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सोमवार, 13 अगस्त 2018

मुल्क


जब स्कूल में पढ़ते थे तो कभी-कभार बच्चों को फ़िल्म भी दिखाई जाती थी. 'मुल्क' ऐसी ही फ़िल्म है जो अगर स्कूल न दिखाए तो आप अपने बच्चों के साथ जाएँ क्योंकि उन तक इसकी सोच और गहराई का पहुँचना बेहद जरुरी है.
फ़िल्म में ऋषि कपूर जी के लाज़वाब अभिनय ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि 102 नॉट आउट के बाद वे अपनी दूसरी पारी भी फुल फॉर्म में खेलने वाले हैं. तापसी पन्नू, प्रतीक बब्बर, आशुतोष राणा, रजत कपूर, नीना गुप्ता ने भी बेहतरीन अदाकारी की है. बिलाल के रोल को मनोज पाहवा जी ने इतनी शिद्दत से निभाया है कि थिएटर से बाहर आने के बाद भी उनके शब्द दिमाग़ में गूँजते रहते हैं, "मेरा नाम बिलाल है....." पुलिसिया जाँच के समय एक निर्दोष इंसान  के रूप में उनका अभिनय रोंगटे खड़े कर देने वाला है.

फ़िल्म के संवाद कट्टरपंथियों के गाल पर तमाचे की तरह पड़ते हैं -
"मेरे घर में मेरा स्वागत करने का हक़ उन्हें किसने दिया? ये मेरा भी उतना ही घर है जितना कि आपका!"
"ये वो घर है, जिसमें वो परिवार रहता है जिसने 1947 में मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना था."

इसमें कोई शक़ नहीं कि अनुभव सिन्हा की यह फ़िल्म उन्हें कई ऊँचाइयों पर ले जायेगी. राजनीति जहाँ तोड़ने में यक़ीन रखती है वहीं कला जोड़ने का काम करती है. कला का क्षेत्र और असल कलाकारों का ह्रदय ऐसा ही होता है जो सारे भेदभाव से दूर रह साथ रहने को अहमियत देता है, उसका समर्थन करता है. 'मुल्क' इसी भावना का बुलंद स्वरों में आह्वान करती है. वे लोग जो हर बात में केवल ख़ुद को ज़िंदाबाद और ये कहते नहीं अघाते कि "गर्व से कहो... फलाना ढिमका हूँ." उन्हें तो यह मूवी दो-तीन बार देखना चाहिए क्योंकि एक बार में तो अक़ल आने से रही! 😃
- प्रीति 'अज्ञात'
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