गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

माननीय बुलडोज़र जी की अलौकिक महिमा

समय का खेला देखिए कि कहाँ हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंतित थे लेकिन अब देसी स्तर पर दुखी होना पड़ रहा है। हमने तो रूस- यूक्रेनयुद्ध की चिंता में स्वयं को भयानक रूप से व्यस्त कर रखा था कि बुलडोज़र अंकल ने मस्तिष्क के चारों प्रकोष्ठों के द्वार जोरों से खटखटा दिए। अब यूक्रेन को तो समझदार एवं मतलबपरस्त दुनिया ने भी छोड़ ही रखा है, यह सोच मन को तनिक समझा लिया है। पर राष्ट्रहित के नाते, एक सच्चे देशवासी का 'लोकल पे वोकल' होना परमावश्यक है। ये हमारे देश की और इसकी जांबाज़ मीडिया की ही ताक़त है कि प्रत्येक ज्वलंत मुद्दे से खटाक से फोकस बदल दिया जाता है। 

अब इसका कारण तो आज प्रातः की मधुर बेला में समझ आया कि इत्ते दिनों से श्रीमान परम आदरणीय, माननीय बुलडोज़र जी की महत्ता क्यों दर्शाई जा रही थी। बताइए, हमारे अपने अमदावाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन जी बुलडोज़र प्लांट के उद्घाटन के लिए पधार चुके हैं और हमें कानोंकान खबर तक न हुई। पर अब न केवल हमारे ज्ञानचक्षु ही खुल गए बल्कि मन की आँखें भी हमने चौपट्टा खोल दी हैं। इन अंग्रेजों का ‘फूट डालो,राज करो’ से मन भर नहीं पाया था क्या जो नया शगूफ़ा छेड़ दिया? बताइए, बुलडोज़र काहे को बन रहे? हर राज्य में सप्लाइ होने को ही न? अब वहाँ पिरसाद तो बाँटेंगे नहीं! सोच रहे कि ‘सुरक्सा’ की दृष्टि से हम भी एक बुक करा ही लें। कभी भिड़ंत हुई तो हमरी मर्सिडीज़ और ऑडी का तो इससे मुक़ाबला हो ही न पाएगा। उल्टे पिचकड़ा और बन जाएगा।  

सच कहूँ तो ‘बुलडोज़र संस्कृति’ ने न्याय तंत्र की तपती जलती घमौरियों को राहत दे दी है। वैसे भी उनके भरोसे कुछ हो तो रहा नहीं था।खामखाँ आरोपी मुस्टंडे हुए जा रहे थे और सबूत लाने वाले मिटते चले जा रहे थे। ऊप्स! आई मीन दुर्घटनाग्रस्त। ऊपर से दवाबका टेंशन अलग!
जिसने विरोध किया, इस्तीफ़े से कम पर फिर बात न बन सकी! या फिर हार्ट अटैक ने ही पैकअप करा दिया। कानून के हाथ लंबे होते हैं तो हुआ करें! अंधा भी तो है न। तभी तो  किसी के गिरेबान तक पहुँचने में कई बरस लगा देता है। कभी मनमाफ़िक शक्ल न मिलने पर 'मसबूरी' में गिरेबान छोड़ना भी पड़ जाता है। तात्पर्य यह कि प्रियश्री बुलडोज़र अंकलजी की क़ातिलाना नज़रों से कोई बच नहीं सकता! घायल करके ही दम लेती हैं। दोषी-वोषी वाली जाहिलपने की बात तो तुम करना ही मत!  

वैसे भी चीखने-चिल्लाने से काम न बनेगा जी! वे तो हेडफोन पहनकर काम कर रहे हेंगे। उनको कछु सुनाई नई आ रओ। जब हाड़ मांस के बने मनुष्यों के हृदय पाषाण बन चुके और अक्ल पर गुफा के बाहर न खिसकने वाला सौ मन का पत्थर पड़ा हुआ है तो भैया, मशीनों के हृदय पसीजने की उम्मीद रख आप स्वयं को ही धोखा दे रहे हो। हम तो एक ही सलाह देंगे कि बिना कोई चूँ-चपड़ किए बच सको तो बच लो! क्योंकि बुलडोज़र अंकल तो पढ़े-लिखे हैं नहीं। मतलब 'सिक्सा' से इनका दूरदराज तक का भी नाता नहीं। सिविक सेंस होता नहीं! अतः वे इन्फॉर्म करके तो कुचलने से रहे। अब तो सीधे यलगार होगी और खेल खत्म! सब मटियामेट। वैसे भी भौतिक वस्तुओं से क्या और कैसा मोह। माटी की देह को भी माटी में मिल जाना है। बस मौत से पहले देशहित में अपने अमिट योगदान के अंतर्राष्ट्रीय तरीके को प्रशंसनीय कहना न भूल जाना। ज्यादा दुख हो तो सिर पटककर मंदिर-मस्जिद की देहरी पर रो लेना। उनका कुछ तो यूज़ हो!

भगवान जी बहुत सालों से भक्तों की लीला देख रहे हैं कभी न कभी उनके शांत चेहरे पर डिट्टो वही भाव दिखाई देंगे, जैसे उनके पोस्टर में प्रदर्शित किए जा रहे हैं। तब तक संतोष रखो।  वे मूरख थे जो ‘गरीबी हटाओ’ की रट लगाते रहे, जरा इनसे मैगी न्याय सीखो। गरीब को हटाने से दो विकराल समस्याओं- गरीबीऔर बेरोज़गारी का डायरेक्ट सूपड़ा साफ़ हो जाता है। मतलब न रहेगा बेरोजगार और न इसकी बेरोज़गारी की बाँसुरी की कर्कश ध्वनि मखमली समाज पे पैबंद की मानिंद चिपकी रहेगी।
अब तो जी इधर दंगा हुआ और उधर लपेटे में पूरा मोहल्ला। नगर निगम का काम आसान। एक ही झटके में सारे अवैध निर्माणों की लिस्ट हाथ आ जाती है। तो क्या जो किसी के हाथ कटे हैं तो कटे हैं, दुकान तो उसकी भी टूटेगी बाबू। इत्ता गोल्डन चांस दुबारा जाने कब मिले और फिर हाथ तो ठाकुर  के भी नहीं थे। उसने बताया न कि साँप को हाथों से नहीं, पैरों से कुचला जाता है। तो भई, कुचले जाने का डर इत्ता गहरा बैठा कि मारे घबराहट के बुलडोज़र भैया भी जरा दाएं बाएं घूम गए। यद्यपि मानसिक संतुलन इतना तो था कि ठोकर उधर ही मारी जिधर साब जी ने बताई थी। कुल मिलाकर विक्षिप्त नहीं हुए।  

उनको रूल क्लीयर कट पता हैं कि नेता का बेटा है तो दंगाई नहीं माना जाएगा। कार से कुचलेगा तो भी उसके घर को अतिक्रमण का ठप्पा लगाकर नहीं तोड़ा जाएगा क्योंकि इन बड़े लोगन के घर भौत जादा हार्ड होते हैं और उस पर उनका मकराना का ऐसा संगमरमरी हुस्न कि बुलऊ फिसल जाए।  
इस विकराल मशीन को गुमटी, झोंपड़ी, खोमचा ठेला, कच्चे घर टाइप चीजें पलटने में मज़ा आता है। क्योंकि उसके आसपास रोते हुए लोग, अपनी चीज़ें बटोरते-बिलखते लोग किसी के मन की बात का विषय नहीं बन पाते। भावनाओं को नहीं झिंझोड़ पाते! बल्कि इस बर्बादी में सबको तसल्ली की और अपनी संकल्पना के साकार होने की मधुर धुन सुनाई देती है। राष्ट्र को और सुंदर, महान बनाने के लिए सब mango people अपने नंबर के लिए तैयार रहें, क्योंकि मरना, कुटना, कुचलना और फिर बुक्के फाड़कर रोना आप ही के भाग्य में लिखा है।
- प्रीति अज्ञात
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रविवार, 3 अप्रैल 2022

शराबबंदी: अब पाप के प्रायश्चित का समय आ चुका है!

बिहार के मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार जी ने हाल ही में शराबबंदी को लेकर एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा, ‘जो लोग बापू की भावनाओं को नहीं मानते, शराब का सेवन करते हैं उनको मैं हिंदुस्तानी ही नहीं मानता! ऐसा करने वाले काबिल तो हैं ही नहीं, वे महा-अयोग्य और महापापी हैं।’ उनके इन शब्दों को कुछ लोग बेहद हल्के में ले रहे हैं। इसकी खूब खिल्ली भी उड़ाई जा रही है। नीतीश कुमार के बयान पर आ रही प्रतिक्रिया को मैं हमारे समाज से जोड़कर समझना चाहती हूँ। जानना चाहती हूँ कि जो लोग इस बयान पर हँस रहे हैं उनकी मानसि‍कता कैसी है! वे शराबबंदी जैसे विषय पर सतही तर्क क्‍यों दे रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘शराब पीना महापाप है’ सुनकर हँसने वाले स्वयं ही नशे में हैं।

शराब यदि इतनी ही भारतीयता से भरी होती तो इसे पीने वाले छुपते नहीं! ये धड़ल्ले से बिकती भले ही हो लेकिन हमारे समाज में इसका सेवन सदैव ही गलत माना जाता रहा है। इसे छुपाकर लाया जाता है, छुपाकर ही रखा जाता है और पीने वाले भी यह सुनिश्चित करते हैं कि पीते समय पकड़े न जाएं! छुपकर अपराध होता है, समाज-सेवा नहीं! भारतीय परिवारों में इसको स्वीकार्यता नहीं प्राप्त हुई है और हो भी क्यों? शराब पीकर किसी का भला हुआ है क्या?

पीने वाले इसे क्यों पीते हैं? क्या इसके औषधीय गुणों के लिए? वह पेय जिसे ग्रहण करने के बाद आपका मन-मस्तिष्क अपना संतुलन खो बैठे, आत्मबल शून्य हो जाए, वह स्वास्थ्य की दृष्टि से तो कतई लाभदायक नहीं है। न ही इसके बाद कोई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। सब जानते हैं कि शराब के अत्यधिक सेवन से देह शिथिल हो जाती है और व्यक्ति अपने होश खो बैठता है। ऐसी स्थिति में वाहन चलाते हुए दुर्घटनाग्रस्त होने की या किसी को कुचल मार डालने की अनगिनत घटनाओं के हम साक्षी हैं। नशे की आड़ में तमाम अपराधों को अंजाम दिया जाता है। घरेलू हिंसा के अधिकांश किस्सों की जड़ में शराब की भी भूमिका रही है। शराबी का परिवार नकारात्मक माहौल में रहने को अभिशप्त रहता है तो इसे पीने वालों को महा-अयोग्य और महापापी क्यों न कहा जाए!

बापू की याद दिलाकर कौन सा पाप कर दिया, नीतीश जी ने? उनके कथन का उपहास उड़ाकर हम महान नहीं बन रहे बल्कि एक ऐसी वस्तु का समर्थन कर रहे हैं जिसने असंख्य जीवन नष्ट कर दिए। समाज का सिस्टम ऐसा है कि हर वस्तु का नकली और सस्ता संस्करण साथ ही तैयार कर लिया जाता है फिर भले ही उसके लिए किसी की जान से खिलवाड़ ही क्यों न करना पड़े! अवैध शराब का बनना और भारी मात्रा में बिकना इसी का उदाहरण है। उसके बाद लोग मरते हैं तो मरें, किसको फ़र्क़ पड़ता है! मरने वालों में ज्यादातर तो मजदूर वर्ग के होते हैं जो चंद रुपयों के लिए दिन भर खटते हैं। उस यातना को भुलाने के लिए जैसे मर ही जाना चाहते हैं, तभी पी लेते होंगे!

कुछ लोग अपनी कमी से मुँह चुराने के लिए नशा करते हैं। असफ़लता के बाद नशा करते हैं। प्रेम में दिल टूटने के बाद नशा करते हैं। ग़म भुलाने के लिए पिए जाते हैं! लेकिन दुख पीछा छोड़ता नहीं क्योंकि अब शराब की लत और जुड़ जाती है।

मनुष्य की सोच, उसकी समझ ही उसकी शक्ति है लेकिन शराब उसे क्षीण कर देती है। ऐसे में शराब नहीं पीने की बात, यदि किसी सरकार की तरफ से आई तो क्या गलत? आगाह ही तो कर रही आपको। इस वैधानिक चेतावनी को समझिए और इससे होने वाले गुण-दोषों की सूची बनाइए तो संभवतः कथ्य के मर्म तक पहुँच सकें!

हमें तो रोज इस नशाखोरी को कोसना चाहिए। रोज यह प्रार्थना करनी चाहिए कि प्रत्येक राज्य शराबमुक्त हो, नशामुक्त हो।  क्योंकि अभी तो चाहे गुजरात हो या बिहार, शराबबंदी होने से वहाँ नशा बंद नहीं हुआ है! पड़ोसी राज्य हैं न मदद को! उस पर एक संगठित तंत्र है जो आपकी सेवा को सदा तत्पर रहता है।

कई सरकारें ये दलील देती हैं कि शराब से उन्‍हें राजस्‍व प्राप्‍त होता है, जिससे वे समाज कल्‍याण के काम करते हैं। यह बेतुका तर्क है। इतना ही नहीं, किसी का जीवन बर्बाद करने की सामग्री को उपलब्ध कराकर, फिर उससे मुक्ति के केंद्र भी खुलवाए जाते हैं। उस पर आत्मसंतुष्टि का आलम  यह कि वैधानिक चेतावनी तो दे ही दी गई है!

एक स्वस्थ और संपन्न समाज, बापू का सपना था। अब बापू के इस देश को शराब के नशे से मुक्त रखने का प्रण होना चाहिए और यह क़दम केंद्र सरकार की तरफ़ से उठे, तब स्थिति बेहतर होगी। जब वस्तु, उपलब्ध ही नहीं होगी और न ही उसके विकल्प होंगे, तभी मुक्ति मिलेगी। नीतीश जी ने जो कहा, वह प्रशंसनीय है। लेकिन अब पाप के प्रायश्चित का समय आ चुका है। समय आ गया है कि पूरा देश इस पर एकमत हो। नागरिकों के अच्छे दिन लाने के लिए, नशाबंदी एक ठोस एवं आवश्यक क़दम होगा। देखना यह है कि ‘जहाँ पैसा ही भगवान है’, वहाँ वैधानिक चेतावनी देकर या ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फ़िल्में बनाकर ही देश आगे बढ़ता रहेगा या कि देशवासियों के खुशहाल जीवन और उत्तम स्वास्थ्य हेतु सचमुच परिवर्तन की कोई आस रखी जा सकती है!

- प्रीति अज्ञात

'हस्ताक्षर' अप्रैल 2022 अंक में प्रकाशित संपादकीय

https://hastaksher.com/nitish-kumar-i-just-dont-consider-them-indian-those-who-do-not-believe-in-bapus-feelings-and-consume-alcohol-editorial-by-preeti-agyaat/

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युद्ध जीतना है? मानवता को हरा दो!

 पाँच हजार कि.मी. दूर रूस-यूक्रेन में युद्ध चल रहा है और यहाँ भारत में एक परिवार की दुनिया उजड़ गई। खबर आई कि कर्नाटक के मूल निवासी नवीन शंकरप्‍पा, जो यूक्रेन के खारकीव शहर में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे, रूसी गोलाबारी की चपेट में आ गए। जब उन पर रूसी रॉकेट गिरा तब वे एक राशन की लाइन में खड़े थे। जी हाँ, वे अपने आटे-दाल का इंतजाम करने के लिए बंकर से बाहर निकले थे। एक मौलिक जरूरत पूरी करने की गरज से निकला वह युवा दुनिया की सबसे गैर-जरूरी चीज़ ‘युद्ध’ की वजह से दुनिया से चला जाता है।

खारकीव में दिवंगत हुआ नवीन भारतीय था, इसलिए हमारी संवेदनाएं इस सुदूर युद्ध के प्रति बढ़ गई हैं। जिसे कल तक हम तमाशबीन बने देख रहे थे, आज उस युद्ध के प्रति अचानक भावनाएं उमड़ने लगी हैं। लेकिन, क्‍या युद्ध की विभीषिका के प्रति हमारी प्रतिक्रिया उसके हम पर पड़ने वाले असर पर आधारित होनी चाहिए? यानी, हमारी सीमा पर युद्ध लड़ा जा रहा हो तो अलग बात रहेगी, और पाँच हजार किमी दूर है तो अलग? युद्ध पर हमारी सहज प्रतिक्रिया इतनी अशुद्ध क्‍यों है?

इस समय कीव में जो अफ़रातफ़री का आलम है, उसने जैसे अफगानिस्तान की सारी तस्वीरें सामने रख दी हैं। वही कहानी अब नए चेहरों के साथ दोहराई जा रही है। मनुष्यता की इससे बदतर तस्वीर और क्या होगी! लोग बदहवास हैं। रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची हुई है। हर कोई अपनी जान बचाने की जुगत में हैं। स्थानीय नागरिकों की एक-दूसरे से लिपट रोने की कितनी ही खबरें वीडियो बन सामने आ रहीं हैं। उन रोती-बिलखती आँखों में आशंका में डूबे अनगिनत स्याह प्रश्न हैं, भय है कि न जाने अब अपनों से कब मिल सकेंगे! जानें कभी मिलेंगे भी या नहीं! प्रश्न तमाम हैं लेकिन उनके उत्तर धमाकों की आवाज और बारूद के गुबार में कहीं खो चुके हैं।

क्या युद्ध के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता?

युद्ध, पहला विकल्प है या आखिरी? क्या इसका होना, सही सिद्ध किया जा सकता है कभी? दरअसल सबसे बड़ा पाप तो युद्ध में सही/ गलत ढूँढना या इसका  पक्ष/ विपक्ष तय करना ही है। हमे कैसे समझा दिया जाता है कि ये तो होना ही था! ये तो जरूरी ही था! समझ नहीं आता कि सारे रास्ते खुले होने के बाद भी महाशक्तियाँ लड़ने को इतनी उतावली क्यों रहती हैं?

मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसके पास न केवल सोचने-समझने की शक्ति है बल्कि अभिव्यक्ति के सारे माध्यम भी खुले हुए हैं। मनुष्य रूप में इस धरती पर आना ही ऐसा अकेला भाव और घटना है कि इस योनि में जन्म लेने का जश्न मनाया जाता है। उस वक़्त किसे पता होता है कि जन्म पर खुश होता ये मानव समाज एक दिन स्वयं ही मरने-मारने पर उतारू हो जाएगा।

आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियाँ हैं जो किसी को युद्ध की दहलीज पर लाकर खड़ा कर देती हैं? बुद्धि से भरपूर होते हुए भी मानव प्रजाति के सारे संवाद इतने कमजोर क्यों पड़ जाते हैं कि तलवारें खिंच जाए, खून बहने लगे पर अकड़ बरकरार रहे। प्रभुत्व या सत्ता की लड़ाई की कीमत क्या है और इसने हमें कहाँ ला छोड़ा है! आक्रमण और अतिक्रमण का परिणाम क्या है? जबकि सब जानते हैं कि युद्ध को शुरू करना तो आसान है पर खत्म करना नहीं।

क्या सच में कोई विजयी होता है?

महाभारत के समय से हमने भी इसे महिमामण्डित कर रखा है। लेकिन क्या कभी इस तथ्य पर विचार किया कि सारे कौरवों के मरने के बाद पांडवों ने कहाँ राज किया होगा? क्या उन्हें सुख मिला होगा? राम सीता को ले आए पर उस लंका का क्या हुआ?

क्या एक की हैप्पी एंडिंग दूसरे का दुख नहीं? क्या बिना किसी को खलनायक बनाए जीता नहीं जा सकता? क्या यह संभव नहीं कि इस प्रक्रिया में एक कुशल संवाद स्थापित किया जाए!

दो देशों की लड़ाई में हम देश को रेखांकित कर सकते हैं। सैनिकों और आम नागरिकों की लाशे, तबाही के मंज़र का हिसाब लगाकर ‘कौन जीता कौन हारा’ भी तय किया जा सकता है। परंतु क्या सच में कोई जीतता है? जीतने वाले की ये कैसी जीत है जो किसी को मारकर मिली!

यूक्रेन और रूस की लड़ाई का जो परिणाम हो सो हो पर जो निर्दोष लड़का मारा गया, उसका परिवार तो उसी वक़्त अपने जीवन का हर युद्ध हार गया। हम हार गए।

क्या हम सबसे दुर्भाग्यशाली पीढ़ी के नागरिक हैं?

मनुष्य जन्म लेने का यदि यही परिणाम है तो जानवर हमसे कहीं बेहतर हैं। हमने अब तक महामारी और युद्ध किताबों में ही पढ़े थे। पर बीते दो वर्षों में कोरोना महामारी के आगे घुटने टेकते बेबस दुनिया को देखा है। लाशों के अंबार को देखा है। और एक पल को लगा कि शायद अब हम कुछ बेहतर इंसान बन सकेंगे, इससे कुछ तो सीख लेंगे। हमने अफगानिस्तान में मची तबाही भी देखी है। वहाँ हमको सर्वनाश होते हुए दिखाई दिया, पर हमने होने दिया। मतलबी दुनिया तब भी चुप रही। क्या ऐसा नहीं लगता कि हम मानव, दूसरे की लड़ाई में मजे लेने वाली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हम पड़ोस की लड़ाई में खिड़कियाँ खोल झांक तो लेते हैं पर मदद की गुहार अनसुनी कर यही खिड़की झट से बंद करने से भी नहीं चूकते!

रूस-यूक्रेन का युद्ध नहीं रुक रहा है, इसलिए हिम्‍मत नहीं हो रही है इस संपादकीय में पूर्ण विराम लगाने की। मन डर रहा है, उस पूर्ण विराम के बाद की आशंकाओं को लेकर। युद्ध में रत लोगों की खून की प्‍यास बुझी नहीं है। ईश्‍वर सबको सद्बुद्धि दे। विनाशलीला का यह तांडव अब थम जाए। किसी का लहू न बहे क्योंकि सब बेगुनाह जन्मे हैं।

हमें तय करना होगा कि या तो सत्य, अहिंसा, प्यार, विश्व बंधुत्व की बातें धोखा हैं या फिर युद्ध करना कर्म नहीं, कुकर्म है। हम एक हाथ में बम लेकर दूसरे से कबूतर नहीं उड़ा सकते। यह विशुद्ध अशुद्ध है, पाप है। युद्ध का तमाशा देखना, मानवता की सबसे क्रूर विकृति है। यदि मनुष्य होने का हासिल यही है तो फिर पाया ही क्या है हमने?

- प्रीति अज्ञात

'हस्ताक्षर' मार्च 2022 अंक में प्रकाशित संपादकीय -

https://hastaksher.com/russia-ukraine-war-once-again-humanity-is-defeated-editorial-by-preeti-agyaat/

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चुनाव ही ज़िंदगी है, है न?

सुबह अलार्म बज गया है, आँखें खोलें या थोड़ी देर और सो लें? चाय-बिस्कुट सामने है, पहले एक चुस्की ले लें या बिस्कुट कुतर लें? अखबार का पहला पन्ना खोल, पहले हेडलाइन देख लें या फोटो निहार लें?… असंख्य चुनावों को रोज जीते हैं हम। इन्हीं पर खुश होते, इन्‍हीं पर पछताते हैं हम। कभी चुनाव को लपकते, और कभी चुनाव से कतराते हम। अपने चुनावों पर आँखें फाड़े विचार करते, और उन्हीं को नज़रअंदाज़ करते हम। चुनाव ज़िंदगी है, उसको जीने का सलीक़ा सीखते हम।

होता है, न! जब रात की नीम बेहोशी के बाद सुबह आँख खुलती है और एक नया सवेरा दस्तक़ देता है। उसी दौरान हम सहज भाव से बिस्तर पर पड़े हुए ही अपने लिए यह चुनाव कर लेते हैं कि आज क्या-क्या करना है। यदि हमारी योजना सही है तो उस दिन को एक सुंदर दिन बनने से कोई नहीं रोक सकता! तात्पर्य यह कि चयन हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। सब्जी-भाजी से लेकर, कपड़े-लत्ते तक, हम अपनी सुविधानुसार प्रतिदिन कुछ न कुछ चुनते आए ही हैं। रेस्टोरेंट में क्या खाना है, उस पर भी गंभीरता से सोच विचार करते हैं लेकिन कुछ चुनाव ऐसे हैं जो हमारा जीवन बदल सकते हैं। उन्हें हम कपड़ों के रंग की तरह नहीं चुन सकते हैं।

‘चयन’ की यही महत्ता है। सही चयन ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करता है।

उत्तम शिक्षा का चुनाव इन्हीं में से एक है। सही शिक्षा, हमें भाषायी सभ्यता की ओर ले जाती है। हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है। प्रतिकूल परिस्थिति में भी यह हमें अभद्रता, अशिष्टता से मीलों दूर रखती है। हमारे भविष्य के निर्माण की महत्वपूर्ण सीढ़ी, यह शिक्षा ही है। हमें हमारे बच्चों के लिए महंगे विद्यालयों से अधिक फोकस इस तथ्य पर करना चाहिए कि उन विद्यालयों, महाविद्यालयों का वातावरण कैसा है। यह तो जानी हुई बात है कि परिवार के साथ-साथ एक अच्छा शिक्षक ही हमारे व्यक्तित्व निर्माण को प्रभावित करता है। हम आज जो कहते, करते या सोचते हैं,  हमारे ये संस्कार कोई आज अचानक हुई बात नहीं है। इसके बीज तो हमारे विद्यालय के प्रथम दिन से ही पड़ने प्रारंभ हो गए थे।

हमारे मित्र कैसे हों? इस बारे में सोचना भी अत्यंत आवश्यक है क्योंकि हमारे जीवन का रंगहीन या रंगीन बनना उनके चयन पर निर्भर करता है। बच्चे के बुरे व्यवहार को ढकते हुए कितनी सरलता से आक्षेप मढ़ दिया जाता है कि सब इसके दोस्तों की ‘संगत का असर’ है। ऐसा कहकर माता-पिता ने स्वयं को तो दोषमुक्त कर लिया, पर उस बच्चे का क्या! क्या हमने उसे अच्छे मित्र की पहचान का पाठ कभी पढ़ाया? हमने कभी कहा कि बेटा, जो गरीबी और दुख में भी तुम्हारे साथ अडिग खड़ा है, वही तुम्हारा सच्चा मित्र है। जो तुम्हारी गलतियों पर दुनिया के सामने प्रश्नचिह्न नहीं लगाता बल्कि तुम्हें प्यार से समझाता है और सुधारने के लिए प्रेरित भी करता है, वही सही मायनों में तुम्हारा अपना है। बात बच्चों तक ही सीमित नहीं है। उम्र के किसी भी मोड़ पर हम खड़े हों, स्वार्थी एवं नकारात्मक दोस्तों से एक निश्चित दूरी बनानी ही होगी।

कहते हैं ‘प्रेम अंधा होता है’, यह कहकर नहीं होता। मैं भी मानती हूँ कि कब कोई अचानक ही अच्छा लगने लगता है और हम दिल के हाथों विवश हो जाते हैं। प्रेम पर सचमुच किसी का बस नहीं! लेकिन प्रेम में भी संभलकर चलना बहुत जरूरी है। प्रेम डगर आसान कतई नहीं होती। इसलिए जीवनसाथी के चुनाव में जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए। धड़कते दिल के साथ, दिमाग की सारी बत्तियाँ भी जलती रहें।  प्रेम के पलों से हसीन कुछ नहीं होता लेकिन जीवन अलग ही शर्तों पर चला करता है। यहाँ निराशा, हताशा और अवसाद के पल भी हैं। क्या उन पलों में आप अपने साथी के सिर पर कांधा रख रो सकते हैं या उन्हें झटक दिया जाएगा? आपकी सफ़लता में आपका साथी उतना ही प्रसन्न होता है, जितने आप हो या कि उसकी मुस्कान खोखली है? उसे आप पर विश्वास है या कि छोटी-छोटी बातों पर भी उसके मन में संदेह घर कर लेता है? इन प्रश्नों के उत्तर ही हमारे जीवन को संवार या बिगाड़ सकते हैं। इसलिए सही साथी का चयन, हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वैसे तो मैं प्रेम विवाह के पक्ष में हूँ पर यदि माता-पिता तय करते हैं तो उनको भी लड़के/लड़की के परिवार, नौकरी, मासिक आय के साथ-साथ संबंधित पक्ष का सामाजिक व्यवहार भी समझ लेना चाहिए। उनके सही चुनाव पर उनके बच्चों का भविष्य टिका है।

कई बार रिश्ते इतने कड़वे हो जाते हैं कि जीना दूभर लगने लगता है। कभी यूँ भी महसूस होता है कि ‘इस दुनिया में हमारा कोई नहीं!’ या कि ‘हमारे जाने से किसी को कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला!’ इसका कारण कुछ भी हो सकता है, व्यक्ति की बेरोज़गारी, नौकरी का छूटना, परिवार या मित्रों से तनाव, कर्ज़, अपने साथ हूए यौन अपराध की पीड़ा, घुटन, विवशता! दुखों की एक ऐसी लंबी सूची हम सबके पास है जो हमें जब चाहे कुंठा, अवसाद और घोर निराशा के भंवर में फेंक सकती है। उस दुख से उबरने का सबसे पहला तरीक़ा यही नज़र आता है कि ‘मर जाएँ!’ लेकिन ठहरकर सोचिए कि जब हमने इस जीवन में पहला क़दम रखा था तब कितने निर्दोष मन के और प्रसन्न रहे होंगे हम। लेकिन जबसे हमने अपेक्षाओं का चयन किया, दुख घेरता चला गया। यह जीवन किसी भी पीड़ा या दुख से ऊपर की चीज़ है और इसकी सार्थकता इसी में है कि इसे पूरे हर्षोल्लास के साथ जिया जाए। दुख को मात देकर जिया जाए। हमारी खुशी का चयन, हमारे हाथ में है। जीवन और मृत्यु में से हमें सदैव जीवन को ही चुनना होगा। हमारे ‘जन्म’ को हमने नहीं चुना तो मृत्यु को चुनने का कोई अधिकार हमें नहीं है। हम खुलकर जिएं, जमकर जिएं।

हम अपने ही नहीं, दूसरे के वजूद को भी उतनी ही अहमियत दें। अभी कुछ दिनों पहले ही एक महिला की आत्महत्या की खबर सामने आई। कारण ‘पोस्ट प्रेगनेंसी डिप्रेशन’ बताया गया, जिससे हर महिला जूझती है। उसने बच्चे को जन्म दिया,  फिर उसको सार्थक बनाने का चुनाव बाकी लोगों के लिए क्या इतना कठिन था कि उसने अकेला, असहाय महसूस किया? क्या ये निर्विवाद रूप से नहीं होना चाहिए कि उसने अपना सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य निभाया तो आसपास का समाज उसे सही साबित करने या औचित्य देने का चुनाव क्यों नहीं कर पाता! क्या वाकई विकल्प नहीं होते? ये ‘तेरा काम तू जाने’ की मानसिकता ने हमें किस मोड़ पर ला छोड़ा है!

क्या ऐसा नहीं लगता कि हमें हमारे जीवन मूल्यों के चुनाव पर डटे रहना चाहिए? हमारे नैतिक और सामाजिक मूल्यों के चयन का उत्तरदायित्व हमारा है? हमारी खुशी, हमारे परिवार, समाज और इस देश की खुशी की नींव ही हमारे उत्तम चयन पर निर्धारित है।

हम कई बार निर्णयों को लेकर असमंजस में रहते हैं। प्रायः बाद में समझ आता है कि “तब ये कहना चाहिए था, वो कहना चाहिए था।” लेकिन वे कौन लोग हैं जिन्होंने सही समय पर सही चुनाव किया और सफ़लता की नई परिभाषा गढ़ी। हमें उन लोगों के बारे में जानना, पढ़ना होगा, उनसे सीख लेनी होगी।

अब तक मैंने राजनीतिक चुनाव की बात नहीं की है। थोड़ा बचती हूँ क्‍योंकि एक यही चुनाव तो है, जिसके बारे में हर तरफ से 24 घंटे ज्ञान दिया जाता है। लेकिन, इस महीने चूँकि 5 राज्‍यों में विधानसभा चुनाव होने हैं तो मैं भी अपने ज्ञान की एक आहुति चुनावी चकल्‍लस वाले हवन में डालना चाहती हूँ। ये बिल्‍कुल नहीं कहूँगी कि आप किसे वोट दें, और किसे नहीं। प्रभावित भी नहीं करूँगी, क्‍योंकि इसका ठेका भी बहुतों ने ले रखा है। हाँ, अपने स्‍वभाव के मुताबिक इतना जरूर कहूँगी कि बाकी चुनावों की तरह ये चुनाव भी पूर्वाग्रह और नकारात्‍मकताओं से दूर रहकर हों। अकसर पूर्वाग्रह और नकारात्‍मक विचार हमें कल्‍याण और सकारात्‍मकता से परे कर देते हैं। ‘हमारे सपनों का भारत’ बनाने के सफर में महत्‍वपूर्ण कदम है मतदान, लेकिन यह नितांत आवश्यक है कि यह कदम उठाने से पहले उत्तम चयन के समस्त अध्याय हमें कंठस्थ हों।

- प्रीति अज्ञात 

'हस्ताक्षर' फरवरी 2022 अंक में प्रकाशित संपादकीय 

https://hastaksher.com/why-the-exercise-of-selection-is-necessary-choice-is-life-isnt-it-editorial-by-preeti-agyaat/

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मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022

ये कैसा विरोधाभास? हम प्रेम करते हैं, और विरोध भी!

हम भारतीयों ने प्रेम को सदा ही पवित्र माना है। समय-समय पर पौराणिक चरित्रों की दुहाई देते हुए भी नहीं अघाते। क्यों न हो, यह ईश्वरीय भाव ही तो है। तभी तो हर शय से ऊपर रखा है हमने प्रेम को। किस्से-कहानियों में सबसे ऊँचा दर्ज़ा दिया है। लेकिन फिर ऐसा क्यों होता है कि जब प्रेम पुष्प अपने ही घर-परिवार में पल्लवित होते दिखते हैं तो अनायास ही सारी समझदारी विलुप्त हो जाती है! प्रतिष्ठा पर भीषण भय के बादल मंडराने लगते हैं! नाक की चिंता सताती है! 'लोग क्या कहेंगे' की आड़ में अपने मन की बात कही जाने लगती है। माता-पिता की ज़िद के आगे कई बार बच्चे झुक जाते हैं, कई बार जान दे देते हैं। जबकि ये दोनों ही निर्णय किसी भी परिस्थिति में सही नहीं ठहराए जा सकते। आखिर ये कौन लोग हैं, प्रेम के नाम पर जिनकी भृकुटी तन जाती है? ये प्रेम को इतना निकृष्ट क्यों मानते हैं? प्रेम को स्वीकारने में आपत्तिजनक क्या है?
हाँ, जहाँ देह का सुख, मन से ऊपर हो, वह छलावा है। मात्र आकर्षण भर होना प्रेम नहीं होता, क्योंकि यह तो परिस्थितिजन्य और अस्थायी भाव होता है। पानी के बुलबुले की मानिंद। जबकि प्रेम दैहिक नहीं, दैवीय घटना है। सोचिए, करोड़ों मनुष्यों से भरी इस दुनिया में एक ऐसा साथी जो हमारा मन पढ़ ले, उसे पाना कितनी अद्भुत बात है। फिर चाहे वह जीवन के किसी भी पड़ाव पर हो। मन से मन का जुड़ाव और जब इसकी अनुभूति होती है, तो हर रिश्ता प्यारा लगने लगता है। किसी से कोई शिकायत नहीं रह जाती। इस स्वार्थी समाज में यदि कोई ऐसा चेहरा हो जो हमारा समर्पण समझ सके, हम पर समर्पित हो सके तो वह अपना सा क्यों न लगे? उससे प्यार क्यों न हो? उसके लिए जमीन-आसमान एक क्यों न कर दिए जाएं? उसकी धड़कनों की ताल पर हमारी साँसें क्यों न चलें? हमारा ऐसा शिरोधार्य रिश्ता, समाज की नज़रों में पाप या अश्लील क्यों हो?
प्रेम के रिश्ते को प्रायः सामाजिक मर्यादा की कसौटी पर कसा जाता है। दबाव यह रहता है कि पहले रिश्ते का अनुमोदन लिया जाए, उसके बाद ही प्रेम की अनुमति होगी! यह क्यों नहीं मान लिया जाता कि प्रेम यदि कोई पौधा है तो वह स्वच्छंद आकाश के नीचे ही फलता-फूलता है। दो प्रेमी यदि परस्पर सुख से रह रहे हैं तो इसमें सामाजिक सद्भाव बढ़ेगा ही, मर्यादाएं कैसे टूटेंगी? इस बात को समझने के लिए समाज को अपनी एक विकृत ग्रन्थि से बाहर आना पड़ेगा! ये जो हम दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में तांकझाँक कर अपने लिए चटकारे जुटाने के आदी हो गए हैं, यह शर्मनाक है। क्या हमने कभी विचार किया कि 'पुलिस ने प्रेमी जोड़े को धर दबोचा!', 'विवाह मंडप से दस मिनट पहले लड़की प्रेमी के साथ फ़रार!', 'नौकरी पर चला बॉस से चक्कर', 'पड़ोसिन पर डाले डोरे!'... कितनी सरलता से कहा और लिखा जाने लगा है। फिल्मी कलाकारों के निजी जीवन पर प्रतिक्रिया करने का स्तर तो और भी रसातल तक जा पहुँचा है। क्या ऐसा नहीं लगता कि 'चक्कर चल रहा', 'लफड़ा', 'टांका भिड़ा है' जैसे विश्लेषणों से हमने सृष्टि के सबसे खूबसूरत भाव को अत्यधिक घिनौना और निकृष्ट मान लिया है?

ऐसी खबरें पढ़कर मुँह पर हाथ रख 'हाय, राम' कहने वालों का मानस समझिए। वे उसी ग्रंथि के शिकार हैं जिसका मैंने अभी-अभी जिक्र किया। हम होते कौन हैं, किसी के रिश्ते पर जज बनने वाले और उस पर टीका-टिप्पणी करने वाले! सबको अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार है। बिना किसी की इजाज़त लिए। समाज की जिम्मेदारी स्पष्ट है, उसे प्रेमियों के रिश्तों को सेलिब्रेट करना ही होगा और प्रेम को आदर के भाव से देखना ही होगा। हम मनुष्य प्रेम करते हैं और हम मनुष्य ही समाज के रूप में उसका विरोध करते हैं। यह विरोधाभास क्यों?
प्रेम की जब भी बात हो, तब क्या इस भाव को थोड़ी मानवीय संवेदना, मृदुता और सरलता के साथ समझा और स्वीकारा नहीं जा सकता?
- प्रीति अज्ञात 
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मंगलवार, 11 जनवरी 2022

मधुबन खुशबू देता है

गीत-संगीत की दुनिया इतनी विशाल और सुंदर है कि इसके बिना जीवन अधूरा ही लगता है। कई बार मैं सोचती हूँ कि हम सबको, इस देश के समस्त गीतकारों, गायकों और संगीतकारों का ऋणी होना चाहिए क्योंकि उन्होंने इस नीरस जीवन में जो रंग भरे हैं वह और किसी के बस की बात नहीं! जैसे पुस्तक हमारी सच्ची मित्र है, वही भूमिका संगीत की भी है। जहाँ संगीत की धुन है, वहाँ उस पर थिरकता एक हृदय भी अवश्य होता है। यह हमारा ऐसा साथी है जिसकी उपस्थिति से एक उदास मन भी खिल उठता है। कई बार हमें उदासी के सागर में डूबे रहना अच्छा लगता है तो उस समय यह भी हमारे कंधे पर सिर रख हमारे साथ हमारा दुख जीता है, तसल्ली देता है।

अब कोई यह पूछे कि कौन सा गायक या गायिका सबसे प्रिय है तो मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं! संभवतः आपके पास भी नहीं होगा! इस मामले में हम लोग बहुत समृद्ध हैं और जब पूरा समंदर ही मोतियों से भरा हो, तो किसी एक को चुन पाना बस की बात रही ही कहाँ!
आज मैं यसुदास जी की बात करना चाहूँगी। जिनके गाए एक गीत ने मुझे सदैव ही प्रेरित किया है। आज भी करता है। 'मधुबन खुशबू देता है', यह एक ऐसा गीत है जिसे मैं दिन-रात लगातार सुन सकती हूँ। जितने खूबसूरत इसके बोल हैं, उतने ही शानदार संगीत से इसे सजाया गया है। अमित खन्ना के लिखे और उषा खन्ना जी द्वारा संगीतबद्ध किए गए इस गीत में यदि किसी ने जान फूंकी है तो वे हैं यसुदास जी। इसका एक-एक शब्द मोतियों की तरह लिखा गया है और उसे कोहिनूर बना दिया है उनकी मधुर आवाज़ ने। यह कोई सामान्य आवाज़ नहीं, रूह तक पहुँचने वाली पवित्र ध्वनि है।
'सूरज न बन पाए तो, बनके दीपक जलता चल /फूल मिलें या अँगारे, सच की राहों पे चलता चल'
ये शब्द भर रह जाते लेकिन यसुदास जी ने इनमें ऐसा जादू भर दिया है कि आप उम्र भर के लिए इन्हें अपना प्रेरणास्त्रोत मान बैठते हैं। 'दिल वो दिल है जो औरों को, अपनी धड़कन देता है /जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है' अहा! यह कोई उपदेश नहीं लगता, बल्कि ऐसा बनने के लिए हृदय स्वयं आह्वान कर बैठता है। यह एक ऐसा गीत है कि जिसने भी इसे सुना, वह इसका दीवाना हो गया। यसुदास जी के गाए अन्य गीतों को याद करें तो ये दीवानगी बढ़ती ही चली जाती है।
उनके गीतों, व्यक्तित्व और पुरस्कारों से जुड़ी बहुत सारी बातें हैं कहने को। 10 जनवरी उनके जन्मदिवस पर, उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए, उनके पंद्रह गानों की सूची भी साथ रख रही हूँ जो मुझे बहुत पसंद हैं। शायद आपको भी अच्छे लगते हों! याद कीजिए, इन गीतों को -
चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा
सुरमई अंखियों में
सावन को आने दो
जब दीप जले आना
गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
आज से पहले आज से ज्यादा
कहाँ से आए बदरा
माना हो तुम बेहद हंसीं
खुशियाँ ही खुशियाँ हो दामन में जिसके
सुन-सुन गाँव की गोरी
तू जो मेरे सुर में
मोहब्बत बड़े काम की
जानेमन जानेमन
का करूँ सजनी
दिल के टुकड़े टुकड़े कर के

शनिवार, 8 जनवरी 2022

जावेद, जो अब हबीब नहीं लगते!

एक समय था जब हम केश कर्तनालय या सीधे-सीधे कहें तो नाई की दुकान का नाम सुनते ही नाक-मुँह सिकोड़ दिया करते। बच्चों को तो पकड़-पकड़ जबरन वहाँ ले जाते हुए मैंने स्वयं देखा है। बच्चा भी हाथ पैर पटकते हुए ऐसी चीखें निकालता, मानो बिना anesthesia के उसकी शल्य चिकित्सा हो रही। भई, नाई और उसके उस्तरे का खौफ़ ही ऐसा था। वो बात अलग है कि कटिंग के अंतिम चरण में जब मुलायम वाले ब्रश में पॉन्ड्स पाउडर भरकर गर्दन पर फिराया जाता, तो इसी बच्चे की खी खी करते हुए बत्तीसी चमकती। गुदगुदी होती थी न!

सब कुछ होता पर 'बाल कटाने जाना है', यह कोई कहने वाली बात नहीं होती थी। लेकिन समय बदला और यहाँ जाना भी बड़ा ईवेंटफुल हो गया। बाकायदा अपॉइंटमेंट लिए जाने लगे और यह एक महत्वपूर्ण और सम्मानजनक व्यवसाय बन गया। 

इस परिवर्तन में जिस व्यक्ति का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता रहा, वह हैं जावेद हबीब।  जी, हाँ! यह हेयर कटिंग करने वाले व्यक्ति को हेयर स्टाइलिस्ट का भद्र नाम देने वाले शख्स का ही नाम है। उनके आने के बाद इस पेशे को बहुत अधिक सम्मान के साथ देखा जाने लगा। अब सैलून खोलना, संकोच का काम नहीं रहा था। इसमें कलात्मकता आ गई थी। देखा जाए तो जैसे भारतीय महिलाओं को अपनी त्वचा की देखभाल या सौन्दर्य के प्रति जागरूक करने की क्रांतिकारी शुरुआत शहनाज़ हुसैन ने की, ठीक वैसा ही बदलाव यह भी रहा। 

आज देश में जावेद हबीब के 300 से अधिक सैलून और कई एकेडमी हैं, जहाँ हेयर डिजाइनिंग/ हेयर स्टाइलिंग में सर्टिफिकेट या डिप्लोमा कोर्स कराया जाता है। कुल मिलाकर यह नाम एक ब्रांड बन चुका है, जिसके समकक्ष अभी कोई नहीं है। कहते हैं उन्होंने दिन-रात एक कर अपने पिता के इस व्यवसाय को प्रतिष्ठा दिलवाई थी। पर अब उसे गंवा चुके हैं। 

कुछ दिन पहले एक workshop में जावेद हबीब एक महिला के बाल पर यह कहते हुए थूक रहे थे कि ‘जब पानी की कमी हो तो ऐसे काम चलाया जा सकता है।' जिस बात को सुनकर भी घिन आ जाए, तो जिस पर बीती हो उसे कितना गंदा लगा होगा! ज़ाहिर है इसके विरोध में उस महिला ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उसके बाद इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर भी जारी हुआ,जहाँ जावेद हबीब की इस घटिया हरकत की जमकर लानत-मलानत हुई। 

अब जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया तो अपने इस कृत्य पर माफ़ी मांगते हुए उन्होंने कहा कि 'लंबे शो होते हैं तो हमें उसको थोड़ा ह्यूमरस बनाना पड़ता है। एक ही बात बोलता हूँ, दिल से बोलता हूँ। अगर आपको सच्ची में ठेस पहुंची है, हर्ट हुए हैं तो दिल से माफ़ी माँगता हूँ। माफ करो न।'

अब आप भी मेरी तरह माथा पकड़ ये सोच रहे होंगे कि क्या किसी के ऊपर थूकने से humour पैदा हो सकता है? नहीं, न! लेकिन इस कार्यक्रम में ऐसा हुआ। जब जावेद हबीब ने थूकते हुए पानी की कमी वाली बात बोली तो वहाँ उपस्थित महिलाएं न केवल हँसीं बल्कि उन्होंने जमकर तालियाँ भी बजाईं। इससे हबीब का हौसला और बढ़ा, उन्होंने चहकते हुए आगे कह डाला, 'इस थूक में जान है।' हास्य का इससे घृणित रूप और क्या होगा! 

और जिस तरह से उन्होंने माफी माँगी है, उससे भी साफ़ ज़ाहिर हो रहा कि उसमें अफ़सोस का रत्ती भर भाव नहीं है बल्कि यह ज्यादा दिख रहा कि 'अरे!,ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई! हँसाने के लिए थूक ही तो दिया था।'

महिला के साथ तो बहुत गलत हुआ ही। पर इस 'humour' के मद्देनज़र जावेद हबीब ने अपनी ही साख पर खुद तगड़ा वाला बट्टा भी फेर दिया है। 

ऊंचाई पर चढ़ने में चाहे कितना वक़्त लगे पर आपकी एक गलती आपको वहाँ से पल भर में ज़मीन पर ला पटक देती है। इंसान चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, यदि उसके व्यवहार में विनम्रता नहीं, दूसरों के प्रति सम्मान नहीं तो वह बेहद छोटा महसूस होता है जैसा कि इन दिनों जावेद हबीब लग रहे हैं। उनकी एक ओछी हरकत, उनके नाम को ले डूबी है!

- प्रीति अज्ञात 

#JavedHabib  #Jawed Habib #hairstylist #disgusting_act 

#नाचूँगाऐसे के घटिया बोल

आज एक नया वीडियो देखने को मिला। जिसके 'गीत' का एक 'अंतरा' मुझे बेहद आपत्तिजनक लगा।

"जैसे मुझे कोई चाबी मिल गयी
किसी वाइन स्टोर की
या यूज़ की गयी बंदी
मुझे खुद ही छोड़ गयी"
'यूज़' की गयी बंदी! ये किस तरह की सोच है? क्या आशय निकलता है, इससे? यही न कि 'बंदी तो यूज़ करने को ही होती है! अच्छा हुआ, खुद ही छोड़ गई!' बात इतना कहने पर ही नहीं रुकी, उसके बाद एक अश्लील हँसी भी है जिसे सुनकर दिमाग और भी खराब हो जाता है।
मैं मानती हूँ कि यह नए ज़माने का वो म्यूजिक है जिसका भाषा से कोई लेना देना नहीं होता! सबको मस्ती में थिरकने से ही मतलब है और सब कुछ बीट्स पर ही चलता है। यह भी ठीक कि यहाँ कोई ज्ञान लेने तो आता नहीं! न ही इनसे संस्कार की पाठशाला बनने की कोई उम्मीद है। लेकिन इस विकृत सोच को कहीं तो लगाम लगे! कितनी आसानी से लड़कियों के लिए Use & Throw का पाठ पढ़ा दिया गया है।
T- सीरीज़ द्वारा 24 दिसंबर, 2020 को रिलीज़, कार्तिक आर्यन के animated version पर फिल्माया गया यह वीडियो काफ़ी पॉपुलर हुआ है और इसके कई मिलियन व्यूज़ हो चुके हैं। शत प्रतिशत कैची नंबर है और सुनने वाले उसी बहाव में बहते नज़र आ रहे हैं। मैं वीडियो के कमेंट बॉक्स में देख रही थी कि किसी ने तो ये बात नोटिस की हो लेकिन वहाँ तो सब इसे खुद से जोड़ते हुए ऐसे खुश हो रहे थे कि जैसे इससे बेहतर कालजयी गीत अब तक रचा ही न गया!
कार्तिक आर्यन अच्छे कलाकार हैं। उनकी अपनी एक बड़ी फैन फॉलोइंग है। इस लिहाज़ से यह उनकी और T- सीरीज़ की जिम्मेदारी बनती थी कि 'महान गीतकार' से इसके बोल ठीक करवा लेते।
मैं यह भी मानती हूँ कि लड़कियों को एक वस्तु की तरह मानना कोई आज की बात नहीं, सदियों से यह चला आ रहा है। फ़र्क़ इतना है कि आज का युवा बेशर्मी के साथ, बिना हिचकिचाहट उसे एडमिट कर रहा है। लेकिन इस बात के लिए उनकी पीठ नहीं ठोकी जा सकती और न ही प्रसन्न हुआ जा सकता है। दुख इस बात का भी है कि बिना बोल सुने, समझे लड़कियाँ खुद इस पर नाच रहीं हैं।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

घटिया नेता, घटिया सोच

दृश्य: एक व्यक्ति कहता है "एक कहावत है कि यदि आप रेप रोक नहीं सकते हैं तो लेटो और मजे लो!" यह सुनकर सामने कुर्सी पर बैठा तथाकथित सम्माननीय व्यक्ति ठहाका लगाने लगता है और फिर उसका साथ देने को इस हँसी में अनगिनत भद्दी आवाजें शामिल हो जाती हैं।

यह किसी C- ग्रेड फ़िल्म की पटकथा नहीं बल्कि कर्नाटक विधानसभा से प्रसारित निर्लज्जता की जीती जागती तस्वीर है। इन आदमियों और बलात्कारियों के बीच में कितना अंतर है, यह आप तय कीजिए! मैं इतना ही कहूँगी कि जानवरों का चेहरा इनसे बेहद खूबसूरत है।
हाँ, हम स्त्रियाँ चाहें तो फिर एक बार इस अश्लील हँसी पर शर्मिंदा हो सकते हैं जो गाहे-बगाहे हमारे कानों में अक्सर पड़ती ही रहती है।
हमने इस बात पर हैरान होना तो अब छोड़ ही दिया है कि जिस देश में हर रोज बलात्कार होते हैं वहाँ तमाम कानूनों के बाद भी बलात्कारियों को सजा क्योँ नहीं होती! फाँसी तो बहुत दूर की बात है। नेताओं को तो इन खबरों से ही फ़र्क़ नहीं पड़ता! और पड़े भी क्यों? सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे जो हैं!
क्या हम भूल गए कि अपराधी नेता अकड़ के साथ कैसे मुस्कुराते घूमते हैं! ये बलात्कार करने के बाद, उस लड़की के पूरे परिवार को खत्म करने से नहीं हिचकते। कभी लड़कों से हुई गलती का नाम देकर बात को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करते हैं तो कभी उसके छोटे कपड़ों को दिखा उसके चरित्र पर ही उंगली उठा देते हैं। महिला नेताओं के चरित्र को लेकर, तथाकथित स्वामियों के विचार भी हाल ही में वायरल हुए थे। याद पड़ता है क्या, कि किसी मामले में इन नेताओं का कुछ बिगड़ा हो?
क्यों बिगड़ेगा भला! जब लगभग सभी की सोच इतनी ही छिछली और बजबजाती हुई हो! इस तरह की सारी घटनाएं, सभी दलों के लिए एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सुनहरा मौका हैं। उससे अधिक और कुछ भी नहीं! कांग्रेस नेता ने बोल दिया तो बीजेपी को मजे आ गए, बीजेपी ने बोल दिया तो कांग्रेसी खेमे में खुशी की लहर दौड़ने लगती है। सजा की मांग, हमेशा सामने वाले के लिए ही की जाती है और अपने वाले पक्ष को बचाने की कोशिशें! यही राजनीति का चरित्र है जिसमें हम सबको पिसते रहना है।
स्त्रियों के प्रति अपमानजनक वक्तव्य यूँ ही बोलते जाते रहेंगे क्योंकि जिन्हें हमने चुना है उनका स्तर ही यही है। उन्हें न तो किसी के सम्मान से वास्ता है और न ही किसी प्रकार का संवेदनशील भाव ही उनके मन में कभी उपजता है। स्त्री को उसका अधिकार दिलाने वाले, सम्मान की बात करने वाले, बेटी-बहन को पूजने की सोच दिखाने वाले सब ढोंगी हैं। जरा सी भी हिम्मत हो तो सब बलात्कारियों को फांसी देकर दिखाएं!
यह भी प्रश्न है कि जो भरी सभा में स्त्रियों के प्रति इतनी भद्दी, निर्लज्ज सोच दिखाते हैं वे अपने आसपास या कार्यालय की स्त्रियों को किन नज़रों से देखते होंगे, कहने की जरूरत नहीं! लेकिन इनके आसपास के लोगों और समाज को अब इनसे ही सावधान रहने की जरूरत अवश्य है!
क्यों न इन सब हँसने वालों के हाथ-पैर बाँधकर इन्हें सड़कों पे घसीटा जाए कि "आप कुछ कर नहीं सकते हो न! इसलिए एन्जॉय करो!"
जिस दिन अपराधी को धर्म, जाति और राजनीति से परे देखकर सजा दी जाने लगेगी, तब ही समझिएगा कि कहीं कुछ उम्मीद बाकी है। वरना हत्या, बलात्कार जैसे मामलों पर यूँ ही ठहाके लगते रहेंगे!
एक बात और, यह जिस दिन की घटना है उस दिन निर्भया कांड की बरसी थी! 16 दिसंबर याद है न? पर मरी हुई आत्माओं को इससे भी क्या लेना-देना!

बुधवार, 10 नवंबर 2021

Rohtang Pass & Atal Tunnel

जैसे पहाड़ का जीवन आसान नहीं, वैसे ही पहाड़ों पर जाना भी आसान नहीं। खासतौर से उनके लिए जो साल के 365 दिनों में से 360 दिन भुट्टे की तरह धीमी आँच पर सिकते रहते हैं। 30- 35 डिग्री के तापमान से माइनस पर पहुंच जाना पूरे तंत्र को हिला देता है। उस पर यदि आपको पहाड़ी इलाकों में चक्कर और उल्टी की समस्या हो, तब तो क्या खाक़ ही मज़ा आएगा! लेकिन इतने पर भी राहत कहाँ, अभी तो दुर्गम, खतरनाक रास्तों पर चलना शेष है। न चाहते हुए भी, बार-बार नज़रें गहरी खाई को देखती हैं और कलेजा बैठने लगता है। मुमकिन है कि जब आप रोहतांग की 13000 फ़ीट से भी अधिक ऊँचाई पर पहुंचें तो इन सब परेशानियों से जूझना पड़े।

लेकिन यदि आप अपने आसपास के अद्भुत वातावरण को देखेंगे तो आँखें भय को भूल प्रसन्नता से भर उठेंगी। हरियाली आपके शरीर के एक-एक ऊतक को नई चेतना देगी। आसमान मुस्कुराकर कहेगा, "ये देखो मेरा असल और निखरा हुआ रूप। इतना ही सुंदर, निर्मल हूँ मैं।" पहाड़ से इठलाते, ठुमकते हुए नीचे आता झरना, आपके हाथों में पानी की बोतल देख खिलखिलाकर हँसेगा कि ये शहरों के लोग कितने अज़ीब होते हैं! चेहरे को चूमती ठंडी हवा भी आपकी उड़ती हवाइयों को देख ठिलठिला उठेगी कि यार! तुमने टोपी केवल पहनी ही नहीं है, तुम खुद ही टोपा हो। 

हम चार क़दम चल अपनी धौंकनी सी चलती साँसों को पनाह देने के लिए कहीं ठहर जाते हैं कि तब तक हमसे दोगुनी उम्र का इंसान सरपट चलता आगे निकल जाता है। वो आगे है क्योंकि उसने शुरू से ही प्रकृति से प्रेम किया, उसकी गोद में खेला। उसे नष्ट नहीं किया। इसके बदले में प्रकृति ने उसे अथाह ताकत और ऊर्जा से भर दिया है। वो उन पहाड़ों पर सामान लादे हुए भी हिरण सा चलता है, जहां हम अपने आप को भी नहीं संभाल पाते। बार-बार लड़खड़ाते हैं। जिम में की जाने वाली तमाम मेहनत यहाँ पानी भरती नज़र आती है। 

असल में तो प्रकृति का आनंद लेने की पहली शर्त ही यही है कि आप उसमें खो जाओ, डूब जाओ प्रेम की तरह। फिर आपको हर जगह वही दिखेगा। मुस्कान भीतर से निकलेगी और दिल मोहब्बत से खिल उठेगा।

पहाड़ पर रहने वालों को प्रेम से जीना आता है, वो मुश्किलों को गिनाकर भाग्य को कोसते नहीं। बल्कि उनसे प्रेम कर उसे अपना जीवन बना लेते हैं। ये मुश्किलें ही उनका रोज़गार हैं, उनकी मुस्कान हैं। दिल का सुकून है।

ये पहाड़ एक प्रेमी की खुली हुई बाँहें हैं, जिनके शीतल घेरे में जीवन का हर तनाव, उड़न छू हो जाता है। ज़िंदगी और भी प्यारी लगने लगती है। ये गहरी खाइयाँ इसका मोल पल भर में समझा जाती हैं। आप आँखें मूँद अपनी मोहब्बत को याद करते हैं। राह आसान लगने लगती है और दिल महक उठता है। प्रेम, आपको ज़िंदा रखने और ज़िंदादिली बनाए रखने की सबसे खूबसूरत वज़ह है। आगे बढ़ने का हौसला भी यही देता है।

- प्रीति अज्ञात

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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

#कमला#नापसंद #अमिताभ ने अपने प्रशंसकों की लाज रख ली!

 बीते कई वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है कि भिया का जन्मदिन आया और हमने उन्हें विश नहीं किया। यूँ तो हमारी शुभकामनाओं से उन्हें अंतर भी क्या पड़ना है! कौन सा वो उन तक पहुँचती ही रही हैं! उन्हें तो ये भी कहाँ पता होगा कि बचपन से लेकर आज तक यदि हम किसी हीरो की बुराई सुनकर दुनिया से भिड़ गए हैं तो वो अमिताभ ही हैं। इधर किसी ने उनके बारे में कुछ गलत कहा और हम कमर कसके बिना लट्ठ, युद्ध के लिए तैयार हो जाते।

सामने वाले से तुरंत ही उनकी भाषा, व्यवहार, व्यक्तित्व, संतुलित-अनुशासित जीवन, कर्मठता की तमाम कहानियाँ और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के लिए किये गए कार्यों की सूची लेकर लड़ बैठते। अभिनय के मामले में तो कोई क्या ही कहेगा उनके बारे में। 50 वर्षों से जो व्यक्ति निरंतर काम कर रहा है। टीवी और फ़िल्मों का सरताज़ बना बैठा है। उसे नमन कर, उससे केवल प्रेरणा ली जा सकती है पर उसने भारतीय फ़िल्म उद्योग को क्या दिया है, इस पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता।

अब अमिताभ बच्चन जैसा तो बना ही नहीं जा सकता! दूसरा कोई अमिताभ न हुआ है और न हो सकता है। होने की जरूरत भी क्या है! गायकी में जो लता हैं, खेल के मैदान में जो सचिन हैं, आसमान में जैसे सूरज-चाँद हैं वैसे ही अपने भिया भी हैं। सबसे अनोखे, अलबेले, हँसाने-रुलाने वाले, जिन्हें नाचना न आता हो, उनको भी नचाने वाले। पाषाण हृदय को संवेदना से भर देने वाले, उदासी भरे दिल में उम्मीद की मुस्कान भरने वाले, जुझारूपन से हर लक्ष्य को हासिल करने वाले! दुनिया को ये सिखाने वाले कि अदाएं कॉपी नहीं की जातीं, स्वयं बनानी होती हैं। प्रेरणा की कोई मूरत होती तो उसकी शक्ल अमिताभ से हूबहू मिलती।

ये अपने भिया ही हैं जिनके कारण हमें फ़िल्मों से बेशुमार मोहब्बत हुई। ये भी सीखा कि अपने-आप पर और अपनी मेहनत पर भरोसा कैसे किया जाता है! बोलने का सलीक़ा क्या होता है! भाषा का सबसे सुंदर रूप कैसा होता है! लोग चाहे लाख आरोप लगाएं, आपकी चुप्पी उन पर हमेशा भारी क्यों पड़ती है। आखिर व्यक्ति के स्थान पर जब उसका काम बोले, तो दुनिया झुकती ही है। अमिताभ के सामने भी झुकी।

बॉलीवुड के अमित जी वही शख्स हैं, जिनके कारण हमने ब्लॉग-लेखन शुरू किया क्योंकि कहीं पढ़ा था कि वे ब्लॉग लिखते हैं। हमें तो पहले ब्लॉग का अर्थ भी नहीं पता था। उससे पहले हम डायरी लिखा करती थे। कविता-शविता भी लिख लिया करते थे। मन में विचारों की खूब रेलमपेल चलती तो नोटबुक में कूचुर-पुचुर लिख लेते। लो जी, हो गई जय राम जी की। 

जिस दिन भिया के ब्लॉग का मालूम हुआ, अपन ने भी ब्लॉग बनाया। उस समय तो निपट अनाड़ी थे, ऑनलाइन कुछ भी करना नहीं आता था। 2010 में जैसे-तैसे लैपटॉप ऑन करना सीखे थे। अब भी कोई बहुत खिलाड़ी नहीं बन गए हैं पर हिम्मत नहीं हारते हैं। हाँ, खुद पर झुँझलाते जरूर हैं। ज़्यादा दुखी हुए तो तनिक रो लिए और फिर उठ खड़े हुए।

अब आप इसे फ़िल्मों का असर समझिए, हमारा उनके प्रति दीवानापन या कुछ और पर हमने  हमारे इस हीरो से बहुत सीखा है। और सीखना तो अच्छा ही होता है न!

इस बार 'कमला पसंद' के विज्ञापन में उन्हें देखकर हम बेहद आहत थे। कुछ भी कहते-सुनते नहीं बन रहा था। कंपनी कुछ भी कहकर विज्ञापन करवा ले पर सब जानते हैं कि बात तो पान-मसाले की ही हो रही। पहली बार हमारे प्रिय कलाकार के एक निर्णय से हम निराश थे। मन को समझाया कि अंततः वे एक कलाकार हैं और इस निर्णय के पीछे आर्थिक आधार भी हो सकता है। लेकिन गलत तो गलत ही है फिर भी। यह भी लग रहा था कि उनके विरोधियों को उन्हें बहुत कुछ कहने का अवसर मिल गया। हम तो अब क्या ही बोलेंगे, किसी से उनके लिए क्या ही लड़ सकेंगे! परेशान तो हम खुद इतने थे कि इतने दिनों से इस विषय पर कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। दुख भी था और गुस्सा भी बहुत आ रहा था। सो, हमने उन्हें विश किया ही नहीं! हालाँकि भीतर से बहुत खराब भी लगता रहा। 

ये जानते हुए भी कि उन्हें कौन सा हमारी शुभकामनाओं के मिलने- न मिलने का फ़र्क़ पड़ने वाला है, अपने-आप के इस व्यवहार से थोड़ा मलाल भी रहा। 

दिन इसी ऊहापोह में गुज़रा और थोड़ा व्यस्त भी रहा। लेकिन अभी आधा घंटे पहले पढ़ी एक खबर ने दिल खुश कर दिया है। पता चला है कि जब अमिताभ उस ब्रांड से जुड़े थे, तो उन्हें नहीं पता था कि वह भी सरोगेट एडवर्टाइज़िंग के अंतर्गत आता है। फ़िलहाल भिया ने उस ब्रांड के साथ अपना कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर दिया है एवं प्रमोशन के लिए मिले पैसे भी लौटा दिए हैं। अब आप इसे कमलानापसंद कहिए जी!

अमित जी, ये खबर खुशी की लहर लेकर आई है। आपने हमारे जैसे करोड़ों प्रशंसकों की लाज रख ली! थोड़ी देर से ही सही, पर आपको जन्मदिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं!

आप शतायु हों!

आप न पढ़ें, कोई गम नहीं! लेकिन अब दिल को बहुत हल्का महसूस हो रहा। 

- प्रीति 'अज्ञात'

#अमिताभबच्चन #कमलापसंद #कमला#नापसंद #अमिताभ #बिगB #Amitabh #प्रीतिअज्ञात #preetiagyaat #newblogpost 



रविवार, 19 सितंबर 2021

Cadbury का #GoodLuckGirls लैंगिक समानता के पक्षधर समाज की सचित्र, संगीतमय व्याख्या है.


अभी तक फ़िल्मों के रीमेक खूब देखे हैं हमने. लेकिन विज्ञापन का भी रीमेक बन सकता है और वो भी ऐसे विज्ञापन का, जो अपने समय का सबसे पसंदीदा विज्ञापन रहा हो! यह बात जरूर चौंकाती है. लेकिन कैडबरी ने ऐसा कर दिखाया और वो भी इतनी खूबसूरती से कि इस बार भी मुँह से वाह, वाह ही निकलती रही. इतनी नरमी और सहजता के साथ, लैंगिक समानता के संदेश को दिलों तक पहुँचा देने के लिए कैडबरी और विज्ञापन एजेंसी Ogilvy की पूरी क्रिएटिव टीम को सलाम बनता है. 

यह विज्ञापन लैंगिक रूढ़ियों और खेल से जुड़ी धारणाओं में परिवर्तन का जश्न है. इसने यह भी सिखाया कि नारी-सशक्तिकरण की बातें केवल चर्चाओं, रैलियों और आंदोलन के माध्यम से ही नहीं कही जातीं, उन्हें कलात्मक तरीके से सबकी भावनाओं को स्पर्श करते हुए भी बखूबी कहा जा सकता है. यह बदलते समय की न्यूनतम समय में की गई प्रभावी, उत्कृष्ट प्रस्तुति है.  
हो सकता है, आपने मूल विज्ञापन के समय को जिया हो और थोड़े नॉस्टैल्जिक होकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' कहने लगें. लेकिन ये तो मानेंगे ही कि कैडबरी डेयरी मिल्क का ये नया विज्ञापन कहीं भी पुराने से उन्नीस नहीं ठहरता! संगीत और शब्द वही होने के बावजूद भी इसका असर रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है. वही चिर-परिचित संगीत अब भी आपके मन के तारों को पहले सा छेड़, भावुक कर जाता है. 

आपको याद है न! लगभग 3 दशक पूर्व ऐसी ही मोहब्बत की खुशबू एक स्टेडियम में फैली थी. ऐसा ही अचरज हम सबकी आँखों में भरा था. विज्ञापनों की दुनिया में तहलका मचा था और बच्चा-बच्चा गुनगुनाने लगा था-
कुछ बात है हम सभी में
बात है, खास है, स्वाद है 
क्या स्वाद है ज़िंदगी में 
हूबहू यही दृश्य था. स्टेडियम में मैच चल रहा है. 99 पर खेलते हुए खिलाड़ी लड़के ने बॉउन्ड्री के पार जाने को गेंद हवा में उछाल दी है. फील्डर, कैच पकड़ने को दौड़ रहा है. दर्शक दीर्घा में जोश है और उत्सुकता भी. इसी बीच दिल में धड़कती साँसों और हाथ में कैडबरी डेयरी मिल्क को थामे हुए एक चेहरा स्क्रीन पर उभरता है. इस चेहरे से जैसे सबकी साँसें जुड़ गई हैं. 
छक्का लगता है. फ्लोरल टॉप पहने वो लड़की अब सुरक्षा घेरे को तोड़ मैदान में आ जाती है. वो खुशी से झूमकर नाचती है तो लगता है जैसे सारी दुनिया से बेपरवाह होकर वो तो बस अपने प्रेमी के शतक का उत्सव मना रही है. इधर प्रेमी के चेहरे की चमक, खिलती हँसी और उस पर लड़की के लिए उमड़ता प्यार अलग ही सबका दिल लूटे ले रहा था. तभी पार्श्व में धुन बज उठती है 'कुछ खास है ज़िंदगी में'. उसके साथ ही जीत के जश्न में कैडबरी डेयरी मिल्क की मिठास घुल जाती है. 'असली स्वाद ज़िंदगी का' की टैगलाइन के साथ दोनों गले लग जाते हैं.


अहा! जो भी इस विज्ञापन को देखता, भीतर तक खिल उठता. उसका मन महकने लगता. यह था ही इतने क़माल का. सब कुछ बेहद स्वाभाविक था इसमें. और इसी स्वाभाविकता ने उसे सबसे खास बना दिया था. देखा जाए तो इस विज्ञापन ने ही यह धारणा ध्वस्त की, कि चॉकलेट केवल बच्चे खाते हैं. अब हर कोई उसे खाना चाहता था, हर लड़का-लड़की अपने जीवन में उल्लास की मधुरता को यूँ ही जीना चाहते थे. हाथ में कैडबरी थामे लड़का-लड़की मोहब्बत की जीवंत तस्वीर बन गए थे. 

अब कैडबरी के नये विज्ञापन ने वो पुरानी यादें तो ताजा की हीं. साथ ही एक संदेश देकर इसे नए आयाम भी प्रदान कर दिए हैं. इस नए विज्ञापन में भूमिकाएं बदल गई हैं. सब कुछ वही है. बस लड़के-लड़की के रोल उलट दिए गए हैं. इस बार पिच पर एक महिला क्रिकेटर है और दर्शक-दीर्घा में पुरुष उसके लिए प्रार्थना कर रहा है. कहने को ये जरा सी बात भी लग सकती है लेकिन इस एक परिवर्तन ने भावनाओं का जैसे ज्वार ही ला दिया है. यह विज्ञापन अब केवल कैडबरी डेयरी मिल्क की ही बात नहीं कर रहा, बल्कि ये भी कह रहा है कि देखो! समय बदल गया है. देखो, हमारी लड़कियाँ भी अब खूब खेल रहीं हैं. प्रगति कर रही हैं. समाज में बदलाव आया है.अभी तक तो लड़कियाँ ही लड़कों का हौसला बढ़ाती रहीं, उनकी तारीफ़ में गदगद होती रहीं. लेकिन अब दर्शक दीर्घा में खुशी से कूदते इस लड़के से समझो कि लड़कियों को हौसला यूँ दिया जाता है. साथी की जीत में यूँ जश्न मनाया जाता है. 

बेशक़ इस नए विज्ञापन में जीत की भावना वही है, सफ़लता को उसी जोशोखरोश के साथ मनाया गया है लेकिन इस बार जो भाव और जुड़ गया है वो है हमारे समाज में स्त्रियों की प्रगति का, उन्हें सम्मान देने का, उनकी उपलब्धियों की जय-जयकार करने का. यह नए भारत का विज्ञापन है, उम्मीद का विज्ञापन है,  #GoodLuckGirls hashtag के साथ यह लैंगिक समानता के पक्षधर बनते समाज की सचित्र, संगीतमय व्याख्या है. 
इसे ichowk पर भी पढ़ा जा सकता है -


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गुरुवार, 2 सितंबर 2021

#SidNaaz का Sid हमेशा-हमेशा को चला गया.

 सिद्धार्थ शुक्ला के निधन की खबर पर सहसा विश्वास नहीं होता! एक प्रतिभाशाली, उदीयमान कलाकार जिसने अभी सफ़लता के पायदान पर आगे बढ़ना शुरू ही किया था कि अचानक ही  उसके जीवन का अस्त हो गया. पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त दिखने वाले, व्यायाम को अपनी नियमित जीवन शैली का हिस्सा बनाने वाले सफ़ल अभिनेता का यूँ असमय चले जाना बेहद दुखद है. उनके परिवार का सोच कलेजा भर आता है. उस माँ पर क्या बीती होगी जिसने एक बेहद ज़हीन बेटा खो दिया, उन बहिनों का क्या हाल हुआ होगा जिनका प्यारा भाई अगली राखी पर अब साथ न होगा! कल तक जो हमारे साथ था, वो आज से नहीं है; जीवन की क्षणभंगुरता का यह रूप बुरी तरह से भयभीत कर देता है. 

मैं टीवी धारावाहिक नहीं देखती. जब संभव हो तो रियलिटी शोज़ या टॉक शोज़ जरूर देख लेती हूँ. सिद्धार्थ को मैंने बिग बॉस के माध्यम से ही जाना. यद्यपि उस समय तक मैंने यह शो देखना छोड़ दिया था. लेकिन जब इसकी खबरें बहुत आने लगीं तो पुनः उत्सुकता हुई. इस उत्सुकता का नाम था,शहनाज़. सिद्धार्थ के प्रेम में दीवानी हुई एक चुलबुली लड़की. सब इस लड़की के बारे में बहुत कुछ कहते लेकिन मेरा उस पर यक़ीन सदा ही बना रहता. वो चाहे किसी से भी बात करे, कुछ भी कहे, लड़े-झगड़े पर अपने सिड के प्रेम में दीवानी थी वो. उसकी आँखों में, उसके चेहरे पर, उसके व्यवहार में, उसके गुस्से में हर जगह उसका सिड था. 

कभी जब सिद्धार्थ उससे रूठ जाता या उसकी बातों को अहमियत नहीं देता तो मुझे बहुत खराब लगता था. मैं सोचती कि माना शहनाज़ की हरकतें बचकानी हैं पर तू उसका प्यार तो देख! माना वो थोड़ी अल्हड़, नादान है पर उसकी दीवानगी तो देख! वो जो भी कर रही है, सब तेरी ही अटेंशन पाने को! उस जैसी प्यार करने वाली नसीब वालों को ही मिलती है. यक़ीनन सिड भी इस बात को समझता था और शहनाज़ की तरफ़ बेपरवाही दिखाते हुए भी उसकी बहुत परवाह करता था. शहनाज़ उसके पीछे-पीछे घूमती और ये उसकी किसी बात से रूठा होता तो लाख मनाने पर भी न मानता. वो मुँह फुलाकर बैठ जाती तो सामने इग्नोर करता. लेकिन दूर से ही उसे प्यार भरी नज़रों से निहारना न भूलता! उसकी भावनाओं की कद्र करता. 

जब ये दोनों साथ होते तो जैसे पूरा घर मुस्काता. बिग बॉस के ज़र्रे-ज़र्रे में मोहब्बत गूँजती. सारा घर खुश रहता. कभी-कभी सिड, शहनाज़ को उसकी गलतियों के बारे में समझाता और वो मान  भी जाती. हाँ, तुनककर ऐसा जरूर कहती कि 'तू ये बात तब भी तो प्यार से बोल सकता था न!'  सिड कभी मुस्कुराता, कभी हँसता और कभी उसे देखते हुए शून्य में खो जाता. यूँ लगता, जैसे गढ़ रहा है इस रिश्ते को. उसे  भावनाओं का सम्मान करना आता था. रिश्तों की अहमियत का खूब अहसास था उसे. इन दोनों के बीच का रिश्ता दोस्ती था या प्यार, ये जानने में मुझे कभी दिलचस्पी नहीं रही. लेकिन इतना जरूर जानती थी कि यह बेहद खूबसूरत दिल का रिश्ता है. ये रिश्ते नाम के मोहताज़ नहीं होते. ऊपर से बनकर आते हैं. सदा साथ रहने को. आज ये भरम टूट गया है. 

सिद्धार्थ शुक्ला का जाना उनके परिवार के लिए कितना असहनीय होगा, ये हम जानते हैं. लेकिन आज एक खिलखिलाती लड़की के चेहरे से उसकी मुस्कान छीन ली गई है. उसको मनाने वाला एक साथी चला गया है. उसकी बातों पर हँसने-छेड़ने और उसे दुलारने वाला दोस्त चला गया. शहनाज़ के दिल का शहजादा चला गया. सिडनाज़ का सिड हमेशा-हमेशा को चला गया. लड़की, इस दुख को सहन करने की हिम्मत रखना तुम!

- प्रीति अज्ञात 

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 कुछ तो अच्छे कर्म रहे ही होंगे जो सुबह-सुबह ऐसी दुर्लभ ख़बर से सामना हुआ -

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खड़े वाहन में घुस गया सांप 

अल्मोड़ा। करबला के पास खड़ी Dl2FCG0555 में रविवार की देर शाम सांप घुस आया।

कार में बैठने से पहले वाहन स्वामी की नजर सांप में पड़ गई। इस बीच मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। इधर मौके पर वन विभाग की टीम पहुंची। काफी देर के रेस्क्यू में तेंदुए की जान नहीं बच सकी। संवाद

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हे ईश्वर! क्या यही दिन देखने के लिए हमें जीवित रख छोड़ा है? आदरणीय पत्रकार जी, एक सलाह हमारी भी सुनो. यदि इसमें एक पंक्ति और जोड़ देते कि 'फिर भारी जनसमूह के साथ कछुए की शवयात्रा निकाली गई'. क़सम से, तब तो मज़ा ही आ जाता इसे पढ़ने का!

भई! बहुत समाचार पढ़े हैं, टीवी पर भी देखे-सुने. अनगिनत फ़िल्में देखीं पर कहानी में ऐसा खतरनाक मोड़! तौबा रे तौबा! बाहुबली की पटकथा भी इसके आगे पानी भरती नज़र आए. सच!अब तक कितने बड़े रोमांच से वंचित थे हम! लेकिन हम भी कुछ कम नहीं! पत्रकार बिरादरी के साथ अंतिम साँस तक खड़े रहेंगे. तभी तो नियति के इस क्रूर मज़ाक को पढ़ने के बाद भी हार नहीं मानी है और इस अद्भुत, अकल्पनीय, अलौकिक समाचार के संदर्भ में कुछ निष्कर्ष प्राप्त कर ही लिए हैं -

1. हो सकता है, उस साँप का नाम 'तेंदुआ' हो और उसके मम्मी-पापा ने उसके गले में इस नाम का locket लटका रखा हो. 

2. ये भी संभव है कि गाड़ी तेंदुआ चला रहा था. अब चूँकि साँप को गाड़ी मालिक से ही बदला लेना था. तो उसने तेंदुए को काट लिया होगा. जिसके परिणामस्वरूप उस तेंदुए की ही लाश प्राप्त हुई. इस दुखद पल में साँप का उल्लेख, उचित नहीं था. 

3. कार की अंतिम तीन डिजिट 555 है. शास्त्रों में इस तरह के अंकों को शुभ एवं मंगलकारी बताया गया है. अतएव वह कार भी चमत्कारी हो सकती है. तात्पर्य यह कि घुसा तो साँप ही पर वो तेंदुआ बनकर बाहर निकला. 

4. क्या पता वह किसी सुप्रसिद्ध, जनहित में प्रसारित होने वाले, ज्ञानवर्धक धारावाहिक की इच्छाधारी नागिन हो, जो कि सेट से बाहर हवा खाने निकल आई थी. फिर उसे मुँह की खानी पड़ी. अब एकता उसके घरवालों पर कितना गुस्सा करेगी, सोचकर अपना तो दिल ही बैठा जा रहा. 

5.उस कार में रजनीकांत बैठे थे तो न्यूज उनके लेवल की बनाई गई है. कृपया, धैर्य रखें. अब इसका सीक्वल आएगा. 

6. नागपंचमी अभी-अभी निकली है. जन-साधारण की भावनाएं आहत न हों, इसलिए क्लाइमैक्स बदल दिया गया है.  

7. हो न हो, ये वन विभाग की कारस्तानी है जिसने एक पहले से मरे तेंदुए को दूसरे दरवाजे से घुसेड़ दिया और साँप को सीट बेल्ट की जगह लटका दिया. 

8. संभवतः नौकरी सिफ़ारिश की है और बंदा कर-करके परेशान हो गया है. अब आत्मनिर्भर बनने का इच्छुक होगा. 

9. तालिबानी सिर पर खड़े थे और उनके हथियारों को देख घबराहट में साँप को तेंदुआ बन प्राण तजने पड़े. 

10. अच्छा, इस ख़बर का शीर्षक भी बड़ा रोचक है -'खड़े वाहन में घुस गया सांप'मतलब ये कहना चाह रहे कि सामान्यतः तो वो चलती ट्रेन को जंप मारकर पकड़ता आया है. पर इसकी जुर्रत तो देखो! मुआ, अबकी बार खड़े वाहन में भी घुस गया. वैसे आनंद में सौ गुना वृद्धि चाहिए तो आप इस 'समाचार' का एक-एक शब्द गौर से पढ़िए. हर शब्द में क्रांति भरी हुई है. 

11. जिस विकास को पाने के लिए हम तड़प रहे थे, सनसनी फैलाता हुआ अंततः वो मिल ही गया। देखो, देखो वो आ गया! हा हा हहा हा 

जो भी सच हो जी, पर भगवान के लिए कोई उस साँप का भी इंटरव्यू ले लो. न जाने उसके दिल पर क्या बीती होगी.  बताओ तो, उसके काम का क्रेडिट कोई और ले गया!क्या वो अब लौटेगा? क्या वो तेंदुआ का रूप धर, अपने खोए हुए सम्मान को प्राप्त करने की चेष्टा करेगा? ये कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तरों की तलाश जारी है. 

हम जैसे कुंठित लेखक का दुख: जो भी सच हो जी, पर ऐसी खबरें अगर लिखी जा रहीं हैं और उसके बाद ससम्मान छापी भी जा रहीं हैं! तो हम क्या बुरे हैं! हमने ऐसे कौन से पाप कर दिए, जो बेरोज़गारी का दंश झेल रहे और ऐसे लेखन वाले तनख्वाह पा रहे! ये हम जैसे मासूम लेखकों की भावनाओं के साथ भीषण खिलवाड़ है, मानसिक उत्पीड़न की पराकाष्ठा है जी! अब आप तो हम पर देशद्रोह का आरोप लगाकर पाकिस्तान ही भेज दो. अरे, सॉरी. अबकी तो तालिबान भेजने का टर्न चल रहा न!

- प्रीति अज्ञात 

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