शुक्रवार, 7 मार्च 2014

होता है, जी....

कई बार ऐसा होता है न, कि कोई इन्सान हमें अपने-आप से भी ज़्यादा ज़रूरी लगने लगता है, हर-वक़्त जेहन में वही एक नाम घूमता रहता है और जो कहीं वो नाम लिखा भी दिख जाए, तो दिल की धड़कनें अचानक बढ़ जाती हैं, चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान छा जाती है और फिर हम अचानक सामान्य दिखने की भरसक कोशिश भी करते हैं. डर जो लगता है कि कोई हाल-ए-दिल पढ़ न ले. उफ्फ...ऐसे FATTU बनने की क्या ज़रूरत है? जिस प्रेम को पाने में लोगों की उमर बीत जाती है, आप उसके बेहद करीब हैं, बस उस एक शख़्स से कहना ही तो शेष है.....जाओ, कह दो आज ही जाकर उसे; "मुख्तसर सी बात है......." और हाँ, फिर थामे रखना उस हाथ को, विश्वास कभी टूटने न देना !
Trust Me , करूण रस के कवि बनने से बेहतर विकल्प है ये ! बाकी आपकी क़िस्मत, खुल गई तो हमारी दुआएँ आपके साथ और न खुली तो बद्दुआएँ क़बूल हैं हमें, पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है ! 
"एक जीवन: आधा बीत चुका दुनिया के हिसाब से.... अब तो जी लो बचा-खुचा, अपनी ख़्वाबों की किताब से"
प्रीति 'अज्ञात'

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा आपने।


    सादर

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  2. एक निवेदन
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    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।
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    धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया, यशवंत जी. अब कोई असुविधा नहीं होगी. पोस्ट पर आने के लिए बहुत-बहुत आभार !

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