बुधवार, 30 अप्रैल 2014

अनजानी सी पहचान

संभवत: दो वर्ष पूर्व की ही बात रही होगी ये ! मैं ट्रेन में सफ़र कर रही थी, दुर्भाग्य से ऊपर की बर्थ ही मिली थी मुझे. मैं उन लोगों में से हूँ, जो ट्रेन में सफ़र करते ही इसलिए हैं कि 'विंडो सीट' का भरपूर मज़ा ले सकें. बाहर के नज़ारे, रास्ते में पड़ते छोटे-छोटे गाँव, रेलवे लाइन के आसपास खेलते-कूदते बच्चे, भागते हुए पेड़, रेलवे-क्रॉसिंग के नीचे रुके लोग और जीभ दिखाते हुए खी-खी करके उन्हें चिढ़ाना मुझे अभी भी खूब भाता है. रात होते-होते ये अफ़सोस भी जाता रहा. ट्रेन में नींद अच्छे से आती नहीं कभी, अपनी और सामान दोनों की ही फ़िक्र. हालाँकि इस समय सामान की उतनी चिंता नहीं थी. ये भी अजीब ही आदत है मेरी, कि लगेज की परवाह जाते समय ही ज़्यादा रहती है, मुझे. लौटते वक़्त तो यही लगता है, कि चोरी हो भी गया तो क्या हुआ, घर ही तो जाना है, अब ! पर हाँ, सबकी गिफ्ट्स का बेग अपने सिरहाने ही रखती हूँ, अभी भी ! खैर...चलती ट्रेन में लिखाई-पढ़ाई मुझसे होती नहीं, पर कुछ विचार बुरी तरह उथल-पुथल मचा रहे थे, सो पर्स में से अपनी डायरी और पेन निकाल ही लिया. माहौल एकदम प्रतिकूल था. लिखते समय जो एकांत चाहिए उसकी उम्मीद रखना भी बेमानी था, मैं दरवाजा बंद करके और कभी-कभार तो पंखे को भी बंद करके लिखने वालों में से हूँ, ज़रा भी व्यवधान हुआ, कि किस्सा ख़त्म ! पर यहाँ ऐसा सोचना भी बेवकूफी थी !

ऐसे में उसकी आवाज़ मुझे बहुत इरिटेट कर रही थी, वो बोले ही चली जा रही थी, चुप न होने का तय करके ही बैठी हो जैसे. तभी मैंनें पूरी गर्दन ही लटका दी और ऊपर से नीचे झाँका, फिर बच्चों से पूछा..'सो गये ना ?' दोनों ने एक साथ मुस्कुराते हुए कहा, 'आपको क्या लगता है ? ' फिर आँखों-आँखों में ही हम तीनों हँस पड़े. तभी कहीं से आवाज़ आई, 'आंटी, मैं डिस्टर्ब तो नहीं कर रही ना ?' मैंनें झट से बोल दिया...'नहीं तो !' पर अचानक ही मैं एकदम असहज-सी हो गई.....आंटी ? हुहह..मेरे जानने वाले तो कहते हैं, कि मैं अभी भी कॉलेज गोइंग टाइप लगती हूँ, और इसने मुझे.......!! फिर खुद ही मन में आए विचार को झटक दिया मैंने, तो क्या हुआ, मेरे को क्या !!! पर सच तो यह है कि मैं मन में खिसिया-सी रही थी..कोई बच्चा आंटी बोले तो चलता है, पर एक शादीशुदा महिला ? यहाँ गौर करने वाली बात ये है, कि महिला शब्द का प्रयोग मैंनें जान-बूझकर ही किया है, वो एक शादीशुदा लड़की ही थी !

न चाहते हुए भी उसकी बातें मेरे कानों में पड़ रहीं थीं. वो अपने आसपास बैठे लोगों से खूब घुल-मिलकर बातें कर रही थी. अपने स्कूल, कॉलेज और दोस्तों की, पसंद-नापसंदगी की और भी जाने क्या-क्या ! अचानक उसकी बातों में मेरे शहर का नाम आया, अरे तो ये भी यहीं की है क्या ? मैंनें पूछना चाहा, पर ऊपर से चिल्लाकर पूछना जँचा नहीं, सो चुप ही रही. थोड़ी देर बाद किसी ने उससे उसका गंतव्य जानना चाहा, अब मेरे भी कान खड़े हो गये थे, एक अजीब सी फ़िक्र होने लगी थी मुझे उसकी...अकेले सफ़र कर रही थी वो, जमाना भी खराब है और मेरे दिमाग़ में ढेरों ऊल-जलूल बातों ने पल भर में ही धरना दे दिया ! जैसे ही उसने फिर से मेरे वर्तमान शहर का नाम लिया, तो मैं उछल ही पड़ी ! बिना उसके पूछे ही मैंनें कह दिया, अरे हम भी वहीं जा रहे हैं. एक तसल्ली सी हुई, कि चलो अब ये खुद को अकेला नहीं समझेगी. हालाँकि उसे देखकर ऐसा बिल्कुल भी लगता नहीं था, कि वो ऐसी तसल्लियों की मोहताज़ भी है ! उसे नींद आने लगी थी शायद, प्यार से मेरी तरफ देखकर बोली..गुड नाइट आंटी ! पता नहीं क्यों, इस बार बुरा नहीं लगा मुझे, और जवाब में हंसते हुए मैंनें भी उसे गुड नाइट कह डाला ! 

हमेशा की तरह सुबह जल्दी ही नीचे उतर आई मैं, बाथरूम भी साफ मिलते हैं और फ्रेश होकर सबसे पहले चाय वाले से चाय लेने का सुख भी अमूल्य होता है. वो भी उठ गई थी, और बातों-बातों में ही उससे अच्छी दोस्ती भी हो गई. एक-दूसरे के नंबर भी लिए हमनें. फेसबुक पर अपने होने की जानकारी भी दी गई. मैं लिखती भी हूँ, इस बात से वो बेहद प्रभावित थी. मैंनें उसे कहा भी, कि मैं इस यात्रा पर ज़रूर लिखूँगी. पर जीवन की जद्दोजहद में कितनी ही प्लान की हुई बातें फेल हो जाती हैं, यहाँ भी यही हुआ ! इस बीच एक बार उससे तभी ही फोन पर बात हुई थी और दो बार कुछ संदेशों का आदान-प्रदान ! पर इतना तो जान ही गई, कि वो बहुत प्यारी इंसान हैं, पागलपन में ठीक मेरी ही तरह, और दूसरों पर तुरंत ही विश्वास कर लेने में भी मेरे ही जैसी ! बस यही दुआ है कि ईश्वर उसके विश्वास को हमेशा बरक़रार रखे. उसे जीवन की तमाम खुशियाँ हासिल हों ! शायद मैं आज भी उसे ये सब ना कह पाती, आज अचानक ही उसके जन्मदिवस का नोटिफिकेशन आया, तो सारी यादें ताज़ा हो गईं ! वैसे भी अब एक नया नियम बना लिया है मैंनें, कि जब जो भी महसूस करो, कह डालो.... बहुत कुछ इसलिए ही पीछे छूट जाता है, कि कह सकने की हिम्मत ही नहीं होती ! पर अब जीवन के उस मोड़ पर हूँ, जहाँ न कुछ पाने की ज़्यादा खुशी होती है और न ही खोने का अफ़सोस ! ये उदासीनता ज़िंदगी का हिस्सा खुद कभी नहीं होती, पर कब शामिल हो जाती है..पता ही नहीं चलता ! जीना इसी को ही तो कहते हैं ना ! खैर....ये बातें फिर कभी !

जन्मदिवस मुबारक हो, प्रिया ! देखो, मैंनें अपना वादा निभा दिया है आज ! :)

प्रीति 'अज्ञात'

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुहावना सफर की याद बन गयी यह
    सफर में कब कौन अपना सा हो जाता है पता ही नहीं चलता लेकिन याद बहुत दिन तक स्मृति पटल पर दर्ज रहती है
    प्रिया को मेरी और से भी जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

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    1. शुक्रिया, कविता जी ! सचमुच कुछ सफ़र उम्र-भर की यादें जाते हैं :)

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  2. आश्चर्य कि आप पिछले दो वर्षों से भी अधिक से ब्लॉग के इस सायबर संजाल पे हैं पर मेरी कभी इन ब्लॉग्स पर नज़र नहीं पड़ी...पर बेहतरीन अभिव्यक्ति है आपकी। आज इत्मिनान से कई पोस्ट पड़ी..समय पाके फिर कभी आउंगा और बाकी पढ़ने की भी कोशिश रहेगी। But really got impressed by both of your blogs :)

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  3. उत्तर
    1. धन्यवाद, सुशील कुमार जी :)

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