गुरुवार, 14 जनवरी 2021

Bird Flu की आड़ में पक्षियों की सामूहिक हत्‍या 'जलियांवाला बाग़ कांड' से कम नहीं!



'Bird Flu के चलते Kanpur Zoo के सभी पक्षियों को मारने का आदेश दे दिया गया है. जबसे यह ख़बर सुनी है, एक बेचैनी सी है. सहसा तो विश्वास ही नहीं होता कि इन मासूमों के प्रति कोई ऐसा बर्ताव करने की कल्पना भी कैसे कर सकता है. खैर! प्रशासनिक अधिकारियों ने यह निर्णय जो भी सोचकर लिया हो पर पता नहीं क्यों, ऐसा लगता है कि किसी भी समस्या से निपटने का जो अंतिम समाधान होता है उसे ही प्रथम पायदान पर रख दिया गया है. चिडि़‍याघर में रहने वाले पक्षी तो हम इंसानों की ही जवाबदारी थे, और यद‍ि उन्‍हें ही मारना पड़ रहा है तो इसका इल्‍जाम तो हम पर ही आना चाहिए. इस निर्णय को जानने के बाद मेरी आंखों में इतिहास की सबसे नृशंस तस्वीर तैरने लगी है जहां 'जलियां वाला बाग़' में जनरल डायर ने निर्दोष भारतीयों को गोलियों से भून, उनकी जघन्य हत्या कर दी थी. वहां की रक्तरंजित दीवारों में अब तक बसी यह घटना इतनी भयावह और दर्द भरी थी कि इसके घाव आज भी हम सबके दिल में गहरी टीस बनकर बैठे हैं. इसी पीड़ा में डूबकर मैं यह समझने की नाकाम कोशिश कर रही हूं कि मनुष्यों को मारा तो 'जलियां वाला कांड' हुआ और पक्षियों की बात आई तो महज़ एक समाचार भर बनकर कैसे रह गया है? निरीह प्राणी, जो न तो इस नृशंस फैसले के विरोध में धरने पर बैठ सकता है और न ही आपके महाआदेश के विरुद्ध में कोई याचिका ही किसी अदालत में जारी कर सकता है. क्या होगा ज्यादा से ज्यादा? कुछ देर फड़फड़ायेगा और वहीं दम तोड़ देगा!

ये मनुष्य की बराबरी भले ही न कर सकते हों पर क्या इन निरीह, बेज़ुबान पक्षियों के प्रति इतना संवेदनहीन होकर कुछ ज़्यादती नहीं हो रही? हम मनुष्य भी तो इस समय कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं लेकिन अपने लिए हमने कब और कहां ऐसा फ़ैसला कर पाया है. हमने ख़ुद की जान बचाने के लिए एड़ी चोटी एक कर दी. दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने एक वर्ष जुटकर इसकी वैक्सीन बना ली है.

तमाम उपाय अपनाकर हमने किया है न इंतज़ार, इसके बनने तक का और अभी इसके लगने की प्रतीक्षा भी कर ही रहे हैं. अपने लिए कितने धैर्यवान और संवेदनशील हो जाते हैं न हम. अब ये 'बर्ड फ्लू' कोई कोरोना की तरह अचानक पैदा हुई महामारी तो है नहीं, जिससे बचाव और रोकथाम के उपाय संभव न हों. दो दशक से देखने में आ रही है और बार-बार आ रही है तो क्या इससे बचने का बस यही एक उपाय रह गया है कि जैसे ही ये बीमारी दस्तक़ दे, पक्षियों की एक खेप मार दी जाए.

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि कुछेक पक्षियों में संक्रमण की आशंका के चलते, सभी पक्षियों को मार देना कहां तक उचित है? जबकि ये तय है कि उनमें से कई स्वस्थ होंगे ही. हम मनुष्य हैं, सबसे समझदार और बुद्धिमान प्राणी. इसीलिए हमको स्वतः ही यह अधिकार भी मिल गया है कि इस प्रकृति से जुड़ी हर सजीव-निर्जीव वस्तुओं के लिए निर्णय ले सकें. पर यह सोचकर भी मेरी रूह कांप  जती है कि ग़र हमसे ऊपर भी कोई शक्तिशाली प्रजाति होती तो? क्योंकि फिर वह प्रजाति भी हम कोरोना पीड़ित और स्वस्थ मनुष्यों को इसी क्रूर दृष्टि से देखती और एक साथ मानव जाति का ख़ात्मा कर देती.

शुक्र मनाइए कि हम सब बच गए. पर दुर्भाग्य से ये पक्षी, उतने भाग्यशाली नहीं हैं. अगली बार जब आप किसी चिड़ियाघर में जाएं तो वहां के पशु-पक्षियों को जी भरकर देख लीजिए और उन्हें सौ गुना स्नेह भी दीजिए. क्या पता, अगली बार किसी बीमारी के चलते इनमें से कोई बलि का बकरा बन जाए और फिर आप उससे दोबारा कभी न मिल सकें.अपने पालतू जानवरों को भी सीने से लगाकर, ख़ूब दुलार दीजिए उन्हें.

आज इन पक्षियों की बीमारी है, कल को कुत्ते, बिल्लियों में भी कोई बीमारी हो सकती है. सोचकर ही कलेजा कांप उठेगा, अगर किसी बीमारी के कारण, कोई हमारे पेट्स को ख़त्म कर देने की बात झूठे ही कह दे तो? क्योंकि ये पालतू जानवर नहीं, हमारे घर के सदस्य हैं. जीवन का बेहद प्यारा और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

फ़िलहाल तो यही कहूंगी कि हो सके तो उन पक्षियों को जी भरकर देख लीजिये, जिन्हें आप रोज प्यार से दाना खिलाते हैं. इनकी उस मधुर आवाज को रिकॉर्ड कर लीजिये जो आपकी सुबह में संगीत घोलती है, इन मासूमों की तस्वीर भी संजोकर रखिये जो आपकी दिनचर्या का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन चुके हैं. क्या पता. कल को, वे हों न हों!
- प्रीति 'अज्ञात'
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बुधवार, 13 जनवरी 2021

गुजरात: संक्रांत‍ि पर छतों की निगरानी का फैसला कटी पतंग जैसा!


गुजरात में मकर संक्रांति के दौरान छतों पर 4 से अधिक लोगों के एकत्र होने पर राज्य सरकार ने रोक लगा दी है. ड्रोन से छतों की निगरानी भी की जाएगी'. जब से यह ख़बर पढ़ने में आई है, मैं यह तय नहीं कर पा रही हूं कि इस निर्णय को लेने वाले की पीठ थपथपाऊं या अपना सिर धुनूं. हर मर्ज़ की एक दवा तो हम सदियों से सुनते आ रहे हैं. अब हर परेशानी का एक कारण भी इन दिनों ज़बरदस्त फ़ैशन में है. नाम है वही, हर दिल में नफ़रत की बत्ती सुलगाने वाला ज़ालिम कोरोना. जिसे लेकर इस त्योहार पर भी भरपूर रोना होगा. 'छत पर 4 से ज्यादा लोग एकत्र नहीं हो सकते!' अजीब मज़ाक है ये! जहां एक घर में 10 लोग पहले से ही रह रहे हैं. उस दिन उनके छत पर जाने से कौन सी कयामत आ जाएगी?

अब गुजरात जैसे राज्य में, जहां संयुक्त परिवार की परम्परा अभी भी बख़ूबी चलन में है, वहां इस तरह के बेतुके निर्णय का पालन कितना और कैसे होगा? पर ये तो एक तरह से यही बात हुई न कि 'यार! तुम लोग इकट्ठे क्यों रहते हो? संयुक्त परिवार की क्या जरूरत? एकल में रहो न!' या कि ऐसा है कि बस, छत पे इकट्ठे जाने से कोरोना फैलता है? बाक़ी नीचे आने के बाद साथ ही खाना खाओ, पलंग पर साथ लदकर टीवी भी देखो. अजी, आपको जो करना है, सो करो. पर भिया! तनिक हमको, हमारी तथाकथित जिम्मेदारी तो निभा लेने दो!

जरा सोचिए, जहां एक घर में 6 लोग हैं वहां वे कौन दो महात्मा होंगे जो अपने मनोरंजन की बलि देने को सहर्ष तैयार हो जाएंगे! दादी मां, बच्चों को सामने खड़ा कर समझा रहीं होंगीं कि 'बेटा, ड्रोन अंकल आ जाएंगे. फ़ोटू छप जाएगी कल के पेपर में. बड़ी बदनामी होगी कि हाय राम! देखो तो नासपीटे इकट्ठे पतंग उड़ा रहे थे!'
दादाजी कहेंगे, 'आपको एक दिन 'सब्र का फल मीठा होता है' वाली कहानी सुनाई थी न? तो मैं न, कल टाइमर सेट कर दूंगा. उसके बजते ही भैया का टर्न आएगा.'

इधर हम जैसे गोलुओं से भरे परिवार में यह चिंता व्याप्त है कि अपन तो 3 खड़े होंगे छत पर, लेकिन ड्रोन से क्षेत्रफल ज्यादा घिरा दिखेगा और ये 6 समझ लेंगे. बड़ी जगहंसाई होगी. तो अपन तो खुद को किचन में आइसोलेट कर मंगोड़े तलकर खाएंगे और टीवी पर उड़ती पतंगों को देख, कान से सुर्र सुर्र धुआं छोड़ेंगे. देश के लिए क़ुर्बान होने का थोड़ा सा फ़ील भी ले लेंगे. गणतंत्र दिवस वाली देशभक्ति अभी से दिखाने का यही उचित समय लग रहा है.

'पतंग महोत्सव' नहीं मनाया जा रहा, इस निर्णय का स्वागत किया जा सकता है क्योंकि वहां दूर-दूर से लोग आते हैं. पक्षियों के कारण भी प्रतिबंध समझ में आता है बल्कि हम तो ख़ुद ही कांच लगे मांज़े के विरोध में एक-एक किलोमीटर लम्बी पोस्ट लिखते आये हैं.
छत पर असावधानी के कारण हुए हादसों के भी हम और आप ग़वाह हैं. पर अब जरा गंभीरता से सोचकर ये बताइए कि कोरोना का, आपकी छत पर पतंग उड़ाने से क्या सम्बन्ध? बल्कि मुझे तो लगता है कि यही एक उत्सव है जिसे कोरोना काल में बिना किसी डर के मनाया जा सकता है. बस कांच वाला मांज़ा न हो.

लोग तो अपने रिश्तेदार या परिचित के साथ ही होते हैं. कोई मेला तो लगता नहीं कि खतरा हो उससे! छत पर गाना बजाना चलता है. पतंगें, आसमान का माथा चूमती इठलाती फिरती हैं और साथ में उंधियु, पूरी, जलेबी, चिक्की और तिल के बने तमाम व्यंजनों का स्वाद महकता है. यही तो होता है इस त्योहार में, जो हमें एक साथ, एक घर में बांधे रखता है. बल्कि इसी के कारण तो संक्रांति के दिन लोग घरों की छत पर होते हैं, कहीं बाहर नहीं जाते.

अब आप आसमान से लटक, ड्रोन से छतों की निगरानी करेंगे तो भई, ये तो उन प्रेमियों की निजता का हनन भी हो गया, जो बड़ी आस लगाए इस दिन के लिए अपनी पतंगें तैयार कर रहे थे. उनकी प्रेम नैया तो परवान चढ़े बिना ही, बीच भंवर में डूब जाएगी.

लोग वैसे ही कहीं आने-जाने को लेकर दुखी चल रहे. सबके चेहरे की रौनक़ उड़ चुकी है. जीवन में तनाव अब सौ गुना अधिक बढ़ चुका है. लॉकडाउन से व्यापारियों के पेट पर कोरोना की तगड़ी मार पहले ही पड़ चुकी है. अब जबकि सारा बाज़ार खुला है तो इनके लिए भी ये बेमतलब के विरोध जैसा ही है. क्या ये पहले से त्रस्त जनता के जले पर नमक छिड़कने जैसा नहीं?
- प्रीति 'अज्ञात'
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मंगलवार, 5 जनवरी 2021

#संन्यास विवाह से ट्विटर के कौवों को सीख लेनी चाहिए!

हाल ही में एक ख़बर वायरल हो रही है जिसमें संन्यास जीवन को अपनाने के बाद दो लोगों ने विवाह का निश्चय किया और अब वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर चुके हैं. कारण था मोहब्बत! विवाह की इससे अधिक ख़ूबसूरत वज़ह कुछ और होनी भी नहीं चाहिए! प्रेमियों का हक़ है ये कि वे उम्र भर साथ रहें! प्रेम में डूबे लोग, किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी को लूटते नहीं, परेशान नहीं करते. वे प्रेम से रहना चाहते हैं और इसी भाव की अपेक्षा दूसरों से भी रखते हैं.

अच्छी बात ये है कि इस शादी से वहाँ उपस्थित लोग भी प्रसन्न होते नज़र आ रहे हैं और किसी ने भी अब तक कोई ऊलजलूल बात नहीं की है बल्कि कई संन्यासी इस शादी के गवाह बने हैं. उस वीडियो को देखने-सुनने के बाद लगता है कि समाज के एक विशेष टेढ़े वर्ग को इन गाँव वालों से सीख लेनी चाहिए! ये वर्ग जो सोशल मीडिया पर अपने आपको कूल और अल्ट्रा मॉडर्न समझते नहीं थकता लेकिन अमृता सिंह से लेकर प्रियंका चोपड़ा और मलाइका अरोड़ा तक को अपने पति की माँ बोलने से नहीं चूकता! उन पर छींटाकशी और भद्दे मजाक करता है! उस पढ़े लिखे, नफ़रत पोसते वर्ग को बटेश्वर के इन लोगों से यह ज्ञान प्राप्त कर ही लेना चाहिए कि 'खग ही जाने खग की भाषा'. प्रेम का अर्थ केवल प्रेम ही होता है और यह उसके अलावा और किसी भी भाषा में यक़ीन नहीं करता. प्यार में उम्र तो कोई मायने ही नहीं रखती!

'न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नयी रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो'
इंदीवर के लिखे इस गीत को जगजीत सिंह ने हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि लगभग 40 साल बाद भी यह रीत अब तक इस समाज में सहजता से नहीं स्वीकारी गई है. बल्कि समाज तो शब्दशः  इसका उल्टा करके चलता है. वो उम्र देखता है, जन्म, जाति, पैसा सब में भरपूर दखल देता है पर मन देखना और उसे समझना इसने सीखा ही नहीं! दुनिया भर को प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले हमारे देश में सबसे ज्यादा गाज प्रेमियों पर ही गिरती आई है. सबसे अधिक प्रश्न प्रेमियों से ही पूछे गए हैं, सबसे अधिक तिरछी निगाहों का सामना उन्हें ही करना पड़ा है. सबसे अधिक हतोत्साहित (ज़लील ही पढ़िए इसे) उन्हें ही किया गया है, सबसे अधिक नफ़रत और बद्दुआ उन्हीं के पवित्र हृदय को पीड़ा देती आई है. धर्म और इज्ज़त के नाम पर हिंसा का ख़ूनी खेल, सबसे अधिक प्रेमी युगल के साथ ही खेला जाता है. 

हम जिस 'भद्र' समाज का हिस्सा हैं उसी में आज भी स्त्री की उम्र अधिक होने पर, पुरुष को फँसाने जैसे घिनौने इल्ज़ाम भी उसी के मत्थे मढ़ दिए जाते हैं. अक्सर ही प्रेम को किसी एक पक्ष की साज़िश कहकर, उसके ख़िलाफ़ नई क़िस्म की साज़िश रच दी जाती है. इस तरह के लोगों का लक्ष्य एक ही है, प्रेम को नष्ट करके, घृणा के बीज बोना और फिर ये उम्मीद भी करना कि इसका मैडल भी उनको नवाजा जाए कि कैसे वे  इस समाज के कट्टर रक्षक बन इस दुनिया में अवतरित हुए हैं.

बटेश्वर धाम के इस जोड़े का विवाह, निम्न मानसिकता से भरे लोगों की सोच के सामने एक सहज उत्तर बनकर प्रस्तुत होता है. ये हारे-घबराए हुए लोगों को उम्मीद का उजाला भी देता है. साथ ही समाज को ये उदाहरण भी देता है कि जीवन के किसी भी दौर में जब अकेलापन महसूस हो, बेहिचक उस अपने का हाथ थाम लो जिसे हमारे लिए ही बनाया गया है.
ईश्वर करे कि उसके दरबार में फलते-फूलते इस प्रेम को, विशेष आशीर्वाद प्राप्त हो. इस युगल का वैवाहिक जीवन इसी प्रेम की छाया में पल्लवित होता रहे और हमें प्रेम की इतनी कहानियाँ पढ़ने को मिलें कि हमारा मन अचरज़ से न भरे! 
अब समय आ चुका है कि प्रेम इस समाज का अभिन्न भाव बनकर रहे, उसमें भीतर तक समा जाए. प्यार, इश्क़, मोहब्बत की कहानियाँ इतनी आम हो जानी चाहिए कि इन्हें ख़ास समझ, इस पर चर्चा बंद ही हो जाए.  
- प्रीति 'अज्ञात' 
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गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

बुरा होते हुए भी बहुत कुछ सिखा गया, 2020

इस बात पर सभी एकमत होंगें कि कोरोना वर्ष 2020 को जितना भी कोसा जाए, कम है! यह काफ़ी हद तक सच भी है. लेकिन यदि गंभीरता से सोचा जाए तो इस वर्ष ने हमें अपने जीवन को समझने और उसके विवेचन-मनन का अवसर दिया है. हमें यह भी सिखाया कि जीने के लिए कितनी कम वस्तुओं की आवश्यकता होती है और बाज़ार दिखावा बेचता है. हमें यह भी पाठ मिला कि स्वच्छता कितनी आवश्यक है और यह न केवल कोरोना बल्कि कई अन्य बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है. इस कठिन समय में हमें प्रकृति के प्र्ति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ और उन लोगों के प्रति भी मन कृतज्ञता से भर गया जिन्होंने हर हाल में हमारा साथ दिया. असल में तो इस वर्ष ने हमें, हमारे अपनों की पहचान कराई है और हमें मोहब्बत से जीना सिखाया है.    

झूठ कम बोला गया 
हर बात पर या बेबात ही झूठ बोल देना सच्चे भारतीयों की निशानी है. लेकिन 2020 के लॉकडाउन ने मनुष्यों को सच्चाई का पुतला बनाकर छोड़ा. पहले तो फ़ोन पर उधारी वापिस माँगने वालों को बच्चे द्वारा कहलवा दिया जाता था कि "पापा घर पर नहीं है". अब कैसे कहें क्योंकि अगर घर पर नहीं तो क्या कोविड वार्ड में हैं?
झूठ, बच्चे अपने लेवल पर स्कूल में प्रयोग करते आ रहे थे. जब टीचर होम वर्क न करने का कारण पूछती थी तो दर्दनाक मुँह बनाकर कह दिया करते थे, 'मेम, मेरे पेट में बहुत जोरों का दर्द हो रहा था". अब डर ये है कि जैसे ही बोला और पीछे से मम्मी ने आकर तमाचा जड़ा कि "क्यों रे! कल तो पिज़्ज़ा खाने के लिए जमीन पर पछाड़ें मार-मारकर गिरे जा रहा था".
प्री-लॉकडाउन काल में पुरुष अपने बॉस को अलग ही दुखभरी कहानी से भावुक कर देते कि कल कैसे पत्नी मरते-मरते बची! और इस कारण से फाइल अधूरी रह गई! अब तो इधर कहा और उधर तलाक़ हुआ कि "हाँ, तुम तो चाहते ही यही हो कि मैं मर जाऊँ!" 
तो सच का बोलबाला बहुत रहा हालाँकि ऑनलाइन क्लास ने बच्चों के दिमाग में नए आइडियाज़ भी भर दिए हैं और वे "नेट स्लो है" कहकर कैमरा या माइक ऑफ कर देते हैं.

दिखावे पर लगी रोक 
शादी-ब्याह में साज-सज्जा के नाम पर ही लाखों रूपये खर्च दिए जाते थे. उपहार के नाम पर लेन देन भी हमेशा ही चलता आया है. कोरोना के कारण अब इन आयोजनों में उपस्थिति एक निश्चित संख्या तक ही सीमित कर दी गई है. एक तरफ तो इससे लोग खुश हैं तो वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस दुःख में अधमरे पड़े हैं कि "हमने तो वर्मा जी की बहू की मुँह दिखाई पर सोने की अंगूठी भेंट की थी और हमें बस डिजिटल बधाई वाला बुक़े मिला". 

बुरी आदतें ख़ुद-ब-ख़ुद कम हुईं 
वे किशोर जिन्हें माँ-बाप से छुप कर सिगरेट सुलगा अपने फेफड़ों को जलाने का शौक़ था, जो नशे में धुत हो अपने ग़म गलत किया करते थे, कभी- कभी सड़क पर गाड़ी को नागिन की तरह लहरा भी दिया करते थे; कोरोना माई ने उन्हें भी अपनी गिरफ़्त में लेकर उनके सारे स्वप्न ध्वस्त कर दिए. अब उनके पास ग़म को सही, गलत करने के लिए गरम पानी है, काढ़ा है, दिव्य पेय है. खून के घूँट पी-पीकर इन्हें गटकने की पीड़ा भी बहुत है जी!
पुलिस के डंडे के डर से पान-गुटका खाकर, मॉडर्न आर्ट बनाने वाले कलाकारों की संख्या में भी भारी कमी हुई है.

पुरुष गृहकार्य में दक्ष होते गए 
कई स्त्रियों को इस बात का बहुत दरद रहा करता था कि उनके मरद को पूजनीया सासू माँ ने कुछ न सिखाया! लॉकडाउन ने जैसे उनकी मनचाही मुराद पूरी कर दी. इस स्वर्णिम अवसर को भुनाने का इससे बेहतर समय और क्या हो सकता था. हेल्पर्स के न आने के दुःख में पतियों को मजबूरन शामिल होना पड़ा. उसके बाद उन्हें सब्जी काटने, वाशिंग मशीन लगाने, कपड़े आयरन इत्यादि का अनचाहा  त्रैमासिक कोर्स भी करना पड़ा. उन्हें ढंग से हाथ-पैर धोना भी आ गया. कुछ साहसी लोग कुकिंग भी सीख गए और निपुणता में पत्नी को टक्कर देने लगे. जो महान थे और अपने उसूलों के प्रति कट्टर भी, उन्हें यह लॉकडाउन भी प्रभावित न कर सका! आपके चरणों में विशेष रूप से नमन पहुंचे!

स्त्रियों को मेकअप के बिना रहना आया
जब आधे से अधिक फेशियल एरिया पर मास्क की तिरपाल चढ़ी हो तो पलस्तर करने को बचा क्या! न लिपस्टिक, न क्रीम, न पाउडर. सबका साथ छूट गया. उस पर घर के कामों में जुटी स्त्रियाँ, न तो कहीं आने जाने का सुख ही भोग सकीं और न ही उन्हें नए गहने और साड़ियों को दिखा पाने का सुअवसर ही प्राप्त हुआ. अब क्या कहें! घर में पति की लगातार उपस्थिति से "और क्या बताऊँ, बहिन!" कहकर उसकी बुराई करने के सुख से भी वंचित रहना पड़ा उन्हें.  

स्वास्थ्य बेहतर हुआ 
अब लोगों को अपना ख्याल रखना आ गया है और वे अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से कहीं अधिक सचेत हो गये हैं. अपनी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए वे तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं. योग के प्रति उनकी रूचि बढ़ी है. चूँकि बाहर का खाना-पीना भी लम्बे समय तक बंद रहा तो घर का भोजन खाने से उनके लगातार बढ़ते वजन पर भी रोक लगी है.

कुल मिलाकर 2020 के कठिन समय ने हमें संघर्ष करना और उससे जूझते हुए आगे बढ़ना सिखाया है. साथ ही हर विपत्ति से निबटने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी किया. दुखद पक्ष यह रहा कि इसने कई घरों से उनके अपने छीन लिए. रोज कमाकर, चूल्हा जलाने वालों का जीवन नष्ट कर दिया. देश की अर्थ-व्यवस्था तहस-नहस कर दी. इसके चलते लोग अपने घरों तक न पहुँच सके. लाखों को अपनी नौकरी, व्यवसाय से हाथ धोना पड़ा और भीषण मानसिक तनाव से भी गुजरना पड़ा. 
जिन्होंने अपनों को खो दिया उसकी भरपाई तो उम्र भर नहीं हो सकती लेकिन इतनी उम्मीद जरुर रख सकते हैं कि बाकी सब धीरे-धीरे पटरी पर लौट ही आएगा! कहते हैं न कि हर बात के दो पहलू होते हैं तो क्यों न इसके सकारात्मक पहलू को सोच, 2021 में प्रसन्न मन से प्रवेश किया जाए.
नववर्ष की शुभकामनाएँ!
-प्रीति 'अज्ञात'
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'कोरोनो-युक्त समाज' के लिए कैसा हो 2021

हम जिस दुनिया में रह रहे हैं वहाँ के लोगों ने अब तक हुई तमाम महामारियों के किस्से भर ही सुने हैं। लेकिन इन किस्सों को सुनना और उन्हें स्वयं जीना, उनका हिस्सा बनना एक अलग ही स्तर का अनुभव है। एक ऐसा दुखद अनुभव, जिसे कोई कभी भी नहीं जीना चाहेगा! सब चाहते हैं कि उनके जीवन की पुस्तक से, दर्द के तमाम पृष्ठ उखाड़ फेंक दिए जाएँ लेकिन कोरोना महामारी और इसकी पीड़ा, अब एक लिखित दस्तावेज़ की तरह हमारी जीवन दैनंदिनी में दर्ज़ हो चुकी है। ये एक ऐसा दुःख है जो न चाहते हुए भी सबके गले पड़ गया है। निश्चित रूप से 2020 में दुनिया भर के कई लोगों के जीवन में कुछ अच्छा भी हुआ ही होगा लेकिन कोविड-19 का प्रकोप हर खुशी पर भारी ही रहा! इसने न केवल सामान्य दिनचर्या को ही प्रभावित किया बल्कि मनुष्य को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। नियमों का उल्लंघन और 'जो होगा, देखा जायेगा!' की मानसिकता इसी कुंठा से उपजा व्यवहार है जिसे किसी भी मायने में सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके दुष्परिणाम भी मानव जाति को ही भोगने होंगे, हम भोग भी रहे हैं। 

लॉकडाउन ने, न केवल उस समय ही तमाम दुकानदारों की कमर तोड़ दी थी बल्कि अब तक भी वे इससे उबर नहीं सके हैं। उत्सवों की रौनक़ कम होने और विवाह एवं अन्य आयोजनों में सीमित संख्या के नियम से बाज़ार बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मुसीबत की सर्वाधिक मार निर्धन को ही झेलनी पड़ी।सबसे अधिक फ़ाका उस निम्न वर्ग के ही हिस्से आया है, जिन्हें रोज़ सुबह उठकर उस दिन के चूल्हे का इंतज़ाम करना पड़ता था। उनका रोज़गार छूटा और इस बीमारी ने उनके हाथों से रोटियाँ ही छीन लीं। संक्रमण न होते हुए भी वे इसकी चपेट में आ गए। 

'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है' की अवधारणा का सबसे पुष्ट प्रमाण इस वर्ष ही देखने को मिला, जब दूर शहर में रहने वाले लोग अपने प्रियजनों से मिलने की बेचैनी को महीनों जीते रहे। रोजी-रोटी कमाने गए लोग या विद्यार्थी अपने घर न जा सके! बेटियाँ मायके की दहलीज़ को छू लेने भर को तरसती रहीं! बच्चे, ददिहाल-ननिहाल के स्नेह आंगन से वंचित रहे। प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से मिलने की तीव्र उत्कंठा को ह्रदय में ही दबाए रहे! इसी सबके बीच मृत्यु का निर्मम तांडव भी चलता रहा। न जाने क्या-क्या बीता होगा उन दिलों पर, जो किसी अपने को खोने के बाद बिछोह के इस कठिन समय में उससे लिपटकर रो भी न सके, बिलखते हुए ये भी न कह सके कि 'तू हमें छोड़ यूँ चला क्यों गया?'  इतनी हताशा और निराशा का अनुभव पहले कभी न हुआ कि जब हमारा कोई अपना हमसे बिछुड़े और हम उसे स्पर्श तक भी न कर सकें,मृतात्मा के अंतिम दर्शन तक को भी तरस जाएँ! सच! बड़ा ही दुखद समय रहा उन घरों में, जहाँ उन्हें अपने प्रियजन की निष्प्राण देह तक न देखने को मिली! अंतिम विदाई में जो उसके साथ दो क़दम भी न चल सके! कैसा दुर्भाग्य है ये कि लाशें किसी सामान की तरह पैक की जानें लगीं। उन्हें छू लेना भर भी किसी बीमारी के विस्फ़ोट का कारण लगने लगा। 

बीमारी हो या मृत्यु, ह्रदय की तमाम संवेदनाओं को जागृत कर ही देती है लेकिन कोविड ने मनुष्य के इस भाव को भी लील लिया। एक-दूसरे के प्रति संदेह और दुर्व्यवहार की सैकड़ों घटनाओं से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। कल तक जो अपना था, आज उसके लिए ह्रदय कैसा निष्ठुर सा हो गया! कुछ मरीज़ जो शायद अपनी रोग प्रतिरोधक शक्ति के चलते इस बीमारी को मात दे भी सकते थे, वो अपनों की दुर्भावना के शिकार हुए। इसके साथ ही मानसिकता का सबसे कुत्सित भाव भी देखने को मिला।जहाँ लाशों के गहने चोरी, उनसे बलात्कार और उनके अंगों को निकाल बेचने की तमाम भयावह घटनाओं ने मनुष्यता को और भी बदरंग, शर्मसार कर दिया। एक ओर जहाँ इस बीमारी ने जैसे जीवन के सारे अच्छे-बुरे रंगों से एक साथ साक्षात्कार करा दिया है तो वहीं कुछ नाम किसी नायक की तरह उभरे और उनकी हृदयस्पर्शी कहानियाँ हमारा मन भिगोती रहीं। इंसानियत पर हमारा विश्वास बनाए रखने में उन सभी का योगदान भुलाए नहीं भूलता, जो इस दुरूह समय में पूरी कर्त्तव्यपरायणता के साथ डटे रहे। इसमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लाखों-करोड़ों नाम सम्मिलित हैं जिन्हें यह बीमारी भी विचलित न कर सकी और वे पूरी निष्ठा और समर्पण से अपना काम करते रहे। यही वे लोग हैं जो इस दुनिया को जीने योग्य बनाते हैं, मानव को उसकी मानवता से जोड़े रखने का सशक्त उदाहरण बन प्रस्तुत होते हैं। 

वैक्सीन की प्रतीक्षा का अंत बस होने को है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कोई संजीवनी-बूटी नहीं है। समस्त देशवासियों को उपलब्ध होने में ही एक वर्ष से अधिक का समय लग जाएगा। हमारे तंत्र में इसकी डोज़ पहुँचते ही ये हमें 'कोरोना-प्रूफ़' नहीं कर देती! पहले इक्कीस दिन तो रोगप्रतिकारक (एंटीबॉडीज़) बनने की प्रक्रिया को प्रेरित करने में लगते हैं और उसके बाद के तीन सप्ताह में इसका निर्माण प्रारम्भ होता है। यानी वैक्सीन लगने के बाद भी दो माह तक आप उतने ही असुरक्षित हैं जितने कि बिना इसके थे। कुल मिलाकर हमें यह मान लेना चाहिए कि मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइज़ेशन अब हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और अब ये जीवन इसके साथ ही सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सकता है। इस तथ्य को भी स्वीकारना ही होगा कि कभी-न-कभी तो हमें बाहर निकलना ही है, अब घर में और बैठना संभव नहीं। 

वज़न घटाना, योगाभ्यास करना, सुबह शीघ्र उठना जैसे तमाम संकल्पों को लेने के लिए नए साल के आने का इंतजार मत कीजिए। आज से ही शुरुआत कीजिए, ताकि 2021 आपको तरोताजा रूप में मिले। यह संकल्प सर्वाधिक आवश्यक है कि हम पूरी सुरक्षा अपनाते हुए एक जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय भी दें। कोरोना-मुक्ति का उपाय तो अभी निकट में दिखता नहीं, तो क्यों न 'कोरोनो-युक्त समाज' के लिए अपने आपको तैयार करें। मानसिक और शारीरिक रूप से अपने आपको तैयार करके ही इस महामारी को साधारण बीमारी में बदला जा सकता है।

- प्रीति अज्ञात

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'हस्ताक्षर' दिसंबर अंक में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/rachna.php?id=2658



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

Merry Christmas!

 



कहने को क्रिसमस भले ही ईसाई धर्म से जुड़ा  त्योहार है लेकिन दुनिया भर के बच्चे इससे कनेक्ट करते हैं. उन्हें पता है कि आज के दिन सैंटा क्लॉज आकर न केवल उन्हें चॉकलेट देते हैं बल्कि उनकी बहुत सारी wishes भी पूरी करते हैं. आप किसी बच्चे से पूछो कि “तुम्हें क्या चाहिए” तो सबसे पहले वो चॉकलेट ही बोलेगा. बच्चों की अपनी जितनी छोटी सी दुनिया है, उसमें पलती wishes भी उतनी ही मासूम हैं. वो सामने वाले की उम्र, पद, हैसियत के आधार पर अपनी इच्छाओं का गुणन नहीं बैठाते बल्कि अपने दिल की ही बात कहते हैं. ईश्वर करे, उनकी ये निश्छलता बनी रहे और सैंटा क्लॉज पर भरोसा भी. 

 

"दुनिया अब भी ख़ूबसूरत है", ये भरोसा हमें हमारे पेरेंट्स ने दिया और हमने हमारे बच्चों को. अब समय बदला है और बच्चों को पता चल चुका है कि सुबह तकिए के पास रखी चॉकलेट और उपहार मम्मी पापा ही रखते हैं. अचानक आया वो 'मैरी क्रिसमस' वाला केक उनके सबसे प्यारे दोस्त ने ही चुपके से भिजवाया है और दरवाजे पर चमचमाती नई साइकिल ददिहाल- ननिहाल से ही आई है.

 

"जिंगल बेल, जिंगल बेल, जिंगल आल द वे....." सुनते ही मन चहकने लगता है और यूँ महसूस होता है जैसे दरवाजे पर दस्तक़ होने ही वाली है और उस लाल सफ़ेद पोटली को लिए, उन्हीं रंगों से सजे वस्त्र धारण किये, टोपी पहने कोई देवदूत बस अब हो हो कर हँसने ही वाला है. 

आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दूँ. मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंगल बेल,  क्रिसमस गीत न होकर, थैंक्सगिविंग गीत है जिसे डेढ़ सौ से भी अधिक वर्ष पहले जार्जिया के म्यूजिक डायरेक्टर जेम्स पियरपॉन्ट ने संगीत ग्रुप के लिए लिखा था. उन्होंने इसे 'वन हॉर्स ओपन स्ले' शीर्षक से लिखा था. पर थैंक्सगिविंग गीत है, तो भी क्या! गर कोई अपनी ख़्वाहिशों के आसमान में चाँद-तारे टांकने को इसे गुनगुना लिया करता है! ये गीत, उम्मीद देता है और इसे हर दिन गाया जाना चाहिए. 

 

बच्चों के साथ, ‘क्रिसमस ट्री’ को सजाना मुझे आज भी अच्छा लगता है.  यूँ भी मेरा मानना है कि वक़्त कितना भी बदल जाए, हम कितने ही समझदार क्यों न हो जाएं, घर कितने ही साजो- सामान से क्यों न भर लें! पर एक सैंटा क्लॉज की दरकार तब भी है, वो सरप्राइज़ सबको चाहिए. किसी भी उम्र में ये अब भी उतना ही अच्छा लगता है और इसके लिए जरूरी है कि हम भी किसी न किसी के सैंटा क्लॉज बनें.  

Merry Christmas!

-    प्रीति ‘अज्ञात’

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शनिवार, 19 दिसंबर 2020

कोरोना को हराने वालों के लिए जानलेवा बनती #Mucormycosis बीमारी को भी जान लीजिए

 कोविड ने पहले से ही पूरी दुनिया को कम दुखी नहीं कर रखा है कि अब इससे जुड़ी एक नई जानकारी ने परेशानी खड़ी कर दी है. ख़बर आई है कि यदि आप कोविड से ठीक हो चुके हैं तो भी निश्चिंत होकर न बैठें! अपना ध्यान रखें क्योंकि कोविड मरीज के लिए नया खतरा बन म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis) नामक बीमारी ने दस्तक दे दी है. 

हाल ही में कम रोग प्रतिरोधक क्षमता (Weak Immunity) वाले तथा  कुछ कोरोना मरीज़ों में इसका संक्रमण (Infection) देखने को मिला है. इस घातक बीमारी के चलते अहमदाबाद में 2 की मौत हो गई तथा 2 अन्य की आंखों की रोशनी चली गई है. 

मुंबई के कोविड अस्पतालों में भी ऐसे मामले देखने को मिले  हैं. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा भी इस ख़बर की पुष्टि की गई है. टीवी चैनलों के माध्यम से उन्होंने बताया कि पिछले दो सप्ताह में ऐसे दर्ज़न भर मरीज़ सामने आये हैं, जिनमें से पचास प्रतिशत अपनी आंखों की रोशनी खो बैठे हैं. 

 

क्या होता है श्लेष्मा विकार (म्यूकोरमाइकोसिस)?
म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis), कवकीय संक्रमण (Fungal  infection) का एक प्रकार है. इसे जाइगोमाइकोसिस या ब्लैक फंगस  भी कहा जाता है. यह रेयर बीमारी है. इसमें लोगों की आंखों की पुतलियां बाहर आ जाती हैं. अधिकाँश मामलों में मरीजों की आंख की रोशनी भी चली जाती है.

यह इसलिए भी विशेष रूप से खतरनाक है क्योंकि यह पूरे शरीर में जल्दी फैलता है. समय पर उपचार न होने से इसका संक्रमण फेफड़ों या मस्तिष्क तक पहुँच सकता है. इसके कारण  पक्षाघात (Paralysis), न्यूमोनिया और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है.

चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी से ग्रस्त मरीज़ों में जीवन-मृत्यु का आंकड़ा 50-50 है. इसमें और कोविड में मुख्य अंतर यह है कि ये कोविड की तरह संक्रामक (Contagious) नहीं है अर्थात् ये एक से दूसरे को नहीं हो सकता. 

 

कैसे फैलती है ये बीमारी?

Mucormyete मोल्ड्स के संपर्क में आने से म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis) होता है. ये सूक्ष्मजीव पत्ते, खाद के ढेर ( piles of compost), मिट्टी, सड़ रही लकड़ी (Rotting wood)  आदि पर पाए जाते हैं. इन स्थानों पर उपस्थित मोल्ड बीजाणु (mold spores) साँस के माध्यम से शरीर में पहुँच सकते हैं. जिसके कारण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system),आंखें, चेहरे, फेफड़ों, साइनस  में संक्रमण विकसित हो सकता है. 
ये कवक (Fungi) कटी या जली हुई त्वचा के माध्यम से प्रवेश करके भी  संक्रमित कर सकता है. ऐसे मामलों में, घाव या जला हिस्सा संक्रमण का क्षेत्र बन जाता है.

 

किनके लिए हो सकती है, जानलेवा?

इस प्रकार के Molds या कवक (Fungi) सामान्य तौर पर उगते ही रहते हैं पर इसका ये अर्थ नहीं कि हर कोई इस बीमारी से संक्रमित हो जाएगा. इस  संक्रमण की आशंका उनमें सबसे अधिक है जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) किसी बीमारी के चलते या अन्य किसी स्वास्थ्य समस्या के कारण अपेक्षाकृत कमजोर हो. इन लोगों को भी विशेष ध्यान रखने की जरूरत है-

कैंसर/ एचआईवी/ मधुमेह रोगी

जिनका हाल ही में अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) या अन्य कोई शल्य चिकित्सा (surgery) की गई हो 

त्वचा जल गई हो (Burns)
किसी चोट के कारण घाव या cut हो 

लेकिन आमजन को भी सारी सावधानियां अपनाते हुए इससे बचकर रहना है.

 

नई नहीं है ये बीमारी !

सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ ENT सर्जन डॉ मनीष मुंजाल के अनुसार यह बीमारी नई नहीं है. इसे पहले भी कमजोर इम्युनिटी सिस्टम वाले लोगों, वृद्धों तथा डायबिटीज के मरीज़ों में देखा गया है. यदि आप इस श्रेणी में नहीं आते और वे मरीज़ जिन्हें कोविड ट्रीटमेंट में स्टेरॉयड की जरुरत नहीं पड़ी, उन्हें अधिक घबराने की आवश्यकता नहीं है. बस अपना ध्यान रखें. 

नेत्र-विशेषज्ञ, डॉ जिगना कैसर का कहना है, ‘'कोविड से पहले, हज़ार मरीजों में पांच या सात ऐसे मामले देखने को मिलते थे, लेकिन कोविड के बाद हज़ार में से बीस मरीज़ों में म्यूकोरमाइकोसिस देखा गया है.

वहीं अहमदाबाद के रेटीना एंड ऑक्यूलर ट्रॉमा सर्जन, डॉ पार्थ राणा का भी कहना है कि पहले ये बीमारी पन्द्रह से बीस दिनों में फैलती थी लेकिन अब चार-पांच दिनों में ही मरीज़ की स्थिति गंभीर हो रही है यहाँ तक कि मृत्यु भी. 

 

कैसे पहचानें इस बीमारी को?

मुख्यतः ये बीमारी श्वसन तंत्र (respiratory System) या त्वचा (Skin) के संक्रमण के रूप में विकसित होती है. इसमें खांसी, बुखार, सिरदर्द, नाक बंद, साइनस का दर्द देखने को मिलता है.

त्वचा (Skin) को संक्रमित करने के साथ ही ये शरीर के किसी भी हिस्से में फ़ैल सकती है. अतः त्वचा के कालेपन, फफोले, सूजन, कोमल हो जाना, अल्सर  होने पर जांच करानी चाहिए. 

यदि आपको छींक वाला जुकाम नहीं है. आपकी नाक में पपड़ियाँ निकल रहीं या क्रस्टिंग हो रही है. साथ ही उस साइड के गाल में सूजन है या फिर सुन्न महसूस हो रहा तो तुरंत ही चिकित्सक के पास जाकर जाँच कराएं. आँखों का लाल हो जाना, आँखों की रौशनी कम होना, आँखों या गालों में सूजन भी इसके लक्षण हो सकते हैं. 

 वैसे तो ये बीमारी शरीर के किसी भी भाग में हो सकती है पर सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव नाक एवं आंखों के आगे पीछे डालती है. नाक में यह फंगस बहुत तीव्र गति से वृद्धि करता है और तीन से पाँच दिन के अन्दर ही संक्रमण फैलने लगता है. सबसे पहले आंख के पीछे, फिर आसपास और फिर ब्रेन में फ़ैल जाता है.  इसका मस्तिष्क तक पहुंचना ही जानलेवा बन जाता है. पर भूलें नहीं कि समय रहते इसका इलाज़ भी संभव है. अतः प्रारम्भिक अवस्था में ही जांच करा लें.

 

बचाव के लिए ये आसान तरीके अपनाएँ 

पूरे शरीर को ढकते हुए कपड़े पहनने चाहिए. 

ये जमीन में होता है अतः उसमें काम करते समय  हमेशा लम्बे शूज पहनकर रहें और त्वचा को मिट्टी के सीधे सम्पर्क में न आने दें.

हवा में भी उपस्थित होता है तो मास्क पहनना न भूलें. 
सफाई का पूरा ध्यान रखें. अच्छी तरह साबुन से हाथ-पैर धोएं. 


किसी भी प्रकार के संदिग्ध संक्रमण के लिए डॉक्टर को दिखाना चाहिए. लैब में टिश्यू सैंपल देखकर म्यूकोरमाइकोसिस का पता लगाया जाता है. इसके उपचार के पहले चरण में Intravenous (IV) एंटिफंगल दवाएं दी जाती हैं और सर्जरी के द्वारा सभी संक्रमित ऊतकों (Infected tissues) को हटा दिया जाता है. अनुकूल प्रतिक्रिया मिलने पर ओरल मेडिकेशन दिए जाते हैं.

 - प्रीति 'अज्ञात'

इसे यहाँ भी पढ़ सकते हैं -

https://www.ichowk.in/society/post-covid-19-threat-mucormycosis-fungal-infection-disease-big-worry-for-corona-patient-what-is-mucormycosis-symptoms-and-treatment/story/1/18933.html

#Mucormycosis #Mask #Covid19 #coronavirus #वैक्सीन #vaccine #immunity #iChowk #preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात   

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

पड़ोसी के घर कोरोना आने के लक्षण, और बचाव!

इस समय कोरोना संक्रमण (Corona Infection) से पीड़ित परिवार और उनके स्वस्थ पड़ोसी दोनो ही धर्मसंकट का खतरा झेल रहे हैं. एक को अपनी पीड़ा साझा करने में तरह तरह की आशंकाएं हैं, तो पड़ोसी इसी कयासों के साथ दुबले हुए जा रहे हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं? मतलब एक तो इंसान पहले से ही कम शैतान और झूठा न था, उस पर आ गया कोरोना. बोले तो 'करेला, नीम चढ़ा!' जी, हां! कहां तो हम सोच रहे थे कि कोविड-19 से त्रस्त इस दुनिया में अब मनुष्य पहले से कहीं अधिक समझदार और संवेदनशील हो जाएगा. पर न जी न! 'डोंट अंडर एस्टीमेट द नालायकपंती लेवल ऑफ़ दिस प्रजाति!' आरोग्य सेतु' भी किसी सरकारी पुल की तरह भरभराकर गिर गया. शुरू में तो सब उसे अपनी सुरक्षा हेतु ही इस्तेमाल कर रहे थे पर जैसे ही ख़ुद में लक्षण दिखने लगे तो इन्हीं महान लोगों द्वारा एप को ऐब की तरह देख, तत्काल प्रभाव से बर्ख़ास्त कर दिया गया.

तात्पर्य यह है कि हमें दूसरों से तो अपनी सुरक्षा की चिंता थी पर हमको संक्रमण होते ही इसे छुपाने पे पिल पड़े. मानो, कोरोना न हुआ ग़बन हो गया जी! अब तो जेल में फंसना पड़ेगा टाइप. इम्युनिटी सिस्टम फ़ेल क्या हुआ, लोग बच्चों की तरह अपनी मार्कशीट ही छुपाने लगे कि 'हाय, हाय दुनिया वाले क्या कहेंगे! कित्ती बेइज़्ज़ती की बात है!' मुए कोरोना ने इंसानों पर स्वार्थ का ऐसा मुलम्मा चढ़ा दिया है कि अब मनुष्य को मनुष्यता तक पहुंचने में कुछेक सदियां और लग ही जाने वाली हैं.

अरे, भई! बीमारी ही तो है! क्या आपको इसके छुपाए जाने का खतरा सचमुच नहीं पता? चलिए, अगर कुछ लोग अपनी होशियारी दिखाने पर आ ही गए हैं तो देशहित में हमारा भी फर्ज बनता है कि इसका पर्दाफ़ाश करें!

ये हैं बीमारी छुपाए जाने के पांच प्रमुख लक्षण -

1- सहायकों को छुट्टी दे दी जाए अथवा दुमंज़िला मकान हो तो एक ही मंज़िल तक उसका आना-जाना सीमित कर दिया जाए.
2- फ़ोन पर बात करते समय उनकी भाषा में अतिरिक्त विनम्रता आ जाए या हर बात पर कहें कि 'भई! अब जीवन का क्या ठिकाना!'
3- अचानक ही उनका टहलना बंद हो जाए.
4- रोज जिनके यहां zomato की एक्टिवा खड़ी रहती थी, अब नदारद दिखने लगे.
5- नित राजनीति में डूबे प्राणी यकायक,सोशल मीडिया को अपनी जीवन-दर्शन से भरी पोस्ट से छलनी करने लगें!

और क्या कहें! बड़ी अजीब दुनिया है रे बाबा! बस, यही दिन देखने को रह गए थे! इस कोरोना ने तो सच्चाई का ऐसा जनाज़ा उठवाया है न कि न रोते बन रहा और न... हंसते तो हम वैसे ही कभी नहीं हैं.वैसे तो व्यक्तिगत बात है पर इस दुनिया में अब क्या अपना और क्या पराया! चलिए बताये देते हैं. पहले तो हमारी हेल्पर ने ही हमसे इस बीमारी को छुपाया, जैसे-तैसे हम ये बात बताने को ज़िन्दा बच गए.

इस दुःख से अभी पूर्ण रूप से उबर भी न पाए थे (बचने के नहीं, हेल्पर के झूठ के) कि पड़ोसी ने भी डिट्टो यही सितम ढा दिया. अब इस बात की भी बोल्ड और अंडरलाइन की गई बात ये है कि वो हेल्पर जिसे अपनी बीमारी छुपाते हुए जरा भी लाज नहीं आई थी, उसी ने ये ख़बर दी. उस पर ये भी बोली कि 'बेन, उन्होंने कितना गलत किया! बताना तो चैये था न?' उसकी इस मासूमियत पर उसके नहीं बल्कि अपने ही बाल नोचने और सिर धुनने का मन कर रहा था. दिल तो ये भी किया कि अभी ईश्वर के चरणों में पछाड़ें खाकर गिरुं कि 'आखिर, आप चाहते क्या हो?'

वो तो मेरे अच्छे करम के सदके, तभी एक देवदूत प्रकट हुआ. उसे तो मेरे मन की हर बात पहले से ही पता होनी थी. सो सीधे ही बोला, 'पड़ोसी का बेटा कैसा है?' मैं मुंह फुलाते हुए बोली, 'जब उन्होंने बताया ही नही कोविड का, तो हालचाल कैसे लूं? अब घर में है तो सही ही होगा!' वो बोला, 'पूछकर कन्फर्म कर ले न!' मैंने कहा कि 'न मरीज की भावनाओं से खिलवाड़ समझ लोग आहत हो सकते हैं.' वो गुस्से में भर बैठा, 'अबे भोली, उनकी भावना की ऐसी की तैसी! उनके घर की हेल्पर तुम्हारे घर आ रही थी, तो उन्होंने किस बात का ख्याल रखा?' फिर मेरे गाल पर प्यार भरी थपकी देते हुए बोला 'अरी भोली! उनसे ऐसे पूछ ले कि आपका बेटा कैसा है जिसको कोविड नहीं हुआ?' या फिर ये कहकर पूछ ले, 'आपका बेटा नहीं दिख रहा, कैसा है वो?' 'तू बस ऐसे 3-4 सवाल लिख कर ले जा, उनको पर्ची देकर कहना कि इनमें से किसी का भी जवाब दे दो! मतलब, उनको बुरा भी न लगे और अपने पेट में शांति भी पड़ जाए!

उसके आइडियाज को सुन मेरा ठीक वही हाल हुआ जो इस समय आपका हो रहा होगा. फिर भी हमने उससे कहा कि 'धक्के मार के निकाल देंगे मेरे को.' तो ज़नाब बोले, 'अबे, तो तू उधर मत जा न! अपनी बाउंड्री से उधर पर्ची फेंक दे और पड़ोसी को बोल कि उठा कर पढ़ लो, पीछे जवाब लिख देना.' या फिर ऐसा कर कि तू सीधे एक पब्लिक पोस्ट ही लिख दे कि 'मुझे पड़ोसी पर शक है. उनके घर में कुछ गड़बड़ है. वरना वो यूं मुंह लटकाए झूले पर बैठे नहीं रहते हैं. आज वो नज़रें चुरा रहे हैं.'

तो भई! हमने उसकी ये लास्ट वाली राय मान ली है. यदि आपको भी पता करना है कि 'पड़ोस में किसी को कोरोना हुआ है क्या' तो ये नुस्ख़े अपनाएं और सफ़लता मिलने पर हमारी फ़ीस अकाउंट में ट्रांसफर कर दें. फ़ीस न दें तो भी चलेगा बस मास्क पहनने, दो गज की दूरी और साबुन से हाथ धोने का पक्का वादा करते जाइए.
नारायण! नारायण!
- प्रीति 'अज्ञात'
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शनिवार, 28 नवंबर 2020

Covid vaccine से 'अमृत' जैसी उम्मीद उगाए लोग ये 5 गलतफहमी दूर कर लें!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना वैक्सीन बना रही भारत की तीनों लैब पर खुद गए. अहमदाबाद की ज़ाइडस बायोटेक से शुरू हुआ उनका दौरा कार्यक्रम भारत बायोटेक (हैदराबाद) और फिर सीरम इंस्टिट्यूट (पुणे) पर जाकर संपन्न हुआ. कोरोना वैक्सीन का टीका बनाने की प्रगति, उसके भंडारण के अलावा एक बड़ी चिंता इस बात की है कि यह टीका जल्दी से जल्दी भारत की 135 करोड़ से अधिक आबादी तक कैसे पहुंचाया जाए. हम जानते हैं कि यह बड़ा ही चुनौतीपूर्ण काम होगा. लेकिन, बुनियादी सवाल तो अब भी जहां का तहां ही है. क्या ये वैक्सीन हमें कोरोना के खतरे से बाहर निकाल लाएगी? अब जबकि कोरोना विकराल रूप धर चुका है तो सबकी नज़रें संकटमोचन वैक्सीन पर जा टिकी हैं. अब तो घरेलू हेल्पर भी पूछने लगी है कि वैक्सीन कब आ रही है? कुछ लोग तो इस भ्रम में ही जी रहे कि ये ऐसी जड़ी-बूटी है कि इधर हमने सेवन किया और उधर हम अमर हुए!  


एक तरफ हमारे वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन बनाने में दिन-रात एक किये हुए हैं, और दूसरी तरफ जनता दिन-रात कुछ और ही तूफ़ानी करने पर आमादा है. जहाँ देखिए मास्क, सैनिटाइज़र, सोशल डिस्टेंसिंग के तमाम नियमों की धज्जियाँ उड़ती दिखाई देती हैं. सबकी लापरवाहियों का नतीज़ा अब इस बीमारी के विस्फ़ोट बन उभरा है. मेरे घर के सामने एक बहुमंज़िली इमारत है. यहाँ की चहल-पहल और हंसने-बालने आवाज़ें ज़िंदगी का खुशनुमा इशारा देती हैं. लेकिन जब पता चलता है कि यहां पौने चार सौ लोग कोरोना पॉजिटिव हैं तो दिल भीतर तक दहल जाता है. हाथ दुआ को उठते हैं कि इन लोगों की मुस्कान सदा सलामत रहे! क्या कोरोना काल में सामान्य जीवन जीना इतना डरावना हो गया है? ऐसे में यह जानना और भी आवश्यक हो जाता है कि हमें कोरोना वायरस की जिस तिलिस्मी वैक्सीन का बेसब्री से इंतजार है. वह हमारे जीवन में कुछ बदल पाएगी भी या नहीं?

वैक्सीन लगते ही आप 'कोरोना प्रूफ़' नहीं होने वाले 

वैक्सीन का काम है बीमारी से बचाव करना, ये उसे ठीक करने की दवाई क़तई नहीं है. यदि आप ये सोच रहे हैं कि वैक्सीन लगते ही आप 'कोरोना प्रूफ़' हो जाएंगे तो आप सौ फ़ीसदी ग़लत हैं! वैक्सीन एक्सपर्ट का कहना है कि "हमारे शरीर में एंटीबॉडीज बनने की प्रक्रिया में न्यूनतम तीन सप्ताह लगते हैं यानी यदि आप आज वैक्सीन लेते हैं तब भी आप पर अगले तीन सप्ताह तक संक्रमण का ख़तरा मँडराता रहेगा! यह संकट इससे अधिक समय के लिए भी हो सकता है". लेकिन जिस तरह का इंतज़ार हो रहा उसे देखकर तो यही लगता है कि लोग मान बैठे हैं कि ये वैक्सीन नहीं बल्कि अमृत जल है जिसे ग्रहण करते ही सारे दुःख मिट जाएंगे. एक सुरक्षा कवच चढ़ जाएगा. जबकि सच इससे उलट है. यदि हम अपनी सुरक्षा स्वयं करना नहीं सीखेंगे तो हमारे लिए वैक्सीन का आना न आना एक बराबर है! 

वैक्सीन से जुड़े किंतु-परन्तु भी समझने होंगे हमें! 

किसी वैक्सीन को बनाने की शुरुआती कोशिश के किसी भी चरण में तीन माह से अधिक ट्रायल कर पाना संभव नहीं है. यही इसका प्रोटोकॉल है, जो कोरोना वैक्सीन के मामले में भी अपनाया गया है. शोध वैज्ञानिक अभी यह भी नहीं बता सकते कि कोरोना वैक्सीन का असर कितने समय तक रहेगा. हो सकता है 6 महीने बाद एंटीबॉडीज बनना बंद हो जाए, और नतीज़ा वही सिफ़र. ये भी संभव है कि आपको जीवन भर कोरोना न हो. पर अभी सारी चर्चा किंतु, परन्तु वाली ही है. वैज्ञानिक ही इस बात को लेकर कहीं-न-कहीं आशंकित हैं तो वैक्सीन बनाने वाली कम्पनीज़ तो कोई गारंटी देने से रहीं. उन्होंने हथियार बना दिया है लेकिन उनके लिए भी इस विषाणु से लड़ना अनजान दुश्मन से लड़ने जैसा है, जिसके अगले वार का कोई अनुमान फिलहाल तो वैज्ञानिकों के पास नहीं है. हार-जीत तो बाद में ही सिद्ध हो सकेगी न! अब क्या ऐसे में वैक्सीन लगने के लम्बे समय बाद तक भी हमें अपनी सुरक्षा पर ध्यान न देना होगा?

लैब की क्षमता और देश की आबादी में जमीन-आसमान का फ़र्क है!

यह भी समझ लीजिए कि चाहे वो स्वदेशी वैक्सीन हो या विदेशी, दोनों को ही हम तक पहुँचने में वक़्त लगेगा! बाहर की वैक्सीन को जिस तरह के रख-रखाव (तापमान वगैरह) की आवश्यकता है उसकी व्यवस्था करने में ही महीनों लग जाएंगे. तब तक शायद हमारी ही तैयार हो जाए. अपने देश में वैक्सीन बनाने वाली तीनों कंपनीज़ को तीसरे चरण में जाने की अनुमति मिल गई है. मान लीजिए, इनमें से किसी की वैक्सीन अगले दो माह में यदि आ भी जाती है तब भी 135 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में आम जनता तक इसको पहुँचने में न्यूनतम 6 माह और लग जाएंगे और ये तो तब होगा जब वैक्सीन का इतना प्रोडक्शन हो सकेगा! हो सकता है इस प्रक्रिया में एक और साल ही लग जाए!

कोरोना वैक्सीन उपलब्ध कराने की राजनीति!

नियम के अनुसार पहले फ्रंट लाइन वर्कर्स, मरीज़ और महत्वपूर्ण व्यक्तियों को यह उपलब्ध होगी. मत भूलिए कि हम जिस देश में रहते हैं वहाँ भूतपूर्व मंत्री, विधायक, सरपंच, छुटभैये नेता, मोहल्ला कमेटी के अध्यक्ष भी अपने-आप को ख़ुदा समझते हैं तो जो वर्तमान में पदासीन हैं उनके रसूख़ का आलम क्या होगा! इन साब लोग के तो घर में जाकर वैक्सीन देना पड़ेगा. फिर इनके चचा, ताऊ, मौसा, फूफ़ा का नंबर लगेगा. वैक्सीन पॉलिटिकस और इसे लेकर बयानबाजी शुरू हो गई है सो अलग! हर बात का राजनीतिकरण कैसे किया जाए, इसके लिए तो हमारे नेताओं को पैसे लेकर आम जनता को क्रैश कोर्स कराना चाहिए. खैर! सरकार को चाहिए कि टीकाकरण की व्यवस्था पर बहुत ध्यान दे क्योंकि जैसे ही वैक्सीन आएगी, तुरंत ही पैसों का खेल शुरू हो जाएगा. और जैसे मंदिर में दर्शनार्थियों की लम्बी क़तार प्रतीक्षा में खड़ी रहती है, वही हाल आम पब्लिक का इधर भी होगा. पैसों के जोर से तथाकथित वी.आई.पी. सीधे मुख्य द्वार पर पहुँच जाएंगे. जनता आश्वासन की चादर ओढ़े, मास्क में मुँह बिसूरती रहेगी. कुल मिलाकर होगा ये कि जब तक वैक्सीन सबको मिलेगी, या मिलने की उम्मीद रहेगी तब तक या तो हममें रोग प्रतिरोधक शक्ति (इम्युनिटी) विकसित हो चुकेगी या फिर हम इससे हार चुके होंगे. 

इम्युनिटी बढ़ाना सबसे अधिक जरुरी है!

कुल मिलाकर बात यह है कि वैक्सीन के आ जाने के बाद भी सब कुछ ऐसा ही रहेगा क्योंकि पूरे देश को इसे मिलने में तीन वर्ष तक भी लग सकते हैं. भूलिए मत, पोलियोमुक्त भारत होने में कितने दशक लगे हैं. तब भी करोड़ों वाहक होंगे इस बीमारी के. हमें उनसे तो बचना होगा न. इसलिए वैक्सीन के इंतजार से कहीं बेहतर है कि हम अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दें. संतुलित भोजन, योगासन, अच्छी नींद और तनावमुक्त जीवन न केवल कोविड से बल्कि कई अन्य बीमारियों से हमें सुरक्षित रखता है. आवश्यक लगे तो अपने डॉक्टर की सलाह से फ़ूड सप्लीमेंट भी लेना शुरू कीजिए. वैक्सीन आ जाए या आपकी इम्युनिटी बढ़ जाए लेकिन फिर भी मास्क हमारे जीवन का हिस्सा रहने ही वाला है. 'हमें कुछ नहीं होगा!', इस भ्रम से जितना जल्दी बाहर निकल सकते हैं निकल आइए. क्योंकि ऐसे लोग ही कैरियर बनकर दूसरे लोगों को संक्रमित कर रहे हैं.

हमारी सुरक्षा, हमें स्वयं ही करनी है. सामने वाला आपकी नहीं सोचेगा. हर बात में सरकार को दोषी ठहराने से भी जान नहीं बचने वाली. वैसे भी सरकार देश चलाए या आपको यही सिखाती रहे कि "टॉयलेट बनवा लो!, साबुन से हाथ धो लो!, घर के अंदर और बाहर स्वच्छता का ध्यान रखो!, सड़क पर कचरा मत फेंको!, सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान न पहुँचाओ!" हमारी अपनी समझ और जिम्मेदारी भी कुछ बनती है या नहीं? देख लीजिए, क्या चुनना है... ख़तरा या सुरक्षा? क्योंकि वैक्सीन के भरोसे अमरत्व पा लेने का ख़्वाब फिलहाल तो पूरा होने से रहा!
- प्रीति 'अज्ञात'
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बुधवार, 4 नवंबर 2020

भई! जरा महिलाओं का दर्द भी समझिए!

"बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी /तेरी नींद उड़े ते उड़ जाए/ कजरा बहकेगा, गजरा महकेगा" ये वाली बात आनंद बक्षी जी ने लिखकर, बताई. लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी ने उस पर शानदार ढुलकिया बजाकर और फिर लता जी ने सुमधुर गाकर भी बताई. उसके बाद मुमताज़ जी ने इस पर ग़ज़ब का नृत्य प्रदर्शन भी किया. और ये बात आज की नहीं, हमारे पैदा होने से भी पहले की है पर जिसे नहीं समझना उसे तो भगवान भी न समझा सके है, जी! अब देखिये इसी चक्कर में एक महाशय थाने की परिक्रमा कर आए. आप लोग भी सावधान रहिये, पत्नी जी को शृंगार करने के मौलिक अधिकार से वंचित करेंगे तो उसकी सजा जरुर मिलेगी. बराबर मिलेगी और वो भी इसी जनम में.

ख़बर आई है कि अपने प्यारे उत्तर प्रदेश में एक महिला ने थाने में अपने पति की शिकायत दर्ज करा दी. अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है? जी, नया ही नहीं बहुत ही क्रांतिकारी हो गया है. कारण यह  कि उसके पति परमेश्वर, उसे उसकी साड़ी से मैचिंग की लिपस्टिक, बिंदी एवं अन्य वस्तुएं नहीं लेने दे रहे थे. है न हद! अब कुछ लोगों का तो इस बात पर ठहाके लगाने का जी कर रहा होगा. पर भिया, हमारा नहीं कर रहा है. रत्ती भर नहीं कर रहा है. बल्कि हमें तो ये लग रहा कि तत्काल जाकर उस महिला की बलैयाँ लें, उसकी नज़र उतारें और मैडम तुसाद में उसकी मूर्ति लगवाकर पूजें उसे! महिला के इस कदम से ये भी पाठ मिलता है कि नारी सशक्तिकरण के नाम पर ज्ञान बाँटने से अच्छा है कि सीधे उसका प्रदर्शन ही कर दिया जाए. वैसे भी थ्योरी तो भाषण और किताबों में धरी रह जानी है. बात का वज़न तो तभी है जब कुछ प्रैक्टिकल हो. बोलो, है कि नहीं! 

अब बताइये जो अपना घर-बार छोड़, बिना ना-नुकुर करे, पूरे भरोसे के साथ अपना जीवन आपके साथ गुज़ारने चली आई, अगर आप उसकी इत्तू सी मांग भी पूरी न करें तो लानत है जी आप पर! घनघोर एवं कड़ी निंदा के पात्र (कु वाले) हैं आप! मुझे तो उन पुलिसवालों पर भी भीषण गुस्सा आ रहा जिन्होंने इस महिला को समझा बुझाकर घर भेज दिया. आख़िर, क्या गलत कहा हमारी बहिन ने? क्यों न सजे सँवरे वो? अरे, दुष्टों! जरा ये तो बताओ कि उसका ये साज-शृंगार किसके लिए है? आई न शरम? उसके माथे की बिंदिया पे तुम्हारा नाम लिखा है, उसके होठों पे जो गुलाबी मुस्कान है वो तुम्हारे ही नाम से खिली है, वो रुनझुन पायल का जो संगीत है न उसमें तुम्हारी याद साथ चलती है और वो लाल-हरी हाथ भर-भर चूड़ियाँ जब खनकती हैं तो वो तुम्हारे ही प्रेम में लजा दोहरी हो रही होती है.

और ज़नाब! आप तो सुबह के निकले संध्या काल में देव दर्शन देते हैं आपके पीछे वो घर-बार ही नहीं सँभालती बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी निभाती है. वो ही है जो आपको इस दुनिया से जोड़े रखती है. चाहे पडोसी के बेटे की शादी हो या कि चाची की बिटिया की गोद भराई; वही बताती है कि कहाँ, क्या देना है. आपका जन्मदिन हो या बच्चों का, वो पूरे साल प्लान करती है. अरे, कोई गिनाने की बात थोड़े न है, आप भी जानते हो कि कई बार तो आपको अपने ही बच्चों की क्लास के सेक्शन भी न पता होते! तो भाईसाब! वो तो सब करे लेकिन जो उसका मौलिक अधिकार है, वो आप उसे न दें! अच्छा! बहुत सही जा रहे हो! अजी, भगवान के लिए तनिक आप भी लजा लिया करो! आज करवा-चौथ पर कितने अरमानों से उसने हाथों में मेहंदी रचाई होगी, सोलह शृंगार कर दुल्हन-सी सजी होगी, दिन भर भूखी-प्यासी रहेगी कि उसके पिया की उम्र लम्बी हो और दोनों का साथ जन्म-जन्मांतर का रहे. और एक आप हैं! न जी, मैचिंग के सामान की तो कोई जरुरत ही ना है!

पुरुषों का तो क्या है! काला, नीला और भूरा..इन तीन रंगों की पेंट में ही ज़िंदगी निकाल लेते हैं. इसी के लाइट शेड की शर्ट या टी-शर्ट ले ली. चलो, ब्लू जींस और जोड़ दो! उनका तो पता भी न लगता कि ये नई है कि बीस साल पुरानी. एक ही तरह के दिखेंगे. सावन हरे न भादों सूखे! अरे, हम स्त्रियों के जीवन में कई समस्याएं हैं. हमें कपड़े डिसाइड करने में ही इतनी माथा-पच्ची करनी होती है. एक तो रिपीट नहीं कर सकते! उस पर ट्रेंडी भी दिखना है, फ़िगर भी चकाचक लगे. अब बड़ी मुश्किल से ये जो ड्रेस फाइनल करी है उसके साथ अटैचमेंट भी तो लगते हैं न! अगर गलती से भी लास्ट मोमेंट उसने दूसरी ड्रेस पहनने की सोच ली तो आप तो न, बस चकरघिन्नी बन मार्केट ही दौड़ते फिरोगे. सराहो अपने भाग्य को कि ऐसी सलीक़ेदार पत्नी मिली है. और ये तो भोली महिला थी जो बस चूड़ी, बिंदी और लिपस्टिक तक ही कहकर रह गई. नेक समझदार होती तो इसमें पर्स, सैंडिल, ताजा ज्वेलरी और जाने क्या-क्या जोड़ देती. फिर तो केस ही पलट जाता, उल्टा आप ही उस पर मानसिक उत्पीड़न का केस दर्ज़ करा रहे होते! तो सौ बात की एक बात ये है जी कि स्त्री है तो सजेगी-सँवरेगी ही, आपकी तरह नहीं कि मुँह उठाया और चल दिए.  
- प्रीति 'अज्ञात'

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