बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ये आकाशवाणी है!

ये आकाशवाणी है! (विश्व रेडियो दिवस पर)

सोशल मीडिया का यह लाभ तो अवश्य हुआ है कि जिन तिथियों की तनिक भी जानकारी नहीं होती थी अब उनके बारे में सुलभता से ख़ूब ज्ञान मिल जाता है. वरना कितनों को मालूम था कि आज 'विश्व रेडियो दिवस' है. वे सभी लोग जिनका जन्म नब्बे के दशक से पहले हुआ है, तय है कि उनका और रेडियो का रिश्ता यक़ीनन बना ही होगा.

उन दिनों रेडियो की भी अपनी एक निश्चित दिनचर्या होती थी. सुबह, दोपहर, शाम के समाचार, गाने, नाटिका, किसान और फौजी भाइयों के लिए, सखियों, युवाओं, बच्चों सबके लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आते थे. वार्ता, साक्षात्कार प्रसारित होते थे. चिट्ठियाँ पढ़ी जातीं थीं. प्रादेशिक केन्द्रों के साथ घर-घर में विविध भारती बेहद लोकप्रिय हुआ करता था. उन दिनों की एक मज़ेदार बात है कि तब गूगल तो था नहीं और हम जैसे लोग जब ऊटकमंड से सीमा, बबलू, गोलू, मनोज और उनके मम्मी-पापा, झुमरीतलैया से रामप्रसाद,गेंदाबाई, इस्माइल ख़ान, जावेद अली और उनके परिवार के सभी सदस्य, गंजडुंडवारा से रेखा, अनीता, पिंकी और उनकी सारी सखियाँ....सुनते तो ये मानकर ही चलते थे कि ऐसे नामों वाली जगह असल में हैं ही नहीं और ये लोग हमें उल्लू बना रहे हैं.  खैर,अब पता चल गया कि वो मज़ाक नहीं करते थे, ये स्थान तो हैं और अपने देश में हीं! उस बात के लिए कान पकड़ के सॉरी है जी!

तब विश्वसनीयता के लिए बीबीसी पर आँख मूँदकर भरोसा किया जाता था. मुझे याद है, इंदिरा गाँधी की हत्या के समय किसी को इस दुखद समाचार पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था. जब बीबीसी पर इसकी पुष्टि हुई तो देश भर में शोक की लहर दौड़ गई. यही वो समय भी था, जब दूरदर्शन का मध्यम वर्ग के घरों में प्रवेश प्रारंभ हुआ था.

रेडियो ने जैसे लोगों को जोड़ रखा था. अमीन सयानी जी की बिनाका (बाद में सिबाका) गीतमाला के समय तो सब यूँ इकट्ठे होकर सुनते जैसे कि पहली पायदान वाली फिल्म के निर्माता-निर्देशक वही हों. शर्तें लगतीं और बाद में इतराया जाता, "देखो, मैनें बोला था न, पहली पायदान वाला गीत! तुम्हारा वाला तो तीसरी पायदान पर ख़िसक गया. टिलीलिलि." और वो बंदा इसी बात पर या तो लड़ बैठता या खिसियाकर खिसक लेता. ख़ूब मस्ती-शैतानियाँ होती थीं.
क्रिकेट और रेडियो का नशा भी अपने चरम पर था. मैच के समय हर घर से कमेन्ट्री की आवाजें आतीं, बाज़ार जाते तो दुकानदार भी रेडियो/ ट्रांजिस्टर से ही कान टिकाये मिलता. अगर आखिरी ओवर हुआ तो 'सामान गया तेल लेने', सब दम साधे सुनते और 'ये लगा सिक्सर' सुनते ही यूँ नाचते जैसे उनके बच्चे ने परीक्षा में टॉप किया हो! क्या गाँव, क्या शहर...सबको एकसूत्र में बाँधकर रखता था रेडियो.

एक समय वह भी आया जब टीवी के घर-घर में पहुँचने के बाद रेडियो चुपचाप रहने लगा. दृश्य और श्रव्य माध्यम को अब ज्यादा महत्ता मिलने लगी थी और रेडियो के दिन बीतने की ख़बरें भी अपनी जगह बना रहीं थीं. पर कहते हैं न कि 'समय के साथ चलने में ही समझदारी है'. रेडियो ने भी यही किया. एफएम रेडियो ने पुनः नई ऊँचाइयों को छुआ और एक बार फिर सबके दिलों में जगह बना ली. इसकी पहुँच और महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी अपने 'मन की बात' पहुँचाने के लिए यही माध्यम चुना!
रेडियो की जय हो!
- प्रीति 'अज्ञात'

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, हम भारतियों की अंध श्रद्धा “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. एक ज़माने में झुमरी तलैया से चिरागे आरज़ू की फ़रमाइश के बिना कोई गाना कभी बजता ही नहीं था. 11 साल की उम्र में सुना 1961 का बिनाका गीतमाला वार्षिक प्रोग्राम मुझे आज भी याद है. 'तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को' टॉप पर और 'अभी न जाओ छोड़ कर' दूसरी पायदान पर था. 1962 में राष्ट्रपति बने डॉक्टर राधाकृष्णन का भाषण बिना समझे हुए ही बहुत अच्छा लगता था. इंग्लिश में आ रही क्रिकेट कमेंट्री हमारे पल्ले तो पड़ती नहीं थी पर शोर सुनकर अंदाज़ा ला लेते थे कि फोर पड़ा है कि कोई आउट हुआ है. अब तो एफ़. एम. रेडियो सुनते हैं पर उस पर ध्यान अब कौन देता है?

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