोल अत्यधिक दक्षता के साथ कहानी को अपने साथ लेकर चलते हैं. राजश्री बैनर के ताराचंद बड़जात्या इसके निर्माता हैं. निर्देशन सत्येन बोस का है.

कहते हैं कि अपने असाधारण अभिनय और कमाल की कहानी के कारण यह एक बड़ी ब्लॉकबस्टर रही थी. और क्यों न हो, जब स्वर सम्राट मोहम्मद रफी ने इसमें वो 5 गीत गाए हों जिन्हें हम अब तक गुनगुनाते हैं. लता मंगेशकर का गाया  गीत 'गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक न हँसोगी' हर माता-पिता ने अपनी बेटी को मनाते हुए गाया होगा. गीतों के शब्द- शब्द दिल में उतरते हैं. 'मेरी दोस्ती मेरा प्यार' सुनकर कैसे अपने दोस्तों पर गर्व होने लगता है.और 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ-सवेरे', से तो न केवल दोस्त बल्कि प्रेमी भी निश्छल मन से किसी को प्रेम करते हुए बिछोह का दर्द महसूस करते हैं,  'मेरा तो जो भी क़दम है' में जो परवाह है उसे रफ़ी साब ने कैसे जीवन दे दिया है! 'जाने वालों जरा मुड़के देखो मुझे' को सुन दिल से एक आह आज भी निकलती है. हम इन सारे थोड़े उदास भावों से गुजर ही रहे होते हैं कि 'राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है' गीत आपको हौले से सहला जाता है और आपका निराश हृदय अनायास ही उम्मीद की जगमगाती किरणों से प्रकाशमान हो उठता है.

इस फिल्म की श्रेष्ठता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म को उस वर्ष  के प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ फिल्म, कहानी, संवाद, संगीतकार, गायक, गीतकार के पूरे 6 पुरस्कार  इसके नाम हुए.  

 दोस्ती पर सैकड़ों फ़िल्में बनी हैं. उनमें से कुछ अच्छी भी हैं. लेकिन इससे श्रेष्ठ, भावनात्मक रूप से प्रबल, अविस्मरणीय गीत-संगीत और अभिनय से सजी प्रेरणास्पद फ़िल्म मैंने आज तक नहीं देखी! हृदयस्पर्शी सिनेमा का अनमोल एवं उत्कृष्ट उदाहरण है यह फ़िल्म.

राजश्री बैनर ने अपनी फ़िल्मों में सामाजिक मूल्यों, नैतिकता, परिवार, संवेदनाओं को शीर्ष पर रखकर सदैव ही भावनात्मक पक्ष को प्रबल रखा है. आश्चर्य इस बात का है कि जहाँ आज फ़िल्मकारों  द्वारा कहानी की मांग को कारण बताकर अनर्गल सामग्री को सिनेमा में सम्मिलित कर लिया जाता है. वहाँ यह फ़िल्म निर्माण कंपनी अब तक अपनी उसी आन, बान और शान के साथ साफ़ सुथरी खड़ी हुई है. प्रशंसनीय है कि राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्में आज भी न केवल इस परंपरा को निभा रही हैं और सफ़ल भी हो रही हैं.

हो सकता है कि 1964 में बनी इस फ़िल्म 'दोस्ती' को देखने पर संवाद अदायगी थोड़ी बचकानी लगे. यह बहुत पुरानी फ़िल्म है और तब से अब तक संवादों के लहजे में बहुत परिवर्तन आ चुका है. लेकिन भावनात्मक रूप से यह अब भी उतना ही गहरा प्रभाव डालने में सक्षम है. यदि आप अच्छी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं तो इसे अपनी सूची में अवश्य सम्मिलित करें. यह निश्चित रूप से आपके बेहतरीन गुजारे ढाई-तीन घंटों की यादों में से एक होगी. ये आपको दर्शनशास्त्र नहीं समझाती,  सुनहरे स्वप्न नहीं दिखाती, कुछ अविश्वसनीय बात भी नहीं कहती बस दो इंसानों का संघर्ष भरा जीवन सामने रख देती है. दोस्ती के अटूट बंधन की पाठशाला है यह फ़िल्म.  रिश्तों के सबसे मधुर और उच्च भाव दोस्ती को यह  इस तरह रखती है कि कहानी के दोनों पात्रों से आपका भीतर तक जुड़ाव हो जाता है. उनके दुख आपकी आँखों से झर झर बहने लगते हैं. पर आप ईश्वर से यह प्रार्थना भी अवश्य कर रहे होते हैं कि आप भी किसी से इसी तरह दोस्ती निभाएं. आपके जीवन में भी कोई ऐसा दोस्त आए जिस पर आप यूँ  भरोसा कर सकें. आखिर दोस्तों में ही तो जीवन बसता है न!

HAPPY FRIENDSHIP DAY! 💕

- प्रीति अज्ञात 

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*पोस्टर विकिपीडिया से साभार

शनिवार, 31 जुलाई 2021

बापू के नाम पत्र

प्रिय बापू
सादर चरण स्पर्श

आज जब मुझे आपको यह पत्र लिखने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है तो ऐसे में मेरी प्रसन्नता अपने चरम पर है। मैं स्वयं को संयत नहीं कर पा रही हूँ कि इतने कम शब्दों में सब कुछ कैसे कह दूँ। वे बातें, वे किस्से जो मैं बीते लम्बे समय से आपको सुनाने की इच्छा रखती रही हूँ, न जाने इन पन्नों पर ठीक से उतर पायेंगे भी या नहीं! पर प्रयास अवश्य करुँगी। मेरी इस व्यग्रता के दो प्रमुख कारण हैं, प्रथम यह कि मेरे अब तक के जीवन में यदि मैंने किसी के आदर्शों को हृदय से अपनाया है तो वह आप ही हैं, बापू। आप सशरीर मेरे साथ उपस्थित न भी होकर परछाई की तरह सदैव साथ चलते हैं। मेरी समस्याओं का समाधान हैं आप! दुःख की उदास घड़ी में मेरे चेहरे की मुस्कान हैं आप! घनघोर निराशा के स्याह अँधेरों में किसी झिर्री से प्रविष्ट होती प्रकाश की एकमात्र किरण हैं आप! मेरी टूटी उम्मीदों का हौसला हैं आप!
द्वितीय कारण मेरा पत्र-लेखन के प्रति अपार प्रेम है। जब मैं छोटी थी न, तो अपने घर-परिवार, मित्रों को ख़ूब पत्र लिखा करती थी। उनके जन्मदिवस, वर्षगाँठ इत्यादि पर अपने हाथों से बनाये 'शुभकामना-पत्र' भी भेजा करती। यहाँ तक कि मम्मी और भैया की ओर से भी पत्र लिख दिया करती थी। सबको अच्छा लगता तो मेरी ख़ुशी भी दोगुनी बढ़ जाती। उस समय का जीवन मुझे बहुत आसान लगता था। कोई जल्दी नहीं थी। पत्र पहुँचने में अपना निश्चित समय लेते और प्रत्युत्तर कब आएगा; मैं हिसाब लगा लिया करती थी। वे कितने अच्छे दिन थे न बापू! अब तो बेचैनियाँ, प्रतीक्षा, प्रसन्नता ये सब भाव मोबाइल और उसके इमोजी ने निगल लिए हैं। अब आप सोचते होंगे कि ये 'मोबाइल', 'इमोजी' क्या बला हैं? जब हम मिलेंगे न तो दिखाऊँगी और आपको सिखा भी दूँगी। वैसे देश को ये नई तरह की व्याधि लगी है बापू, घर-मित्र-परिवार से विमुख हो सोशल बनने की! ये जो उपकरण है न, ये एक ही क्षण में सारे समाचार दुनिया भर में प्रसारित कर देता है। तस्वीरें खींचता है, भेज देता है और तो और...सामने बैठे हों ऐसे बात भी कर सकते हैं इसके द्वारा। इसको वीडियो चैटिंग कहते हैं। कितना अच्छा होता न, अगर ये आजादी की लड़ाई के समय साथ होता! संगठित होने में कितनी आसानी होती! सत्याग्रह आंदोलन और दांडी यात्रा के ख़ूब अपडेट्स होते! ये सब पढ़कर आप हँस रहे होंगे, मुझे भी बताने में बहुत आनंद आ रहा है। हाँ, एक सच्ची बात और कह दूँ कि इस मोबाइल के लाभ भी कम नहीं। यूँ समझिये कि विज्ञान की तरह यह भी विनाशकारी और लाभदायक दोनों है। सब अपनी-अपनी मानसिकता के आधार पर इसका प्रयोग करते हैं। 

बापू, मेरा और आपका साथ बहुत पुराना है। माता-पिता ने हमेशा सादा जीवन एवं सद्कार्यों को अपनाया तो हम बच्चों (मैं और मेरा भाई) में भी ये संस्कार स्वतः आ गए। 'सत्य' और 'अहिंसा' का प्रथम पाठ भी मैंने घर से ही सीखा और अब तक उस पर अडिग हूँ। बचपन में ही एक दिन मेरे माता-पिता ने बताया था कि वे आपके रास्ते पर चल रहे हैं और ये सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, प्रार्थना सब आपके ही विचार हैं जिनका वे सदैव अनुकरण करते आये हैं। तब मुझे बहुत अच्छा लगा था क्योंकि आपकी तस्वीर को जब भी देखती थी तो मेरे प्यारे दादू का चेहरा दिखाई देता था। वे मुझसे अपार स्नेह करते थे। जब थोड़ी बड़ी हुई तो पापा ने आपकी दो पुस्तकें 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' (आत्मकथा) और 'मेरे सपनों का भारत' पढ़ने को दीं। तब से ये दोनों ही मेरी प्रिय पुस्तकों में से हैं।
 
पता नहीं, मुझे आपसे ये कहना चाहिए भी या नहीं.... पर बापू, अत्यंत भारी हृदय के साथ आपको यह सूचना दे रही हूँ कि वो भारत जिसका आप स्वप्न देखा करते थे और जिस स्वप्न को हम भारतवासियों ने भी आत्मसात कर अपनी आँखों में भर लिया था, हमें अब तक उस भारत की प्रतीक्षा है। न जाने ऐसा क्या हुआ है और क्यों हुआ है बापू, कि मनुष्य बहुत स्वार्थी हो चला है। झूठ का बोलबाला है और हिंसा तो ऐसी कि आप भी घबराकर आँखें मूँद लें! मैं तो कई बार जब भेदभाव और छुआछूत के बुरे समाचार अखबार में पढ़ती हूँ तो फूट-फूटकर रोने लगती हूँ कि हम बापू के आदर्शों को क्यों न संभाल सके!
सच! अब जबकि पूरा देश आपकी 150वीं जयंती मना रहा है तो ऐसे में यह तथ्य और भी दरकता है कि जिन बापू ने हमें आजादी दी, हम उनको क्या दे सके! आपकी विरासत को सहेजना तो हमारी ही जिम्मेदारी थी न! ऐसे में आपकी और भी याद आती है और लगता है कि देश ने आपको कितना निराश किया। आपके हत्यारे के समर्थकों को जब पढ़ती सुनती हूँ तो मुझे बहुत बुरा लगता है और जाकर उन पर अपना क्रोध जाहिर करने का मन भी करता है। लेकिन ऐसे में भी आप ही मुझे रोक लेते हो! अब आप सोच रहे होंगे कि आप तो मुझे जानते तक नहीं, तो रोकेंगे कैसे भला? हा, हा, हा...बापू ये आपकी 'गाँधीगिरी' ही है जो मुझ पर सदैव हावी रहती है और मैं किसी से झगड़ा नहीं कर पाती। मैं ही नहीं, इस देश के जन-जन के लहू में आप संस्कारों की तरह बहते हैं। तभी तो हम आपको 'राष्ट्रपिता' कहते हैं।

एक अच्छी बात बताऊँ, आपको? पता है ये लोग जो हिंसा और असत्य के समर्थक हैं, ये बस मुट्ठी भर ही हैं। परेशानी ये है कि अच्छी ख़बरें दिखाई जानी कम हो गई हैं। ऐसे में बुराई चहुँ ओर दृष्टिगोचर होती है एवं उसी की चर्चा अधिक होती है। बीते कुछ वर्षों से मैं और मेरे साथियों ने यह बीड़ा उठाया है कि हम समाज में 'अच्छा भी होता है' की तस्वीर पेश करें। कर रहे हैं बापू और सफलता भी मिल रही है। हमसे बहुत लोग हैं जो एक ऐसे  सकारात्मक समाज की संकल्पना करते हैं जिसमें प्रेम हो, भाईचारा हो और सारे भेदभाव से ऊपर उठकर सत्य और अहिंसा की लाठी के साथ चलने की ललक हो।

इसी बात से एक किस्सा याद आया। मैंने आपको तस्वीरों में हमेशा धोती पहने, लाठी और चश्मे के साथ ही देखा था। बचपन में ही एक बार जब टीवी पर गाँधी फ़िल्म आई, तब परिवार के साथ मैं भी उत्सुकता से दूरदर्शन के सामने जम गई थी। पूरी फ़िल्म देखते समय मुझे यही लगता रहा कि ये आप ही हो और आपकी हत्या के दृश्य को देखकर मैं चीखने लगी थी। सबने समझाया कि ये पिक्चर है और ये अभिनेता हैं जो कि आपकी भूमिका अदा कर रहे हैं। मैं कई दिनों तक आश्चर्य में रही कि कोई मेरे बापू जैसा कैसे दिख सकता है? बड़े होने पर सारी बातें समझ आने लगीं। हाँ, एक बात अवश्य पूछूंगी आपसे कि आप सिनेमा के विरोधी क्यों थे? देखिये तो, अगर फ़िल्में न होतीं तो आज की पीढ़ी आपसे कैसे मिलती? कैसे विस्तार से जान पाती? मुझे पूरा विश्वास है कि यदि आप आज के समय में होते तो सिनेमा के समर्थन में होते क्योंकि इन दिनों कई ऐसे निर्माता-निर्देशक हैं जो यथार्थ दिखाने का साहस रखते हैं और युवा पीढ़ी उनकी ख़ासी प्रशंसक है। आप पर एक मजेदार फ़िल्म भी बनी थी, जिसे देखकर आप भी बहुत हँसते-खिलखिलाते। उसमें गाँधीगिरी से ही सब समस्याओं का समाधान बताया गया था और 'जादू की झप्पी' से किसी का भी दुःख साझा करने का प्रयास दिखाया गया था। इसे विश्व भर में बहुत सराहना मिली और  इतना अधिक पसंद किया गया था कि मुझे यक़ीन हो गया था कि जिन बापू को हमसे पहले की पीढ़ी स्नेह करती थी, वे वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे क्योंकि गाँधी मात्र नाम नहीं, समग्र विचारधारा है और विचार कभी मरते नहीं! वे अमर हो जाते हैं, सदा-सदा के लिए!

बापू आपको जब भी सोचा तो वही स्मित मुस्कान लिए प्रिय दादू- सा कोई चेहरा दिखाई दिया जो सदैव सही राह पर चलना सिखाता है। जिसके पास प्रत्येक जिज्ञासा का हल है। जिसका निश्छल, शांत स्वभाव और शालीन भाषा ऐसे अपनेपन में बाँध लेती है कि पल भर को भी यह अनुभव नहीं होता कि ये दुनिया के सबसे महान व्यक्ति हैं।

आप जिन सिद्धांतों पर चलने की बात करते थे, उस पर अभी भी कुछ लोग टिके हुए हैं। वे आपके आदर्शों को अब भी अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। वे एक थप्पड़ के बाद दूसरा गाल भले ही आगे न करें, पर अपशब्द एवं हिंसा का प्रयोग नहीं करते एवं अपने सत्य के साथ अडिग खड़े रहते हैं। यही 'गाँधीगिरी' है जो अब भी देखने को मिल जाती है।
बापू, आपका वो भारत जहाँ सर्वधर्मसमभाव सबके ह्रदय में था, जहाँ सब बराबर थे, सबको जीने का हक़ था और जहाँ बुराई के रावण का दहन होता आया है। जहाँ  सत्य और अहिंसा को ही हथियार मान पूजा जाता है...उस भारत की तस्वीर में वो पहले सा नूर अभी नहीं दिखता पर इनसे सच्चे भारतीयों का हौसला टूट जाए, ऐसा भी नहीं! क्योंकि हम आपकी कही इन बातों को अब तक भूले नहीं हैं -
"जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।"
"मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार रहूँ।"
"आप मानवता में विश्वास मत खोइए। मानवता सागर की तरह है; अगर सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो सागर गन्दा नहीं हो जाता।"
सम्पूर्ण विश्व आपके विचारों का समर्थन करता है। आप और आपके विचार अमर हैं बापू। भारतवासियों के हृदय में आप सदा यूँ ही मुस्कुराते रहेंगें। 
शेष शुभ!
पूज्य बा को मेरा चरण-स्पर्श कहियेगा, छोटों तक स्नेहाशीष पहुँचे। 
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में 
आपकी 
प्रीति 
19 नवम्बर 2019 को बापू के नाम लिखी इक चिट्ठी 
#बापू #पत्र  #अंतरराष्ट्रीयपत्रदिवस #प्रीति अज्ञात #पत्रलेखन #Newblogpost 


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

बॉलीवुड की मसाला फ़िल्मों की मसालदानी के चुनिंदा मसाले

बीते दो दशकों में हिंदी फ़िल्मों में बहुत कुछ बदल गया है. आपको तो पता ही है कि पुरानी फ़िल्मों के विषय गिने-चुने ही हुआ करते थे. ये फ़िल्में घर-परिवार, रिश्ते या बदले की भावना को लेकर बनतीं. कुछेक में माँ की ममता, बड़े भैया का त्याग या पिता की मजबूरी की भावनात्मक कहानी भरपूर छलकती. कुछ में दो घरानों के बीच में दुश्मनी और उनके नौनिहालों की तड़पती मोहब्बत के तराने गूँजते. तो कहीं क्रूर जमींदार के कब्ज़े में, गरीब नायक/नायिका का घर या गहने होते. 

चुनिंदा फ़िल्में किसी उपन्यास पर भी आधारित होतीं या सामाजिक दृष्टिकोण को लेकर बनाई जातीं. जिनमें छुआछूत, दहेज और स्त्री-विमर्श प्रधान विषय होते. इन बाद वालियों को प्रायः कलात्मक श्रेणी में डाल दिया जाता. मतलब तब इनके नाम सुनते ही हम जैसे बच्चे नाक-मुँह सिकोड़ लिया करते. हाँ, मसाला फ़िल्में बड़े चाव से देखी जाती थीं. जबकि भारतीय सब्जियों की तरह उनका मसाला पहले से ही तय रहता था और दर्शकों के लिए कुछ भी रहस्यमयी नहीं होता था. पर स्वाद तो स्वाद है, एक बार ज़बान पर चढ़ जाए बस!

1. इन फ़िल्मों की विशेषता यह थी कि हर दृश्य के साथ-साथ अगले दृश्य का अनुमान स्वतः होता जाता. लेकिन खलनायक का नायक के हाथों पिटना हम जैसे गाँधीवादी को भी एक अलग ही क़िस्म का सुख दिया करता. हर ढिशुम- ढिशुम के साथ मन से यही ध्वनि आती कि "और मार, और मार! ये इसी लायक़ है!". उधर अमिताच्चन जब प्राण या अमज़द खान को कूट रहे होते, इधर अपन सीट पर उछल-उछल तालियाँ पीट उन्हें प्रोत्साहित करते. लड़के लोग तो सीटी मार, सिक्के भी उछाल लिया करते थे. 

2. इनमें खलनायक का कुछ हसीनाओं के साथ घिरे रहकर, तेल मालिश कराने का दृश्य भी अवश्य रहता था. वो वनमानुष सा पड़ा रहता और इन्हीं सुंदरियों में से एक अंगूर का गुच्छा लिए उसे लपर-लपर खिला रही होती. उसी समय एक दूत (खबरी) का आगमन होता और उससे सूचना प्राप्त करते ही खलनायक के चेहरे पर कुटिल हँसी छा जाती. 

3. इन फ़िल्मों में जमकर तस्करी (स्मगलिंग) दिखाई जाती थी. इसमें काले कोट और काले गॉगल पहने एक मनुष्य चेहरे पर अति गंभीर भाव लिए ब्रीफकेस लेकर तीव्र गति से चलता. बस, दर्शक देखते ही तुरंत समझ जाते कि तस्कर (स्मगलर) है. यह वेशभूषा मन में इस हद तक घर कर चुकी है कि आज भी कोई इस तरह तैयार हो दिख जाए तो यही लगता है कि डॉन का कोई गुर्गा है. जिसे काली पहाड़ी के पीछे एक संकेत-शब्द (कोडवर्ड) बोलकर इस संदूकची का हस्तांतरण करना है. 

4. अच्छा, खलनायक भले ही कितना निर्दयी हो, पर उसके मन का एक कोना नृत्य और संगीत के प्रति समर्पित रहता. यही कारण था कि दुश्मन के अड्डे पर नायिका का नृत्य हर फ़िल्म का आवश्यक अंग बन जाता. आजकल तो नायिका स्वयं ही उचित अवसर देख 'आइटम नंबर' शुरू कर देती हैं. लेकिन उस समय ये विवशता में होता था. इधर नायिका अपनी कला प्रस्तुत करते हुए उनके हथियार, हथिया लेती और उधर गीत समाप्त होते ही नायक आ धमकता. उसके बाद दुष्चरित्रों की पिटाई का वर्णन पहले बिंदु में कर ही दिया गया है. 

पर हाँ, एक बड़ी कॉमन परेशानी थी. जैसे ही नायक सबको पीटकर सुस्ता रहा होता तभी अचानक से उसकी माँ दुश्मन के कब्ज़े में आ जाती! इतना क्रोध आता था न तब कि इतनी मुसीबत के समय माँ, घर से अपहरण करवाने निकली ही क्यों!
वो तो भला हो पुलिस का कि इतना कुछ निबट जाने के बाद अंततः आ ही जाती. उसे देखते ही दर्शक खलनायक से स्वयं ही बोलने लगते, "अपने हाथ ऊपर कर दो. अब तुमको कोई नहीं बचा सकता! पुलिस ने इस इलाके को चारों तरफ से घेर लिया है!".  

5. उन दिनों मेले में बिछड़ना भी आम था. तब मोबाइल तो थे नहीं. अतः ट्रैक करने के लिए सबके गले में एक सा लॉकेट डाल दिया जाता या फिर एक कॉमन पारिवारिक गीत होता जिसकी धुन हर सदस्य को पता होती. कभी- कभी एक फोटो होता जिसे दो टुकड़ों में बाँट दिया जाता. फ़िल्म जब समाप्ति के चरण में होती तब ये लोग वही गीत गाकर एक दूसरे को पहचानते. कभी लॉकेट खोल अचंभित हो भरे गले से 'भैया' कह बाँहें फैला मिलते तो कभी उन दो टुकड़ों को जोड़ पूरी तस्वीर बना लेते. दर्शक पूरी फ़िल्म में घबराते हुए बार-बार उन्हें याद दिलाते कि अरे यही तेरा भाई है. खैर! इन्हीं पलों की प्रतीक्षा में सब साँसें थामे रहते और अब कहीं जाकर इनकी प्रतीक्षा को विराम मिलता. प्रायः आँखें भी भर आया करतीं. 

6. प्रेम तो शाश्वत है. उसके बिना फ़िल्में कभी बनी ही नहीं. हाँ, समय के साथ प्रेम प्रदर्शन की  पद्धति जरूर परिवर्तित हो चली है. पहले पुस्तकों के गिरने-उठाने के मध्य आँखों-आँखों में कहानी का आरंभ होता था. दो फूलों के मिलन या बरसात होते ही ज्ञात हो जाता था कि अब अगला संवाद 'मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ', ही होगा. आजकल तो कहानी की माँग के बहाने जो हो जाए, कम है. 

7. उन फ़िल्मों में प्रेम त्रिकोण के समय एक ऐसा गाना भी होता था जिसमें नायक या तो नशे में या फिर आँखों पर मास्क सा लगाकर प्रेमगीत गाता. प्रेमिका अपने पिता या सौतेली माँ के घूरने के बावजूद भी हाथ छुड़ा, नायक के पास दौड़ी चली आती. दिल को चैन मिलता. आजकल 'तू प्यार है किसी और का', 'मेरा दिल भी कितना पागल है'  गीतों का दौर समाप्तप्राय है. 

8. ऐसे तो उस दौर से जुड़ी बहुत सी बातें हैं. पर चलते-चलते एक और याद करा देती हूँ. जब डॉक्टर ये कहता कि "इनको दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है'. तो उफ़! नायक मंदिर-मस्जिद की चौखट पर पहुँच ऐसे-ऐसे संवाद बोलता कि कलेजा मुँह को आता. तभी अचानक जोर-जोर से मंगल ध्वनियाँ वातावरण में गूँजने लगतीं और हम ये जान लेते कि 'हैप्पी एन्डिंग' होने वाली है. लेकिन जब हीरो अपनी माँ की गोदी में सिर रख लेता और बचपन याद करता तो जी भर आता. पूरे सिनेमा हॉल से सुबकने की आवाज आती क्योंकि इतिहास गवाह है कि इस पोज़ वाला नायक जीवित न रहा कभी! रुमाल निचोड़कर सुखाते कि फिर भीग जाता. बाहर निकलते समय सब बस एक ही बात कहते कि "यार, पिच्चर तो अच्छी थी पर हीरो को ज़िंदा रहना चैये था". 
- प्रीति अज्ञात 
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फोटो: गूगल 




मंगलवार, 27 जुलाई 2021

#Mimi : बधाई हो! हमारा सिनेमा बदल रहा है!

27 जुलाई को कृति सेनन के जन्मदिवस के अवसर पर उनकी फ़िल्म 'मिमी' नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ कर दी गई.  निर्धारित तिथि से चार दिन पहले आने के कारण, इस रिलीज़ को प्री-मैच्योर बेबी की उपमा भी दी गई है. लेकिन परिपक्वता की दृष्टि से यह फ़िल्म हर मायने में पूरी तरह खरी उतरती है. 

इधर हमारा समाज अभी तक इसी प्रश्न में ही उलझा हुआ है कि जन्म देने वाली या पालने वाली माँ में से कौन बड़ा! हम माता देवकी और मैया यशोदा की तुलना सदैव करते आए हैं. लेकिन अब विज्ञान ने हमारा सिर खुजाने को एक वज़ह और दे दी है- सरोगेट मदर. 

सरोगेसी पर आधारित इस फ़िल्म 'मिमी' का ट्रीटमेंट बेहद मनोरंजक तरीके से किया गया है. यह अपने पहले ही सीन से इस हद तक बाँध लेती है कि फिर आप एक पल को भी बीच में उठना नहीं चाहेंगे.  

बिना रोमांस और अश्लीलता के भी एक शानदार फ़िल्म बनाई जा सकती है. 

हिन्दी फ़िल्म हो और उसमें कोई प्रेम कहानी न हो! यह बात हम भारतीय दर्शकों को चौंका सकती है. मिमी ठीक ऐसी ही है. इसमें नायक-नायिका दोनों हैं पर उनमें प्रेम नहीं. दोनों दोस्त भी नहीं हैं. नायिका मिमी के बॉलीवुड को लेकर अपने सपने हैं और वह खूब पैसा कमाना चाहती है. नायक भानु भी यही चाहता है. एक विदेशी जोड़ा, सरोगेट मदर की तलाश में जयपुर आता है और जैसे इनके सपनों को मंज़िल मिल जाती है. बिना गरीबी का रोना रोए इस पूरी कहानी को बहुत ही सहजता से फ़िल्मांकित किया गया है. कहानी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं और यह सारे इमोशन्स को बड़ी ही खूबसूरती से साथ लेकर चलती है. 

गंभीर विषय को गुदगुदाते हुए भी कहा जा सकता है. 

हम हिन्दी फ़िल्मों के दर्शक जब सरोगेसी विषय देखते हैं तो सीधे-सीधे दो बातें दिमाग़ में आती हैं, पहली तो यह कि चूँकि गंभीर और नया विषय है तो इसमें बहुत ज्यादा उपदेशात्मक या ज्ञान भरी बातें होंगीं. और दूसरी वही माँ की ममता से लबरेज़ महान भावनात्मक चित्रपट की तस्वीर आँखों में कौंध जाती है. क्या करें, हमने त्याग, बलिदान, तपस्या में डूबी हुई रोने-धोने की इतनी फ़िल्में देख रखी हैं कि सिवाय इसके और कुछ और सोच ही नहीं पाते! लेकिन जैसा कि मिमी की टैगलाइन में भी कहा गया है कि 'इट्स नथिंग लाइक व्हाट यू आर एक्सपेक्टिंग' तो हम भी यही कहेंगे कि ये हमारी घिसी-पिटी सोच से हटकर एकदम नए कलेवर में बनाई गई फ़िल्म है. 

 यह फ़िल्म ज्ञान तो देती है पर उपदेश नहीं. इसके संवादों पर आप मुस्कुराते हुए हामी भरते जाते हैं. हास्य का पुट देते हुए गंभीर विषय को सहजता से कैसे समझाया जा सकता है, यह फ़िल्म उसका सटीक, सशक्त उदाहरण है.

हिन्दू-मुस्लिम साथ में हँसते भी हैं.  

इस फ़िल्म में हिन्दू-मुस्लिम हैं पर उनके कट्टरपन को भुनाने की कोई चेष्टा नहीं की गई है. यहाँ एक-दूसरे को देखते ही उनका खून नहीं खौलता! लेकिन कुछ भी कहिए पर यह फ़िल्म भारतीय दर्शकों की नस जरूर पकड़ के रखती है. निर्देशक जानते हैं कि चोट भी कर दो और ज़ख्म दिखाई न पड़े. बल्कि यहाँ तो हमारी मानसिकता को सोच बार-बार हँसी ही आती है. एक स्थान पर भानु स्वयं को मुसलमान बताता है और उस की टैक्सी पर जय श्री राम लिखा देख दो लोगों के चौंकने का अभिनय सहज हास्य पैदा करता है. वहीं जब मिमी की माँ, स्थिति को समझे बिना मिमी के गर्भवती होने की खबर जान पछाड़ें खा छाती कूट रही होती है. तभी उसे पता चलता है कि लड़का मुसलमान नहीं है. उस वक़्त उसके चेहरे की प्रसन्नता देखते ही बनती है. वो सारे दुख भूल इस बात से सुकून महसूस करती है कि लड़की ने ज्यादा नाक नहीं कटाई! 

एक जगह मिमी की सहेली शमा के घर जब भानु मुस्लिम बनकर रहता है तो उससे नमाज़ के बारे में किये गए प्रश्न पेशानी पर बल नहीं डालते बल्कि भीतर तक गुदगुदा जाते हैं. 

हालाँकि यह फ़िल्म अपने मूल विषय सरोगेसी से एक पल को भी हटती नहीं लेकिन फिर भी घर-परिवार से जुड़े हर दृश्य से एक जुड़ाव सा महसूस होता है और संवाद अपने से लगते हैं. यक़ीनन यह फ़िल्म कई सामाजिक धारणाओं को बदलने का माद्दा रखती है.

मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की खूबसूरती का संगम है यह फ़िल्म  

एक बच्चे के घर आने से कैसी रौनक आ जाती है और सब दुख बौने लगने लगते हैं, इसे अत्यंत भावुक और संवेदनशील तरीके से फिल्माया गया है. कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ गला रुँधने को आता है पर अचानक ही कोई फुलझड़ी सी छूटती है और मन स्वयं को संभाल लेता है. बच्चे से जुड़ाव और मोह के सारे रंग तो हैं ही इसमें, पर इसके साथ ही बच्चे, रिश्ते कैसे जोड़ देते हैं यह भी बड़ी सरलता और संतुलित ढंग से दिखाया गया है. वहीं गोरे बच्चे को लेकर जो आकर्षण है, उसे दिखाने में भी निर्देशक ने कामयाबी हासिल की है. बकौल भानु, "रंगभेद से छुटकारा जाने कब मिलेगा". 

भानु के कोई बच्चा नहीं लेकिन उसके पास सरोगेट मदर अफोर्ड करने के लिए पैसा भी नहीं है. एक दृश्य में वह कहता है कि 'बच्चों को पढ़ाने के लिए लोन लेते हैं, पैदा करने के लिए कौन लेगा!' लेकिन वहीं वो विदेशी जोड़े को एक फ़िट सरोगेट मदर दिलाने में कोई क़सर नहीं छोड़ता. एक अन्य जगह, जब मिमी बेहद निराश होकर उससे पूछती है कि वो अब तक उसका साथ क्यों दे रहा है?  तो उसका जवाब है कि "ड्राइवर हूँ,एक बार पैसेंजर को बिठा लिया तो हम उसे मंजिल पे छोडे बग़ैर वापिस नहीं लौटते". 

जीवन-दर्शन का पाठ भी है यहाँ कि "हम जो सोचते हैं वो ज़िंदगी नहीं होती है, हमारे साथ जो होता है वो ज़िंदगी होती है". 

ज़बरदस्त कलाकारों का कॉम्बो पैक है यह फ़िल्म.  

मिमी के माता-पिता के रूप में सुप्रिया पाठक और मनोज पाहवा का अभिनय, अभिभूत कर देता है. उनके चेहरे के हाव भाव ही आधी बात कह जाते हैं. मिमी की सहेली शमा के रूप में सई बेहद प्रभावित करती हैं. उनकी बोलती आँखें दीप्ति नवल और स्मिता पाटिल की याद दिलाती हैं. पंकज त्रिपाठी के बारे में तो अब क्या ही और कितना कहा जाए! हर फ़िल्म में वे अपनी कला से दर्शकों का दिल जीत लेते हैं. उनके लिए एक ही बात बार-बार ज़हन में आती है कि 'एक ही दिल है, कितनी बार जीतोगे!' 

कृति सेनन ने मिमी के चरित्र में जान फूँक दी है. जहाँ भी उनका ज़िक्र होगा, मिमी खुद ब खुद उधर चली आएगी. यह फ़िल्म उनके करिअर में मील का पत्थर तो साबित होगी ही, साथ ही अब उनको ध्यान में रखते हुए कहानी भी लिखी जाया करेंगीं.   

इस फ़िल्म की सफलता में इसकी ज़बरदस्त स्टार कास्ट का होना भी जरूर गिना जाएगा. हर कलाकार ऐसा है जिसकी जगह और किसी को सोचा ही नहीं जा सकता! सबने अपना-अपना रोल दमदार तरीक़े से निभाया है. जीत का सेहरा कलाकारों के सिर बाँधते हुए, तालियों की गड़गड़ाहट इसके निर्देशक लक्ष्मण उटेकर के लिए भी होनी चाहिए. क्योंकि उन्होंने ही यह साबित किया कि गंभीर विषय पर चर्चा मुस्कुराते हुए हो, तो उसका असर गहरा और प्रभावी होता है. ए.आर.रहमान का नाम देख यदि अपेक्षाएं हावी न हों तो गीत संगीत ठीक-ठाक है. यद्यपि फ़िल्म के इस पक्ष पर अधिक ध्यान नहीं जाता क्योंकि हमारा मन तो इस कहानी से इतर कहीं भटकता ही नहीं! 

एक बार फिर याद दिला रहे हैं  कि पहली फ़ुरसत में ही इसे देख डालिए, क्योंकि 'इट्स नथिंग लाइक व्हाट यू आर एक्सपेक्टिंग'. 

बधाई हो! हमारा सिनेमा बदल रहा है!

- प्रीति अज्ञात 

आप इसे यहाँ भी पढ़ सकते हैँ -

https://www.ichowk.in/cinema/mimi-movie-review-on-netflix-pankaj-tripathi-kriti-sanon-starrer-mimi-is-one-of-the-best-film-in-recent-time-reasons-stating-why/story/1/20971.html

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फोटो: साभार गूगल 



गुरुवार, 22 जुलाई 2021

मन दौड़ने लगता है....

बीते समय में एक ज्ञान हमने बहुत अच्छे से ले लिया है कि जब तक किसी बात को कहने के लिए दिल स्वयं राजी न हो, जुबां पे ताला लगाकर रखना चाहिए. बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देने से लेने के देने पड़ जाते हैं. यूँ तो इस संदर्भ से जुड़े कई किस्से हैं लेकिन अभी आपको ताजातरीन घटना सुनाती हूँ. 
एक दिन रफ़ी साब की बात चल रही थी. चर्चा में पूरी तरह सहभागिता दर्शाते हुए हमने आगे होकर कह दिया कि किशोर और रफ़ी का कोई मुक़ाबला ही नहीं! गायन के मामले में मोहम्मद रफ़ी का अंदाज़ तो अद्भुत है ही, लेकिन किशोर दा भी कहीं उन्नीस नहीं ठहरते जबकि उन्होंने तो संगीत की विधिवत शिक्षा भी नहीं ली है. अब शायद तब हमारी बुद्धि ही भ्रष्ट हो चली थी जो हमने इसमें एक पंक्ति और जोड़ दी कि 'मुकेश मुझे उनसे कम पसंद हैं." मेरा यह मानना है कि जब कोई 'कम पसंद' कहता है तो वह उस इंसान की आलोचना नहीं कर रहा होता बल्कि अपना रुझान बताना चाहता है. लेकिन मित्रों के सामने इतनी आसानी से कोई बात कह बचकर निकल जाओ तो लानत है ऐसी मित्रता पर! 
रफ़ी-किशोर की प्रशंसा तत्काल समाप्त करके मित्र की सुई मुकेश पर अटक गई. उन्होंने हमारी बात को सुन तुरंत ही जिस टोन में 'अच्छा!' कहा, हम समझ गए कि "अबकी कुल्हाड़ी पर सीधे ही पैर मार लिया है हमने, बचना मुश्किल है". उनकी खतरनाक मुखमुद्रा देख हमें अपनी गलती का जरूरत से ज्यादा ही एहसास हो गया था. सच्चाई यह है कि मुकेश ने राज कपूर जी के जितने भी गाने गाए हैं, हमने जमकर सुने हैं और सदैव दिल से उनके प्रशंसक रहे हैं. इसके अलावा भी बेशुमार बेहतरीन गीत हैं उनके. 

तो हमने बात संभालते हुए कहा, "अरे! मेरा ये मतलब नहीं था. राज कपूर जी की तो आवाज़ थे वे. आवारा, श्री 420, संगम, मेरा नाम जोकर, अनाड़ी और कितनी ही अनगिनत फ़िल्मों का पार्श्वगायन उन्होंने किया है. जिस देश में गंगा बहती है का 'होठों पे सच्चाई रहती है' गीत तो हम भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि गीत मानते हैं. 
तुमको क्या पता, जब हमको प्रेम हुआ था न तो हमने अपने प्रेमी को सबसे पहले यही गीत सुनाया था, "खयालों में किसी के, इस तरह आया नहीं करते" और चिट्ठी लिखकर हम दोनों ने परस्पर "फूल तुम्हें भेजा है खत में" भी गुनगुनाया था. सावन के महीने में पवन ने उन दिनों भी खूब सोर किया था. हमारे नसीब में बिछोह था जिसके कारण रो-रोकर "छोड़ गए बालम, हमें हाय अकेला छोड़ गए" का सहारा भी हमने लिया ही है". 

हमारे दुख को दरकिनार कर मित्र ने दूसरी गोली दागी. "राज कपूर जी की तो आवाज़ थे वे!!!" ये कहकर आप क्या सिद्ध करना चाह रही हैं? दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ तक सबको सुपरहिट गाने दिए हैं उन्होंने". अब हम समझ गए कि उन्होंने हमारी बात सीधे दिल पर ले ली है, समझाने का कोई फायदा नहीं! हाथ जोड़कर शब्द वापिस लेना ही एकमात्र उपाय बचता है. शर्मिंदगी में सिर को जमीन में गाड़ते हुए भरे गले से हमने कहा कि 'हाँ, दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा', 'कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है', 'मैं पल दो पल का शायर हूँ, मुझे भी बेहद प्रिय हैं. उन्होंने तो मनोज कुमार, संजीव कुमार, राजेश खन्ना सबके लिए शानदार गाया है. 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए', 'महबूब मेरे', 'धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले', 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे', 'इक प्यार का नगमा है','सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं', 'चल अकेला' और ऐसे ही शानदार सैकड़ों गीत उनके खाते में हैं. तभी तो उनकी आवाज़ को 'गोल्डन वॉयस' कहा जाता है". हमने उनकी जानकारी में इज़ाफ़ा कर रिरियाते हुए अपनी खिसियाहट दूर करने की एक और नाकाम कोशिश की. 

खैर! दिल का मामला था और वो भी संगीत से जुड़ा. दोनों पक्षों का भावुक होना स्वाभाविक था.  हम मौन होकर 'दोस्त दोस्त न रहा', 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'सजनवा बैरी हो गए हमार' जैसे दर्द भरे नगमों में डूब गए. उस दिन इतने गहरे दुख और सदमे में चले गए थे कि स्वयं ईश्वर ने आकर हमारी स्मृति से सभी गायकों को विलुप्त कर केवल मुकेश को छोड़ दिया था. हम तबसे यही सिद्ध करे जा रहे हैं कि वे मेरे भी प्रिय गायक हैं. 
लेकिन सच तो ये है कि हम उन्हें दीवानों की तरह चाहते हैं. हमारे दुख को उन्होंने अल्फ़ाज़ दिए हैं. 'वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते', 'दीवानों से ये मत पूछो', 'मुझको इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो' ने हमारे आँसुओं को खूब कांधा दिया है. 
उस दिन जरूर हम, अपनी बात हम ठीक से रख नहीं पाए थे, इसलिए मित्र की नाराज़गी छलक पड़ी. बाद में उनको हमने ग्रुप छोड़ते हुए 'हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, याद आए कभी तो मत रोना' गीत व्हाट्स एप कर दिया था.  जिस पर उन्होंने सहृदयता दिखाते हुए हमें मुस्कान वाला इमोजी भेजा था. 

लेकिन मुकेश जी, आप तक हमारा प्यार पहुँचे. सैकड़ों गीतों के साथ-साथ, आपके लंदन अल्बर्ट हॉल वाले कार्यक्रम का कैसेट भी था घर में, जिसे सुनकर हम बड़े हुए हैं. पता नहीं कैसा जादू है आपकी गायकी में कि हजारों बार सुनकर भी जी नहीं भरता! आपके गीत इतना चलाते थे कि कई बार कैसेट की रील उलझ जाती. फिर जैसे-तैसे उसमें पेंसिल फंसा धीरे-धीरे घुमाते और ठीक करके ही दम लेते थे. जब तक ठीक न होता, मुँह लटका ही रहता था. 
आप सबके प्रिय गायक हैं और हमेशा रहेंगे. मन टेप रिकॉर्डर और कैसेट के जमाने की स्मृतियों के पन्ने पलट रहा है. एक बार फिर रजनीगंधा महक रहा है. आप मन के भीतर उतर आए हैं, रील गोल गोल घूमने लगी है -
कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमा रेखा है
मन तोड़ने लगता है
अन्जानी प्यास के पीछे
अन्जानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है....  
- प्रीति अज्ञात 
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बुधवार, 21 जुलाई 2021

चाय में डूबे बिस्कुट की भी अपनी एक कहानी है

आलू गोभी, कढ़ी चावल, छोले कुलचे की तरह एक और भारतीय जोड़ी है चाय-बिस्कुट की. लेकिन इन दोनों का किस्सा ही अलग है. हम ये बात आज तक नहीं समझ सके कि चाय के साथ अगर बिस्कुट या टोस्ट आता है तो उसको डुबोना किसलिए है? आखिर इनके मेलजोल की प्रथा कब से प्रारंभ हुई? अब सुबह-सुबह बिस्कुट महाराज हाथ से ऐसे फिसले जैसे गंगा नहाने घाट से उतर गए हों. खुद तो डूबे ही सनम, हमारी सुबह भी ले डूबे हैं. हम तो इतने आहत हैं कि क्या ही कहें!

सच मानिए, जीवन में असली दर्द की पहचान तो तब होती है जब सुबह की पहली चाय के साथ अपना बिस्कुट खुदकुशी कर ले. आप सबने भी यह दुख कभी न कभी झेला ही होगा! ये भी जानते ही होंगे कि यही दर्द तब नासूर बन जाता है जब उस दिवंगत बिस्कुट को बचाने के चक्कर में, बचा हुआ भी डूब जाए! आज इस गहरे ज़ख्म की पीड़ा की प्रक्रिया से इतना बुरी तरह गुजरे हैं हम. क़सम से पहली बार तो दिल पर पत्थर रख लिया था हमने और वक़्त के इस घनघोर सितम को चुपचाप सह गए थे. लेकिन दूसरी बार तो यूँ लगा जैसे बचाव दल (रेस्क्यू टीम) का एक बंदा खामखां शहीद हो गया. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसे तो बचाया जा सकता था!  लेकिन अब अफ़सोस के सिवाय और कुछ हाथ न था. इस गरीब के किचन में वही दो बिस्कुट शेष थे जो आज साथ छोड़ गए. गए भी तो वहाँ, जहाँ से आज तक कोई भी साबुत न लौटकर आ सका. ज्ञानी लोगों ने तो कब का बता दिया था कि कमान से निकला तीर, मुँह से निकले शब्द और चाय में डूबे बिस्कुट को लौटा पाना असंभव है. अब मति तो हमारी ही मारी गई थी कि ज्ञानियों की बातों को हल्के में ले लिया. 

अच्छा! अब आप सोच रहे होंगे कि हमने कौन सा बिस्कुट लिया था. तो हमें यह बताने में रत्ती भर भी संकोच की अनुभूति नहीं हो रही कि ये वही आयताकार खाद्य पदार्थ है जो कि सृष्टि के निर्माण के समय से ही इस धरती पर विद्यमान है. जी, हाँ पारले- G. हमारा तो यह भी मानना है कि ईश्वर ने जब मनुष्य को इस धरती पर भेजा तो टोसे में केतली भर चाय और पारले- G का पैकेट साथ बाँध दिया था. हो सकता है, उन्होंने स्वयं भी अपनी थकान दूर करने के लिए यही खा कर आराम किया हो. तभी तो इसे वरदान प्राप्त है कि युग आते-जाते रहेंगे पर तुम सदैव, सर्वत्र उपस्थित रहोगे.

अब ऐसा भी नहीं कि हमने इसके विकल्प न तलाशे हों. गोल मैरी ट्राई किया पर वो पूरा बैरी निकला. क्रेक्जैक और 50-50 टाइप  को तो स्वयं चाय ने ही ठुकरा दिया. बोली, "मुझे पाने वाले में कुछ तो क़शिश और मौलिकता होना माँगता है बेबी! ये सब तो मोनको की कॉपी करके बड़े हुए हैं". कई चॉकलेटी बंदे भी इस स्वयंवर में आए लेकिन अपने लावा को भीतर ही घोल पराजित हुए. इधर ये कमबख्त पारले यह सोच मंद-मंद मुस्कुराता रहा, मानो कह रहा हो, "अजी, हमसे बचकर कहाँ जाइएगा, जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा!" जाने किस फॉर्मूले से बना है कि इसके सिवाय और कुछ जँचता ही नहीं! या फिर चाय ही नहीं चाहती होगी कि उसके जीवन में कोई नयापन आए. उसे बदलाव की चाहत ही न रही. शायद उसी बोरिंग लाइफ की अभ्यस्त हो चली है.

लेकिन तनिक विचारिए, उस चाय के दिल पर क्या बीती होगी जिसे अपनी बाँहों में समाए उसका प्रेमी चल बसा. आखिर चाय और मुँह के बीच फ़ासला था ही कितना! वैसे भी उस समय कप टेबल और मुख के मध्य स्थान पर लहराती उंगलियों के चंगुल में था. बस, जरा सी ही दूरी तो तय करनी थी. लेकिन ये बेवफ़ा अपनी प्रिया का साथ न दे सका और दो क़दम चले बिना ही एन मौके पर दम तोड़ गया.

यद्यपि हमें इससे सहानुभूति भी कुछ कम नहीं. हमारा वैचारिक गुरु भी यही है. एक बार जब हम अपने प्रेमी की स्मृतियों में औंधे पड़े टसुए बहा रहे थे तब इसी ने सचेत किया था. कह रहा था कि किसी में ज्यादा डूबोगी, तो टूट जाओगी. और आज, खुद ही ऐसा डूबा, ऐसा डूबा कि कोई न बचा सका. आज के जमाने में कोई नैतिक शिक्षा लेना तो नहीं चाहता, पर भावुक मन से बस इतना ही कहेंगे कि मोहब्बत में 'दो ज़िस्म एक जां की तरह' ऐसा डूबो, ऐसा डूबो कि अलग करना मुश्किल हो जाए. इश्क़ करो तो चाय-बिस्कुट की तरह एकाकार हो जाओ.

खैर! यह हादसा ऐसा है जो हम सबके साथ कभी न कभी हुआ है. सच कहूँ तो चाय में डूबा बिस्कुट हमारी भारतीयता की पहचान है. यही वह भीषण दुख और दर्द से भरा रिश्ता है जिसने हम सबको एक सूत्र में बाँधे रखा है. लेकिन अगर डूबने से डर लगता है तो जरा संभलकर रहिए.

कहीं पढ़ा था, "चाय में डूबा बिस्कुट और प्यार में डूबा दोस्त किसी काम के नहीं रहते". लेकिन हम कहते हैं, उन पर से ध्यान नहीं हटना चाहिए. न जाने कब उन्हें हमारे सहारे की जरूरत पड़ जाए.  हाँ, लेकिन डूबे हुओं के किस्से मन को भीतर से तोड़ देते हैं! डूबे हुए बिस्कुट को निकालने में संघर्षरत इंसान को देख हमारा तो कलेजा एकदम से फट जाता है जी.  

अच्छा, चलते-चलते एक जरूरी बात और बताते चलें कि अंग्रेजी के 'बिस्किट' सर, हिन्दी पट्टी में आते ही 'बिस्कुट' भाईसाब बन जाते हैं क्योंकि हम लोग चुटुर पुटुर चीज़ों को कुटुर -कुटुर खाते हैं. 

- प्रीति 'अज्ञात'

20/07/2021 

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शनिवार, 10 जुलाई 2021

जब चोर की चिट्ठी ने हमें भावुक कर दिया!

कुछ खबरें ऐसी होती हैं जिन्हें जानने के बाद हम जैसे होमो सेपिएन्स बेहद कन्फ्यूज़ हो जाते हैं. मतलब रत्ती भर भी समझ नहीं आता कि भावुक होकर प्राण तज दें या केवल सिर धुनकर ही इस दिल की बेचैनी को क़रार दें!. 

बताइए, ये भी कोई बात हुई कि एक बंदे ने चोरी की और उसपे सॉरी नोट भी छोड़ गया! कि "मैं मजबूर हूँ. जैसे ही पैसे जमा होंगे, सूद समेत तुम्हारे पास फेंक जाऊँगा. मैं अच्छा इंसान हूँ".  हालांकि इसमें 'फेंकना' शब्द पर मुझे घोर आपत्ति है, थोड़ी शालीन भाषा का प्रयोग किया जा सकता था. पर कोई न! जल्दी में बेचारे के मुँह से निकल गई होगी. वरना उफ़्स! इतना क्यूट और मासूम चोर, न भूतो न भविष्यति! 

मुझे तो लग रहा कि इसका पत्र पढ़कर पीड़ित पक्ष भी एक-दूसरे के गले लग बिलख-बिलख रोया होगा. शायद आँखों ही आँखों में परस्पर बधाई का आदान-प्रदान भी कर लिया हो कि हम कितने भाग्यशाली हैं जो एक चरित्रवान, संवेदनशील और ईमानदार चोर ने हमारा घर चुना. घर की एक-एक ईंट अपने भाग्य को सराह रही होगी कि कैसे एक देवदूत ने उन्हें स्पर्श कर दैवीय बना दिया. 

अच्छा! ये भी इतिहास में पहली बार ही दर्ज़ समझिए कि जब चोर ने अपने ही पर्सनल हाथों से अपना चरित्र प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया हो. सोचिए, चोरी के उन नाजुक क्षणों में जहाँ एक-एक पल कीमती होता है. साँसों की मद्धम आवाज़ भी गुस्ताख महसूस होती है, वहाँ इस मासूम ने चिट्ठी लिखते समय अपनी जान की तनिक भी परवाह न की. हे युवक! तेरी इस वीरता की कहानी पाठ्यपुस्तक का हिस्सा बनेगी. 
सिर्फ़ इतना ही नहीं मैं तो यह सोचकर भी परेशान हूँ कि हिन्दी साहित्य इस बाँके जवान के निश्छल कृत्य से कैसे उऋण हो सकेगा! आखिर उसने रुपये उठाने के साथ-साथ, लुप्त होती पत्र-लेखन विधा को पुनर्जीवित करने का बीड़ा भी तो उठाया है. 

ओ मोरे खुदा! ओ माय भगवन! मतलब इन जैसे लोग हम डिजिटल कार्ड वालों को तो डायरेक्ट गिल्ट में ही मार के चले गए! क्या बताएं! एक जमाने में हम भी दो-दो किलोमीटर लंबी चिट्ठियां लिखा करते थे. अब लज्जा से मुंडी जमीन में धंसी जा रही है. तरन्नुम में सोचती हूँ "हम कितने मासूम थे, क्या से क्या हो गए देखते-देखते!" 
खैर! कलेजे पर पत्थर रख हमने इन मजबूर महाशय को कोसने की बजाय इनकी प्रशंसा का मन बना ही लिया था. अभी प्रशस्ति पत्र का प्रारूप दिमाग की अटरिया में उमड़-घुमड़ ही रहा था कि हाय रे! हमारे कोमल दिल पर एक और आकस्मिक भारी जुलुम हो गया. अब इसे भाग्य की विडंबना कहें या अपने अथाह पनौतीपन की जानी-पहचानी कंटिन्यूटी. पता चला, मामला भिंड (म. प्र.) का है. 

अब साब! लेट मी क्लियर माय ऑरिजिनल मन की बात, कि मामला जब जन्मभूमि (माना कि हम राम जी नहीं, पर कहीं तो पैदा हुए हैं न!) से जुड़ा हो तो संवेदनशीलता अलग ही लेवल पर भभककर बाहर आने को दौड़ती है. आपने एकदम ठीक समझा, भिंडी ऋषि की यह पावन भूमि इस नाचीज़ की अवतरण स्थली भी है. भई, यहाँ का अपना एक समृद्ध इतिहास है. गौरी सरोवर है, किला है. ग़ज़ब की खूबसूरती है, गुलाब की पत्तियों से महकते लिपटे पेड़े तो दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं ही. यहाँ की प्रतिभाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में खूब नाम कमाकर शहर को गौरवान्वित किया है. एक तो आपके सामने अभी है ही. खी खी खी. 

हमें पता है आप मन में क्या सोच रहे हैं! तो सुनिए, ये जो थोड़ी इमेज खराब हुई भी है वो इस चक्कर में कि यहाँ नेक डाकू-वाकू हो गए थे कभी. जैसा कि हमने अभी ही अपने भावपूर्ण उद्बोधन में कहा कि जगह तो लल्लन टॉप है. उसी को विस्तार देते हुए बता रहे हैं कि इधर इटावा वाली साइड में जो बीहड़ है न, वो पहले विला टाइप फ़ील देता था. तो कुछेक दस्यु सम्राट और साम्राज्ञी भी इसी चक्कर में यहाँ सेटल हो गए थे. मल्लब उन की और उनकी बंदूक की पदचाप यहाँ की फिज़ाओं में बेतहाशा गूँजी हैं. लेकिन इस भ्रम में न रहिएगा कि इसके लिए केवल भिंड ही जिम्मेदार है. न, बेटा न! ऐसी मिस्टेक गलती से भी मत करना!
आपने लक्ष्मी-प्यारे, शंकर-जयकिशन, नदीम-श्रवण, सलीम सुलेमान, विशाल-शेखर आदि की संगीत जोड़ी का नाम तो सुना ही होगा.  बस, ठीक वैसे ही हमाई जन्मस्थली की भी जोड़ी याने द्वय है जी. लोग जब डाकुओं का जिक्र करते हैं न, तो बड़े सम्मानपूर्वक भिंड-मुरैना एक साथ जपा जाता है. 

वैसे विषय से इतर एक बात बताएं आपको? पर पिलीज़ पहले प्रॉमिस कीजिए कि आप इसको घमंड समझ, हमको सेलिब्रिटी समझने की भूल कतई न करेंगे. वो बात ये है कि हमको भी दस्यु सुंदरी फूलन देवी और श्री मलखान सिंह जी के साक्षात दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है. पर वो कहानी फिर कभी! अभी जरा चोरी की इस प्रेरणास्पद घटना पर ठीक से पिरकास डाल लें!

तो आगे का किस्सा ये है कि आदरणीय चौर्य महोदय ने अपनी वीरगाथा सुनाते हुए एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी भी दी. सूत्रों से बात करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने 'धूम-3' के नायक की तरह 'अच्छा काम' किया है. उनके लिखे पत्र में भी धूम-3 और उनके अच्छे इंसान होने की पुष्टि की गई है. लेकिन अंदर की खबर यह है कि पुलिस कुछ पुष्टि स्वयं ही करने की इच्छुक पाई गई है. हो सकता है कि भिंड पुलिस ने ही ससम्मान इस नवयुवक के माथे पर लड्डू उगाके उस को सूद समेत घर लौटाने का मन बना लिया हो. 

जो भी हो, देश भर के अखबारों में इस अच्छे इंसान की धूम मची है. चोरी वोरी की बात कौन करे! वो तो रोज का किस्सा है जी. अपन को तो सेंटीमेंटल होना जमता है. तभी तो खुशी से मेरी शुष्क आँखें छलक उठी हैं. इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुईं. अंततः हमारे भिंड के अच्छे दिन आ ही गए! हौसला न छोड़ना. आपके भी आएंगे. 

रात के तीन बजा चाहते हैं. लेकिन सुंदर कल्पनाओं से मन का आँगन सजा हुआ है. हौले-हौले सतयुग में लौट रहे हैं हम. इस सतत प्रक्रिया के मध्य में सिबाका फिर से बिनाका गीतमाला बन चुकी है. अपने अमीन सयानी जी चहकते हुए कह रहे हैं, ऊँ हूँ आहा, तो भाइयों और बहनों, इस बार चार छलाँगे ऊपर लगाता हुआ पायदान नंबर एक पर पहुँचा है, ये गाना -
दुख भरे दिन बीते रे भैया 
अब सुख आयो रे 
रंग जीवन में नया लायो रे 
आए हाए दुख भरे दिन बीते रे भैया, बीते रे भैयाआआ 
- प्रीति अज्ञात 
फोटो: न्यूज का स्क्रीन शॉट लिया है. चिट्ठी हमारे घर नहीं आई थी. 
#भिंड #भावुकचोर #चोरकीचिट्ठी #newblogpost #preetiagyaat 



गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

नारायण दभालकर का परम परोपकार राजनेताओं औेर राष्ट्र के लिए शर्म का विषय!

एक खबर कई बार सामने आ चुकी है कि कैसे नागपुर में एक 85 वर्षीय बुज़ुर्ग नारायण दभालकर ने अस्पताल में अपना बेड एक युवक को दे दिया और उसके प्राणों की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया. इस खबर को राजनेता किस मुंह से सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रहे हैं? हर मरीज को बेड उपलब्ध न कराने वाला तंत्र शर्मसार क्यों नहीं होता? निश्चित तौर पर किसी की जीवन रक्षा हेतु अपने प्राण त्याग देना, संवेदनशीलता और त्याग की पराकाष्ठा है. यूं भी हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि वहां त्याग और बलिदान की कई कहानियां सुनने-पढ़ने को मिलती आई हैं.

भारत जैसे विशाल देश में इन कहानियों ने ही हमारे संस्कार और सभ्यता की नींव रखी है. चाहे वह श्रीराम हों, ऋषि दधीचि या फिर नचिकेता और ऐसे ही जाने कितने अनगिनत नाम, जिनकी कहानियों को सुनकर मन आश्चर्य से भर जाता है. हमारे स्वार्थी हृदय को तो सहसा विश्वास भी नहीं होता! लेकिन वो सब सच है परंतु सतयुग का!

कलयुग में ऐसा विरले ही देखने में आया है. स्व. श्री नारायण जी ने जो किया, उसके हम सब साक्षी बने हैं. यह घटना इसलिए भी उल्लेखनीय है कि इस समय कोरोना ने मनुष्य के सामाजिक मूल्यों और नैतिकता को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर रखा है. देश के कई स्थानों से नकली इंजेक्शन बनाने, दवाओं की कालाबाज़ारी, और मरीज़ों से दुर्व्यवहार की खबरें सामने आ रही हैं.

साथ ही हम ये भी देख रहे हैं कि एक बेड के इंतज़ाम में परिजन कैसे चक्कर काट रहे हैं और इस कठिन समय में मनुष्य सिवाय अपनी जान बचाने के और कुछ भी सोच नहीं पा रहा है, ऐसे में किसी का स्वेच्छा से अपना बेड छोड़ किसी और मरीज़ को दे देना, इस कृत्य को अत्यंत सराहनीय और उस व्यक्ति को ईश्वरतुल्य बना देता है. उन बुज़ुर्ग सज्जन के बड़प्पन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है.

नारायण जी की मौत, राजनेताओं के लिए डूब मरने वाली बात
निश्चित तौर से इस अतुलनीय त्याग की इस पूरी घटना पर हमारा भाव-विह्वल होना स्वाभाविक है. लेकिन हमें एक पल को भी नहीं भूलना चाहिए कि 'अगर बेड होता तो वे बच भी सकते थे'. त्याग और बलिदान अपनी जगह है लेकिन किसी भी देशवासी के लिए इससे अधिक शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है कि 'चूंकि अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं है, इस कारण कोई वृद्ध स्वेच्छा से मृत्यु-वरण कर ले!

एक तंत्र के लिए यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय होता है जब एक देह के त्याग करने से दूसरी देह की रक्षा का प्रबंध हो रहा हो! क्या मृत्यु को महिमामंडित करने के स्थान पर हमें 'सिस्टम' से सीधे-सीधे प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि इलाज के अभाव में किसी व्यक्ति की जान कैसे चली गई? क्या इस तरह की मृत्यु अनैतिक नहीं लगती?

इस पूरे घटनाक्रम में किसी का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता? क्या हर जीवन बहुमूल्य नहीं होता? तो फिर ये कैसा अद्भुत 'सिस्टम' है जो हर मृत्यु को उत्सव में परिवर्तित कर देता है! हम आयु के आधार पर जीवन की महत्ता का निर्धारण करेंगे? या कि इस अवधारणा को संपुष्ट समझें कि जब भी कोई गंभीर परिस्थिति आए तो बलि अधिक आयु वाला ही देगा?

डूब मर जाना चाहिए इस तंत्र को जो किसी की मृत्यु पर 'सॉरी' बोलने के स्थान पर आपसे केवल गौरवशाली अनुभव करने की बात करता है. यदि हम सब भी मात्र इसी भाव में डूब गदगद होते रहे तो व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद हमेशा के लिए भूल जाना बेहतर है. आइए, तंत्र की असफलताओं पर गर्व करें और त्याग के नए प्रतिमान गढ़ने को तैयार हो जाएं. 
नम आंखों से, स्व.श्री नारायण जी को विनम्र श्रद्धांजलि.
 - प्रीति अज्ञात 
29 अप्रैल 2021 

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क्या कोरोना को हराने में 'सिस्टम' से हुई ये 7 बड़ी भूलें?

जैसे ही नए ऑक्सीजन प्लांट लगने और उसकी आपूर्ति के समाचार आने शुरू हुए, भक्त लहालोट होने लगे हैं और उन्होंने 'मोहैतोमुहै' कहकर अपनी खींसे निपोरना शुरू कर दिया है. हाँ, हर बार की तरह इस बार भी वे भूल जाना चाहते हैं कि ये रायता माननीय का ही फैलाया हुआ है और अब वे उसे समेटने में लगे हैं. पर क्या करें? दरअसल गलती उनकी नहीं बल्कि  'सिस्टम' की है. 

सरकारी आंकड़ों का काला सच इससे भी पता चलता है कि जिन मरीज़ों की मृत्यु अस्पताल में हुई, बस उन्हें ही गिना जा रहा है. यानी यदि आप अस्पताल की देहरी पर बैठ इलाज़ के इंतज़ार में, एम्बुलेंस में या घर में इस बीमारी के चलते मृत्युलोक सिधार जाते हैं तो आप कोरोना के शिकार नहीं माने जाएंगे. परिजनों को ये मान लेना होगा कि आप हृदयाघात से मरे, मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) से मरे या क्या पता, आत्महत्या ही कर ली हो! मैं ये तो नहीं कहूँगी कि घर में बैठने की सलाह इसलिए ही दी जा रही है कि आँकड़े कम शर्मनाक हों और हम दुनिया को मुँह दिखाने के क़ाबिल रह सकें लेकिन इतना जरूर कहूँगी कि सतर्क रहिए क्योंकि आपदा प्रबंधन के नए पैमाने गड़े जा चुके हैं. 

आवश्यकता से अधिक उत्सव प्रेमी 
कोरोना ने जब इस देश में प्रवेश किया था तो थाली, ताली और मोमबत्ती के आयोजन किये गए, जिसमें हम सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही 'आपदा में अवसर' का सूत्र भी थमा दिया गया था. जिसे पहली लहर में मरीजों के अंग निकालकर बेचने, उनके गहने लूटने और दूसरी लहर में दवा और इंजेक्शन की कालाबाज़ारी ने एक शर्मिंदगी भरे जुमले में बदल दिया है. अब यह वाक्य नकारात्मक समाचार के साथ जुड़ चुका है. 
जब महामारी का असर कम होने लगा तो ये नहीं देखा कि बाकी देशों में दूसरी लहर का आगमन हो चुका है. यहाँ कोरोना को हराकर विश्व गुरु बनने का ताज पहना जाने लगा, वैक्सीन बनने की खुशियां मनाई जाने लगीं और इस गंभीर तथ्य को भूल गए कि हम कोरोनमुक्त देश तब बनेंगे जब 135 करोड़ भारतीयों को ये टीका लग जाएगा. लेकिन चुनाव की जल्दबाज़ी और विजेता के मद में, न तो टेस्टिंग बढ़ाने पर जोर दिया गया और न ही अन्य चिकित्सकीय व्यवस्थाओं को प्राथमिकता!

वैसे तो अपुनिच भगवान है!
जहां श्रेय लूटने की बात आती है, सरकार छाती ठोक 'हमने किया, हमने किया' का गीत गाने लगती है. मानो, वैसे तो ये काम किसी और का रहा होगा लेकिन हाय रे हमारा सौभाग्य! कि इन्होंने कर दिखाया. लोग तो इस खुशी में ही बावले हुए फिरते हैं. जनता नतमस्तक हो जाती है कि प्रभु! हम पर आपके द्वारा ये जो एहसान कर दिया गया है, उससे उऋण कैसे होंगे! 
भैया, ओ भैया! आपको काम करने के लिए ही बेहद विश्वास और बहुमत के साथ चुना गया है. तो जब नाकामी हाथ लगे तो इसका ठीकरा 'सिस्टम' पर मत फोड़ो! क्योंकि ये 'सिस्टम' आपके कहे पर ही चलता आ रहा है. 

जरूरत से सौ गुना अधिक मीडिया प्रबंधन 
सारे चैनल दिन-रात किसकी बंसी बजा रहे,अब ये कोई राज की बात रह नहीं गई है. कभी-कभार आत्मा धिक्कारे, तो सच बोलने की कोशिश भी करते हैं पर उनकी टर्मिनोलॉजी बदल जाती है. अब माननीय का नाम बदलकर 'सिस्टम' कर दिया जाता है. वैसे अन्य संदर्भों में सिस्टम वो शय है जिसे नेहरू जी ने खराब कर रखा है.  
बेचारा, मजबूर 'सिस्टम', स्तुतिगान का पक्षधर है और इस संगीत का भरपूर आनंद लेता है पर उसका दिल बड़ा नाजुक है जी! इसलिए सुर बदलते देख संबंधित विषय की पोस्ट पर प्रतिबंध लगा देता है. बोले तो, 'न रहेगा बाँस... न बजेगी बाँसुरी'. तभी तो, जब हालात बिगड़ने लगे और दुनिया भर में थू-थू होने लगी तो ऑक्सीजन पहुँचाने का ऑर्डर देने से पहले सोशल मीडिया पर कोरोना से सम्बंधित पोस्ट करने वालों पर कार्यवाही करने का ऑर्डर आ गया. अपने आलोचकों का मुँह बंद करने का यही एकमात्र खिसियाना और बचकाना तरीका रह गया है. हालांकि ये यूपी वाले बाबूजी के ठोकने और गाड़ी पलटाने के तरीके से कहीं बेहतर और अहिंसक है. अब भई, इतनी तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी. 
काश! ऐसे ही आपदा प्रबंधन भी कर लिया होता!

जनता की नब्ज़ पर तो हाथ रखा पर दिल टटोलना भूल गए!
वो जनता जो शिक्षा और रोज़गार की बात करती थी, जो भ्रष्टाचार और गरीबी से मुक्ति चाहती थी, जिसने अव्यवस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए थे और 2014 से अपनी आँखों में तमाम सपने भर एक बदलाव की अपेक्षा करने लगी थी, उस जनता की आँखें मूँद दी गईं. उन्हें देशभक्त और देशद्रोही की शिक्षा दी गई. आपस में भिड़ाया गया. फिर एक जगमगाते मंदिर की नींव रख ये यक़ीन दिलाया गया कि तुम यही तो चाहते थे. राष्ट्रवादी जनता फिर दीवानी हो उठी. 
आज वही जनता रोते-बिलखते हुए अस्पताल की मांग करती है, चरमराई चिकित्सा व्यवस्था को देख दिन रात तड़पती है पर शिकायत करे भी तो किस मुँह से? हमने अस्पताल कब मांगे? मंदिर ही तो मांगा था, सो मिल गया! 
हाँ, आप इसे भारतीयों की आस्था से न जोड़ लीजिएगा, यहाँ बात केवल और केवल प्राथमिकता की है
'अयोध्या की तो झांकी है/ मथुरा, काशी बाकी है' कहने वालों से मुझे कोई आपत्ति नहीं, न ही राम मंदिर या लौह पुरुष की भव्य मूर्ति से. ये हमारे देश और संस्कृति की पहचान हैं लेकिन अगली बार जब चुनाव हों तो भले ही यही लोग सत्ता में रहें पर आप उनसे अपना हक़ जरूर मांगना. अच्छे अस्पताल और शिक्षा की बात जरूर करना और ये भी याद दिलाना न भूलना कि जीवन चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, पर इस सिस्टम के हाथों ऐसी निर्दयी मौत कभी न हो!

मसीहा बनने का चस्का
'मोहैतोमुहै' का नारा यूँ ही नहीं बना है. अच्छी खासी रेसिपी है इसकी. पहले किसी समस्या को इतना बढ़ने दो कि देश में त्राहिमाम मच जाए. फिर 'अँधेरी रातों में, सुनसान राहों पर...एक मसीहा निकलता है' की धुन पर इठलाते हुए ठीक 8 बजे टीवी पर अवतरित हो जाओ. फिर एक ऐसी बात कह दो कि जनता स्वयं को धन्य महसूस करने लगे और सारे गिले शिकवे भूल जाए.  
ये ठीक ऐसा ही ही है कि 99 लोगों को मरने दो और 100 वें का नंबर आते ही हीरो स्टाइल में एंट्री लो और उसे बचा लो. फिर बचाने के महान उपकार का वर्णन कुछ इस तरह करो कि जनता अपने भाग्य को सराहने लगे. 
और जो ये प्रश्न पूछे कि उन 99 मौतों का हिसाब कौन देगा? तो उसे देशद्रोही कहकर अपमानित करने के लिए आईटी सेल पहले से ही चाक-चौबंद है. प्रजातंत्र का ऐसा अपमान पहले कभी नहीं देखा. 

कथनी और करनी में अंतर 
आप गमछा बाँधकर टीवी पर तो खूब आए और बहुत ज्ञान भी बांटा लेकिन अफ़सोस कि स्वयं उसे अपनाने में बुरी तरह से विफल हुए. 'दो गज की दूरी, मास्क जरूरी और सोशल डिस्टेंसिंग' का ब्रह्मवाक्य, बंगाल चुनाव की किसी भी रैली में आपके मुखमंडल से एक बार भी उच्चरित नहीं हुआ. क्योंकि आपको तो ठसाठस भरी भीड़ को देखने का सुख लेना था, उनकी तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी छाती को और चौड़ाना था. आप हों या आपके बाल सखा, सभी अहंकारी मुस्कान लिए, बिना मास्क लोगों के बीच घूमते रहे.  उस समय ऐसा लग रहा था जैसे आप किसी  कोरोना मुक्त ग्रह पर विचरण कर रहे हों. हाँ, ये बात अलग है कि वहाँ के आँकड़े जब आएंगे तो सारा ठीकरा दीदी के सर फोड़ दिया जाएगा. 
'छोड़ो दो गज की दूरी, अब चुनाव है जरूरी' के व्यवहार ने ये भी बता दिया कि आपने देश हित से ऊपर स्वयं को रखा. यही नहीं बल्कि इसके साथ-साथ कुंभ में लाखों लोगों को  एकत्रित कर जनता की आस्थाओं को भी सहलाते रहे. जनता ने पहले लॉक डाउन में आपके कहे अनुसार सब किया तो अब वो आपको यूं भीड़ में बोलता देख स्वयं भीड़ बनने से क्योँ सकुचाए?

'आत्मनिर्भर भारत' अब जुमला कम, श्राप अधिक लगता है! 
मात्र कोविड महामारी ने ही हम भारतीयों को दुख नहीं दिया बल्कि कई परिवारों ने उस दर्द को भी सहा है जिसका एहसास उनकी आने वाली पीढ़ियों तक शेष रहेगा. ये लोग पहले एम्बुलेंस की तलाश में दर-दर भटके, फिर अस्पताल की देहरियों पर माथा टेका, उसके बाद बेड की तलाश में नाक रगड़ते रहे, फिर दवाई और ऑक्सीजन सिलिन्डर के लिए गिड़गिड़ाए. कुछ ऐसे अभागे भी रहे जो सारी पूंजी खर्च करने के बाद किसी अपने की अर्थी लिए, श्मशान की प्रतीक्षा पंक्ति में टोकन लिए खड़े हो खून के आँसू बहाते रहे. 'आत्मनिर्भर भारत' के ऐसे अश्लील रूप की कल्पना भी न की थी हमने!
हम वाकई इस सिस्टम से हार चुके हैं. 
- प्रीति अज्ञात 
27 अप्रैल 2021 को iChowk में प्रकाशित

वो दिन हम ही ला सकते हैं!

 इन दिनों जिधर देखो, प्रतीक्षा है. एक ऐसी प्रतीक्षा, जो ईश्वर करे कि किसी के हिस्से में कभी न आये! आदमी बीमार है लेकिन बीमारी पता करने के लिए एक लम्बी लाइन है. टेस्ट हो गया तो उसकी रिपोर्ट के लिए भी प्रतीक्षा करनी होगी. कोरोना पॉजिटिव निकले तो अस्पतालों के दरवाजे खटखटाने होंगे, जहाँ बेड के लिए फिर उसी अंतहीन लाइन से जूझना होगा. हो सकता है किसी अस्पताल की लॉबी में या सड़क किनारे कहीं आपका ठिकाना बना दिया जाए. हालत गंभीर हुई तो इंजेक्शन और ऑक्सीजन के इंतज़ाम के लिए दर बदर ठोकरें खानी होंगी. एम्बुलेंस भी न जाने मिलेगी या नहीं! लेकिन इतने पर भी दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ने वाला क्योंकि जो साँसें टूटीं तो मृत्यु बाद भी यह प्रतीक्षा जारी रहेगी. लाश रखने की जगह अब कम पड़ने लगी है तो उन्हें सामान की तरह एक-दूसरे पर रखा जा रहा है. सड़ती हैं तो सड़ा करें, क्या करें अस्पताल वाले!

अभी तो कहानी और भी है क्योंकि इसके बाद श्मशान घाट पर भी आपकी मृत देह को एक टोकन मिलेगा और जब नंबर आएगा, तब ही आपका जैसे-तैसे अंतिम संस्कार हो सकेगा. कहीं पुरानी क़ब्रों को खोदकर किया जा रहा तो कहीं यूँ ही फेंक भी दिया जाता है क्योंकि अपनी जान सबको प्यारी होती ही है तो कभी-कभी घरवाले ही घबरा जाते हैं. कहीं लकड़ियों की भी कमी हो रही.
ये बात पढ़ने में जितनी क्रूर लग रही, सच्चाई उससे कहीं अधिक कठिन और भयावह है. लेकिन ऐसा असहाय मनुष्य पहले कभी न देखा होगा आपने! वो अस्पताल की देहरी पर दम तोड़ती उम्मीदों के साथ वहीं कहीं, दीवारों पर सिर मारते रह जाता है, चीखता चिल्लाता है. जाने वाले को पुकारता रह जाता है लेकिन जो गया है वो लौटकर कभी नहीं आ पाता! ये एक ऐसी बेबसी है जिससे लाखों परिवार जूझ रहे हैं.
बहुत सी बातें हैं जो इस समय दिमाग़ में घूम रही हैं. न जाने कितनी कह पाऊँगी और कितनी अनकही रह जाएंगी. लेकिन सच तो यह है कि जिस कोविड महामारी ने पिछले वर्ष दस्तक़ दी थी इस बार इसके क़हर से बच पाना मुश्किल हो रहा है. आप कितने भी बड़े तोप हों या किसी भी उम्र के, ये वायरस सबको निगलने को तैयार है. इधर आप अपनी तैयारियों में ढीले पड़े और उधर इसने सेंध बना ली.
हम हमारी जर्जर व्यवस्था पर आँसू बहा सकते हैं, स्वयं बीमार होने या परिजनों को लेकर भटकते हुए हम चिकित्सा व्यवस्था को कोस सकते हैं, प्रशासन पर प्रश्न उठा सकते हैं, सरकार पर आरोप मढ़ सकते हैं. हम मास्क, सैनिटाइज़र और सोशल डिस्टेंसिंग का मज़ाक उड़ा सकते हैं. उनसे होने वाली असुविधाओं पर घंटों बात कर सकते हैं. वैक्सीन न लगाने के पक्ष में ललित निबंध लिख सकते हैं. मोदी-राहुल, कुम्भ-तबलीगी ज़मात पर घंटों बहस कर सकते हैं, चुनाव होने, न होने पर पर गहरा वक्तव्य बाँच सकते हैं. लेकिन इससे हमें मिलेगा क्या? और अब तक क्या पा लिया है हमने? यक़ीन मानिए, कोविड वायरस इन सब बातों से बेअसर है. वो आपके राजनीतिक रुझान को समझ नहीं पाता और आपकी मूर्खताओं पर हँसते हुए पीछे से आकर चुपचाप आपका गला दबोच लेता है.
हमारे हाथ में इतना ही है कि हम वैक्सीन लगवाएं, मास्क का उपयोग करें, अपनी सुरक्षा पर स्वयं ध्यान दें. उसके बाद अगर बीमार हो भी गए तो इस वायरस को हराने की उम्मीद बढ़ जाती है. हमारी जान, हमारे अपनों के लिए बहुत क़ीमती है. हम इसे बचाने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. इस महामारी से मुक्त दुनिया में मनुष्य चैन की साँसें ले सकें, वो दिन भी हम ही ला सकते हैं. ईश्वर सबको सुरक्षित रखे. 🙏
18 अप्रैल 2021 को MP MediaPoint में प्रकाशित

Remdesivir Injection: कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी इंजेक्शन, दवाई भी-लड़ाई भी!

'दवाई भी और कड़ाई भी', कहने को तो देश के बच्चे-बच्चे को यह आदर्श वाक्य रट चुका है. लेकिन जब कोविड उपचार में जीवनरक्षक रेमडेसिविर (Remdesivir) इंजेक्शन की बात आए तो यह एकदम खोखला प्रतीत होता है. 'न दवाई है, न कड़ाई है'. जो सामने दिख रहा है, वो केवल 'दवाई के लिए हो रही लड़ाई' ही है. हालात ये हैं कि इस इंजेक्शन की एक डोज़ का मिलना भी मुश्क़िल दिख रहा है, जबकि गंभीर स्थिति वाले मरीज के लिए छह इंजेक्शन का डोज़ अनिवार्य है. ऐसे में इसे पाना कितना जरुरी है ये केवल उस मरीज़ के परिजन ही समझ सकते हैं. फिलहाल तो दुआ कीजिए कि चुनाव निबटें तो शायद सरकार की नज़र इन ‘छोटे-मोटे’ मुद्दों पर पड़ जाए!

विडंबना यह भी है कि एक तरफ मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है. कहीं तो मास्क न पहनने पर मार-मारकर अधमरा छोड़ देने तक की ख़बरें भी चर्चा में हैं तो वहीं इस बात की भी समुचित व्यवस्था है कि इस इंजेक्शन को पाने के लिए लोग कैसे टूट पड़ें और मारामारी पर उतारू हो जाएँ. बीते कुछ दिनों के समाचार इसके साक्षी हैं.  हाँ, हमारे देश में नेताओं के लिए कोई नियम क़ायदे लागू नहीं होते हैं, वो तो जहाँ जाएंगे छुट्टा मुँह ही! और आपका ये फ़र्ज़ बनता है कि ये साब लोग जहाँ भी मिलें, आप रुलबुक फाड़कर उन्हें सलाम करना न भूलें. देश में वायरस फैलाने के लिए इनके अतुलनीय योगदान के चर्चे अब सदियों तलक होते रहेंगे.

खैर! मुद्दा यह है कि कहने को तो देश की कई प्रमुख कंपनियाँ रेमडेसिविर इंजेक्शन बना रही हैं, लेकिन ये जा कहाँ रहे हैं इसकी सूचना से जनता बेख़बर है. धरातल पर इसे पाने के लिए आम आदमी के हिस्से एक बार फिर वही कड़ा संघर्ष ही आया है. क़ीमत की तो चर्चा ही अलग है! किसी के रेट हजारों को पार कर रहे, तो कोई कंपनी हज़ार से कम में भी इसे उपलब्ध कराने का दावा पेश कर रही है. उस पर तुर्रा ये कि यह वही इंजेक्शन है जो कोविड के पहले दौर में लाखों को पार कर गया था. कुल मिलाकर 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' वाला मामला है. सबके अपने-अपने रेट हैं और जो ब्लैक मार्केटिंग कर रहे, उन असुरों के टशन का तो भगवान ही मालिक है.

आपदा में अवसर! 

'आपदा में अवसर' का इससे सुनहरा रूप और क्या होगा कि इधर आपदा आई और उधर धंधे पनपने लगे. 'तुम मरो या जियो' उनकी बला से! जीवनरक्षक इंजेक्शन की मांग और आपूर्ति का अनुपात पूरी तरह से चरमरा चुका है. ऐसे में दवाई की कालाबाज़ारी करने वालों के अच्छे दिन फिर लौट आये हैं. क्योंकि इसे खरीदने को इच्छुक भीड़ का आलम वैसा ही है जैसा कि कभी थिएटर की टिकट खिड़की पर हुआ करता था. पर वो फ़िल्म थी, आज छूटी तो कल देख ली जाएगी! ज्यादा जल्दी हुई तो ब्लैक में टिकट ख़रीद ली. लेकिन साहिब, ये ज़िन्दग़ी है यहाँ खिड़की पर हाथ धरे हुए ही कब साँसों की डोर हाथ से छूट जाए, कौन जानता है! साँसों की कालाबाज़ारी करने से बड़ा पाप भी कोई और नहीं होता! किसी की मजबूरी का लाभ उठाने से बड़ा ग़ुनाह और कुछ नहीं! लेकिन पापियों को अपना पाप, दिखाई ही कब दिया है! दुर्भाग्य ये है कि पूरी प्रक्रिया में जनता ही पिसती है, वही बलि देती आई है, सरकारें ठुड्डी पर हाथ धरे तमाशा देखती रही हैं कि कब पानी सिर के ऊपर से गुज़रे और वे अपना अवतारी रूप ग्रहण कर जनता को धन्य करें. इस बार भी वही हो रहा.

लेकिन आपको इससे क्या लेना-देना!

जिसका कोई अपना जीवन-मृत्यु से जूझ रहा, वह उसे बचाने की ख़ातिर अपनी जान हथेली पर रख मेडिसिन काउंटर पर गिड़गिड़ा रहा है कि किसी भी क़ीमत पर इस इंजेक्शन को हासिल कर ले. लेकिन हालात ये हैं कि हर जगह निराशा, निराशा और फिर उसका अंत करते हुए एक सफ़ेद चादर से सामना होता है. हिम्मत है तो लाशों के ढेर पर बैठ, अच्छे दिनों की इस उजली तस्वीर को क्लिक कर लीजिए जिससे हम सबको भी एक-न-एक दिन रूबरू होना ही है. 

अरे! सराहिए अपने भाग्य को कि आप डॉक्टरी प्रिस्क्रिप्शन को लेकर शहर भर में नाक नहीं रगड़ रहे. ईश्वर को भी धन्यवाद दीजिए कि उन लाखों मृत शरीरों में आपका कोई अपना नहीं था. लेकिन क़ाश आप उस दर्द को महसूस करते तो कम से कम दवाई पाने के लिए सरकार की नाक में दम तो कर देते! हड़तालें करते, ढोल बजाते, अनशन करते! या कि हम केवल दिए जलाने और थाली पीट गौरवान्वित होने को ही बने हैं? कभी शर्मिंदा होंगे इन हालातों पर?

क्या हमने कभी ये 5 सवाल पूछे हैं?

*आख़िर ऐसा क्यों है कि एक ऐसी बीमारी जिसने पिछले डेढ़ वर्षों से पूरे विश्व को जकड़ रखा है, उसके लिए 'क्राइसिस मैनेजमेंट' के नाम पर ज़ीरो बटा सन्नाटा है?

*सरकारी व्यवस्था ऐसी क्यों होती है कि पहले भयावहता दिखाई जाए और फिर 'ये देखो! हमने कर दिखाया' कहकर अहसान की तरह, सम्बंधित दवाई या इंजेक्शन उपलब्ध कराया जाए. 

* किसी समस्या के विकराल रूप धारण करने तक की प्रतीक्षा क्यों होती है? आम आदमी क्यों दर-दर भीख माँगता फिरे? क्या इतनी महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवाई की उपलब्धता सहज नहीं होना चाहिए या हम हमेशा प्यास लगने पर ही कुंआ खोदते रहेंगे?

* क्या हर चीज़ के लिए 'जुगाड़ तंत्र' ही एकमात्र उपाय है? एक ही दवाई को पाने के लिए, अमीर-ग़रीब के लिए एक सा ही सीधा रास्ता क्यों नहीं होता?

* आम इंसान की लाचारी का फायदा क्यों उठाया जाता है? क्या वो जीवन भर कालाबाज़ारी के दुष्चक्र में पिसने को ही बना है? 

SMS वाले गणितीय सूत्र को कब-कब भूल जाना है?

एक तरफ़ सामाजिक दूरी की बात होती है और वहीं इंजेक्शन और दवाई की ख़ातिर लगी लम्बी लाइनों और मारामारी पर कोई चर्चा नहीं? क्या इस महामारी के दौर में ये सारी दवाइयां हॉस्पिटल के माध्यम से नहीं मिलनी चाहिए? या आम पब्लिक जो अभी इस वायरस से संक्रमित नहीं हुई है, उसे भी इसकी आग में झोंकना जरुरी है? क्या इससे संक्रमण का खतरा और बढ़ नहीं जाता है कि स्वस्थ आदमी  किसी की दवा लेने जाए और भीड़ में कुचलने के बाद संक्रमित होकर लौटे?  

ध्यान रहे, किसी के लिए आपकी मौत एक ख़बर जितनी भी महत्वपूर्ण नहीं है. वैसे ख़बर तो ये भी है कि कोरोना मरीज़ों की मृत्यु दर के आंकड़ों से भी खेला जा रहा है तो हो सकता है आप उन आंकड़ों से भी उड़ा दिए जाएँ. बदनसीब हुए तो क्या पता कि कल को दवाई लेने जाएँ और यही घिसे-पिटे जवाब सुनने पड़ें -

* स्टॉक खत्म हो गया है.

* ऑर्डर किया है, अभी आया नहीं!

* अब इंजेक्शन पेड़ पर तो उगते नहीं है न!

* जी, शिकायत सही मिली, तो काला बाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही की  जाएगी.  

ख़ैर! जितना हो सके, अपना और अपनों का ध्यान रखें. दवाई की नौबत ही न आने दें. अस्पताल मरीज़ों से पटे पड़े हैं लेकिन प्रशासन ने रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाकर कोरोना वायरस को धमका रखा है. अभी तो जहाँ चुनाव हैं, वहाँ के रुझान आने शेष हैं. चुनावी बिगुल में दवाई, कड़ाई, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियों पर कोई ज्ञान नहीं बाँटा जा रहा. शायद कोरोना वायरस के लिए बैरिकेडिंग कर फ़िलहाल उसे सीमाओं पर रोक लिया गया है.

- प्रीति अज्ञात 

8 अप्रैल 2021 को iChowk में प्रकाशित -

सोमवार, 1 मार्च 2021

आख़िर दुनिया में सुसाइड करने वाली हर तीसरी महिला, भारतीय ही क्यों है?


आयशा की आत्महत्या ने फिर से वही सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनसे हम बार-बार बचकर निकलना चाहते हैं. लेकिन क्या इस तरह की घटनाओं और आत्महत्या का ज़िम्मेदार वो समाज नहीं? जो बचपन से ही एक लड़की के दिमाग़ में यह कूट-कूटकर भर देता है कि "वह फूलों की डोली में बैठकर जिस घर में प्रवेश करेगी, उसकी अर्थी भी वहीं से उठेगी!" क्यों उठे उसकी अर्थी वहीं से? यदि वह उस घर में ख़ुश नहीं तो क्या वो उस घर को छोड़कर नया जीवन नहीं जी सकती? कब तक वो अभिशप्त जीवन जीती रहे? 

उसे ये भी समझाया जाता है कि "मारे या पीटे पर पति तो परमेश्वर होता है. थोड़ा तो सहन कर ही लेना चाहिए". हाँ, बिलकुल कर लेगी  लेकिन तब ही, जब पति भी उसके हाथ का थप्पड़ खाकर बर्दाश्त करना सीख जाए और चुप रहे. पढ़ते ही कैसे धक् से चुभ गई न ये बात?

यही होता है कि जब तक स्त्री सहन कर रही है, सब अच्छा है. वो मर भी गई, तब भी हम उन सारे कारणों को ढूँढने में लग जाते हैं जो हमें दोषमुक्त कर दे. लेकिन कब तक? आयशा तो एक नाम भर है जो हमारे समाज की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करता है. लेकिन आँकड़े जो सच्चाई बयान कर रहे हैं, उनसे आख़िर कैसे मुँह फेरा जा सकता है?

भारत में होने वाले तलाक़ की दर दुनिया में सबसे कम है -

प्रतिवर्ष यूनाइटेड नेशंस, ग्लोबल डिवोर्स रेट दर्ज़ करता है. इसके अनुसार पूरी दुनिया में भारत में होने वाले तलाक़ की दर सबसे कम है. यहाँ 1000 शादियों में से केवल 13 में तलाक़ होता है. यह आँकड़ा डेढ़ प्रतिशत से भी कम है. जबकि स्पेन, फ़्रांस, यूनाइटेड स्टेट में सर्वाधिक मामले दर्ज किये गए हैं.

लेकिन इसका मतलब ये क़तई नहीं कि हमारे यहाँ सभी खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं. दरअसल 'हैप्पी मैरिज लाइफ' एक मिथ्या है. हम लोग तोड़ने से बेहतर, बर्दाश्त करने को मानते हैं. समझौता मंज़ूर है हमें, पर अलग होना नहीं!

जो स्त्रियाँ वैवाहिक जीवन से तंग आकर आत्महत्या करती हैं, उन्हें पता है कि इस देश में तलाक़ लेकर जीना आसान नहीं. अकेली स्त्री को उपभोग की वस्तु की तरह देखा जाता है. वो अपने पिता और पति के अलावा और किसी पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाती. गृहिणियों को आर्थिक असुरक्षा का भय भी सालता है. ऐसे में उन्हें यही सही लगता है कि जैसे-तैसे इसी चारदीवारी में जीवन काट दें. वे तलाक़ के स्थान पर, सहजता से घुटन भरे जीवन में रहने के विकल्प को चुन लेती हैं. वे पितृसत्तात्मक समाज के इस सूत्र को अपना ध्येय वाक्य बना बैठती हैं कि 'सुहागन मरना सौभाग्य की निशानी है'.

दुनिया में सुसाइड करने वाली हर तीसरी महिला भारतीय है- 

विश्व की महिला जनसंख्या में भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की आत्महत्या के मामलों में यह 36 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. यानी घुट-घुटकर मरने वाली स्त्री, एक दिन मौत को ही चुन लेती है. दरअसल भारतीय समाज की मानसिकता ऐसी है कि विवाह के बाद बेटी पराया धन मान ली जाती है. मायके में उसका स्वागत तो सदैव होता है लेकिन यदि वो किसी परेशानी के चलते पति का घर छोड़कर आना चाहे तो उसके अपने ही, उसके लिए दरवाज़ा बंद करते नहीं हिचकते. उसे समझौते के लिए समझाया जाता है कि थोडा बर्दाश्त कर, सब ठीक हो जाएगा. समाज के सामने अपनी नाक का हवाला दिया जाता है कि तू मायके आकर बैठ गई तो लोग सवाल करेंगे. लड़की इशारे समझ जाती है और फिर कभी अपनी पीड़ा नहीं बाँटती. 

हर परिवार ऐसी ही संस्कारी लड़की और बहू की अपेक्षा रखता है. "लड़का चाहे कुछ करे, उसका चल जाएगा. पर तू तो लड़की है!"

"मैं तो लड़की हूँ!" यही बात उस लड़की के दिल में भी गहरे बैठ जाती है और फिर वो अपनी महानता, त्याग और बलिदान की पुस्तक भरने के लिए खुद ही अपना सिर, कलम करवाने को तैयार रहती है. क्योंकि वो तो लड़की है! उसे तो महान बनना ही होगा! दुनिया के सामने महान बनते बनते ये लड़की अपनी ही नज़रों में रोज़ गिरती है. सबको खुश रखने वाली ये लड़की, अकेले में रोज़ रोती है. 

हमारे तथाकथित संस्कार हमें हर दर्द को सहने की शक्ति सिखाते ही आये हैं. ऐसे में स्त्रियों के पास उसी नर्क में रहने के अलावा और कोई चारा नहीं होता! और फिर एक दिन जब पानी सिर से ऊपर निकलने लगता है तो वे हारकर इस दुनिया को अलविदा कह देती हैं.

सबसे अधिक सुसाइड के मामले 15 से 29 आयु वर्ग वाली युवतियों के - 

नई पीढ़ी में आत्महत्या की बढ़ती दर बेहद चौंका देने वाली है. प्रेम, बेमेल विवाह, उनके प्रति होने वाले अपराध के चलते युवतियां भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर एवं असहाय महसूस करती हैं. कई बार नौकरी में होने वाली परेशानियों से भी वे तंग आ जाती हैं. भविष्य के लिए देखे गए सुन्दर सपनों की तस्वीर, जब उनके वर्तमान से मैच खाती नहीं दिखती तो वे हताश हो जाती हैं. पापा की परी के भीतर जैसे ही सामाजिक चेतना जागृत होती है, उसके सामने कई भयावह चुनौतियां आ खड़ी होती हैं. उसमें लड़ने की हिम्मत और जज़्बा तो होता है पर धैर्य नहीं. कई बार इनके लिए विद्रोह का तरीका मर जाना ही होता है. वे इतने गहरे अवसाद में चले जाते हैं कि फिर लौट ही नहीं पाते. दोष सामाजिक और पारिवारिक वातावरण का ही है क्योंकि हमने अपने बच्चों को जीतना सिखाया है, सफ़लता पाने की सारी क़िताबें रटा रखी हैं लेकिन असफ़लता से जूझने का पाठ कभी नहीं पढ़ाया. उनके सिर पर हाथ फेरकर कभी नहीं कहा कि हारना भी उतनी ही स्वाभाविक प्रक्रिया है जितनी कि जीतना.

बढ़ती आत्महत्या के कई कारण हैं-

* बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हासिल कर लेने के बाद भी स्त्रियों में सशक्तिकरण का अभाव है. वे अपनी हर ख़ुशी को किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति से जोड़कर देखती हैं. अपना सारा जीवन उसी के इर्दगिर्द समर्पित कर देती हैं और जब एक दिन उससे अलग होने की सोच भी सामने आती है तो वे इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पातीं. उन्हें पुरुष के बिना रहना आया ही नहीं.

* पितृसत्तात्मक समाज में घरेलू स्तर पर वे, प्रारंभ से ही निचले दर्जे पर खड़ी नज़र आती हैं. अपने जीवन से जुड़े हर निर्णय के लिए बचपन में पिता, भाई, फिर पति और अंत में बेटे पर निर्भर. एक परजीवी सा जीवन उन्हें तथाकथित संस्कारों का संरक्षण करना ही सिखाता आ रहा है. अत्याचार सहना पर उफ़ न करना, बचपन में भाई और बड़े होकर पति, बेटे को बचाना, उनकी उम्र के लिए व्रत करना. उन्हें लगता है कि पिता. पति या भाई के अलावा दुनिया उन्हें नोच खाएगी.

* पहले महिलाएं अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार को अपना भाग्य मानकर जीवन काट देती थीं. "भला है बुरा है, जैसा भी है/ मेरा पति मेरा देवता है" को ब्रह्मवाक्य बनाकर जी लेती थीं. अब वे शिक्षित हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी. जब हल नहीं निकलता तो वे कुंठा से भर जाती हैं. कुछ रास्ता नहीं सूझता तो आत्महत्या कर जीवन समाप्त कर लेती हैं.  

कैसा दुर्भाग्य है कि हमने अपनी दुनिया को इतना बदसूरत और असुरक्षित बना डाला है कि स्त्रियाँ यहाँ अकेले जीना ही नहीं चाहतीं. हमें अपनी बेटियों, अपने आसपास की स्त्रियों को सबसे पहला पाठ यही देना है कि वे हर हाल में किसी से कमतर नहीं हैं. हमें उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाना है और धोखे से संभलना भी. उनके दर्द को बांटना, उनकी परेशानियों को सुनना भी सीखना है. उन्हें यह विश्वास भी दिलाना है कि हम उनके साथ खड़े हैं. 

और लड़कियों, तुम आत्मनिर्भर, निडर और सशक्त बनो. हर बात के लिए किसी का मुँह न ताको. जब तक तुम हो, ये दुनिया सुंदर है. तुम्हारी हार, इस दुनिया की हार है.

- प्रीति अज्ञात 

https://www.ichowk.in/society/ayesha-suicide-sabarmati-riverfront-video-every-third-women-committing-suicide-in-world-is-indian-major-women-suicide-reasons/story/1/19566.html

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एक चिट्ठी, इस दुनिया की हर आयशा के नाम!

मेरी प्यारी आयशा 

अभी जबकि लगभग एक सप्ताह बाद पूरा देश मिलकर, महिलाओं को उनके दिवस की बधाई देने में जुट जाएगा, इस बीच तुमने साबरमती में कूदकर अपनी जान दे दी है. इतना ही नहीं बल्कि आत्महत्या से पहले एक वीडियो भी बनाया है जिसका एक-एक शब्द झकझोर कर रख देता है. जीवन के आखिरी पलों के दौरान भी अभिवादन की तुम्हारी तहज़ीब देखकर मैं हैरान हूँ. तुम अंत में थैंक यू कहना भी नहीं भूलतीं. लेकिन सच कहूँ तो तुम्हारी निडर आवाज़ और मुस्कान ने डरा दिया है  मुझे. न जाने वो कौन से पल रहे होंगे कि तुमने मृत्यु को सुख पाने का मार्ग समझ लिया.

मुझे बेहद दुःख और अफ़सोस है कि हम इस दुनिया को तुम्हारे जीने लायक बनाने में विफ़ल रहे.

हम एक ही शहर के हैं पर कभी मिले नहीं. मेरा तुमसे जो नाता है वो साबरमती का है, रिवर फ्रंट का है. ये जगह मुझे हमेशा से सुकून भरी लगती रही है. तुमने भी अपने वीडियो में सुकून की बात कही है. पर कितना फ़र्क है तुम्हारे और मेरे सुकून में! तुम कहती हो "मैं हवाओं की तरह हूँ, बस बहना चाहती हूँ और बहते रहना चाहती हूँ. किसी के लिए नहीं रुकना". और मैं चाहती हूँ कि काश तुम नदी के पानी से अठखेलियाँ करतीं और जीवन धार में बहती जातीं. हर संघर्ष का सामना करतीं. ये जीवन तुम्हारा अपना है, तुम्हें इसे पूरा और बेबाकी के साथ जीना था.

तुम्हारे चेहरे पर सहज मुस्कान है लेकिन आँखों में दर्द का इक सैलाब भरा है. एक ऐसा सैलाब, जिससे हर स्त्री किसी-न-किसी रूप में जरुर रिलेट कर सकेगी. तुम्हारे जो शब्द हैं, वो हमारे मस्तिष्क पर तमाचे की तरह पड़ते हैं. तमाचा, जो बार-बार यही याद दिलाता है कि तुम में और आयशा में कोई फ़र्क नहीं! 

लेकिन ये बताओ कि इतनी मानसिक पीड़ा के बावजूद भी तुमने महान बनने का वह नैसर्गिक गुण क्यों नहीं छोड़ा? जिसे हम स्त्रियों ने सदियों से किसी मंगलसूत्र की तरह दिल से लगाकर रखा है. तुम्हें एक बार को भी नहीं लगा? कि जब तक स्त्रियाँ अन्याय को सहती रहेंगी, उसके विरोध में आवाज़ उठाने की बजाय चुप्पी साध लेंगी और उफ़ तक न करेंगी, तब तक उनकी असमय मृत्यु का ये दौर अनवरत जारी रहेगा! तुम्हें बहुत हिम्मत दिखानी थी, गुड़िया. 

आयशा, तुम्हारी बातें सुन जितनी पीड़ा हुई है, उतना ही क्रोध भी आया है. यूँ भी दिल किया कि तुम्हें डांटकर कहूँ "पागल लड़की! तुम्हें निकल आना था, उस ज़हन्नुम से! डूबते हुए भी तुम एक दहेज़ लोभी इंसान को बचाना चाहती हो? उसे बरी करना चाहती हो? ये कैसी मोहब्बत है तुम्हारी कि जिसने तुम्हारा जीवन बरबाद कर दिया, तुम अपनी जान देकर उसे बचा रही हो?" तुम्हारे पापा-मम्मी ने तुम्हें कितना रोका, क़समें दीं, मिन्नतें कीं. यहाँ तक कि दहेज़ का केस वापिस लेने को भी तैयार हो गए, तब भी तुम हार गईं? तुम्हें नहीं पता कि तुम कितनी भाग्यशाली थीं कि तुम्हारे पेरेंट्स तुम्हारे साथ थे. 

पता है, तुम केवल मोहब्बत हो! और तुम्हें खोने वाले अभागे. तुम अपने पिता से आग्रह करती हो कि "कब तक लड़ेंगे अपनों से? आयशा लड़ाइयों के लिए नहीं बनी. प्यार करते हैं उससे, उसे परेशान थोड़े न करेंगे. अगर उसे आज़ादी चाहिए, ठीक है वो आज़ाद रहे".

काश! तुम्हारी ये बात दुनिया समझ ले तो हर चीज़ सुंदर हो जाए. जो तुम ठहरतीं तो दुनिया आसानी से समझ पाती.

जानती हो, तुमसे कोई गलती नहीं हुई थी और न ही तुम में या तुम्हारी तक़दीर में कोई कमी थी. बस, तुम अपने-आप को नहीं जान पाई. तुम उन अपनों को भी नहीं देख पाई जो तुमसे बेपनाह प्यार करते हैं. तुमने अपना जीवन एक ऐसे इन्सान की ख़ातिर गँवा दिया, जिसे पैसे से प्यार था. लेकिन सारे इन्सान बुरे नहीं होते! 

हाँ, तुम्हारी ये बात सच है कि "मोहब्बत करनी है तो दोतरफा करो एकतरफा में कुछ हासिल नहीं!" इसमें एक बात और जोड़ती हूँ कि मोहब्बत दोबारा भी हो सकती है. ये बात याद रखना अब. 

तुम्हारा आखिरी फोन कॉल दिल दहला देने वाला है, आयशा. तुम्हारे आँसुओं ने बेहद रुलाया है. तुम्हारे माता-पिता का सोचकर भी कलेज़ा कांप उठता है. मैं उस पिता की निरीह अवस्था और हताशा को सोचती हूँ जिसे फ़ोन पर पता चलता है कि अगले ही पल उसकी बेटी नदी में छलांग लगाने वाली है. उस माँ के दर्द को समझने की नाकाम कोशिश करती हूँ जो बार-बार तुमसे रुकने का अनुरोध कर रही है. मासूम लड़की, तुम्हें परिस्थितियों का डटकर सामना करना था. अपने आप को किसी से कम नहीं आंकना था. तुम अपार संभावनाओं से भरा चेहरा थीं.

तुम्हारी विदाई का गुनहगार ये समाज भी है जो तुम्हारे लिए ऐसा वातावरण ही नहीं बना पाया कि तुम स्वयं को अकेला न महसूस कर सको. या फिर इसे तुम्हें अकेले चलना सिखा देना चाहिए था. तुम्हें बता देना चाहिए था कि तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारे जीवन की तरह कितनी अनमोल है. 

मैं तुम जैसी तमाम लड़कियों से कहना चाहती हूँ कि आख़िर हम क्यों अपने सपनों और खुशियों को किसी और के जीवन से जोड़ें? हम क्यों न अपने हक़ की लड़ाई खुद लड़ें? किसी से इतनी अपेक्षा क्यों रखें कि उनके पूरा न होने पर हम ही टूट जाएँ. आत्महत्या, तो अवसाद की पराकाष्ठा है. हम इस राह से बाहर निकल, आत्मसम्मान के साथ जीना क्यों न चुनें? सब अच्छे लोग यूँ दुनिया को छोड़ देना चुन लेंगे, तो इसे संवारेगा कौन?

तुम जहाँ भी हो, हर ख़ुशी तुम्हारे साथ हो.

स्नेह तुम्हें 

प्रीति अज्ञात 

https://www.ichowk.in/society/ayesha-suicide-due-to-dowry-in-jalore-sabarmati-riverfront-in-ahmedabad-recorded-video-is-heart-breaking-open-letter-to-ayesha/story/1/19565.html

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