शनिवार, 19 जुलाई 2014

'मैगी' साहित्य

हम वही खाते हैं, जो परोसा जाता है. हिन्दी सिनेमा में द्विअर्थी संवाद या गानों के लिए आजकल यही तर्क़ दिया जाता रहा है. दर्शक फिल्मकारों पर सामाजिक पतन का दोष मढ़ते हैं और फिल्मकार इसे अपनी मजबूरी और 'यही चलता है', कहकर टाल देने का प्रयत्न करते हैं. ठीक यही स्थिति हिन्दी साहित्य की भी होती जा रही है. कुछ भी, कैसी भी, ऊल-जलूल भाषा में लिख देना और फिर उसका छप जाना बेहद प्रचलित हो गया है. ऐसे में भाषा के स्तर से ज़्यादा ध्यान मार्केटिंग पर दिया जाता है. जितना अच्छा प्रचार, उसी के अनुपात में बिकना तय होता है. साहित्यकार अब व्यापारी होता जा रहा है. अब पहले वह ये पता लगाता है कि मार्केट में चल क्या रहा है ? फिर उसी के हिसाब से सब तय होता है. प्रकाशक और उसके बीच गठबंधन-सा होने लगा है. भाषा, मुखपृष्ठ श्लील हो या अश्लील, इससे किसी को इतना फ़र्क़ नहीं पड़ता, बिकना प्राथमिकता है. बल्कि कुछ लोग तो इसे अपनी आधुनिक सोच का तमगा पहनाने में भी नहीं हिचकते. एक सच ये भी है कि अच्छे साहित्य के लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों की आज भी कमी नही, कमी उन्हें पूछने वालों की है और कई तो इसी कुंठा में आलोचक बन बैठे हैं. साहित्यकार बनना अब २ मिनिट मैगी जैसा है, १ किताब बाज़ार में आई नहीं, कि सारे पुरस्कारों के साथ लेखक / लेखिका / कवि ( तथाकथित पढ़ें ), सब इठलाए घूमते हैं.

प्रेमचंद जी की 'ईदगाह' में जब हामिद, अमीना को चिमटा देते हुए अपराधी-भाव से कहता है..- "तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।"... तब कैसे हम सबका मन हामिद को सब कुछ ख़रीदकर देने का हो जाता था. बचपन में पढ़ी उस कहानी के नन्हे हामिद की यह भावना आज तक दूसरों के लिए पहले सोचने को विवश कर देती है. निराला जी की 'वह तोड़ती पत्थर' ने हमें मेहनत और लगन से काम करने की प्रेरणा स्कूल के दिनों से ही दी है. सुभद्रा कुमारी चौहान जी की 'खूब लड़ी मर्दानी' आज भी नस-नस में देशभक्ति और वीर रस का संचार कर देती है. कहने का तात्पर्य यही है कि साहित्य का हमारे चरित्र और सोच पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है. हमारी इच्छा शक्ति, दृढ़ता, देश के लिए मर-मिटने की भावना और आत्म निर्माण में साहित्य गहरी भूमिका निभाता है. अच्छे विचार, अच्छा लेखन ऊर्जा-संचारक और प्रेरणा-स्त्रोत के रूप में कार्य करते है. कहा ही गया है.."पुस्तक सच्ची मित्र होती है".....ऐसे में यह और भी आवश्यक हो जाता है, कि लिखी जाने वाली भाषा पठनीय व स्तरीय हो. क्योंकि अश्लील साहित्य से उत्थान संभव नहीं, हाँ ये पतन का कारण अवश्य बन सकता है.

- प्रीति 'अज्ञात'
* इस विषय पर हुई परिचर्चा के लिए इस लिंक पर जाएँ -
http://www.sahityaragini.com/rachna.php?id=444

20 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, पानी वाला एटीएम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. theek kahaa .. jo hit hai wahi fit hai .. waise bhi ye maggie/fastfood sahitya hi logon ko janchta hai .. jo purana hai wo toh "complicated" hai

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. :) सबको आसान रास्ता ही भाता है ! शुक्रिया.भावना जी :)

      हटाएं
  3. बिल्कुल सही लिखा है आपने कि हम लोग जिस तरह के साहित्य से रू-ब-रू प्रोडक्ट भी तो वैसा ही तैयार होगा। पहले के जमाने में चंदामामा, नंदन, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं से हम ने बहुत कुछ सीखा है।
    अच्छा लगा आप का यह लेख पढ़ कर...यथार्थ ब्यां कर दिया आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस लिंक पर आप ईदगाह कहानी देख सकते हैं, दूरदर्शन प्रस्तुति। इस लिंक को आप को कापी करना होगा।

      हटाएं
    2. दूरदर्शन के यूट्यूब चैनल पर तहरीर मुंशी प्रेम चंद की सीरीज़ के अंतर्गत यह ईदगाह कहानी कुछ दिन पहले देखने को मिली थी, आज आप की पोस्ट देखने के बाद एक बार फिर से अपने पाठ को पक्का कर लिया। धन्यवाद

      हटाएं
    3. लिंक तो नहीं दिखाई दी, पर मैं सर्च कर लूँगी ! आपका भी आभार !

      हटाएं
  5. सच कहा है ... ज़माना ही ऐसा है ... सब कुछ बस टू मिनट ...

    उत्तर देंहटाएं