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रविवार, 13 जनवरी 2019

#विश्व_पुस्तक_मेला

लेखकों की दुनिया में 'विश्व पुस्तक मेला' एक बहुत बड़ा आयोजन माना जाता है. लेखक, प्रकाशक, पाठक तीनों से यदि एक साथ मुलाक़ात करनी हो तो इससे बेहतर कोई स्थान नहीं! पुस्तकों के विमोचन और प्रचार-प्रसार के साथ अलग-अलग शहरों में रहने वाले मित्रों से एक साथ मिल पाना भी यही संभव है. इसी कारण इस मेले को लेकर ख़ासा उत्साह बना रहता है. सोशल मीडिया पर भी 9-10 दिनों तक इसकी ख़ूब धूम मची रहती है.

लेकिन दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए पुस्तक मेले में जाना बिटिया के ब्याह जैसा है. पहले तो सभी उपलब्ध शुभ तिथियों में से एक को चुनकर दिवस सुनिश्चित किया जाता है. उसके बाद जान-पहचान वालों, दूर-पास के रिश्तेदार, मित्र आदि को इसकी पूर्व सूचना दे दी जाती है. तत्पश्चात विविध प्रसंगों और मौसम के हिसाब से वस्त्रों का चयन होता है. महिलाओं को ब्यूटी पार्लर जाना पड़ता है तो पुरुष भी युवाओं की श्रेणी में पिछले 50 वर्षों से अपना स्थान पक्का करते हुए इस बार भी स्लेटी बालों को काले में बदलने हेतु गार्नियर men का डिब्बा चुपके से ख़रीद लाते हैं. सेलेब्रिटी लुक को प्राथमिकता देने के बाद अब कुछ लोगों को इस बात की परेशानी से भी दो-चार होना पड़ता है कि गोष्ठी में ऐसा क्या धांसू पढ़ें कि श्रोताओं की आँखों से आँसू बहने लगें.

जुगाड़-तंत्र और अव्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी पोस्टों से पाठकों का सीना छलनी कर उन्हें भावुकता के सागर में डुबोने वाले साहित्यकार तय रचनाओं के अतिरिक्त अपनी 8 अन्य रचनाएँ उन गोष्ठियों के लिए बैकअप में रखते हैं जहाँ बिन बुलाये बेधड़क घुसा जा सकता है. उपहारस्वरुप देने के लिए अपनी उन पुस्तकों का Gift wrap बना गट्ठर तैयार कर लिया जाता है जिनके प्रकाशक महोदय इस बार stall लगाने की भारी-भरकम राशि देने में असमर्थ रहे. ये ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई बड़ा-बूढ़ा अस्वस्थता के कारण ब्याह में न जाने पर लिफ़ाफ़ा भिजवा दिया करता है.

इन सारी तैयारियों के बाद घटनास्थल से सीधा प्रसारण प्रारंभ होता है. प्रथम चरण में रेलवे स्टेशन या एअरपोर्ट के विहंगम दृश्य के साथ कुछ पंक्तियाँ नज़र आती हैं जिन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ तक आने के लिए इस इंसान ने जिन भीषण कठिनाइयों का सामना किया, उतना तो देश को आज़ाद कराते वक़्त हमारे परमपूज्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी नहीं हुआ होगा. सहानुभूति और प्रेम की ठंडी छाँव से भरी प्रतिक्रियाएँ यह सुनिश्चित कर पाने में सफ़ल होती हैं कि कौन-कौन उससे दिल से मिलना चाहता है और कौन बच निकलना!
द्वितीय चरण में ट्रेन की बर्थ पर बैठ खाने के फोटो, मोबाइल बैटरी के ख़त्म होने के मार्मिक किस्से, टैक्सी इत्यादि बातों पर सार्थक चर्चा होती है. कभी-कभी विषयांतर हेतु बाथरूम की ख़स्ता हालत पर अफ़सोस और रेलवे का निंदा रस भी चलता है.
इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हौले-हौले अब ये नाजुक क़दम तृतीय चरण की ओर बढ़ते हैं और अंततः वह घड़ी आ ही जाती है जहाँ चेहरे पर हीरो-हीरोइन की माफ़िक मुस्कान धारण करते हुए गेट नंबर 7 से प्रवेश करना होता है. अरे हाँ, उससे पहले मुख्य द्वार पर लगे पुस्तक मेले के होर्डिंग के साथ चित्र खिंचाना भी प्रोटोकॉल में आता है. शादी के venue पर पहुँचकर फोटुआ नहीं खिंचाते क्या, बुड़बक?

चतुर्थ चरण में नेत्र और नेट के द्वारा संपर्क किया जाता है और एक-एक कर उन सभी के गले लग प्रसन्नता का वह भाव जागृत होता है जैसा कि अपने चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहिन को देखकर उत्पन्न होता आया है. वही हँसी, ठहाके और पीठ पर धौल जमाकर  मस्ताना कि बाक़ी लोग भी पलटकर देखने लगें. 
उसके बाद वह अमृत पेय मँगाया जाता है जो इस बंधन को सदा के लिए जोड़ देता है. जी हाँ, चाय चाय चाय.
तत्पश्चात एक stall से दूसरे stall पर फुदकने, पुस्तकें ख़रीदने, विमोचने, बड़े-छोटे, ऊँचे-नीचे सभी प्रकार के मनुष्यों के साथ सेल्फियाने का सुन्दरतम दौर चलता है.
अंतिम चरण में भारी मन और ख़ाली जेब के साथ पुस्तकों के थैले को घसीटते हुए बस पर चढ़ाने का समय आ जाता है और नम आँखों से हॉल नंबर 12-A को विदाई दी जाती है. वैसे यहाँ ये स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेले में इसके अलावा भी कई हॉल हैं पर चूँकि वहाँ के अपडेट नहीं दिखते तो उन्हें गिना ही नहीं जाता. जैसे घर के छोटे सदस्य भी तो शादी के समय कितनी दौड़भाग करते हैं पर मंच पर दूल्हा-दुल्हिन को निहारते, प्रशंसा करते लोगों के बीच उनका यह योगदान वीरगति को प्राप्त होता है.
और हाँ, जो टिकट कराने के बाद भी जा नहीं पाता...उसकी हालत उस इंसान की तरह होती है जिसकी सगाई होने के कुछ ही दिन बाद रिश्ता टूट गया हो. और वो अपने दुःख से दुखी होने की बजाय इस सदमे से इसलिए नहीं उबर पाता कि लोग क्या कहेंगे!
- प्रीति 'अज्ञात'
#विश्व_पुस्तक_मेला

https://www.ichowk.in/humour/world-book-fair-2019-how-people-prepare-himself-for-the-gala-event-popular-among-literature-love-known-as-book-fair/story/1/13641.html

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

इस 'एंग्री यंग मेन' ने हँसाया भी ख़ूब है!


सदी के महानायक, बॉलीवुड के शहंशाह और सभी सिनेप्रेमियों के आदर्श एंग्री यंग मेन, अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्त्व में इतने चमकदार पहलू हैं कि एक साथ उनकी चर्चा कर पाना संभव ही नहीं! यह तो हम सभी जानते हैं कि चाहे जंजीर, शोले, दीवार, कालिया, मर्द, डॉन, शहंशाह जैसी फिल्मों का एक्शन हीरो हो; या कि सिलसिला, कभी-कभी, मुक़द्दर का सिकंदर के गंभीर प्रेमी की भूमिका; आनंद का संज़ीदा बाबू मोशाय, माँ और परिवार के लिए मर मिटने वाला खुद्दार इंसान हो या फिर लीक से हटकर अक्स, मैं आज़ाद हूँ, अग्निपथ, पीकू, सरकार, 102 नॉट आउट, पिंक, चीनी कम जैसी फ़िल्मों को अपनी शानदार अभिव्यक्ति से यादगार बना देने वाला कलाकार; अमिताभ हर रंग में खरे उतरे हैं. बात इनकी कॉमिक टाइमिंग की हो या भावुक संवेदनशील दृश्यों की; ये अपने हर चरित्र में भीतर तक जान फूँक देते हैं. अमिताभ संभवतः वह अकेले कलाकार होंगे जिसकी प्रशंसक एक ही घर की तीनों पीढ़ियाँ हैं. मात्र फ़िल्में ही नहीं बल्कि टीवी और विज्ञापनों की दुनिया में भी वे नंबर वन हैं.
हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं पर अमित जी की ऐसी पकड़ है कि अच्छे-अच्छे भी उनके सामने पानी भरते नज़र आते हैं. मेहनत, लगन और अनुशासन से अपने जीवन को कैसे सफ़ल और सार्थक बनाया जा सकता है, यह बात कोई अमिताभ से सीखे!

बॉलीवुड के इस चहेते 'एंग्री यंग मेन' ने अपनी कॉमेडी फिल्मों के माध्यम से भी न केवल बॉक्स-ऑफिस पर ही धूम मचाई बल्कि अपने प्रशंसकों का भरपूर मनोरंजन कर ख़ूब वाहवाही भी लूटी है. कुछ दृश्य तो इतने गहरे उतर चुके हैं कि 30-40 वर्षों बाद भी किसी चलचित्र की भांति चलते हैं. इनका एक-एक डायलॉग आज भी लोगों को जुबानी याद है.

'सत्ते पे सत्ता' में तरबूज के जमीन पर गिरकर फटने के साथ ही अमिताभ के दिल के बिखरने वाला दृश्य हो, हेमा मालिनी को कैलेंडर के हिसाब से फ़ेमिली का  परिचय कराने वाला या फिर बुक्का फाड़कर यह गाना 'प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया'...इस फ़िल्म का हर एक दृश्य और गीत यादगार बन गया था. 
उन दिनों हर बच्चा 'चैन खुली की मैन खुली की चैन' कहकर अपनी 
लड़ाई का उद्घोष करता था. 
इसी फ़िल्म में जब अमिताभ (रवि); अमज़द खान के सामने 'दारु पीता नहीं अपुन, मालूम है क्यूँ? शराब पीने से लीवर ख़राब हो जाता है. इधर (ज्ञान बांटते हुए लीवर की पोजीशन दिखाते हैं). उस दिन क्या अपुन एक दोस्त की शादी में गया था'....इस संवाद को दसियों बार कुछ इस अंदाज़ में दोहराते हैं कि हर बार दर्शक और जोरों से ताली पीटने पर मज़बूर हो गया था.

'नमक हलाल' भी ऐसी कई मजेदार दृश्यों की साक्षी रही है. एक तो वो जब वे अर्जुन सिंह के चरित्र में अपने मालिक शशिकपूर की चाय में मक्खी गिरने से बचाते हैं (यहाँ वे दरअसल उनके होटल को धोखेबाजों के हाथों बिकने से बचाना चाहते हैं). और दूसरा ये जिसने सबको अंग्रेज़ी में बात करने का कॉन्फिडेंस (ओवर ही सही) दिया. याद कीजिये, "अरे, बाबूजी ऐसी इंग्लिस आवे है देट आई कैन लीव अंग्रेज़ बिहाइंड. यू शी सर, आई कैन टॉक इंग्लिश, आई कैन वॉक इंग्लिश, आई कैन लाफ इंग्लिश बिकॉज इंग्लिश इज ए वेरी फनी लैंग्वेज. भैरों बिकम्स बैरो बिकॉज देयर माइंड्स आर वेरी नैरो. इन द ईयर 1929 सर व्हेन इण्डिया वाज़ प्लेयिंग अगेंस्ट ऑस्ट्रेलिया इन मेलबोर्न सिटी....." उसके बाद उन्होंने जो कमेन्ट्री सुनाई है उसने लोगों को हँसा- हँसाकर पागल कर दिया था. बात यहीं नहीं रुकी, उसके बाद वे पूरी मासूमियत से रंजीत से पूछते भी हैं कि "मेरे इस सामान्य ज्ञान पर आप कुछ विशेष टिप्पणी करेंगे?"

शोले में यद्यपि उनकी भूमिका गंभीरता ओढ़े हुए थी लेकिन जब वे बसन्ती की नॉन-स्टॉप बकबक के साथ उसके ये कहने पर कि "यूँ कि आपने हमारा नाम तो पूछा ही नहीं!"...बड़ी सादगी और शांत भाव की मुद्रा अपनाते हुए जब उससे पूछते हैं " तुम्हारा नाम क्या है, बसन्ती?" या फिर बसन्ती के लिए वीरू का रिश्ता जब मौसी के पास लेकर जाते हैं और पूरा सत्यानाश करने के बाद भोलेपन से कहते हैं "क्‍या करूं, मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है, मौसी!" तो दर्शक यकायक खिलखिला उठते हैं. उस पर वीरू का टंकी पर चढ़ चक्की पीसिंग एंड पीसिंग का ड्रामा चलता है तो वे आराम से टाँगें फैलाकर बैठे रहते हैं और बड़ी अदा से कहते हैं, "घड़ी-घड़ी ड्रामा करता है, नौटंकी साला!" दर्शक उसी पल इनके दीवाने हो गए थे.

'खुद्दार' में अपने भाई का ड्रामा देखने जाते हैं वहाँ उनका अपनी टाँगों को एडजस्ट करना और फिर अंग्रेजी न समझने के कारण दूसरों के  हिसाब से हँसना, इतना ही नहीं भाई को पिटते देख स्टेज पर चढ़ सब मटियामेट कर डालना भी क्लासिक बन पड़ा है. इसमें उन्होंने अपनी 
टैक्सी के साथ भी बहुत गुदगुदाते दृश्य दिए हैं.

'जलवा' में अतिथि भूमिका में होते हुए भी अपना जलवा दिखा गए थे. याद है न जब सतीश कौशिक जी गप्प हाँकते हैं कि वो अमिताभ बच्चन को जानते हैं, उसी समय उनका पीछे से आकर वो ज़बरदस्त अभिनय करना!
बड़े मियां छोटे मियां में गोविंदा के साथ तो ऐसी शानदार ट्युनिंग  बैठी कि दोनों ने डबल रोल में ऐसा डबल धमाल किया कि दर्शक भी हँस-हँस दोहरे हो गए. "डाकू मोहरसिंह को किसने पकड़ा?" और माधुरी दीक्षित से ब्याह रचाने का ख्व़ाब जोरदार बन गया था.

चुपके-चुपके में जया जी को बॉटनी पढ़ाते हुए जब वे उदाहरण सहित व्याख्या करते हैं कि "गोभी का फूल, फूल होकर भी फूल नहीं, सब्‍जी है। इसी तरह गेंदे का फूल, फूल होकर भी फूल नहीं है." कोरोला और करेला को मिलाकर उन्होंने जो स्वाद बनाया था, उसके चटखारे आज तक लिए जाते हैं.

कहीं मूँछों का ज़िक्र हो और शराबी में मुकरी साब के साथ अमिताभ के इस संवाद की बात न हो, यह तो हो ही नहीं सकता! "भाई मूँछे हों तो नत्थूलाल जी जैसी हों वरना न हों. बड़प्पन उसका, जिसकी मूँछें बड़ी हों! हमारा तो कोई पन नहीं, देखिये सफाचट"
इसी फिल्म में जब अपने चमचों के साथ विकी (अमिताभ) घटिया शायरी "जिगर का दर्द ऊपर से कहीं मालूम होता है, जिगर का दर्द ऊपर से नहीं मालूम होता है" सुना रहा होता है तो उसी समय उसे मुंशी जी (ओमप्रकाश) से जो लताड़ पड़ती है उसका असर आज भी कई आशिक़ों की अधूरी ग़ज़लों में नज़र आता है. बेबस और जबरन बने शायर आज भी अमित की इस बात से जूझते हैं कि "बस यही तो बात है मुंशी जी, ये कमबख्त वज़न कहाँ से लायें? रदीफ़ पकड़ते हैं तो काफ़िया तंग पड़ जाता है, काफ़िये को ढील देते हैं, वज़न गिर पड़ता है, ये वज़न मिलता कहाँ है?"

कुली में मूर्ति बनकर रति अग्निहोत्री के सामने खड़े होना और फिर "लो हम जिंदा हो गए" कहते हुए छाता उछाल कूद पड़ना तथा योग और आमलेट की मिक्सिंग का दृश्य भी कम लुभावना नहीं था. 
 'याराना' का "कच्चा पापड़, पक्का पापड़" आज भी tongue twister के उदाहरण में पेश किया जाता है.

अब आपकी आँखों में भी न जाने कितने नाम तैर रहे होंगे जो इस सूची में आने से रह गए. बॉम्बे टू गोवा, मि. नटवरलाल, नसीब, दोस्ताना, कभी ख़ुशी कभी ग़म, मोहब्बतें, कभी अलविदा न कहना, खून पसीना, परवरिश, हेराफ़ेरी....ये लिस्ट थमेगी नहीं!

"एइसा तो आदमी लाइफ में दोइच टाइम भागता है, ओलंपिक का रेस हो या पुलिस का केस हो" (अमर अकबर एंथोनी)
आपकी कर्मठता यूँ ही बनी रहे और प्रेरणा देती रहे.
जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएँ अमित जी!
- प्रीति 'अज्ञात'
#KBC #अमिताभ बच्चन #ज्ञान का दसवाँ अध्याय #कौन_बनेगा_करोड़पति # जन्मदिवस_11_अक्टूबर #BIG_B #ichowk

इसे आप इंडिया टुडे ग्रुप के ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म, ichowk पर भी पढ़ सकते हैं -
https://www.ichowk.in/cinema/celebrating-amitabh-bachchan-birthday-remembering-his-iconic-comedy-roles/story/1/12716.html

गुरुवार, 24 मई 2018

पापी, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!

सचमुच हद हो जाती है जब टीवी चैनल्स समाचार को यह कहकर उसमें सनसनाहट भरने की कोशिश करते हैं कि "रमज़ान के महीने में भी पाक़िस्तान ने की फ़ायरिंग!!" मतलब आपकी उम्मीदों की दाद देनी पड़ेगी कि आप दुश्मन देश से भी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने की अपेक्षा रखते हैं!

पता नहीं, किस मिट्टी के बने हैं हम लोग! पर ये तो तय है कि हम महामूर्ख अवश्य हैं. तभी तो अपनी शांतिप्रियता दिखाते हुए सीना तान कह डालते हैं कि "पवित्र महीने में नहीं होगी फ़ायरिंग" और एन उसी वक़्त दुश्मन देश का गोला हमारे देश वासियों पर क़हर बन टूट पड़ता है. पुरानी कहावत है "Everything is fair in love & war". दुनिया भर के प्रेमियों को तो यह बात तुरंत ही समझ आ गई थी अब हम सब भी समझ जाएँ तो बेहतर! यूँ भी जब बात देश की आन से जुड़ी हो तो सीधे वार करना ही बनता है. समय आ गया है कि पाकिस्तान को उसकी हर हरक़त का मुँहतोड़ जवाब दिया जाए. आख़िर कितने दशक तक हम शांति का राग अलापते रहेंगे? हार या जीत के बीच की जो लाइन होती है न, अब उसे छू, आर या पार जाने का वक़्त आ गया है साहब. 

अब रही बात त्योहारों की...तो भई जरा हिसाब लगाकर बताइये कि ऐसी कौन सी दीपावली है जिसमें अपराधियों ने किसी के घर का चिराग़ न बुझाया हो! ऐसी कौन सी ईद है जहाँ मित्रता और मोहब्बत के नाम छुरा न घोंपा गया हो! ऐसी कौन सी राखी है जहाँ किसी भाई ने ही अपनी बहिन की हत्या न की हो! ऐसा कौन सा करवा-चौथ है जहाँ किसी सुहागन का सुहाग न उजाड़ा गया हो! और ऐसा कौन सा महिला/ मातृ दिवस है जहाँ स्त्री की अस्मिता तार-तार न हुई हो! जी हाँ, ये मैं अपने ही देश की बात कर रही हूँ. जब हम अपनों को ही नहीं सुधार पा रहे तो किसी और से ऐसी उम्मीद रखना कितना बचकाना है!

इसलिए अब हमें अपनी समस्त इन्द्रियों को सचेत कर, अपने मस्तिष्क में सदैव के लिए यह बात गुदवा लेनी चाहिए कि चाहे पाक़िस्तान हो या कोई भी दुश्मन देश.....अपराधियों के इरादे कभी पाक़ नहीं होते! उनका कोई धर्म/ मज़हब नहीं होता! उन्हें बस गोलियों की आवाज़ ही रास आती है, वही चलाते हैं और एक दिन वही ख़ुद भी खाते हैं. इन्हें सिर्फ़ ज़हर फैलाने का मोह है और कुछ भी नहीं! जिस इंसान ने अपने-आप से मोह छोड़ दिया, जिसे अपनों की कोई परवाह नहीं, जिसकी रग़ों में नफ़रत लहू बनकर दौड़ती है, वह कुछ भी कभी भी, कहीं भी कर सकता है! पापी इंसान, व्रतों के हिसाब से कैलेंडर देखकर पाप नहीं करता!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk, #Terrorist
https://www.ichowk.in/society/expecting-pakistan-to-respect-ceasefire-during-ramadan-is-hopeless/story/1/11067.html

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

मोमबत्तियों की उजास क्या इस स्याह अँधेरे को रोशन कर पाएगी?

निर्भया,आयलान, आसिफ़ा और इन जैसे तमाम मासूम, निर्दोषों की दर्दनाक चीखें यहाँ की आबोहवा में बस गई हैं. स्वयं को दोषी ठहराती हवाएँ भारी शर्मिंदगी और गुस्से से गर्म हैं. सूरज की आँखें लाल हो दहक रही हैं. ये प्रकृति, ये हरे-भरे वृक्ष भी मुँह झुकाए, उदास चुपचाप खड़े हैं. कुछ डालियों ने सहमकर, नन्ही कोपलों को आहिस्ता से भीतर खींच लिया है और पल्लवित होने को बेताब कलियाँ स्वत: ही सूखकर इस माटी की गोदी में समा गई हैं. पहाड़ निःशब्द, स्तब्ध हैं और आसमां समंदर में अपना मुँह छुपाए बिलख-बिलख भीग रहा है. पक्षियों की चहचहाहट में अपने मनुष्य न हो पाने का उल्लास है या कि कुछ न कर पाने की बेबसी, स्पष्टत: कह नहीं सकती पर पशुओं को अब स्वयं के सभ्य होने का पूरा यक़ीन हो चला है.

मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा! वह धर्म और राजनीति की आड़ में अपनी हवस को बुझाने का रास्ता ढूँढ ही निकालता है. दानवी तर्क़, राजनीति को न्यायसंगत और लुभावने लगते हैं क्योंकि तिरंगे का स्थान दो अलग-अलग रंगों ने ले लिया है. साहस, बलिदान, सम्पन्नता और हरियाली से भरे इन दोनों रंगों ने मिलकर एकता के प्रतीक हमारे प्रिय राष्ट्रध्वज की ख़ूबसूरती को नष्ट कर एक स्याह काला रंग ओढ़ा दिया है, जिसमें घृणा है, ईर्ष्या है, द्वेष है. अब देश इन्हीं दो रंगों की पिचकारियों से ख़ून और बदले की होली खेलने लगा है. एक श्वेत रंग जो शांति का प्रतीक हुआ करता था, अब भी छटपटा रहा है. दशकों से उसकी पताका दूर-दूर तक भी देखने को नहीं मिल सकी है और अब यह केवल पुस्तकों, तस्वीरों, नम आँखों में छुपी दुआओं और सहमी, भयभीत चुप्पियों में नज़र आता है! अथाह वेदना से भरा हर ह्रदय यही कह रहा है कि बस! अब बस भी करो! अब और सुनने, देखने की शक्ति शेष नहीं रही! नींद, अब ख़्वाब हो गई है। बेचैनी, घबराहट और दुःख से उपजा अवसाद लीलने को आतुर है.

मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अँधेरे को रोशन कर पाएगी? ये पोस्टर, ये नारे, ये क्रांति क्या सुन्न हुए मस्तिष्कों पर अपना असर छोड़ पाएँगे? क्या हर अपराध के बाद प्रजा को राजा से यूँ ही न्याय की गुहार लगानी होगी? क्या प्रजा की प्रसन्नता और सम्पन्नता, राजा और उसके दरबारियों का उत्तरदायित्व नहीं? न्याय तंत्र का काम न्याय करना है या उसकी पुकार करते लोगों की प्रतीक्षा करना?...कि आप चीखें, तो हम सुनने का प्रयास करें?

इधर गलियारों में राजनीति की तरीदार, महक़ती हांडी चढ़ चुकी है, संवेदनाओं की मीठी खीर अक्षयपात्र से गिरने को है. मौक़े की गरमागरम क़रारी रोटियाँ दोनों तरफ से सेकी जा रहीं हैं. शब्द, नमक की तरह सुविधानुसार हैं. आओ, स्वाद लें इस शुद्धिकरण भोज का! महकते गुलाबी कागज़ों में लिपटे सांत्वना के फूल भी बस आते ही होंगे!

मानवता आज भी किसी जीवित लाश की तरह बेसुध, औंधे मुँह उदास  पड़ी है!
हो सके, तो इसे अपने-अपने घरों में ज़िंदा रखें कि आने वाली पीढ़ियों को मनुष्यता गाली न लगे!
- प्रीति 'अज्ञात'
## iChowk में प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/society/candle-light-march-for-gang-rapes-are-worthless/story/1/10557.html