मैं अब भी उस छोटे से शहर की बड़ी राह जोहती हूँ. शहर जो हरियाते दरख़्तों से घिरी संकरी गलियों के इर्दगिर्द बसा था, इन दिनों कुछ चौड़ा नजर आता है. आदमियों से ज्यादा दुकानें हैं, लोग हैं, पर सब जल्दी में.
अब कोई किसी से हंसकर बात नहीं करता. नाम जानती थी जिस दुकान वाले का; मैंने चहककर उसे आवाज़ दी "राजकुमार भैया, कैसे हो?"
वो हड़बड़ाकर हैरानी में इधर-उधर देखने लगा जैसे कि यह प्रश्न बेहद अप्रत्याशित था उसके लिए. मैंने भी अचकचाकर मुँह फेर लिया.
स्कूल से जुडी कितनी ही यादें थीं. सारे टीचर्स, प्रिंसिपल, वो छुट्टी का घंटा बजाने वाली अम्माँ और बाहर पॉपिन्स, पिपरमेंट की गोली वाली दुकान. अरे हाँ, एक ठेला भी तो था चाट का. पच्चीस पैसे में आलू की दो गरमागरम टिक्कियाँ, वो भी चटपटी चटनी और चने के साथ. कैसे प्यार से फटाफट बनाता था.
स्कूल के प्रांगण में लगा वो नीम का पेड़, जिसके चबूतरे पर बैठ अजीब-सा सुकून मिलता था. यह सब सोचते हुए चलती जा रही थी कि जैसे धक्-से बैठ गया ह्रदय...स्कूल का वो बड़ा सा गेट और स्कूल का नामोनिशां तक न था. उसकी जगह एक बहुमंजिला काम्प्लेक्स ने ले ली थी. छूकर देखने को स्मृतियों के अवशेष तक न थे. गली ठसाठस भरी थी वाहनों से. उन्हीं के बीच बचती-बचाती निकलती कि अचानक ही एक दुपहिया वाहन से टक्कर हुई. वो चिल्लाया
"दिखता नहीं है क्या?"
कहना चाहा मैंने भी चीखकर "हाँ, कुछ भी नहीं दिखता है अब
न स्कूल है, न इमारत है, न वो ठेले और न ही हँसता दुकानदार,बताओ कहाँ गए सब!"
पर मैं पनियाई आँखें लिए मौन, खिसियाकर रह गई
यूँ भी वो रुका ही नहीं था.
भागते वक़्त में चीखने का समय सबके पास है, ठहरकर कौन सुनना चाहता है भला!
शहर भूल चूका है मुझे, इक मैं ही इसे क्यों न भूल सकी!
#शहर से लौटते हुए
-प्रीति 'अज्ञात'
अब कोई किसी से हंसकर बात नहीं करता. नाम जानती थी जिस दुकान वाले का; मैंने चहककर उसे आवाज़ दी "राजकुमार भैया, कैसे हो?"
वो हड़बड़ाकर हैरानी में इधर-उधर देखने लगा जैसे कि यह प्रश्न बेहद अप्रत्याशित था उसके लिए. मैंने भी अचकचाकर मुँह फेर लिया.
स्कूल से जुडी कितनी ही यादें थीं. सारे टीचर्स, प्रिंसिपल, वो छुट्टी का घंटा बजाने वाली अम्माँ और बाहर पॉपिन्स, पिपरमेंट की गोली वाली दुकान. अरे हाँ, एक ठेला भी तो था चाट का. पच्चीस पैसे में आलू की दो गरमागरम टिक्कियाँ, वो भी चटपटी चटनी और चने के साथ. कैसे प्यार से फटाफट बनाता था.
स्कूल के प्रांगण में लगा वो नीम का पेड़, जिसके चबूतरे पर बैठ अजीब-सा सुकून मिलता था. यह सब सोचते हुए चलती जा रही थी कि जैसे धक्-से बैठ गया ह्रदय...स्कूल का वो बड़ा सा गेट और स्कूल का नामोनिशां तक न था. उसकी जगह एक बहुमंजिला काम्प्लेक्स ने ले ली थी. छूकर देखने को स्मृतियों के अवशेष तक न थे. गली ठसाठस भरी थी वाहनों से. उन्हीं के बीच बचती-बचाती निकलती कि अचानक ही एक दुपहिया वाहन से टक्कर हुई. वो चिल्लाया
"दिखता नहीं है क्या?"
कहना चाहा मैंने भी चीखकर "हाँ, कुछ भी नहीं दिखता है अब
न स्कूल है, न इमारत है, न वो ठेले और न ही हँसता दुकानदार,बताओ कहाँ गए सब!"
पर मैं पनियाई आँखें लिए मौन, खिसियाकर रह गई
यूँ भी वो रुका ही नहीं था.
भागते वक़्त में चीखने का समय सबके पास है, ठहरकर कौन सुनना चाहता है भला!
शहर भूल चूका है मुझे, इक मैं ही इसे क्यों न भूल सकी!
#शहर से लौटते हुए
-प्रीति 'अज्ञात'





हरेक भगवान की इश्टोरी पता तो चले। स्कूल के दिनों में ही क़िताबें पढ़-पढ़कर palmistry भी सीख ली थी, जो कि समय की लक़ीरों के गहराते-गहराते धुंधली पड़ती गई। अब सिर्फ़ जीवन रेखा, ह्रदय रेखा और मस्तिष्क रेखा की पहचान भर शेष है। 'व्रत' से मुझे कोई परेशानी तब तक नहीं, जब तक दूसरे उसे कर रहे हों। अब भगवान ने उनको यह शक्ति दी है तो हम का करें? हमसे तो नहीं रहा जाता जी! वैसे पूरा दिन घर या बगीचे का काम करते हुए कब दो कप चाय के साथ ही पूरा दिन गुज़र जाए,पता नहीं चलता पर जो 'व्रत' की बात आई तो बस, केस बिगड़ा ही समझो!
पाचन तंत्र के सारे अंग जन्मों के भुक्खड़ टाइप बनकर 'सामग्री भेजो बेन' की गुहार करने लगते हैं और हमसे उनकी ये बेचैनी देखी ही नहीं जाती सो तुरंत फ़ूड सप्लाई प्रारम्भ कर देते हैं।
सोनू निगम का एक्टर बनना लगा था। कुछ लोग दिल में जिस तरह बैठे हुए हैं, उम्र-भर वैसे ही सुहाते हैं। और हाँ, इन दोनों ही गायकों का जवाब नहीं! देने की कोशिश भी न कीजियेगा! 