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गुरुवार, 29 जुलाई 2021

बॉलीवुड की मसाला फ़िल्मों की मसालदानी के चुनिंदा मसाले

बीते दो दशकों में हिंदी फ़िल्मों में बहुत कुछ बदल गया है. आपको तो पता ही है कि पुरानी फ़िल्मों के विषय गिने-चुने ही हुआ करते थे. ये फ़िल्में घर-परिवार, रिश्ते या बदले की भावना को लेकर बनतीं. कुछेक में माँ की ममता, बड़े भैया का त्याग या पिता की मजबूरी की भावनात्मक कहानी भरपूर छलकती. कुछ में दो घरानों के बीच में दुश्मनी और उनके नौनिहालों की तड़पती मोहब्बत के तराने गूँजते. तो कहीं क्रूर जमींदार के कब्ज़े में, गरीब नायक/नायिका का घर या गहने होते. 

चुनिंदा फ़िल्में किसी उपन्यास पर भी आधारित होतीं या सामाजिक दृष्टिकोण को लेकर बनाई जातीं. जिनमें छुआछूत, दहेज और स्त्री-विमर्श प्रधान विषय होते. इन बाद वालियों को प्रायः कलात्मक श्रेणी में डाल दिया जाता. मतलब तब इनके नाम सुनते ही हम जैसे बच्चे नाक-मुँह सिकोड़ लिया करते. हाँ, मसाला फ़िल्में बड़े चाव से देखी जाती थीं. जबकि भारतीय सब्जियों की तरह उनका मसाला पहले से ही तय रहता था और दर्शकों के लिए कुछ भी रहस्यमयी नहीं होता था. पर स्वाद तो स्वाद है, एक बार ज़बान पर चढ़ जाए बस!

1. इन फ़िल्मों की विशेषता यह थी कि हर दृश्य के साथ-साथ अगले दृश्य का अनुमान स्वतः होता जाता. लेकिन खलनायक का नायक के हाथों पिटना हम जैसे गाँधीवादी को भी एक अलग ही क़िस्म का सुख दिया करता. हर ढिशुम- ढिशुम के साथ मन से यही ध्वनि आती कि "और मार, और मार! ये इसी लायक़ है!". उधर अमिताच्चन जब प्राण या अमज़द खान को कूट रहे होते, इधर अपन सीट पर उछल-उछल तालियाँ पीट उन्हें प्रोत्साहित करते. लड़के लोग तो सीटी मार, सिक्के भी उछाल लिया करते थे. 

2. इनमें खलनायक का कुछ हसीनाओं के साथ घिरे रहकर, तेल मालिश कराने का दृश्य भी अवश्य रहता था. वो वनमानुष सा पड़ा रहता और इन्हीं सुंदरियों में से एक अंगूर का गुच्छा लिए उसे लपर-लपर खिला रही होती. उसी समय एक दूत (खबरी) का आगमन होता और उससे सूचना प्राप्त करते ही खलनायक के चेहरे पर कुटिल हँसी छा जाती. 

3. इन फ़िल्मों में जमकर तस्करी (स्मगलिंग) दिखाई जाती थी. इसमें काले कोट और काले गॉगल पहने एक मनुष्य चेहरे पर अति गंभीर भाव लिए ब्रीफकेस लेकर तीव्र गति से चलता. बस, दर्शक देखते ही तुरंत समझ जाते कि तस्कर (स्मगलर) है. यह वेशभूषा मन में इस हद तक घर कर चुकी है कि आज भी कोई इस तरह तैयार हो दिख जाए तो यही लगता है कि डॉन का कोई गुर्गा है. जिसे काली पहाड़ी के पीछे एक संकेत-शब्द (कोडवर्ड) बोलकर इस संदूकची का हस्तांतरण करना है. 

4. अच्छा, खलनायक भले ही कितना निर्दयी हो, पर उसके मन का एक कोना नृत्य और संगीत के प्रति समर्पित रहता. यही कारण था कि दुश्मन के अड्डे पर नायिका का नृत्य हर फ़िल्म का आवश्यक अंग बन जाता. आजकल तो नायिका स्वयं ही उचित अवसर देख 'आइटम नंबर' शुरू कर देती हैं. लेकिन उस समय ये विवशता में होता था. इधर नायिका अपनी कला प्रस्तुत करते हुए उनके हथियार, हथिया लेती और उधर गीत समाप्त होते ही नायक आ धमकता. उसके बाद दुष्चरित्रों की पिटाई का वर्णन पहले बिंदु में कर ही दिया गया है. 

पर हाँ, एक बड़ी कॉमन परेशानी थी. जैसे ही नायक सबको पीटकर सुस्ता रहा होता तभी अचानक से उसकी माँ दुश्मन के कब्ज़े में आ जाती! इतना क्रोध आता था न तब कि इतनी मुसीबत के समय माँ, घर से अपहरण करवाने निकली ही क्यों!
वो तो भला हो पुलिस का कि इतना कुछ निबट जाने के बाद अंततः आ ही जाती. उसे देखते ही दर्शक खलनायक से स्वयं ही बोलने लगते, "अपने हाथ ऊपर कर दो. अब तुमको कोई नहीं बचा सकता! पुलिस ने इस इलाके को चारों तरफ से घेर लिया है!".  

5. उन दिनों मेले में बिछड़ना भी आम था. तब मोबाइल तो थे नहीं. अतः ट्रैक करने के लिए सबके गले में एक सा लॉकेट डाल दिया जाता या फिर एक कॉमन पारिवारिक गीत होता जिसकी धुन हर सदस्य को पता होती. कभी- कभी एक फोटो होता जिसे दो टुकड़ों में बाँट दिया जाता. फ़िल्म जब समाप्ति के चरण में होती तब ये लोग वही गीत गाकर एक दूसरे को पहचानते. कभी लॉकेट खोल अचंभित हो भरे गले से 'भैया' कह बाँहें फैला मिलते तो कभी उन दो टुकड़ों को जोड़ पूरी तस्वीर बना लेते. दर्शक पूरी फ़िल्म में घबराते हुए बार-बार उन्हें याद दिलाते कि अरे यही तेरा भाई है. खैर! इन्हीं पलों की प्रतीक्षा में सब साँसें थामे रहते और अब कहीं जाकर इनकी प्रतीक्षा को विराम मिलता. प्रायः आँखें भी भर आया करतीं. 

6. प्रेम तो शाश्वत है. उसके बिना फ़िल्में कभी बनी ही नहीं. हाँ, समय के साथ प्रेम प्रदर्शन की  पद्धति जरूर परिवर्तित हो चली है. पहले पुस्तकों के गिरने-उठाने के मध्य आँखों-आँखों में कहानी का आरंभ होता था. दो फूलों के मिलन या बरसात होते ही ज्ञात हो जाता था कि अब अगला संवाद 'मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ', ही होगा. आजकल तो कहानी की माँग के बहाने जो हो जाए, कम है. 

7. उन फ़िल्मों में प्रेम त्रिकोण के समय एक ऐसा गाना भी होता था जिसमें नायक या तो नशे में या फिर आँखों पर मास्क सा लगाकर प्रेमगीत गाता. प्रेमिका अपने पिता या सौतेली माँ के घूरने के बावजूद भी हाथ छुड़ा, नायक के पास दौड़ी चली आती. दिल को चैन मिलता. आजकल 'तू प्यार है किसी और का', 'मेरा दिल भी कितना पागल है'  गीतों का दौर समाप्तप्राय है. 

8. ऐसे तो उस दौर से जुड़ी बहुत सी बातें हैं. पर चलते-चलते एक और याद करा देती हूँ. जब डॉक्टर ये कहता कि "इनको दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है'. तो उफ़! नायक मंदिर-मस्जिद की चौखट पर पहुँच ऐसे-ऐसे संवाद बोलता कि कलेजा मुँह को आता. तभी अचानक जोर-जोर से मंगल ध्वनियाँ वातावरण में गूँजने लगतीं और हम ये जान लेते कि 'हैप्पी एन्डिंग' होने वाली है. लेकिन जब हीरो अपनी माँ की गोदी में सिर रख लेता और बचपन याद करता तो जी भर आता. पूरे सिनेमा हॉल से सुबकने की आवाज आती क्योंकि इतिहास गवाह है कि इस पोज़ वाला नायक जीवित न रहा कभी! रुमाल निचोड़कर सुखाते कि फिर भीग जाता. बाहर निकलते समय सब बस एक ही बात कहते कि "यार, पिच्चर तो अच्छी थी पर हीरो को ज़िंदा रहना चैये था". 
- प्रीति अज्ञात 
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फोटो: गूगल