मंगलवार, 4 सितंबर 2018

करोड़पति कोई भी बने बस ये जादू यूँ ही चलता रहे!

अमिताभ, भारतवर्ष के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्हें सुनकर भी हिंदी सीखी जा सकती है. भाषा की सभ्यता और बोलने का सलीक़ा क्या होता है, तमाम सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी एक अनुशासित जीवन कैसे जिया जाता है, कई दशकों से अमित जी इसके जीते-जागते साक्ष्य  बन हमारे जीवन को प्रेरणा देते रहे हैं. कार्य के प्रति उनकी मेहनत, लगन, निष्ठा और अनुशासन देख अच्छे-अच्छे भी उनके सामने पानी भरते नज़र आते हैं. पर यहाँ यह भी जानना आवश्यक है कि इतने दशकों से सभी के दिलों पर कोई यूँ ही राज नहीं कर लेता! इस क़ाबिल बनने के लिए वर्षों की अपार मेहनत और संघर्ष की भीषण आँधियों से गुज़रना होता है. अमिताभ भी सारी मुश्किलों को झेलते हुए अपने बुरे समय से जूझकर आगे बढ़ते रहे. इस उम्र में भी KBC के अब तक के सभी सीजन की लगातार सफ़लता और दसवें अध्याय की शानदार शुरुआत सारी कहानी स्वयं ही कह देती है.

कहते हैं किसी इंटरव्यू में नसीर साब ये कह गए कि "अमिताभ बच्चन का सार्थक सिनेमा में कोई विशेष योगदान नहीं रहा, क्योंकि वे विशुद्ध व्यावसायिक अभिनेता हैं."
कोई और होता तो निश्चित रूप से यह सुनकर उखड़ ही जाता. तो पत्रकार भी इस बात पर बच्चन जी की प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक थे पर अमिताभ बच्चन ने कहा, "जब नसीरुद्दीन शाह जैसा अभिनेता कुछ कहता है तो वे प्रतिक्रिया देने से बेहतर आत्म-मंथन करना चाहेंगे."
इसे कहते हैं शिष्टता और विनम्रता! वे चाहते तो अभिमान, आनंद, चुपके-चुपके सरीखी दसियों श्रेष्ठ फिल्मों के नाम गिना सकते थे और बाद में चीनी कम, ब्लैक, पा, सरकार, पिंक, पीकू,102 नॉट आउट इत्यादि भी. यह सूची अभी मीलों बढ़ती ही जानी है.

'कौन बनेगा करोड़पति' जब प्रारंभ ही हुआ था तो उस समय हर शहर का माहौल कुछ ऐसा होता था जैसे कि देश भर में अघोषित कर्फ्यू लग गया हो. सबको घर पहुँचने की बेहद जल्दी रहती थी. उससे पहले यह दुर्लभ दृश्य प्रति रविवार 'रामायण' के प्रसारण के समय देखने को मिलता था.
कुल मिलाकर सच तो यह है कि प्रतियोगी, प्रश्नोत्तर और भव्य सेट एक तरफ़...पर ये अमिताभ का जादू ही है जो KBC में आज भी सर चढ़कर बोलता है. 

जहाँ तक हम जैसे ज़बरदस्त प्रशंसकों की बात है तो अपना तो ये हाल है कि अमिताभ के ख़िलाफ़ कोई कहकर तो देखे, हम तुरंत ही उसे अपनी नजरों से नीचे गिरा देते हैं. पहले जब  परदे पर अमिताभ की एंट्री होती थी तो लड़कों की सीटियों की आवाज़ लगातार सुनाई देती और सिक्के उछालते हुए तालियाँ पीटी जाती थीं. सबका कुदकने का ख़ूब मन करता पर हम तो मैनर्स के पीछे मरे जाते थे, सो मंद-मंद सॉफिस्टिकेटेड टाइप मुस्कान ही रख पाते थे. अब टीवी के सामने नाच भी सकते हैं. हमारी पीढ़ी उन लोगों का प्रतिनिधित्त्व  करती है जो अमिताभ के युग में ही जन्मे और उनकी फिल्मों के साथ-साथ आगे बढ़ते रहे. 

बहुत-सी बातें शेष हैं अभी.......
फ़िलहाल बस इतना ही कहेंगे कि "कौन कमबख़्त इन चैनलों की बहस देखने को टीवी चालू करता है. हम तो इसलिए रिमोट उठाते हैं कि सदी के महानायक की आवाज़ सुन सकें, उन्हें देख सकें, कुछ पल सुकून से जी सकें, ज्ञान के दो घूँट पी सकें और उम्र के हर दौर को ज़िंदादिली से जीने की प्रेरणा ले सकें!"
करोड़पति कोई भी बने बस ये जादू यूँ ही चलता रहे! और क्या!
- प्रीति 'अज्ञात'
#KBC #अमिताभ बच्चन #ज्ञान का दसवाँ अध्याय #कौन_बनेगा_करोड़पति

शनिवार, 1 सितंबर 2018

गोलगप्पा: हाय! इस पर किसी को प्यार क्यों न आये भला!

हम भारतीयों को तीन बातों से बड़ी तृप्ति मिलती है-पहला गोलगप्पे खाने से, दूसरा पाकिस्तान को हराने से और तीसरा फ्री में कुछ मिल जाने से.आज पहले की बात करते हैं -
गोलगप्पा, ज़िंदाबाद है, ज़िंदाबाद था और ज़िंदाबाद रहेगा!
वैसे तो गोलगप्पा किसी परिचय का मोहताज़ नहीं और यदि आपने अब तक इसका नाम नहीं सुना है तो आपको स्वयं ही अपने ऊपर देशद्रोह का आरोप मढ़, चुल्लू भर पानी ले यह देश छोड़ देना चाहिए. कुल मिलाकर लानत है आपकी भारतीयता पर! भई, गोलगप्पे का भी अपना इतिहास है, समझिये उसे पर पिलीज़ बदलियेगा मत!
सब जानते हैं कि हरदिल अजीज गोलगप्पे को देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है. पानी पूरी, पकौड़ी, पानी के बताशे, गुपचुप, पुचका, गोलगप्पे, फुल्की और कितने नामों से इसे पहचाना जाता है पर 'नाम जो भी, स्वाद वही चटपटा!'  

'गोलगप्पा' ये नाम ही इतना क्यूट है जैसे कि कोई गोलू-मटोलू बच्चा मुँह फुलाये बैठा हो. हाय! इस पर किसी को प्यार क्यों न आये भला!
गोलगप्पे की कहानी इतनी पुरानी है कि कभी-कभी तो लगता है कि जैसे यह सतयुग से चला आ रहा है. उफ़ ये छोटे-छोटे पुचके जब आलू और चने के साथ तीखे, चटपटे पानी में  लहालोट होते हैं तब हर भारतीय की स्वाद कलिकायें एक ही सुर में जयगान करती हैं "गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त". 
हमारा पाचन तंत्र भी बचपन से इस तरह ही डेवलॅप होता रहा है कि उसमें गोलगप्पे के लिए विशिष्ट स्थान स्वतः ही आरक्षित रहता आया है. अच्छी बात ये है कि अब तक इस पर किसी क़ौम ने अपना कॉपीराइट नहीं ठोका है वरना तो सियासतदां इस पर भी बैन लगा इसे पाचन सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रफ़ा-दफ़ा कर दिए होते! ख़ुदा न करे पर यदि किसी ने इसके विरुद्ध एक क़दम भी उठाया न तो उसे इस देश की तमाम जिह्वा कलिकाओं का ऐसा श्राप लगेगा, ऐसा श्राप लगेगा कि वह अपनी सुधबुध के साथ सारे स्वाद भी खो बैठेगा. यूँ मैं धरना, आंदोलन टाइप बातों में क़तई विश्वास नहीं करती पर भइया गोलगप्पे की साख़ पे आँच भी आई न तो फिर हम क्रांतिकारी बनने में एक पल की भी देरी नहीं करेंगे.

ये सब हम यूँ ही नहीं कह रहे! दरअसल गोलगप्पे से देशवासियों का असीम भावनात्मक जुड़ाव रहा है. यही एक ऐसा फास्टफूड है जिसने अमीर-गरीब, ऊँच-नीच की गहरी खाई को पाटने का काम किया है. यह उम्र, जाति, धर्म का भेदभाव किये बिना सबको एक ही रेट में, एक-सा स्वाद देता है. यहाँ साइकिल सवार हो या बड़ी गाड़ी के मालिक सब एक साथ पंक्तिबद्ध नज़र आते हैं. कोई असल का भिक्षुक हो या करोड़पति; कटोरी तो साब जी सबके हाथ में होती ही है.
महँगाई चाहे कितनी भी बढ़ गई हो पर यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो अब भी सबके लिए अफोर्डेबल है. दस रुपये में कोई चार देता है तो कोई छह, उस पर मसाला वाली अलग से. इतनी उदारता तो उदारवादी संगठनों में भी देखने को नहीं मिलती.  और जहाँ तक विकास की बात है तो वो भी इसने जमकर कर लिया है. पहले रेगुलर मसाला पानी ही आता था और हम खुश हो गटागट पी लिया करते थे पर फिर भी इसने अपने विकास का ग्राफ ऊँचा चढ़ा पुदीना, नींबू, अदरक, लहसुन, जीरा, हाज़मा हज़म के फ्लेवर भी इसमें जोड़ दिए हैं. ये जो लास्ट वाला 'हाज़मा हज़म' है न, ये उन जागरूक नागरिकों के लिए ईज़ाद किया गया है जो अपने बढ़ते वज़न को लेकर चिंता पुराण खोल लेते हैं. हाज़मा हज़म खाते ही इन्हें गोलगप्पे खाने के अपराध बोध से कुछ इस तरह मुक्ति मिल जाती है जैसे कोई महापापी पुष्कर में डुबकी लगा स्वयं को संत महात्मा की केटेगरी में डाल मुख पर वज्रदंती मुस्कान फेंट लेता है.

अच्छा, हम लोग वैसे तो बचपन से ही लम्बी- लम्बी लाइनों में लगने को प्रशिक्षित हैं लेकिन यही वो मुई नासपीटी जगह है जहाँ हमारे सब्र का बाँध टूट जाता है. प्रतीक्षा में खड़े लोग गोलगप्पे देने वाले को यूँ तकते हैं जैसे चकोर ने भी आज तक चाँद को न देखा होगा. 'अच्छे दिन कब आयेंगे?' की चिंता में घुलते लोग भी सब कुछ भूल यही जाप करते हैं कि 'मेरा नंबर कब आएगा?'. कुछ एक्टिविस्ट टाइप लोग तो ये भी गिनते रहते हैं कि फलां हमारे बाद आया, कहीं इसका नंबर पहले न लग जाए. इसी को सत्यापित करने की कोशिश में वो ठेले वाले की ओर लाचार, प्रश्नवाचक नज़रों से से देखते हैं और फिर उसकी मुंडी के सकारात्मक मुद्रा में मात्र दस डिग्री के कोण से झुक जाने पर ही ये अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होकर साक्षात् विजयी भाव को धारण करते हैं.
 फिर भी प्रतीक्षारत लोग खड़े-खड़े प्रश्नों के इस दावानल से तो जूझते ही रहते हैं. 'भैया, मसाला तो और है न?'
 'उफ्फ, ये लोग कित्ता खाते हैं!'
'अपन पाँच  मिनट पहले आ जाते, तो अच्छा था. कहीं ठेला ही न बंद कर दे!' 
और जब अपना टर्न आया तो....हे हे हे, भैया आलू और भरो न थोड़ा सा, नमक भी डाल दो और आराम से खिलाओ, इत्ती जल्दी-जल्दी मत दो, हमको ट्रेन नहीं पकड़नी है....खी खी खी. दोना रखा करो. उसमें खाने में और मज़ा आता है.
इश्श! इतना अपनापन झलकता है कि उई माँ! कहीं नज़र ही न लग जाए इस अपनापे को!
और फिर प्रथम गोलगप्पे के मुँह में जाते ही अहा! सारी क़ायनात एक तरफ....कैसा चमचमाता है, ये चेहरा, सारी दुनिया का नूर छलकता है! जुबां मस्तिष्क तक ये गीत भेजने को लालायित हो उठती है, "तुम आ गए हो, नूर आ गया है/ नहीं तो चराग़ों से लौ जा रही थी" उधर से भी लपककर तुरंत जवाब आता है,"जीने की तुमसे, वजह मिल गई है बड़ी बेवजह ज़िन्दगी जा रही थी." 

नैतिक शिक्षा: उपर्युक्त वर्णन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्ता और विपक्ष को एकसूत्र में बाँधने का काम गोलगप्पा ही कर सकता है. इसी के मंच पर खड़े होकर समस्त भारतवासी एक दिखाई देते हैं. अतः हमें इसे राष्ट्रीय स्वाद्कलिका योजना के तहत राष्ट्रीय तेजाहार (फ़ास्ट फ़ूड) घोषित करवाने के लिए संगठित होना ही पड़ेगा. जय भारत!
- प्रीति 'अज्ञात'
पोस्ट इंडिया टुडे ग्रुप के ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म, iChowk पर पढ़ें- 

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

भुजरियाँ

मध्यप्रदेश में रक्षाबंधन के अगले दिन एक बड़ा प्यारा पर्व मनाया जाता है, भुजरिया। इसे भुजरियाँ या कजलिया भी कहा जाता है। संभवतः यह अन्य प्रान्तों में भी किसी न किसी रूप में मनाया जाता होगा पर मैंने इसे भिंड में ही देखा-समझा।
इसमें अन्न के दानों (गेहूँ, धान, जौ इत्यादि) को छोटे-छोटे गमलों, टोकरी में बो देते हैं, प्रतिदिन स्त्रियाँ इन्हें पानी देकर देखभाल करती और पूजती हैं। जब इनसे पौधे निकलते हैं तो गीत गाये जाते हैं और यह सब एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसे सिराने के लिए नदी-तालाबों तक लोग समूह में बड़े उत्साह के साथ पहुँचते हैं। यह अच्छी फसल की कामना का प्रतीकात्मक त्योहार तो है ही पर इसमें भी लोग होली-ईद की तरह गले लगते हैं और सारी कटुता भुलाकर मित्र बन जाते हैं। 

मुझे इतना ही याद है कि इस दिन घर में बहुत आना-जाना लगा रहता था। सब आते, भुजरियाँ देते और बदले में हम भी उन्हें अपनी भुजरियाँ देते। आने वाले लोग या तो पैर छूते या भुजरियाँ कान के पास लगाते, यह उम्र के हिसाब से तय होता था। हम भी ऐसा ही करते थे। 
बच्चों में इस पर्व को लेकर ख़ास ख़ुशी होती थी एक तो छुट्टी मिलती, उस पर सारे दिन घूमने का मामला भी सेट रहता। हाँ, बारिश बहुत हुआ करती थी इस दिन, पर लोगों का उत्साह सदैव ही इस पर भारी रहा करता था।

'नदिया के पार' के एक गीत 'कौन दिसा में लेके चला रे बटुहिया' का एक रीमिक्स भी बनाया था मैंने, जिसका मुखड़ा था -
कौन दिसा में लेके चलारे भुजरियाँ
ओये चटर-पटर, ये सुहानी सी मटर 
ज़रा खावन दे, खाआवन दे
मन भरमाये बड़ी तेज ये दुपरिया 
कहीं खाई जो मटर, दिन जायेगा गुज़र
भैंसा हाँकन दे, हाँकन देएए
हाँ, एक बात और! मैं छोटी थी और उस समय इस एक बात पर मुझे बहुत हँसी आती थी कि जब भी भुजरियों का लेन- देन होता; दोनों पक्ष हाथ जोड़कर एक-दूसरे से 'नमस्ते' जरुर कहते। मुझे ये औपचारिकता बहुत अजीब लगती और मैं नमस्ते कहने के साथ ही ठिलठिल कर खूब हँसती थी।
यूँ मैं तो बेवज़ह भी जमकर हँसती हूँ। 
अच्छा, नमस्ते 😎🙏
- प्रीति 'अज्ञात'
* पक्की बात है कि अब कुछ लोगों को यह गीत गुनगुनाने की इच्छा हो रही होगी। ल्यो, लिंक दे रहे -
https://www.youtube.com/watch?v=x3iVHlSoJAs

सोमवार, 20 अगस्त 2018

Wish List

मुझे हर विषय में रुचि है, सिवाय भूगोल के. यूँ हमेशा से पढ़ाकू और अच्छी विद्यार्थी रही हूँ पर न जाने क्यों ये भूगोल गोल ही हो जाता है. मुझे न दिशाएँ समझ आतीं हैं और न रास्ते. पर फिर भी मैं नई राहों से गुज़रने की हिम्मत जुटा पाती हूँ. मुझे जंगलनुमा स्थानों में भटकना पसंद है क्योंकि यहाँ सारे पेड़ किसी बातूनी दोस्त की तरह बकबक करते गले मिलते हैं. उन पर फुदकते पक्षी कुछ इस तरह से मस्ती और उल्लास से भरे लगते हैं जैसे मायके आकर लड़कियाँ चहकती, इतराती घूमती हैं. कभी-कभी तो यूँ भी महसूस होता है कि किस्से-कहानियों से निकल वो अलादीन का जिन्न या कोई सुन्दर सी परी भी अभी सामने आ खड़ी होगी और मेरा हाथ थाम मुझे वहाँ की सबसे अनोखी मीठी झील के पास छोड़ आएगी. डाल पर अकेला कुछ सोचता हुआ बैठा पक्षी मुझे अपने पूर्वजन्म का कोई प्रेमी सा लगता है जिसका मेरा साथ कभी लकीरों ने लिखा ही नहीं! मैं उसके गले लग जी भर रोना चाहती हूँ या इस दूरी के लिए झगड़ना.....यह कभी तय ही न कर सकी! बस हम दोनों ख़ामोशी से एकदूसरे को एकटक देख आगे बढ़ जाते हैं. मैं चाहती हूँ वो जिस भी दुनिया में हो, मेरा सारा प्रेम महसूस कर सके! मुझसे शिक़ायतें न रखे कि उसके जाते समय मैं उसे रोकने के लिए अनुपस्थित क्यों थी! क्योंकि ये नाराज़गी तो उससे कहीं ज्यादा मुझे ख़ुद अपने-आप से भी है.
उसके हिस्से का प्यार मुझे मिले न मिले, पर मेरी हर ख़ुशी उसके नाम लिख देना चाहती हूँ और यह दुआ भी कि उसे किसी को मिस न करना पड़े कभी! मैं यह बात भी उसको समझाना चाहती हूँ कि उसे थोड़ा ठहरना चाहिए था क्योंकि कहकर ली गई विदाई, बिन कहे सदा के लिए अचानक चले जाने से कहीं बेहतर होती है!

पहाड़ की ऊँची चोटी मुझे उतनी प्रभावित नहीं करती जितनी कि वहाँ पहुँचने से पहले की यात्रा सुहाती है. वहाँ मैं कई मर्तबा रुक-रुककर न केवल अपनी श्वाँस को सामान्य करती हूँ बल्कि उस पल भर के ठहराव को भी खुलकर महसूस करती हूँ और अपने कैमरे में क़ैद भी. यहाँ रोज चढ़ने-उतरने वाले लोग जब डग भरते हुए आगे निकल जाते हैं तो मेरा मन उनके प्रति आदर से भर उठता है और उनके होठों के इर्दगिर्द उभरती दो लक़ीरें मुझमें अपार ऊर्जा का संचार कर देती हैं. रोज चढ़ने-उतरने वाले इन लोगों के मन में कभी भी इस काम को लेकर उबाऊपन नहीं दिखता. ये खुश हैं अपने-आपसे.
समंदर के साथ-साथ मीलों चलना चाहती हूँ ये जाने बिना कि न जाने उस आख़िरी छोर पर क्या होगा, कुछ होगा भी या नहीं! पर मैं उस तक पहुँचना चाहती हूँ. मछुआरे जाल फेंकते हैं, उनका समूह एक साथ गाते हुए एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाता है. कभी नाव को किनारे लगाते समय सब पंक्तिबद्ध खड़े होकर रस्सी खींचते हैं. मैं ठिठककर उनके पास खड़ी हो सहायता करने की सोचती हूँ, ये जानते हुए भी कि इस रस्सी को थाम लेने भर से मैं इसे खींच नहीं पाऊँगी और यह प्रयास भी बेहद बचकाना है..... पर ऐसा करना अच्छा लगता है मुझे.
रेगिस्तान की भी अपनी अलग ही अदा है! यहाँ रेत के सुनहरे टीले जैसे 'आओ' कहकर अपनी ओर बुलाते हैं और दूर तक पसरी मृगतृष्णा किसी नटखट बच्चे-सा खेल खेलने लगती है. एक नन्हा पौधा भी अपार प्राण वायु का अनुभव करा जाता है और उसी के नीचे खेलता वो गोल मटोल लाल-काला सा कीड़ा किसी पुष्प की तरह मन को खिला देता है. रेगिस्तान के जहाज तसल्ली से लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं. बबलू, राजू, जेम्स बांड जैसे नाम धर ये झट से पर्यटकों से उम्र भर का रिश्ता जोड़ लेते हैं जिसे वो अपनी यात्रा की कहानियों में बार-बार दोहराते हैं.

कई बार सोचती हूँ कि बिना उठापटक, बिना राजनीति और लड़ाई-झगड़ों से दूर इन जंगलों, पहाड़ों, नदियों और रेगिस्तान की दुनिया में कितना प्रेम भरा है, कितनी सच्चाई है, कितनी एकता है. अपेक्षाएँ कम हैं, सो दुःख भी कम ही होंगे तभी तो इनकी औसत आयु हमसे ज्यादा है. तो फिर ये हमारे शहरों को ही क्या हो गया है कि इनकी भूख ही नहीं मिटती? रोज ही ये धरती का सीना क्यों चीर देते हैं? आख़िर कौन लील रहा है हमें? क्या हम स्वयं ही??
न जाने क्यों....मैं अब भी उस परी के मिलने की उम्मीद लिए अपनी Wish List रोज दोहरा लेती हूँ. 
- प्रीति 'अज्ञात'
#Wish List #प्रकृति 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

मुल्क


जब स्कूल में पढ़ते थे तो कभी-कभार बच्चों को फ़िल्म भी दिखाई जाती थी. 'मुल्क' ऐसी ही फ़िल्म है जो अगर स्कूल न दिखाए तो आप अपने बच्चों के साथ जाएँ क्योंकि उन तक इसकी सोच और गहराई का पहुँचना बेहद जरुरी है.
फ़िल्म में ऋषि कपूर जी के लाज़वाब अभिनय ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि 102 नॉट आउट के बाद वे अपनी दूसरी पारी भी फुल फॉर्म में खेलने वाले हैं. तापसी पन्नू, प्रतीक बब्बर, आशुतोष राणा, रजत कपूर, नीना गुप्ता ने भी बेहतरीन अदाकारी की है. बिलाल के रोल को मनोज पाहवा जी ने इतनी शिद्दत से निभाया है कि थिएटर से बाहर आने के बाद भी उनके शब्द दिमाग़ में गूँजते रहते हैं, "मेरा नाम बिलाल है....." पुलिसिया जाँच के समय एक निर्दोष इंसान  के रूप में उनका अभिनय रोंगटे खड़े कर देने वाला है.

फ़िल्म के संवाद कट्टरपंथियों के गाल पर तमाचे की तरह पड़ते हैं -
"मेरे घर में मेरा स्वागत करने का हक़ उन्हें किसने दिया? ये मेरा भी उतना ही घर है जितना कि आपका!"
"ये वो घर है, जिसमें वो परिवार रहता है जिसने 1947 में मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना था."

इसमें कोई शक़ नहीं कि अनुभव सिन्हा की यह फ़िल्म उन्हें कई ऊँचाइयों पर ले जायेगी. राजनीति जहाँ तोड़ने में यक़ीन रखती है वहीं कला जोड़ने का काम करती है. कला का क्षेत्र और असल कलाकारों का ह्रदय ऐसा ही होता है जो सारे भेदभाव से दूर रह साथ रहने को अहमियत देता है, उसका समर्थन करता है. 'मुल्क' इसी भावना का बुलंद स्वरों में आह्वान करती है. वे लोग जो हर बात में केवल ख़ुद को ज़िंदाबाद और ये कहते नहीं अघाते कि "गर्व से कहो... फलाना ढिमका हूँ." उन्हें तो यह मूवी दो-तीन बार देखना चाहिए क्योंकि एक बार में तो अक़ल आने से रही! 😃
- प्रीति 'अज्ञात'
@chintskap @anubhavsinha #मुल्क #Mulk


शनिवार, 11 अगस्त 2018

#अंडमान_डायरी

अंडमान जाकर आप एक क़सक के साथ न लौटें, यह तो संभव ही नहीं क्योंकि एक ओर जहाँ इसके द्वीपों का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य आपको मंत्रमुग्ध कर देता है और आपका मन प्रसन्न हो झूमने लगता है तो वहीं cellular jail की यात्रा भीतर तक बेचैन कर देती है। दशकों तक चली अमानवीय यातना की लम्बी कहानी रात भर सोने नहीं देती। आँख भर आती है और इस पावन धरा को चूमने को ह्रदय लालायित हो उठता है  जिसे स्वतंत्र कराने के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने क्या-क्या कष्ट नहीं झेले!

अंडमान में घूमने को बहुत कुछ है। उस पर लिखने बैठूँ तो एक पुस्तक ही रच जाए। बस इतना जान लीजिये कि जब भी यहाँ आयें तो कम-से-कम पाँच दिन ठहरने का समय अवश्य रखें। यह भी याद रहे कि हम उस भाग्यशाली समय में यहाँ हैं जहाँ हम गले में कैमरा लटकाये स्वतंत्र घूम सकते हैं और इसकी सुंदरता को क़ैद कर सकते हैं।
अंडमान के लोग अच्छे और ईमानदार हैं। लगता तो नहीं कि यहाँ चोरी-चकारी टाइप घटनाएँ कभी होती भी होंगीं। धरना और हड़ताल का नाम भी इन्होंने शायद ही सुना हो। अपनी धुन में मस्तमौला इन लोगों के बीच जाकर लगता है कि दुनिया आज भी कितनी भोली और मासूम है। प्रकृति की सुंदरता के बीच बसे लोगों को अपराध से क्या वास्ता! अति महत्वाकांक्षा और ईर्ष्या से कोसों दूर रहने वाले इस द्वीप के लोग बिना किसी शिक़ायत खुश रहना जानते हैं। 
'स्वच्छ भारत अभियान' का कोई पोस्टर तो यहाँ नहीं दिखा पर स्वच्छता को देख दिल बेहद खुश हो गया। सच तो यही है कि इन सब आडम्बरों की आवश्यकता ही नहीं होती; समझ स्वयं ही विकसित करनी पड़ती है। अत्यधिक भाग्यवान हैं वे सभी, जिनका जन्म आज़ादी के बाद हुआ। लेकिन इस अमूल्य आज़ादी को किन-किन भीषण कष्टों और अमानवीयतापूर्ण व्यवहार को झेलते हुए प्राप्त किया गया, कितने लोग शहीद हुए, कितने घर उजड़े; उन सब सच्ची घटनाओं को बार-बार सुनाना, उन पर लिखा जाना अत्यधिक आवश्यक है कि हमें इस स्वतंत्रता की विलक्षणता का अहसास हो और हम अपने भारतीय होने पर गौरवान्वित महसूस करें। देशप्रेम, सहृदयता और संवेदनाओं का झरना  हर दिल से फूटे और हम आपसी भेदभाव, कट्टरता को भूल अपनी मातृभूमि को एक साथ नमन करें।
यहाँ गाइड एवं स्थानीय लोगों द्वारा जो जानकारियाँ प्राप्त हुईं, उन्हें साझा कर रही हूँ। जो अंडमान नहीं गए हैं, वे समय निकालकर अवश्य पढ़ें। 











अंडमान को काला पानी क्यों कहा जाता है?
यह 'काल' और 'पानी' दो शब्दों से मिलकर बना है। 'काल' अर्थात मृत्यु, जहाँ से कोई ज़िंदा वापिस नहीं आ सकता। तात्पर्य यह कि यदि कोई अंडमान आ गया तो समझिए काल का ग्रास बन गया। 'पानी' तो स्पष्ट ही है, अंडमान निकोबार द्वीप समूह के चारों ओर हजारों मील तक पानी ही पानी है कोई क़ैदी भागे भी तो कहाँ तक! भागकर आसपास के जंगलों में पहुँचते तो आदिवासी देखते ही मार डालते थे। जंगल में खाने को कुछ नहीं था, इन आदिवासियों से बचते तो भूख से मरना तय था या फिर उन दिनों मलेरिया से उनकी मृत्यु हो जाती थी।

सेनानियों को यहाँ लाने का उद्देश्य -
जेल के गाइड की मानें तो किसी भी राजनीतिज्ञ/नेता को अंडमान में फाँसी नहीं दी गई। उन्हें भारत के अन्य जेलों में फाँसी दी जाती थी। यहाँ स्वतंत्रता सेनानी, आजीवन कारावास के लिए भेजे जाते थे। भीषण यंत्रणा, बीमारी और जबरन भोजन खाने से उनकी मृत्यु हुआ करती थी। जबरदस्ती खाना तब खिलाया जाता था जब क़ैदी भूख हड़ताल करते थे। वे मुँह से नहीं खाते या इंकार करते, तो हड़ताल तोड़ने के लिए उनके हाथ-पाँव बाँधकर नाक में नली डालकर द्रव्य पदार्थ पिलाया जाता था, जैसे - चावल का मांड या दूध। इस कारण महावीर सिंह, मोहित मोइत्रा आदि की मृत्यु हुई। फाँसी केवल उन्हीं लोगों को दी जाती थी जो अंडमान में आने के बाद दोबारा कोई अपराध करते थे। cellular jail के फाँसी घर में कम लोगों को फाँसी दी गई पर कितनों को दी गई, इसका कोई रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है। 
ब्रिटिशर्स द्वारा क्रांतिकारियों को अंडमान लाने का मुख्य उद्देश्य उन्हें शारीरिक, मानसिक यंत्रणा देना और किसी से संपर्क न करने देना था। तात्पर्य यह कि एक बार जो यहाँ आ गया तो उसके पास किसी की कोई जानकारी न रहे और न ही कोई उसके बारे में कुछ जान सके। 

क़ैदी और अत्याचारी में भेद -
क़ैदियों की सामान्य यूनिफॉर्म में कुर्ता और हाफ पेंट हुआ करते थी, गले में लोहे का छल्ला, लोहे की प्लेट उनकी पहचान थी, उस पर जेल का नंबर और दंड की अवधि लिखी होती थी। उनके पाँव में कड़ा, हाथ में हथकड़ी बाँधकर उन पर शारीरिक अत्याचार किये जाते थे जिससे मारते समय क़ैदी हिल भी न पाए। यह सजा बाक़ी कैदियों में भय उत्पन्न करने के लिए किसी एक कैदी को दी जाती थी। दुर्भाग्य यह कि मारने वाला भी भारतीय ही होता था। स्वतंत्रता सेनानियों के अलावा वहाँ असल अपराधी भी आते थे। इन अपराधियों में से जो हट्टा कट्टा, दिमाग से कमजोर पर अत्याचारी प्रवृत्ति का होता था, ऐसे लोगों को पहचानकर ब्रिटिशर्स काम पर रखते थे। इनमें से ही अटेंडेंट, जमादार, वार्डन बनाये जाते थे। इनको कैदियों से काम करवाने तथा उन पर शारीरिक अत्यचार करने को कहा जाता था। बदले में इन्हें अच्छा खाना मिलता था और साथ ही यह सुविधा भी कि न तो कभी इन्हें इस तरह का कठिन परिश्रम करना पड़ता और न ही इन्हें कोई मारपीट ही सकता था। यही इनकी तनख्वाह भी थी। 

फ़ाँसी घर -
यहाँ जब बाहर खड़े होते हैं तो पता ही नहीं चलता कि यह सुन्दर सा दिखने वाला कक्ष 'फाँसीघर' है। आसपास की हरियाली और टूरिस्ट के बीच यह चित्र देखने में बहुत सुंदर लगता है लेकिन इसके भीतर की कहानी उतनी ही भयावह एवं दुखदायी है। पहले खुले में फाँसी दी जाती थी, वुडन बीम और प्लेटफॉर्म उस समय के ही हैं एवं रस्सी नई है। यहाँ तीन लोगों को एक साथ फाँसी दी जाने की व्यवस्था थी। बायीं तरफ़ लोहे का lever है। गले में फंदा डालने के बाद इस lever को pull करते ही प्लेटफार्म नीचे की तरफ़ खुल जाता था, नीचे आठ फ़ीट गहरा कमरा है। फाँसी पर झूलते ही क़ैदी की मृत्यु हो जाती थी। शव को साइड के गेट से बाहर ले जाकर अंतिम संस्कार करते थे।

टॉर्चर फैक्ट्री (प्रताड़ित करने का कारखाना) -
प्रताड़ना का कोई एक तरीक़ा तो था नहीं, अंग्रेज़ों ने हमारे सेनानियों को कष्ट देने के लिए वीभत्सता की सारी हदें पार कर ली थीं। यह 'टॉर्चर फैक्ट्री' उनकी इसी घृणित सोच का जीता-जागता उदाहरण है। यहाँ पहुँचते ही आपका ह्रदय उन जालिमों के प्रति नफ़रत से भर जाता है और आप उन्हें कोसे बिना रह ही नहीं सकते।

कोल्हू -  इसका भार 150 किलो है। इससे एक कैदी को एक दिन में 30 पौंड नारियल तेल निकालना होता था। जो बैल भी सारा दिन जुतकर नहीं निकाल सकते थे; तो इंसान कहाँ से निकाल पाते! जब हमारे सेनानी कोल्हू चलाते-चलाते थक जाते और इंकार करने लगते थे तब अंग्रेज़ उनका हाथ पकड़कर जबरन चलवाते और पीछे से हंटर भी मारते थे। कुछ क़ैदी इसी कोल्हू को चलाते-चलाते बीमार पड़ जाते और कुछ की मृत्यु हो जाती थी। जो जीवित शेष रहते तो उनका जीवन नर्क़ से भी बदतर बना दिया जाता और उन्हें भयावह यातना और अथाह पीड़ा के विभिन्न चक्रों से गुजरना पड़ता था। 

सेलुलर जेल में यातना के कई प्रकार थे -
*जो क़ैदी अपना काम पूरा नहीं करते थे, एक हफ्ते के लिए उन्हें कोठरी के बाहर हथकड़ी में रखा जाता था। पहली बार एक दिन में 8 घंटे हथकड़ी लगाई जाती। उसके बाद दो दिन बोरे की बनी ड्रेस पहननी होती थी, जिससे उन्हें गर्मी ज़्यादा लगे और पूरे शरीर में खुजली होती रहे। बँधे हुए हाथों से कोई कैसे खुजा सकता था! हमारे सेनानी इस अपार वेदना को सहते रहे।

तीन तरह के punishment chain fetters थे। इन्हें एक वर्ष पहनाते थे, पहले में हाथ फ्री है और क़ैदी चल सकता था। पर पैरों में वजन बंधा होता था। 
Bar fetters, छह माह पहनाते थे। चलते समय इन्हें पकड़कर चलना पड़ता था और काम करते समय छोड़ देते थे।
Danger cross में पाँव के नीचे लोहे की छड़ होती थी।  जिससे सबके पैरों में घाव हो जाते थे क्योंकि चलते वक़्त ये rod उनके पाँव से घिसती जाती थी।

क़ैदियों की दिनचर्या -
खाना खाने के लिये लोहे की प्लेट होती थी जिसमें दाल, चावल, रोटी सब्ज़ी, उतना ही दिया जाता था जितना कि जीवित रहने को आवश्यक है पर उतना नहीं कि पेट भर सके। पीने के लिए दिन में दो बार गंदा पानी ही मिलता था। रात में बिजली नहीं होती थी । बस सुरक्षाकर्मी एक लालटेन लिए बाहर घूमा करता था। और वे उसी घुप्प अंधेरे में सोया करते थे। बेड, लकड़ी के बने थे।
दिन भर क़ैदी बाहर काम करते थे। ग्राउंड में उनके लिए कॉमन toilets थे। कुछ कैदियों को कोठरी के अंदर ही काम देते थे, उनके लिए नियम यह था कि वे दिन में 3 बार बाहर जाकर टॉयलेट्स का इस्तेमाल कर सकते थे। लेकिन ब्रिटिशर्स के तय किये समय पर ही। शाम 6 से सुबह 6 तक सब लॉकअप में ही रखे जाते थे जहाँ उन्हें मिट्टी का कटोरा दिया जाता था, जिसे हम सकोरा कहते हैं। जो भी करना इसी सकोरे में,रात में उन्हें इसी का प्रयोग कर उसी दुर्गंध में सोना होता था। सुबह स्वीपर आकर ले जाता था।

काल कोठरी
एक cell में एक ही व्यक्ति रहता था जिससे वह मानसिक रूप से भी प्रताड़ित हो, बातचीत न कर सके और शोषकों के विरुद्ध कोई योजना न बना पाए।
बात करना तो दूर, एक विंग का क़ैदी, दूसरे विंग के क़ैदी को देख भी नहीं सकता था। लॉक भी इस तरह के कि खोल पाना असंभव क्योंकि कुंडा दूर लगा हुआ था और वहाँ हाथ पहुंच ही नहीं सकता था।
इस समय 7 में से 3 ही विंग शेष हैं। जो हिस्सा रहने लायक नहीं वहाँ हॉस्पिटल बना दिया गया है। विंग के टूटे हुए हिस्सों के स्थान पर हॉस्पिटल है जहाँ दवा, उपचार, एक्सरे, स्कैन सारे परीक्षण निशुल्क होते हैं। विंग में एक जगह प्रदेश के आधार पर क्रांतिकारियों की सूची लगी हैं। गाइड की मानें तो सबसे अधिक बंगाल और फिर पंजाब के क्रांतिकारी यहां रहे थे।

वीर सावरकर जी की कोठरी
वीर सावरकर जी की कोठरी में दो दरवाजे लगे हैं। इनमें खतरनाक क़ैदी को रखा जाता है। उन्हें 10 वर्षों तक यहां रखा गया। सावरकर जी को जब इंग्लैंड से गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था तब वे जहाज के टॉयलेट का glass तोड़ वहाँ से कूदे और तैरते हुए दूसरे बंदरगाह पहुंचे। जहाँ फ्रांसीसी गार्ड ने उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद उन्हें ब्रिटिश गार्ड्स ने अपने कब्जे में ले लिया। भारत लाकर उन पर केस चला। 6 माह बाद उन्हें अंडमान भेजना तय किया गया। ब्रिटिशर्स डरते थे कि ये दोबारा न भागें, इसलिये उन्हें कड़े पहरे में रखा गया। उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर जी उनसे पहले से ही यहाँ थे, पर दो वर्ष तक दोनों आपस में मिल भी न सके। जब बड़े भाई बीमार हुए तब पहली बार वीर सावरकर जी से उनकी अस्पताल में मुलाकात हुई। उसके बाद 1921 में उन्हें cellular jail से  रत्नागिरी महाराष्ट्र ट्रांसफर करवा दिया गया। 3 साल बाद वहां नज़रबंद रख फिर उन्हें छोड़ा गया। 
सोचकर भी रूह काँप जाती है कि जिस स्थान पर हमारा 10 मिनट खड़े रहना भी मुश्क़िल है वहां उन्होंने दस वर्ष गुजारे।
आज अंडमान एयरपोर्ट उन्हीं के नाम पर है।

जापानी कब्ज़ा -
सेलुलर जेल को ब्रिटिशर्स ने 1938 में खाली कर दिया था एवं सभी क़ैदियों को भारत की जेलों में ट्रांसफर करवा दिया था। इस तरह 1858 से 1938 तक चली कालापानी की अमानवीय सज़ा का पटाक्षेप हुआ। उसके बाद अंग्रेजों का राज रहा पर यह अत्याचार बंद हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान ने अंडमान पर कब्ज़ा कर लिया था । साढ़े तीन साल उनका कब्ज़ा रहा। जो इंडियन यहाँ बसे हुए थे, उनमें से कुछ शिक्षित और कुछ इंडियन इंडिपेंडेंट लीग से जुड़े लोग थे। जापानीज को संदेह होता था कि वे अंगेज़ों के लिए जासूसी कर रहे हैं। जिसके प्रति भी ब्रिटिशर्स के प्रति सहानुभूति का शक होता, वे उसे जेल में लाकर प्रताड़ित करते थे। जापानियों के अत्याचार और भी भयावह थे।
यदि अंग्रेजी बम न गिरते तो आज अपना अंडमान जापानी कब्ज़े में होता।

भारतीय झंडा-
उसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी का अंडमान आना हुआ था। 30 दिसंबर 1943 को वे सेलुलर जेल आये और उन्होंने पहली बार यहाँ भारतीय झंडा फहराया था। उसके बाद उन्होंने इस द्वीप समूह को दो नाम भी दिए। अंडमान को 'शहीद द्वीप' और निकोबार को 'स्वराज द्वीप'। 
ब्रिटिशर्स के रॉयल एयर फोर्स ने अंडमान में जापानियों के ऊपर बहुत बम गिराए उसके बाद जापनियों ने सरेन्डर कर दिया। और कुछ समय बाद 1945 में वे अंडमान छोड़कर चले गए। डेढ़ साल पुनः अंग्रेजों का राज़ रहा। चूँकि यहां भारतीय अधिक थे अतः स्वतन्त्रता के समय उन्होंने  यह हमें सौंप दिया और इंग्लैंड लौट गए। 

भारतीय यहाँ इसलिये अधिक थे क्योंकि जब अंडमान में क़ैदियों को भेजना शुरू किया गया था तो जो क़ैदी एक बार यहाँ आ गया उसे तब वापिस ही नहीं भेजते थे, चाहे सजा पूरी हो गई हो या उसमें छूट भी हो। एक बार जो आ गया वो वापिस जा नहीं सकता था। उन्हें यहीं बसाते थे। जमीन देते थे, खेती बाड़ी करो या अंग्रेजों के पास काम कर जीविकोपार्जन करो। कहते हैं, आज अंडमान में जो लोग हैं वे उन्हीं के वंशज हैं।
- प्रीति 'अज्ञात'
#अंडमान_डायरी

सोमवार, 6 अगस्त 2018

प्रकृति, विभाजन में विश्वास नहीं रखती!

सूरज कभी भी अपने नाम की तख़्ती लिए नहीं घूमता और न ही चाँद अपनी सूरत को देख स्वयं आहें भरा करता है। जीवनदायिनी प्राणवायु सरसराती हुई किसी तप्त मौसम में शीतलता ओढ़ाती और शीत ऋतु में जमकर ठिठुराती है पर आज तक उसने हौले-से भी कभी कानों के पास आकर यह नहीं कहा कि "सुनो, मैं हवा हूँ"....सागर, नदियाँ, ताल-तलैया कभी अपनी पहचान की माँग नहीं करते। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ तक अपनी जगह मौन, स्थिर खड़े हैं किसी ने हरियाली की चादर ओढ़ी हुई है तो कोई सर्द बर्फ़ की मोटी रजाई में आसरा लिए पड़ा है, कोई पत्थरों से क्षत-विक्षत। पर अपनी-अपनी ऊँचाई के घमंड से चूर हो या दूसरे से घृणा/ईर्ष्या कर ये सब एक-दूसरे को आहत करते कभी नहीं पाए गए। वृक्षों ने भी अपने छायादार, फलदार, कँटीले, लघु-वृहद स्वरुप को लेकर कोई प्रश्न नहीं उठाये। पुष्प सदियों से मुफ़्त में ही अपनी सुगंध फैलाते आ रहे हैं। प्रत्येक देश-प्रदेश की माटी का रंग अलग-अलग पर फिर भी सभी वनस्पतियों को एक-सा प्रेम देती है। जीव-जंतुओं का आसरा भी यह भूमि ही है, जो अपने नाम का उल्लेख तक नहीं करती।

तात्पर्य यह कि जो देना जानता है, वह न तो अपने गुण कभी गिनाता है और न ही श्रेय लेने का प्रयास करता है। सब कुछ उसे स्वतः मिलता है। प्रकृति विभाजन में विश्वास नहीं रखती। अच्छाई स्वयं अपनी पहचान बनाती है और सद्कर्मों को गिनाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। सूरज की रोशनी ने हम में जीवन भरा, हमने बिन मांगे उसे सरताज बना दिया। चाँद की शीतलता को प्रेम से जोड़ हमने उसे पवित्र प्रेम के सर्वोच्च शिखर पर बिठा दिया। हवाओं के आगे सर झुकाया और ऋतुओं के गुणगान किये। देश-प्रदेश, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को उनके गुणधर्मों के आधार पर विभाजित कर संवाद हेतु सुविधाजनक मार्ग बनाया। बात यहीं पर रुक जानी चाहिए थी। परेशानी ने अपने पाँव तब पसारने प्रारम्भ कर दिए जब हमने मनुष्यों को बाँटना शुरू किया। किसी को उत्कृष्ट और किसी को निकृष्ट मानना तय कर लिया गया। किसी को सारे अधिकार मिले तो कोई युगों तक वंचित रहा। पाने का अर्थ छीनना और जीतने की परिभाषा दमन हो गई। धर्म के पक्ष में खड़े होना तो स्वाभाविक है पर अधर्म को भी सबल का आश्रय मिलता रहा। इंसानियत ने अपने अर्थ खोये। अधिक बुद्धि और तकनीक के ग़लत प्रयोगों ने न केवल अपराध को बढ़ावा दिया बल्कि इंसानों से उनके दिन-रात छीन लिए। अब हम विज्ञान और तकनीक के उपभोक्ता नहीं; ग़ुलाम बन चुके हैं। यह एक ऐसा मुश्किल समय है कि अब एक क़दम आगे बढ़ाने से बेहतर है कि दो क़दम पीछे खींच कुछ पल ठहरा जाए, विचार किया जाए कि सर्वश्रेष्ठ हो जाने की दौड़ में कितना कुछ छूट रहा है। कितनी ऐसी घटनाएँ हैं, जिनका घटित होना या उन पर हमारी चुप्पी हमें पशुओं की श्रेणी में सम्मिलित कर रही है। हम सच के साथ खड़े होने में हिचकते क्यों हैं? अन्याय का विरोध करने की शक्ति इतनी क्षीण क्यों हो गई है? हमारे भीतर की इंसानियत हमें झिंझोड़ती, धिक्कारती क्यों नहीं?
जैसे-जैसे मनुष्य बँटते गए, मनुष्यता क्यों सरकती जा रही है?

यहाँ यह स्वीकारोक्ति भी आवश्यक है कि निश्चित तौर पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक बहुत कुछ बदला है और विश्व के मानचित्र पर हमारी उपस्थिति हमें गौरवान्वित करती है। परेशानी जो है, वो घर के भीतर ही है और अब दुनिया की नज़र में आने लगी है। इससे स्वतंत्र होना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए-
गली, मोहल्ले, गाँव, शहर के स्नेह को हृदय में सजाये हुए इस देश के प्रत्येक नागरिक को सबसे पहले स्वयं को भारतीय स्वीकारना होगा। तभी वह अपने-अपने प्रदेश की वाह-वाही और दूसरे पर आक्षेप की मानसिकता से स्वतंत्र हो सकेगा। हर घटना के हिंदू-मुस्लिम मुलम्मे ने देशवासियों को सिवाय पीड़ा के और कुछ भी नहीं दिया, हमें इस पीड़ा से स्वतंत्रता चाहिए।

ग़रीब बचपन चीखकर रोता है, एक बेबस पिता कहीं बोझा ढोता है, इधर रोटी की प्रतीक्षा में तीन भूखे पेट दरवाज़े पर आँखें रख हमेशा-हमेशा के लिए वहीं गहरी नींद सो जाते हैं। जो रोटी न दे सके, वे उन्हीं भूखे पेटों को चीरकर मृत्यु के कारण तलाशने की कोशिशों में जुटे हैं। यह भूख का दोष ही रहा होगा कि वह कुछ नहीं कह पाती। सूखे हलक और आँतों से चिपककर सुन्न हो बैठ जाती है। हमें इस ग़रीबी और लाचारी से स्वतंत्रता चाहिए।

हमें भ्रष्टाचार, शोषण, अशिक्षा और अपराधमुक्त भारत चाहिए। हमें वह आज़ादी भी चाहिए, जिसमें हमारे बच्चों और प्रियजनों को घर से बाहर भेजते समय, यात्रा के समय हमारा मन सशंकित न हो और हम उनकी सुरक्षा के प्रति कोई घबराहट न महसूस करें। अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी की क़ीमत भले ही हम ठीक से न समझ सके हों, पर फिर भी हमने इसे भरपूर जिया है। अब यह आवश्यक है कि बच्चों को भी उनके हिस्से की स्वतंत्रता मिले-

बहुत समय हुआ जबसे मैंने 
इन आँखों में कुछ स्वप्न पाले हैं
ज़्यादा कुछ नहीं बस इनमें 
वो हँसते-खेलते बच्चे हैं 
जो अब भी पड़ोस में खेलकर 
माँ के बुलाने पर ही घर लौटते हैं 
जिन्हें आनंद मिलता है छुट्टी की घोषणा का 
और जो हो-हो कर तालियाँ पीट 
बैग उठा गलियों में सरपट दौड़ पड़ते हैं 
बच्चे, जो बारिश में रेनकोट लिए बिना
जब चाहे घर से निकलते हैं 
छपाक-छपाक कर कहीं भी कूद पड़ते हैं
और मस्ती के किस्से सुनाते एक पल भी नहीं अघाते
जो झूलते हैं बेझिझक दादा-दादी के कन्धों पर 
और अपनी मीठी बोली से नाना-नानी तक 
दुनिया भर की तमाम शिकायतें पहुँचाते हैं
बच्चे जो भयभीत नहीं
जिन पर स्कूल और पढ़ाई का 
अंतहीन भार नहीं 
जो अब भी मिट्टी में खेलते हैं 
चहककर बाग़ में तितलियाँ पकड़ते हैं
- प्रीति 'अज्ञात'
#हस्ताक्षर #प्रकृति #स्वतंत्रता #बच्चे 

http://hastaksher.com/rachna.php?id=1552

रविवार, 5 अगस्त 2018

मित्रता दिवस

'मित्रता दिवस' के मनाये जाने से उन लोगों के पेट में एक बार फिर से जबरदस्त मरोड़ उठ सकती है जो वैलेंटाइन डे को मातृ-पितृ दिवस और क्रिसमस को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाये जाने की वक़ालत किया करते हैं. मजेदार बात यह है कि फादर्स डे और मदर्स डे पर भी इनका यही सुर रहता है एवं तब इनकी सरगम से वही घिसी-पिटी धुन निकलती है कि "हम विदेशी दिवस क्यों मनायें जी, हमारे यहाँ तो सदा से माता-पिता पूजनीय रहे हैं." उसके बाद इनके द्वारा उदाहरण स्वरुप सदाबहार श्रवण कुमार जी की कहानी दोहराई जाती है जिसे सुन-सुनकर अब श्रवण कुमार की श्रवणेन्द्रियाँ भी असहज महसूस करती होंगी. मैं कभी यह सोच परेशान होती हूँ कि इनके पास और कोई उदाहरण क्यों नहीं होता! तो कभी तमाम वृद्धाश्रमों की तस्वीर आँखों में चुभने लगती है.  पर उस समय मेरा यह यक़ीन कि 'अच्छाई आज भी जीवित है', मुझे किसी निरर्थक बहस में पड़ने से रोक देता है. 
बहरहाल, बात चाहे जो भी हो पर मेरा मानना है कि 'जो अच्छा है उसका विरोध नहीं होना चाहिए.' ख़ासतौर पर तब जबकि वातावरण को दूषित करने के लिए कुछ लोग कटिबद्ध हो आपसी वैमनस्यता बढ़ाने की साज़िशें रच रहे हों. लोगों को तो इमरान ख़ान की इस बात से भी तक़लीफ़ हो गई है कि उन्होंने कपिल देव, गावस्कर और सिद्धू (siddhu) साहब को क्यों न्योता! यक़ीनन ऐसी सोच वाले दोस्ती का 'द' भी नहीं समझते.  

सकारात्मकता कभी बुरी नहीं होती इसलिए 'मित्रता दिवस' मुझे ईद, होली सरीख़ा लगता है क्योंकि यह तोड़ने नहीं, जोड़ने की बात करता है. जहाँ आप अपने मित्रों के गले लग पुराने गिले-शिक़वे दूर कर सकते हैं. जी चाहे तो उनकी पीठ पर मुक्का भी मार सकते हैं, लड़ सकते हैं और दुनिया-जहान की सारी परेशानियाँ उनसे साझा कर एक दर्ज़न गालियाँ खा अपने बेवकूफ़ होने का प्रमाणपत्र निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं. दोस्तों का कुछ बुरा नहीं लगता, उनकी नाराज़गी में स्नेह बरसता है. बस जब वो हमें नज़रअंदाज़ कर कहीं और भटकने लगें तब जरूर दिल गोलगप्पे सा फूलकर धचाक से टूट जाता है. पर जबसे सल्लू मियाँ ने बताया है कि 'दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी!' हम तुरंत ही मान भी जाते हैं.
- प्रीति 'अज्ञात'
* ये फोटो दो साल पुराना है, पर विचार अब भी वही हैं.
#मित्रता दिवस


मंगलवार, 31 जुलाई 2018

दो मिनट मौन

बकरी का किस्सा जब सुनने में आया तब समझ से बाहर था कि इसे क्या कहा जाए! क्योंकि इस घटना के सामने 'पाशविकता' एक सभ्य शब्द लगने लगता है और 'जानवर' इंसान से कहीं बेहतर नस्ल के प्राणी जान पड़ते हैं. दुःख यह है कि उनके पास  विरोध का कोई माध्यम नहीं.  न तो उन्हें गाली-गलौज़ कर अपना आक्रोश व्यक्त करना आता है और न ही उनमें पोस्टर लगा, मोमबत्तियाँ जलाकर शांतिपूर्ण तरीके से रैलियाँ निकालने की सभ्यता ही विकसित हुई है. संभव है यह भी कहा जाए कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं....तो चलो, मुज़फ्फ़रपुर की बात करते हैं. यूँ भी क्या फ़र्क़ है, इस बकरी और उन बच्चियों में! दोनों ही निरीह, दूसरों पर आश्रित, जिनके दुःख-दर्द से दस दिन बाद किसी को कोई वास्ता नहीं रहने वाला!  बड़ी-बड़ी घटनाएँ, हादसे, नृशंस हत्या, गैंगरेप के हज़ारों किस्से आसानी से गटकने वाले हम लोग अब चीख-चीखकर हार चुके हैं और मजबूरीवश ही समझिये पर पक्के हो चुके हैं. हमारी इस कमजोरी को आती-जाती सभी सरकारें और मीडिया तंत्र अच्छे से जान चुका है. तभी तो उस निर्लज़्ज़ अपराधी की हँसी यूँ ही नहीं है. यह धन का गरूर है, न्याय को खरीदने का दंभ है, ऊँची पहुँच का घिनौना प्रमाण है, आगे भी शोषण करते रहने का बुलंद दस्तावेज है.

सूरत, पानीपत, जींद, कठुआ, दिल्ली के उदाहरण तो बस अभी-अभी के हैं. अपराधी, अपराध करते समय एक बार भी नहीं सोचता होगा कि वह जिसके साथ कुकर्म कर रहा है वह एक मासूम बच्ची है, महिला या अधेड़ उम्र की महिला लेकिन 'न्याय-तंत्र' की व्यवस्था एकदम केयरिंग है वह पीड़िता की उम्र के आधार पर किसी वहशी की सजा 'एडजस्ट' कर अपनी महानता का परिचय देना नहीं भूलती. यूँ हम सभी जानते हैं कि भूले-भटके से कभी किसी को जेल की हवा खानी भी पड़ी तो पैसों की गर्मी उसे ससम्मान बरी कर ही देगी और न किया तब भी यहाँ 'दंड' का तात्पर्य वर्षों तक मुफ्त की रोटियाँ तोडना ही तो है, और इन्हें पालने-पोसने का खर्च करने को जनता है ही. उसे जब चाहे नोचा, निचोड़ा जा सकता है.

हम इतने आशावादी हैं कि तब भी सरकारों से उम्मीद रखते हैं और जुए  की तरह कांग्रेस, बीजेपी, आप की गोटियाँ फेंक जीतने की कोशिश करते हैं, जबकि राजनीति एक ऐसा खेल है जिसमें हर हाल में हार प्रजा के ही हिस्से आती रही है.
नेता बहुत बेचारे हैं, न छेड़िये उन्हें! उनके पास समय ही नहीं ... वे स्वयं को घोटालों और स्टिंग ऑपरेशन से बचाने की जुगत भिड़ायें या आपकी बकवास सुनें! आप ICU में तैरें या बाढ़ में डूबकर मर जाएँ, उन्हें तो हेलिकॉप्टर से बाढ़ पीड़ितों का दौरा कर ऊपर से टॉफियाँ उछालनी हैं, सभी बुरी घटनाओं की निंदा कर उसका ठीकरा अपने विरोधी पर फोड़ना है, विदेशों में अपनी महानता के पर्चे बाँट जयकारा लगवाना है. हम कहाँ गँवारों की तरह वही राग गाये जा रहे हैं! जबकि अब तक हमें आदत पड़ जानी चाहिए थी कि रोज सिर झुकायें और इंसानियत के नाम पर 'दो मिनट मौन की' श्रद्धांजलि अर्पित करें.
इस विषय पर मेरी यह आखिरी पोस्ट है.
- प्रीति 'अज्ञात' 
#मुज़फ्फ़रपुर

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

रोटी

'मृत्यु' बिकाऊ है और बेहद आसान भी! पैसों की गर्मी ने, संवेदनाओं को सोख लिया है। रुपया ही बोलता है, वही चलता है! जीवन उसी को कमाने की मशीन जो बन चुका है! भावनाओं का मूल्यांकन, संबंधों की सुंदरता, बचपन की मासूमियत, किशोरों की ठिठोली और मन की संतुष्टि अब ज़रूरतों की बाढ़ में डूबकर अपने अस्तित्व की खोज में भटक रही है! यहाँ जमीन के लिए लड़ाईयां होती हैं, इस सच को जानते हुए कि एक दिन इसी जमीन के अंदर गाड़े जाने वाले हैं, बम-विस्फोट की योजनाएं बनती हैं अपने ही देश को उड़ाने के लिए, कायदे-कानून की धज्जियाँ; खोए आदर्शों की तरह हर तरफ बिखरी दिखाई दे रही हैं। हड़ताल, अब अपनी जायज़ मांगों की पुकार न होकर सुनियोजित दंगे का भरम देने लगी है। अपने ही देश की संपत्ति को आग में झोंककर आखिर हम किस मुँह से अधिकारों की मांग करते हैं? 

गरीब बचपन चीखकर रोता है, एक बेबस पिता कहीं बोझा ढोता है, इधर रोटी की प्रतीक्षा में तीन भूखे पेट दरवाजे पर आँखें रख हमेशा-हमेशा के लिए वहीं गहरी नींद सो जाते हैं। जो रोटी न दे सके, वे उन्हीं भूखे पेटों को चीरकर मृत्यु के कारण तलाशने की कोशिशों में जुटे हैं। यह भूख का ही दोष रहा होगा कि वह कुछ नहीं कह पाती। सूखे हलक़ और आँतों से चिपककर सुन्न हो बैठ जाती है। इंसानियत को इन दिनों ज्यादा धक्का नहीं लगता। धक्के खा-खाकर हम सब भी तो अभ्यस्त हो चले हैं। काव्य की आँखों से दो बूँदें गिरती हैं; अदृश्य हो जाती हैं! चहुँ ओर एक मौन पसर जाता है, बीच में झिलमिलाती हुई मोमबत्ती थोड़ी देर जलकर, एक टूटी उम्मीद की तरह अंतत: वहीं हारकर बैठ जाती है! विरोध के स्वर भी उठते हैं और नया विषय मिलते ही उनकी दिशा ऐसे बदल जाती है जैसे किसी बच्चे को अगली कक्षा में प्रोमोट कर दिया गया हो और वो दौड़कर अपनी सारी पुरानी किताबें रद्दी वाले के लिए उठाकर एक कोने में पटक आता है। समय की एकत्रित हुई धूल. इसे पुराना घोषित कर देती है और इसमें रूचि समाप्त हो जाती है। 'मृत्यु अब एक समाचार भर है।'

मौतें रोज होती हैं, कारण बदलते रहते हैं! रोज हजारों लोग किसी-न-किसी अपराध की बलि चढ़कर अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं, परिवार ख़त्म हो जाता है, आँसू सूख जाते हैं, ह्रदय भीतर तक कसैला हो जाता है और एक परिवार समाज को घृणित भाव से देख अपनी सारी आशाएँ, किसी नदी में पार्थिव शरीर-सा प्रवाहित कर आता है! उसके विश्वास को किसने तोड़ा? इस समाज ने ही उसका सर्वस्व छीना है. इसीलिए जिस अनुपात में अपराध होते हैं, उसी अनुपात में उतनी ही नकारात्मकता समाज के प्रति बढ़ती जाती है।

विकास करना है, तो अपराध को रोकना होगा! रोते, उदास, मायूस चेहरों से परिवर्तन की उम्मीद न कीजिये साहेब ! उन्हें हौसला दीजिये, विश्वास दीजिये, उनकी खोई मुस्कान वापिस लौटाने की हलकी-सी कोशिश भी कुछ दिलों को रोशनी से भर देगी। और गर हमारे समाज में 'मौत' यूँ ही  सामान्य घटना बनकर रह गई तो फिर इस  'दर्पण' के टूटकर बिखरने में भी अधिक वक़्त नहीं लगेगा!

कवि ह्रदय और आम आदमी अब क्या करे? क्या लिखे? क्या पढ़े? क्या देखे? वेदना को मसोसते हुए झूठी तसल्लियाँ दे? या कि लाशों के ढेर से मुँह फेरकर, अपनी दो वक़्त की रोटियों की फ़िक्र करे!
- प्रीति 'अज्ञात' 
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बुधवार, 25 जुलाई 2018

मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे!

वे कहते थे, 'मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य'
यदि आपको कविता पसंद है तो आपने गोपालदास नीरज को अवश्य पढ़ा होगा, यदि संगीत के प्रेमी हैं तो उनके गीतों को भी ख़ूब सुना होगा। ख़ूब इसलिए क्योंकि जिसने एक बार सुन लिया तो वह उनका ही होकर रह गया और फिर एक बार से तो जी भरता ही कहाँ है! उनका जीवन जितने संघर्ष से गुजरा उतनी ही मजबूती से उन्होंने इसको जिया भी और अपनी मेहनत के दम पर उच्च शिखर तक पहुँचे। जिस दर्द को उन्होंने महसूस किया, वही शब्द बन काग़ज़ पर कुछ यूँ ढलता रहा कि जनमानस के दिलों को भीतर तक स्पर्श कर गया। उनकी कविताओं के हाथ में उन्होंने जो प्रेम रुपी दीपक थमाया था, उसी ने हिन्दी साहित्य के हर गलियारे को अपनी रोशनी की चमक से जगमग कर दिया। वे जनहित की बात करते थे, उनकी भाषा मानवीयता से परिपूर्ण थी और लेखनी भी इन्हीं गुणों की कुशल संवाहक बनी। समाज के प्रति उनकी चिंता, उनके संवेदनशील हृदय की परिचायक थी। धर्मनिरपेक्षता, उनके व्यवहार और लेखनी में कूट-कूटकर भरी थी। वे कहते थे, "अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए; जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।" वे राजनीतिज्ञों की टेढ़ी चाल भी ख़ूब समझते थे तभी तो जनता को सचेत कर बोल उठते थे, "हाथ मिलें और दिल न मिलें, ऐसे में नुक़सान रहेगा/ जब तक मंदिर और मस्जिद हैं, मुश्किल में इंसान रहेगा।"
उनके अवसान से साहित्य की बगिया का सबसे सुर्ख गुलाब मुरझाया-सा लगता है। सूरज की चमक में फीक़ापन है, चाँदनी ने उदासी का रंग ओढ़ लिया है। अब जबकि मैं उन्हें श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ कहना चाहती हूँ तो शब्द जैसे बिखर से रहे हैं, इन्हें समेटना असंभव जान पड़ता है।

नीरज जी को प्राप्त पद्मश्री, पद्मविभूषण, यश भारती सम्मान हिंदी साहित्य जगत में उनके अभूतपूर्व योगदान की गाथा स्वयं गाते हैं। तीन बार मिले फिल्मफेयर पुरस्कार, गीतकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा का यशगान करते नज़र आते हैं। वे कवि थे और गीतकार भी। अपनी दोनों ही पारियाँ उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बन खेली हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ- आसावरी, दर्द दिया है, कारवां गुजर गया, बादलों से सलाम लेता हूँ, गीत जो गाए नहीं, नीरज की पाती, नीरज दोहावली, गीत-अगीत,  पुष्प पारिजात के, काव्यांजलि, नीरज संचयन, बादर बरस गयो, वंशीवट सूना है, नीरज के संग-कविता के सात रंग, प्राण-गीत, फिर दीप जलेगा, तुम्हारे लिये इत्यादि रहीं। मंच पर भी उन्हें श्रोताओं का भरपूर स्नेह और सराहना मिली।

पद्मश्री गोपालदास नीरज मूलतः कवि ही थे पर गीतकार के तौर पर उनका हिन्दी सिनेमा को दिया गया योगदान अतुलनीय है। इंसानी भावनाओं के हर रंग को उन्होंने ख़ूब निखारा है। तभी तो प्रेम की शोख़ी में डूबकर वे लिखते हैं-
"याद अगर वो आये, कैसे कटे तनहाई /सूने शहर में जैसे, बजने लगे शहनाई/ आना हो, जाना हो, कैसा भी ज़माना हो/ उतरे कभी ना जो खुमार वो, प्यार है"
इन पंक्तियों में इस क़दर नशा है कि कई दशक बीत जाने पर भी इनकी ख़ुमारी प्रेमियों के दिलों पर अब तक चढ़ी हुई है। प्रेमिका के हृदय की धड़कन को उन्होंने 'आज मदहोश हुआ जाए रे' के तराने से अभिव्यक्त किया है तो उसकी याद में ख़त भी इश्क़ की गाढ़ी स्याही में डुबोकर, टूटकर लिखा है और उसे इतनी सुन्दर उपमाएँ दी हैं कि चाँद-तारों को भी उससे ईर्ष्या होने लगे। मदहोशी में ही सही, पर कोई यूँ भी प्रेमपत्र लिखता है क्या!
"कोई नगमा कहीं गूँजा, कहा दिल ने के तू आई/ कहीं चटकी कली कोई, मैं ये समझा तू शरमाई/ कोई ख़ुशबू कहीं बिख़री, लगा ये ज़ुल्फ़ लहराई" (लिखे जो ख़त तुझे)
प्रकृति की सारी सुन्दरता समेटकर इश्क़ की गहराई को उन्होंने "फूलों के रंग से, दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती" में भी इतनी खूबसूरती से व्यक्त किया है कि यह प्रेमियों का प्रतिनिधि गीत बन बैठा है। "खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को", "ओ मेरी, ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली" गीत भी यही रूमानी छटा बिखेर वर्षों से जवां दिलों के सरताज बन गए। "चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है/ देखो-देखो टूटे ना" में वे मनुहार कर अपने शरारतीपन का भी बड़ा प्यारा परिचय देते हैं।

नीरज, प्यार में भीतर तक डूब जाने की बात करते हैं तो टूटे हुए दिलों पर मरहम रख उसे सांत्वना भी देते आये हैं और उदासी भरे लम्हों में उनकी क़लम दर्द की जीती-जागती तस्वीर बन उभरती है। कभी यह भीतर तक टीस बन ठहर भी जाती है, जब वे कहते हैं-
"ये प्यार कोई खिलौना नहीं है/ हर कोई ले जो खरीद /मेरी तरह ज़िंदगी भर तड़प लो/ फिर आना इसके क़रीब" (दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है)
मात्र प्रेम ही नहीं 'दर्शन' भी उनकी लेखनी का आवश्यक तत्त्व बनकर उभरा है। 'ए भाई, ज़रा देखके चलो' जीवन-दर्शन से भरा हुआ गीत है। इसका एक-एक शब्द जीवन की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज है, जिसका सामना हम सब कभी-न-कभी करते आये हैं। उनके ये शब्द कितनी कटु स्मृतियों की धुंधली तस्वीर खींच देते हैं-
"जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है/ खाता है कोड़ा भी/ रहता है भूखा भी/ फिर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है/ और इन्सान? माल जिसका खाता है/ प्यार जिससे पाता है/ गीत जिसके गाता है/ उसके ही सीने में भोंकता कटार है।"
“कहता है जोकर सारा ज़माना, आधी हक़ीकत आधा फ़साना/ चश्मा उठाओ, फिर देखो यारो, दुनिया नयी है, चेहरा पुराना” भी इन्हीं अहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करता चलता है। 
उनके ये शब्द "बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ" भी वर्तमान परिस्थितियों के सन्दर्भ में एक क़सक छोड़ जाते हैं। इंसानियत की गुहार लगाने वाले नीरज जी की नज़र समाज के हर पहलू पर थी और वे मानवता को हर धर्म से श्रेष्ठ समझते थे। यहाँ इस बात की पुष्टि भी होती है कि जब तक इंसान इस धरती पर है उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

"ताक़त वतन की हमसे है" जैसा कालजयी गीत लिखकर उन्होंने न केवल सैनिकों का सम्मान किया बल्कि जनमानस की भुजाओं को फड़कने पर मजबूर कर उनमें देशभक्त की पवित्र भावना का संचार भी किया। उनके स्वर, चेतना के स्वर थे। 
पद्मभूषण गोपालदास नीरज जी प्रेम की बात करते थे, वीर रस से भरे ओजपूर्ण गीत लिखते थे, अपने दार्शनिक अंदाज़ से सबके चहेते बन बैठे थे। जीवन के हर रस का उन्होंने अपने शब्दों से शृंगार किया। हर भाव को उत्कृष्ट अभिव्यक्ति दी। अब जब गए हैं तो उनकी लेखनी की अमूल्य निधि हम सबके पास विरासत में छोड़ गए हैं, जिसे हम सदैव गुनगुनाते रहेंगे, जिसे हमारे पूर्व की पीढ़ी ने ख़ूब पढ़ा, सराहा और सम्मानित भी किया, आगे वाली पीढ़ियाँ भी इस धरोहर को संभालकर रखेंगीं।

नीरज जी के निधन ने जो शून्य उत्पन्न कर दिया है, उसे कभी भरा नहीं जा सकता; पर हम यह भी जानते हैं कि कलाकार कभी मरते नहीं! वे अपनी कृति के रूप में हम सबके हृदय में सदैव धड़कते हैं। उनके शब्द एक गहरी सीख बन साथ चलते हैं, प्रेरणा देते हैं, सच्चा मार्गदर्शन करते हैं।
"गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए/ साथ के सभी दिये, धुआं पहन-पहन गए/ और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके/ उम्र की चढ़ाव का उतार देखते रहे/ कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे"
नीरज जी जानते थे कि उनके कितने दीवाने हैं तभी तो उन्होंने कहा था "आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा/ जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा" (धर्म है..)
उन्हीं की लिखी पंक्तियों से श्रद्धासुमन अर्पित करती हूँ-

धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले
जब तलक ज़िन्दा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे
खो दिया हमने तुम्हें तो पास अपने क्या रहेगा
कौन फिर बारूद से सन्देश चन्दन का कहेगा
मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे

यूँ ही नहीं कोई देशराग गाता है, यूँ ही नहीं कोई प्रेम धुन बजाता है, सदियाँ लग जाती हैं उन-सा कुछ बनने में, यूँ ही नहीं कोई नीरज बन जाता है।
विदा, प्रिय कवि....शत शत नमन!
- प्रीति 'अज्ञात'
#नीरज #हस्ताक्षर_वेब_पत्रिका
http://hastaksher.com/rachna.php?id=1515

बुधवार, 18 जुलाई 2018

उम्मीदों की टूटती इमारतें

'रोटी, कपड़ा और मकान' जीवन की मूलभूत आवश्यकता है. मेहनत से रोटी और कपड़े की व्यवस्था तो हो जाती है पर दो दशक पहले तक मध्यमवर्गीय इंसान के लिए अपना मकान एक स्वप्न ही था. सारी कमाई खाने-पीने, बच्चों की स्कूल फ़ीस और घरेलू खर्चों में ही ख़त्म हो जाया करती थी. जैसे-तैसे करके कुछ धन जोड़ा भी जाता था, तो वह भी शादी-ब्याह में पल भर में स्वाहा हो जाया करता था. ऐसे में 'अपना घर' सोचना और मन-मसोसकर रह जाना ही इन परिवारों की नियति थी. भारतीय फिल्मों में भी इस इंसानी चाहत को ख़ूब भुनाया गया है और 'दो दीवाने शहर में......आशियाना ढूँढते हैं' हो या 'देखो मैंने देखा है ये इक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना' गीत दर्शकों की इसी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते रहे हैं.

बदलते समय के साथ सुविधाओं में भी वृद्धि हुई. बैंकों से लोन मिलने लगे और अपने घर तक पहुँचने की नई राहें खुलने लगीं पर यह ऋण भी ब्याज सहित चुकाना होता है. इसे चुकाने के लिए न जाने कितनी बार अपनी इच्छाओं में कटौती करनी पड़ती है, मन-मारकर रह जाना पड़ता है पर अपने सपनों के पल्लवित होने की आशा लिए यह सब सह जाता है आदमी.  
लेकिन वही सपनों का महल जब पल भर में धराशायी हो जाए तो उस इंसान के दिल पर क्या गुज़रती होगी यह समझना मुश्किल नहीं! मुश्किल ग़र कुछ है तो वो है भ्रष्टाचार से लड़ना, उस व्यवस्था से उम्र-भर जूझना जिसके आगे आप निरीह, लाचार नज़र आते हैं! ये कैसी नियति है कि वो घर जिस पर आपका मालिकाना हक था, उसका सुख भोगे बिना आप या तो मलबे के ढेर के नीचे दम तोड़ देते हैं या फिर आपके हिस्से आई वसीयत में न्याय की आस में अदालत-दर-अदालत चप्पलें घिसना लिखा होता है.
इमारतों का ढहना कंक्रीट और रेत की चादर का भरभराना भर नहीं है यह परिश्रमजनित उन स्वेद कणों की भी बड़ी निर्मम मौत है जिसके लिए किसी व्यक्ति ने अपना दिन-रात एक कर दिया था. ये लाशें उन उम्मीदों की अंतिम विदाई है जो एक हँसते-खेलते परिवार को कफ़न की श्वेत चादर ओढ़ा वहीं दम तोड़ देती हैं. जो शेष हैं उनके हिस्से वो कराहता, छटपटाता स्वप्न है जिसे देखने के लिए वे जीवन भर अपने-आप को कोसेंगे.

हम कड़ी निंदा, भर्त्सना करेंगे और प्रशासन आश्वासन देगा. उस मुआवजे की घोषणा भी अवश्य होगी जिसे पाने के लिए आपको तमाम कार्यालयों की देहरी पर वर्षों नाक रगडनी होगी. लेकिन तब भी मौत का यह खेल जारी रहेगा...इन कमजोर इमारतों, पुलों का बनना और गिर जाना कभी नहीं रुकेगा. क्यों रुके? कभी किसी बिल्डर को फांसी चढ़ते देखा है?लोकतंत्र की मोटी त्वचा में भ्रष्टाचार के नुकीले दांत इतना भीतर और गहरे धँसे हुए हैं कि जान लेकर ही बाहर आते हैं और फिर कहीं दूसरे शिकार को घोंपने चल पड़ते हैं.
चलो, सपनों का छोडो...इस दर्द की भरपाई कौन करेगा?
आम जनता की जान की क़ीमत क्या है?
जीवन भर खटने के बाद उसके हिस्से में क्या आया?
कोई बाढ़ में बह गया तो कोई आँसुओं की नदी में....
बात यहाँ आकर भी ख़त्म नहीं होती.  
अभी तो मुआवज़े की बंदरबाँट होना शेष है.
- प्रीति 'अज्ञात' 
#टूटती_इमारतें #भ्रष्टाचार 
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शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

मेरा शहर

यह प्रश्न कि आप कहाँ की हो या कि आपका शहर कौन-सा है? सदैव ही असमंजस में छोड़ जाता है मुझे, अजीब लग सकता है पर मैं जब-जब होती हूँ जहाँ-जहाँ, तब-तब बस वहीं की ही होकर रह जाती हूँ.
 प्रत्येक शहर में छूटता जाता है, कुछ-कुछ मेरा हिस्सा और कुछ मैं ही हो जाती हूँ ऋणी इसकी; क्योंकि ज्यूँ ही रखती हूँ क़दम उस धरती पर....ओढ़ लेती हूँ वहाँ की धूप, श्वांसों को मिलती है गति वहीं की वायु से, जीवित रखता है मुझे उसी शहर का जल और भोजन...तभी तो आज मेरी उपस्थिति कृतज्ञ है, हर बीते शहर की.

यूँ भी नहीं कि इतनी भाग्यवान हूँ और सुखद ही रही हों सारी स्मृतियाँ, किसी शहर, किसी यात्रा, किसी व्यक्ति से, कभी भी नहीं मिली हो पीड़ा.............मिली है, असहनीय मिली है, पर तब भी मैंने शहर को नहीं धिक्कारा और उन पलों को गिनती गई जिनमें सुख के तमाम जुगनू 
चमचमा रहे थे उत्साह से, मेरी निराशा, मेरी उदासी, मेरा दुःख 
खाना चाहता था मुझको पर मेरी आशा, मेरा विश्वास, मेरा साहस 
सदैव निगलता रहा उसको.

मैं जानती हूँ हर शहर मेरा है तो जब तुम पूछते हो कहाँ की हो?
मैं पड़ जाती हूँ सोच में, किसे याद करूँ? वो घर जहाँ मैंने जन्म लिया, माता-पिता की गोदी में खेली, पढ़ाई की या कि छुट्टियों में दादा -दादी, नाना-नानी का घर, जहाँ स्नेह की छाँव में ऊँची कुलाँचें भरता रहा मेरा बचपन. मेरी सखियों के घर, रिश्तेदारों-परिचितों के घर जहाँ तमाम उत्सवों, शादी-ब्याह का उल्लास भरता रहा जीवन का इंद्रधनुष.  
अहा! कितनी यात्राएँ, कितने शहरों में....अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़ाव, एकदम अपना सा ही तो लगता है सब कुछ.

अब बताओ मैं कहाँ की हूँ?  
मुझमें लखनवी सभ्यता है 
तो चम्बल की गर्ज़ना भी 
बनारसी मिठास है तो 
दिल्ली का ठसका भी 
मैं पंजाब का पनीर हूँ 
यू पी की खीर हूँ 
गुजरात की गांधीगिरी 
राजस्थान की शमशीर हूँ 
उत्तर में दर-बदर 
तय किये कितने सफ़र 
दक्षिण की बाँहों में भी
झूली हूँ कितने पहर  
हर जगह मेरे अपने 
वही मेरा जहान है 
पूरब में सूरज चचा 
पश्चिम में आसमान है 
कैसे चुनूँ किसी एक को 
जब दिल हुआ हिन्दुस्तान है 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 9 जुलाई 2018

संजीव कुमार: इस मोड़ से जाते हैं....!

"सुनो, आरती! ये जो फूलों की बेलें नजर आती हैं न; दरअसल ये बेलें नहीं हैं अरबी में आयतें लिखी हैं इसे दिन के वक़्त देखना चाहिए, बिल्कुल साफ़ नज़र आती हैं. दिन के वक़्त ये सारा पानी से भरा रहता है. दिन के वक़्त जब ये फ़व्वारे......"

निश्चित तौर पर गुलज़ार जी की ये पंक्तियाँ हर सिने-प्रेमी को शब्दशः याद होंगी और इसे  सुनते ही जो शानदार चेहरा उभरकर सामने आता है वह है - संजीव कुमार
किशोर दा, रफ़ी साब के गाये कितने ही गीतों को उन्होंने अपने जानदार अभिनय से अमर कर दिया. आम हीरो की छवि से एकदम अलग प्यारा सा, मुस्कुराता चेहरा लिए, शिष्टता की प्रतिमूर्ति थे संजीव कुमार, जिनकी विशिष्ट अभिनय शैली के हम सब हमेशा से क़ायल रहे हैं. खिलौना, शोले, आंधी, मौसम, अंगूर, अनहोनी, त्रिशूल, मनचली, अनामिका, कोशिश, नौकर, नया दिन नई रात, सीता और गीता, श्रीमान श्रीमती, पति पत्नी और वो, सिलसिला, शतरंज के ख़िलाड़ी, हमारे तुम्हारे, बेरहम, त्रिशूल और ऐसी ही कई फिल्मों में अपने हर किरदार को निभाते हुए उन्होंने अभिनय के नए मापदंड स्थापित कर उन ऊँचाइयों को स्पर्श किया कि वे इतने वर्षों बाद भी प्रशंसकों के दिलों में घर बनाये हुए हैं और पूरी शिद्दत से याद किये जाते हैं.

'खिलौना' के मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति का अत्यधिक भावुक, संवेदनशील अभिनय और वह गीत, "खिलौना जानकर तुम तो....." आज भी मन भिगो जाता है. एक तो रफ़ी साहब की दर्दभरी आवाज़ का जादू, उस पर संजीव कुमार का भावपूर्ण अभिनय; हिट तो होना ही था. याद है न! कैसे प्रतिशोध की ज्वाला में जलते 'शोले' के ठाकुर के मिसमिसाते डायलॉग, "सांप को हाथ से नहीं, पैरों से कुचला जाता है गब्बर." ने  सिनेमा हॉल को तालियों की गडगडाहट से पाटकर रख दिया था.
'सिलसिला', 'अनामिका','आँधी' में वे संज़ीदा पति/प्रेमी के रूप में नज़र आये और इनके गीत आज लगभग चार दशकों बाद भी उतने ही लोकप्रिय बने हुए हैं. 

अनामिका का 'मेरी भीगी-भीगी सी पलकों पे रह गए, जैसे मेरे सपने बिखर के....' और आँधी का 'तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...' आज भी लाखों उदास प्रेमियों की एकाकी रातों और तन्हाई के साथी बनते हैं.
'कोशिश' में मूक-बधिर इंसान के रूप में अपने उत्कृष्ट अभिनय से उन्होंने सबके ह्रदय पर ऐसी छाप छोड़ी कि इसके लिए उन्हें दूसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. पहला उन्हें फ़िल्म 'दस्तक' के लिए प्राप्त हुआ था. 'आँधी' के लिए भी उन्हें 'फिल्मफेयर' पुरस्कार मिला.

पर ऐसा नहीं कि संजीव कुमार ने केवल गंभीर भूमिकाएँ ही निभाईं. मस्तमौला प्रेमी और इश्कबाज़ पति के रोल भी उन्होंने बेहद ख़ूबसूरती से निभाये. पारिवारिक और जासूसी फ़िल्में भी कीं. वे नए प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते थे और उनकी फ़िल्म 'नया दिन नई रात में' उन्होंने एक साथ नौ विविध चरित्र निभाकर सबको अचंभित कर दिया था. यह उनकी असाधारण अभिनय क्षमता ही थी कि जीवन के हर रस को वे पर्दे पर बड़ी सहजता से जीवंत कर देते थे. 'अंगूर' में उन्होंने दर्शकों को खूब हँसाया और 'नौकर' में भी अपनी अभिनय प्रतिभा से सबको लाज़वाब कर दिया. इस फिल्म का 'पल्लो लटके' गीत तब ख़ूब बजा करता था और अब इसके रीमिक्स ने भी वर्तमान पीढ़ी तक इसकी लोकप्रियता की ख़बर पहुँचा ही दी है. यह संजीव कुमार का ही असर है कि 'पति, पत्नी और वो' का यह गीत, 'ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाना चाहिए' आज भी सबका प्रिय बाथरूम सॉंग बना हुआ है. उन दिनों सब माता-पिता अपने नन्हे-मुन्नों को यही गीत सुनाते हुए स्नान करने के लिए फुसलाया करते थे.

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन (मौसम), तुम आ गए हो नूर आ गया है (आँधी), इस मोड़ से जाते हैं (आँधी), ग़म का फ़साना बन गया अच्छा (मनचली), हवा के साथ-साथ (सीता और गीता) मनचाही लड़की कहीं कोई मिल जाए (वक़्त की दीवार) ... उनकी सुपरहिट फिल्मों और गीतों की फ़ेहरिस्त काफी लम्बी है.

हरिभाई के नाम से लोकप्रिय, अभिनेता संजीव कुमार की फिल्मों और उनके उत्कृष्ट अभिनय की ऐसी ही न जाने कितनी अनूठी स्मृतियाँ आँखों में तैर रही है. उन पर फिल्माए कई गाने भी सदैव साथ चला करते हैं. अभी उनकी फ़िल्म 'अनोखी रात' का ये सदाबहार गीत याद आ रहा है -
"ओहरे ताल मिले नदी के जल में,
नदी मिले सागर में,  
सागर मिले कौन से जल में
कोई जाने न....!'
कलाकार मरते नहीं! हमारी यादों में वे सचमुच अमर हो जाते हैं.
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

संजू: 'नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ को चली।'


'संजू' फ़िल्म प्रारम्भ में ही यह लिखकर अपनी सारी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ स्वयं को सुरक्षित कर लेती है कि "यह आत्मकथा नहीं है।" तो फ़िर टीज़र में इसे संजय दत्त की आत्मकथा कहकर क्यों प्रमोट किया जा रहा है? और रणबीर को संजू के अवतार में ढालने और इतने बवाल की क्या तुक थी? यहाँ तक कि कई इंटरव्यू में भी इस बात को स्वीकारा जा चुका है। 
संजय दत्त के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म मूलतः दो बातों के लिए याद रखी जायेगी, पहली रणबीर की शानदार परफॉरमेंस और दूसरी मीडिया की सच्ची तस्वीर खींचने के लिए। ख़बरों को मसालेदार, चटपटा बनाने के लिए उसे कैसे तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है और एक प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर क़ानूनी अड़चनों से कैसे बचा जाता है, इस तथ्य को यहाँ सटीकता के साथ उकेरा गया है। टी.आर.पी की अंधी दौड़ से तो हम सब वाक़िफ़ हैं ही। 

संजू का ड्रग्स की लत को छोड़ने और सुनील दत्त के सामने रोने का दृश्य निस्संदेह भावुक कर जाता है पर कुछ अन्य दृश्यों में अप्रत्यक्ष रूप से अपनी बुरी आदतों का ठीकरा दत्त साब पर फोड़ते हुए वे रत्ती भर भी संवेदना नहीं बटोर पाते। अरे, लड़का नालायक़ निकलेगा, बुरी संगत में पड़ेगा तो पिता टोकेगा नहीं? उनके समय में तो थप्पड़ ही मिलता था। वे चाहते तो दत्त साब से सेवाभाव सीख सकते थे, जैसा उनकी बहनों ने सीखा पर उन्होंने अपनी परेशानियों का हल ड्रग्स में ढूंढ निकाला तो पिता क्या करे? माँ मौत के मुंह में और बेटे को लड़कियों के साथ की और ड्रग्स की तलब उठ रही! कभी सुना, देखा किसी ने ऐसा!!

ग़लतियों पर सुपर रिन की चमकार मारते समय फ़िल्म में एक स्थान पर बताया गया है कि सुनील दत्त सिगरेट पीते थे और उन्हें ऐसा करते देख ही संजू बाबा ने बचपन में इसका क़श लगाना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी इन्हीं बिगड़ती आदतों के कारण उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेजना पड़ा। चलो, ये बात मानी जा सकती है। लेकिन फ़िर अंतिम दृश्य के लिए कोई माफ़ी नहीं, जहाँ सिगरेट सुलगाते हुए संजू अपने बच्चों से कहते हैं कि "तुम अपने पापा जैसा नहीं, मेरे पापा जैसा बनना।" ठीक है, पर आप कब सुधरेंगे जनाब? यदि यही बात उन्होंने सिगरेट को पैरों तले मसलते हुए या फेंकते हुए कही होती तो यह दृश्य प्रभावी बन सकता था।  

फ़िल्म की दो घटनाएँ अत्यधिक निंदनीय हैं एक में नायक अपनी पत्नी के सामने निर्लज़्ज़ होकर स्वीकारता है कि उसने 350 से अधिक स्त्रियों के साथ दैहिक सम्बन्ध बनाये हैं। वहीं दूसरी घटना में वह अपने मित्र के सो जाने पर उसकी गर्लफ्रेंड के साथ भी यही करता है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक उसका अपने मित्र को यह कहना कि "मैं चेक़ कर रहा था, लड़की में भाभी मटेरियल है कि नहीं! नहीं यार! इसका चरित्र अच्छा नहीं। मैनें तुझे बचा लिया।" उस समय थिएटर में उपस्थित लड़कों का ताली पीटकर सीटी बजाना यह सुनिश्चित कर देता है कि आदर्शवाद के तमाम ढोंग रचाने के बाद भी स्त्रियों की स्थिति वही है। शादी के लिए सबको वर्जिन चाहिए पर चरित्र प्रमाणपत्र देते हुए एक पल को भी इनकी नज़रें शर्मिंदगी से नहीं झुकतीं! ताली क्या एक हाथ से बजती है?  यदि ये दृश्य संजय दत्त की ईमानदारी और सच्चाई को बेझिझक बयां करने की नीयत से रखे गए थे तो इन्हें इतने हल्केपन से नहीं फ़िल्माना चाहिए था। फ्लैशबैक में आत्मग्लानि का बोध होते हुए भी दिखाया जा सकता था, पर वे तो यह बात मर्दानगी के घमंड में बोलते नज़र आये। सचमुच निर्माता विधु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजू हिरानी की फ़िल्म में ऐसे दृश्य बेहद खलते हैं क्योंकि ये दोनों अच्छे एवं संवेदनशील फिल्मकार माने जाते रहे हैं, उनकी कई फ़िल्में भी इस बात की साक्षी हैं पर लगता है कि उनकी इस संवेदनशीलता पर संजय दत्त की मित्रता भारी पड़ गई। तभी तो उन्होंने इस फ़िल्म में अश्लीलता से भरपूर, द्विअर्थी संवाद रखने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया। संजू फ़िल्म से किसी को लाभ हो या न हो पर अपनी इस सोच के कारण यह जोड़ी तो नुक़सान में ही रहेगी। 

रणबीर के अभिनय का लोहा अब सभी मानते हैं और यह फ़िल्म उनके लिए मील का पत्थर साबित होगी इसमें दो राय नहीं। जहाँ तक संजू का प्रश्न है तो उन्हें स्वयं को सही सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी। हो सकता है कि वे अपने पापा का नाम ख़राब करने के लिए अब राजनीति में भी प्रवेश को इच्छुक हों और अपनी छवि को स्वच्छ करने हेतु यह फ़िल्म बनवाई हो /अथवा अपने क़रीबी मित्रों की चाहत पूरी करने के लिए स्वीकृति दी हो। पर बेहतर यही होता कि वे ऐसा करने से बचते। उन पर हथियार रखने का जो आरोप था उसके लिए वे अपने हिस्से की सज़ा काट चुके हैं और उनकी फ़िल्मों के अच्छे आंकड़ों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि जनता उन्हें माफ़ कर चुकी थी। वरना मुन्ना भाई इतना रिकॉर्ड तोड़ बिज़नेस नहीं करती। इसलिए भले ही उन्होंने कितनी भी सच्ची और ईमानदार कहानी कहलवाने की कोशिश की है फिर भी अंत में उनके लिए एक ही बात उभरती है कि 'नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ को चली।' 
फ़िल्म का गीत-संगीत अच्छा और अनुकूल है। 'कर हर मैदान फ़तह' शानदार, प्रेरणात्मक गीत है जो वर्षों गुनगुनाया जाएगा। 'मैं बढ़िया तू भी बढ़िया' शादी-ब्याह में ख़ूब बजेगा। अखबार गीत भी सटीक है पर मीडिया उसके प्रचार से बचती नज़र आ रही है। 
परेश रावल, अनुष्का, सोनम, मनीषा सभी कलाकार अपनी जगह बेहतरीन है। मित्रता के भावपूर्ण रिश्ते को इस फ़िल्म में बहुत अच्छी तरह दर्शाया गया है और कमलेश के रोल को इतनी जीवंतता से निभाने के लिए विकी कौशल बधाई के पात्र हैं। यह फिल्म उनके लिए और भी कई रास्ते खोल सकती है।
यदि आप रणबीर कपूर के प्रशंसक हैं तो 'संजू' फ़िल्म आपको कहीं भी निराश नहीं करेगी। शानदार अभिनय और जी-तोड़ मेहनत के लिए रणबीर कपूर को पूरे 5 स्टार, सामान्य फ़िल्मों और विशुद्ध मनोरंजन के लिए इसे देखा जाए तो 3 और अच्छी-ख़ासी चलती ज़िंदगी में अतिरिक्त सहानुभूति बटोरने की संजू बाबा की बेतुकी कोशिशों के लिए ज़ीरो बटा सन्नाटा। 
- प्रीति 'अज्ञात'
#Sanju#Ranbir#Vicky_Kaushal
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सोमवार, 2 जुलाई 2018

मंदसौर रेप: ये सूची कब ख़त्म होगी?

मंदसौर की सम्पूर्ण घटना का विवरण इतना क्रूर और जघन्य है कि उसे बोलते समय आपकी ज़बान साथ छोड़ देती है. शब्द लड़खड़ाकर न बोले जाने की भीख मांगते हैं. पूरा शरीर कांपने लगता है और उस मासूम बच्ची की पीड़ा को महसूस कर हृदय चीत्कार कर उठता है.

यक़ीन मानिये इसे पढ़ते-सुनते समय आप दुःख और ग्लानि के इतने गहरे समंदर में डूब जाते हैं कि इस समाज में अपने होने का अर्थ एवं औचित्य तलाशने लगते हैं. अनायास ही उन तमाम खिलखिलाते बच्चों के चेहरे आंखों में घूमने लगते हैं, जिन्हें इस दुनिया के सुन्दर होने पर अब भी भरोसा है. जो अब भी बाग़ में खिलते फूलों पर भटकती तितलियों को देख हंसते हुए उनके पीछे दौड़ते हैं. जिन्हें चॉकलेट, आइसक्रीम, टॉफ़ी खाना ख़ूब सुहाता है और जिनका मासूम हृदय किसी अंकल की घिनौनी सोच और निकृष्टम कुत्सित इरादों को पढ़ नहीं पाता. ये इनकी नहीं, इस उम्र की स्वाभाविक असमर्थता है, क्योंकि हमारे जिग़र के ये टुकड़े बस इतना ही जानते, समझते हैं कि मनुष्य तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ समाज में रहता है और खूंखार जानवर जंगल में. अभी उनकी इतनी उम्र ही कहां हुई कि वे समझ सकें कि कुछ पुरुष शरीर के भीतर एक खूंखार, जंगली जानवर भी दांत निकाले चीर डालने को बैठा होता है.

रेप, बलात्कार, अपराध, कानून, सजा बच्चों को तो हर इंसान अपना-सा लगता है और इसी अपनेपन में वे अनजान शख़्स पर भरोसा कर उसकी उंगली थाम चल पड़ते हैं. किसी की नीयत पढ़ पाने का हुनर बचपन में नहीं आता! बचपन, छल-कपट से दूर भरोसे में जीता है. प्यार की भाषा ही बोलता-समझता है, ईमानदारी में विश्वास रखता है. जीवन की कड़वी सच्चाइयां तो इस पड़ाव के दो दशक पूर्ण होने के बाद ही समझ आती हैं. वरना हर मां अपने बच्चे को सिखाती ही है कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ कभी नहीं जाना चाहिए, लेकिन इस बात की समझ भी तो एक पकी उम्र की मांग करती है. आज जबकि हम उस समाज में रह रहे हैं जहां बलात्कारी छह माह की बच्ची से लेकर अस्सी वर्ष की वृद्धा तक को नहीं बख़्शता, तो ऐसे में हमारे बच्चे कहां जाएं? क्या जन्म लेते ही सबसे पहले उन्हें बलात्कार का मतलब समझाया जाए? उनके भोले बचपन को छिन्न-भिन्न कर अब तक हुई सारी अमानवीय घटनाओं को उन्हें पढ़ाया जाए कि देखो! तुम जहां जन्मे हो, वहां यह भी होता है. क्या हम हर समय एक सहमे, भयभीत चेहरे को देखने के लिए तैयार हैं? पर यदि बच्चों को बचाना है तो यह तैयारी तो अब हमें करनी ही होगी. उनके मस्तिष्क में यह ठूस-ठूसकर भरना होगा कि तुम्हारे आसपास कोई जंगली भेड़िया भी घूम रहा है. दुःखद है कि इतना सब कुछ बार-बार होने के बाद भी न तो अपराध रुके और न ही उस पर होने वाली राजनीति. कुछ निर्लज़्ज़ तो यह भी कहने में नहीं हिचकते कि "विधायक आए हैं, उन्हें धन्यवाद दीजिए." किस बात का धन्यवाद चाहिए था इनको कि

"धन्यवाद, आप और आपका प्रशासन निकम्मा है?"

"धन्यवाद, कि आज हमारी बेटी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रही है!"

"धन्यवाद, कि हमारी इस अथाह पीड़ा में भी आप मुस्कुराने का साहस कर पा रहे हैं!"

"धन्यवाद, कि आपको इस दर्द के राजनीतिकरण का एक और विषय मिल गया!"

धिक्कार है ऐसे लोगों पर और उनकी गिरी हुई सोच पर कि इन्हें किसी के दर्द से कोई मतलब नहीं. तुम और तुम्हारे जैसे सभी घटिया लोग, कान खोलकर सुनो और यदि थोड़ा भी शेष है तो उस दिमाग़ में ये बात अच्छे से गुदवा लो कि "ख़ून या दर्द कभी हिन्दू-मुस्लिम नहीं होता! 'हिन्दू-मुस्लिम' शब्द के नाम पर प्रायोजित दंगे होते हैं, यह चुनाव का मन्त्र होता है, वोट को भुनाने और मानवता की जड़ में ज़हर का बीज रोपने का वीभत्स तरीक़ा होता है." भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले तथाकथित देशभक्तों को हर बात में अपराधी की जात देखने के पहले अपराध को समझना होगा, उसके विरोध में बेझिझक खड़ा होना होगा. इन्हें सजा देने के लिए सत्ता-विपक्ष, धर्म-जाति के निंदनीय कुतर्कों से परे हो समवेत स्वर में आवाज़ उठानी होगी. यह भी समझिये कि जिस भी दल का झंडा थामे आप लोगों से निरर्थक भिड़ रहे हैं, उस दल के लिए आप एक प्यादे भर हैं जो केवल बलिदान के काम आता है.

बलात्कार जैसे कुकृत्य तब तक नहीं रुकेंगे जब तक कि अपराधियों को उनके किये का क्रूरतम दंड नहीं मिलेगा. इनके लिए कोई वक़ील नहीं होना चाहिए. इनके शरीर को कहीं भी जगह न मिले. इनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार हो. फांसी एक आसान सज़ा है. इन्हें भूखे शेर के आगे फेंक देना चाहिए. जंगली कुत्तों से नुचवाना चाहिए. इनके हाथ-पैर काट देने के बाद इन्हें किसी गहरी खाई में उछाल देना चाहिए कि इनकी आने वाली पीढ़ियां भी ये दुर्गति देख सदियों सिहरती रहें. समाज और प्रशासन को उन माता-पिता से हाथ जोड़ क्षमा मांगनी चाहिए, उनके पैरों में गिर जाना चाहिए कि "हम आपकी बेटी को इस पीड़ा से बचा पाने में असमर्थ रहे." यूं दर्द तो यह जीवन भर का है. किसी की सज़ा या किसी का गिड़गिड़ाना इसे रत्ती भर भी कम नहीं कर सकता. उन बदहवास माता-पिता के कानों में अपनी बेटी की चीखें गूंजती रहेंगी, उसका बहता लहू उनकी पलकों तले रिसता रहेगा. सरकार से यही विनती है कि हो सके तो, वो जो एक कानून बनाया है, उम्र के हिसाब से. उसी के तहत ही सही पर इस कुकर्मी, दरिंदे को दुनिया से हटा दो और जिन्हें इससे हमदर्दी है उन्हें भी.

ऐसे अपराध अब नहीं होंगे, यह सोच लेना भी मन को झूठा भरमाना ही है. ये क्रम कब और कहाँ रुकेगा, पता नहीं! 'मानवता' शब्द भी मज़ाक भर रह गया है. इंसानियत मर ही चुकी है.

क्या करें! क्या कहें!

बच्चों से उनका बचपन और सभी माँओं से उनके हिस्से की नींद छीन ली गई है. 
इधर एक सर्वे में 'भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश' कहा गया है. इस ख़बर से एक पक्ष शर्मिंदा और दुःखी महसूस कर रहा तो वहीं दूसरों का चेहरा तमतमाया हुआ है. वे चीखकर कहते हैं "तो फिर पाकिस्तान में रहो, सीरिया में रहो" लेकिन इस बात को स्वीकारने और मूल समस्या को समझने में उनको लकवा मार जाता है कि तमाम ख़ूबियों और सुंदरता के बाद भी यही वह देश भी है जहाँ विदेशी सैलानियों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार की ख़बरें आम हैं. जहाँ हर दूसरे दिन किसी न किसी शहर में एक स्त्री की लाश नाले में पड़ी मिलती है. हारे हुए तथाकथित प्रेमी द्वारा उसे कभी एसिड डालकर जला दिया जाता है तो कभी ससुराल पक्ष द्वारा पेट्रोल डालकर. कभी फ्रीज़र तो कभी तंदूर से उसके टुकड़े मिलते हैं. रेप के सरकारी आँकड़े देखकर ही पसीना छूट जाए जबकि उसके दोगुने तो भय और अपमान के कारण दर्ज़ भी नहीं होते. कन्या भ्रूण हत्या की बात भी किसी से छिपी नहीं रही. बेटे की आस में घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की तो अनगिनत; अनसुनी, अनकही कहानियाँ हैं. विकास के इस स्वर्णिम दौर में बाल-विवाह अब भी होते हैं. विधवाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं. अकेली स्त्री को उपलब्ध मान लिया जाता है. न्याय की गुहार लगाते हुए एक शिक्षिका सस्पेंड कर दी जाती है.

जी, हो सकता है कि यह सर्वे और उस पर आधारित रिपोर्ट पूर्ण रूप से सच न भी हो पर क्या हमारा सातवाँ नंबर ही रहता तो हम तसल्ली से हाथ झाड़ शर्मिंदा नहीं होते? सूची से आप इसलिए सहमत नहीं क्योंकि आपका नंबर पहला है पर क्या इस सूची में होना ही वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं?

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ परिवर्तन आया है और स्त्रियाँ भी पहले से अधिक जागरूक हो गई हैं. लेकिन जब तक निर्भया, आसिफा और मंदसौर की इस बच्ची के साथ ऐसे घृणित कुकर्म होते रहेंगे, तब तक आईना देखने के लिए इस सूची की भी कोई आवश्यकता नहीं! प्रयास इस सूची से बाहर निकलने का होना चाहिए न कि तमतमाने का. यह भी तय है कि यदि यही सूची सकारात्मक बात के लिए होती तो अभी यही सब लोग एक दूसरे की पीठ थपथपा रहे होते और तब इसकी विश्वसनीयता पर भी कोई संदेह नहीं होता. हम तारीफ़ पसंद लोग जो हैं. खैर! आप सब सुरक्षित रहें और अपने बच्चों का ध्यान रखें. किसी से कोई भी उम्मीद न रख, उन्हें सुरक्षित वातावरण देने की व्यवस्था स्वयं करें.
- प्रीति 'अज्ञात'
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iChowk में 01-07-2018 को प्रकाशित -
https://www.ichowk.in/society/rape-is-biggest-problem-in-india-need-to-take-strict-action/story/1/11554.html