गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

#भारतीय रेल: तुम आओ कि इस जीवन का क़ारोबार चले! #lockdownstories12



यहाँ अहमदाबाद में गुजरात इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का जो ऑफिस है वहाँ तक पहुँचने से पहले एक रेलवे फाटक बीच में पड़ता है. बीते वर्ष मुझे दस-पंद्रह बार वहाँ जाना पड़ा (वो अलग कहानी है) तो जब भी जाती, कई बार ऐसा हुआ कि गेट बंद मिला और कुछ मिनटों की प्रतीक्षा करनी पड़ी. ये प्रतीक्षा इंसान को हमेशा ही खलती आई है, मैं भी इसका अपवाद नहीं थी. बैठे-बैठे भुनभुनाती मानो उन पाँच मिनटों में जैसे मैं न्यूटन के गति वाले तीनों फॉर्मूलों को ख़ारिज़ कर नई व्युत्पत्ति ही कर देती! लेकिन यक़ीन मानिये ट्रेन के आते ही मैं यह सब भूल चहकने लगती. हर बार ही झटपट मोबाइल निकाल रंगीन चमचमाती बोगी के फोटो खींचती और फिर प्रसन्न हृदय से जाकर काम निबटा आती.  


ट्रेन से न जाने यह कैसा लगाव है जो प्लेन की बीसियों यात्राओं के बाद भी छूटता ही नहीं! ट्रेन की खिड़की से सर को टिकाये मैं झांकती हूँ अतीत की बंद खिड़कियों से. ट्रेन से जब-जब भी यात्रा करती हूँ तो सफ़र का अधिकांश हिस्सा साथ दौड़ते वृक्षों, खेतों, उसमें काम करते लोगों और बादलों की विविध आकृतियों को निहारते हुए ही निकल जाता है. वही खेत-खलिहान, कुछ कच्चे मकान, सदियों पुराने उन्हीं विज्ञापनों से रंगी हुई दीवारें उन घरों की ईंटों की दरारों को ढांपने की नाकाम कोशिश आज भी उतनी ही शिद्दत से कर रहीं हैं. ट्रेन की गति जीवन की तरह ही तो है, सब कुछ पीछे छूटता जा रहा, जैसे हाथ छुड़ाकर भाग रहा हो कोई. ये नीम-हक़ीम के नाम आज भी नहीं बदले, इतने ज्यादा हैं कि दौड़ती हुई ट्रेन के साथ भी इन्हें आसानी से पढ़ा जा सकता है. शायद याद ही हो गए हैं.

कई बार देखती हूँ कि क्रॉसिंग पर रुके अधीर लोग अब भी माथे पर वही शिकन लिए खड़े हैं. लगता है इनकी फ़िक्र इनके साथ ही जाएगी. काँच की खिड़की से बाहर झांकते समय, कूदते नन्हे बच्चों का चिल्ला-चिल्लाकर टाटा बोलना भी बड़ा मनोहारी लगता है. यूँ वातानुकूलित खिड़कियों से अक़्सर ही बाहर की आवाजें टकराकर वहीं ढेर हो जाती हैं पर उनके मासूम चेहरे का उल्लास मेरी इस धारणा को बेहद संतुष्टि देता है कि अभिव्यक्ति को सदैव शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, वो तो चेहरे और आंखों से भी ख़ूब बयां होती है. ये बचपन "बाय-बाय, फिर मिलेंगे" कुछ इस अंदाज़ से कहता है कि पूरा यक़ीन हो जाता है, दुनिया जीवित है अभी. एक मुस्कान चेहरे पर तैरने लगती है, मैं भी जोरों से हाथ हिलाकर अपने इस आश्वासन को पुख़्ता करती आई हूँ.
बहुत बार यूँ भी हुआ कि ठुड्डी को हाथों पे धरे हुए ही रास्ता कटता गया और बीते जीवन के पृष्ठ फड़फड़ाते रहे. यात्रा आपको केवल गंतव्य तक ही नहीं पहुंचाती, बीच राह बहुधा खुद को खुद से मिलाते हुए एकालाप भी करती है.

ये बातें, ये पल न बस में संभव हैं और न प्लेन में!

ट्रेन हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है. आम नागरिक का जीवन सँवारा है इसने. अपनों को अपनों से मिलाया है इसने, गर्मियों की हर छुट्टी में बच्चों का हाथ थाम ननिहाल, ददिहाल तक छोड़कर आई है ये ट्रेन. ये ट्रेन ही है जो स्कूल में आखिरी परीक्षा के दिन हमारे सपनों का इंजन बन साथ चली थी. इसकी बर्थों पर चढ़ते-उतरते सैकड़ों बच्चों की उमंगें यहीं से परवान चढ़ी थीं. हमारी छुट्टियों की सच्ची साथी बनती आई है ये ट्रेन.  

याद नहीं पड़ता कि स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक ये कभी भी रुकी हो! आज इतना याद कर जरूर शर्मिदा हो रही हूँ कि लेट होने पर मैंनें इसे कई बार कोसा है पर मुझे मेरे अपनों तक पहुँचाने के लिए धन्यवाद कभी नहीं दिया! कितनी ही बातें 'taken for granted' रह जाती हैं. है, न!
मेरी प्रिय भारतीय रेल, भले तब ही आना जब समय अनुकूल हो पर आना अवश्य! तुम्हारी छुकछुक प्रेमिका के पायलों की रुनझुन है, प्रेमी के दिल की बढ़ती धड़कन है. तुम आओ कि बच्चों को तुम्हारी प्रतीक्षा है. तुम आओ कि घर को संभालती नई बहू अब कुछ दिनों के लिए बाबुल के आँगन लौट जाना चाहती है और कोई माँ कहीं उदास है, तुम आओ कि दो जोड़ी वृद्ध आँखों की चमक लौट आए, तुम आओ कि इस जीवन का क़ारोबार चले!
तुम्हें शुक्रिया! 
#lockdownstories12 #indianrailway  

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

Hydroxychloroquine क्या कोरोना वायरस की रामबाण दवा है? #LockdownStories11


कोरोना वायरस के इलाज (Coronavirus treatment) के तौर पर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (Hydroxychloroquine) से सम्बंधित कई भ्रामक ख़बरें इन दिनों पढ़ने में आ रहीं हैं. खासतौर पर तब सेे, जब से डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात को सार्वजनिक किया कि इस दवा के इस्तेमाल से कोरोना वायरस का संक्रमण ठीक हो रहा है. आमतौर पर मलेरिया और कुछ अन्य बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इस दवा की डिमांड ऐेसी बढ़ी कि दुनिया में इसकी कालाबाजारी शुरू हो गई. हाल ही में इस दवा से जुड़ी खबर में भारत तब शामिल होे गया, जब भारत ने दवा के निर्यात पर अपनी घरेलू जरूरतों को देखते हुए प्रतिबंध लगा दिया. और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से इस दवा की आपूर्ति को लेकर सख्त लहजे में गुहार लगाई. ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारत से इस दवा की सप्लाई लेने के लिए बेहद दिलचस्प संदेश भेजा है.हनुमानत जयंती के मौके का फायदा उठाते हुए ब्राजील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को संजीवनी की संज्ञा दे रहे हैं. 

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के इस तरह चर्चा में आने से कई सवाल भी खड़े हो गए हैं. क्या ये दवा वाकई कोरोना वायरस का इलाज है? इस दवा की सप्लाई के लिए दुनिया भारत के पीछे क्यों पड़ी है? भारत में कितनी खपत है इसकी? सच्चाई को समझने के लिए यह आवश्यक है कि आप इन तथ्यों को अच्छे से जान लें.

यह क्या है?
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, मुख्य रूप से मलेरिया की दवाई है जो कि डॉक्टर की सलाह पर आर्थराइटिस, lupus वगैरह के लिए भी दी जाती है.

क्या यह Covid-19 को बेअसर करती है?
इस तथ्य को अभी साइंटिफिक रूप से प्रामाणिकता नहीं मिली है और न ही इसके किसी भी तरह के कंट्रोल्ड ट्रायल की पुष्टि हुई है. हाँ, In-Vitro research (लैब टेस्ट ) में एंटी वायरल एक्टिविटी अवश्य मिली है. लेकिन मनुष्यों पर इसके प्रभाव का कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है.
फ़्रांस में की गई एक छोटी सी ट्रायल में जो मरीज़ ठीक हुए हैं वह महज़ एक संयोग हो सकता है. लेकिन वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिकता न होने के कारण मेडिसिन से जुड़े लोगों द्वारा यह ट्रीटमेंट के लिए मान्य नहीं है.

क्या इसे कोरोना पॉजिटिव न होने पर भी बचाव (prevention) के तौर पर लिया जा सकता है?
क़तई नहीं! जब तक डॉक्टर इसे prescribe न करे!  
यदि किसी वजह से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन आपके घर में पहले से ही है तब भी नहीं लेना है. क्योंकि इसके साइड इफ़ेक्ट ख़तरनाक भी हो सकते हैं. जिनमें सडन कार्डियक फेलियर तथा रेयर केसेस में टोटल हियरिंग लॉस और विज़न लॉस रिपोर्टेड हैं. यदि आप पहले से कोई एंटीबायोटिक या डायबिटीज की दवाई वगैरह ले रहे हैं तब तो यह रिस्क और भी बढ़ जाती है.

डॉक्टर की सलाह के बिना लेने पर मृत्यु भी हो सकती है?
हाल ही में आसाम के एक डॉक्टर की मृत्यु इसी कारण रिपोर्ट की गई है. अमेरिका से भी एक जोड़े के क्लोरोक्वीन फॉस्फेट लेने के बाद बुरी ख़बर सामने आई है जिसमें पति की मृत्यु हो गई और पत्नी जीवन से संघर्ष कर रही है. मलेरिया और इसकी डोज़ अलग हो सकती है और किसी को भी इसकी सही डोज़ का अनुमान नहीं है तो स्वयं लेकर अपनी जान ख़तरे में मत डालिए.

क्या केमिस्ट शॉप पर ये टेबलेट गायब हो गई हैं? क्यों?
जी, ऐसा सुनने में आया है कि सुरक्षा कारणों से सरकार द्वारा लगभग 70 लाख की हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाइयाँ उठा ली गई हैं क्योंकि हमारी आम जनता, अपना डॉक्टर ख़ुद बनने के मूड में अधिक रहती है उस पर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से रोज निकलते डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. कोई बिना असल डॉक्टरी सलाह के ये न ले ले और बाद में उसकी तबीयत न बिगड़ जाए! इस बात को ध्यान में रखते हुए जनता के भले के लिए ही यह दवाई मार्केट से गायब है परन्तु आवश्यकता पड़ने पर यह हर मरीज़ को अवश्य उपलब्ध कराई जाएगी.

क्या सारी दवाइयाँ पहले अमेरिका को दी जायेंगीं?
देश के नागरिक पहली प्राथमिकता हैं. 10 करोड़ की दवाइयाँ पहले भारत के लिए ही हैं. जिसे कई फार्मास्यूटिकल कंपनीज़ बना रही हैं. इनमें से कुछ कम्पनीज़ द्वारा ये दवाइयाँ मुफ़्त देने की घोषणा भी हुई है. ये सभी सरकारी अस्पतालों और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं के लिए दी जायेंगीं. सुरक्षा के लिहाज़ से ये लोकल केमिस्ट पर नहीं मिलेंगीं.

चूंकि भारत हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टेबलेट का ग्लोबली सबसे बड़ा सप्लायर है इसलिए न केवल आर्थिक बल्कि मानवता के आधार पर भी हमारा फ़र्ज़ बनता है कि इस वैश्विक महामारी से पीड़ित अन्य देशों की मदद करें. यह हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान भी है.

जब इससे ट्रीटमेंट का कोई पुख्ता प्रमाण ही नहीं, तब इसकी क्या आवश्यकता?
अभी तक covid 19 ट्रीटमेंट की कोई दवा नहीं बनी है. रिसर्च साइंटिस्ट इसकी खोज में लगे हैं. जो ख़बरें वैक्सीन बनने की आ रहीं हैं वे अभी ट्रायल स्टेज में हैं.
जो भी थोड़े बहुत संकेत मिले हैं वह इसी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टेबलेट से मिले हैं. हो सकता है कि जल्द ही ICMR कोई गाइड लाइन्स निकाले कि यह किस पेशेंट को कब और किन परिस्थितियों में दी जानी हैं.
शायद जब हर तरफ़ से हार का भय होगा तब ही उम्मीद की अंतिम किरण के रूप में इसे देखा जाएगा. आख़िर इसी उम्मीद पर ही तो दुनिया क़ायम है!
स्वस्थ रहें और अपना पूरा ख्याल रखें.
- प्रीति अज्ञात

https://www.ichowk.in/society/what-is-hydroxychloroquine-hcq-drug-for-coronavirus-treatment-all-you-need-to-know-by-faq/story/1/17296.html


सोमवार, 6 अप्रैल 2020

कोरोना वायरस से समझौता वार्ता

हम अभी लॉन में बैठे हुए गिलहरी, तितलियों से उनकी मुस्कराहट और सुंदरता का राज़ बस पूछ ही रहे थे कि दरवाजे पर आहट सी हुई. इस समय कौन हो सकता है! सोचकर ही धुकधुकी होने लगी. फिर मन को कड़ा करके गेट तक पहुँचे. सुरक्षा के सारे मन्त्रों का नौ बार जाप करते हुए झाँका तो एक बॉलनुमा पर नुकीली संरचना नज़र आई. पहली नज़र में पहला प्यार तो नहीं हुआ पर चेहरा जाना-पहचाना सा लगा. ओह्ह! अरे! अच्छा! ये तो वही प्लास्टिक वाली पिंगपोंग बॉल है जिस पर आलपिन में गुलाबी मोती फँसाकर एक जमाने में हमने शो पीस बनाया था. 

अरे यार! तुम अब तक भीष्म पितामह टाइप कंटीली शैया पर ही हो! निकाल काहे नहीं लिए रे ये काँटे? आओ, हम निकाल दें. लड़ियाते हुए हमने मुखारविंद से उच्चारित किया. बस ट्वीज़र लेकर उसकी तरफ़ भावुक हृदय संग हाथ बढ़ाया ही था कि तभी मुझे उस बॉल चेहरे में दो क्रूर, कुटिल आँखें चमकती नज़र आईं. मुँह से OMG कहकर चीखना चाहा ही था कि तब तक गिल्लू और तितली मुझे घसीटकर अंदर ले आये और लगे डपटने, "कितनी बार कहा है आपको, लक्ष्मण रेखा नहीं क्रॉस करनी! मतलब नहीं करनी! जनता की तरह बिहेव मत करो!" 
"बहुत दिनों से मनुष्य नहीं देखा, बस इसलिए नैक निकल आये थे." हमने रिरियाते हुए सफ़ाई दी.

गला खरखराने लगा था कि पीछे फिर आहट आई और हमने भयभीत मन से गुनगुनाया, "जरा सी खांसी भी आ जाये तो दिल सोचता है....कहीं ये वो तो नहीं, हाआय कहीं ये वो तो नहीं!" 
"अरे! आंटी जी, जे वोई है", तितली ने कर्णपटल में घुसते हुए चीत्कार भरी. अब हमको तो घिघियावस्था को प्राप्त होना था सो पलटने की बजाय जम्प मारकर ठीक एक मीटर आगे पहुँच गए, फिर तनाव से मुक्ति हेतु अपने-आप से रोमांटिक अंदाज़ में दोनों बाँहे फैलाते हुए कहा, "पलट"
पर वो पिंगोलू जी तो कमर पर हाथ रखकर खड़े थे. हमने हाथ जोड़कर डिस्टेंस मेंटेन करते हुए कहा, "पिरनाम, कोरोना जी. वर्ल्ड टूर पे निकले हो का! जेट लेग हो जायेगा, जाओ अपने घर यू पिंग पोंग पिंग!"
"काहे जाएँ, सुना है बड़ा चर्चा है तोहार देस का? अतिथि देवो भवः हूँऊऊ ! यही कहत रहीं न सबसे?" वो गब्बर सिंह अंदाज़ में बोला. 
"जी, वो तो अब भी कहते हैं. तब ही तो आपको नमस्ते किये और सारी दुनिया को भी सिखा दिए हैं. आपके आने की जब चिट्ठी मिली तो पूरे देश में नगाड़ा पिटवा दिया था जी. कुछ लोग तो ग़ज़ब का परफॉरमेंस भी दिए थे. टीवी पे तो देखा होगा न हमार जलवा? अब का जान दे दें तोहार ख़ातिर?"

"देखा टीवी भी और तुम सबकी हरक़तें भी! जो ये सब तुम दुनिया वाले इतने वर्षों से प्रकृति भगिनी से छेड़छाड़ करते आ रहे हो न! इसकी सजा तुम्हें मिलेगी, बराबर मिलेगी." वह साक्षात् क्रोध की हार्ड कॉपी था.
"अब क्या बोलें! हमने तो आपका नमक भी नहीं खाया है." हम एक मीटर जमीन की तरफ झुकते हुए सकुचाते सॉफ्ट मोड में बोले. 
"खाने की जरुरत ही क्या है? बस हाइजीन मेंटेन मत करो. ईश्वर की तरह मैं भी कण-कण में व्याप्त हूँ." उसके इतना कहते ही बेचारी गिल्लू ने घबराकर मुँह में घुसा दाना बाहर उगल दिया. 

समझौता वार्ता अभी चालू थी. हमने कोरोना जी को वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए विनम्र भाव से कहा कि "भई माफ़ कर दीजिए. मनुष्य को अपनी भूल का अहसास हो चुका है. अब गुस्सा थूक भी दीजिये."
"थूकना मत! थूकना मत!" तितली पूरी ताक़त से चिल्लाकर दो बार बोली.
"देखा! तुम इंसानों से अधिक समझदारी तो इन जीव-जंतुओं में है." कोरोना जी ने अकड़कर कहा.
"जी, सो तो है! हमारे तो कुत्ते और गाय भी दो दफ़े दायें-बायें देखकर ही सड़क क्रॉस करते हैं." हम खींसे निपोरते हुए चहकने लगे.

अब हम दोनों थोड़ा घुलमिल से गए थे तो इनफॉर्मल होकर हमने उन्हें इन्फॉर्म किया, "थोड़ा ग्रॉसरी की परेशानी है और डेयरी पर दर्शन जैसी भीड़ देखकर दूध नहीं ला पाये थे, वरना चाय तो.....!"
"नहीं, नहीं बहिन जी! इट्स ओके." अबकी बार वो विनम्र था.
"अच्छा, ये बताइये कि आप जहाँ जाते हैं वहाँ रायते सा फ़ैल क्यों जाते हैं?"
"देखिये, पहली बात तो ये कि मैं आग्रह और आमंत्रण के बाद ही आता हूँ. फैलना नहीं चाहता पर आप सभी देशों का अहंकार, आत्ममुग्धता और ओवर कॉन्फिडेंस ही आपको ले डूबता है. आप प्रकृति की इज़्ज़त करना सीख जाइये, हमारी प्रजाति भी आपकी इज़्ज़त करने लगेगी. पहले अनुज स्वाइन फ्लू को दूत बनाकर भेजा था, उसको लतिया तो दिया आप सबने...पर अपने-आप को कब लतियायेंगे? कब सुधरेंगे?" वो आग-बबूला हो उठा.

"क्षमा कीजिए, प्रभु! पर आपका लुक देखकर पूछने का मन हो गया कि क्या आप भी पितामह की तरह अपनी मृत्यु का तरीक़ा साझा करना चाहेंगे?" हमने उसके गुस्से को इग्नोर मारते हुए निवेदन किया. 
"कूल डूड हूँ, सो बस ज्यादा गर्मी नहीं बर्दाश्त होती. घमोरियां निकल आती हैं." वह भोलेपन से बोला. 
"और कोई जानकारी?"
"जी मैं आपकी प्रजाति की तरह भेदभाव नहीं करता! सभी को समभाव से देखता हूँ, सेक्युलर हूँ. बड़े-बड़ों के मुग़ालते दूर करना मेरा प्रिय शग़ल है." उसने आँख मिचमिचाते हुए कहा.
"अच्छा, तो आप यायावर हैं?"
"पथिक ही समझिये."
"जी, लेकिन आपके ठसके और नख़रे देख ऐसा बिल्कुल नहीं लगता! आप आस्तीन के साँप हैं जो कुछ दिन बाद समझ में आते हैं. लेकिन आपको हमारी विशाल संस्कृति की शक्ति का रत्ती भर भी अनुमान नहीं! हम अकेले नहीं, करोड़ों एक साथ हैं. आपको टॉर्च देकर थोड़ा आगे का रास्ता तो समझा ही दिया है. अब आप सीधा निकल्लो जी!जाइये और अपने होम टाउन में वानप्रस्थ गुजारिये. तब तक आपको ट्रीट देने के लिए हम भी वैक्सीन की तैयारी करते हैं और देश को इस वार्ता की झलक सूत्रों के हवाले से देकर आते हैं." कहकर हम अदब से उठ खड़े हुए.

देखा, तो मुंडी नीचे कर, पाँव घसीटता हुआ कोरोना वायरस जाकर नंन्हे श्वान पुत्रों से भिड़ रहा था, "क्यों बे! झूठ बोल रहे थे न! इन्होने तो हमें टमाटर खिलाया ही नहीं!"
वो कुछ जवाब दे पाते तब तक उनके पिताजी अपने गुट के साथ दौड़ते हुए आये जिन्हें देखते ही कोरोना सरपट भाग खड़ा हुआ.
मैं मन ही मन धन्य महसूस कर रही थी कि हमारे पास हर चीज़ का तोड़ है. अजी, हम बेजोड़ हैं!
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories9

रविवार, 5 अप्रैल 2020

हम 98 प्रतिशत वाले समूह में ही आते हैं

चीन से शुरू होकर Covid-19 ने जब यूरोप में पाँव पसारने प्रारम्भ कर दिए थे तब देशवासियों ने इसे इतनी गंभीरता से नहीं लिया था. जब 22 मार्च के लॉकडाउन की घोषणा हुई तब कहीं जाकर लोगों को वस्तुस्थिति का सही अनुमान हुआ. उसके बाद जैसे-जैसे कोरोना  पीड़ितों की संख्या में वृद्धि होती गई, सबके चेहरों पर भय के बादल मँडराने लगे. एक ऐसी बीमारी जो संक्रामक है और जिसकी मृत्यु दर 2 या 3 फ़ीसदी ही है; उसने अपने ही लोगों के बीच लक्ष्मण रेखा खींच दी है. यह एक ऐसी विवश स्थिति है जिसका दर्द हर कोई महसूस कर रहा है. 

विश्व भर से ऐसी तमाम तस्वीरें और वीडियो आ रहे हैं जिसमें डॉक्टर, नर्स, पुलिस एवं कई आवश्यक विभागों से जुड़े लोग अपने ही परिवारों के सदस्यों से मिल नहीं पा रहे. किसी में पिता नम और लाचार आँखों से घर के दरवाजे पर खड़ा हो बच्चों को निहार भर सकता है लेकिन यह बीमारी उसे आगे बढ़कर बच्चों को गले लगाने की इज़ाज़त नहीं देती! इससे मनहूस पल किसी व्यक्ति के जीवन में और क्या हो सकता है! उसके बाद अगली ख़बर मिलती है कि दो मासूम बच्चों की माँ जो हॉस्पिटल में संभावित मरीज़ के तौर भर्ती हुई थी, कभी लौट ही न सकी. अंतिम समय में किसी से भी न मिल पाई बस वाकी-टॉकी पर अपने लाड़लों की आख़िरी बार आवाज ही सुनी उसने और दुनिया को अलविदा कह दिया! यह मार्मिक कहानी पत्थर दिल को भी तोड़कर रख दे. 

यह इस बीमारी की क्रूरता ही है कि आज जो मनुष्य हँस-बोल रहा है, फ़्लू जैसे symptoms होते ही वह 'संदिग्ध' की श्रेणी में आ जाता है और एक ही पल में उसे समाज से अलग होना पड़ता है. मैं फिर याद दिला रही हूँ कि 98% मरीज़ बच जाते हैं लेकिन वे अभागे जो 2% में आते हैं कभी घर नहीं लौट पाते! संक्रमण के भय से उनकी लाश तक नहीं दी जा सकती!
मृत्यु का भय, मनुष्य को जीते-जी मार देता है और मुसीबत की घड़ी में वह स्वयं के लिए सबसे बुरा ही सोचता है.कुछ क्षेत्रों से संभावित संक्रमित लोगों का भागना इसी ओर इंगित करता है कि वे ये मानकर ही चल रहे हैं कि बचेंगे नहीं और इसीलिए अपने घरवालों के साथ ही रहना चाहते हैं. एक-दो स्थानों पर मरीज़ भाग गए या किसी ने कूदकर आत्महत्या कर ली. बहुतों ने सच भी छुपाया. लेकिन ये सब बीमारी से बचने के उपाय नहीं हैं. अपना मेडिकल टेस्ट कराना और उचित समय पर इलाज़ ही इसे महामारी के रूप में फैलने से बचा सकता है. अधिकांश केसेस में तो बीमारी निकलेगी ही नहीं और आपको शीघ्र ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा. 

समाज को भी चाहिए कि वे रोगी के प्रति पूरी सद्भावना एवं  संवेदनशीलता बरते तथा अपना व्यवहार सकारात्मक रख उसे जीवन के प्रति आशावान बनाये.कौन जाने कल किसका नंबर लग जाए! इसीलिए सबसे प्रेम से पेश आयें, उन सभी लोगों को धन्यवाद दें जिन्होंने मुश्क़िल घड़ी में आपका साथ दिया. उन सभी को माफ़ कर दें जिन्होंने आपका दिल दुखाया हो कभी. यह समय हमारी मानवता को जीवित रखने का है, उस अहसास का है कि एक अदृश्य वायरस भी हमारे अस्तित्व को अनायास ही बौना कर देता है, यह उस चिंतन और मनन का भी समय है कि हमारे जीने का उद्देश्य क्या है और एक नागरिक के रूप में हम देश और समाज को क्या दे सकते हैं! यह Covid-19 के प्रति जागरूक और स्वयं के लिए सचेत रहने का भी समय है. इसके लिए आवश्यक है कि हम आवश्यकतानुसार  मास्क पहनें, स्वच्छता सम्बन्धी सारे नियमों का आज और भविष्य में भी पालन कर अपनी इम्युनिटी बढ़ायें, और इस विश्वास को भी क़ायम रखें कि हम 98 प्रतिशत वाले समूह में ही आते हैं. 

एक श्लोक पढ़ा था कहीं -
प्रार्थयामहे भव शतायु: ईश्वर सदा त्वाम् च रक्षतु
पुण्य कर्मणा कीर्तिमार्जय जीवनम् तव भवतु सार्थकम् 
(ईश्वर सदैव आपकी रक्षा करे, आप समाजोपयोगी कार्यों से यश प्राप्त करें,आपका जीवन सबके लिए कल्याणकारी हो, हम सभी आपके लिए यही प्रार्थना करते हैं).
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories8 

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

ओल्ड इज़ गोल्ड

इन दिनों चैनल्स नए एपिसोड्स की शूटिंग न हो पाने के कारण जैसे-तैसे एडजस्ट कर रहे हैं. इसी अवसर का सुनहरा लाभ लेते हुए दूरदर्शन ने अपने पॉपुलर, ब्लॉकबस्टर सीरियल्स का पुनर्प्रसारण प्रारम्भ कर दिया है. दशकों बाद लोग दूरदर्शन की ओर लौट रहे हैं और बाक़ी प्राइवेट चैनल्स खाली हाथ होने के कारण टी.आर.पी खोते जा रहे हैं क्योंकि उनके पास टक्कर देने के लिए कुछ है ही नहीं! जो सीरियल्स सुपर हिट हुए भी, वे इतने नए हैं कि तुरंत ही कोई उनका रिपीट टेलीकास्ट नहीं देखना चाहता. दर्शकों को एक गैप तो चाहिए ही न भूलने के लिए! यद्यपि चैनल्स के पास उन्हें ही दिखाते रहने के अलावा फ़िलहाल और कोई विकल्प भी नहीं है.

इधर रामायण, महाभारत जैसे धारावाहिक पुनः प्रसारित कर दूरदर्शन अपनी खोई हुई साख़ को फिर से प्राप्त कर रहा है. दर्शक बीते दिनों को याद कर भाव-विभोर हो रहे हैं. कर्फ्यू पहले से ही लगा है. आना-जाना हो नहीं सकता! इसलिए जो घरों में हैं वे कोरोना वायरस को भूल इन धारावाहिकों संग छुट्टियों का आनंद लेने में मगन हैं. ऐसे में लग रहा है कि ये लॉकडाउन दूरदर्शन के लिए वरदान सिद्ध हुआ है और उसके सुनहरे दिन लौट आये हैं. वो कहते हैं न, 'ओल्ड इज़ गोल्ड'.  
एक समय था, जब रामायण और महाभारत के समय देश में कर्फ्यू-सा माहौल हो जाता था. यह भी एक संयोग ही है कि अब लॉकडाउन के दिनों में भी सड़कें वैसी ही सूनी हैं.

प्रसार भारती ने हर वर्ग के दर्शकों को प्रसन्न रखने की पूरी तैयारी कर ली है. बच्चों के लिए सुपरहीरो 'शक्तिमान' है तो युवाओं के लिए अजीज़ मिर्ज़ा-कुंदन शाह निर्देशित 'सर्कस' आकर्षण का केंद्र हो सकता है जिसमें वे अपने प्रिय हीरो शाहरुख़ ख़ान के शुरूआती अभिनय की झलक देख सकेंगे. इसमें अभिनेत्री रेणुका शाहाणे और आज के निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने भी उनका साथ दिया था.
'श्रीमान श्रीमती', हास्य के कलेवर से जड़े वैवाहिक जीवन के हसीन किस्से दिखा रहा है तो वहीं उन दिनों के रोमांस को समझने के लिए 'बुनियाद' से बेहतर कुछ नहीं. मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित और रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित यह धारावाहिक विभाजन की पृष्ठभूमि और संयुक्त परिवार पर आधारित था. इसने टीवी की दुनिया में सफ़लता के नए आयाम स्थापित किये थे. कहानी के मुख्य पात्र हवेलीराम और लाजो जी का चेहरा आज भी दर्शकों के ज़हन में बसा हुआ है. 'देख भाई देख', कॉमेडी की भरपूर डोज़ लेकर हाज़िर हुआ है तो बुद्धिजीवी 'चाणक्य' के लिए समय निकाल सकते हैं. इतने सबके बाद भी दर्शकों की फ़रमाइशें बढ़ती ही जा रही हैं.

तक़नीक़ एवं गुणवत्ता की दृष्टि से तब और अब के समय में काफ़ी अंतर आ चुका है इसलिए संभव है कि वर्तमान पीढ़ी को यह सब थोड़ा बचकाना और आउटडेटेड लगे लेकिन अच्छा है इस बहाने उस समय के हेयर स्टाइल, चश्मे के फ्रेम, कपड़े, डायलॉग डिलीवरी और परिवारों के जीने के अंदाज़ को भी जान-समझ पायेंगे. 
वे नागरिक जो इस समय घर पर हैं और पुरानी दिनचर्या से अभी दूर हैं, उनके लिए यही एक अवसर है इस नॉस्टाल्जिया में लौटने का. 
उम्मीद है, लॉकडाउन हट जाने के बाद भी दर्शकों का यह प्रेम यथावत रहेगा और दूरदर्शन अपनी पुरानी बुलंदियों को पुनः प्राप्त करेगा. 
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories7 
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

यह मानव जाति को बचाने का समय है, घटनाओं के हिन्दू-मुस्लिमीकरण का नहीं!

अफ़सोस होता है कि जब हमें किसी अदृश्य शक्ति (वायरस) के विरुद्ध एकजुट हो खड़े होने की आवश्यकता है तब भी हमने परस्पर आरोप-प्रत्यारोप का दामन थाम रखा है और महासंकट के इस दौर में कई मुद्दों पर हम एक-दूसरे के विपक्ष में विष वमन करते नज़र आते हैं. हमारी भारतीयता क्या थाली पीटने या तालियाँ मार सीटी बजाने तक ही सीमित है? देशहित के लिए जब उत्तरदायित्व के निर्वहन की बात आती है तब हम इतने संवेदनहीन क्यों हो जाते हैं?

सब जानते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने 22 मार्च शाम पांच बजे का जो समय दिया था वह समय उत्सव मनाने का नहीं बल्कि उन सेवाकर्मियो को धन्यवाद देने का था जिन्होंने मुश्किल की इस घड़ी में देश का साथ दिया. इसमें हमारे परिवार के वे लोग शामिल थे जो अभी भी हम सबकी रक्षा और अन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए अपने कर्तव्य पालन में जुटे हुए हैं.
यह समय यह दिखाने का भी था कि #coronavirus से सुरक्षा के लिए और इसके ख़तरे से मानव जाति को बचाने के लिए हम घर से बाहर नहीं निकलेंगे.  किसी और के संपर्क में भी नहीं आएंगे. खिड़की या balcony से समर्थन दिखायेंगे. लेकिन हुआ यूँ कि कुछ लोग जोश में होश खो बैठे और उन घरों के मातम को भूल बैठे जिन्होंने किसी अपने को हमेशा के लिए खो दिया है! इन्हें जश्न से मतलब था, थाली पीटने से मतलब था लेकिन उसके उद्देश्य को ही भूल बैठे! भीड़, जुलूस से दूर रहना था और इन्होंने मजमा लगा दिया. सड़कों पर कर्फ्यू की तस्वीर निकालने ग्रुप में पहुँच गए और चुनावी रैली सा माहौल बना दिया.
शाम को जो ध्वनि सुखद लग रही थी, इन सबके व्यवहार ने उसे घोर दुख में बदल दिया. कुछ लोगों ने दिखा दिया कि किये कराए पर पानी कैसे फेरा जाता है जबकि यह शोक के बीच, जीवन रक्षक कोशिशों को धन्यवाद देने का समय था; किसी बीमारी के जश्न का नहीं! नतीज़तन लॉकडाउन की अवधि कड़े नियमों के साथ बढ़ानी पड़ी. 

उसके बाद यूपी और बिहार के लोगों के पलायन की ख़बरों ने देश को झकझोर दिया. यहाँ दोष इनका नहीं, गरीबी का था. उस भूख का था जो किसी की सग़ी नहीं होती! और बिना किसी वाहन ये सब हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने पैदल ही निकल पड़े. बाद में बसों का इंतज़ाम हुआ, जिनमें भर इन्हें गंतव्य भेजा गया. तब तक कितनी देर हो चुकी थी यह आने वाला समय लिखेगा. 
बात फिर भी नहीं थमी और इसके बाद तमाम क़ायदे-क़ानून को ताक़ पर रख दूसरे समुदाय के लोगों की एक साथ जमा होने की ख़बरें आईं. पुलिस, डॉक्टर, नर्स सभी के साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन पर थूका गया. इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वो कम है!

कई सोसायटीज़ से भी इसी तरह की घटनाएँ सुनने को मिल रही हैं. मेरी एक मित्र ने बताया कि उसके मायके में सोसायटी के लोग सुरक्षा को धता बताते हुए रोज़ इकट्ठे हो रहे हैं, पिकनिक, पार्टीज़ चल रही हैं और वे किसी की सुनने को तैयार ही नहीं! जब मेरी मित्र की माँ एवं भाई ने इसका विरोध किया तो ये लोग उनके घर न केवल लड़ने ही पहुँच गये बल्कि ग़ालीगलौज़ कर भाई को मारने की धमकी भी दी. बीमार माँ की तबियत और बिगड़ गई और परिवार के लोग सकते में हैं क्योंकि धमकाने वाले लोग वो थे जो सोलह वर्षों से सोसायटी में साथ रह रहे थे.

लॉकडाउन में जबकि संयम, सौहार्द्रता और सहिष्णुता बनाये रखने की नितांत आवश्यकता है ऐसे में कुछ नागरिकों का इस तरह का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया बीमारी के अगले स्टेज तक पहुँचने और इसकी भयावहता को बढ़ाने की ओर संकेत कर रहा है. इस तरह की छुद्र मानसिकता से भरे लोग अपनी संवेदनाओं को जागृत कर अब भी संभल जाएँ तो देश पर इनका बड़ा अहसान होगा! 
इस समय पूरे विश्व की निग़ाह हम पर है. हमारे लिए यह सुरक्षा सम्बन्धी निर्देशों का पूरी तरह से पालन कर मानव जाति को बचाने का समय है, जड़ बुद्धि के साथ घटनाओं के हिन्दू-मुस्लिमीकरण का नहीं! 
यूँ भी घृणा, किसी वायरस से कहीं अधिक संक्रमण फैलाने की ताक़त रखती है, मनुष्यता बचाये रखने के लिए बेहतर है कि इस वायरस से हम भारतीय हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जायें. 
बाक़ी सब बढ़िया है.
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories6

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

कोरोना! तुम्हें करीना की हाय लगेगी!

लॉकडाउन के इस समय में तमाम तरह के स्टेटस लिखे जा रहे हैं. एक जो सबसे अधिक देखने में आ रहा, वो है 'कमेरे पतियों' का वीडियो या तस्वीर. यक़ीन मानिए कि यह सौहार्द्रपूर्ण भाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से ही बनवाया जा रहा है और जितनी देर का वीडियो है, काम उससे एक सेकंड भी ज्यादा नहीं किया गया है. अपवाद अवश्य हो सकते हैं लेकिन बहुमत ड्रामेबाजों का ही है. भारतीय पुरुष कितने भी समझदार हो चुके हों लेकिन अपने पैरों पर यूँ कुल्हाड़ी नहीं मारते! उल्टा घर बैठे, 'जरा चाय बना दे', 'ये कर दे, वो कर दे' करने में भरपूर आस्था  रखते हैं. इनकी काम करती तस्वीरें ठीक उतनी ही भ्रामक हैं जितनी कि स्त्रियों की बेलन से मारने वाली या घर में न घुसने देने वाली बात है. समाज इतना भी आगे नहीं बढ़ गया है कि स्त्रियों के हाथ में हथियार भी दे और उसके प्रयोग की हिम्मत भी.
कोई सब्जी काट रहा, कोई रोटी बना रहा, कोई कपड़े धो रहा...ये सब 'समय बिताने के लिए करना है कुछ काम' की टैग लाइन के साथ भले ही दिखें पर असल में 'फोटो अपलोड के लिए किये प्रपंच तमाम' ही हैं. यह ठीक वैसी नौटंकी है जैसी कि कई स्त्रियाँ जब किसी प्रोग्राम में दर्शक बनकर जाती हैं और उसकी समाप्ति के बाद मंच पर चढ़, माइक हाथ में ले यूँ फोटो अपलोड करती हैं जैसे कि 'बीज वक्तव्य' उन्होंने ही दिया हो.

और ये जो 'पति घर में हैं', 'बड़ा अच्छा लग रहा जी' केवल चार दिन की अनुभूति है. पांचवें दिन से अखरने लगता है. जब सुबह के नाश्ते के चक्कर में सखियों से गॉसिप मिस हो रही, झाड़ू-पोंछा, कपड़ा, बर्तन के एसेन्शियल वर्क के कारण सोशल मीडिया से भी डिस्टेंस रखना पड़ रहा हो! गृहिणियों की परेशानी की तो हद नहीं! हेल्पर के न आने से आधी जान तो पहले ही सूख चुकी होती है. उस पर ताजा लगे पोंछे से कोई गुजर न जाए, इस पर भी कड़ी नज़र रखनी पड़ती है. हिन्दुस्तानी जनता है जी, मात्र कह देने भर से तो समझेगी नहीं! अच्छे से क्लास लेनी पड़ती है. तभी तो पोंछे के समय हर घर में दहशत वाला माहौल रहता है. बच्चा, फ़ोन पर अपने मित्र को कह रहा होता है, "हाँ, यार. वो प्रॉब्लम तो मैं सॉल्व कर दूँगा पर डायरी बैग में है. अभी पलंग से उतर नहीं सकता! मम्मी ने पोंछा मारा है." पति घबराते हुए पैर के अँगूठे के बल फ्लेमिंगो सा चलता आता है और जम्प मार गार्डन में पहुँच जाता है. सास जी सोफ़े के ऊपर पालथी मार बैठ जाती हैं कि कहीं फिनाइल में नहाया पोंछा उन्हें अपवित्र न कर दे. वैसे इसके पीछे यह मंशा भी रहती है कि कहीं बहू वो एक सेन्टीमीटर वाले स्थान में पोंछा लगाना भूल गई तो क़यामत न आ जाए!

झाड़ू के समय तो हम लोगों की यही कोशिश होती है कि उस समय रूम में कोई न हो. वरना झाड़ू पूरी होने से पहले ही, "हेहे जरा पंखा चालू कर जाना. बहुत गर्मी है." सुनते ही ऐसी आग लगती है कि "हाँ, जी पंखा काहे ए.सी. में बैठो! हम तो कैलाश पर्वत पर पसरे जलेबियाँ उड़ा रहे हैं न!" उस पर हर घर में ऐसा एक सदस्य भी जरुर ही होता है जो आपके कमरे से एन बाहर निकलने के समय ही टोककर कहे, "वो उधर, थोड़ा कचरा रह गया है."
आय-हाय! इन्हें दो-दो मीटर तक फैलाया अपना सामान तो आज तक न दिखा पर सुई की नोक सा कचरा फट से दिख गया!

खाने और बर्तन की तो बात ही न पूछो, ऐसा लगता है कि सिंक के आसपास कोई तांत्रिक का रचा काला साया है जिसके असर से ये हर एक घंटे बाद अठारह बर्तन उगल देती है. वैसे हम सबका जन्म इस धरती पर उपस्थित प्रत्येक पदार्थ खाने के लिए ही हुआ है, इस बात से भी पूर्ण सहमति है मेरी. इसलिए वे जिन्हें यह भ्रम/उम्मीद है कि स्त्रियाँ बड़ी स्लिम-ट्रिम हो जाएँगी, ऐसा कुछ नहीं है! मजूरों की तरह काम करने के बाद भूख भी डबल लगती है. तभी तो खाना हम अपने स्वादानुसार बनाते हैं. इस सबके अलावा भी कितने ही छोटे-बड़े काम, जिनकी गिनती ही नहीं! गीली टॉवल को सही जगह सुखाने और यहाँ-वहाँ पड़ी हुई चप्पलों को उनके मंत्रालय तक पहुंचाने के लिए कई बार फेफड़ों और स्वर नलिका पर अतिरिक्त दबाव बनाना पड़ता है. उफ्फ्फ़! बड़ी टफ लाइफ है जी अपनी! इन दिनों हम ईंट पर सिर रखकर ही सो जाएँ या किसी को दे मारें! गंभीरता से न सोचें, हमें ज्ञात है कि पहला विकल्प ही सेफ है जी!

वैसे भारतीय गृहिणियों का असल सच यही है कि चाहे दुकानें बंद हों, देश में कर्फ्यू लगे, लॉकडाउन हो या कि कोई तीज त्योहार..काम की दोहरी मार उन पर ही पड़ती आई है. ऐसे में जिन स्त्रियों को परफ़ेक्शन के साथ हर कार्य करने की आदत है, उनकी हालत तो और भी ख़राब हो जाती है. उस पर उन्हें 'सारा दिन करती ही क्या हो?', 'अच्छा, आप हाउसवाइफ हैं! फिर तो मेरा ये काम कर दीजिये!', 'हमारी बहू तो कुछ करती ही नहीं!' जैसे बेहूदे वाक्य भी प्रायः सुनाये जाते हैं. नश्तर की तरह चुभते हैं पर हिन्दुस्तानी औरत है न! सो हँसते-हँसते झेल जाती है. अपने लिए कभी किसी 'लॉकडाउन' की माँग नहीं करती! सोचिये जो एक दिन स्त्रियों ने भी घर के कामों की तालाबंदी कर दी, तो क्या होगा??
ख़ैर.....हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें....!


और हाँ...कोरोना, ये तुमने ठीक नहीं किया! तुम भी उस प्रेमी से स्वार्थी, धोखेबाज़ और घोर स्त्री-विरोधी ही निकले! तुम्हें करीना की हाय लगेगी!
देखना! कुछ ही समय बाद न तो तुम्हें कोई दोस्त मिलेगा और न होस्ट सो प्लीज गैट लॉस्ट!
बाक़ी सब बढ़िया है.
-प्रीति 'अज्ञात' 
#Lockdown_stories5

#Lockdown_stories4

सुबह से लेकर शाम तक, शाम से लेकर रात तक
रात से लेकर सुबह तक, सुबह से फिर शाम तक.....बस काम करोओ...हो ओ बस काम करो।

 
हैं!!! 
उदित जी-अलका जी! ये मैं क्या सुन रही हूँ?
आनंद बक्षी साब - नहीं, बिटिया। मैंनें तो ठीक ही लिखा था। शायद तुम्हारा ही मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। तुम्हें दुआ नहीं डॉक्टर की ही जरुरत है।  
ओह्ह! नहीं -नहीं! अपन ऐसे ही मंत्र याद करके जी लेगा। कान की मशीन लगवा लेगा, संगीत भूल जाएगा पर डॉक्टर के यहाँ नहीं जा पायेगा, मोई जी। वहाँ बहुत भीड़ है, परेशानी है। 
क्षमा कीजिये, प्रभु! ।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि
अर्थात हे मनुष्य! तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल में हेतु रखनेवाला मत हो तथा तेरी अकर्म में (कर्म न करने में) भी आसक्ति न हो। 
जजज्जी,पंडिज्जी। हमारे तो घर में लगे आम के पेड़ में भी दस बरस से एक आम न आया। हम तो उसके फल की भी इच्छा करना भूल चुके हैं और उसे वानर जाति के सुपुर्द कर दिया है। नीबू भी 90% बाँट देते हैं, 10% चुरा लिए जाते हैं। हम तो घर बैठे-बैठे दुश्मनों के दांत खट्टे कर देते हैं। कितनी वीरता और त्याग की कहानियाँ सुनेंगे जी? अभी तो चर्चा शुरू हुई है। 
बाक़ी सब बढ़िया है। 
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories4  

और भरो टमाटर फ्रिज़ में!! #Lockdown_stories3

इन दिनों गली के कुत्तों की बड़ी मौज है। हमारी गली में दर्जन भर से अधिक तो पहले ही थे और हाल ही में कई पिल्लों के जन्म के बाद से रौनक और बढ़ गई है। अब सुबह वाहनों की आवाज की जगह इनकी भौं-भौं ने ले ली है। असल में हमारे घर के कॉर्नर पर खड़े हों तो वह चार पतली सड़कों का केंद्र बिंदु है। ये चौराहेनुमा स्थान कॉमन प्लॉट की तरह है लेकिन गलियों के अपने-अपने कुत्ता नेता हैं। क्या मज़ाल कि किसी को कोई एक इंच भी अपनी गली में क़दम रखने दे! तो सुबह-सुबह ये हाहाकार मचा अपना वही मसला निबटाते हैं और इस चक्कर में सारे एरिया के लोगों के मीठे स्वप्न मंज़िल तक पहुँचने के पहले ही विस्थापन का दर्द झेलते लगते हैं। दूध लेने जाओ तो मनुष्यों की संख्या से कहीं अधिक इन दिव्य आत्माओं के दर्शन का पुण्य लाभ मिलता है। 

अब चूँकि ये बहुमत में हैं तो इश-इश करने से तो सरकते नहीं। चिल्लाकर बोल नहीं सकते क्योंकि गला फट जाता है और उसके बाद खाँसी निकल सकती है। जो निकल गई फिर तो पब्लिक इन कुत्तों से भी बदतर हालत कर देती है। ख़ैर....अभी सेंटीपना भूलकर कुत्तों पर कंसन्ट्रेट करते हैं। तो इनमें से अधिकांश तो फ़ैल-फैलकर सड़क पर चौड़े होकर चल रहे थे लेकिन दो-तीन तगड़े कुत्ते बड़े अपसेट थे। मैंने कहा, "अब काहे का रोना है? अब तो करोना है।" बोले, "का बताएँ! यही तो दुःख है। ज़िन्दग़ी से साला एडवेंचर ही ख़तम हो गया है। जब तक दो-चार मनुष्यों को दौड़ा नहीं लेते, हमारी तो गुडमॉर्निंग ही नहीं होती!"हमने कंधे पर हाथ रख सांत्वना देते हुए मासूमियत से पूछा, "क्यों, आपके यहाँ सुबह व्हाट्स एप्प पे सुप्रभात भेजने का रिवाज़ नहीं है क्या?"

आप तो हँस दिए होंगे पर वो घुन्ना गया। आगे बोला,"बड़ी बोरिंग लाइफ है। बाइक और कार के साथ दौड़ने में अपन की भी वर्ज़िश हो जाती थी और आंटी लोग को डरते देख बच्चों का एंटरटेनमेंट। अब तो दिन बड़ा सूना और निराश गुजर जाता है।"तभी नन्हे पिल्ले ने असहमति दिखाते हुए कहा, "नहीं पापा, मुझे तो आजकल ठीक लग रहा है। अभी कोई पत्थर नहीं मारता! पूँछ में लड़ी बम बाँधकर हमारे दर्द पर हँसता नहीं। मेरा कोई भी दोस्त गाड़ी से कुचला नहीं! हाँ, थोड़ा खाने-पीने की दिक़्क़त है पर चलता है।"

हमने कहा, "दिक़्क़त तो इसलिए है कि तुम लोगों में एटीट्यूड जरुरत से ज्यादा आ गया है। हम जब छोटे थे तो हमारी गली के कुत्ते तो रोटी, सब्जी, ब्रेड सब कुछ खा लेते थे। तुम लोग भूखे रह जाओगे पर चाहिए पारले-G ही। अब नहीं मिल रहा न, तो हम क्या करें?"तभी सभी पिल्लों ने मुझे घेर लिया और बोले, "कोई बात नहीं! आंटी फ्रिज़ में टमाटर तो होंगे न! कल ही आपने मुँह पे पट्टा बाँध के लूटे थे!"मैंने कहा, "अबे गदहों, तुम सब की बुद्धि घास चरने चली गई है। वो मास्क था, उसे लगाकर लूटना नहीं होता है। स्वयं और दूसरों की रक्षा होती है।""ओह्ह! तो इसका मतलब, हिन्दी फिल्मों ने हमें गलत शिक्षा दी है।" सब एक स्वर में बोले। मैं सिर पकड़कर बैठ गई। "कोई न! आप तो लॉन में बिठाकर पहले की तरह पार्टी कराओ। टमाटर से स्किन पे ग्लो आता है।" और सब खी-खी कर मेरे पीछे चल पड़े।  
और भरो टमाटर फ्रिज़ में!!
बाक़ी सब बढ़िया है।  
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories3 
Photo- Google



सोमवार, 30 मार्च 2020

#Lockdown_stories2 जाना था जापान, पहुँच गए चीन समझ गए न!

भले ही मेरी ऑनलाइन मैगज़ीन है, ब्लॉग्स हैं, सोशल मीडिया अकाउंट्स हैं फिर भी मैं स्वयं को टेक्नोचैलेंज्ड की श्रेणी में रखती आई हूँ। ज्यादा तीन-पाँच वाले काम मुझे समझ ही नहीं आते। कारण यही कि सारा लेखन लैपटॉप पर होता है और वो भी बिना किसी प्रपंच के। एक समय था जब मुझे कंप्यूटर ऑन करना भी नहीं आता था। वर्षों से टक्करें मार-मारकर अब लिखना और फोटोशॉप सीख गई हूँ। मोबाइल से रिश्ता बस कॉल इनकमिंग-आउटगोइंग तक ही सीमित है।व्हाट्स एप्प पर टुकुर टुकुर टाइपिंग से बेहतर मुझे सीधे फ़ोन पर बात करना लगता है। मैसेंजर कभी इन्स्टॉल किया ही नहीं और व्हाट्स एप्प ग्रुप्स में जोड़ने वाले खुद ही मुझसे हार मान नमस्कार कर चुके हैं क्योंकि मुझसा देसी और इनएक्टिव इंसान 'न भूतो न भविष्यति।'

वैसे भी दुनिया के हर इंसान से तो मेरा भावनात्मक लगाव है नहीं तो इनसे मैं सुप्रभात और शुभरात्रि लेकर क्या करूँ और ज्ञान भरा एक ही मैसेज जब चार अलग लोग एक ही दिन भेजते हैं तो सोचिए कैसा लगता है! पहले मैं टाइम चेक़ कर अनुमान लगाया करती थी कि इन म्यूच्यूअल फ्रेंड्स में से किसने किसका कॉपी किया है फिर जो रेस में पहला होता था उसे स्माइली भेज देती थी।उसके बाद जब वही मैसेज या वीडियो परिवार के ग्रुप में देखती थी तो पता चलता था कि प्रीति बेटा दुनिया उतनी भी विशाल नहीं जितनी तुम माने बैठी हो! गोलमाल है भई सब गोलमाल है! 

ख़ैर..इस बारे में हम सा चींटी प्राणी कर भी क्या सकता है! अब तो सरकार ही हमरी माई बाप है। तो उनको ही सोचना चाहिए कि बिना फीलिंग्स वाली इन प्लास्टिक संवेदनाओं का क्या करना है! वैसे मुझे पूरा भरोसा है कि अब वो दिन दूर नहीं जब आप कोई भी इमोजी टच करेंगे, टंकार के साथ जय श्री राम ही जायेगा। आप दिल भेजेंगे, नमस्ते जाएगी, चाय भेजेंगे लौकी का जूस जाएगा, फूल भेजेंगे तुलसी मैया का पौधा जाएगा, केक भेजेंगे तो बताशा जाएगा। नेटफ्लिक्स खोलेंगे तो रामायण आएगी, सास बहू के सीरियल खोलते ही MDH वाले दादाजी संस्कारी होने का मतलब समझाएंगे। रामराज्य ऐसे ही थोड़े न आ जायेगा। पूरे तंत्र को लगाना पड़ता है जी। 

इधर फिटनेस चैनल हमारे नेताओं को दिखाकर बता रहा होगा कि असल किरपा तो ये बनने में बरसती है। नामुरादों, फिट होकर क्या करोगे? पकौड़े ही तो तलने हैं न तुम्हें। एथलीट बन भी गए तो आगे का जीवन 'चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात' सा ही कटेगा। यहाँ तो बिना डिग्री राजा भोज बना जा सकता है इसलिए ही तो शिक्षा एसेंशियल सर्विसेज में नहीं है। अब हमने ही यूनिवर्सिटी मेरिट में आकर कौन से तीर मार लिए, इधर ही बिना कमाई क़लम घसीट रहे हैं न! वही गंगू तेली टाइप। उसपे frustration जब तब हिलोरें मारता है, सो अलग!  

लो 'जाना था जापान, पहुँच गए चीन समझ गए न!' मल्लब 'जब दिल हूं हुं करे, घबराआआए' तब भड़ास यूँ निकलती है।
बात तो हम अपने टेक्नोचैलेंज्ड होने की कर रहे थे। एक सिंपल एप्प को समझने में भी मुझे दस गुना समय लगता है। यहाँ तक कि नया मोबाइल लेने के बाद भी मैं पुराने को तब तक use करती रहती हूँ जब तक कि नया समझ न लूँ। इस प्रक्रिया में मुझे औसतन पंद्रह दिन से एक माह तक का समय लगता है।

सौभाग्य से हमारी प्रिय मित्र नीरजा जी टेक्नो एक्सपर्ट हैं। मुझसे तो सौ गुना बेहतर हर हाल में हैं। कई बार मुझे झींकते हुए देखतीं हैं तो हमेशा कोई न कोई एप्प डाउनलोड करने की सलाह देतीं और भी कई गुणवान बातें मैंने उनसे सीखी हैं। ऐसे ही एक शुभ दिन में उन्होंने मुझे बिग बास्केट के बारे में बताया। बच्चे भी रोज कहते थे, थैला उठाये दस किलो सामान लेकर क्यों आती हो, जब घर पे सब आ सकता है! अब हमारे घर से चार कदम दूरी पे सब्जी और ग्रॉसरी वाला है। कई बार ठेले वाला भी घंटी बजा दिया करता है। तो उस समय मुझे बिग बास्केट की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।

अब lockdown के दिनों में मैंने यह app इन्स्टॉल कर लिया। तुरंत वेलकम मैसेज आया, अपन तो जी खिल उठे। फिर एक-एक कैटेगरी में जाकर आधे घंटे कुचुर-कुचुर कर सामान सेलेक्ट किया, उसमें भी बेटी को बग़ल में बिठा रखा था। हम लोग साल भर का राशन नहीं भरते, हर माह खरीदते हैं। चूँकि सरकार ने पैनिक होने को मना किया तो अपन रत्ती भर भी नहीं हुए। लेकिन ये क्या वेलकम करने वाले ने अगले ही पल हमारी यह कह घनघोर बेइज़्ज़ती कर दी कि बैकलॉग के कारण अभी कुछ दिन हम ये सर्विस नहीं दे पायेंगे। बाद में कोशिश करें। मतलब अगर कोरोना से बचे तो हमारी बची खुची ज़िंदगी का राशन इनकी किरपा से मिलेगा.....और अगर किरपा न हुई तो अपन भूख से तड़प-तड़पकर इधर ही जान दे देगा मोई जी। सॉरी बोल सबकी आस यूँ न तोड़िये, कुछ कीजिये, बच्चे की दुआएँ लगेंगीं। वरना देश के शहीदों की सूची में एक नाम और जोड़ ही लीजिए। बाक़ी सब बढ़िया है।
सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय।
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories2  

#Lockdown_stories1

#मोहैतोमुहै

मैं हमेशा से इस भ्रम में थी, मानती और कहती भी हूँ कि मैं स्वयं के लिए ही पनौती हूँ लेकिन आज एक न्यूज ने मेरे ये ख़यालात बदल दिए।
सर्फिंग करते हुए अचानक एक तस्वीर दिखाई दी, साथ में कैप्शन था 'बैंगलोर की कहक़र गया था थाईलैंड, पुलिस ने किया पर्दाफ़ाश' पढ़कर हमें तो बहुत जोर से हँसी आई और चित्र को zoom किया। पत्नी की भौंहें तनी हुई और पति के चेहरे पर उड़ती हवाइयाँ उसके गुनाह की सारी कहानी कह रही थीं।

मैं आपको बता दूं कि थाईलैंड को मसाज़ कंट्री की तरह दुष्प्रचारित किया जाता है जबकि यह अत्यधिक spiritual country है, बेहद खूबसूरत भी। समय और मैं रही तो उस पर लिखूँगी कभी। हाँ, मसाज़ सेंटर भी बहुत हैं वहाँ, पर यही उसकी विशेषता नहीं है। 

ख़ैर....इन साहब ने जिस तरह से ये खबर अपनी पत्नी से छुपाई उससे साफ ज़ाहिर है कि इनके इरादे नेक नहीं थे। अब कोई ट्रेन तो थी नहीं जो कह देते कि अरे, नींद लग गई तो अगले स्टेशन पर पहुँच गए थे। 
सोचो, हर स्थान पर ये फ़ोटो खिंचवाने से बचे होंगे। समुंदर की लहरों संग उल्टा तैरे होंगे। बीच पर रेती में मुँह घुसा लिया होगा। लगेज में से एयरलाइन के सारे कागज़ हैंडल और ताले से उखाड़ फेंके होंगे। पर्स में से बोर्डिंग पास निकालकर एयरपोर्ट के बाहर ही dustbin में डाल दिया होगा । एकाध करेंसी बची होगी तो मित्र की जेब में 'रख ले यार' कहकर डाल दी होंगी। यह दान नहीं बल्कि मुँह बंद रखने की कीमत ही समझिए। बाथटब में निरमा वाशिंग पाउडर से झाग बना स्वयं को स्वच्छ किया होगा कि देसी smell से शक़ की कोई गुंजाइश न रहे। इतने सारे efforts के बाद निश्चिन्त होकर सफ़र की थकान का पोज मारते हुए मुँह लटकाए घर में घुसे होंगे। शायद किसी शॉप से मुरक्कू और मैसूर पाक भी खरीद लिया हो।

बताइए, इतनी तैयारी के बाद ये सितम!
भारतीय पुलिस को अपनी सारी होशियारी अभी ही दिखानी थी।
बेचारे ने सपने के करोड़वें हिस्से में भी नहीं सोचा होगा कि देश में पहुँचते ही कोरोना खींसे निपोरता मिलेगा। फिर lockdown होगा। फिर विदेश से आने वालों को quarantine में रखा जाएगा, फिर उस पीरियड में विदेश जाने वालों की सूची बनेगी, फिर घर-घर जाकर उनकी क्लास ली जाएगी और फिर मैं पकड़ा जाऊँगा। 
यह कोई आम घटना नहीं है जी बल्कि साक्षात् इतिहास रचा गया है कि एक ऐसा महापुरुष जिसका झूठ बीवी ने नहीं बल्कि पुलिस ने पकड़ा वो भी बिना FIR दर्ज करे।
भक्क! ऐसा भी होता है कहीं।
अरे! हुआ है सच्ची!

सदियों में एक ऐसा इंसान पैदा होता है जिसे महापनौती साबित करने के लिये पूरी क़ायनात उसके पीछे लग जाती है। न जाने कौन से जन्म के पापों की सज़ा मिली है आपको। इस जन्म के पाप तो पता चल गए हैं जी। तो भैये हार्दिक संवेदनाओं के साथ आज से पनौती का महान टैग आपका हुआ। हम अब चैन से गुजर-बसर करेंगे। आज तो हमरा भी मन कर रहा कि एक बार कह ही दें #मोहैतोमुहै
मंगलभवन अमंगलहाaaaaरी.....
राम सियाराम सियाराम जय जय राम
-प्रीति 'अज्ञात'
#Lockdown_stories1 

मंगलवार, 10 मार्च 2020

विदा, #प्रेम भारद्वाज जी

ये तब की बात है जब मैं सोशल मीडिया पर इतनी सक्रिय नहीं थी। महीने में अधिकतम 4 -5 बार यहाँ आती और वास्तविक दुनिया में लौट जाती। उन दिनों इस आभासी दुनिया (अब नहीं मानती) से ख़ासी विरक्ति हो चली थी मुझे। हाँ, पत्रिका 'हस्ताक्षर' शुरू हो चुकी थी सो उस पर और ब्लॉग पर सक्रियता बरक़रार थी। अंक तो याद नहीं पर ये बात अब तक नहीं भूली हूँ कि उन्हीं दिनों मेरे किसी सम्पादकीय पर मुकेश जी ने लिखा था कि "देखना एक दिन तुम्हारे सम्पादकीय भी प्रेम भारद्वाज जी की तरह ही पढ़े जायेंगे।" ये प्रेम भारद्वाज जी से मेरा प्रथम परिचय था।
दिल्ली सर्कल और विशिष्ट संगठनों से मैंने सदैव एक निश्चित दूरी बनाकर रखी है उसके कई कारण हैं पर वे बातें फिर कभी। लेकिन इतना अवश्य जान लीजिये कि सबके लिए सम्मान और स्नेह में कोई कमी नहीं! लेकिन हाँ, मुकेश जी के इस कमेंट के बाद मुझे बेहद उत्सुकता हुई और मैंने तुरंत अपनी मित्रता-सूची खँगाली तो प्रेम जी का नाम वहाँ पहले से ही था। उनकी वॉल पर गई तो उनकी लेखनी की शक्ति का अनुमान स्वतः ही हो गया। एकबारग़ी लगा भी कि उन्हें मेसेज कर दूँ कि मेरे लिखे पर अपनी राय अवश्य दें पर फिर संकोचवश ऐसा कर न सकी। सोचा, कभी दिल्ली पुस्तक मेले में मुलाक़ात होगी तो कह दूँगी। बात आई-गई हो गई।
मैं इस बात को शायद भूल ही जाती लेकिन अभी फरवरी में मुंबई जाना हुआ और मित्र अनुराधा सिंह से न केवल उनकी अस्वस्थता की जानकारी मिली बल्कि यह भी ज्ञात हुआ कि उनका इलाज़ अहमदाबाद में चल रहा है। प्रेम भारद्वाज जी का नंबर मुझे मिल गया था और उनके हालचाल लेने थे। उस समय मेरे मन में सौ प्रश्न चल रहे थे कि किस तरह बात शुरू करुँगी! पता नहीं पहचानेंगे भी या नहीं! कैंसर से मेरे इतने क़रीबियों को खोया है कि इस शब्द भर से मेरा गला भर्रा जाता है। सच कहूँ तो उस दिन थोड़ा अभ्यास करके मैंने उन्हें फ़ोन लगाया। अपना परिचय दिया। वे सहज भाव से बोले, "जानता हूँ आपको।" उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो कहने लगे, "Up -Down चल रहा है।" फिर धीरे से बोले, "Down ही चल रहा है।" उस वक़्त उन्हें बोलने में भी बेहद तक़लीफ़ हो रही थी लेकिन गहन उदासी और पीड़ा के स्वर मैं भीतर तक महसूस कर पा रही थी। कई बार किसी की उदासी आपको मौन कर देती है और कहने को कुछ भी नहीं बचता! दुःख और भी कई गहरी रग़ों को छेड़ जाता है, दर्द के सारे पुराने पृष्ठ फड़फड़ाते नज़र आते हैं।
मैंने उनसे हॉस्पिटल में मिलने की अनुमति लेते हुए एड्रेस भेजने को कहा। ये 24 फरवरी की बात है। लेकिन तबसे उनका व्हाट्स एप्प बंद ही था। मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी और ये भी कि बिना एड्रेस के जाऊँ कैसे? 4-5 दिन बाद उनके परिवार के एक सदस्य का नंबर मिला और उनसे सारा डिटेल भी। तब तक प्रेम जी को ब्रेन हैमरेज भी हो चुका था। तमाम आशंकाओं से घिरी मैं अपने पति के साथ 1 मार्च को उनको देखने हॉस्पिटल पहुँची।वहाँ जाकर पता चला कि ब्रेन हैमरेज का असर उतना गहरा नहीं हुआ और शरीर में मूवमेंट हो पा रहा है। उस दिन उन्होंने सहारे से बैठकर खिचड़ी भी खाई थी। मैं गई, तब वे गहरी नींद में थे। घर के सदस्यों ने उन्हें उठाना भी चाहा था पर मैंने ही मना कर दिया। मुझे लगा कि नींद में दर्द का अहसास थोड़ा कम होगा उन्हें और फिर सुधार की ख़बर पाकर मैं प्रसन्न भी थी। सोचा, जब स्वस्थ हो जायेंगे तब उनसे मिल ही लूँगी। उनकी बहिन का नंबर लिया और अपडेट करते रहने का कहकर मैं लौट आई थी। सोशल मीडिया पर इस सब की चर्चा से परिवार परेशान होता ही है, उन्होंने कहा भी था। इसलिए मुझे जो भी पोस्ट दिखीं, मैंने उन्हें hide करने का अनुरोध भेज दिया था। बीच में एक बार उनके घर बात की तो पता चला कि वे कुछ भी खा-पी नहीं रहे हैं।
आज सुबह अचानक उनकी बहिन का मैसेज दिखाई दिया, "भैया इस दुनिया में नहीं रहे।"
मैं उनसे मिलकर भी नहीं मिली थी, बात होते हुए भी कुछ नहीं हुई थी, पर उनके बारे में रत्ती-भर न जानते हुए भी उनके शब्दों से गहरा पाठकीय रिश्ता था। एक समृद्ध लेखक की यही पूँजी है कि उसका शरीर भले ही दफ़न हो जाए लेकिन शब्द सदैव ज़िंदा रहते हैं! पाखी को पहली उड़ान देने वाले प्रेम भारद्वाज जी को अंतिम विदाई, मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏🙏
- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 8 मार्च 2020

#HappyWomensDay2020

व्यस्तता भरे जीवन में से कुछ समय अपने लिए बचाकर/चुराकर रखना है। अपने शौक़ पूरे करने हैं। वो डिश भी अपने लिये जरूर बनानी है जो आपको पसंद है, भले ही घर में उसे कोई और न खाता हो। अपनी अस्वस्थता का बेसुरा राग अलापने से बेहतर है, स्वास्थ्य पर ध्यान देते हुए मस्त रहना।
हर बात में ये नहीं बोलना है कि "इनसे पूछकर बताती हूँ।" कुछेक निर्णय अपने-आप भी लिए जा सकते हैं। भले ही सुख में जी रही हों पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह निकालनी ही है।
हर बार समाज ही सब कुछ बुरा नहीं कहता.. कभी-कभी हम लोग ही स्वयं अपना जीना हराम कर लेते हैं। पीड़िता, मजबूर, त्याग और बलिदान की देवी बनकर। महान बनने से कुछ नहीं होता सिवाय सिरदर्द के क्योंकि कुछ वर्षों बाद यही महानता और 'DISEASE TO PLEASE' घुटन बनकर भीतर से ख़त्म करने लगती है। इसीलिए सच के साथ खड़े होकर अपनी बात कहना सबसे पहले सीखना है।
हमें उम्र भर यह कहते हुए कुंठित क्यों होना कि "मेरी पढ़ाई तो चौके-चूल्हे में ही झोंक दी गई।" आप उसके साथ भी बहुत कुछ कर सकती हैं बशर्ते आप अपने आप को भी प्राथमिकता सूची में स्थान दें। याद कीजिए, आखिरी बार कब आपका नाम लिया गया था? मम्मी, चाची, बुआ, मौसी, दीदी के रिश्तों से होते हुए कब ज़िन्दगी गुज़र जाती है पता भी नहीं चलता और एक दिन आपका नाम मात्र प्रमाणपत्र तक ही सीमित रह जाता है।
मेरे जीवन का मूल मंत्र -'अच्छा सोचो, अच्छा कहो, अच्छा सुनो' और लोगों की बुराइयों को अपनी अच्छाइयों से मारो! 😍
MORAL: Happy Women's Day! पर पुरुषों के पीछे सोटा लेकर क़तई नहीं दौड़ना है। 😁
वैसे तो हर दिन अपना ही है पर जैसे बर्थडे वाले दिन स्पेशल लगता है, आज भी हम सबको वही अहसास मुबारक़ हो! 💐💐
- प्रीति 'अज्ञात'

#HappyWomensDay2020 #InternationalWomensDay

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

भाषा, संवाद का जरिया है अहसासों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है. हम किसी भी माध्यम में पढ़ें हों, पर जहाँ बचपन गुजरा वहाँ की भाषा से लगाव हो जाना स्वाभाविक है. फिर हम कितने भी साब-मेमसाब बन जाएँ लेकिन जब भी उस भाषा को बोलने का अवसर मिले; चूकते नहीं! आंचलिक शब्दों की मिठास ही अलग होती है, इसे अपनी माटी से मोह भी समझा जा सकता है.
आजकल प्रादेशिक भाषाओं के प्रचार पर बहुत जोर दिया जा रहा है. अच्छी बात है, देना भी चाहिए! बस इसका उद्देश्य अपनी भाषा को सर्वश्रेष्ठ एवं अन्य को कमजोर सिद्ध करने से कहीं ज्यादा उसके संरक्षण में होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह केवल इतिहास के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए. प्रत्येक भाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसका बोला एवं लिखा जाना आवश्यक है. अपनी भाषा को बोलने में संकोच कैसा! भाषा जोड़ने का काम करती है और सृजन में कोई भी कमतर-बेहतर नहीं होता! सबकी अपनी-अपनी सुंदरता, मधुरता है तथा स्थान के अनुसार प्रत्येक की उपयोगिता भी होती ही है. हम मित्रों के साथ जिस सहजता,अपनेपन और अनौपचारिक ढंग से बात करते हैं वहाँ तू, तेरा जैसे शब्द भी कितने प्रेम भरे लगते हैं वहीं कार्यस्थल में बात करने की एक अलग ही प्रशिक्षित शैली होती है. अति-संभ्रांत वर्ग में तमाम औपचारिकताओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओँ का छौंक लगाना सभ्यता का मानक समझा जाने लगा है. वहीं किसी बड़े mall के सेल्समेन से बात करते समय और ठेलेवाले से सब्जी लेते समय हमारी भाषा में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. इंसान हम वही हैं बस स्थानानुसार, सबकी सहूलियत के आधार पर ज़बान बदल लेते हैं.
मंत्र यही है कि भाषा कोई भी हो, इसको बोलने का तरीक़ा ही सब कुछ तय करता है. भाषा के साथ-साथ उचित शब्दों का चयन ही बात बनाता और बिगाड़ता है. अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं पर हृदय में जो भी भाव उठें, जैसी भी अनुभूति हो, उसे हम व्यक्त ज़रूर करें. माध्यम कोई भी हो इससे अंतर नहीं पड़ता, महत्त्वपूर्ण यह है कि मानसिकता सही रहे...स्नेह-भाव जीवित रहे! और क्या!
हर भाषा का अपना मज़ा है, सबको अपने बच्चों जैसा प्यार करना चाहिए. मेरा बस चले तो सब सीख लूँ. वैसे हमें तो हिन्दी ही ठीक से आती है और सपने में भी इसी भाषा में बात करते रहे हैं. अंग्रेज़ी, गुजराती और संस्कृत गुजारे लायक आती है. बस, इतनी ही कि किसी जानकार के सामने नहीं बोल सकते. 😁
MORAL:'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' का मूल उद्देश्य भाषाई विविधता और विकास पर बल देना है. अपनी वाली को महान बताने के लिए कुश्ती नहीं लड़नी है. 😎
- प्रीति 'अज्ञात'
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