शनिवार, 9 मई 2020

#बॉयज /गर्ल्स लॉकर रूम: 13 से 18 वर्ष तक के बच्चों को यह 'कूल' क्यों लग रहा?

#बॉयज /गर्ल्स लॉकर रूम: यदि आप अभी शरमाए तो किसी दिन अपने बच्चे की हरक़त के कारण शर्मिंदा भी हो सकते हैं!

एक समय था जब परिवार के साथ फ़िल्म देखने जाते और सिनेमा के पर्दे पर जैसे ही दो फूल टकराते कि बच्चे नज़रें झुका लिया करते थे. घर में टीवी देख रहे हों और अचानक लिरिल, माला-डी या निरोध का विज्ञापन आ जाए तो अचानक से ही कोई बात करना शुरू कर देता जिससे कि टीवी की तरफ किसी का ध्यान ही न जाए. कोई बेडरूम सीन आ गया तो संकोच में यूँ धंस जाते कि सीधा धरती फटे और अपन इसमें समा जाएँ.
स्कूल की बात करें तो वहां प्रेम व्रेम का तो कांसेप्ट ही नहीं था, सब भैया दीदी होते. कोई अच्छा भी लगता तो बस उसे नोट्स दे देना ही इज़हार, इक़रार समझ लो और बात ख़त्म भी यहीं हो जाती थी. कॉलेज में दो नामों के बीच में प्लस लिखकर समीकरण बनते जैसे दीपिका + रणवीर, जिन्हें चॉक़ से बेंच पर लिख लड़की को छेड़ा जाता और फिर जब लड़की कॉलेज आती तो ये देख बुक्का फाड़ के रोती. यही छेड़खानी का उच्चतम लेवल होता. कुछेक रेयर केसेस होते थे पर सामान्यतः यही था. गालियाँ देने वाले छात्र भी होते थे पर उन्हें गन्दा/बुरा लड़का मान कोई उनसे दोस्ती न करता, जो करते वो या तो उन जैसे ही होते थे या फिर डर के कारण उनके दोस्त बन जाते थे.
सेनेटरी नैपकिन तक छुपाकर खरीदे जाते थे. रेप, सेक्स जैसे शब्द तो किसी की ज़बान पर भी आयें तो वो कटकर गिर जाए. अब आप इसे संस्कार समझें या पिछड़ापन पर तब ऐसा ही था और उस समय के लोग अब भी ऐसे ही हैं. सेक्स एजुकेशन तब भी नहीं थी.

अब 2020 को देखिये. पिद्दी से बच्चों को प्यार हो रहा है. मिडिल स्कूल में आते-आते दो तीन ब्रेकअप हो जाते हैं. इश्क़ समझने से पहले ही छात्रों ने अपनी और दूसरे पक्ष की तबाही के हथियार भी थाम लिए हैं. यौन कुंठा से ग्रस्त ये नई पीढ़ी के बच्चे जमकर पोर्न देख रहे हैं, बलात्कार की प्लानिंग करते हैं, लड़कियों की आपत्तिजनक फ़ोटो शेयर करते हैं. लड़कियाँ भी इस दौड़ में कहाँ पीछे हैं जितनी भी अश्लील और अभद्र भाषा का प्रयोग संभव है वे भी बराबर कर रही हैं. अपनी इसी कुंठा, यौन इच्छाओं और विकृत मानसिकता को एक जगह सँभालकर रखने के लिए इन सबने अपना-अपना इंस्टाग्राम समूह बनाया और इसे बॉयज /गर्ल्स लॉकर रूम का नाम दे दिया.
यहाँ लड़के किस हद तक गए और लड़कियाँ किस हद तक.....इस तुलना के कोई मायने नहीं हैं क्योंकि अपराध, अपराध ही होता है. सोचने वाली बात यह है कि इन 13 से 18 वर्ष तक के बच्चों को यह 'कूल' क्यों लग रहा? हो सकता है इन्हें 'बच्चा' शब्द पर भी आपत्ति हो क्योंकि इनकी हरक़तें तो बड़े-बड़ों को भी शर्मिंदा कर दें. 
इस पूरी घटना के और पहलू भी हैं-

कुछ लोग कहते हैं कि क्या लॉकर रूम की ख़बर पब्लिक में आना जरुरी थी?
बिल्कुल जरुरी थी क्योंकि अभी तो यह शुरुआत थी, पता न चलता तो इनकी हिम्मत और भी बढ़ सकती थी. न जाने कितने बच्चे इसे 'कूल' समझकर अनजाने में इससे जुड़ फूल बन सकते थे और फिर उनकी जो मानसिकता होती, उसकी कल्पना कर पाना भी सिहरा देता है. लेकिन इन बच्चों के नाम पब्लिक करने व उसकी तस्वीर शेयर करने से भी कहीं ज्यादा जरुरी है कि इनकी काउंसलिंग की जाए और दण्डित भी. 

दोषी कौन?
इस बात के लिए माता-पिता या मोबाइल ही दोषी हैं? यह बात पूरी तरह से सही नहीं ठहराई जा सकती. अपने आसपास देखिये हर कोई सहज भाव से गाली दे रहा. आज की युवा होती पीढ़ी हो या स्टैंड अप कॉमेडियन सब माँ-बहिन की गाली दिए बिना जोक ही नहीं सुना पाते. फ़िल्में और क़िताबें तक इनसे अछूती नहीं रहीं. पॉपुलर भी वही अधिक होतीं. बोल्डनेस और वल्गरनेस के बीच अब कोई अन्तर नहीं रह गया है. रेप के वीडियो सबसे ज्यादा देखे जाने लगे हैं. इस पर चुटकुले तैयार होते हैं, स्त्रियों को कमतर आँकने वाले हजारों जोक्स तो हम और आप जैसे लोग भी मुस्कुराते हुए फॉरवर्ड कर देते हैं. हर जगह द्विअर्थी भाषा है और netflix तथा अन्य वेब माध्यम से अश्लीलता जमकर परोसी जा रही. हर चैनल पर एंकर होस्ट के प्रेम में पड़े होने का नाटक करता है या किसी न किसी रूप में प्रेम को भौंडेपन के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. क्या ये बस हम और आप ही देख रहे हैं? नहीं, ये बच्चे भी वही देख रहे हैं और जब हम इस पर ताली बजा हँसते हैं न, तो वे इसे सही मानने लगते हैं. स्वयं इनसेंसिटिव होकर हम सबसे सेंसिटिव होने की उम्मीद कैसे रख सकते हैं?
 
माता-पिता का काम है, बच्चों को सही शिक्षा देना और उचित राह दिखाना. उसके बाद चलना बच्चों को ही है. हाँ, पेरेंट्स का इतना दायित्व तो बनता ही है कि वे अपने बच्चों से ऐसी  बॉन्डिंग बनाकर रखें कि बच्चे अपनी हर बात, फ़्रस्ट्रेशन, परेशानियाँ उनसे साझा कर सकें. हम ये मानकर उनको इग्नोर नहीं कर सकते कि अरे, ये तो बच्चा है, इसको क्या तनाव हो सकता है! बच्चे स्कूल जाने से लेकर, घर लौटने तक एक अलग दुनिया में होते हैं. उस दुनिया के लोगों की सोच, व्यवहार एवं प्रतिक्रिया प्यार भरी ही हो, ऐसा नहीं होता! ये बातें जब वो साझा करना चाहे तो किससे करे? हमें ही तो उनका सपोर्ट सिस्टम बनना होगा. पेरेंट्स के साथ ट्रांसपेरेंसी होगी तो बच्चा खुद ही ऐसे ग्रुप्स की बात उन्हें बता देगा.
मोबाइल आज के जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है. सुरक्षा के लिहाज़ से भी इसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता. हम बच्चों से कहेंगे कि फेसबुक पर न जाओ, फेक लोग हैं. तो वह ट्विटर पर जाएगा, वहां नहीं तो इंस्टाग्राम पर. कुछ भी न हो तो व्हाट्स एप्प तो है ही. क्यों नहीं जुड़ेंगे वे सबसे जब आप भी जुड़े हैं! उन्हें सोशल मीडिया सम्बन्धी सावधानियों की जानकारी होनी चाहिए और कैसे ज़रा सी असावधानी जीवन का सत्यानाश करती है, ये भी पता होना चाहिए. 

लॉकर रूम से बाहर की लड़कियां क्या सोचती हैं इन भद्दी चर्चाओं के बारे में?
आज कुछ छात्राओं से इस बारे में चर्चा की कि उन बच्चों के ऐसा व्यवहार या भाषा इस्तेमाल करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तो उन्होंने इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक वज़हें दीं. उनका सीधा मानना था कि उचित शिक्षा / यौन शिक्षा का अभाव (Lack of proper education/ sex education) उन बच्चों की गन्दी मानसिकता का प्रमुख कारण है.
कहीं-कहीं साथियों का प्रभाव (Influence of peer members) भी पड़ता है जब बच्चे उनके 'कूल ग्रुप' में फिट होने का प्रयास कर प्रभुत्व स्थापित करना (Establish dominance) चाहते हैं. कुछ लड़के Toxic masculinity का समर्थन करते हैं जिसमें पुरुष को सब कुछ करना allowed है. निम्न सामाजिक जीवन (Low social life /influence),आत्म सम्मान में कमी (Low self esteem), अस्वीकृति को संभालने में असमर्थता (Inability to handle rejection), सहानुभूति की कमी (Lack of empathy), नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व (Narcissistic personality) आदि भी इसमें शामिल हैं. घर का माहौल भी इसके लिए मुख्यतः उत्तरदायी होता है. यदि घर में ही गाली-गलौज़ और मारपीट का माहौल है तो आप उनसे कैसे संस्कारों की अपेक्षा करेंगे! कितनी ही बार लड़कों की हरक़तें यह कहकर टाल दी जाती हैं  कि Boys will be boys. ऐसे भी जेंडर स्टीरियोटाइप को बढ़ावा मिलता है. 

क्या किया जा सकता है?
आख़िर स्कूल क्यों नहीं बैठकर, खुलकर सेक्स एजुकेशन पर बात करते हैं? पेरेंट्स, आप भी 'SEX' शब्द को हौआ न बनाएँ. समझाइये बच्चों को, जिससे कि उनके मन में इस शब्द को लेकर विकृति न हो और थोड़ी maturity आये. वे सेक्स को 'इज़्ज़त' से जोड़कर न देखें और 'रेप' को इस इज़्ज़त को ख़त्म कर देने का एकमात्र हथियार भी न समझें! बताइये उन्हें एनाटोमी के बारे में. जिससे वे इधर-उधर न तलाशें. घर में इस विषय पर बात होना शुरू होना ही चाहिए. यदि आप अभी शरमाए तो किसी दिन अपने बच्चे की हरक़त के कारण शर्मिंदा भी हो सकते हैं.
बच्चों को केवल पैसा कमाना ही न सिखाएं, नैतिक शिक्षा (moral education) भी दें. घर में सब ठीक होगा तो बाहर इतना ग़लत कभी नहीं हो सकता!
- प्रीति 'अज्ञात'
#lockdownstories #lockdown  #Girls Locker Room #Bois Locker Room #Instagram #Coronavirus_Lockdown  #preetiagyaat #प्रीतिअज्ञात  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें