रविवार, 12 अप्रैल 2020

लौट आई हैं, ग़ुमशुदा छतों की रौनक़ें! #lockdownstories14



"चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है" 
हसरत मोहानी की लिखी इस ग़ज़ल को ग़ुलाम अली साहब ने  यादग़ार बना दिया है. उदास मूड में ये ग़ज़ल बहुत ही गहरा असर करती हैं पर आज मेरा मूड अच्छा था और "दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए/ वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है" सुनते ही मेरी आँखों में शेरवानी पहने दीपक पाराशर और लजाती हुई सलमा आगा की तस्वीर सज गई. इस एक दृश्य में दोनों अलग-अलग छत पर खड़े थे पर उनके दिल एक थे.
असल में दिलों को मिलाने में इन छतों का बहुत योगदान है. याद है न 'नया दौर' में दिलीप कुमार जब मचलती ज़ुल्फ़ों को लहराते, हँसते हुए कहते हैं. "तुझे चाँद के बहाने देखूँ/ तू छत पर आजा गोरिये/ तू छत पर आजा गोरिये,ज़ींद मेरिये" तो उनकी इस अदा पर कितनी हसीनाएँ क़ुर्बान हो जाया करती थीं! इसी बात को आगे बढ़ाते हुए साधना ने अपनी परेशानी यूँ बयां की थी, "घर की छत पे मैं खड़ी/ गली में दिलबर जानी/ हँस के बोले नीचे आ/ अब नीचे आ दीवानी/ या अँगूठी दे अपनी/ या छल्ला दे निशानी/ घर की छत पे खड़ी-खड़ी/ मैं हुई शरम से पानी"
फिर क्या होना था? "दैया! फिर झुमका गिरा रे!"
'मैंने प्यार किया' फ़िल्म के "मेरे रंग में रंगने वाली'' गीत ने भी सफलता के कई कीर्तिमान गड़े थे. इसमें छत पर नायिका का जन्मदिन मनाया गया था.
उन दिनों करवा चौथ के व्रत तोड़ने वाले दृश्य हों या फिर पतंगबाज़ी के गीत; बॉलीवुड ने छत पर पूरा कब्ज़ा जमा लिया था. फिर वह दौर भी आया जब ये छतें हमसे दूर होती गईं और इन पर जाना इन्हीं दो त्योहारों तक सीमित होकर रह गया.

बहुमंज़िली इमारतों की भीड़ में तो इन छतों का खोना स्वाभाविक ही था लेकिन जिनके पास अपनी थी; व्यस्तता की आड़ में उसकी रंगत भी खोती चली गई. इन्होंने वह सुनहरा समय भी देखा है जब ये कभी सुबह कपडे सुखाने तो दोपहरी में चिप्स, पापड़ बिछाने और अचार की बरनी रखने के काम आती. ढलती शामों को स्त्रियों की दिनभर की बातें भी इसी के फर्श पर बिछी चटाइयों पर साझा होतीं, अपने पति का इंतज़ार करतीं पत्नियां और उनकी निगरानी में छोटे बच्चों की टोली आइस- पाइस खेलती तो कभी रोते-झींकते माँ के पास आ ढेरों शिक़ायतों की पोटली उलट दिया करती. अधिकांश मामले वहीं रफ़ा-दफ़ा भी हो जाते थे! कुछ बच्चे पढ़ाई के लिए भी सुबह-शाम आया करते थे हालाँकि वे पढ़ाई से ज्यादा समय उसकी व्यवस्था में लगाते थे. नाश्ता-पानी, पेन-पेन्सिल क़िताबें ऐसे लेकर आते जैसे ज़िन्दग़ी गुज़ारने आये हों! ये बीते समय की ही बात हुआ करती थी.

इधर लॉक डाउन के इस संक्रमित एवं कठिन समय में एक सकारात्मक दृश्य यह देखने को आया है कि इन बंद छतों के दरवाजे अब धीरे-धीरे खुलने लगे हैं. आख़िर दिन भर घर में बैठने के बाद इंसान उकता ही जाता है. कहते हैं कि 'आवश्यकता, अविष्कार की जननी है' तो लोगों ने भी नया आउटिंग प्लेस ढूंढ निकाला है. यह है घर की छत. इन दिनों सुबह-शाम छतों का नज़ारा बदल गया है. ये धोयी जा रहीं हैं. जिम जाने वाले लोगों ने अपने योगा मैट यहीं बिछा लिए हैं. पिता अपने बच्चों के साथ बैडमिंटन खेलते नज़र आ रहे हैं. कोई टेरेस गार्डन का प्लान कर पौधों की सूची बना रहा है. सुहानी, ताजा हवा का आनंद उठाती इवनिंग वॉक के लिए भी यही साथी बन बैठी हैं. महिलाएँ अपनी-अपनी छतों पर खड़ी परस्पर बातचीत न भी कर पाएं पर मुस्कराहट का आदान-प्रदान बदस्तूर जारी है. क्या पता, पुराने ज़माने की तरह चुपके से कहीं दो दिल भी मिल रहे हों!

सड़कें वीरान हैं तो क्या हुआ! वाहनों की चिल्लपों से बेहतर ये हँसते-खेलते परिवार की आवाजें हैं, शाम को घर लौटते पक्षियों का मीठा कलरव है जो अब साफ़-साफ़ सुनाई देता है, वो रंगीन आसमान है जिस पर चढ़ी मैल की परत अब शनैः शनैः ढलने लगी है.
यह बात भी सोलह आने सच है कि कुछ समय बाद ही सही पर इन सड़कों पर गाड़ियां फिर दौड़ेंगीं, दुकानों के शटर धड़ाधड़ खुलने लगेंगे. पुरानी दिनचर्या में हम सब लौट आयेंगे और अंतत: जीवन ठीक वहीं से रफ़्तार पकड़ लेगा जहाँ अभी विश्राम कर रहा है लेकिन तब तक इस बात से ख़ुश अवश्य हुआ जा सकता है कि हमारी इन ग़ुमशुदा छतों की रौनक़ें लौट आई हैं!
- प्रीति 'अज्ञात'
https://www.ichowk.in/humour/coronavirus-lockdown-turned-as-boon-for-roof-and-terraces-as-family-get-together-place/story/1/17333.html
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फोटो:साभार गूगल 

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