प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ऐसे पल कई-कई बार आते हैं जब परिस्थितियों से जूझते समय वह हताश हो उठता है और उसे लगने लगता है कि किसी से कुछ कहने-सुनने का मतलब दीवारों से सिर फोड़ना है। रिश्तों के साथ भी ऐसा होता आया है कि सब कुछ समर्पित कर देने के बाद भी उसे निराशा ही हाथ लगती है और वह यह मान बैठता है कि उसकी उपस्थिति का कोई मूल्य नहीं! समाज में हो रहे अन्याय के विरुद्ध उसकी आवाज़ कभी नहीं काँपती लेकिन जब वह पलटकर देखता है तो अपनों की भीड़ में स्वयं को नितांत अकेला और असहाय महसूस करता है। कभी उसके स्वर मंद पड़ जाते हैं तो कभी वह भी इसी स्वार्थी और भयाक्रांत भीड़ का हिस्सा बनने को विवश हो जाता है।
लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंत तक हार नहीं मानते और सारी अपेक्षाओं को परे रख अकेले यात्रा पर चल पड़ते हैं। ये अकेलापन उन्हें प्रेरणा देता है और यह समझ भी कि किसी को उम्र भर पुकारते रहने से बेहतर है अकेले चलना! 'कोई बचाने आएगा' यह सोच प्रतीक्षा करने से कहीं श्रेष्ठ है, अपनी राहों के कंटकों से स्वयं जूझना! जब चारों दिशाओं में काली स्याह रात सा अँधेरा छाया हो तो उससे भयभीत हुए बिना अपनी अंतरात्मा की पुकार की स्वरलहरी पर अपने क़दमों को गति देना! जब-जब मेरा इन विचारों से साक्षात्कार होता है, तब-तब जो चेहरा सामने आ खड़ा होता है, वह है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का।
यदि टैगोर ने 'एकला चलो रे' न लिखा होता तो न जाने कितनी उदासियाँ अँधेरों की चादर ओढ़े कहीं खो चुकी होतीं! न जाने कितने निराश चेहरे हमसे विदा ले चुके होते! न जाने कितनी मुस्कानें अब तक पत्थर बन गई होतीं!
1905 में, यानी आज से सौ वर्ष से भी कहीं अधिक समय पूर्व लिखा गया रवींद्र संगीत पर आधारित यह देशभक्ति गीत आज भी इतना प्रासंगिक होगा, यह अनुमान तो स्वयं गुरुदेव को भी न हुआ होगा! यूँ तो यह गीत मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया है लेकिन समय-समय पर इसके अनुवाद भी होते रहे हैं। यहाँ एक रोचक तथ्य यह भी है कि हममें से अधिकांश इसका मुखड़ा ही जानते हैं पर उसके बावजूद भी ये तीन शब्द 'एकला चलो रे' मनुष्य के डूबते ह्रदय में प्राणवायु का संचार करते हैं। यह गीत व्यक्ति के जीवन में अथाह आत्मविश्वास और उत्साह भर देता है। इसके बोल भीतर तक स्पर्श करते हैं और ठहरे हुए जीवन में अबाध गति प्रदान करते हैं।
भाषा की जानकारी न होते हुए भी यह मेरा सबसे पसंदीदा गीत रहा है। इन्टरनेट की सुविधा ने इस तक पहुँच भी आसान कर दी है। आज पहली बार इस पर लिखते हुए अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
इस गीत को you-tube पर सुनकर, लिखने का प्रयास किया है। वीडियो भी साझा कर रही हूँ। भाषा की अनभिज्ञता के कारण, यदि कोई ग़लती हुई हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ पर आपसे सुधार का अनुरोध अवश्य रहेगा।
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!
जोदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
केऊ कथा ना कोय
जोदि शोबाई थाके मुख फिराय, शोबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
जोदि शोबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
जोदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
जोदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
जोदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
- प्रीति 'अज्ञात'
*यह तस्वीर मैंने गोवा के एक संग्रहालय में दो-तीन वर्ष पूर्व क्लिक की थी।