शनिवार, 27 मई 2017

दिखाई दिया यूँ....कि बेसुध किया :D

'चश्मा' अब चश्मा लगता ही नहीं! शरीर का एक अतिरिक्त अंग हो जैसे. किसी के पांच की बजाय छः उंगली और हमारी आँखों के ऊपर आँखें...मनपसंद (इसे 'मजबूरी' के पर्यायवाची के रूप में लें) फ्रेम में गढ़ी. कहते हैं स्त्रियों को गहनों से प्यार होता है, हमारा तो यही गहना है जो हमने बाल्यावस्था से पहना है. हमारे पास ऐसे विविध गहने हैं और हम उन सभी को ख़ूब हिफाज़त से रखते हैं. सुनकर हंसी आये भी तो हम शर्मिंदा नहीं होंगे, पर हमने उन्हें लॉकर में रखा हुआ है. आपके लिए चश्मा हो सकता है पर हमारी आँखें है ये. इसे 'चश्मा' बोलना भी अपनी आवश्यकता को जलील करने जैसा लगता है, इसीलिए पिछले कई वर्षों से हम इसे पूरे सम्मान के साथ 'हमरी आँखें' कहकर पुकारते हैं. जब कभी खो जाती हैं तो बच्चों को ढूँढने में लगा देते हैं, वो माँ की टर्मिनोलॉजी अच्छे से समझते हैं. हमारी नाक और कान को भी हम उतने ही सम्मानजनक तरीके से देखते हैं और आँखों की बैसाखी मानते हैं, आख़िर इन्हीं पर तो ये टिकीं हैं. ये न हों तो आँखें पीसा की झूलती मीनारें बन जायेंगीं और फ़िलहाल इतिहास में नाम दर्ज़ कराने में हमें कतई इंटरेस्ट नहीं!

हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमारे पास नाना (इस शब्द का उद्गम कहाँ से और क्यूँ हुआ होगा क्या पता! पर मस्त लगता है) प्रकार के चश्मे हैं. एक सामान्य दिनचर्या के लिए आधे फ्रेम वाला, वही आना-जाना, फलाना-ढिमका वाला घटिया रूटीन, दूसरा पढने के लिए फुल फ्रेम वाला (ये अपुन की पसंदीदा जिंदगी है), तीसरा किसी कार्यक्रम के लिए, बिना फ्रेम वाला (ये सबसे high standard वाला होता है, इसमें फोटू पे बिजली न्यूनतम अनुपात में गिरती हुई दिखती है) चौथा आँखों पे आँखें पे आँखें टाइप माने आड़ी-टेड़ी टूटी खिडकियों पे चश्मा और उस चश्मे पे गॉगल्स. (अति उच्च वर्ग वाले इसे 'शेड्स' पढ़कर तसल्ली पा लें). ये बाउंड्री वाल के साथ आता है.इसे लेते समय विशेष ध्यान रखना होता है कि ऊपरी माले का आकार, कारपेट एरिया से ज्यादा हो. मल्लब. नीचे वाला चश्मा न दिखे, इसकी पूरी कोशिश करनी पड़ती है. क्या करें, हमरी पॉवर वाले शेड्स अभी ईज़ाद ही ना हुए! ये शेड्स बोलकर हमें अभी-अभी 'पॉवर पफ गर्ल' वाली फीलिंग हुई! खी-खी-खी!!

तो ये तो हुए चारों प्रकार और हमें इन सबकी डुप्लीकेट copy भी रखनी पड़ती है यानी कहीं जाएँ तो आठ हमसफ़र तो साथ होते ही हैं. ग़नीमत है टिकट एक की ही लगती है. वैसे हम एक पांचवी प्रकार की आँख भी बनवाये थे गुस्से में, कि बार-बार बदलना न पड़े. पढ़े-लिखे इसे bi-focal कहते हैं पर इसे पहनते ही हमारी दुनिया तो out of focus हो गई थी. हम कहीं के न रहे थे. बस यही लगता था कि किसी पहाड़ी इलाके में ट्रेन घूम-घूमकर चल रही और हम दिल हूँ-हूँ करे वाला गाना अपनी भद्दी आवाज में रेंक रहे. बस तबसे हमें उस टूरिस्ट स्पॉट से नफ़रत-सी हो गई. पर पहले प्रेम की तरह उसे भी संभाल के रखे हैं. हे-हे-हे 

अब कुछ ज्ञानी-ध्यानी अवश्य सोच रहे होंगे कि इत्ती ही आफ़त आ रई तो कांटेक्ट काहे नहीं लगवाये लेतीं. तो लो अब जे बालो किस्सो सुनो..जब हमारी शादी तय हुई तो कुछ शुभचिंतकों को चिंता हुई कि विंडस्क्रीन के साथ मेकअप जंचेगा नहीं, तो बड़ी मुश्किल से डाक्टर साब हमें उल्लू बना पाने में सफल हो पाए. हम भी थोड़े तो खुश हो ही गए थे. एकदम लल्लनटॉप टाइप फीलिया रहे थे. कि अब हमहू मेंगो पीपल की तरह दुनिया देख सकेंगे. पार्लर में टनाटन तैयार होके सीधा स्टेज पे आये. सिर झुकाके शर्माते हुए आने की और प्यारी बहिनों के हाथ थाम वहां तक पहुंचाने की परंपरा के चलते ज्यादा कुछ पता ही न चला. शुरू में तो सब ठीकठाक रहा, पर एक घंटे बाद ही हमारी लालटेन तो झिलमिलाने लगी. हालत बेहद ख़राब और मुस्कुराना उससे ज्यादा जरुरी. सो, 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो' से प्रेरणा लेते हुए ये समय कट गया. उसके बाद फेरों में वक़्त था. जब हम ब्रेक में गए तो सबसे पहले इन चायनीज़ मोमोस को बाहर निकाल फेंका और फिर गर्व से अपने स्क्रीनसेवर (चश्मा) को चढ़ा आये. फिर जो रामायण हुई, उसका इस विषय से कोई लेना-देना नहीं. पर इतना जरुर जान लें, कि कांटेक्ट लेंस हरेक के लिए नहीं होते. जिस बन्दे को बिना चश्मे के दिखता ही नहीं वो स्वयं कांटेक्ट लेंस लगा ही नहीं सकता...एक घंटा तो हथेली पे टटोलने में ही निकल जाता है कि मुआ रक्खा कित्थे है!

बचपन में हम बहुत frustrate हो जाते थे. वैसे तो स्कूल और दोस्तों में सबके फेवरिट थे लेकिन दुष्ट आत्माएं तो हर जगह पाई ही जाती हैं. ऐसी ही प्रेतात्माओं ने हम जैसों के लिए एक गीत बना रखा था "चश्मुद्दीन बजाये बीन, जूता मारो साढ़े तीन" कुछ सभ्य, बदतमीज इसे "घड़ी में बज गए साढ़े तीन" गाकर हमारी आँखों में थमे गंगासागर को भीतर ही फिंकवा दिया करते थे. ये सम्पूर्ण चश्मिश प्रजाति को समर्पित गीत था, जिसके रचयिता के बारे में कोई जानकारी आज तक उपलब्ध न हो सकी. वहां तो हम कुछ न बोल पाते थे, पर घर में घुसते ही ताला खोल सबसे पहले अपना चश्मा दीवार पे दे मारते और फिर शाम तक अफ़सोस करते. ये एक्स्ट्रा आँखें रखने की प्रेरणा हमें, हमारे बचपन के इन्हीं उच्च कर्मों ने दी है.

पहले ये सोच ख़ूब दुखी होते थे कि यार एक दिन तो नार्मल आँखों से दुनिया दिखा दे पर अब हम इसी बात पे हँसते हैं कि दिखानी होती, तो फोड़ता ही क्यों? उसे कोसते नहीं, वरना बची-खुची भी कहीं न निकल ले! रात को रोड क्रॉस करने में दिक्कत आती है, एक्स्ट्रा प्रोब्लम के कारण ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता, मोबाइल का बहुत कम उपयोग कर सकते हैं, गाडी से बाहर निकलते ही दो-तीन बार इसका ग्लास साफ़ न किया जाए तो बेमौसम कोहरा छा जाता है; इन बातों से कहीं ज्यादा कभी इस बात का अफ़सोस जरुर होता है कि बारिश में चलने का मजा नहीं लूट पाते, सो बगीचे में और पार्किंग में पानी भर, इसकी भी भरपाई कर लिया करते हैं.
एक मजेदार बात और ...दो दशक पहले जो चश्मे आते थे न, आधा किलो के तो होते ही होंगे. उसे पहन यूँ लगता था कि नाक वेट लिफ्टिंग का परमानेंट कोर्स कर रही. एकदम dumbell की तरह हो जाती थी. बीच में पिचकी और दोनों तरफ फूली. अब तो विज्ञान ने तरक्की कर इसका भी डाइट प्लान करवा इसे स्लिम बना दिया है. अब चश्मिश होना फैशन स्टेटमेंट है और कूल भी लगता है. हम बैकवर्ड जमाने के लोग ऐवीं फूल ( गुलाब नहीं, मूर्ख वाला) बनके दिन काटते रहे.

खैर...जो भी है. अपुन खुश हैं कि प्रकृति की सुन्दरता रोज अपनी आँखों में भर सकते हैं. किसी का हाथ थाम उसे सहारा दे सकते हैं. फिलहाल जितनी भी रोशनी है, लेखन और जीने के लिए काफ़ी है. दुनिया जैसी भी है, दिख तो रही है....उससे ज्यादा देखने की अब कोई ख्वाहिश बची भी कहाँ!

बोलो, तारा रारा, बोलो तारा रारा
हायो रब्बा, हायो रब्बा, हायो रब्बा
- प्रीति 'अज्ञात'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १७०० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " अरे दीवानों - मुझे पहचानो : १७०० वीं ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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