गुरुवार, 9 जनवरी 2014

ज़िंदगी....कब ज़िओगे !


"ज़िंदगी"! एक खुशनुमा शब्द 
    जिसके नाम से ही,जीने का 
 एहसास हो जाता है ! 
    उल्लास का,खुशी का, लुत्फ़ उठाने का 
 नाम ही तो ......"ज़िंदगी" ! 
    लेकिन...वो क्या था....?? 
 जब मैने, जीते हुओ को भी 
    घुट-घुटकर मरते देखा था.. 
 कहीं "ज़िंदगी"......................... 
    "मौत की शुरुआत" तो नहीं???? 

कई बरस पहले लिखी मेरी ये पंक्तियाँ, आज भी कितनी प्रासंगिक लगती हैं ! कितने ही लोग हैं,जो रोज़ सुबह एक सपने के साथ जागते हैं; और सूर्यास्त होने तक अपने उस नन्हे सपने के साथ उदासीन से नींद की गोद में समा जाते हैं. अगली सुबह फिर वही रोना....! जी तो रहे हैं, पर जी नहीं पा रहे ! सब इस "जी" का ही खेल है ,जी ! लग जाए, तो भी मुश्किल और ना लगे तो और भी ! बहरहाल, यहाँ हम काम के सन्दर्भ में "जी" का इस्तेमाल कर रहे हैं ! आपने, कुछ और ही समझा था ना !! चलेगा, होता है !!! 

अपना काम ज़िम्मेदारी से निभाना तो बहुत ही अच्छी बात है, पर उसमें डूबकर अपने आसपास की दुनिया की तरफ जो नज़र भी उठाकर नहीं देख पाए, तो ये जीना भी क्या जीना !! पैसा कमाना ही ज़िंदगी का एकमात्र उद्देश्य रह गया दिखता है. हर वक़्त, हर इंसान के दिलो-दिमाग़ पर बस यही धुन सवार है...पैसा,पैसा,पैसा.... 

ग़रीब होना ज़्यादा अच्छा! उन्हें सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी की ही चिंता होती है. मिल गई; तो बड़े ही चैन की नींद सो जाते हैं. उन्हें सोने के लिए नींद की गोलियों का सहारा नहीं लेना पड़ता. ना ही बैंक-बैलेंस की चिंता!  जीने के लिए चाहिए ही क्या ? खाना,एक घर, बीमारी में लगाने को कुछ पैसे और चलो घूमने के लिए एक गाड़ी भी !मेरे लिए तो एक कार का होना ही बहुत है, काम ही क्या है उस कार का;आपको सर्दी, गर्मी, बारिश के प्रकोप से बचाना! अब वो मारुति हो या फ़ेरारी क्या फ़र्क पड़ता है! अंततः है तो वही चार पहिए वाला आवागमन का साधन! यहाँ मेरा इरादा किसी ब्रांड का अपमान करना नहीं, सिर्फ़ व्यक़्तिगत राय है! तरह-तरह के फोन आ गये हैं मार्केट में. कुछ फल के नाम लगते हैं और कुछ दवाई से ! ब्लेकबेरी और टेबलेट. ये भी कोई नाम हुए! अब सच में ही 'दुनिया अपनी ज़ेब में' आ गई है. पर समझ नहीं आता,कि ये वाकई ज़िंदगी की ज़रूरतें हैं...या कि यूँ ही बस चाहिए! 

परिवार और दोस्तों से हम तब भी जुड़े थे, शायद और बेहतर तरीके से जुड़े थे; जब इन तथाकथित उत्पादों का जन्म भी नहीं हुआ था. पत्र के इंतज़ार में दस-बारह दिन आसानी से काट लिया करते थे और अब अगर दस मिनिट में मेसेज का जवाब नहीं आए, तो लोगों के ब्रेक-अप हो जाया करते हैं. मेसेज भी क्या हैं, टुकड़े हैं..समझ आ जाए तो किस्मत है जी. इसीलिए रिश्ते भी 'एस एम एस' बन गये हैं. मेरी भाषा में 'सब मुरझाए से' ! 

लीजिए...फिर विषय से भटक गये. बात पैसे कमाने की थी...तो मेरा तो यही मानना है. कोई भी हो सब आटे की ही बनी रोटी खाते हैं, किसी के में भी सोने-चाँदी का पाउडर नहीं लगता. फिर दिन-रात की मारामारी क्यूँ? तनाव में क्यूँ जीना? फ़िक्र किस बात की? होड़ किससे से है? चैन से जियो, खुशियाँ बाँटो! सोचो ज़रा..क्या मतलब ऐसे जीने का..जिसमें वक़्त ही नहीं,किसी से बात करने का, पलटकर देखने का, खुशी के पल साथ बिताने का, यूँ ही बेवजह मुस्कुराने का! क्यूँ हम सभी सिर्फ़ पैसा कमाने में मस्त हैं, और आज अपनों तक पहुँचने की सारी लाइनें व्यस्त हैं........!!

साथ ना जाएगा तेरे, कुछ भी
ज़मीन,ज़ायदाद या झूठी शान. 
जीकर भी क्या जिए वो 
जो बन ही ना सके,'इंसान' ! 

दिलों में रह जाएँगीं, बस 
यादें ही होकर, अमर. 
और खाली पड़ा रहेगा,ये 
टूटा,खंडहर सा मकान !  

राज करेंगें वो ,तुम्हारी ही 
मेहनत की भूमि पर.
जिनके लिए, ता-उम्र तुम 
देते रहे हर इम्तिहान ! 

क्या फ़र्क रहा,फिर तुझमें 
और उस ग़रीब में ? 
अंत में,तेरे हिस्से भी तो 
वही राख और वही शमशान..!

प्रीति'अज्ञात' 

छोटी-छोटी खुशियाँ......

             
रात से ही आसमान में कुछ अज़ीब सा समाँ है. काले घने फैले बादल उम्मीद जता रहे हैं, कि आज तो हम बरस ही जाएँगे. बारिश का इंतज़ार तो सभी को रहता है, हाँ..सबकी वज़ह अलग-अलग हो सकती हैं.किसान को फ़सल की चिंता सताती है,आम जनता को महँगाई की फिक्र,सरकार को सड़क पर भरे गड्ढों की पोल खुल जाने की, किसी को उस खुशबू की...जो कि पानी की बूँदों के मिट्टी पर गिरते ही सारे वातावरण को  एक सुगंध से सराबोर कर देती है. पर सबसे ज़्यादा भोली और निर्दोष इच्छा होती है...उस बच्चे की, जो पूरी रात बार-बार खिड़की से बाहर झाँककर ये देखा करता है,कि "कहीं बारिश रुक तो नही गई!". उसे तो अपनी 'रेनी-डे' की छुट्टी से मतलब होता है, बाकी दुनिया की सोचने की उम्र अभी नहीं हुई उसकी !! 
 
 बरसात से जुड़ी कितनी ही यादें है,हम सबकी! कितने ही खूबसूरत पल थे वो, जब हम काग़ज़ की नाव चलाया करते थे. यूँ तो आज भी वही हाल हैं,पानी निकास के.....पर तब पानी कुछ ज़्यादा ही भर जाया करता था. माँ के लाख मना करने के बावज़ूद भी कोई ना कोई बहाने से खिसक लिया करते थे. चेहरे की चमक देखते ही बनती थी, जब हमारी नाव शान से आगे बढ़ती थी,और पड़ोसी के बच्चे की नाव का काग़ज़ गल जाया करता था. कैसी शान से कहा करते थे.."तू ना, अगली बार से थोड़े मोटे काग़ज़ की बनाना..फिर अच्छा रहेगा"! एक गर्व भरी मुस्कान भी बारिश की बूँदों की तरह चेहरे से टपक जाया करती थी.

चप्पलें कीचड़ में फँस जाया करती थी. कभी उस टूटी चप्पल को हाथ में लेकर आते थे या कभी पैरों से घसीटकर! पर लक्ष्य तक तो ले ही आते थे. माँ की डाँट सुनते और बेशरम से खी-खी करके हँसते! पता जो रहता था कि, अभी गरमा-गरम पकोडे ये माँ ही बनाके खिलाएँगी. अपने माता-पिता की क़ीमत का एहसास अक़सर एक उम्र के बाद ही हुआ करता है! जिसे जितना जल्दी समझ आए, बेहतर!! 
 
स्कूल से लौटते समय दिल तो करता था कि उस एक छाते में पूरी क्लास को ही छुपा लें, पर चिंता सबको अपने बॅग की होती थी. ऐसा कुछ नहीं...वो तो इसलिए कि दोबारा ना लिखना पड़े! वैसे उन दिनों ये भी आराम था...लाइट चली जाया करती थी, और हम बेचारे मज़बूरी में नहीं पढ़ पाते थे !ही-ही-ही.... 
 एक फ़र्क ज़रूर आया है, तब और अब में...उस समय चाहे कितनी भी गंदगी या कीचड़ होती थी..तो भी उसमें आराम से यूँ चले जाया करते थे, गोया फूलों के बाग़ में धँस के जा रहे हों. 'लुक' की इतनी परवाह नहीं हुआ करती थी,उन दिनों! 
लीजिए, इस बीच बारिश शुरू भी हो गई...पर अब हमारी चिंताएँ कुछ अलग हैं....
 
जब से नहीं तुम,घर है सूना 
आँखों से है,मेघ बरसता! 
काश! अब आ जाओ फिर से 
घर हमारा है, तरसता!!
 
खो गये तुम हो कहाँ, 
संदेश भी आता नहीं! 
ढूँढा किए, हर घर में तुझको  
क्यूँ खबर,भिजवाता नहीं!!
               
यूँ तो पहले भी,था तुमने 
कई बार ऐसा ही किया! 
पर लौट के आए थे,जब तो 
झूम गया था,ये हिया!!
 
बहुत हुआ,अब आ भी जाओ 
दीवारों को कुछ दो दिलासा! 
कह दो ना, कल दर्शन दोगे 
हे! हमारे काम वाले काका!!
 
दूर रेडियो पर भी हमारी भावनाओं को सहारा देता हुआ, गीत बज रहा है.... 
"आएगा, आएगा,आएगा,आएगा......आने वाला...आएगा..आएगा" ये रेडियो सिटी को भी हमारे मूड की खूब ख़बर रहती है, सोचते हुए हम उठ खड़े हुए......!
 
प्रीति'अज्ञात'

कैसे बनें करोड़पति !

मुआ, जब से ये 'के.बी.सी.' चालू हुआ है. ना दिन में चैन है..ना रातों को आराम! बचपन से यही तो सपना देखते आ रहे हैं,अमिताभ जी से मिलने का! जब भी दूसरे शहर में जाते,तो यही सोचा करते.."अमित जी को कैसे पता चलेगा,कि हम यहाँ हैं"! वो तो बचपन का पागलपन था,पर अफ़सोस कि अब तक जारी है! 

जब के.बी.सी. का पहला सीज़न शुरू हुआ,तो बड़े ही उत्साहित थे हम! बड़े फोन लगाए, कुछ नहीं हुआ! चुपचाप, उदास से बैठे कार्यक्रम देखा करते और हर प्रश्न पर यही सोचते कि "कितना आसान है,मैं तो सब जीत के ही आती"(घर बैठे देखने में ये बड़ा सुख है..ना घड़ियाल जी,ना टिक-टिकी और ना ही सूईं-मुई का झंझट,बच्चों पर भी अच्छा इंप्रेशन पड़ता है)! 
 खैर! दूसरे सीज़न में भी ट्राइ किया,और क्या कहें जी.."नंबर लग गया"! हमने तो शॉपिंग लिस्ट भी बना डाली, और सबके तॉहफ़ों की भी! तीन दिन में फोन का इंतज़ार करने को कहा गया..कसम ख़ुदा की,हमने घर के बाहर एक कदम तक ना रखा!! क्या पता, कब अमित जी का फोन आ जाए?? हम ना मिलें,तो उन्हें कितना बुरा लगेगा ना, भैया पैसे की बात नहीं हैं; पर किसी का दिल नहीं दुखना चाहिए!! खैर, दिल हमारा ही टूटा! 
 
तीसरे सीज़न में जब यार -दोस्तों ने कहा,"यार, तू ट्राइ क्यों नहीं करती"! तो ऊपर-ऊपर तो हम हँस के बोल दिए,"अरे,कहाँ यार;औरों को जीतने का चान्स देना चाहिए"!(पर अंदर ही अंदर दिल बिलख रहा था,"कैसे बताएँ,कि उंगलियाँ टेढ़ी हो गईं,नज़रें  पथरा गईं,इक फोन के वास्ते") उसके बाद के सीज़न में मन को बहलाया कि.."तेरी क़िस्मत में तो मेहनत का ही फल नहीं,ऐसे सपने ना देख बच्चे"! ये हम यूँ ही नहीं कह रहे, एक बार ही ईनाम मिला है,किसी ढक्कन के नीचे! आप सोच सकते हैं ,कि बस एक बार 'बोरोलीन' मिली थी! आज तक नहीं समझ पाए 'ये ईनाम था,या जख्म लेकर इस्तेमाल करने का सुझाव'! बड़ी हैरत हुई,..हमें! 
 
हां,तो मुद्दा के.बी.सी. था,इस बार हमने जाने का ट्राइ ही नहीं किया! हां,घर बैठे लखपति बनने या जॅकपॉट जीतने का प्रस्ताव हो ;तो हमें कोई आपत्ति नहीं! इसी उम्मीद में चार रुपये का मेसेज किए जा रहे हैं, हिसाब लगाया;ज़्यादा नुकसान नहीं है. एक पिज़्ज़ा नहीं खाएँगे,और क्या!! 
 
अगर ग़लती से किसी की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो तो,क्षमा चाहते हैं! एक निवेदन ज़रूर है 'अमित जी' से..सर आप इसका नाम 'कैसे बनें करोड़पति' रख दीजिए,के.बी.सी. तो फिर भी रहेगा! हमें थोड़ी तसल्ली मिल जाएगी कि आप तक हमारी  आवाज़ तो पहुँची!ओके. दोस्तों, अगली बार तक के लिए..शुक्रिया,आदाब ,खुदाहाफ़िज़,सत श्री अकाल,शब्बा खैर,शुभ रात्रि.... 

प्रीति'अज्ञात' @ :)))))))