गुरुवार, 6 अगस्त 2020

आख़िर क्यों अनुत्तीर्ण हुए उत्तरप्रदेश में हिन्दी के विद्यार्थी?



बीते दिनों उ.प्र. माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा हाईस्‍कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम घोषित किये गए. जिसमें लगभग 8 लाख परीक्षार्थी हिन्दी विषय में फेल हो गए. उधर परिणाम आए और इधर उनकी स्वाभाविक विवेचना प्रारम्भ हुई. इन लम्बी-चौड़ी बहसों में अधिकांश का जोर इसी बिंदु पर था कि हिन्दी भाषी राज्‍य होते हुए भी भाषा की ये दुर्गति!
प्रश्न उठता है कि हिन्दी की दुर्दशा कहाँ नहीं हैं? किस प्रदेश में उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है?

यह दयनीय स्थिति क्यों है?
जब आप संभ्रांत मनुष्यों की भाषा का मुकुट आंग्ल भाषा को पहनाते हैं, उसी समय आप अपनी भाषा का दुखद भविष्य निश्चित कर देते हैं.
घर में अतिथियों के आने पर बच्चों का ज्ञान प्रदर्शन करवाते समय उनसे अंग्रेजी भाषा की लघु कविताएँ सुनवा, माता-पिता बलिहारी हुए जाते हैं; परन्तु इन बच्चों को ककहरा सिखाने का कष्ट कोई नहीं उठाता! उन्हें स्वयं याद होगा, यह तथ्य भी संदेह के घेरे में ही समझिये. दोष इन दोनों का नहीं अपितु उस शिक्षा व्यवस्था का है जो प्रतिदिन हमें यह स्मरण कराती है कि आंग्ल भाषा ही आपका उज्ज्वल भविष्य निर्धारित करेगी.
प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यही प्रधान भाषा के रूप में दर्शित होती है.
किसी के सामने अंग्रेज़ी में बात करने का अलग ही रौब समझा जाता है. तो बच्चा क्यों नहीं, हिन्दी छोड़ इस भाषा को प्रधानता देगा! उसे भी तो इसी समाज का हिस्सा बनना है. अपने भविष्य को सुनहरा होता हुआ वह भी देखना चाहता है. ज्ञातव्य हो, यह सोच हमने ही उसे दी है.

कमी यहाँ रह जाती है
भूल यह भी हो जाती है कि हम अपनों को बड़े ही हल्के में ले लेते हैं. 'अरे! तुम तो अपनी ही हो! तुम तो समझोगी ही!' या कि 'ये तो घर की बात है, बाद में देख लेंगे!' जब हम रिश्तों को इस मानसिकता के साथ जीने लगे हैं तो भाषा की बिसात ही क्या! बड़े भी कहते हैं कि "शेष विषयों पर ध्यान दो, हिन्दी में क्या सीखना! ये तो रोज की भाषा है." बच्चे जिन्हें पहले से ही इसे पढ़ना 'कूल' नहीं लगता, वे भी यह मान बैठते हैं कि "रोज़ तो बोलते हैं. इसमें क्या! उत्तीर्ण तो हो ही जाना है." उनका सारा ध्यान अन्य विषयों पर केंद्रित हो जाता है. यही अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबता है. वे मौखिक और लिखित भाषा का मूल अंतर भूल जाते हैं. व्याकरण की अल्पज्ञता का प्रभाव उनकी अंकसूची पर चिह्नित होता है.

दोष किसका है?
अब इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा क्या है? एक तो बच्चे को पहले से ही हिन्दी में रुचि जागृत नहीं हुई, उस पर इस विषय की उपयोगिता भी हम सार्थक सिद्ध नहीं कर सके! ऐसे में उसका झुकाव अन्य विषयों की ओर होना तय ही है. हमारा सामाजिक ढाँचा और शैक्षणिक नीतियाँ ही ऐसी हैं; जहाँ अंग्रेज़ी को, हिन्दी से अधिक सम्मान हर क्षेत्र में दिया जाता है. फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी न बोलने वाले प्रायः उपेक्षित ही होते रहे और हीन भावना का शिकार हुए. दोष उस व्यवस्था का है जिसने अपनी ही भाषा का अपमान कर दूसरी के सिर पर ताज रख दिया.  अंग्रेज़ी से कोई आपत्ति नहीं परन्तु प्रश्न यह है कि उसके सामने हिन्दी कमतर क्यों आँकी जाती है?

वर्तमान स्थिति क्या है?
ऐसा नहीं कि हिन्दी की प्रिंट पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध नहीं. सोशल मीडिया पर भी इनकी संख्या पर्याप्त है लेकिन वर्तमान पीढ़ी में इस भाषा के प्रति रुझान न्यूनतम ही देखने को मिलता है. कारण ऊपर उल्लिखित किये ही जा चुके हैं.
मानकर चलिए कि बच्चों में जो थोड़ी-बहुत हिन्दी शेष है, उसके लिए बॉलीवुड फ़िल्मों और गीतों का बड़ा योगदान है.  
हिन्दी सेवा के नाम पर प्रतिवर्ष संगोष्ठी, परिचर्चा इत्यादि कार्यक्रमों के माध्यम से लाखों फूँका जाता है पर हिन्दी की स्थिति जस-की-तस बनी हुई है. कारण यही कि काग़ज़ी भाषणों में बड़ी-बड़ी बातें कह दी जाती हैं, तालियाँ पिटती हैं, रंगीन तस्वीरें सुर्ख़ियों के साथ प्रकाशित होती हैं. बस, सेवा यहीं समाप्त हो जाती है. जमीनी तौर पर कोई कारग़र नीति भूले से भी दृष्टिगोचर नहीं होती! 
भाषा, हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है, अब इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता आन पड़ी है.
- प्रीति 'अज्ञात'
#उत्तरप्रदेश #हिन्दी #Result #UPBoard #साहित्यनामा
प्रखर गूँज 'साहित्यनामा' के अगस्त' 2020 अंक में मेरे नियमित स्तम्भ 'प्रीत के बोल' में पढ़ें-

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

भारत-चीन तनाव के बीच ह्वेनसांग के आँसुओं की क़ीमत कौन समझेगा?


आज भारत-चीन तनाव के चलते एक पौराणिक कथा अत्यधिक प्रासंगिक लगने लगी है जब 1400 साल पहले चीनी यात्री ह्वेनसांग का भारत आगमन हुआ था. वो समय था जब पूरा विश्व भारतीय संस्कृति से प्रभावित था.

क्या है वह किस्सा?
यह चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल की घटना है. ह्वेनसांग ने भारतवर्ष के कई प्रमुख स्थानों की यात्रा की तथा वे लोगों के व्यवहार, भारतीय संस्कृति और परम्पराओं से अवगत हुए. हमारे धर्मग्रंथों और इतिहास के प्रति भी उनकी बहुत रुचि थी और उनके पास इनका अच्छा-ख़ासा संग्रह भी था. स्वदेश लौटने से पहले उन्होंने अपने अनुभव सम्राट हर्ष के साथ साझा किये और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की. हर्षवर्धन ने भी उन्हें सम्मानित कर विविध उपहार दिए, साथ ही उनके सकुशल अपने देश पहुँचने हेतु नौका एवं 20 योद्धा सैनिकों की भी उचित व्यवस्था की. 
ह्वेनसांग के प्रस्थान के समय सम्राट ने अपने योद्धाओं से कहा, "इस नौका में कई भारतीय धर्मग्रंथ एवं ऐतिहासिक वस्तुएँ हैं जो हमारी संस्कृति का प्रतीक हैं. इनकी रक्षा करना आप सभी का कर्तव्य है". 

कई दिनों तक उनकी सुखद यात्रा चलती रही लेकिन एक दिन समुद्र में भयंकर तूफ़ान आया और नौका डोलने लगी. सभी भयभीत हो गए. घबराकर प्रधान नाविक ने कहा, " नौका में भार अधिक हो गया है. शीघ्र ही ये पुस्तकें एवं ऐतिहासिक वस्तुओं को समुद्र में फेंक अपने प्राणों की रक्षा कीजिए". 
यह सुनकर सैनिकों के नायक ने कहा, "यह हमारा अग्निपरीक्षा काल है. इन सभी वस्तुओं के रक्षण द्वारा भारतीय संस्कृति की रक्षा करना हमारा प्रधान कर्तव्य है. इन्हीं ग्रंथों से तो लोगों को हमारी सभ्यता और परम्पराओं का ज्ञान होगा! इसकी रक्षा के लिए हम अपने प्राण भी समर्पित कर सकते हैं". अपने नायक के ये वचन सुनते ही तुरंत सभी योद्धाओं ने एक साथ पानी में छलांग लगा दी. 
अकस्मात हुई इस घटना से ह्वेनसांग हतप्रभ हो गए. संस्कृति की रक्षा हेतु भारतीय वीरों के त्याग और बलिदान को देख उनकी आँखों से अविरल अश्रुधार बहने लगी. 

'वसुधैव कुटुंबकम्' ही हमारा मूल स्वभाव है 
यह मात्र भावविह्वल कर देने वाली कथा भर ही नहीं है बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति और संस्कारों की प्रतिनिधि कहानी के रूप में भी उभरती है. यह इस तथ्य को और सुदृढ़ करती है कि जब-जब संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपने जीवन को भी दाँव पर लगा देने का अवसर आया है, तब-तब हमारे समर्पित वीरों ने बिना किसी हिचकिचाहट के संस्कृति को ही चुना. इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इस वीर गाथा के साक्षी उस देश के यात्री ह्वेनसांग के आँसू हैं जो देश (चीन) आज हम पर आँखें तरेरने का दुस्साहस कर रहा है. 
हम भारतीय अब तक अपने उन संस्कारों को नहीं भूले हैं. हमने हर बार दुश्मन देश से आये लोगों का खुलकर स्वागत किया है और किसी भी वैमनस्यता को पीछे रख, सदैव ही प्रेमपूर्वक दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. यह न केवल हमारे शांतिप्रिय होने की बल्कि सहज विश्वास की भी पुष्टि करता है. 'वसुधैव कुटुंबकम्' हमारे मूल स्वभाव में निहित है.
 
अतिथि देवो भव:
उपर्युक्त पूरी घटना यह भी सिद्ध करती है कि हमारे देश में अतिथियों को मान देने की परम्परा सदियों से चली आ रही है और आज तक क़ायम है. माना कि उस समय हमारा देश सोने की चिड़िया था और घर आये अतिथि को हम बेशक़ीमती उपहारों से लादकर ही विदा करते थे लेकिन अतिथि सत्कार का यह भाव आज भी हमारी संस्कृति का उतना ही अहम् हिस्सा है. हम उस अटूट संस्कृति के भी सम्पुष्ट वाहक रहे हैं जहाँ देशधर्म, देशहित सबसे पहले है.

हिन्दी चीनी भाई-भाई'?
चाहे वह नेहरू जी के समय 'हिन्दी चीनी भाई-भाई' का नारा हो या शी जिनपिंग के साथ मोदी जी का झूला झूलना, यह सब हमारा भरोसा, अपनत्व भाव और पुरानी कटुता को भूलकर आगे बढ़ना ही प्रदर्शित करता है. हम हर किसी के व्यवहार को रणनीति की दृष्टि से नहीं देखते बल्कि उस पर पूरा भरोसा करते हैं. जो भी हमसे मित्रवत होकर मिला, हमने उसे गले ही लगाया है. 
हम आज भी सारी कड़वाहट को पीछे छोड़ते हुए चाइनीज़ सामान को अपना पूरा बाज़ार दे देते हैं. उनके उत्पादों के लिए पलक -पाँवड़े बिछाए रखते हैं. देश भर में उनके होर्डिंग्स टांग लेते हैं. 

चीन ने ह्वेनसांग के आँसुओं से क्या सीखा? 
ह्वेनसांग ने अपने देश जाकर नम आँखों से इन तमाम पुस्तकों का अनुवाद किया. ‘सी-यू-की’ ग्रन्थ उनकी भारत यात्रा का विवरण हैं जिसमें उन्होंने भारत की आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक दशा एवं संस्कृति का विस्तार से वर्णन किया है. लेकिन लगता है चीन ने ह्वेनसांग के आँसुओं से कुछ नहीं सीखा, तभी तो वह बंजर जमीन के टुकड़े के लिए आँखें तरेरने लगा है. उसे सीमा के विस्तार में दिलचस्पी है, भले ही इस प्रक्रिया में उनके दिल सिकुड़ते चले जाएँ! 

हमारे लद्दाख में चीनियों की ऊलजलूल और फ़ितूर भरी शर्मनाक़ हरक़तों से इनके पूर्वजों की आत्माएँ भी शर्मिंदा होती होंगी. चीन का वर्तमान रवैया, ह्वेनसांग की भावनाओं का अपमान है, उस संवेदनशील हृदय की अवहेलना है. हमारी संस्कृति को समझने के लिए चीन को ह्वेनसांग की आँखों से हमें देखना होगा। उनसे बहे आँसुओं से सीखना होगा! विचारणीय है कि आख़िर चीनियों के लिए ह्वेनसांग के आँसुओं की क़ीमत है ही क्या! 
- प्रीति 'अज्ञात'
iChowk में प्रकाशित -
#भारत_चीन_तनाव #ह्वेनसांग #पौराणिक_कथा #वसुधैव_कुटुंबकम् # Hiuen_Tsang #सी-यू-की #PreetiAgyaat

सोमवार, 3 अगस्त 2020

#विश्व संस्कृत दिवस: संस्कृत और संस्कृति

'संस्कृत' यह शब्द सुनते ही मंत्रोच्चार की मधुर ध्वनि संगीत की तरह तरंगित बजने लगती है. विद्यार्थी दिनों के रटे हुए श्लोक स्वत: ही उच्चरित होने लगते हैं. आँख मीचते हुए, खाना खाने के पूर्व का श्लोक हो या कक्षा के अंतिम पाठ के समय का, ये सभी हमारे बचपन का एक अटूट हिस्सा रहे हैं.

ॐ असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

इसके अतिरिक्त भी कई शांति/ वैदिक मन्त्र हैं जो हम सबको अभी तक कंठस्थ होंगे. ये प्रभाव है 'संस्कृत' का, उस भाषा का जो आपको सभ्यता और मनुष्यता के प्रथम चरण से साथ लिए चलती है. यह मात्र भाषा ही नहीं, सम्पूर्ण संस्कृति है जिसने इसे आत्मसात कर लिया उसने न केवल स्वयं को, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी सुरक्षित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

अब प्रश्न उठता है कि 'संस्कृत' ही क्यों?
इसमें कोई शंका नहीं कि हर भाषा की अपनी विशिष्टता और मधुरता है. जहाँ हिन्दी पूरे देश को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करती है वहीं उर्दू की अदा, नज़ाक़त और मिठास जीवन में शहद-सी घुल जाती है. प्रादेशिक भाषाओं की अपनी महत्ता, उपयोगिता और सहजता है. हमें इन सबके अस्तित्व का न केवल सम्मान ही करना है अपितु इनका संरक्षण भी हमारा उत्तरदायित्व बनता है. 'संस्कृत' भारतीय भाषाओं की जननी है और भारतीय संस्कृति में 'माँ' का स्थान सबसे ऊपर रखा गया है. जननी, जन्मभूमि और पोषित करने वाली धरा को भी हम नित दिन प्रणाम करते हैं तो क्या इसके संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी नहीं?

कई बुद्धिजीवी वर्ग  हिन्दी भाषा के सरलीकरण एवं उसमें अन्य शब्दों के प्रवेश पर चिंता व्यक्त करते हैं, वे भाषा की क्लिष्टता और उससे ही निर्मित लेखन को साहित्य की कसौटी पर रखे जाने के समर्थन में भी हैं. वहीं उन बुद्धिजीवियों की संख्या भी कम नहीं जो आजकल की युवा पीढ़ी के दृष्टिकोण को समझते हुए भाषा की सहजता, सरलता और सर्वग्राह्यता पर जोर देते हैं. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों ही श्रेणियों के चिंतकों को भाषा के बचे रहने की चिंता सता रही है. कारण स्पष्ट है, 'संस्कृत' भाषा का विलुप्तीकरण हम सबने देखा है. यहाँ विलुप्तीकरण से अभिप्राय, इसके न्यूनतम एवं विशिष्ट स्थानों पर ही प्रयोग से है.

'संस्कृत' इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
संस्कृत को देवों की भाषा कहा गया है. समस्त वेद, वेदान्त, उपनिषद एवं पुराण इसी भाषा में रचे गए हैं. यह सम्पूर्ण जगत की सर्वाधिक प्राचीन और समृद्ध भाषा है. पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण आज भी प्रकाण्ड विद्वानों और भाषा वैज्ञानिकों को आश्चर्यचकित कर देता है. संस्कृत का शब्दकोष अक्षय और अक्षुण्ण है.

NASA की बात पर विश्वास करें तो इस अमेरिकन संस्थान ने अंतरिक्ष में सन्देश भेजने के लिए संस्कृत भाषा को ही सर्वोत्तम माना है. वहीं फोर्ब्स पत्रिका (1985 में) के अनुसार अनुवाद हेतु उपलब्ध भाषाओं में संस्कृत ही सर्वश्रेष्ठ है तथा कंप्यूटर में भी इसका इस्तेमाल अत्यन्त सरलता से संभव है.
एक शोध के अनुसार मानव-स्वास्थ्य पर भी संस्कृत का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इस भाषा के प्रयोग से तंत्रिका तंत्र सक्रिय एवं शरीर ऊर्जावान रहता है.  
जिस भाषा के आगे सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक है, क्या हमें उस पर गौरव नहीं होना चाहिए?

भारतीय संस्कृति में 'संस्कृत' कितनी शेष है?
यह प्रश्न विकास और आधुनिकता की दौड़ में एक प्रश्नचिह्न बनकर झूलने लगा है. हम अपने आसपास, दूर और देश के कोने-कोने को भी छान आएं तो संस्कृत भाषा कहीं दिखाई नहीं देगी. आप इसे भारतीय जीवन बीमा निगम के विज्ञापन में लगे लोगो 'योगक्षेमं वहाम्यम्' और पर्यटन विभाग के 'अतिथि देवो भव:' में अवश्य देख सकते हैं. इसके बाद यह केवल सरकारी लोगो में ही दिखाई देती है. भारत सरकार का 'सत्यमेव जयते', दूरदर्शन का 'सत्यं शिवम् सुन्दरम्', डाक तार विभाग का 'अहर्निशं सेवामहे', केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का 'असतो मा सद्गमय' और ऐसे सभी logo में संस्कृत की उपस्थिति इसके जीवित रहने और जड़ों में बसे होने का पुष्ट प्रमाण देती है. वर्तमान पीढ़ी का इस भाषा से सम्पर्क बस इतना भर ही है! हाँ, विवाह, धार्मिक आयोजनों, पूजा-पाठ में भी इसका प्रयोग होता है. लेकिन इसका अर्थ मात्र बोलने वाले पण्डित जी को ही समझ आता है. इसीलिए आज का युवा इन कार्यक्रमों से दूरी बनाकर खिसक जाना उचित समझता है. क्योंकि यदि वह टोककर प्रश्न करता है, तो आस्था की दुहाई देकर उसे चुप करा दिया जाता है और यदि अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों के साथ बार-बार 'स्वाहा' बोलकर हँसता है तो उसे जाने को कह दिया जाता है. दोष किसका है? अंग्रेज़ी सिखाने की होड़ में हमने अपने बच्चों की हिन्दी भी सुरक्षित नहीं रख पाई, ऐसे में उनसे 'संस्कृत' समझने और उसे सम्मान देने की उम्मीद!!! ये स्वयं से कैसी अपेक्षा है हमारी? वो शिक्षित समाज, जो हिन्दी बोलने में ही ग्लानि का अनुभव करता है, संस्कृत का तो सोचना ही उसके लिए डूब मरने वाली बात हो जाएगी.
आप किसी से संस्कृत में बात करके देखिए. वो या तो आपका मजाक उड़ाएगा या फिर मुँह ताकता नज़र आएगा. क्योंकि अब यह हमारे आसपास से इस हद तक विलुप्त हो चुकी है कि जनसामान्य की न होकर किसी और ग्रह की भाषा लगती है. स्वयं को सौभाग्यशाली समझें और धन्यवाद दें कि हिन्दी हमारे साथ है.

हम क्या कर सकते हैं?
समस्त धर्मांध, कट्टरपंथी, साम्प्रदायिकता का विष उगलने वाले गुटों और विघटनकारी समूहों से यह विनम्र अनुरोध है कि आप संस्कृत को किसी धर्म विशेष से न जोड़ें क्योंकि जैसे यह देश सबका है, योग सबका है, उसी तरह भाषा पर भी सबका समान अधिकार है और इसे बचाए रखने का कर्त्तव्य भी हम भारतवासियों का ही है.

हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि जो संस्कृत पढ़ रहे हैं या इसके प्रचार-प्रसार में योगदान दे रहे हैं; उन्हें उनके हिस्से का सम्मान दें. उन सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों, विद्यालयों को भी धन्यवाद कहें जिन्होंने अब तक इस भाषा से स्नेह बनाए रखा है. हमें अपने घर, परिवार, मित्र और आसपास के सभी लोगों को संस्कृत पढ़ने और बोलने के लिए प्रेरित करना होगा. उन्हें यह समझाना ही होगा कि यह शर्मिंदा होने का नहीं बल्कि स्वाभिमान का विषय है, गौरव की बात है.

लेकिन, इतना सब भी पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि सरकार इसमें हस्तक्षेप न करे. सरकार को 'संस्कृत' को विश्वविद्यालय स्तर तक अनिवार्य भाषा घोषित करना होगा और इसके शिक्षण के लिए प्राध्यापकों को उचित प्रशिक्षण देना भी उतना ही अनिवार्य करना होगा. सभी सरकारी, गैर-सरकारी प्रपत्रों में हिन्दी, अंग्रेज़ी के साथ संस्कृत का भी विकल्प होना उतना ही आवश्यक है.
'सोने की चिड़िया' का तो पता नहीं, पर देश की एक मुस्कुराती तस्वीर जरूर सामने आएगी, ऐसा मेरा विश्वास है.
आपके क्या विचार हैं, अवश्य कहिए.
- प्रीति 'अज्ञात'

#preetiagyaat #Sanskkrit #दोपहर की धूप में  #विश्व_संस्कृत_दिवस

2019 में प्रकाशित पुस्तक #दोपहर की धूप में से 



कोरोना नवसूत्र

1.  
वैक्सीन बन रई लैब में, तब तक कीजे टास्क
दो गज की दूरी धरो और पहन ल्यो मास्क

2.
साबुन ही अच्छा लगे,  मैल कुचैल भगाय 
ज्यों-ज्यों घिसत जात हैं, त्यों-त्यों मन हरषाय

3.
मौज़ मज़ा के दिन गए, सब भूले आना-जाना 
कोरोना के दौर में, बस घर ही एक ठिकाना 

4.
जाने मानव जात से, है गई है का भूल 
कोरोना के काल ने छुड़ा दयो स्कूल 
छुड़ा दयो स्कूल, तो भैया पढ़ते हैं ऑनलाइन 
चेहरा, बोली बंद है, बस दिखते हैं साइन 
बस दिखते हैं साइन तो बेटा, का करिहों फिर आके 
तान के चद्दर सुइ जावो या नेटफ्लिक्स देखो जाके 

6.
न इश्क़ मिला, न चैन मिला, बन बैठे घुन्नू बस 
मैया तुमरे काल में, जग हुआ न टस से मस 

 7.
देखत ही जी कुढ़ गयो, मन हियरा धधकत जाय 
प्रभु! कोरोना को नास हो, अब इसपे पिरलय आय 

8. 
मजबूरी में निकल पड़े तो सैनिटाइज़र हो साथ 
बोल नमस्ते प्रेम से, बस जोड़ लीजिए हाथ 

9. 
कोरोना के काल में, बस यही चैन की बीन 
याद रखो डिस्टेंसिंग, मास्क या हो जाओ क्वारंटीन 
- प्रीति 'अज्ञात'
#coronavirus #mask #quarantine 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

'प्रेम' ऐसा तो नहीं हो सकता!

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद से उनके प्रशंसक सदमे में हैं और अब तक इससे उबर नहीं सके हैं. हाल ही में रिलीज़ सुशांत की फ़िल्म 'दिल बेचारा' ने उनके जाने के दर्द को और भी गहरा कर दिया है. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं कि आर्थिक रूप से संपन्न यह युवा एवं प्रतिभाशाली कलाकार हताश होकर मृत्यु-वरण कर सकता है. आख़िर जब इतना पढ़ा-लिखा, समझदार और बुद्धिमान युवक भी निराशा में डूब अपनी जीवन- लीला समाप्त कर बैठे तो प्रश्नों का उठना जायज़ भी है और स्वाभाविक भी. यही कारण है कि देश भर में उनकी आत्महत्या के कारणों को लेकर तमाम अटकलें लगाईं जाती रही हैं.

पहली दृष्टि में यह मामला नेपोटिज़्म को गुनहग़ार दिखलाता दिखा. ज़ाहिर है, सुशांत के प्रशंसकों का गुस्सा बुरी तरह फूटा और इसकी गाज़ फिल्म उद्योग से जुड़ी कई बड़ी हस्तियों पर गिरी. सोशल मीडिया के माध्यम से सुशांत के मित्रों, प्रशंसकों ने अप्रत्यक्ष रूप से इन सबका जीना हराम कर दिया. यह मामला अभी भी ठंडा नहीं हुआ है. आये दिन इन नामचीन लोगों के विरोध में स्वर उठते रहते हैं, वीडियो आते हैं. इस सबसे हमारा सुशांत तो अब लौटकर नहीं आ सकेगा, बस ये उम्मीद ही रखी जा सकती है कि आने वाले दिनों में अब किसी प्रतिभावान कलाकार को मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाएगा. बॉलीवुड को इस मामले से कुछ तो सबक़ लेना ही चाहिए. यूँ नेपोटिज़्म हर क्षेत्र में भीतर तक पाँव पसार चुकी है. हम उसे कहाँ-कहाँ से निकाल सकेंगे, यह आने वाला समय ही तय करेगा. 

अब इस मामले में नया मोड़ आ चुका है और प्रश्नों की सुई सुशांत की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती की तरफ़ घूम गई है. चूँकि दोनों साथ भी थे तो पूरे घटनाक्रम की जाँच के लिए उनसे जानकारी लेना आवश्यक भी है. जो बात हैरान कर रही है वो यह है कि उन पर आरोप लगने लगे हैं. समाचारों में बताया जा रहा है कि कैसे उन्होंने सुशांत को अपने 'चंगुल' में ले रखा था! यहाँ 'चंगुल' शब्द से मुझे घोर आपत्ति है. दोनों साथ रह रहे थे तो ज़ाहिर है, प्रेम भी रहा होगा. इससे पहले सुशांत अंकिता लोखंडे के साथ 'लिव इन रिलेशन' में थे और एक लम्बे समय के बाद इन दोनों का ब्रेकअप  हो गया था. यदि सुशांत रिया के साथ रिश्ते से ख़ुश नहीं थे तो वे इस 'चंगुल'  से निकल अलग हो सकते थे. वे कोई अबोध बालक नहीं थे कि कोई उन्हें वश में कर ले और उन्हें इसका इल्म तक न हो! 

कहते हैं, रिया ने सुशांत को आत्महत्या के लिए उकसाया और 15-17 करोड़ रूपये अपने अकाउंट में ट्रांसफर करवाए. क्या कोई किसी के उकसाने भर से आत्महत्या कर सकता है? क्या बिना किसी की जानकारी के उसके अकॉउंट से करोड़ों रूपये ट्रांसफर हो सकते हैं और उसे पता भी नहीं लगता? हो सकता है, दोनों ने साथ में कुछ सपने देखे हों और प्रेमवश सुशांत ने ही ये धनराशि रिया को दी हो! हमारे-आपके लिए ये बहुत बड़ी रक़म है लेकिन फ़िल्मी कलाकारों के लिए उतनी नहीं है. प्रेम में तो इंसान क्या कुछ नहीं कर जाता! यह तो बहुत छोटी सी बात है. प्रश्न यह भी उठता है कि अगर रिया के कारण सुशांत बीमार रहने लगे थे और परिवार वाले ये बात जानते थे तो उन्होंने पहले इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया? अब इन बातों का क्या मतलब? अगर वे जानते थे तो सुशांत भी तो समझे होंगे इसे. वे डॉक्टर बदल सकते थे. 

अगर रिया पर लगे आरोप सही साबित होते हैं तो यह बेहद अफ़सोसजनक और अविश्वसनीय होगा. मेरी दुआ है कि ये सभी आरोप निराधार साबित हों. 'प्रेम' ऐसा हो ही नहीं सकता! सब जानते हैं कि यह भीषण अवसाद में डूबी दुःखद घटना है लेकिन अगर दुर्भाग्यवश ये सारा पैसों का खेल निकलता है तो फिर किस्सा और लंबा खिंचने वाला है. 
ईश्वर प्रिय सुशांत की आत्मा को शांति दे!
-प्रीति 'अज्ञात'
#love #suicide #sushant_singh_rajput

रविवार, 26 जुलाई 2020

#Sushant: किसी को शिद्दत से महसूस करने के लिए उसका तारा बनना ही जरुरी नहीं होता!

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, जो घटित होते ही स्मृतियों की अनवरत आवाजाही के मध्यांतर में दुःख के तमाम बीज रोप देती है. यहाँ सैकड़ों तस्वीरें पनपती और चहकती हैं और किसी चलचित्र की तरह हमें उन्हें मौन, स्थिर बैठकर जीना होता है.

जब तक व्यक्ति हमारे बीच होता है तब तक वह भीड़ का हिस्सा बना रहता है. चले जाने के बाद ही हमें उसकी अहमियत पता चलती है और वह विशिष्ट हो जाता है. सिने प्रेमियों के लिए सुशांत, भीड़ का हिस्सा तो नहीं थे. वे पहले भी ख़ास थे और आगे भी रहेंगे. दरअसल, हम दर्शक अपने हीरो को जिस रूप में परदे पर देखते हैं, वही छवि मन में भी बना लेते हैं. हमने कलाकारों को ऐसे ही स्थापित किया हुआ है. जहाँ नायक की हर अदा से हमें प्यार होता है और ख़लनायक से नफ़रत. हम सदा से सिनेमा को यूँ ही जीते आये हैं.  

हम पेज थ्री को भले ही चटख़ारों के साथ पढ़ें पर कलाकारों की व्यक्तिगत ज़िंदग़ी से हमें कोई बहुत अधिक सरोकार तो नहीं ही होता है. हमारे अपने दुःख और व्यस्तता का बोझ हमें इतना सब सोचने की अनुमति भी नहीं देता. 

 

आज जब 'दिल बेचारा' पर दर्शकों का टूट पड़ता अगाध स्नेह देख रही हूँ तो लगता है कि जैसे यह हम सबका प्रायश्चित है. यह पश्चाताप है उन दिनों का कि समय रहते हम सुशांत को ये क्यों न कह सके कि आपको कितना चाहते हैं हम!

मैनी चला गया! वह न केवल फ़िल्म के अंत में हम सबसे अलविदा कह देता है बल्कि असल ज़िंदग़ी में भी उसका हँसता, मुस्कुराता चेहरा, अब हमारे बीच कभी नहीं आएगा. हाँ, उसकी तस्वीरें और फ़िल्में उसकी स्मृतियों के पन्ने अक़्सर फडफ़ड़ाएंगी और उसे जीवित रखेंगी. 

 

दुनिया बहुत विशाल है और थोड़े कम, थोड़े ज़्यादा रिश्तों की भरमार हम सबके पास है. कुछ लोग परिचित भर हैं, कुछ दिल के क़रीब और कुछ हमारा जीवन ही हैं. कई लोग ऐसे भी हैं जो हमारे कुछ नहीं लगते, पर हम उन्हें बेहद पसंद करते हैं. वो चाहे हमारे आसपास जुड़ा कोई चेहरा हो, हमारा पसंदीदा कलाकार या कोई भी. 

चाहे वह कोरोना काल हो या किसी का अनायास ही चले जाना! यह समय हमें सिखा रहा है कि जिन्हें हम चाहते हैं हाथ बढ़ाकर उन्हें रोक लें. उन्हें कह दें कि "सुनो, तुम बहुत जरुरी हो मेरे लिए!"

 

'दिल बेचारा' का  मैनी चला गया! पर हमने हमारे सुशांत को जाते हुए महसूस किया. उसको अलविदा कहते हुए देखा. उसके आँसुओं ने हमें भी भिगो दिया. ये जानते हुए भी कि अब वो पलटकर मुस्कुराएगा नहींउसे हम बस पुकार भर सकते हैं! उसके लौट आने की प्रतीक्षा व्यर्थ है. उसकी यादों को सहेज सकते हैं!

हम चाहें तो इस घटना से सबक़ लेकर, अब भी उन अपनों तक पहुँच सकते हैं जिन्हें हमने कभी कहा ही नहीं कि "यार! तुम बिन जी नहीं सकते!"

हम जानते हैं कि ‘दिल बेचारा’ कोई असाधारण फ़िल्म नहीं है. सुशांत की आख़िरी फ़िल्म होना, उसे ख़ास बना गया है. मैनी के रूप में सुशांत ने अपने चरित्र में जान फूंक दी है और उन्होंने अपनी भूमिका को शत-प्रतिशत अंजाम भी दिया है. आज सुशांत पर दर्शकों का अपार स्नेह उमड़ा है. हर कोई उसकी प्रशंसा में बिछा हुआ है. काश! सुशांत यह सब देख सकते!

 

सुशांत को श्रद्धांजलि देने का एक ही तरीक़ा है. हो सके तो हम सब बस इतना याद रखें कि किसी को शिद्दत से महसूस करने के लिए उसका तारा बनना ही जरुरी नहीं होता!

-  प्रीति ‘अज्ञात’

#PreetiAgyaat  #SushantSinghRajput #DilBechara #star #suicide

शनिवार, 25 जुलाई 2020

#DilBecharaReview: तुम न हुए मेरे तो क्या, मैं तुम्हारा रहा!


दर्द का रिश्ता, टूटे हुए लोगों को जैसे जोड़ने का काम कर देता है! जब दो दिल प्रेम में हों तो एक-दूसरे की पसंद से भी बेतहाशा प्यार होने लगता है! यहाँ तक कि अज़ीबोग़रीब हरक़तें भी अच्छी लगने लगती हैं. गंभीर बीमारी के साथ भी कैसे खुलकर हँसा जाता है, जिया जाता है और लोगों को गले लगाया जा सकता है! छोटी-छोटी इच्छाओं का पूरा होना कितना सुख देता है! जीवन में एक दोस्त का होना कितना जरुरी है और सच्चा दोस्त कैसा होता है! 'दिल बेचारा' इन्हीं अहसासों के ताने-बाने से रची गई कोमल, मधुर अभिव्यक्ति के रूप में परदे पर साकार होती है. 

'दिल' सुनते ही इश्क़ की घंटियाँ बजने लगती हैं. वह ऑर्गन जो हमारी धड़कनों को रवानी देता है. किसी नज़र के दीदार भर से कभी ठहरता तो कभी रफ्तार पकड़ लेता है, वह एक न एक दिन प्रेम के दरिया में डुबा ही देता है और फिर राजकुमार- राजकुमारी की कहानी बनती है.  

इस फ़िल्म में निरर्थक क्रांतिकारी बातें नहीं हैं और न ही हाई वोल्टेज ड्रामा! बस, हमारी आपकी साधारण सी दुनिया और उसमें जानलेवा कैंसर के साथ मुस्कुराते हुए जीते रहने का प्रयास है. यहाँ नायक-नायिका दोनों, अपनी-अपनी लड़ाई लड़ते हुए भी एक दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े होते हैं. साथ हँसते-साथ रोते हैं पर दुखियारे बनकर नहीं रहते. पुष्पिंदर के साथ (ऑक्सीजन सिलिंडर) रहते हुए भी क़िज़ी (संजना संघी) सहज है. वो दर्द समझती है और दूसरों का ग़म बाँटने की कोशिश करती है. एक जगह वो कहती है, "इनको गले लगाती हूँ तो लगता है, इनका ग़म बाँट रही हूँ....या अपना!" उसका अपने माता-पिता के साथ का रिश्ता भी बहुत प्यारा है. जब वो ये बोलती है कि "माँ को लगता है जैसे जादू के लिए धूप जरूरी है वैसे ही बंगाली के लिए सोन्देश", तो सबको अपनी-अपनी माँ का लाड़ याद आ जाता है. मैनुअल राजकुमार जूनियर उर्फ़ मैनी (सुशांत) को बेहद खुशमिज़ाज़ और ज़िंदादिल दिखाया गया है जो ख़ुद कैंसर से जूझते हुए, एक कृत्रिम पैर के साथ भी सबके जीवन में इंद्रधनुषी रंग भरने में लगा है. 

फ़िल्म के कुछ संवाद याद रह जाते हैं-

"हीरो बनने के लिए पॉपुलर नहीं बनना पड़ता. वो सच मे हीरो होते हैं". 

"कहते हैं, प्यार नींद की तरह होता है. धीरे-धीरे आता है फिर एकदम से आप उसमें खो जाते हो'. 

"किसी का सपना पूरा होना, उस सिली की बात ही कुछ और है!"

फ़िल्म के अंत में मैनी (सुशांत) का गुज़र जाना भीतर तक उतर जाता है. यूँ तो फ़िल्मों के ऐसे दृश्य भावुक कर ही देते हैं पर इस बार जो आँसू गिरे, उनकी नमी लम्बे समय तक बनी रहेगी. यह दुःख फ़िल्म के नायक़ की मृत्यु से उपजा दुःख भर ही नहीं है बल्कि यह हम सबके प्रिय सुशांत के, इस फ़िल्म के साथ ही हमें अलविदा कह देने का भी है. 

एक ओर तो यह दृश्य आपको याद दिलाता है कि हमारा सुशांत चला गया, वहीं दूसरी ओर मन सांत्वना देने का प्रयास भी करता है कि वो गया कहाँ! वो तो अब भी है, हम सबके बीच, अपनी फ़िल्मों के माध्यम से. 

किसी भी प्रेम कहानी से ये उम्मीद जोड़ लेना कि उसमें कुछ नयापन होगा, अति आशावादी होना ही माना जायेगा. लेकिन इसके बावज़ूद भी 'प्रेम फ़ॉर्मूला' प्रायः हिट हो जाता है. 'दिल बेचारा' की थीम कुछ-कुछ 'आनंद' और 'कल हो न हो' से मिलती अवश्य है पर इसकी पटकथा में वो कसावट नहीं है कि उतना गहरा असर छोड़ सके! इधर रहमान के नाम से ही हम सबकी अपेक्षाएँ ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाती हैं. उनके गीतों की विशेषता ही है कि वे धीमे-धीमे असर करते हुए गहरे पैठ जाते हैं लेकिन इस फ़िल्म को लेकर इतना आशान्वित नहीं हुआ जा सकता! यूँ फ़िल्म की कहानी में गीत अच्छे से रच-बस गए हैं, हम साथ में थोड़ा गुनगुना भी लेते हैं लेकिन बस, बात यहीं पर ही ख़त्म भी हो जाती है. हाँ, 'तुम न हुए मेरे तो क्या, मैं तुम्हारा' गीत को पूरा सुनने की ललक नायिका के साथ ही, दर्शकों के मन में भी बढ़ जाती है. 

संजना संघी को देखकर यह क़तई नहीं लगता कि यह उनकी पहली फ़िल्म है. ख़ूबसूरत तो वे हैं ही, पर आत्मविश्वास से भरपूर उनका अभिनय भी देखने लायक़ है. सुशांत का तो कहना ही क्या! हर बार की तरह इस रोल को भी उन्होंने जी लिया है जैसे. उनके दोस्त जेपी यानी जगदीश पांडे की भूमिका में साहिल वैद भी ख़ूब जँचे हैं. अभिमन्यु वीर सिंह के छोटे से रोल में सैफ़ अली ख़ान प्रभावी रहे हैं. शेष कलाकारों का अभिनय भी ठीकठाक है. निश्चित रूप से यह कोई क्लासिक फ़िल्म नहीं है लेकिन फिर भी ऐसा महसूस हुआ कि थोड़ी लम्बी होती तो बेहतर था. इसे सुशांत के लिए ज़रूर देखा जाना चाहिए. 

सुशांत के प्रशंसकों को अपने इस हीरो के खिलंदड़पन को याद रखना है, उसकी शैतानियों को सोच मुस्कुराना है और सौ दुःख-दर्दों से गुजरते हुए, जीवन कैसे जिया जाता है; यह सीख लेनी है. सुशांत के लिए यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 

"तुम न हुए मेरे तो क्या, मैं तुम्हारा, मैं तुम्हारा, मैं तुम्हारा रहा 

मेरे चंदा! मैं तुम्हारा सितारा रहा"

ये गीत सुनकर यूँ लगता है जैसे जाते-जाते सुशांत अपने दिल की बात कह रहे हों.  

- प्रीति 'अज्ञात'

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बुधवार, 22 जुलाई 2020

#भारत TikTok जैसे कामयाब ऐप्स क्यों नहीं बना पाता? जानिए...


भारतीय एप डेवलपर्स के सामने मौजूदा समय किसी चैलेंज से कम नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान करते हैं, तो इसी बीच चीन से तनाव के चलते टिकटॉक जैसे कई एप बैन कर दिए जाते हैं. अब इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि टिकटॉक एक बेहद लोकप्रियता एप है. तो सवाल यह उठता है कि भारतीय एप डेवलपर्स दुनिया को ऐसे किसी एप की सौगात क्योें नहीं दे पाए हैं. देश के जाने-माने वेब डेवलॅपर एवं एप गुरु इमरान खान (App Guru Imran Khan) बता रहे हैं, एप से जुड़ी वे सारी बातें, जिनसे जुड़े सवाल हर यूज़र के मन में है.

इंस्टाग्राम, टिकटॉक और व्हाट्सएप की सफ़लता का राज़ क्या है?
यूज़र्स को आकर्षित करने के लिए जरुरी है कि नए apps बनाने वाली कम्पनीज़ ग्राहकों की आवश्यकताओं को समझें. उन्हें कुछ ऐसा दें जिसकी वे ज़रूरत महसूस कर रहे हों. आख़िर लोगों का दिमाग़ कैसे पढ़ा जाता है? कैसे आकर्षित होता है यूज़र? जब किसी एप के पॉपुलर होने की बात की जाती है तो इसमें तीन बातें प्रमुख होती हैं.

1.एप डेवलॅपमेंट- एप, यूज़र्स की आवश्यकताओं को तो पूरा कर ही रहा हो, साथ ही यूज़र फ़्रेंडली भी हो. उसका स्मूथ एक्सपीरिएंस हो. जैसे व्हाट्सएप चलता है पर उसके जैसे अन्य मैसेजिंग एप उतना नहीं चलते. एप्स को लगातार अपडेट भी करते रहना चाहिए. इससे खामियां दूर होती हैं. कोई भी बड़ी कम्पनी इसे आसानी से कर लेती है.

2.थीम - यदि किसी एक विषय को केंद्र में रखकर एप बनाया जाए तो वह अधिक सफ़ल होता है. जैसे टिकटॉक वीडियो क्रिएशन और इंस्टाग्राम मुख्यतः फोटो के लिए बनाए गए हैं. पॉपुलर एप प्रायः किसी एक विशेष थीम को लेकर ही सफ़लता की पायदान चढ़ते हैं.

3.प्रॉपर मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग
- एप बनाना तो फ़िर भी आसान है लेकिन इसे हरेक तक पहुंचाना बहुत कठिन है. बड़ी कम्पनी यहां जीत जाती हैं. वे एक छोटे से प्रोडक्ट को भी अच्छे से प्रमोट करती हैं. पॉपुलर भारतीय ऐप्स की संख्या बहुत कम है. जैसे शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो BYJU's का बहुत नाम है. इसका विज्ञापन आपको हर जगह सोशल मीडिया, टीवी, अख़बार में देखने को मिल जाएगा. आप किसी बच्चे से भी एजुकेशन एप का नाम पूछें तो वह तुरंत शाहरुख़ ख़ान को याद करते हुए BYJU's का नाम ले लेगा. सारा खेल मार्केटिंग का है. इसकी फंडिंग फेसबुक भी करता है.


क्यों मात खा जाते हैं भारतीय एप?
एप बनाना और प्रमोट करना दो अलग बातें हैं. आम आदमी इसे बना सकता है लेकिन प्रमोशन का पैसा कहां से आएगा? अधिकांश भारतीय ऐप्स यहीं मात खा जाते हैं. बड़ी कम्पनी के पास अच्छा खासा बजट होता है. यदि स्टार्टअप या किसी डेवलपर ने उसको बनाया है तो उसे कोई फंडिंग तो मिले. कुल मिलाकर बात यह है कि जितने बड़े स्पांसर्स हों, उतनी ही अच्छी टीम बन जाती है. ख़र्चा बढ़ा दिया जाता है. कंटेंट राइटर भी बिठा दिए जाते हैं. अच्छा विज्ञापन तैयार किया जाता है.
इमरान कहते हैं, 'इंडियन सक्षम नहीं हैं, यह बात मैं नहीं मानता. दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियों में भारतीय ही ये सब बना रहे हैं. दुखद है कि हमारे देश में हमारे ही लोगों की प्रतिभा की उतनी क़द्र नहीं होती. मैं तो फिर भी भाग्यशाली हूं कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने वेम्बली स्टेडियम में मेरा जिक्र किया. यूं उसके बाद भी सब कुछ अपने स्तर पर ही करना होता है. जब सरकार को किसी एप की जरुरत होती है तो अधिकारी मुझसे संपर्क करते हैं.
मैं बिना सरकारी सपोर्ट के, अपने रिसोर्सेज से उन्हें बनाकर दे देता हूं. मुझे ये कार्य करना ख़ुशी देता है. अच्छा लगता है. इसे देश सेवा ही समझिये'.

हम भारतीयों को साइबर सुरक्षा (security) के बारे में जानना और समझना भी आवश्यक है.
कॉन्टेक्ट, गैलरी, लोकेशन और अन्य कई व्यक्तिगत जानकारियां एप के माध्यम से ले ली जाती हैं. ये विवरण टिकटॉक या केवल चाइनीज़ एप ही नहीं, बल्कि सभी लेते हैं. चूंकि हमारे देश के 95 % यूज़र्स को साइबर सिक्योरिटी की जानकारी नहीं है. अतः वे सब ओके करते चले जाते हैं और उन्हें अपनी व्यक्तिगत जानकारी तक पहुंचने की अनुमति दे देते हैं. परिणामस्वरूप वे हैकिंग का शिकार हो जाते हैं.

एप्स के मामले में सरकारी हस्तक्षेप कितना होता है?
नियम और दिशा-निर्देश तो सभी कम्पनीज़ फॉलो करती हैं. उसके बाद ही कोई एप बाज़ार में उतारा जाता है. यदि कहीं कोई गड़बड़ी है, तब भी सरकार तभी ही एक्शन ले सकती है जब शिक़ायत होती है. जैसे ज़ूम को लेकर कुछ लोगों ने प्राइवेसी इशू उठाया था, हैकिंग की रिस्क भी कही गई थी. भले ही वो पूरा सच नहीं था. लेकिन ऐसी किसी भी शिक़ायत की पूरी जांच होती है और आवश्यकतानुसार कार्यवाही की जाती है.
टिकटॉक तो पहले भी था लेकिन जब भारत-चीन के बीच तनाव हुआ तो इसका विरोध जोर पकड़ने लगा. सामान्य तौर पर सरकार अगर प्रमोट नहीं करती तो डिमोट भी नहीं करती। जिसका जैसा चल रहा है, चलता है.

प्रतिस्पर्द्धा का खेल
हर क्षेत्र की तरह यहां भी प्रतिस्पर्द्धा एक महत्वपूर्ण मुद्दा हैं. जैसे ज़ूम में इतनी परेशानी थी नहीं, जितना दिखाया गया. बड़ी बड़ी कम्पनीज़ आज भी इसे इस्तेमाल कर रही हैं. हुआ यह कि जैसे ही कोरोना महामारी आई और लोगों के पास परस्पर संपर्क का कोई साधन न रहा तो ज़ूम बहुत तेजी से पॉपुलर हुआ. देखते ही देखते इसके यूज़र्स की संख्या बढ़ती चली गई.
ऐसे में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट को तो बुरा लगना ही था क्योंकि अब तक तो वे ही हीरो थे. जब प्रतिस्पर्द्धा की भावना होती है तो अपनी-अपनी लॉबी द्वारा दबाव भी बनाया जाता है. यही हुआ भी. इधर ज़ूम की बुराई शुरू हुई उधर गूगल मीट प्रयोग में आने लगा. आज की तारीख़ में ज़ूम इन सबसे बेहतर है. जो आईटी कम्पनीज़ हैं, वे भी ज़ूम का ही प्रयोग कर रही हैं.
जहां तक 'JIO' की बात है तो फ़िलहाल यह कॉपी के अलावा और कुछ भी नहीं, उस क्वालिटी का भी नहीं. हां, इस बात पर खुश हुआ जा सकता है कि कोई भारतीय एप बाज़ार में उतरा तो सही. लगातार अपडेट से इसमें भी सुधार आएगा, इसकी उम्मीद रखी जा सकती है.

टिकटॉक बंद करने के लिए भारत-चीन तनाव की जरुरत नहीं थी.
यह सच है कि टिकटॉक स्टार लाखों कमाते थे. इससे यदि किसी की प्रतिभा उभर कर आई तो वो हैं हमारे गांव के कलाकार. लेकिन इसके अतिरिक्त इस एप का कोई भी प्लस पॉइंट नहीं था. इमरान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि टिकटॉक बंद करने के लिए भारत-चीन तनाव की जरुरत नहीं थी. इसे तो बहुत पहले ही बंद कर देना चाहिए था. इसने युवाओं का फ़ायदे से अधिक नुकसान ही किया है. दसवीं और बारहवीं के बच्चों का समय बहुत क़ीमती होता है. टिकटॉक ने उसे बर्बाद कर दिया.
अफ़सोसजनक भाव के साथ वे आगे कहते हैं कि भारत की बर्बादी की अगर कभी कोई कहानी लिखी जाएगी तो उसके तीन कारण होंगे - क्रिकेट, सोशल मीडिया और थर्ड क्लास पॉलिटिक्स. गांव, गली में हर जगह पचासों बच्चे क्रिकेट खेलते मिल जाएंगे पर ये कबड्डी नहीं खेल सकते हैं. इनके शरीर ही इतने मज़बूत नहीं. सब ग्लैमर की तरफ़ भागते हैं. इधर सोशल मीडिया ने भी सभी सीमाओं को लांघ दिया है. सेंसरशिप कहीं है ही नहीं. वेबसीरीज़ की हालत तो इससे भी बदतर है. गंदी राजनीति तो हम सब देख ही रहे हैं.
अपने यहां भाई भतीजावाद में प्रतिभा (talent) दब जाती है. उस पर रचनात्मकता (creativity) से ज्यादा जोर अंकों (marks) पर है. अमेरिका में भी ड्रॉपआउट होते हैं लेकिन देखिये जो ग्रेजुएट भी नहीं, वे गूगल में जॉब कर रहे हैं. कारण यही कि वहां डिग्री से अधिक कार्य-कौशल (skill) की महत्ता है.

(अलवर निवासी इमरान ख़ान, वेब डेवलॅपर एवं एप गुरु हैं. उन्होंने 80 शैक्षिक मोबाइल अनुप्रयोग (Mobile Apps) और सौ से अधिक वेबसाइट विकसित की हैं जिनका प्रयोग निःशुल्क है. वे नवंबर 2015 से तब चर्चा में आए, जब वेम्बली स्टेडियम, लंदन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने भाषण में उनका उल्लेख किया. उन्होंने कहा था कि 'मेरा भारत, अलवर के इमरान खान में बसता है'. हाल ही में उन्होंने मॉरीशस सरकार के अनुरोध पर वहां के बच्चों के लिए एजुकेशनल एप बनाया है, जिसे वहां के प्रधानमंत्री लॉन्च करेंगे.)
-प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

#World Emoji Day: जब शब्दों की जेब ख़ाली हो, तब इमोजी का बड़ा सहारा है!

एक ही बात को यदि भिन्न भावों के साथ बोला जाए तो मायने बदल जाते हैं. बोलते समय तो आपकी मुखमुद्रा, उच्चारण एवं भावभंगिमा से सामने वाला समझ जाता है. अर्थ का अनर्थ तब हो सकता है, जब इसे लिखा जाए. अब सोशल मीडिया पर लिखते समय पढ़ने वाले को आपकी टोन का अनुमान कैसे हो? इन परिस्थितियों में भावनाओं की सरल और सहज अभिव्यक्ति के लिए इमोजीस वरदान की तरह अवतरित हुए हैं. इमोजी की महत्ता एक उदाहरण से समझिए-

क्या कह रहे हो?😂 जब आपकी बात से हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाएँ.
क्या कह रहे हो?😆सुनने वाले को मज़ा आया.
क्या कह रहे हो?😈बताइये, कमीनेपन वाला भी दे रखा है.
क्या कह रहे हो?😍दिल में लड्डू फूटिंग. ये तुमने क्या कह दिया, जानां.
क्या कह रहे हो?😎कूल डूड टाइप फ़ीलिंग
क्या कह रहे हो?😐अरे!तुमने ऐसा कैसे कह दिया रे!
क्या कह रहे हो?😓घोर निराशा की बदली 
क्या कह रहे हो?😕चिढ़ोकरे, घुन्नू वाली प्रतिक्रिया  
क्या कह रहे हो?😡आगबबूला 
क्या कह रहे हो?😜मस्ती का ख़ुमार
क्या कह रहे हो?😛हाय अल्ला! जे तुमने का कह डाला.
क्या कह रहे हो?😤ट्यूबलाइट अभी जल नहीं पाई.
क्या कह रहे हो?😨 हैं, सच्ची!
क्या कह रहे हो?😬मतलब हाउ डेयर यू!
क्या कह रहे हो?😘इश्श! 
क्या कह रहे हो?😳नहीं! ये नहीं हो सकता!
क्या कह रहे हो?😭दुःख की गंगा-जमुना में डूबते लोग 
क्या कह रहे हो?😱भगवान के लिए कह दो ये झूठ है!

यानी केवल एक इमोजी बना देने के बाद फिर व्याख्या की आवश्यकता नहीं रह जाती! सोशल मीडिया पर जब से इमोजी आए हैं, लिखने का अंदाज़ ही बदल गया है. वाहवाही के लिए, दुःख, हँसी, परवाह, प्रेम, जन्मदिवस, शुभकामनाएँ हर चीज़ के लिए इमोजी तैयार हैं. ख़ोज  को सरल करने के लिए इनको अलग-अलग श्रेणियों में भी बाँटा गया है. बस, एक क्लिक के माध्यम से आप अपने अहसास जस-की-तस साझा कर सकते हैं.

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इमोटिकॉन्स और इमोजी में अंतर होता है. कहते हैं, 1990 के दौर में सबसे पहले जापान में इमोटिकॉन्स (kaomoji) प्रचलन में आए. इसमें नंबर और विराम चिह्नों की मदद से चित्र बनाया जाता है. जैसे : और D को मिलाकर लिखने से हँसने वाला चित्र :D बनता है या फिर : और / को इस्तेमाल कर :/ ये भाव प्रदर्शित किया जाता है. इस दशक के अपनी समाप्ति के चरण में पहुँचने तक इमोजी अस्तित्व में आ चुके थे. इसकी शुरुआत भी जापान से ही हुई थी. इसकी खोज का श्रेय किसे दिया जाए, इस बारे में कई मतभेद हैं.  इमोजी मूलतः Pictograph होते हैं, ये E (picture) + moji (character) से मिलकर बने हैं. अब ये इमोजी केवल भाव-भंगिमाओं तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि खानपान से लेकर घर गृहस्थी, कार्यालय, बाज़ार की सभी प्रकार की वस्तुएं इसमें शामिल हो चुकी हैं.
समय के साथ-साथ इमोजी भी अपडेट होते जा रहे हैं. जैसे अभी कोरोना महामारी के समय में  केयर (परवाह) का इमोजी जुड़ गया है अर्थात फेसबुक भी केयर करने लगा है. उन्हें पता है कि इन दिनों सबसे अधिक आवश्यकता सांत्वना देने की ही है.
वैसे ये इमोजी न हों, तो बातों का मज़ा ही क्या! ये शब्दों में चाशनी की तरह घुल जाते हैं. कितनी ही बातें इमोजी के माध्यम से कह दी जाती हैं. कभी-कभी इन इमोजीस के मज़े भी लिए जाते हैं. दो दोस्तों के बीच, इमोजी की टांग खिंचाई की एक बानगी देखिए-
😀
 😁
यार, तुम हँसती हो तो ऊपर नीचे दोनों दांत दिखते हैं. मेरे केवल ऊपर के, ऐसा क्यों?
हाहा 😄अब देखो.
हाँ, अब ठीक है.
मतलब, तुमको दो तरह से हँसने  की कला आती है?
न! चार तरह से आती है.
अच्छा!
😄😁😆🤣ये देखो!
एक और है!
बताओ!
😂
अरे, हाँ! 5 हुए. ये खुशी के आँसू टाइप
😜😜छिछोरी हँसी भी है
 🤣🤣
😅ये भी है, पता नहीं क्या?
ये इंटेलेक्चुअल हँसी. मने हँसने का कारण भी समझ आ रहा
 🤩
जब ये 😜 है, तो ये 🤪 क्यों है?
😁😁😁 खी खी खी 
शायद पहला वाला दिव्यांग है.
नहीं, पहला छिछोरी हँसी है और दूसरा उसके साथ अश्लील है.
🤓ये cool बन हँसने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बात में दम नहीं है.
हाँ, एकदम गंवार लग रहा!
😎 कूल ये
🤩 इसका मतलब झलक पाते ही लड्डू फूटना
🥴👎👎निरा गंवार
न, न! चारों खाने चित्त है ये
😁😁
अच्छा! इस पर बात नहीं होगी. आउट ऑफ़ कोर्स है ये. केवल उसी पर चर्चा होगी, जो हँसे.
हाँ, हटाओ इसे!
जानते हो, आज अपन ने अनजाने में क्या कर दिया है ?
हाँ, हास्य इमोजी का आलोचनात्मक विश्लेषण!
ये महान काम अपन ही कर सकते बस
दुनिया मे इत्ती बुद्धि न है
😇
जित्ती अपन दोनों में है 😁
 🧐
अच्छा, बस तुम ही महान हो महाराज!
हीही, परिश्रम से क्या नहीं संभव!
😬 इसमें मेहनत, निष्ठा और अनुशासन भी जोड़ो जी.
कोरोना फाइट में मेरा योगदान: एक महती रिसर्च
😆😆
हास्य के विविध रूप 'इन द टाइम ऑफ़ कोरोना'
नहीं! हँसो मत! 
तो फिर?
कोरोना जैसे गंभीर दौर में बेतुका हँसना अक्षम्य है.
हुँह! हँसी के दौर में तो सब हँसते हैं. इस दौर में हँसना ही तो खास है!
हँसी को लेकर गंभीर 🧐
 😂😂

आप भी हँसते रहिए और इमोजी के माध्यम से अपने अहसास बाँटिये. इससे समय की बचत होती है. भाव पुख्ता तौर पर साझा किये जाते हैं. इस बात को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि जब शब्दों की जेब ख़ाली हो या कहीं कोई झिझक आड़े आ रही हो, तब हाल-ए-दिल की अभिव्यक्ति के लिए भी इनका बड़ा सहारा है! बस, ध्यान रहे कि हमारी भाषा शेष रहे और इन्हें इस्तेमाल करते-करते हम E. Human न बन जाएँ!
- प्रीति 'अज्ञात'
#World Emoji Day #Emoji #preetiagyaat #Blogpost

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

वो दामाद है, असुर नहीं!

हाल ही में एक ट्वीट देखने को मिला जिसमें एक महिला ने अपने दामाद के लिए 67 आंध्र व्यंजनों के साथ लंच तैयार किया है. इसमें स्वागत पेय( welcome drink), स्टार्टर, चाट, मेन कोर्स और स्वीट्स शामिल हैं! निश्चित रूप से इसमें एक माँ का, अपनी बेटी और दामाद के लिए विशुद्ध प्रेम और ममता से भरा भाव ही है और कुछ नहीं. भारतीय समाज में सास और दामाद का रिश्ता बहुत मधुर भी होता है (कम से कम सास की ओर से तो होता ही है).
अब इसका एक अन्य पक्ष भी है और कई बार युवक ससुराल जाने के नाम से ही घबराते हैं. जो कारण हैं न, उसके साक्षी आप भी कभी-न-कभी जरूर ही रहे होंगे.  

अब आपको भले ही अतिश्योक्ति लगे पर हमारे समाज में दामाद को ईश्वर तुल्य ही मान लिया गया है. वह घर का सदस्य होते हुए भी सदैव विशिष्ट अतिथि के पद पर मनोनीत रहता है. यही वह प्राणी भी है जिसकी उपस्थिति में घर का सबसे रोशन चिराग़ स्वयं को उपेक्षित, तिरस्कृत और सेवक महसूस करता है. बेटा तो लात भी खाता ही है. ख़ैर! अब साले साहब बने हैं तो ये उनका नैतिक कर्तव्य है कि जीजू की सेवा सुश्रुषा में कोई कमी न रह जाए. 'जिनके आगे जी, जिनके पीछे जी' के सामने खिलखिलाने और वातावरण को सुरमई बनाए रखने में साली की भूमिका भी अहम होती है. ये वही देवी हैं जो बारात के आने पर सबसे अधिक चहकती हैं और 'जूता चुराई' के समय इक्कीस हजार से शुरू कर इक्कीस सौ (कभी-कभी 500 पर भी) पर समझौता कर लेती हैं. दरअसल विवाह पद्धति में ये सब परम्पराएँ बनी ही इसलिए हैं कि दो अज़नबी परिवारों में स्नेह और सौहार्द्र के भाव पनपें और आगे जाकर एक अटूट, प्रगाढ़ रिश्ता बने. 

होता क्या है कि जैसे बहू गृहप्रवेश के साथ ही पूरा घर सँभालने लगती है, इसके ठीक उलट दामाद जी के चरण पड़ते ही पूरा घर उन्हें सँभालने लगता है. परिजन स्वागतातुर हो उनकी राहों में फूल बिछा दिया करते हैं. प्रबल प्रेम पक्ष तो अपनी जगह है ही लेकिन कहीं एक भय भी रहता है कि दामाद नाराज़ न हो जाए. उसकी नाराज़गी का अप्रत्यक्ष मतलब बेटी को दुःख मान लिया जाता है. यद्यपि ऐसा हर घर में होता नहीं है परन्तु आम सोच यही है. तो जब इतनी सारी बातें जुड़ी हुई हैं तब आवभगत तो होनी ही है.
 
हमारे समाज में आवभगत का एक ही सीधा-सीधा अर्थ है कि जमकर खिलाओ (इसे ठुंसाओ की तरह लें). हफ़्तों पहले से ही किसी रेस्टोरेंट के menu की तरह व्यंजन-सूची तैयार कर ली जाती है. फिर दामाद जी का पदार्पण होते ही 9 मिठाइयों से सजे मिष्ठान थाल के साथ उनका और इस सूची का भव्य उद्धाटन होता है. तत्पश्चात आगामी प्रयोगों हेतु प्रयोगशाला खोल दी जाती है.  मिठाई यह कहकर खिलाना शुरू होता है, 'अजी, इतने समय बाद आए हैं कनपुरिया लड्डू से मुँह तो मीठा करना ही पड़ेगा!' ये चॉकलेट बरफ़ी तो मेरी बिट्टो ने ख़ास आपके लिए ही बनाई है. कह रही थी कि 'जब तक जीजाजी नहीं चखेंगे, कोई हाथ भी न लगाना'. और ये सोनहलवा तो बरेली वाली मौसी ने आज सुबह ही भिजवाया है कि 'भई, दामाद जी को हमारा आशीर्वाद जरूर देना'. 

उसके बाद चाय-नाश्ता, फिर फ़लाहार(Fruit Salad) कराया जाता है. दामाद आराम करने का मन बना लेता है, तभी साली जी ठुमकती हुई आकर कहती हैं, 'अरे, जीजू अभी लंच तो किया ही नहीं!' उसके बाद शाम की चाय के साथ समोसे और फिर रात्रिभोज में पड़ोस वाली आंटी जी के यहाँ भी जाना जरुरी होता है वरना वो बुरा मान जाएंगी जी. अब दिल पर हाथ रखकर आप ही बताइए कि जिस फ़ूफ़ा के साथ ऐसा हो रहा है और उस पर सदियों से देश मज़ाक भी उड़ा रहा है, उसे नाराज़ होना चाहिए कि नहीं?

अब सबकी इच्छाओं की पूर्ति करते-करते दामाद जी का जो हाल होता है, वो तो वह ही जानें. लेकिन याद है न! अगली बार ससुराल जाते समय पहले से ही कैसे झूठी कहानी बनाकर तैयार रखते हैं कि मम्मी को कह देना 'डॉक्टर ने घी-तेल खाने को मना किया है'. 
अच्छा, एक मज़ेदार बात और है कि पहले के समय में जब दामाद अपनी ससुराल आता था न! तो अड़ोस-पड़ोस के लोग किसी न किसी बहाने से उसे देखने आते थे या फिर अपनी छत पर खड़े हो उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे. कुछ-कुछ ऐसा ही सीन बनता था जैसे शहर में तेंदुआ घुस आने पर लोग बावरे से हो जाते हैं. खैर! वो ज़माना ही अलग था. बहुत प्यारा समय था. 😊

सौ बात की एक बात! स्नेहिल भावनाओं का पूरा सम्मान. यह भी सच है कि प्रेम की कोई सीमा नहीं होती पर क्या करें!  लाख अच्छे व्यंजन सामने होते हुए भी ये दुष्ट पेट और ग्रहण करने से रोक देता है. आप तो न जी, बस इतना समझ लो और भगवान के लिए मान भी लो कि दामाद, हमारी-आपकी तरह ही एक मनुष्य है, वह कोई असुर लोक से नहीं पधारा है बल्कि इसी पृथ्वी ग्रह का प्राणी है. प्यार करो, खिलाओ भी पर जबरन खिला-खिलाकर इतना अत्याचार न करो! कहीं ऐसा न हो कि अगली बार ससुराल का नाम सुनते ही बंदा चीत्कार मार अचेतन अवस्था को प्राप्त हो जाए जैसा कि प्रायः बहुएँ हो जाया करती हैं. 😂
😰 उफ़! अचानक बहुत जोर से जी घबरा रहा है! हे प्रभु, किरपा बनाए रखना.
चलो, जै राम जी की 🙏
- प्रीति 'अज्ञात' 
#Son_in_law #Indianculture #दामाद  #संस्कृति 
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सोमवार, 13 जुलाई 2020

विवाह का बैतूल मॉडल


आजकल एक रोचक ख़बर सुर्ख़ियाँ बटोर रही है. इसे पढ़कर लड़के तो मारे आनंद के बावले हुए पड़े हैं लेकिन लड़कियों ने अपनी भृकुटि तान ली है. बात है ही कुछ ऐसी कि ख़ुशी और ग़म के मारे दोनों ही प्रजातियों का कलेजा छलनी हुआ जा रहा है. 

पूरा किस्सा 
बैतूल (मध्यप्रदेश) के एक युवक की शादी उसके घरवालों ने कहीं और तय कर दी थी जबकि युवक, अपनी प्रेमिका से विवाह रचाना चाहता था. जैसा कि आम भारतीय परिवारों में होता ही आया है कि घरवालों ने अपनी इज़्ज़त की दुहाई दी. बेटा ज़िद पर अड़ा रहा. उधर प्रेमिका के घरवाले भी लड़के की कहीं और शादी तय होने पर लगातारआपत्ति दर्ज़ कर रहे थे. मामला बढ़ा तो पंचायत बुलाई गई. एक अविश्वसनीय निर्णय सुनाते हुए पंचायत ने उस लड़के को दोनों से विवाह की अनुमति दे दी. आश्चर्यजनक बात यह भी है कि पंचायत के इस निर्णय से लड़का, लड़की और प्रेमिका सहमत हो गए. तीनों के परिवार भी इसका स्वागत करते दिखे.   
 
प्रशासन का दख़ल 
यूँ तो इस विवाह में पूरा गाँव शामिल हुआ लेकिन प्रशासन ने आदतानुसार इस मामले की जाँच शुरू कर दी है. अब इन्हें कौन समझाए कि नफ़रतों से भरी इस दुनिया में प्रेम को ग़ुनाह समझना, किसी ग़ुनाह से कम नहीं!
हम तो इतना ही कहेंगे कि जब मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी! वैसे भी यह पूरा प्रकरण उन सभी मामलों से तो बेहतर ही है, जहाँ किसी एक को सरेआम सूली पर लटका दिया जाता है और अगले दिन कोई ग़वाह तक नहीं मिलता!
सरपंचों ने शायद परिवारों को आपसी रंज़िश से बचाने के लिए ये बीच का रास्ता अपनाया हो! ख़ैर! ये तो वही लोग बता सकते हैं. हाँ, बात का बतंगड़ जरूर बनने लग गया है. 
  
लड़कों की प्रतिक्रिया और बैतूल मॉडल की पुरज़ोर सिफ़ारिश 
*एक ओर तो पुरुष वर्ग इस लड़के की क़िस्मत से ईर्ष्या कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर उन्हें अपनी अंधियारी ज़िंदगी में आशा की फूटती किरण भी दिखाई देने लगी है. 'अपना टाइम आएगा' के मंत्र के साथ ख़्वाबों की नॉनस्टॉप आवाजाही जारी है. 
*जो वैवाहिक जीवन के भुक्तभोगी हैं उन्होंने साफ़ कह दिया है कि अब इस लड़के की खुशियों पर ग्रहण लगा ही समझो. 
*चरमराती अर्थव्यवस्था पर ध्यानाकर्षित करते हुए कुछ लोग सहानुभूति दर्शाते भी नज़र आए. वे इस युवक की तनख़्वाह दोगुनी करने की सिफ़ारिश कर रहे हैं. 
*कई लोगों ने इस पूरी घटना को लड़के का अभूतपूर्व साहस मानते हुए उसके लिए 'परमवीर चक्र' की मांग की है. 
*किसी ने एक साल बाद अपडेट देने की गुज़ारिश की है तो कोई पंचायत के इस फ़ैसले को अद्भुत बताते हुए यह प्रक्रिया देश भर में अपनाने की कह रहा है. इसे 'बैतूल मॉडल' के नाम से प्रस्तुत किया जा सकता है. 
*इसी सबके बीच एक गंभीर प्रश्न यह भी उठा कि इनके घर में होने वाले भावी झगड़ों में पंचायत हस्तक्षेप करेगी या ये स्वयं ही मामला सुलटा लेंगे?

लड़कियों के दुखड़े और स्त्री विमर्श की आहट 
*भई, लड़कियों ने तो दो टूक कह दिया है कि जब सर्वसम्मति से यह निर्णय उचित मान ही लिया गया है तो हम भी इस सुविधा के उम्मीदवार बनना चाहेंगे. अब न्यायिक संतुलन तो बनता ही है, जी. 
*उन्होंने अपने विचारों को बेझिझक स्पष्ट करते हुए आगे कहा कि समय का बँटवारा भी होगा.अर्थात लड़की छह माह अपने चुने हुए प्रेमी के साथ प्रसन्नतापूर्वक बिताएगी और छह माह परिवार द्वारा थोपे गए पति के साथ भुगत लेगी. 
*दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय' को बार-बार याद दिलाने वालों की भी कोई कमी न रही. इन्होंने व्याख्या करते हुए कहा कि चार दिनों में प्यार का बुख़ार उतर जाएगा और दोनों आपस में सौतन-सौतन खेलेंगीं.'
*कई स्त्रियाँ इस प्रकरण से क्षुब्ध भी हैं. उनका मानना है कि यदि मामला उलट होता तो यह निर्णय किसी भी स्थिति में नहीं आता. हमारे साथ भेदभाव तो सदियों से चला आ रहा है. 
'अखिल भारतीय प्रेमी संघ' ने, प्रेम के ऊपर साक्षात् पहरा (पत्नी की उपस्थिति) बताते हुए इस पूरी घटना की कड़ी निंदा की है. 

मिश्रित वर्ग के जलकुकड़ुओं के विचार भी जान लीजिये 
*इनका विचार है कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं. अब इन्होंने जो कहा वो भले ही पुरानी कहावत है. लेकिन हमें इस बात पर घनघोर आपत्ति है कि लड़कियों को 'तलवार' कैसे कह दिया? आई मीन, हाउ डेयर यू!! फूल सी कोमल लड़कियों के लिए यह हिंसक नाम क़तई शोभा नहीं देता!
*एक साहब ने तो तालियाँ पीटते हुए यहाँ तक कह डाला कि यही इसके लिए उचित सजा है. बच्चू को केवल आटे-दाल के भाव ही नहीं पता चलेंगे बल्कि जब बाइक पर किसी एक को क़रीब बिठाएगा और दूसरी को पीछे; असल खेल तो तब शुरू होगा. 

भई, हम तो कहते हैं ये परिवार ख़ूब खुशहाल जीवन जिए. बस, कोरोना काल में ऐसी ख़बरें आती रहनी चाहिए. तनाव दूर होता है और बैठे-ठाले मुस्कुराने की वज़ह मिल जाती है. प्रसुप्तावस्था में पड़ी उम्मीद को क़रार आ जाता है, सो अलग. 
नारायण-नारायण 
- प्रीति 'अज्ञात'
#BetulMarriage #MadhyaPradesh #Marriage #IndianBride #MP_Panchayat #iChowk #preetiagyaat
                                                                



शर्मनाक! अमिताभ के साथ रेखा को जोड़कर छिछोरे comments करने वाले भी बीमार हैं

इस कोरोना महामारी ने न केवल दुनिया भर के लोगों का जीना मुश्क़िल कर दिया है बल्कि कुंठित और घिनौनी मानसिकता से भरे तमाम लोगों को अपनी तथाकथित 'प्रतिभा' दिखाने का कुअवसर भी दे डाला है. व्हाट्स ऐप्प पर लिखने वाले तो महान हैं ही, पर इन बेहूदगी भरी पोस्टों को हँसते हुए फॉरवर्ड कर देने वालों की भी कोई कमी नहीं! देखकर तरस आता है कि इन्होंने निम्नता के रसातल तक पहुँचने की कोई सीमा तय की भी है या नहीं?

एक ओर जहाँ पूरा देश अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने से स्तब्ध है. देश-दुनिया भर में उनके करोड़ों प्रशंसक उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की दुआएं माँग रहे हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इस समय भी मसख़री सूझ रही है. मसख़री भी नहीं बल्कि ये ख़ालिस बदतमीज़ी ही है.
ठीक है, रेखा और अमिताभ का कभी एक पास्ट रहा भी होगा तो इसका यह मतलब तो क़तई नहीं कि आप जब जी चाहें, उनका जीना हराम कर दें! हद है! इस संवेदनशील समय में भी इधर-उधर का जोड़-तोड़, सच्ची मोहब्बत के नाम पर इन दोनों कलाकारों के लिए घटिया पोस्ट रची जा रही है. क्या हम भारतीयों की रचनात्मकता (creativity) का स्तर इतना गिर चुका है कि हम बीमारी में भी मज़े लूटना नहीं छोड़ पा रहे! हो क्या गया है, समाज को?

मुझे नहीं याद पड़ता कि किसी भी बड़े नेता या फ़िल्म स्टार के सुरक्षाकर्मी (Security Guard) के कोरोना पॉजिटिव होने की ख़बर इतने जोर-शोर से दिखाई गई हो, जितना कि रेखा के बंगले की बात हुई. चलिए, ख़बर देना भी सही! पर उसके मिलते ही यूँ उछल पड़ना जैसे लॉटरी निकल गई हो; कहाँ तक तर्कसंगत है? आख़िर लोगों की मानसिकता किस हद तक नीचे गिरेगी?

फेसबुक, ट्विटर पर कुछेक को छोड़ दिया जाए तो वहां संवेदना भरे लाखों संदेशों की बाढ़ आई हुई है लेकिन व्हाट्स ऐप्प यूनिवर्सिटी का एक अलग ही शास्त्र है. यहाँ केवल मखौल उड़ाती या सस्ती भाषा से भरी पोस्ट ही फॉरवर्ड की जा रहीं हैं.
एक लिखता है, "इसी को मोहब्बत कहते हैं प्यारेलाल जी कि कोरोना सिकंदर को हो और बंगला ज़ोहराबाई का सील कर दिया जाए!"
दूसरे ने तो आला दर्ज़े का काव्य ही रच दिया, "मोहब्बत की मिसाल देगा सदियों तक ज़माना, कोरोना अमिताभ को और बंगला रेखा का सील हो जाना."
इनके लिए मोहब्बत न हुई मज़ाक हो गई कि जब चाहे कर लो! ये तो बानगी भर है. अग़र सारी पढ़ें तो किसी का भी खून खौल जाए.

हम जानते हैं कि अमिताभ ही नहीं बल्कि अभिषेक, ऐश्वर्या और उनकी बेटी आराध्या भी कोरोना से संक्रमित हैं. इस कठिन समय में भी जब बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित परिवार को लेकर लोग अपना छिछोरापन नहीं छोड़ पा रहे हैं तो आम जनता के दुःख में इनकी घड़ियाली संवेदनाओं का अनुमान आप स्वयं लगा लीजिए!
इन्हें बच्चन परिवार के साथ और इस महामारी में खिलंदड़पन सूझ रहा है तो ये अपने आस-पड़ोस के लोगों के संक्रमित हो जाने पर न जाने उन्हें किन नज़रों से देखते होंगे? कैसा बर्ताव करते होंगे?

कुछ को तो इस बात से भी पेट में मरोड़ उठ रही कि इतने लोगों को कोरोना हुआ तो बच्चन परिवार के मामले को ही क्यों तूल दी जा रही?
मने कमाल है! हिन्दी सिनेमा का महानायक जिसने अपने जीवन के पचास वर्ष इस इंडस्ट्री को दिए, आप सबका मनोरंजन किया, अपनी संघर्ष और सफ़लता की कहानी से न जाने कितने युवाओं को प्रेरणा दी, उनमें जोश भरा! तमाम सामाजिक कार्यों से जुड़ा हुआ है. आज उसकी न्यूज़ से आपको दिक़्क़त होने लगी?
क्या बच्चन परिवार की न्यूज़ दिखाने से शेष संक्रमितों के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है? यदि किसी सितारे के चाहने वालों को उसकी फ़िक्र है तो इसमें आपको ग़लत क्या लग रहा? क्या आप उसकी चिंता नहीं करते जो आपका प्रिय है? हाँ, अमिताभ बच्चन ख़ास हैं, सदैव रहेंगे.

कोरोना काल में लगने लगा था कि अब इंसान की सोच थोड़ी बेहतर होगी, मन शायद निर्मल होने लगेगा, हृदय कुछ और संवेदनशील होगा, इंसानों और भावनाओं की क़द्र होने लगेगी पर यहाँ तो हर तरफ़ समाज का दोहरा, भद्दा और वीभत्स चेहरा ही नज़र आ रहा है!
- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 12 जुलाई 2020

मेरे लिए तो A फॉर अमिताभ ही है

उन दिनों जब एक नए नवेले नायक को 'एंग्री यंग मैन' कहा जा रहा था लगभग तभी ही मेरा इस दुनिया में पदार्पण हुआ. इसलिए कह सकती हूँ कि जब से होश सँभाला है स्वयं को अमिताभ के युग में ही पाया. मैं और मुझसे कई उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अमिताभ के नायक से महानायक बनने की पूरी यात्रा में साथ-साथ चले हैं. उनके गीतों को गुनगुनाया है. उनके संवादों संग अठखेलियाँ कर अपनी मोहब्बत में हजारों रंग भरे हैं. 
उन दिनों शहर के चौराहों और कई प्रमुख स्थानों पर फिल्मों के पोस्टर लगा करते थे. रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर भी नई फ़िल्मों के लगने ('रिलीज़' शब्द तब अंचलों तक पहुँचा ही नहीं था) की सूचना दी जाती थी. स्कूल जाते समय इन पोस्टरों को देखने रुक जाती और नाम पढ़ती कि किस टॉकीज़ में कौन सी फ़िल्म लगी है. अमिताभ के पोस्टर पर आँखें जैसे ठहरी ही रहतीं.

चम्बल का इलाक़ा था और छोटा शहर. प्रायः नई फ़िल्में यहाँ उसी दिन देखने को नहीं मिलती थीं. कुल तीन सिनेमा हॉल थे, बाद में एक और बन गया था. दो ही तरह की फ़िल्में यहाँ ख़ूब चलतीं. या तो डकैतों पर बनी हों या अमिताभ की हों. कुल मिलाकर मेरे शहर भिंड का एक्शन से भरपूर सम्बन्ध था तो ऐसे में सबको मुँहतोड़ जवाब देने वाला 'विजय' हमेशा ही भाता रहा. अन्य किसी भी तरह की फ़िल्म कब आती और कब उतर जाती, पता भी नहीं चलता था. ये अपने भिया अमिताभ का ही जादू ऐसा था कि हमेशा सबके सिर चढ़कर बोलता. उनकी फ़िल्में हफ़्तों चलतीं, कभी-कभी महीनों भी. टिकट-खिड़की पर धक्का-मुक्की, मारामारी यहाँ तक कि ब्लैक में भी टिकटें बिका करतीं. अब चूँकि ये अमिताभ बच्चन हैं तो लोग खड़े होकर भी इनकी फ़िल्में देखने को तैयार रहते क्योंकि जहाँ ये खड़े होते हैं, लाइन तो वहीं से शुरू होती है. आपको बता दूँ, उन दिनों शो हॉउस फुल होने के बाद अतिरिक्त कुर्सियाँ और बेंच लगा दी जाती थी. जब ये बेंचें भी भर जाया करती थीं, तब लोग खड़े होकर भी अपने नायक की एक झलक पाने को तत्पर रहते थे. इधर अपने अमिताभ की एंट्री हुई, उधर तालियों और सीटियों से हॉल गूँजने लगता और ख़लनायक (Villain) की पिटाई के दौरान तो जो सिक्के उछाले जाते कि पूछिए मत! ये जज़्बा जो अमित जी के लिए उमड़ता रहा न, वो मैंने कभी किसी के लिए नहीं देखा. अजी, तब तो लोग पागल हो जाते थे. अभी मल्टीप्लैक्स में फ़िल्में देखने का वो मज़ा नहीं है और इस तरह का पागलपन भी जरा कम ही देखने को मिलता है. पागलपन नहीं, दीवानगी ही समझिये इसको. पर भैया, अब जो है सो है. उनके जैसा हेयर स्टाइल, बैलबॉटम, चलने का अंदाज़ सब कुछ कॉपी किया जाता. उनके संवाद बच्चे-बच्चे को याद रहते और नृत्य की अनोखी शैली से तो हम सब परिचित हैं ही.  

अपना ये हीरो ग़र अख़बार भी पढ़े न तो अपन तो आवाज़ सुन ही होश खो बैठें. ये हीरो जब बोलता है तो आवाज़ सीधे दिल की घाटी में उतर जाया करती है, जब हँसता-हँसाता तो मैं भी उसके साथ और बाद में भी घंटों हँसती, वो उदास होता या उसका दिल टूटता तो मुझे बेहद गुस्सा आता. यूँ लगता कि नहीं यार! मेरे लंबू को कुछ नहीं होना चाहिए. उसके ग़म में मैं भी जार-जार रोती. ये वही हीरो है जिसने मुझे अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने और डटे रहने की प्रेरणा दी. जो हर मुसीबत से निकल पाने की सीख देता रहा, जिसने हर ज़ुल्म का प्रतिरोध किया. क्या करें, तब फिल्मों का असर इतना गहरा ही होता था, असल ज़िंदग़ी से जुदा नहीं लगा करती थीं. मनोरंजन का एकमात्र साधन यही था जिसने तमाम युवाओं के मन में सपनों के हजार बीज बो दिए थे. मेरे हृदय में भी 'हीरो' की छवि में एक साँवला, लंबा और गहरी आँखों वाला युवक उभरने लगा था.  मैं उनकी तस्वीरें भी जमा करती थी और उनसे जुड़ी ख़बर पाने के लिए ही अख़बार पलटा करती. आलम ये था कि कोई उनके विरुद्ध एक शब्द भी कह दे तो अपन उससे सीधा भिड़ जाते. अमिताभ के लिए कुछ भी गलत सुनना न तो तब ग़वारा था और न अब है. आगे भी नहीं होगा.

अमिताभ की फ़िल्में ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व और जीवन से भी बहुत पाठ लिए जा सकते हैं. उन्होंने ही सिखाया कि संघर्षों से कैसे जीता जा सकता है, मुश्क़िल समय में मन नहीं हारना है और ये वक़्त भी गुज़र जाएगा. उनकी भाषा, बोलने का सलीक़ा और विनम्रता देख लोग सभ्यता का पाठ समझते हैं. उनका मौन भी मुखर होता है. वे हर पीढ़ी के आदर्श रहे. अपने बाबूजी के ये प्रेरणास्पद शब्द वो अक़्सर कहते हैं -
 "तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ'
ये शब्द जब अमिताभ की आवाज़ पा जाते हैं तो तन-मन में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार कर देते हैं.

हिन्दी सिनेमा का महानायक और दादा साहब फ़ालके पुरस्कार प्राप्त यह अभिनेता अपने आप में एक संस्थान है. एक युग है. अमिताभ, अभिनय की वो पाठशाला हैं जो अपने जीवन के पचास से भी अधिक वर्ष सिनेमा को समर्पित कर इसे समृद्ध करते रहे हैं और टीवी पर भी अपना जलवा ख़ूब बिखेरा है. अब भी बिखेर रहे हैं और हम सब को केबीसी के नए सीज़न का बेताबी से इंतज़ार भी है. अमिताभ सा दूजा न कोई हुआ है, न होगा. पक्का यक़ीन है कि मुसीबतों को मात देने वाला हमारा 'विजय' इस बार भी शीघ्र ही घर लौटेगा.

याद है अमित जी, बाबूजी ने एक अनुवादित कविता में क्या कहा था? पढ़िए तो जरा -
अभी कहाँ आराम बदा
यह मूक निमंत्रण छलना हैं,
अरे अभी तो मीलों तुमको,
मीलों तुमको चलना है.
स्वस्थ होकर घर आइए. हम सबको केबीसी और आपकी आने वाली फ़िल्मों की प्रतीक्षा है. लेकिन उससे भी पहले आपके और अभिषेक के स्वस्थ होने की ख़ुशी में जलसा भी तो करना है न!
देश भर का अपार स्नेह और सारी प्रार्थनाएं आपके नाम.
Get Well Soon, Sir 🌺
https://www.ichowk.in/cinema/amitabh-bachchan-and-abhishek-bachchan-got-infected-with-covid-19-stressed-fans-praying-for-big-b-recovery-get-well-soon-big-b/story/1/17955.html
- प्रीति 'अज्ञात'  
#Amitabh_bachchan #BigB #Angry_Young_Man #AbhishekBachchan #Covid19 #coronavirus #iChowk
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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

प्रेम को जीना इसे कहते हैं!

कुछ मित्रों के आग्रह पर अश्विन जी और मल्लिका जी के चैट उपन्यास 'यू एन्ड मी...द अल्टिमेट ड्रीम ऑफ़ लव' पर मेरे द्वारा लिखी गई भूमिका यहाँ साझा कर रही हूँ। यह जून 2019 में लिखी गई थी। संदर्भ: https://preetiagyaat.blogspot.com/2020/07/blog-post_7.html
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प्रेम की कोई एक स्थायी परिभाषा कभी बनी ही नहीं। यह संभवतः चंद मख़मली शब्दों में लिपटी गुदगुदाती, नर्म कोमल अनुभूति है। आँखों के समंदर में डूबती कश्ती की गुनगुनाती पतवार है। एकाकी उदास रातों में अनगिनत तारे गिनती, स्मृतियों के ऊँचे पहाड़ों के पीछे डूबती साँझ  है। प्रसन्नता के छलकते मोती हैं या फूलों में बसी सुगंध है। अनायास उभर चेहरे को लालिमा की चादर ओढ़ाती मधुर मुस्कान है।
हम सबके जीवन में कोई न कोई ऐसा इंसान अवश्य ही होता है जिससे अपार स्नेह हो जाता है, दिल उसे हमेशा प्रसन्न देखना चाहता है और हर दुआ में उसका नाम ख़ुद-ब-ख़ुद शामिल होता जाता है। यद्यपि यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि उस इंसान की भावनाएँ भी आपके प्रति ठीक ऐसी ही हों। ऐसा होना अपेक्षित भी नहीं होता है, फिर भी कुछ बातें गहरे बैठ जाती हैं। दुःख देती हैं लेकिन धड़कनें तब भी हर हाल में उसी लय पर थिरकती हैं। उसकी तस्वीर को घंटों निहार कभी ख़ुशी तो कभी निराशा के गहरे कुएँ की तलहटी तक उतर जाती हैं। यह सारी जादूगरी प्रेम की ही देन है।
क्या पल भर की मुलाक़ात, चंद बातें और एक प्यारी-सी हँसी भी प्रेम की परिभाषा हो सकती है? होती ही होगी...वरना कोई इतने बरस, किसी के नाम यूँ ही नहीं कर देता! आप इसे इश्क़/मोहब्बत/प्यार /प्रेम या कोई भी नाम क्यों न दे दें, इसका अहसास वही सर्दियों की कोहरे भरी सुबह की तरह गुलाबी ही रहेगा। इसकी महक जीवन के तमाम झंझावातों, तनावों और दुखों के बीच भी जीने की वज़ह दे जाएगी।
प्रत्येक प्रेम कहानी का प्रारंभ प्रायः एक सा ही होता है। भीड़ के बीच दो क़िरदार मिलते हैं, कभी कहानी बनती है तो कभी बनते-बनते रह जाती है। सारा खेल कह देने और न कहने के मध्य तय होता है। जीवन की दौड़ और समय के बहाव में कोई एक क़िरदार इतना आगे निकल जाता है कि पलटकर आता ही नहीं और एक मौन कहानी ठिठककर, सकुचाई-सी वहीं खड़ी रह जाती है। उसके बाद की गाथा समाज तय करता है, 'दुखांत', 'सुखांत' या 'एकांत'!

इन दिनों सोशल मीडिया और इस पर फलते-फूलते आभासी प्रेम की सैकड़ों कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं। पानी के बुलबुले-सा जीवन जीती ये तथाकथित प्रेम कहानियाँ लाइक, कमेंट, इनबॉक्स से होती हुई देह तक पहुँचती हैं और कुछ ही माह पश्चात् आरोप-प्रत्यारोप, स्क्रीन शॉट और ब्लॉक की गलियों में जाकर बेसुध दम तोड़ देती है। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अंतरजाल की दुनिया ने रिश्तों को जोड़ने के स्थान पर तोड़ने का कार्य अधिक किया है। लेकिन यह भी चिरकालिक सत्य है कि सच्चे प्रेम को कोई डिगा नहीं सकता! इन्हीं ख़्यालों से गुजरते हुए मैं एक ऐसे ही उपन्यास 'यू एन्ड मी...द अल्टिमेट ड्रीम ऑफ़ लव' से रूबरू होती हूँ तो यही सोशल मीडिया ईश्वर के दिए किसी वरदान सरीख़ा प्रतीत होता है।
पैंतालीस वर्षों के दीर्घ अंतराल के बाद सोशल मीडिया की इसी आभासी दुनिया में इस उपन्यास के लेखक युग्म मल्लिका और अश्विन का मिलना, किसी खोए हुए स्वप्न को खुली आँखों में भर लेने जैसा है। वो अनकही प्रेम-कहानी, जो अपने समय में जी ही न जा सकी; जब पुरानी स्मृतियों के पृष्ठ पलटती है तो सृष्टि के सब से सुन्दर और सुगंधित पुष्प आपकी झोली में आ गिरते हैं। इनकी महक़ और भावुकता में डूबा हृदय दुआओं से भर उठता है और प्रेम के सर्वोत्कृष्ट रूप से आपका मधुर साक्षात्कार होता है।

यह प्रेम कहानी भी बनते बनते, एक अंतहीन प्रतीक्षा की चौखट पर उम्र भर बाट जोहती अधूरी ही रह जाती है। लेकिन जीवन तब भी उसी निर्बाध गति से चलायमान रहता है। जब कहीं रिक्त स्थान छूट जाता है या छोड़ दिया जाता है तो उम्मीद की सबसे सुनहरी किरण ठीक वहीं से प्रस्फुटित होती है तभी तो एक दिन अचानक वो बचा, छूटा हुआ हिस्सा ही सौभाग्य का चेहरा बन नायिका के मन के द्वार को कुछ इस तरह से खटखटाता है कि उस की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता! यही प्रेम की वह उत्कृष्टतम अवस्था है, जहाँ प्रिय से अपने हृदय की बात कह पाना और उसकी स्वीकारोक्ति ही सर्वाधिक मायने रखती है। यहाँ न मिलन की कोई अपेक्षा है और न ही समाज का भय। आँसू से भीगे मन और खोई हुई चेतना है! वो प्रेम जो दर्द बनकर वर्षों से नायिका के सीने में घुमड़ रहा था, उसकी अभिव्यक्ति अपने प्रिय के समक्ष कर देना ही सारी पीड़ा को पल भर में हर लेता है। उसके बाद जो नर्म अहसास शेष रहता है, वही प्रेम का चरम सुख है।

कहते हैं, जो पा ही लिया तो प्रेम क्या और उसकी चर्चा क्या? प्राप्य के बाद कुछ भी सम्भाव्य शेष नहीं रहता। प्रेम की महत्ता पाने से कहीं अधिक उसे खोकर जीने में है। अश्विन और मल्लिका की प्रेम गाथा को पढ़ते हुए इन्हीं गहन सुखद अनुभूतियों से पाठक का साक्षात्कार होता है। यह उपन्यास प्रेम पर टिके हर विश्वास को और गहरा करता है साथ ही इस बात की पुष्टि करने से भी नहीं चूकता कि सच्चा प्रेम कभी नहीं हारता, बल्कि शाश्वतता की ओर बढ़ता चला जाता है!
यह उपन्यास समाज के उस कुरूप चेहरे को भी बेपर्दा करता है जहाँ खोखली परम्परा और मान्यता के नाम पर बनाए खाँचे में फिट होने पर ही किसी रिश्ते को सर्वमान्य किया जाता है। साधारण रंगरूप की नायिका, नायक से अथाह प्रेम करने के बाद भी उससे अपने दिल की बात यह सोचकर नहीं कह पाती कि भला इतना सुदर्शन युवक उसकी प्रेमपाती क्यों पढ़ेगा? फिर समाज ने तो धर्म के चश्मे से ही दिलों को परखा है धड्कनों को गिनना तो वह आज तक नहीं सीख पाया! आज से पैंतालीस वर्ष पहले इस किशोरी नायिका का यह भय स्वाभाविक ही था कि हिन्दू लड़की और ईसाई युवक का सम्बन्ध यह रूढ़िवादी समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा। वो एक तरफ़ा प्रेम करती रही, इधर नायक भी अत्यधिक संकोची एवं अंतर्मुखी होने के कारण न तो उस किशोरी के हृदय की तरंगों को सुन पाया और न ही उससे दोस्ती का हाथ बढ़ा पाया।

परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पूर्ण एवं बेहतरीन तरीके से निर्वहन करते हुए भी कथा नायिका चार दशकों से भी ज्यादा समय तक न केवल उसकी स्मृतियों को जीवंत बनाए रखती है अपितु उससे जुड़ी तमाम तस्वीरें भी अपने पास सुरक्षित रख पाती है। फिर एक दिन अपने कॉलेज काल के प्रिय साथी को सोशल मीडिया पर ढूँढ निकालती है। अपने संक्षिप्त परिचय के साथ जब उसकी दुनिया में प्रवेश करती है, हजारों मील दूर बसा नायक खुले दिल से अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए संवाद के जरिये विस्थापन की पीड़ा, अपने समस्त दुःख एवं अस्वस्थता भुला, खुलकर बातें करता है। अपने खोए हुए शौक़ को जीवंत करते हुए संगीत, शेरो-शायरी के बीच अपनी आपबीती कहता है। लोग सही कहते हैं कि यदि आपके साथ एक भी इंसान ऐसा है, जिससे आप अपने सारे दुःख-सुख साझा कर सकते हैं तो आपका जीवन सार्थक है। दिल से जुड़े हुए लोग परस्पर दर्द जैसे सोख लेते हैं।

प्रेम के बीज से अंकुरित इस उपन्यास को प्रेम कहानी भर कह देना इसके साथ अन्याय होगा क्योंकि यह कई सामाजिक विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है। यह धर्म के नाम पर उठाई गईं दीवारों को तोड़ देने की बात करता है। नई पीढ़ी के युवाओं को महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना बनाए रखने का अनुरोध करता है। हमारी शिक्षा-व्यवस्था पर भी कई गहन संवाद करता है। विदेशों में रहने वाले भारतीयों को लेकर हमारे समाज में जो भ्रांतियाँ स्थापित की गईं हैं, यह उपन्यास उन पर भी करारा प्रहार करता है। पैसे कमाने के लालच में कई बार विदेश जाने वाले लोगों को किस-किस तरह की परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है और उनका जीवन किस दुश्चक्र में फँस जाता है कि उनसे न आते बनता है, न वहाँ रहते; यह अमीरी के उस भ्रामक मापदंड की भी स्पष्ट और सटीक विवेचना करता है। अपने वतन से बिछड़ने का दर्द भी जाहिर करता है।
अपने-अपने जीवनसाथी से रिश्तों की मजबूती निभाते हुए, अपने परिवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पित होते हुए भी मल्लिका जी और अश्विन जी ने अपने-अपने जीवन की सच्ची दास्तान लिखने का जो साहस दर्शाया है, आप उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते। कथा नायक अश्विन और उसकी पत्नी के रिश्ते को भी बहुत सुन्दर तरीके से बताया गया है कि करीब चार साल तक विवश हो अलग रहने और तमाम कठिनाइयों का सामना करने के बाद अंततः वह अपनी पत्नी और बेटी के पास अमेरिका पहुँच ही जाता है। ठीक उसी तरह कथा नायिका मल्लिका भी एक सहपाठी के साथ दोस्ती और प्रेम की भूलभुलैया में उलझकर चरम मानसिक संघर्ष से गुजरती है तभी एक अत्यधिक सुलझा हुआ, संवेदनशील एवं समझदार इंसान उसे जीवनसाथी के रूप में मिल जाता है, जिससे वह अपने दिल की सारी बातें बेझिझक साझा कर सकती है।

मुझे पूरा विश्वास है कि चैट पर आधारित यह उपन्यास प्रेम के शाश्वत रूप को और भी गहराई से स्थापित करेगा तथा पाठकों तक यह सन्देश भी पहुँचायेगा कि जब किसी से प्रेम हो तो उस पक्ष को अपनी बात निस्संकोच कह ही देना चाहिए। अधिक से अधिक क्या होगा? ‘न’ हो सकता है और क्या? पर प्रणय निवेदन न कर पाने का उम्र भर दुःख मनाने से कहीं श्रेष्ठ है उसे कह देने की प्रसन्नता पाना।
थोथी इज़्ज़त के नाम पर घृणा और हिंसा में डूबते समाज में ढाई आख़र के प्रेम की यह गाथा शीतल बयार की तरह है। इन गाथाओं का जीवित रहना और बार-बार कहे जाना नितांत आवश्यक है कि मानवीय संवेदनाओं का मान बना रहे और प्रेम को उसकी शाश्वतता के कारण चिरकाल तक बिसराया न जा सके।

स्थल और काल से परे, प्रेम को परिभाषित करती इस उपन्यास की कहानी, वर्तमान पीढ़ी के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि आज से पैंतालीस वर्ष पूर्व थी। युवाओं को यह भी सीखने को मिलेगा कि देह से इतर प्रेम कितना ख़ूबसूरत और परिपक्वता लिए होता है। समाज के बनाए हुए निरर्थक नियमों के चलते अथाह पीड़ा से गुजरकर, नियमों के दायरे को तोड़कर; प्राप्य की इच्छा से कोसों दूर आत्मिक श्रेष्ठता की अनुभूति कर पाना वास्तव में प्रेम का चरम बिंदु है।
मैं नहीं चाहती कि इस श्लाघनीय उपन्यास में आपके आनन्द में रत्ती भर भी कमी आये और दोहराव लगे, इसीलिए मैं संवादों को यहाँ लिखने से बच रही हूँ। अंत में पाठकों से इतना ही कहूँगी, अपनी-अपनी कहानी का अंतिम पृष्ठ हमारे भरने के लिए ही होता है, आप भी उसे इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कर दीजिए!
-प्रीति 'अज्ञात'

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