मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

तुम्हें दुपट्टा तो मैचिंग का चाहिए लेकिन पति..?


भैया, जरा इसकी मैचिंग का दुपट्टा निकाल देना। 

सुन, छोटू! ऊपर से जरा लाल वाला दुपट्टा निकाल दियो। कॉटन का। 

नहीं, भैया! जॉर्जेट, शिफॉन या सिल्क में हो तो अच्छा।    

जी, बहनजी। लीजिए, ये रहा आपका दुपट्टा। 

अरे! ये तो रानी कलर का है। ये कुर्ते का रंग तो देखो! कहाँ मैच कर रहा? 

अच्छा! और मँगवाता हूँ। छोटू, वो नीचे वाला गट्ठर ले आ। 

अरे, ये तो पिंक है। 

नहीं, दीदी। बेबी पिंक है। 

बहनजी, मरून भी चल जाएगा। रखकर देखिए। 

नहीं, भैया। इससे तो मैं गाजरी ले लूँ। नारंगी भी चल जाए शायद। कुर्ते में एक-दो फूल हैं उस कलर के। 

अच्छा भैया, सुनो क्रिमसन रेड या ब्रिक रेड में मिलेगा?

नहीं, दीदी। उस हिसाब से तो इस पर ब्लड रेड या टमाटरी ही जाएगा। 

ये लो जी, टमाटरी। पैक करा दूँ?

मज़ा नही आ रहा और दिखाओ। अच्छा, रुको। यही कलर नेट में मिलेगा क्या?

नहीं, आप डाई करवा लीजिए। मंडे तक दे दूँगा। 

नहीं, रहने दीजिए। हम कहीं और देख लेंगे। आपके यहाँ तो चॉइस ही नहीं है। 

शायद आपको भी कोई खरीद याद आ गई होगी! यह भी हो सकता है कि पापा या भाई से मंगाई कोई वस्तु का किस्सा दिमाग में घूम गया हो, जिस पर रंग के मारे चिक-चिक हुई थी। जहाँ पापा कह रहे कि 'हरा ही तो मंगाया था!' और भैया चिढ़ रहा, 'मैंने तो सी ग्रीन समझाया था पापा को। इन्होंने मेरी बात ही नहीं सुनी।' 

तब आप तुनककर बोलीं, 'नहीं इसे ऑलिव ग्रीन कहते हैं।' 

कहने को तो सात ही रंग हैं पर परेशानी यह कि उसमें सात सौ शेड्स निकल आए हैं। उससे भी बड़े दुख की बात यह कि हम स्त्रियों को न केवल इन रंगों की जानकारी है बल्कि मैचिंग मिलाते समय हम उसे पाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं। 

कुछ रंगों (सी ग्रीन, टरकॉइज़, पीच, ऑफ व्हाइट इत्यादि) के बारे में हमारी राय है कि उनका रंग रात को सही नहीं पता लगता। तो उसे दिन में ही लेने जाते हैं। उस पर भी दुकान से बाहर निकल सूरज की रोशनी में दो बार अतिरिक्त जांच करते हैं कि परफेक्ट मैच है या नहीं!

बात दुपट्टे की ही नहीं बल्कि ब्लाउज, पेटीकोट, चूड़ियाँ, जूती, लिपस्टिक, बिंदी, ईयर रिंग सबके मैचिंग की अपनी कहानी है। मैचिंग मिलाते समय जैसे एक जुनून सा छा जाता है कि अजी! ऐसे कैसे नहीं मिलेगा! ढूँढकर ही दम लेंगे! जबकि इस सच्चाई को हम सभी बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि एकाध शेड ऊपर-नीचे होने से कोई अंतर नहीं पड़ता! लेकिन हमें तो पड़ता है न! बस यही इक बात हमें पागल कर देती है और हम दीवानों की तरह उसकी तलाश में निकल पड़ते हैं। कितनी बार जरा सी चीज के लिए दस किलोमीटर तक चले जाते हैं। गली-गली भटक सौ दुकानों पर पूछते हैं या घर में किसी को दौड़ा दिया जाता है। 

सब्जी, फल, बेडशीट, सजावटी सामान, पौधे, फर्नीचर और तमाम घरेलू सामान हर वस्तु की खरीद के लिए हम अपनी पसंद-नापसंद को स्पष्ट रूप से बताते रहे हैं, अपनी ज़िद पर अड़ खूब बहस भी की है। जमकर चिकचिक की है कि 'ये वाला फोन चाहिए तो चाहिए ही', भले उसके लिए रात 12 बजे लॉगिन कर बुकिंग करनी पड़े।

तो लड़कियों, मैं तुम्हें हमारी प्रजाति के बारे में यह सब इसलिए याद दिला रही हूँ क्योंकि हमारी न कुछ आदतें बड़ी ही अजीब होती हैं। यूँ तो ये सामान्य ही लगती रहीं हैं।  पर गहराई से समझो तो लगता है कि हम कितनी अनावश्यक वस्तुओं पर अपना समय जाया करते हैं। वहाँ हम अपनी पसंद को लेकर बहुत स्पष्ट भी रहते हैं। कहीं कोई संशय नहीं! लेकिन जहाँ पूरा जीवन बिताने की बात आती है, जीवनसाथी चुनने की बात आती है, झट से एक दिन में निर्णय ले लिया करते हैं। बहुधा सामाजिक दबाव के चलते, मन-मस्तिष्क पर जैसे चुप्पी सी छा जाती है। 

आज भी कई लड़कियाँ ऐसी हैं जो घरवालों के बताए रिश्ते को चुपचाप सिर हिलाकर हामी भर देती हैं। पलटकर प्रश्न तक नहीं करतीं कि लड़के का स्वभाव कैसा है? उसकी रुचियाँ क्या हैं? यह सच है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए बेहतर ही सोचते हैं। लेकिन केवल अच्छे घर और अच्छी कमाई से ही जीवन नहीं चला करता! लड़का/लड़की की मानसिकता, सोच, स्वभाव, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार के बारे में भी जानना उतना ही आवश्यक है। अन्यथा विवाह, मात्र समझौता भर बनकर रह जाता है। परिवार की पसंद के लड़के से अवश्य विवाह करें पर उसे जान तो लीजिए। 

समय बदल रहा है। इस बदले हुए समाज और ढेर होती मान्यताओं के दौर में अब मन मसोसकर किये गए समझौते चरमराने लगे हैं और बात संबंध-विच्छेद तक पहुँच जाती है। तनाव और अवसाद घेर लेता है, सो अलग। कई बार स्थिति घातक भी हो जाती है। जब हम बिना विचार किये कुछ तय नहीं करते, तो अपना जीवन कैसे दाँव पर लगा देते हैं!

कभी सोचा है कि हमें दुपट्टा तो मैचिंग का चाहिए लेकिन पति..?

- प्रीति अज्ञात

राजधानी से प्रकाशित पत्रिका 'प्रखर गूँज साहित्यनामा' के दिसम्बर 2022 अंक में मेरे स्तम्भ 'प्रीत के बोल' में प्रकाशित

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1 टिप्पणी:

  1. सही बात की है आपने। कम से कम कोशिश तो करनी चाहिए। लेकिन वस्तुओं और इंसानों में बस एक फर्क होता है। सी ग्रीन चीज अक्सर सी ग्रीन ही होगी लेकिन इंसान कई बार जांच परख के बाद भी वो नहीं निकलता जैसा सोचा होता है। प्रेम विवाहों में अक्सर ये बात सामने आती ही है। फिर भी ऐसे में ये तसल्ली रहती है कि कम से कम कोशिश तो की थी।

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