रविवार, 16 मार्च 2014

'ज़िंदगी'....जीने के लिए ही तो बनी है !

'आत्महत्या' एक प्रकार की हत्या ही है. फ़र्क बस इतना ही है, कि इसमें इंसान अपने मरने के तरीके खुद चुनता है; माहौल तो दूसरे या उसके अपने ही तैयार कर देते हैं. 'हत्या' में, हत्यारे को उस व्यक्ति की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं; इसलिए वो उसे मार डालता है. 'आत्महत्या' में, ख़ुद ही पता होता है; कि उपस्थिति के कोई मायने ही नहीं ! एक नज़र से, यही ज़्यादा समझदार सा लगता है या फिर कोई बहुत ही बड़ा बेवकूफ़ !

मैं हमेशा से ही 'आत्महत्या' करने वालों से नफ़रत करने वाली और इस कृत्य की घोर विरोधी रही हूँ, क्योंकि मुझे लगता आया है; कि उन्हें उन अपनों की परवाह ही नहीं, इसीलिए ये कायरता भरा कदम उठाते हैं. लेकिन कभी-कभी एक अप्रत्याशित सी सहानुभूति भी होती है, उनसे ! हो सकता है, उन्हें भी यही महसूस होता हो; कि अपनों को ही उनकी फिक़्र नहीं ! अगर मरने से पहले, कोई उन्हें ये अहसास करा देता कि उनकी मौजूदगी कितनी अहं है..तो वो शायद कभी ऐसा करते ही नहीं ! काश, कोई किसी को कभी ऐसा करने को मजबूर न करे ! दिल से न सही, एक 'भ्रम' की तरह भी कोई, किसी का हमेशा के लिए हो सके....तो कुछ ज़िंदगियाँ, कुछ वर्ष और जी सकें ! अकेलापन भी मार ही देता है, इंसान को ! ये 'मौत' भीतर ही होती है, हर रोज ! कभी समाज का भय, तो कभी व्यक्ति-विशेष से बिछोह का. कभी किसी की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाना बुरा लगता है, तो कभी अपने ही उत्तरदायित्वों के निर्वाह में कमी सी लगती है. 'अपेक्षा' और 'उपेक्षा' दोनों ही हर रूप में घातक हैं. इनसे बच गये, तो भाग्यशाली हैं. वैसे ऐसा हो पाना भी मुश्किल सा ही है.

'एकला चलो रे.....' सुनने में अच्छा ज़रूर लगता है, पर कौन, कब तक, कितनी दूर तक अकेला चल पाया है..इसका हिसाब-किताब कहीं नहीं ! हाँ, जिसने भी इस मंत्र को समझ लिया, वही जी गया.... ! कतरा-कतरा ज़िंदगी तो रोज ही बिखरती है, और रोज ही उसे समेटना भी ज़रूरी है. बहुत रहस्यवादी है, ये दुनिया और इसमें बसे सभी लोग. क़िस्मत वाले हैं, वो .......जो इसमें खुलकर हँस लेते हैं ! कौन जाने, उस हँसी की तहों में, कितने दर्द दफ़न हैं !
खैर....ख़ुदा करे, आपके सभी अपने, आपके करीब और हमेशा सलामत रहें ! 'ज़िंदगी'....जीने के लिए ही तो बनी है! इससे कैसी नाराज़गी !


प्रीति 'अज्ञात'

9 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा सिर्फ इतना मानना है कि जब जीवन विकल्प रहित हो चुका हो तो हतोत्साहित रहते हुए जीने से बेहतर जीवन को समाप्त कर देना होता है।

    बहरहाल आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !

    सादर

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    1. जीने से बेहतर और कोई विकल्प नहीं, यशवंत जी
      शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद, आपको भी मुबारक हो !

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  2. कल 20/03/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  3. जीवन से बेहतर कोई और विकल्प तो नहीं ... पर आत्महत्या करना भी आसाँ नहीं ... उस मानसिक अवस्था को महसूस कर पाना आसाँ नहीं ...

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    1. इस मानसिक अवस्था को जीकर ही इसे जाना जा सकता है. ईश्वर किसी को ऐसा अनुभव न दे, पर यदि हुआ भी; तो इससे बाहर निकलकर जीना भी सिखाए ! "ज़िंदगी मिलेगी ना दोबारा" :)

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  4. ज़िन्दगी जीना भी साहस का काम है,हर एक के पास अनेक विकल्प है हर समस्या के, जरुरत उन्हें ढूँढने व अपनाने की है

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  5. Mushkil hai auro ki vedna ko samjhna qki duniya do hai ek jise hum dekh rahe aur dusra jo humare andar hai, agar dono mein talmel nahi hai to aksar log toot jate hai...

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