मंगलवार, 26 जून 2018

#काला_दिवस

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे 
ख़ता-वार समझेगी दुनिया तुझे 
अब इतनी ज़ियादा सफ़ाई न दे 
(बशीर बद्र) 

प्रत्येक पद की एक विशिष्ट गरिमा होती है और व्यक्ति उसी के आधार पर व्यवहार करता ही शोभा देता है क्योंकि यदि वह स्वयं पद के अनुकूल भाषा का प्रयोग नहीं करेगा तो प्रत्युत्तर में उसे भी मर्यादित भाषा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. 
यूँ तो भारतीय राजनीति की छवि कभी भी अच्छी नहीं मानी गई और इसे भ्रष्ट, अति-महत्वाकांक्षी, सत्ता-लोलुप और झूठे वादों की कला के धनी  लोगों द्वारा धन और पद का दुरूपयोग करने वाले क्षेत्र के रूप में ही देखा गया है. देशसेवा का नाम सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है यह बात भी जगजाहिर है.

आजकल देश के असल मुद्दों को भुलाकर भारतीय सड़कों की तरह हर दूसरे दिन इतिहास खोदा जा रहा है. आननफानन में एक गड्ढा भरते हैं, तब तक कोई दूसरा खोद कर चला जाता है. जब-जब जनता ठीक से चलने की उम्मीद लिए क़दम बढ़ाती है तब-तब वह इन्हीं गड्ढों में अटककर चारों खाने चित्त गिरी नज़र आती है. विचारणीय बात यह है कि इन ऊबड़-खाबड़ राहों पर विकास की बुलेट चलने का दावा क्यों किया जा रहा है? अरे, विकास फिकास छोड़ो; पहले मानसून के आते ही जल निकास की व्यवस्था पर ध्यान दो! और हाँ, इतिहास हो या सड़क; कृपया कुछ दिन के लिए उसे खुला ही छोड़ दो. जिसे जो कहना हो कह लेने दो. भीतर का सारा कष्ट (ज़हर) निकल जाए, मन भर जाए फिर खड्डे भी भर देना.

हमारी तथाकथित मानसिक 'प्रगति' का मूल मन्त्र यही है कि या तो बीते हुए में भटकते रहो या फिर भविष्य के मुंगेरी सपने बुनो! यथार्थ के धरातल पर पैर टिका वर्तमान में जीना हमने सीखा ही नहीं! लेकिन गड़े मुर्दे उखाड़कर मूल बात से ध्यान भटकाने का यह खेल बेहद बचकाना और निंदनीय है.

हरे और भगवा की कबड्डी में अब काला भी रेफ़री बन शामिल हो गया. श्वेत का अस्तित्व तो सदैव ही दोनों पालियों के बीच खींची एक लाइन भर का रहा है. चाहे किसी भी पाली में हों पर यह तय है कि हर राजनीतिक कबड्डी में घसीटा जनता को ही जाता है. हर पटखनी की चोट का असहनीय दर्द भी उसके ही हिस्से आता है.

इधर ख़बर आई है कि भारत महिलाओं के लिए दुनिया में सबसे असुरक्षित देश है. इस पोल में अफगानिस्तान और सीरिया को क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान मिला है. यह सर्वे थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन की ओर से कराया गया है और इसमें महिलाओं के मामले से जुड़े विश्व के 550 विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया है. 'काला दिवस' मनाने का यह एक सार्थक कारण है जिस पर 'बोलो, है कि नहीं!" कहकर पब्लिक से तालियाँ नहीं पिटवाई जा सकतीं! हाँ, सर झुकाकर शर्मिंदा जरुर हुआ जा सकता है.
बोलो, शर्म आई कि नहीं?
बताओ न, शर्म आई कि नहीं?
- प्रीति 'अज्ञात'
#काला_दिवस

1 टिप्पणी:

  1. आती भी है और नहीं भी आती है
    शर्म भी बहुत बेशर्म हो जाती है ।

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