मंगलवार, 8 मार्च 2016

मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे...

मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे...

'अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस' की शुभकामनाएँ, बोलना उतना ही आसान है जैसा कि 'स्वतंत्रता दिवस मुबारक़ हो' या अन्य कोई भी दिवस की बधाई देना। लेकिन सब जानते हैं, इस सब की सच्चाई, एक तिथि या अवकाश से ज्यादा कुछ भी नहीं। कभी गौर कीजियेगा, नब्बे प्रतिशत महिलाओं के मुँह से इस बधाई की प्रतिक्रियास्वरुप खिसियाता 'थैंक्स' ऐसे निकलेगा जैसे अस्पताल के बिस्तर पर पड़े किसी बीमार बच्चे को हैप्पी बर्थडे बोल दिया गया हो। पर एक बात यह भी है कि कोई 'विश' करे, अच्छा तो लगता ही है! सच समझे आप, 'स्त्रियों' को समझ पाना इतना आसान नहीं है। स्त्री मन की थाह का अंदाजा, शायद स्त्री को भी नहीं होता। फिर भी इन बातों को समझकर उसे शुभकामनाएँ भेजेंगे, तो उसे अच्छा लगेगा-

आज जिस इंसान पर कोई स्त्री आग-बबूला हो रही है, कल उसी के लिए नम आँखों से दुआ मांगती दिखेगी। क्योंकि उसे परवाह है अपनों की, क्रोध उस खिसियाहट का परिणाम है कि अपनों को उसकी परवाह क्यों नहीं? ये प्रेम है उसका। 
"जाओ, अब तुमसे कभी बात नहीं करुँगी" कहकर दस सेकंड बाद ही सन्देश भेजेगी, "सॉरी यार कॉल करूँ क्या?" क्योंकि वो आपके बिना रह ही नहीं सकती, उसे क़द्र है आपकी उपस्थिति की। ये रिश्तों को निभाने की ज़िद है उसकी।
रात भर सिरहाने बैठ बीमार बच्चे का माथा सहलाती है, कभी अपनी नींदों का हिसाब नहीं लगाती। ये ममता है उसकी।
हिसाब से घर चलाते हुए, भविष्य के लिए पैसे बचाती है और एक दिन वो सारा धन बेहिचक किसी जरूरतमंद को दे आती है। ये दयालुता है उसकी। 
कोई उसकी मदद करे न करे, लेकिन वो सबकी मदद को हमेशा तैयार रहती है। ये संवेदनशीलता है उसकी। 
अपने आँसू भीतर ही समेटकर, दूसरों की आँखें पोंछ उन्हें दिलासा देती है। ये दर्द को समझने की शक्ति है उसकी।
अपनों के लिए ढाल बनकर दुश्मन के सामने खड़ी हो जाती है। ये हिम्मत है उसकी।
बार-बार जाती है, जाकर लौट आती है। इश्क़ है, दीवानगी है उसकी।
एक हद तक सफाई देती है, फिर मौन हो जाती है। गरिमा है उसकी।  
स्वयं की तलाश में, खोयी रही अब तक....कुछ ऐसी ही ज़िंदगानी है उसकी।

स्त्री को कोई अपेक्षा नहीं सिवाय इसके कि उसे 'इंसान' समझा जाए। उसके साथ निर्ममता और क्रूरतापूर्ण व्यवहार न हो। नारी, 'नर' की महिमा है, गरिमा है, ममता की मूरत है, अन्नपूर्णा है, कोमल भाषा है, निर्मल मन और स्वच्छ हृदय है, समर्पिता है. और इन सबसे भी अहम बात वो सिर्फ़ एक ज़िस्म ही नहीं, उसमें जाँ भी बसती है। अपने हिस्से के सम्मान की हक़दार है वो। हमें बदलना ही होगा अपने-आप को, अपनी सोच को, अपने आसपास के माहौल को, नारी को उपभोग की वस्तु समझने वालों की कुत्सित सोच को..अब बिना डरे हुए सामना करना ही होगा उन पापियों का, समाज के झूठे ठेकेदारों का, बेनक़ाब करना है हर घिनौने चेहरे की सच्चाई को..साथ देना होगा, उस नारी का, उम्मीद की लौ जिसकी आँखों में अब भी टिमटिमाती है, जिसे अब भी विश्वास है बदलाव पर! 

वो फूलों को देख प्रसन्न हो जाती है,
हवाओं में मचलकर आँचल लहराती है,
तूफां से न हारी, देखो बिजली-सा टकराती है
बारिश में किसी फसल की तरह लहलहाती है,
खुशी में दीपक बन जगमगाती है
हल्की आहट से बुद्धू बन चौंक जाती है
अकेले में पगली बेवजह गुनगुनाती है 
हँसती है बहुत तो कभी
औंधे मुंह पड़ जाती है 
जाते ही इसके जाने क्यूँ 
घर की नींव हिल जाती है 
मैं सोचती रही, क्या कहूँ उसे....
तभी सामने से एक 'स्त्री' गुजर जाती है 
- प्रीति 'अज्ञात'
http://hastaksher.com/rachna.php?id=346

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सटीक लिखा है आपने स्त्री के वारे में । बहुत सुंदर । मेरी ब्लॉग पर आप का स्वागत है ।

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