मंगलवार, 4 नवंबर 2014

रिक्शावाला


'रिक्शा' या तीन पहियों पर चलने वाली साईकिल, नाम सुनते ही आज भी एक अजीब-सी शर्मिंदगी होने लगती है. अपराध-बोध का अनुभव होता है. दु:ख होता है न, ये देखकर कि आदमी ही, आदमी को खींचकर ले जा रहा है. पर जब स्कूल जाया करती थी, उन दिनों आने-जाने का यही एकमात्र साधन था. मुझे हमेशा से ही इस पर बैठना बुरा लगता रहा है, चलाने वाला पसीने में तर-बतर और हम बेशरम-से उस पर लदे हुए ! पैदल जाने के हिसाब से उम्र कम थी और दूरी ज़्यादा, सो और कोई विकल्प ही नहीं था. ४ बच्चे आगे और ३ पीछे लटके हुए, और उस पर उनके बेग भी...१०-१२ बच्चों का वजन वो काका कैसे खींचा करते होंगे , पता नहीं ! पर मैं, एक भी अतिरिक्त 'नोटबुक' नहीं ले जाती थी, कि कुछ तो वजन कम हो ! मन हमेशा ग्लानि से भरा रहता था. जैसे ही सातवीं कक्षा में आई, फिर इससे स्कूल जाना तो छोड़ दिया था. लेकिन 'रिक्शा' फिर भी नहीं छूटा, बस स्टैंड या मार्केट जाते समय फिर उस पर लद जाते, जब साथ की सहेली उन्हें जल्दी चलाने को बोलती, तो मैं सर झुकाए उसका हाथ खींचकर टोक देती, "क्या यार, देख तो..कितनी मेहनत लगती है इसमें !"

एक बार, सामान कुछ ज़्यादा ही था...तो मैंनें 'रिक्शे वाले' को थेन्क यू और सॉरी भैया, दोनों बोला. उन्होंनें चौंककर मुझे कहा, "थेन्क यू तो समझा, पर सॉरी किसलिए ?" मैंनें खिसियाते हुए जवाब दिया, "वो आप को हमारी वजह से इतनी मेहनत करनी पड़ी न, इसलिए ! मुझे रिक्शे में बैठने में अफ़सोस होता है, पर मजबूरी में बैठना पड़ता है" मेरी बात सुनकर वो हँसे भी और उनकी आँखें भी भीग गईं. फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, अगर ऐसा ही सब सोचने लगे, तो हम कमाएँगे कैसे गुड़िया ? मैं चुप हो, सोच में पड़ गई ! उसके बाद जब भी दूर जाना होता, निगाहें उन्हें ही ढूँढा करतीं. वो भी देखते ही तेज़ी से आ जाते थे. मम्मी ने भी एक दिन पूछा, कि "तुझे जानते हैं ?" और मैंनें गर्व से 'हाँ' बोल दिया ! :)

समय का पहिया चलता रहा.....जगह बदलती रहीं ! ७-८ वर्ष पूर्व की बात है, मैं मायके गई हुई थी. मम्मी और अपनी बेटी के साथ मार्केट जाने को निकली ही थी, कि एक रिक्शा अचानक आकर रुका और वही आवाज़.."बैठो, गुड़िया". मैं तो जैसे खुशी से पगला ही गई. अरे, आप ! आपने मुझे पहचान भी लिया ? मम्मी तुरंत बोलीं, तुम्हारी शादी के बाद से ये मुझे भी लेके जाते हैं और तुम्हारे हाल-चाल भी पूछा करते हैं ! उन्होंनें बड़े स्नेह के साथ, मेरी बेटी को गोदी में लेकर उसे रिक्शे में बैठाया और बोले "ये है, हमारी गुड़िया की गुड़िया, बिल्कुल हमारी गुड़िया जैसी !" उसे आशीर्वाद दिया . ज़िद करने पर भी उन्होनें एक रुपया तक नहीं लिया, बोले "बेटियों से भी कोई लेता है क्या?"
घर पहुँचकर, बेटी ने पूछा, " मम्मी आप उन अंकल जी को जानती थी क्या ?" मैंनें उसी गर्व के साथ जवाब दिया, और नहीं तो क्या ! पर इस बार मेरी पलकें भीगीं थीं. :)
- प्रीति 'अज्ञात'

* आज नेट पर 'रिक्शे' की इतनी सुंदर तस्वीर देखकर ये पुरानी बात याद आ गई और साझा करने का मन हुआ !

3 टिप्‍पणियां:

  1. हर बार अचंभित कर देते हो
    जिंदगी से जुडी ऐसी घटनाओं पर रौशनी डालना आपका अच्छालगा !!

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  2. जिस खूबसूरती से बयाँ की गयी है ये घटना अंदर घर कर गयी.

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  3. Behad bhaawpurn yahi jiven hai.. Kuch log mehnat karke paisa kamaate hain..kuch kadi mehnat ke baad bhi kam kamaatein hai.. Aapki kahani se yakeen aa gya duniya gol hai kal ki gudia bhi ek gudia ki maa ban gyi aur usi rikshey waale se mil aayi... Bahut sunder samran ....!!

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