गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक बिहारी सबपे भारी

मेरी मित्रता-सूची में सबसे अधिक संख्या में यदि कोई राज्य नज़र आता है तो वो है बिहार/ झारखंड। पता नहीं, यह महज़ संयोग है या कि यहाँ के लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय हैं।
जहाँ हर तरफ़ इस राज्य (मैं अब भी दोनों को एक ही मानती हूँ) को लेकर नकारात्मकता फैली हुई है, वहीं मैं न केवल इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए ही प्रसन्न होती हूँ बल्कि इसे बौद्धिकता और साहित्य के प्रति अगाध प्रेम से पटा हुआ भी पाती हूँ। यहाँ के पठन-पाठन में रुचि रखने वाले लोग जमकर लिखते हैं और अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के खुलकर कहने में जरा भी नहीं झिझकते। ये अच्छे मित्र हैं, मिलनसार हैं, बातूनी हैं, मस्तीखोर हैं, आशिकमिजाज़ हैं, बिंदास हैं। लेकिन अगर आपकी बात नहीं जँची या फिर आपने कोई बेफिज़ूल बात कह दी तो आवश्यकतानुसार ये दादागिरी पर उतर आने  में भी नहीं चूकते। अभी-अभी ही कुछ मित्रों को याद कर 'दादागिरी' को मैंने 'लड़ाकू और अकडू' के सम्मिश्रण के अर्थ में लेने की गुस्ताख़ी कर दी है।

आज देश भर में त्यौहारों की चमक भले ही धूमिल पड़ती जा रही है,  लेकिन यहाँ के लोगों के भीतर का उत्साह अब भी जीवित है। बल्कि बिहार, उन इक्का दुक्का राज्यों की श्रेणी में आता है जहाँ आज भी उत्सवों को धूमधाम, पारंपरिक तरीक़े और पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कम-से-कम मुझे तो यही महसूस होता है। 

इस राज्य के साथ जब हम ग़रीबी, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध, अन्याय और विकृत शिक्षा प्रणाली की बात करते हैं तब हम उस लचर और बेलगाम तंत्र व्यवस्था की चर्चा करना भूल जाते हैं जिसके सुधार के बिना इन समस्याओं से मुक्ति पाना असंभव है। पर यह मात्र बिहार ही नहीं, शेष राज्यों में भी इतना ही विकराल रूप धारण किए उपस्थित हैं। हाँ, बिहारी इन बातों को लेकर अत्यधिक भावुक एवं संवेदनशील हो जाते हैं..यहाँ उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण और आत्मशोधन की आवश्यकता है। 
अपनी जन्मभूमि से स्नेह होना स्वाभाविक है, होना ही चाहिए! तभी तो 
हमें नालंदा पर गर्व है, बुद्ध पर अभिमान है, देश को सर्वाधिक प्रशासनिक सेवा अधिकारी देने की प्रसन्नता है, जमीन से जुड़े रहने की ज़िद है पर यदि हमारी कमी को लेकर कोई कुछ इंगित करता है तो उसे सहज स्वीकार कर बदल देने का जुझारूपन भी और बढ़ाना होगा। किसी बहस में उलझने से कहीं ज्यादा प्रयास करने होंगे कि हमारे राज्य की तस्वीर और भी ख़ूबसूरत बने। अंततः हैं तो हम भारतीय ही। देश का हर कोना हमारा अपना ही तो घर है।

आज जबकि मैं यह लिख रही हूँ तो मेरी मित्रता सूची के तमाम प्यारे चेहरे मेरी आँखों में तैर रहे हैं। वे शानदार लेखक, लेखिका, संपादक, पत्रकार, अध्यापक, समाज सेवी, व्यापारी, सरकारी नौकरी में सेवारत और लगभग हर व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़े हैं। सबकी अपनी विशिष्ट    पहचान है। इन सबमें अगर कोई बात कॉमन है तो वो है इनका साहित्य के प्रति मोह, अधिकाधिक एवं अच्छा पढ़ने की लालसा और भीड़ में एक अलग पहचान बनाने की अदम्य इच्छाशक्ति।

मैं आप सबको 'बिहार दिवस' पर ख़ूब शुभकामनाएँ और बधाई देती हूँ कि आप अपने राज्य के साथ हम सबको गौरवान्वित करें। मित्रता-सूची में जुड़े होने का शुक्रिया भी क़बूल कीजिए। कई लोग हैं जिनके नाम मैं लेना चाहती हूँ पर संभव है कि इस प्रक्रिया में कई नाम रह भी जाएँ। 
वैसे भी आप लोग कहते हैं न कि 'एक बिहारी सबपे भारी' तो इस बात पर गौर फरमाते हुए और अपने-आप को भावी दुविधा से सुरक्षित रखने  हेतु मैं किसी को टैग न करना ही उचित समझती हूँ।
और हाँ, सुनिए... यदि बिहार देश के गले का हार है तो आप उस हार के गुलाब और गुलाबो हैं। इसी बात पर दिल करे तो दो गुलाबजामुन खा लीजिएगा। 
शेष शुभ ही शुभ है। 
पर सबसे मज़ेदार बात ये है कि हम आज तक बिहार ही न गए। :D 
- प्रीति 'अज्ञात'


मंगलवार, 20 मार्च 2018

केदारनाथ सिंह

*मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहते हैं दीमक
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अन्दर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़बान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी

और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने
जिससे वादा है
कि मिलूंगा।

आह! और आप इसी विश्वास के साथ चले गए! हाँ, पृथ्वी रहेगी और आपके शब्द भी नम आँखों में यूँ ही तैरते रहेंगे.
मैं स्वयं को उन पाठकों की श्रेणी में देखती हूँ जिनके लिए दिल्ली अभी दूर है, बेहद दूर. ऐसे में जब केदारनाथ सिंह जी सरीख़े साहित्यकारों की कविताएँ हाथ लगती हैं तो अपने अच्छे पाठक होने पर भी संदेह होने लगता है कि आख़िर मैनें अब तक पढ़ा ही क्या है! कितना वृहद और समृद्ध साहित्य है हमारा और उन पुस्तकों को हाथ भर लगाते हुए कैसा बौनापन-सा महसूस होता है! मैं केदारनाथ सिंह जी से कभी नहीं मिली, वही नहीं, उनके समकक्ष साहित्यकारों से भी कभी नहीं मिली. मिलना चाहती थी, अब भी चाहती हूँ पर कहा न...हम जैसों के लिए दिल्ली अभी दूर है! हमें ऐसे सुअवसर जरा कम ही नसीब होते हैं. होते ही नहीं! हमारी औक़ात भी कहाँ! ख़ैर..... 
सोशल मीडिया के कई सकारात्मक पक्ष हैं और उन्हीं के चलते केदारनाथ सिंह जी से कई-कई बार मुलाक़ात हुई, उन्हें पढ़ा और जब-जब उनकी तस्वीर सामने आई तो वही अहसास हुआ जैसे मेरे दादाजी को देखकर हुआ करता था. वही स्नेहिल मुस्कान और नरम-मुलायम सा दिल. यहाँ यह भी स्वीकार करती हूँ कि मैंने उन्हें उतना और इस हद तक कभी नहीं पढ़ सका था जितना कल रात से अब तक. मैं सो ही न सकी. मन बेहद भारी है उनके शब्द इन हवाओं में कहीं आसपास उड़ रहे हैं जैसे और यूँ लगता है -
*"झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,
दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की"

तुम ही कहो, क्यों चले गए अब? जानते थे न
*"कि जाना/ हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है."
मैं नए कवि के दुख को ओढ़े इस सोच में बैठी हूँ -
*"क्या जीवन इसी तरह बीतेगा/ शब्दों से शब्दों तक जीने /और जीने और जीने ‌‌और जीने के /लगातार द्वन्द में?

*कितनी लाख चीख़ों /कितने करोड़ विलापों-चीत्कारों के बाद /किसी आँख से टपकी / एक बूंद को नाम मिला- आँसू /कौन बताएगा /बूंद से आँसू / कितना भारी है?

*उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते
हे, विधाता! बस करो....इन पत्तों को अब हरा भी रहने दो!
- प्रीति 'अज्ञात'
*केदारनाथ सिंह

रविवार, 18 मार्च 2018

सौदामिनी...

किसी को किसी से कुछ भी नहीं चाहिए होता है. हर रिश्ता केवल मुट्ठी भर समय की मांग करता है. उसका टिकना, बनना, टूटना, बिखरना इस एक बात पर ही टिका है. कोई तो हो, जो कहे.....कोई तो हो, जो सुने! अपने और पराये के बीच की दूरी इसी समय के दोराहे से होकर गुजरती है. कोई दुःख में काँधे पर हाथ भर रख दे, तो आँसुओं को कैसा सहारा मिल जाता है और जो कभी मुस्कान को उसका जोड़ीदार मिल जाए तो फ़िर उसे खिलखिलाहट में बदलते पल भर की भी देर नहीं लगती. बस ये पाषाण चुप्पियाँ ही हैं जो इंसान को भीतर-ही-भीतर लीलने लगती हैं. धीरे-धीरे गहराई बढ़ती है और गड़प की ध्वनि के साथ अचानक खेल ख़त्म! अब मातम मनाइये या उम्र भर का अफ़सोस कीजिए ....बदले में यही चुप्पी ही हाथ आएगी. दिल सर पटकेगा और एक ही बात दोहराएगा....काश! काश! काश!
लेकिन इस काश! को समझने का समय भी किसके पास होता है? कब होता है?
तक़लीफ़ यह है कि उसे अब भी ज़िंदग़ी से ग़ज़ब का इश्क़ है. 
ख़ामोशियों से चीखती आवाज़ें और सौदामिनी देखें...आख़िर कब तक टिकते हैं!
'सौदामिनी....एक अधूरी कहानी' शनैः शनैः समाप्ति की ओर
- © प्रीति 'अज्ञात'

बुधवार, 14 मार्च 2018

स्त्री और पुरुष

पुरुष होने के भी अपने फ़ायदे हैं. जब भी दिल करे आप जब चाहें, जहाँ चाहें, बे-रोकटोक आ-जा सकते हैं. आपके आने-जाने, सुरक्षा-संबंधी फ़िक्र करने और बेतुके प्रश्न पूछने वाला कोई नहीं होता. 
ऐसा नहीं कि स्त्रियाँ घर से निकलती नहीं पर उस समय भी उन्हें बहुत कुछ manage करके जाना पड़ता है और आने के बाद भी वही प्रक्रिया दोहरानी होती है. मसलन पति, बच्चे, सास-ससुर कोई भी बाहर जाए तो वही है जो सभी घरेलू कार्यों के साथ-साथ सबका खाना पैक करके देगी, हर वस्तु का ख्याल रखेगी और किसी मशीन की तरह धडाधड लगी रहेगी. दिक्कत यह है कि जब वो बाहर जाए तब भी उसे यही सब करके जाना होता है. वो कहीं भी चली जाए, बार-बार फ़ोन करके निश्चिन्त होना चाहती है कि उसके पीछे सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं! दुःख यह है कि घर में घुसते ही उसे पानी की पूछने वाला भी कोई नहीं होता, चाहे कितनी ही लम्बी/छोटी, थकान/परेशानी भरी  यात्रा हो...घर में घुसते ही सब यूँ फरमाइशें करते हैं, गोया अभी पांच मिनट पहले ही बगीचे से टहल घर में घुसी हो!
कुछेक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो कहीं कम; कहीं और भी ज्यादा पर कुल मिलाकर आम भारतीय स्त्री की यही कहानी है. पर मैं इसका दोष घरवालों से कहीं अधिक स्वयं स्त्रियों को ही देती हूँ क्योंकि -
* हमने ही अपने मन को इस चारदीवारी से इस क़दर बाँध रखा है और  इस भरम में जीने लगे हैं कि हमारी अनुपस्थिति में ये सब असहाय हो जाते हैं. बेचारों को चाय भी बनानी नहीं आती, बाहर का खाने की आदत नहीं इत्यादि, इत्यादि. जबकि सब ख़ूब मस्त रहते हैं और हमारे घर में प्रवेश करते ही पुराने फॉर्म में लौट आते हैं.
*हमें अपने-आप पर आवश्यकता से अधिक गर्व है और अपने perfectionist होने का अहसास भी भरपूर हिलोरें मारता है. इसलिए हम यह भरोसा कर ही नहीं पाते कि हमारे बिना सब ठीक रहेगा.
*हमने इसे अपना कर्त्तव्य मानकर पूरी तरह ओढ़ लिया है, इतना कि अपने लिए जीना ही भूल चुके हैं. हमें त्याग और बलिदान की मूर्ति बनना ही भाता रहा है. फिर उसके बाद अपने दुखड़े रोना भी नहीं भूलते कि शादी न की होती तो मैं ये कर सकती थी, वो कर सकती थी. मज़ेदार बात ये है कि जिन सदस्यों को हम अड़चन समझ कोसते रहे हैं, उनके बिना न तो रह सकते हैं और न ही कहीं कोई ठौर है.
*हम बड़े डरपोक क़िस्म के जीव हैं और आजकल के हालातों में कहीं आने-जाने में हमारे ही पसीने छूट जाते हैं और हम पुरुष का साथ चाहते हैं. जबकि पुरुषों ने भी कोई मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग नहीं ली हुई होती है, न ही उनकी चमड़ी बुलेट प्रूफ है. गोली लगने या लूटपाट होने पर उनको भी वही दर्द होगा जिससे हम हाहाकार मचाते हैं. 'मर्द को दर्द नहीं होता' वाली कहावत कितनी ही हिट हो गई हो पर सच यह है कि 'मर्द को भी ख़ूब ज़बर दर्द होता है, बस इस डायलाग के बोझ तले दब वो बेचारा कह ही न पाया कभी! पर फिर ये क्या है कि उनका साथ हममें साहस भर देता है, सुरक्षित होने का अहसास कराता है? कहीं ये इश्क़ वाला लव तो नहीं!
जो भी है, स्त्री होना बहुत अच्छा भी लगता है और नहीं भी...ये सोच भी बड़ी situational चीज है. जब देखो, नेताओं की तरह पाला बदल लेती है.

वैसे कई फ़ायदों के बावजूद भी पुरुष होने की कई दिक्कतें हैं -
* बचपन से ही अच्छी नौकरी पाने की टेंशन वरना घरवालों को चिंता कि इस नाकारा से कौन ब्याह रचाएगा।
* नौकरी मिल गई तो सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने की जी-तोड़ कोशिश. यद्यपि यह हमेशा नाकाम ही होती पाई गई है.
* घर-परिवार, बॉस-नौकरी में सामंजस्य बिठाने की कोशिश उसे चकरघिन्नी बना डालती है. उस पर भी किसी-न-किसी का मुँह फूला हुआ मिलना तय है. 
*छुट्टियों की मारामारी से जूझता यह प्राणी अपने सारे शौक़ भूल चूका होता है और उसका पूरा जीवन घर-बच्चों को खुश करने में बीतता चला जाता है, हालांकि सब अंत तक असंतुष्ट ही बने रहते हैं.
*वो जो शादी से पहले एक गिलास पानी तक भी न लेता था, आज बोतलों में पानी भर फ्रिज़ में रखना सीख गया है.
*अपना जन्मदिन भले ही भूल जाए पर बाक़ी सबकी तिथियाँ रटनी पड़ती हैं उसे.
* कहाँ दस हजार में भी अकेले ठाट से रहता था अब लाखों भी जैसे नित कोई अज़गर निगल लेता है.
*कितनी भी थकान हो, pick & drop करने की ड्यूटी तो उसी की लकीरों में रच दी गई है.
*उसके जीने का एकमात्र उद्देश्य अपने परिवार का भरण-पोषण है और उसके बाद के लिए भी वह जुटाकर रखने की लाख कोशिशें करता है.
*और हाँ, इन्हें भी मशीन समझा जाता है. कौन सी? ATM ...
हाय ख़र्चा कर-करके हम लोग इनका जीना मुहाल कर देते हैं.

कृपया विचार कीजिए, कहीं ऐसा तो नहीं कि विवाह ही हर समस्या की जड़ है?
आदर्शवाद से परे आप क्या कहते हैं?
#भारतीय समाज की दुखी आत्माएँ
MORAL: इतना टेंशन भी ठीक नहीं! कभी हँस भी लिया करो! 
- प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

दीवाना किसे बनाएगी ये लड़की!

आज सुबह से ही मैं श्रीदेवी के असमय निधन से स्तब्ध हूँ. सोशल मीडिया उनकी ख़बरों से पटा पड़ा है. बहुत कुछ है जो कहा गया, बहुत कुछ कहना शेष भी रह गया. बहुत कुछ है जो मैं भी कहना चाहती हूँ पर क्या चंद शब्दों में किसी ऐसे व्यक्तित्व की चर्चा संभव है जिसने अपना फ़िल्मी सफ़र लगभग तब ही प्रारम्भ किया हो, जब हम और आप किशोरावस्था के उस दौर से गुज़र रहे थे; जहाँ ख़्वाबों की दहलीज़ पर क़दम बस पड़ने को ही थे! नहीं, बिलकुल भी आसान नहीं होता है उस शख़्स से जुड़ी सारी स्मृतियों को एक ही पल में एकत्रित कर पाना. यादें तो उन नन्हे पर मज़बूत तिनकों की तरह हैं जिन्हें लम्हा-लम्हा जोड़ किसी सशक्त घोंसले का निर्माण होता है. अब उन्हीं नाज़ुक तिनकों को एक-एक कर गिनने का समय आ गया हो जैसे! पर मैं यह भी क्यों स्वीकार कर लूँ कि श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं रहीं!
समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं इस हद तक बेचैन क्यों हूँ? आख़िर मेरा उनसे रिश्ता ही क्या था? वो तो मुझे जानती तक न होंगीं! तो फिर ये क्या है जो मेरी आँखों को नम किये जाता है? क्यों मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मैंनें किसी बेहद अपने को खो दिया हो!

आह! भावनाएँ जब उफ़ान पर होती हैं तब बहुधा उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव-सा क्यों महसूस होता है? ये जो दिल है, भीतर-ही-भीतर इस तरह चुपचाप आँसू क्यों बहाता है? और भाव हैं कि कागज़ों पर उतरने से साफ़ इंकार कर देते हैं. ऐसे समय में चुप होकर स्वयं को समेट लेने की मैं भरसक कोशिशें कर रही हूँ. अब जबकि इस ख़बर को मुझ तक पहुँचे हुए लगभग बारह घंटे बीतने को हैं, मैं स्वयं और मुझ जैसे कईयों को उत्तर दे पाने में स्वयं को थोड़ा समर्थ महसूस कर रही हूँ.

दरअसल हम सब बड़े मतलबी लोग हैं. हम उन्हीं से जुड़ जाते हैं जिन्होंने हमारे सपनों को हवा दी हो! हमारे दिलों में मोहब्बत की शमा रोशन की हो! इश्क़ की गुदगुदाहट से हमें लबरेज़ कर दिया हो! जीतू जी और श्री की शुरूआती फिल्मों ने किशोर मन की इन्हीं सीढ़ियों पर ही अपना हाथ थामा था!
चुलबुली, शोख़ अदाएँ हमें हमेशा ही लुभाती रही हैं और उस पर शैतानियों का मुलम्मा चढ़ जाए, तो कहना ही क्या! 'चालबाज़' ने हमारे इन्हीं अरमानों में ही तो इंद्रधनुषी रंग भरे थे!
भोले मासूम नयन और भावुक मन, जो कभी बात समझता है तो कभी क़तई सुनना तक नहीं चाहता, 'लम्हे' इन्हीं ख़ूबसूरत लम्हों की ही तो बयानगी है!
संवेदनशीलता, भाव-प्रवणता और भावुकता भरे ह्रदय वाली स्त्री जो समझदार हो, सबकी परवाह करे, नृत्य, पाक कला में भी पारंगत हो और अपनी खिलखिलाहट से घर गुंजायमान कर दे; 'चाँदनी' ने इसी उम्मीद की चमक घर-घर में बिखेर दी थी.
मिस्टर इंडिया की वो जर्नलिस्ट जो बच्चों के नाम तक से चिढ़ती थी, जब उन्हें गले लगाती है तो देश के बच्चे-बच्चे की दीदी बन जाती है और वही जब 'काटे नहीं कटते ये दिन और रात' पर थिरकती है तो लाखों युवाओं की धड़कनें यक़ायक़ जैसे थम सी जाती हैं.
कौन भूल सकता है, 'सदमा' के उस मासूम चेहरे को; जिसने हॉल को हिचकियों से भर दिया था!
हर लेडीज संगीत कार्यक्रम, नगीना के 'मैं नागिन तू सपेरा' के बिना अधूरा है और चाँदनी के 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियाँ हैं' पर नृत्य किये बिना कोई दुल्हन घर से विदा नहीं होती. ये चुहलबाज़ियाँ ही तो जीवन के उदास क्षणों भरे अल्बम में हँसी की जगमग तस्वीर उकेरती हैं.  

वो चेहरा जिसकी हँसी अपनी-सी लगे, जिसका दुःख हमको भी तोड़ दे, जिसकी शैतानियों पर हमारा दिल भी बच्चा बन जाए, जिसकी मासूमियत हर उम्र का मन मोह ले, जिसके इश्क़ का अंदाज़ पत्थरों को भी पिघलाने का माद्दा रखता हो, 'ख़ुदा ग़वाह' हो जिसका ......वह शख़्स कभी ग़ैर नहीं होता, वो हमारे-आपके जीवन का एक हिस्सा बन जाता है, उम्र के हर दौर में उसका चेहरा, उसके गीत हमारे साथ चलते हैं. उसकी फ़िल्में सदैव हमारे साथ रहती हैं, जिनमें उसकी मुस्कान बदलती नहीं! ऐसे शख़्स दुनिया छोड़ जाने के बाद भी हमारे साथ रहते हैं इंग्लिश-विंग्लिश बोलती, आत्मविश्वासी, स्नेहिल, प्रेरणामयी किसी MOM की तरह!

क़िरदार को जीना किसे कहते हैं, यह कोई श्रीदेवी से सीखे. लाखों दिलों को धड़काने वाली इस अदाकारा के दिल ने धड़कने से मुँह क्यों फेर लिया, यह बात समझ के बाहर है. 'खनन-खन चूड़ियाँ खनक गई' कहकर इतराने वाली वो मोरनी न जाने कहाँ चली गई! पर इतना तय है कि ये लम्हे, ये मौसम हम वर्षों याद करेंगे...ये मौसम चले गये तो हम फरियाद करेंगे! लेकिन हम ये भी जानते हैं कि ईश्वर की इस तानाशाही से बस नाराज़ हुआ जा सकता है, सिर पटका जा सकता है पर वहाँ अब कोई फ़रियाद की सुनवाई होती ही नहीं! सारी याचिकाएँ यूँ ही खारिज़ होती चली जाती हैं.

न जाने कहाँ से आई थी / न जाने कहाँ गई अब / दीवाना किसे बनाएगी ये लड़की!
बड़ी छोटी थी मुलाक़ात/ बड़े अफ़सोस की है बात / किसी के हाथ न आएगी ये लड़की.....!
बेहद मलाल है इस लड़की की दूसरी पारी न देख पाने का...पर यही नियति है शायद, मेरी, आपकी, हम सबकी!
अश्रुपूरित विदा, मिस हवा हवाई! पद्मश्री, श्रीदेवी जाओ, अपनी चाँदनी की चमक से उस जहां को भी रौशन कर दो! सितारों के आगे जहां और भी हैं!
- प्रीति 'अज्ञात'
#श्रीदेवी #Sridevi

दुर्भाग्य! उनकी मृत्यु की ख़बर, अफ़वाह नहीं है

सुबह 5.30 के अलार्म के साथ नींद खुलती है. आदतन वाईफाई ऑन करती हूँ तभी एक मित्र का मैसेज दिखाई देता है, लिंक है कोई. वो सुप्रभात वाली मित्र नहीं है इसलिए तुरंत ही उस लिंक पर क्लिक करती हूँ और हैडलाइन दिखाई देती है....Sridevi passes away. Sylvester Stallone की मृत्यु की अफ़वाह को अभी ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है. मैं यही सोच रही थी कि "अभी थोड़ी देर में इस ख़बर का भी खंडन आ ही जायेगा" अपनी दिनचर्या की ओर रुख़ करती हूँ.

टहलते समय जब मेरी मित्र इसी ख़बर की पुष्टि करती है तो ह्रदय भावुक हो कितनी कहानियाँ उधेड़ने बैठ जाता है. घर पहुँचते ही घरेलू कार्यों को निपटाकर, चाय का कप साथ लिए बैठी हूँ अभी....कि 'चाँदनी' की तस्वीर उभरती है. यह किशोरावस्था के दिनों में देखी गई फ़िल्म है तो ज़ाहिर है इसका असर गहरा ही रहा होगा. फ़िल्म तो 1989 में रिलीज़ हुई थी पर मैंने इसे 1990 में इंदौर में अपनी बुआजी के घर भाई-बहिनों के साथ देखा था. इस शानदार फ़िल्म के गीतों ने भी अपना जादू बिखेर रखा था लेकिन इसका यह गाना 'रंग भरे बादल से, तेरे नैनों के काज़ल से....मैंने इस दिल पर लिख दिया तेरा नाम....चाँदनी' में न जाने ऐसा क्या था कि हम सब पगला ही गए थे.

न जाने कितनी बार रिवाइंड कर-करके देखा. ये गीत का ही नहीं, उस अदाकारा का भी जादू था कि अपनी खनकती हुई आवाज़ में जब वो कहती थीं "कितनी मस्ती करता है, मेरे शोना, शोना, शोना" तो एक दीवानगी सी छा जाती थी. ख़ूबसूरती और नज़ाकत के साथ-साथ उनके गहन संवेदनशील अभिनय ने रातों-रात उनके लाखों प्रशंसक खड़े कर दिए थे. यद्यपि 'सदमा' में भी उनकी गहन अभिनय प्रतिभा की झलक देखने को मिली थी पर दुर्भाग्य से यह फ़िल्म उतनी व्यावसायिक सफ़लता नहीं पा सकी थी जिसकी हक़दार थी.

'चाँदनी' से पहले श्रीदेवी 'नगीना' में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी थीं एवं 'मिस्टर इंडिया', 'चालबाज़' में उनकी कॉमिक टाइमिंग के सब ज़बरदस्त फैन हो चुके थे. यह जीतू जी के साथ उनकी कई फ़िल्मों के बाद का समय था जब वो एक उत्कृष्ट नृत्यांगना के साथ-साथ बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में भी बॉलीवुड में पूरी तरह छा चुकीं थीं. 'लम्हे' को काफ़ी सराहना मिली तो आलोचना भी हुई. इसकी कहानी भारतीय दर्शकों के गले भले ही नहीं उतर सकी हो पर यह उनकी भावप्रवण आँखों का ग़ज़ब का सम्मोहन ही था कि वे सबके दिलों में गहरी उतरती चली गईं.

'श्रीदेवी'..परिचय के लिए बस ये नाम ही काफ़ी था. वे अब नंबर वन बन चुकी थीं. विवाह, मातृत्व, पारिवारिक दायित्व प्रत्येक स्त्री के कैरियर में एक ठहराव ला ही देते हैं. संभवत: यही उनके साथ भी हुआ. लेकिन 2012 में 'इंग्लिश-विंग्लिश' के साथ उनके कमबैक ने इस वर्तमान पीढ़ी को भी उनका मुरीद बना दिया जो श्रीदेवी युग से वंचित रह गए थे. इस फ़िल्म ने लाखों भारतीय स्त्रियों की संवेदनाओं को छुआ और उन्हें गहरे आत्मविश्वास से भरने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. उनके हौसलों में एक नई उड़ान भर दी. 2017 में आई 'मॉम' में उनकी भूमिका आज के समाज की जीती-जागती तस्वीर बनकर उभरी जहाँ वे एक बलात्कार पीड़िता की माँ और उसके हमारी इस लचर न्याय-व्यवस्था से संघर्ष की कहानी को कहती नज़र आईं. बेहद उम्दा अभिनय के साथ अब वे अपनी दूसरी पारी खेलने को तैयार थीं. इंतज़ार था हमें इस परिपक्व अभिनेत्री की आने वाली कई फ़िल्मों का... पर दुर्भाग्य! उनकी मृत्यु की ख़बर, अफ़वाह नहीं है.

एक गहरी साँस के साथ मैं इन यादों को विराम देती हूँ. चाय का कप ठंडा हो चुका है.....

तुम्हें विदा, पद्मश्री श्रीदेवी
- प्रीति 'अज्ञात' 
#iChowk में प्रकाशित 
https://www.ichowk.in/cinema/sridevi-passes-away-in-the-age-of-55-obituary-for-her/story/1/10000.html

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

भाषा, संवाद का जरिया है अहसासों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है. हम किसी भी माध्यम में पढ़ें हों, पर जहाँ बचपन गुजरा वहाँ की भाषा से लगाव हो जाना स्वाभाविक है. फिर हम कितने भी साब-मेमसाब बन जाएँ लेकिन जब भी उस भाषा को बोलने का अवसर मिले; चूकते नहीं! आंचलिक शब्दों की मिठास ही अलग होती है, इसे अपनी माटी से मोह भी समझा जा सकता है.
आजकल प्रादेशिक भाषाओं के प्रचार पर बहुत जोर दिया जा रहा है. अच्छी बात है, बस इसका उद्देश्य अपनी भाषा को सर्वश्रेष्ठ एवं अन्य को कमजोर सिद्ध करने से कहीं ज्यादा उसके संरक्षण में होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह केवल इतिहास के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए. प्रत्येक भाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसका बोला एवं लिखा जाना एक अनिवार्य तत्त्व है. अपनी भाषा को बोलने में संकोच कैसा!
भाषा जोड़ने का काम करती है और सृजन में कोई भी कमतर-बेहतर नहीं होता! सबकी अपनी-अपनी सुंदरता, मधुरता है तथा स्थान के अनुसार प्रत्येक की उपयोगिता भी होती ही है. हम मित्रों के साथ जिस सहजता,अपनेपन और अनौपचारिक ढंग से बात करते हैं वहाँ तू, तेरा जैसे शब्द भी कितने प्रेम भरे लगते हैं वहीं कार्यस्थल में बात करने की एक अलग ही प्रशिक्षित शैली होती है. अति-संभ्रांत वर्ग में तमाम औपचारिकताओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओँ का छौंक लगाना सभ्यता का मानक समझा जाने लगा है. वहीं किसी बड़े mall के सेल्समेन से बात करते समय और ठेलेवाले से सब्जी लेते समय हमारी भाषा में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. इंसान हम वही हैं बस स्थानानुसार, सबकी सहूलियत के आधार पर ज़बान बदल लेते हैं. 
मंत्र यही है कि भाषा कोई भी हो, इसको बोलने का तरीक़ा ही सब कुछ तय करता है. भाषा के साथ-साथ उचित शब्दों का चयन ही बात बनाता और बिगाड़ता है. 
माध्यम कोई भी हो इससे अंतर नहीं पड़ता, महत्त्वपूर्ण यह है कि मानसिकता सही रहे...स्नेह-भाव जीवित रहे! और क्या!
हर भाषा का अपना मज़ा है, सबको अपने बच्चों जैसा प्यार करना चाहिए. मेरा बस चले तो सब सीख लूँ. :) 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

इतिहास हमेशा ख़ुद को दोहराता है

बाल्यकाल से ही हम गाने सुनने के बहुत शौक़ीन रहे हैं. इतना मन लगाकर सुनते थे कि गीतों के बोल भी एकदम सही याद रहते थे. गायिका तो सपने में भी नहीं हैं पर कोई गलत बोल या उच्चारण के साथ गा रहा हो तो हम भीतर तक ज़बरदस्त आहत हो जाते हैं. पर फ़तवे के कारण चुप्प रहना पड़ता है जी! हमको क्या....गाओ गलत! श्राप लगेगा तुमको क्योंकि तुम्हारी आने वाली पीढ़ियाँ भी यही दोहरायेंगीं. बस और क्या!

हम तो सुरैया, तलत महमूद, शमशाद बेग़म, गीता दत्त, मुकेश, रफ़ी, किशोर, सोनू निगम तक चलकर अरिजीत पर ठिठके और अब फ़िलहाल पुरानी तरफ़ ही लौट रहे हैं. वैसे मूड के हिसाब से दलेर मेहंदी और मीका को सुनने में भी ख़ूब मज़ा आता है. पर एक बात full & final है कि अगर जगजीत सिंह नहीं होते तो फिर हमारा इस पावन धरा पर अवतरण और इन कर्णों की उपस्थिति व्यर्थ ही थी. यद्यपि चश्मा इन पर ही टिका है.

अपना अंग्रेज़ी गानों के साथ ठीक वही नाता है जो इस देश में सरकार और न्याय-व्यवस्था का रहा है। भैया, कोशिश तो बहुत करते हैं पर हो नहीं पाता!
ये गाने जरा कम समझ आते हैं, सो जिसे महसूस ही न कर सको तो सुनने का क्या फ़ायदा! पूरे समय दिमाग़ गूगल की तरह घटिया ट्रांसलेट करके देता है. सच, गूगल जी, बुरा मत मानियो पर आपके अजीबोग़रीब अनुवाद हमें अत्यधिक दुःख देते हैं. भय है, कहीं इस वज़ह से हम तीव्र मस्तिष्क विस्फ़ोट के शिकार न हो जाएँ! इसलिए ऐसा करो, हमको तत्काल जॉब पे रख लो. 
हाँ, Titanic का Theme song (My Heart Will Go On) बेहद पसंद है और मुझे लगता है कि ये आंग्ल भाषा का अब तक का सबसे प्यारा रोमांटिक गीत है. यहाँ यह बात बताना भी आवश्यक है कि यही वह इकलौता अंग्रेज़ी गीत है जिसके बोल हमें पहली बार में ही समझ आ गए थे. लगता है इसकी रचना हिन्दी माध्यम में पढ़े लोगों को ध्यान में रखकर की गई होगी. बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें ख़ुश करने के चक्कर में Lion King का Hakuna Matata, Aqua का Barbie Girl और Shakira का Waka Waka (This Time for Africa) इतना सुना कि फिर बाद में beats के साथ अपने-आप ही मुंडी हिलने लगती थी. अच्छा हुआ, जुरासिक पार्क में कोई गीत नहीं था, वरना उस पर झूमती खोपड़ी कुछ यूँ लगती जैसे कि अपने प्राणप्रिय देश में आत्मा/ देवी माँ के प्रवेश करने पर भयावह रंगारंग नृत्य एवं संगीत कार्यक्रम हुआ करते हैं. मुझे डरपोक बनाने में इन भुतहा ध्वनियों का सम्पूर्ण एवं अभूतपूर्व योगदान रहा है. वो कहानियाँ फिर कभी..... 

अब ये बताओ कि बचपन में समाचार इतने बुरे और नीरस क्यों लगते हैं? मुए तीनों टाइम चलते थे. वो 'जल बिन मछली' की तरह भीषण तड़पन का समय होता था, हम अपना दायाँ हाथ प्यारे मरफ़ी के कान के पास रख इतराते हुए पूछते, "पापा, स्टेशन बदल दें?" पापा जैसे ही कहते, "रुको ..हैडलाइन सुनने दो" ...क़सम से उस पल ऐसा लगता कि दो मिनट और सुना तो अभी आकस्मिक हृदयाघात से मौत आ जाएगी! भौंहे ऊपर चढ़ा जो अथाह वेदना भरा दुखियारा लुक देते थे वो एक दिन न्यूज़ सुनते समय जब हमारे बच्चों ने हमें return gift में दिया तो दरद समझ आया. 
MORAL: इतिहास हमेशा ख़ुद को दोहराता है. गया लुक लौट के आता ही आता है. 
* कई बार अपठित गद्यांश को पूरा पढ़ने की जरुरत नहीं होती. कथा का संदेश अंतिम पंक्तियों में ही मिल जाता है. हीहीही
समाचार समाप्त हुए!  
- प्रीति 'अज्ञात'

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ये आकाशवाणी है!

ये आकाशवाणी है! (विश्व रेडियो दिवस पर)

सोशल मीडिया का यह लाभ तो अवश्य हुआ है कि जिन तिथियों की तनिक भी जानकारी नहीं होती थी अब उनके बारे में सुलभता से ख़ूब ज्ञान मिल जाता है. वरना कितनों को मालूम था कि आज 'विश्व रेडियो दिवस' है. वे सभी लोग जिनका जन्म नब्बे के दशक से पहले हुआ है, तय है कि उनका और रेडियो का रिश्ता यक़ीनन बना ही होगा.

उन दिनों रेडियो की भी अपनी एक निश्चित दिनचर्या होती थी. सुबह, दोपहर, शाम के समाचार, गाने, नाटिका, किसान और फौजी भाइयों के लिए, सखियों, युवाओं, बच्चों सबके लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आते थे. वार्ता, साक्षात्कार प्रसारित होते थे. चिट्ठियाँ पढ़ी जातीं थीं. प्रादेशिक केन्द्रों के साथ घर-घर में विविध भारती बेहद लोकप्रिय हुआ करता था. उन दिनों की एक मज़ेदार बात है कि तब गूगल तो था नहीं और हम जैसे लोग जब ऊटकमंड से सीमा, बबलू, गोलू, मनोज और उनके मम्मी-पापा, झुमरीतलैया से रामप्रसाद,गेंदाबाई, इस्माइल ख़ान, जावेद अली और उनके परिवार के सभी सदस्य, गंजडुंडवारा से रेखा, अनीता, पिंकी और उनकी सारी सखियाँ....सुनते तो ये मानकर ही चलते थे कि ऐसे नामों वाली जगह असल में हैं ही नहीं और ये लोग हमें उल्लू बना रहे हैं.  खैर,अब पता चल गया कि वो मज़ाक नहीं करते थे, ये स्थान तो हैं और अपने देश में हीं! उस बात के लिए कान पकड़ के सॉरी है जी!

तब विश्वसनीयता के लिए बीबीसी पर आँख मूँदकर भरोसा किया जाता था. मुझे याद है, इंदिरा गाँधी की हत्या के समय किसी को इस दुखद समाचार पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था. जब बीबीसी पर इसकी पुष्टि हुई तो देश भर में शोक की लहर दौड़ गई. यही वो समय भी था, जब दूरदर्शन का मध्यम वर्ग के घरों में प्रवेश प्रारंभ हुआ था.

रेडियो ने जैसे लोगों को जोड़ रखा था. अमीन सयानी जी की बिनाका (बाद में सिबाका) गीतमाला के समय तो सब यूँ इकट्ठे होकर सुनते जैसे कि पहली पायदान वाली फिल्म के निर्माता-निर्देशक वही हों. शर्तें लगतीं और बाद में इतराया जाता, "देखो, मैनें बोला था न, पहली पायदान वाला गीत! तुम्हारा वाला तो तीसरी पायदान पर ख़िसक गया. टिलीलिलि." और वो बंदा इसी बात पर या तो लड़ बैठता या खिसियाकर खिसक लेता. ख़ूब मस्ती-शैतानियाँ होती थीं.
क्रिकेट और रेडियो का नशा भी अपने चरम पर था. मैच के समय हर घर से कमेन्ट्री की आवाजें आतीं, बाज़ार जाते तो दुकानदार भी रेडियो/ ट्रांजिस्टर से ही कान टिकाये मिलता. अगर आखिरी ओवर हुआ तो 'सामान गया तेल लेने', सब दम साधे सुनते और 'ये लगा सिक्सर' सुनते ही यूँ नाचते जैसे उनके बच्चे ने परीक्षा में टॉप किया हो! क्या गाँव, क्या शहर...सबको एकसूत्र में बाँधकर रखता था रेडियो.

एक समय वह भी आया जब टीवी के घर-घर में पहुँचने के बाद रेडियो चुपचाप रहने लगा. दृश्य और श्रव्य माध्यम को अब ज्यादा महत्ता मिलने लगी थी और रेडियो के दिन बीतने की ख़बरें भी अपनी जगह बना रहीं थीं. पर कहते हैं न कि 'समय के साथ चलने में ही समझदारी है'. रेडियो ने भी यही किया. एफएम रेडियो ने पुनः नई ऊँचाइयों को छुआ और एक बार फिर सबके दिलों में जगह बना ली. इसकी पहुँच और महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी अपने 'मन की बात' पहुँचाने के लिए यही माध्यम चुना!
रेडियो की जय हो!
- प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

सुनो, लड़कियों...क्रांति का उद्घोष करो!

डिस्क्लेमर - इस पोस्ट को बीयर प्रेमियों से किसी प्रकार का कोई बैर न समझा जाए. 
जब किसी को लड़कियों के बीयर पीने से डर लगता है तो मुझे भी यक़ायक़ बड़े जोरों से हँसने की तलब हो उठती है. फिर याद आता है कि उफ़ ये तो चरित्रहीन होने की उम्दा निशानी है. अत: मैं अपनी मुस्कान वाली माँसपेशियों को दो सेंटीमीटर से अधिक बाहर नहीं जाने देती और एक मृदु मुस्कान को हमेशा टिकाये रखती हूँ. वो क्या है न कि पुरुषों का जाहिल, हिंसक, अभद्र, अश्लील, विकृत और घिनौना रूप समाज में बड़ी सहजता से स्वीकार्य है और इसमें संतुलन स्थापित करने के लिए हमें संस्कारी, शांतिप्रिय, सभ्य, उत्तम विचार युक्त, सुंदर, सुशील छवि स्थापित करनी ही पड़ती है. इसके लिए हमें एयर इंडिया की होस्टेस की तरह सदैव स्वागत को आतुर नमस्कार मुद्रा में खड़े होने का प्रशिक्षण जन्म से ही प्राप्त है. आप अत्याचार करें, हम सहेंगे.
आपराधिक मानसिकता से परिपूर्ण पुरुषों (कु) में किसी स्त्री को थप्पड़ देने के एवज़ में थप्पड़ खाने की कला अभी तक विकसित नहीं हो सकी है. इसे सभ्य भाषा में 'पुरुषार्थ पर प्रहार' भी कहा जाता है. हाय, विकासशील देशों का यह कैसा दुर्भाग्य! जैसा कि ज्ञात ही है कि इस सभ्य, सुसंस्कृत समाज में पवित्रता की धारा बहाने और चरित्रता की मिसालें क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल स्त्रियों के कंधे पर है. सो, डरने की बात तो है, भैये! 

अब इसे मेरा मादक द्रव्य पदार्थों को समर्थन क़तई नहीं समझा जाए. विद्यार्थी जीवन में स्कूल से घर लौटने का जो शॉर्टकट था न, वहाँ एक 'देसी शराब का ठेका' पड़ता था. भीषण दुर्गन्ध के कारण साँस रोक निकलना होता था (रामदेव जी ने तो अब सिखाया पर प्राणायाम तो हमारा बाल्यकाल से ही प्रारम्भ हो गया था). डाकुओं के इलाके में रहने के कारण भय नामक तत्त्व भी कूट-कूटकर भरा था. तो अपन जैसे ही किसी लाल-लाल आँखों वाले को देखते, तुरंत ही सरपट भाग लिया करते. वैसे मूलत: इन शराबियों की वहीं एक गंदे नाले के पास गिर जाने की प्रथा भी उन दिनों अपने चरम पर थी. तो साब, नफ़रत का आलम तो समझ ही जाइए. 

वो तो भला हो प्रकाश मेहरा और लम्बू जी का, कि 'शराबी' फिल्म के बाद हमें इस क़ौम से सहानुभूति होने लगी और इस बात पर लगभग विश्वास ही हो गया कि 'दर्द की यही दवा है'. 'मुझे पीने का शौक़ नहीं, पीती हूँ ग़म भुलाने को' गाने ने भी हमारी इस सोच की पुष्टि की. कुछ फिल्मों ने यह भी ज्ञान दिया कि प्रेमी अपने सच्चे प्रेम की पुष्टि अक़्सर नशे की अवस्था में ही ईमानदारी से कर पाते हैं. पर इसके समर्थन में हम तब भी खड़े न हुए क्योंकि हमें पता था कि 'शराब, पीने से लिवर ख़राब हो जाता है'. 

हमारी सामाजिक व्यवस्था की क्यूटनेस इसी बात से मेन्टेन रहती है कि धर्म, जाति के नाम पर ही नहीं बल्कि लिंग आधार पर भी भेदभाव को उचित विस्तार दिया गया है. तात्पर्य यह है कि जो कार्य पुरुषों के लिए उचित, वही स्त्रियों के लिए सर्वथा अनुचित माने गए हैं. यथा- एल्कोहल सेवन, धूम्रपान, वेश्यावृत्ति, बीच सड़क खड़े हो कर गपशप, गालियों का धुँआधार प्रयोग, लड़ाई-मारकाट इत्यादि. यद्यपि इसमें गालियों के बीच महिलाओं को यथोचित स्थान देने का प्रयास किया जाता रहा है. 
परिस्थितियों के अनुसार ग़लत-सही की परिभाषाएँ परिवर्तित होती रहती हैं. हर आनी-जानी सरकार डिनर मीटिंग में एक कनस्तर एल्कोहल पीने के बाद आपको सूचित करती है कि "यह बुरी वस्तु है लेकिन हम बिकवाएँगे. आप बस ख़रीदियो मत! ख़रीद ल्यो तो घरवाली को मत बतइयो और जो लत पड़ जाए तो नक्को चिंता! सुधार-गृह का ठेका अपने पैचान वाले का ही है. हेहे, उसके भी घर में चार पैसे आएँगे".
जब सब पीने का ठेका तुमरा ही है साहेब जी, तो पिलीज़ एक काम करो, जरा ज़हर पीकर बताओ न! सच्ची हम बिल्कुलै try नहीं करेंगे.

मज़ाक बहुत हुआ पर मुझे सचमुच उस दिन की प्रतीक्षा है जब तुम (बुरे पुरुष) स्त्रियों का नाम सुन थर-थर कांपने लगो. 
किसी घर के बेसमेंट में खुद के लुट जाने के भय से छुप जाओ. 
रात को बाहर चार दोस्तों के साथ ही निकलो कि कहीं कोई लड़की  अकेले देख तुम्हारा फायदा न उठा ले. 
तुम अकेले सफर करने से घबराओ और ट्रेन में पुरुष डिब्बे की मांग करो. 
वो सुबह कभी तो आएगी!
सुनो, लड़कियों...क्रांति का उद्घोष करो!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowkमें प्रकाशित 

पहले उसकी जात पूछ लेना!

अंकित के साथ जो हुआ वह हमारे काले गुनाहों की सूची में एक और बदनुमा दाग़ लगाकर आगे बढ़ गया है. इस जघन्य कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, कम है और हमारे बस में कुछ रहा भी क्या है!
इन दिनों यही तो हमारी नियति बन गई है कि हम निंदा करते हैं, चौराहों, न्यूज़ चैनलों पर जमकर चर्चा होती है, आक्रोश दूध के उबाल की तरह निकल- निकल बाहर आता है और फिर अगले गुनाह के होने तक सभी अपनी-अपनी  व्यस्त दिनचर्या में लौट चुके होते हैं.

सरकार वही घिसा-पिटा आश्वासन देती है और प्रशासन क्षतिपूर्ति के नाम पर एक निश्चित धनराशि. यह मात्र मुँह बंद रखने की क़ीमत भर है इसे दर्द और आँसुओं से भरे इंसान के शेष जीवन से कोई लेना-देना नहीं! इसे उस हृदयविदारक दृश्य से भी क्या मतलब जब किसी के सामने उसके ही जिग़र के टुकड़े का बेदर्दी से गला रेत दिया जाता है. इसके बहरे कानों तक उस प्रेमिका की चीखें कभी नहीं पहुँच पातीं जो उसके चकनाचूर हुए स्वप्न और प्रेमी को हमेशा-हमेशा के लिए खो देने की पीड़ा से उपजी हैं.

ऊँचाई पर बैठे लोगों को वर्तमान से कहीं अधिक भूतकाल में रूचि है. इन्हें शहरों, गली-मोहल्ले के नाम बदल अपनी पीठ थपथपाना आता है. इनके माथे पर गहरी शिक़न तब आती है जब कोई किसी पर इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगा 'वोट बैंक' को डगमगाने की कोशिश करता है. ये तब चौंक जाते हैं जब कोई इनके लिए अपशब्द कह डालता है.
इनकी घबराहट तब देखने लायक होती है जब इनका कोई 'अपना' कहीं फंस रहा होता है.
ये अपनी हाँ में हाँ मिलाने वालों के मुरीद हैं और विरोधी से नफ़रत कर उसे देशद्रोही क़रार कर देने का एक भी मौका नहीं छोड़ते.
सार यह है कि अपने व्यक्तिगत हितों और सत्ता-लोलुपता की दृष्टि से सम्बंधित सभी विषयों पर इनकी समस्त इन्द्रियाँ जागृत हो जाती हैं और तब ही न्यायपालिका भी सावधान मुद्रा में खड़ी हो अपनी सचेत अवस्था की हास्यास्पद पुष्टि करती नज़र आती है.

वरना आप किसी तथाकथित 'संत' के जेल जाने पर शहर को आग में फूँक दें... इज़ाज़त है!
आप बीच चौराहे पर किसी को ज़िंदा जला दें  .... ये उफ़ भी न करेंगे!
धर्म के नाम पर इंसानों को टुकड़ा-टुकड़ा कर वीडियो वायरल कर दें, ये उस मुद्दे को भूनकर और सब तरफ़ से भुनाकर चबा डालने में माहिर हैं.
ये अपराधों को दूर करने से कहीं ज्यादा उसके सुलगते रहने पर यक़ीं करते हैं, शर्त यह है कि फ़ायदे का लडडू सीधा इनके मुँह में आ गिरे!
ये छह माह की बच्ची या चौरासी साल की वृद्धा के साथ हुए बलात्कार को सहजता से लेते हैं. किसी किशोर को उसकी उम्र की आड़ में बाइज़्ज़त बरी करते हैं और उसकी हवस का शिकार बनी स्त्री जाति के छोटे कपड़ों  पर दोष मढ़ हाथ झाड़ लेते हैं. इन्हें उसके ऊंचे कपडे दिखाई देते हैं पर अपनी नीची सोच पर फ़क्र महसूस होता है. इन्हें बलात्कारी को फाँसी देने में कोई रुचि नहीं बल्कि डर है कि कहीं इनके साथी ही उसके चपेटे में न आ जायें. ये चुप्पी यूँ ही नहीं है!

हम उस दुनिया में रह रहे हैं जो विध्वंस के बारूद पर खड़ी है. जहाँ क़ातिलों को सज़ा नहीं मिलती और 'Honor killing' अब लीगल लगने लगी है. जहाँ अधिकारों की मांग करते-करते 'भीड़' अपने कर्त्तव्यों को भूल राष्ट्र्रीय संपत्ति को नष्ट करने में एक पल भी नहीं हिचकती. 
हम ख़बरों को देख हताश हो उठते हैं. अपने परिवार के सदस्यों के बाहर जाने पर बेचैनी से समय काटते हैं, एक घबराहट और भय हर समय साथ चला करता है.
तमाम अच्छाइयों के बीच अब सर्व धर्म समभाव, अहिंसा गुरु और धर्म-निरपेक्षता की बातें सिर्फ़ क़िताबी हैं. सहिष्णुता दिखती है क्या कहीं? प्रेम, भाईचारा, अनेकता में एकता मजाक का विषय बन रह गए हैं.
असल दुनिया में सब तरफ़ अन्याय है, दुःख है, गहरी पीड़ा है और इस सबके साथ चलता एक बेबस जीवन है जो अब भी कभी-कभी मूर्खतावश सकारात्मक उम्मीद कर बैठता है जबकि आज के इस दौर में हमें सिर झुका, हाथ जोड़, नम आँखों से यह स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि नफ़रतों के इस दौर में प्रेम करना सबसे बड़ा गुनाह है.
धिक्कार है हम पर... 
हमारे नियमों पर...
और प्रेमियों इस वैलेंटाइन माह में तुम यूँ ही दिल न दे बैठना किसी को ...पहले उसकी जात पूछ लेना!
- प्रीति 'अज्ञात'
#वैलेंटाइन#iChowk में प्रकाशित 

ध्यान रहे कि 'गले लगना और गले पड़ना दो अलग अलग बातें हैं'


यदि भारतीय संस्कृति के मूलभूत नियमों और सभ्यता की बात करें तो यहाँ अपरिचित के गले लगना, आज भी असंस्कारी माना जाता है. यहाँ तक कि स्त्री-पुरुष का परस्पर गले मिलना भी संशय के दायरे में स्थान ग्रहण करता है. अत: हमारे यहाँ किसी महिला को महिला मित्र से गले लग और पुरुष मित्र से नमस्ते, हैलो, हाय कर मिलने की परंपरा चिरकाल से चली आ रही है. गले मिलना किसी एक पक्ष को असहज भी कर सकता है. पर फिर भी कुछ लोग ज़बरन गले मिलते हैं. ध्यान रहे, यहाँ नेताओं की बात नहीं हो रही!

कहते हैं, परिवर्तन संसार का नियम है. इसलिए अब लोगों की सोच बदल रही है. विशेष रूप से युवाओं में. वे इस बात को लेकर बेहद सहज हैं और इसे सामान्य तौर पर ही लेते हैं. वो जमाने गए जब लड़के-लड़की को साथ देख लोग मुँह फाड़े हौहौ किया करते थे. यदि अब भी ऐसे लोग जीवित हैं तो उन्हें अब अपनी सोच में बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि यदि मानसिकता सही हो तो फिर कुछ भी ग़लत नहीं होता!

ईद के त्यौहार में गले मिलकर ही बधाई देते हैं. माता-पिता अपने बच्चे को गले से लिपटाकर जो स्नेह वर्षा करते हैं, उससे सुंदर भी कोई अनुभूति हो सकती है, क्या? दो दोस्तों के बीच मित्रता का आलिंगन, एक सुरक्षा-कवच की तरह होता है. आपके दुःख में कोई बढ़कर गले लगा ले तो आँसुओं का ठहरा सैलाब अचानक बह उठता है. गहन पीड़ा में मरहम की अनुभूति होती है. इसे 'जादू की झप्पी' यूँ ही नहीं कहा जाता! यह एक जरुरी स्पर्श है जो हर बंधन को और भी मजबूती देता है. अपनत्व का अहसास कराता है. अपार सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है ये स्नेहसिक्त झप्पी. 

हिन्दी फ़िल्मों के कई सदाबहार गीतों में 'लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो, शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो' आज भी कई आँखों को नम कर देता है. यह इसकी लोकप्रियता का ख़ुमार ही है कि अब इसका नया version भी आ चुका है. 'मुझको अपने गले लगा लो, ए मेरे हमराही; तुमको क्या बतलाऊँ मैं, कि तुमसे कितना प्यार है' भी जवां उमंगों को हवा देता है.
'चुपके से लग जा गले रात की चादर तले', 'आके तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी', 'बाँहों के दरमियाँ दो प्यार मिल रहे हैं' जैसे ख़ूबसूरत नगमों ने रोमांस को नई परिभाषाएँ दी हैं.
'आ लग जा गले दिलरुबा', 'बाँहों में तेरी, मस्ती के घेरे सांसों में तेरी खुशबू के डेरे' भी इसी अहसास से ओतप्रोत मस्ती भरे गीत हैं.
'आओ न गले लगाओ न, लगी बुझा दो न ओ जाने जाँ' में हेलन ने इसे एक अलग ही रंग देकर नए कीर्तिमान स्थापित किए. पति-पत्नी के बीच के रोमांस को दर्शाते हुए जया भादुड़ी और संजीव कुमार पर फिल्माए इस मधुर गाने को भी दर्शकों की ख़ूब वाहवाही मिली थी...'बाँहों में चले आओ हो, हमसे सनम क्या परदा'. सीधी-सी बात है जहाँ 'प्रेम' है वहाँ गले तो लगेंगे ही. आपकी हा-हू से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला!
बस, ये ध्यान रहे कि 'गले लगना और गले पड़ना दो अलग अलग बातें हैं'. 
- प्रीति 'अज्ञात'
#hug_day#वैलेंटाइन#valentine_day iChowkमें प्रकाशित 

भारतीय समाज और वादे का नाजुक शीशमहल


भारतीय समाज में वादा, प्रॉमिस, वचन की महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक वचन के कारण ही पूरी रामायण रच दी गई. 'प्राण जाय पर वचन न जाय' को लोगों ने अपना जीवन-सूत्र बना लिया. तमाम युद्ध और घटनाओं की जड़ में भी कहीं-न-कहीं ये वचन ही रहा. कोई राजा किसी रूपवती पर इस क़दर मुग्ध हुआ कि स्वयं को ही वचन दे डाला...."मैं इसे पाकर रहूँगा", उसके बाद की कहानी का तो  इतिहास में तुरंत स्थान पा लेना सुनिश्चित था ही. इधर वर्तमान में कुछ नासमझ अपनी पत्नी को वचन दे अपनी जान सांसत में डाल लेते हैं जबकि भारतीय समाज में आज भी पत्नी को वचन देने का मतलब, उम्रभर का ताना मोल ले लेना है. इसे 'कुल्हाड़ी पर डायरेक्ट पैर मारना भी कह सकते हैं. बड़ा भावुक दृश्य होता है जब वह अपने मायके वालों से आप ही के समक्ष बड़ी मासूमियत से कह रही होती है, "इनका तो का बताएं जिज्जी, 1989 में लाल किले पे घुमाने को कहा था, आज तक न ले गए. 1992 में गुप्ता जी की दुकान से साड़ी भी न खरीदने दी, बोले बाद में दिलवाऊंगा और फिर 93, 94 से लेकर 2018 तक की पूरी सूची से आपका साक्षात्कार हो रहा होता है. पति बेचारा अपनी पत्नी की उत्कृष्ट स्मृति-शक्ति पर गर्व करने का दुस्साहस भी नहीं कर पाता! इधर कुआँ, उधर खाई वाली मर्मस्पर्शी परिस्थिति होती है उसकी. 

पर इससे भी अधिक  ख़तरनाक है, बच्चों से कोई वादा करना. ओहोहो, ग़र आपने गलती से प्रॉमिस कर दिया कि "हाँ, बेटा कल वहाँ चलेंगे या  तुम्हारे लिए समोसे बनाऊंगी"आदि और इसके बाद निभा नहीं पाए तो दिन रात उनकी आग्नेय आँखों और तत्पश्चात आपके भीतर उत्पन्न होते घनघोर ग्लानि-भाव के लिए आप ही स्वयं ज़िम्मेदार हैं. यह प्रॉमिस, लोंग के तेल वाला टूथपेस्ट नहीं बल्कि किसी सघन दलदल में बिछे सूखे पत्तों पर चलने जैसा अभिशाप है जहाँ प्रत्येक क़दम फूँक-फूँककर रखना होता है. जान हथेली पर होती है.

अब ये मानकर भी नहीं चलना चाहिए कि वादा-खिलाफ़ी दूसरा पक्ष ही करता है. तनिक वज़न कम करने वाले गोलू मासूमों से पूछिए कि वो वीकेंड में पिज़्ज़ा-बर्गर का सात्विक भोजन करते समय, हर सोमवार के लिए स्वयं से क्या-क्या वादे कर रहे होते हैं! कितनी निष्ठा से वे सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाकर उठते हैं और स्वयं को सांत्वना देते हुए पाँच बजकर, पाँच मिनट को पुनः बिस्तर रुपी स्वर्ग धारण करते हैं. इस तरह इनके आलस्य के निवारण का सोमवार कभी नहीं आ पाता! लेकिन हिम्मती इतने कि हर वर्ष के इकत्तीस दिसंबर को निर्मित कार्यतालिका में 'वेट लॉस' का गोला प्रथम स्थान पाता है और जनवरी के प्रथम सप्ताह तक किसी निर्दयी इरेज़र से मिट, स्थानांतरित होता नज़र आता है.

अब जब घरेलू स्तर पर हम वादों के शीशमहल को बेधड़क चकनाचूर होते देख, हँसते हुए सह जाते हैं तो पक्ष / विपक्ष के नेताओं से चुनावी वादों को पूरा करने की उम्मीद क्यों कर बैठते हैं? उन पर तो पूरे देश का भार है, अत: हमें उनका आभारी होना चाहिए एवं उनकी 'वादीय क्षमता' पर अत्यधिक गर्व का अनुभव करना चाहिए. 

'वादे' नामक चुम्बकीय तत्त्व को बॉलीवुड ने भी ख़ूब भुनाया है. चाहे 'जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा' वाला सदाबहार गीत हो या अपने सल्लू - भाग्यश्री का "वादा किया है तो निभाना तो पड़ेगा" वाला क्यूट-सा, रोमांटिक डायलॉग. 
कभी मुस्काती, हेमा जी यह जताती रहीं कि "ओ मेरे राजा, खफा न होना देर से आयी, दूर से आयी, मजबूरी थी फिर भी मैंने वादा तो निभाया" तो कभी स्मित चेहरा लिए सुनील दत्त साब "तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ /तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो, मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ" कहकर लाखों दिल लूट ले गए. जीतू सर "कितना प्यारा वादा है, इन मतवाली आँखों का" पर सबको नचाते रहे तो "क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम, वो इरादा/ भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें" ने दर्शकों को बाल्टी भर-भर टसुए बहाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी. "वादा कर ले साजना" गीत पर विनोद खन्ना के साथ थिरकती प्यारी सिमी ग्रेवाल आज भी सबको याद हैं. इसके अतिरिक्त "तू- तू है वही, दिल ने जिसे अपना कहा", "मिलने की तुम कोशिश करना, वादा कभी न करना", "दोनों ने किया था प्यार, मगर मुझे याद रहा तू भूल गई", "वादा तेरा वादा","वादा करो नहीं छोडोगी, तुम मेरा साथ, जहां तुम हो वहाँ मैं भी हूँ", "वादा रहा सनम, होंगे जुदा न हम" और ऐसे सैकड़ों गीतों ने श्रोताओं के ह्रदय को, विविध भावों और संवेदनाओं के महासागर में डुबकी लगाने को बाध्य कर दिया है, साथ ही वादे के सभी मूर्त रूपों से उन्हें परिचित कराने में भी इनके अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.
लेकिन कई दशकों से अब तक,यह गीत  जीवन-दर्शन का प्रतिबिम्ब बनकर उभरता रहा है -
"देते हैं भगवान को धोखा, इनसां को क्या छोड़ेंगे/ अगर ये हिन्दू का है तो फिर,मंदिर किसने लूटा है /मुस्लिम का है काम अगर फिर,खुदा का घर क्यूँ टूटा है/ जिस मज़हब में जायज़ है ये, वो मज़हब तो झूठा है /कस्मे-वादे, प्यार, वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या/कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या!"

खैर, भावुक न होइए!
सायोनारा सायोनारा, वादा निभाऊंगी सायोनारा, इठलाती और बलखाती....कल फिर आऊँगी, सायोनारा!
- प्रीति 'अज्ञात'
#Promise_day #वैलेंटाइन #iChowk में प्रकाशित 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

चतुर्थ पावन प्रस्तुति (वैलेंटाइन यज्ञ)

'टेडी' नाम सुनते ही एक नरम, मुलायम, गुदगुदे फ़र वाले खिलौने की याद आ जाती है, जिसे कभी खिलौना माना ही नहीं गया. अपने बचपन और उसके बाद के समय में भी, कभी किसी बच्चे को जमीन पर पैर पटकते हुए यह कहते नहीं पाया कि  "ऊँऊँआआआं, मम्मीईईईई (इस अवस्था में हमारे नौनिहालों का गला प्राय: फटे बांस की तरह भरभराने लगता है) मुझे टेडी बीयर वाला खिलौना दिला दो!" वे तो बड़े प्यार से माँ का आँचल थाम, गोल-गोल आँखें मटकाते हुए बोलेंगे, "मम्मा, टेडी बीयर ले लें, प्लीईईईईज". गूढ़ चिंतन एवं सामाजिक दृश्यों के आधार पर यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि बच्चों से कहीं अधिक युवतियाँ एवं माताएँ इस पर वारी जाती हैं तथा कई स्थानों पर उन्हें इस निर्जीव, निश्छल, मुलायम भालू को मेरा कूचीकू, कुचु-पुचु, गुच्चू जैसे निरर्थक नामों से भी पुकारते हुए पाया गया है.
इस टेडी से आप बात कर सकते हैं, उसका तकिया बना सकते हैं और यदि आपका लालन-पालन ठीक से नहीं किया गया है तो आप दुष्टतावश इसकी एक आँख (बटन) निकाल उसे काना बनाने से भी पीछे नहीं हटते.

मज़ेदार बात यह है कि चाहे बंदर, कुत्ता, बिल्ली, उल्लू, पेंग्विन या चमगादड़ ही क्यों न हो पर सॉफ्ट टॉयज को हम 'टेडी बीयर' कहकर ही सभ्य एवं गौरवान्वित महसूस करते हैं. इसी प्रथा को मद्देनज़र रखते हुए मिनरल वाटर को बिसलेरी और सॉफ्ट ड्रिंक्स को कोकाकोला पुकारने की परंपरा भी विकसित हो गई थी. यह भी संभव है कि ये दोनों टेडी बीयर के प्रेरणास्त्रोत रहे हों! कारण जो भी पर साब जी, यह विकासशील LED के जमाने में बजाज बल्ब सरीख़ी बात लगती है. याद है न -
"जब मैं छोटा लड़का था, बड़ी शरारत करता था
मेरी चोरी पकड़ी जाती, जब रोशन होता बजाज 
अब मैं बिलकुल बूढ़ा हूँ, गोली खाकर जीता हूँ 
लेकिन आज भी घर के अंदर रोशनी देता बजाज"
अब रोशन तो ऋतिक हो गए और बाक़ी का जानने की हमने कोशिश ही नहीं की!
चलो, टेडी से कूची-पूची करके पूछते हैं, "बताओ, न तुम्हारा नाम टेडी किसने रखा?"
एक बात और नहीं समझ आई कि गिफ्ट की अपेक्षा हमेशा लड़कों से ही क्यों की जाती है? इस बार आप ही (बोले तो गर्ल्स) देकर देखो न! क़सम से उनका दिमाग़ झनझना जाएगा. बेचारे कह भी न पाएँगे कि काहे दिया! उसके बाद आग में घी डालते हुए 'हैप्पी टेडी डे' भी याद से बोल दियो!
-प्रीति 'अज्ञात'
#Teddy_day #वैलेंटाइन 

चॉकलेट, ज्वालामुखी और डार्क फैंटेसी

चॉकलेट का प्रादुर्भाव कब और कहाँ हुआ और कैसे ये हमारे देश में घुसपैठ कर हर उम्र के लोगों की चहेती बन गई, इसे बताने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं वरना 'गूगल' फिर क्या करेगा! पर यह अकेली ऐसी चीज है जिसे बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक बिना टेंशन लिए खाया जा सकता है. बल्कि शोधकर्ताओं के अनुसार तो यह हमें तनावमुक्त करने में भी सहायता करती है. अब उन वैज्ञानिकों को कौन यह बताए कि भईया जी, यही काम हमारे देसी गोलगप्पे तो सदियों से करते आ रहे हैं. ख़ैर, आज तो हम बस चॉकलेटमय चर्चा ही करने के इच्छुक हैं.
अब जब चॉकलेट की बात हो और बच्चों का ज़िक्र न हो तो इसे बनाने वाली कंपनियों पर लानत (धिक्कार का प्रभावी रूप) है! उन्हें पता है कि सबके घरों में प्रवेश करने के लिए बच्चों के दिलों तक पहुंचना जरुरी है और हमारे पूर्वजों की उत्तम वाणी के अनुसार 'दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है' तो कुल मिलाकर उत्पाद के बाज़ार में उतर आने से पहले ही मामला सलमान, आमिर की ब्लॉकबस्टर मूवी की तरह सेट ही था.

याद है आपको सत्तर-अस्सी के दशक में चॉकलेट और हमारे बीच का रिश्ता, कैडबरी 5 स्टार या मिल्क चॉकलेट तक ही था और ऑरेंज गोली, पॉपिन्स खाने वाले हम आम बच्चों के लिए यह बहुत बड़ी ट्रीट हुआ करती थी. चॉकलेट देने वाले इंसान को हम बहुत ऊँचा स्थान दिया करते थे और उसे देखते ही हमारी बाँछें खिल उठतीं थीं. फिर परिवार के लोग प्रवचन देते थे और बना-बनाकर झूठी कहानियाँ सुनाते थे कि कैसे फ़लाने-ढिमके के बच्चे का इसी चक्कर में अपहरण हो गया! बड़ा दुःख होता था भई! अपहरण का सुनकर नहीं, बल्कि यह देखकर कि हमारे माता-पिता की नज़रों में हमारी इमेज 'लालची बच्चे' की है. ही ही ही.
लेकिन हाँ, कुछ दुष्ट लोग सचमुच इसे रिश्वत की तरह प्रयोग में लाकर बच्चों से काम निकलवा लेते हैं प्लीज, ऐसा न करो! उन्हें चॉकलेट कभी भी दो, पर भ्रष्टाचार मत फैलाओ यारा! उन मासूमों का मन भी इसी की तरह झट से पिघल जाता है.

5 स्टार या डेयरी मिल्क चॉकलेट, मंच, किटकैट और ऐसे तमाम चॉकलेटी स्वाद के अलावा अब यह गृहलक्ष्मी बन किचन में पूरी तरह पाँव फैला इत्मीनान से बैठ चुकी है. पहले कुकीज़ में इसे दानेदार रूप में धँसाया गया, तत्पश्चात दो बिस्कुटों के बीच में गोलमटोल टिक्की-सी रखने लगे. बच्चे बिस्कुट खोल चॉकलेट वाले गोले को लेते फिर बिस्कुट को जीभ निकाल लपर-लपर पूरा यूँ चाट लेते जैसे हेल्पर पोंछा लगाती है. कुछ शैतान तो उन बिस्कुटों को वापिस रखने का पुण्य भी कमाते और बाद में धकाधक कुटने का! 
इसके बाद उन्हें चॉकलेट ड्रिंक की लत लगी. कॉर्न-फ्लेक्स का स्थान भी चोकोस ने ले लिया. चॉकलेट ने पौष्टिकता के नाम पर स्वयं को ड्राई फ्रूट्स से लबालब कर लिया. अब तो डार्क फैंटेसी (बिस्कुट है, भई) में इसे कुछ यूँ भरते हैं कि पहले ही बाइट में धच्च् से मुँह सन जाए. यहाँ तक कि चॉकलेट केक भी अब चोको लावा केक बन विकसित हो चुका है. केक के अंदर गर्म चॉकलेट का पिघलता ज्वालामुखी, अहा! कैसे अलौकिक सुख की अनुभूति होती है एवं 'हॉट चॉकलेट' सुनते ही अतुलनीय ग्लैमर की ज्वाला प्रज्ज्वलित होती है और एक कमनीय काया का आकर्षक चित्र, सटाक से चित्त में खिंच जाता है.
 इधर ब्रेड में भी अब नटेला नामक नट ने सफलतापूर्वक स्थान ग्रहण किया है. आईस्क्रीम के फ्लेवर में तो चॉकलेट आई ही पर हद तो तब हो गई जब ये आईस्क्रीम-ब्राउनी को साथ बिठा पवित्र चॉकलेट सिरप से स्नान भी करने लगी. इसी की देखा-देखी अब मुलायम त्वचा के लिए इसका मास्क भी बनने लगा.

एक जमाना था जब ब्याह, उत्सव, जन्मदिन में मिठाई ले जाते थे पर अपुन के लम्बू जी ने 'कुछ मीठा हो जाए' नारे के साथ कब इसे चॉकलेट के डिब्बे से स्थानांतरित कर दिया. जनता को पता भी न चला! वो तो मंत्रमुग्ध हो, भोली आँखों में नेह भर बच्चन को निहारती रही इधर कंपनी अपना काम कर गई. वो सिल्क जिसका केवल साड़ियों से ही रिश्ता था अब पिघल-पिघल होठों पर लगने लगा. दरअसल यही एक ऐसा खाद्य-पदार्थ है जिसके विज्ञापन में आप इसे खाते हुए पूरा मुँह सानकर भी बड़े क्यूट लगते हो! 
इस आकस्मिक प्रहार से घबराकर मिठाई वालों ने, चॉकलेट बर्फी की परिकल्पना कर इसका मुंहतोड़ जवाब दिया. पर मैं इससे ख़ुश नहीं बल्कि मुझे भय है कि कहीं इस होड़ में ये मेरी प्यारी जलेबी को चॉकलेट में डुबोकर न देने लगे. क़सम से मेरी जलेबी और रसमलाई को जरा-सा भी छेड़ा तो मैं वहीं धरने पर बैठ, अपनी स्वाद कलिकाओं की संतृप्ति हेतु पछाड़े खा-खा आह्वान करुँगी और इसे अपने देश से बाहर वैसे ही भगा दूँगी जैसे कि हमने अंग्रेज़ों को भगाया था. पर मैं जानती हूँ इस क्रांति की मैं एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी रहूँगी.  क्या पता, मेरे बच्चे ही इस बार मेरे खिलाफ फ़तवा जारी कर दें!  
पर आप फिर भी न घबराना क्योंकि भगाने के बाद भी चॉकलेट यहाँ वैसी ही बसी रहेगी जैसी कि अंग्रेज़ों के बाद,अंग्रेजियत बसी रह गई है.

कुल मिलाकर चॉकलेट और बच्चे एक-दूसरे के पूरक हैं और यह सह-अस्तित्व के सिद्धांत का जीता-जागता उदाहरण बन प्रस्तुत होती है. तात्पर्य यह है कि चॉकलेट मात्र स्त्री-पुरुष के प्रेम सप्ताह में उपहारस्वरूप दिया जाने वाला या साथ-साथ खाया जाने वाला खाद्य-पदार्थ ही नहीं, इसकी अपनी एक विशाल दुनिया है और करोड़ों ग्राहक! हम जैसे अजूबे कम ही हैं जो चॉकलेट पर फ़िदा हो पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं.
जय चॉकलेट, जय बच्चा पार्टी और जय तुम प्रेमियों की भी! खाओ और यूँ ही प्रेमभाव से रहो!
प्यार/प्रेम/इश्क़/मोहब्बत का तीसरा पवित्र दिवस मुबारक़!
- प्रीति 'अज्ञात'
#iChowk में प्रकाशित 

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

द्वितीय पावन दिवस- Propose day

सुरभित महायज्ञ के द्वितीय पावन दिवस के लिए आवश्यक सूचना -लड़कियों को तरह-तरह के pose, बिना purpose देना अत्यधिक मनभावन लगता है, सेल्फ़ी ने उनकी इस समस्या का समाधान करने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है एवं उन्हें इसका अच्छा अभ्यास भी दिया है. अत: propose करने से पहले आप भी अपनी घुटनों पर बैठने वाली या पेड़ से उल्टा लटककर चौंकाने वाली position की उचित जाँच कर लें. क्योंकि लड़की को तो पता है उसे 10 मिलीमीटर पुतलियाँ फैलाकर और 2 सेंटीमीटर मुँह खोलकर, गर्दन को 60 डिग्री पर रखते हुए आश्चर्य का भाव प्रकट करना है.

लयबद्ध कथा - एक दिन कुछ यूँ हुआ -
इस्क में शराबोर आसिक का सेर आया -
कबी कबी मेरे दील मे खियाल आता हे 
की जेसे तूझको बनाया गिया हे मेरे लीए

हमने जे जबाब दीया -
तेरे दील मे ये बेहुदा खियाल जभ आता हे
मेरे अन्दर का सायर तबी मर झाता हे
तूम कोपी तो ठिक करते नही 
सेर को माफ करने मे तेरा किया झाता हे
झा इस्क तो न कर सकुंगि कबी 
तेरी id ओर चेरा रोझ बदल झाता हे
- प्रीति 'अज्ञात'
तू झा और fb पे पोझ दे 
#Propose day #वैलेंटाइन #iChowk

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में!

आज इस साप्ताहिक महायज्ञ में आहुति का प्रथम दिवस है -
मंत्र जाप - बेरोज़गार इंसान को किसी रोज, कोई रोज़ मिल जाने से वह रोज़गार वाला नहीं बन जाता है. उसे हर रोज इतना तो दे ए ख़ुदा! कि वो खुदै एक रोज़ किसी को रोज़ दे सके! आमीन!

कथा - हड़प्पा की खुदाई जितना पुराना एक बहुत ही प्यारा गीत है जो आज भी प्रेमियों के ह्रदय के तार झनझना देता है. यद्यपि तकनीकी ज्ञान के युग में इसके बोल प्रासंगिक तो नहीं लेकिन हम तो अस्सी के दशक में भी इसका क्रियाकर्म करने से नहीं चूके थे. आइए अब आपको इसके मुखड़े तक लिए चलते हैं. 
"फूल तुम्हें  भेजा हैं खत में, फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे मुझको लिखना क्या ये तुम्हारे काबिल है?"
इन दो पंक्तियों ने ही हमारे वैज्ञानिक मस्तिष्क की आपत्तिशाला से बाहर निकल दो महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर पुनर्विचार की मांग की है-
प्रेमिका को यह स्वयं तय कर लेना चाहिए कि वह फूल भेज रही है या दिल? क्योंकि यदि यह पुष्प ही है तब तो ठीक पर यदि दिल है तो हे बहारों की देवी! आप जीवित कैसे हैं? और आपका प्रेमी दूसरे दिल को क्या अपने फेफड़े पर लगाएगा?

"प्यार छुपा है खत में इतना, जितने सागर में मोती 
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा, पास जो तुम मेरे होती"
यह प्रत्युत्तर प्रेमी के भावुक और आतुर ह्रदय की पुष्टि करता है और यह भी कि उसका अपनी भावनाओं पर सम्पूर्ण नियन्त्रण है. लेकिन यहाँ उसकी प्रेमिका उन मोतियों के बारे में प्रश्न कर उसे असहज कर सकती है.

"नींद तुम्हें तो आती होगी क्या देखा तुमने सपना 
आँख खुली तो तन्हाई थी सपना हो न सका अपना 
तन्हाई हम दूर करेंगे ले आओ तुम शहनाई 
प्रीत बड़ा कर भूल न जाना प्रीत तुम्हीं ने सिखलाई"
पुनश्च यहाँ प्रेमिका सीधे-सीधे ताने मार रही है कि तुम तो सोते ही रहते होगे बस! कामधाम तो करने से रहे! इतने फ़ालतू ही बैठे हो तो शादी क्यों नहीं कर लेते! फिर देखो, कैसे नींद ले पाओगे! अंततः प्रेमी घबराकर यह स्वीकार कर ही लेता है कि हाँ, मेरी प्रियतमा! मुझे नींद लग गई थी पर सपना पूछ, क्या बच्चे की जान ही ले लेगी अब? देखो, परेशान न करो तुमने मुझे प्रेम में रहने की लत दे दी है.

"ख़त से जी भरता ही नहीं अब नैन मिले तो चेन मिले 
चाँद हमारे अंगना उतरे कोई तो ऐसी रैन मिले 
मिलना हो तो कैसे मिले हम, मिलने की सूरत लिख दो 
मिलने की सूरत लिख दो 
नैन बिछाए बैठे हैं हम, कब आओगे खत लिख दो!"
इस अंतरे की प्रथम पंक्ति से प्रेमिका की लोलुप-प्रवृत्ति का दुखद ज्ञान मिलता है साथ ही इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि उसका प्रेमी से मुलाक़ात का एकमात्र उद्देश्य उस चेन को ही प्राप्त करना है जो वह मोतियों से बनवा सकती है. साथ ही वह चाँद की जगमगाती रौशनी  में प्रदीप्तमान श्वेतमोती के दिव्य-दर्शन को भी लालायित है. इधर मासूम प्रेमी मिलने की बात को दोहरा रहा है कि लालची औरत शायद दूसरी बार में ही उसके प्रेम-निवेदन को समझ जाए!

पर हाय री फूटी, चक़नाचूर क़िस्मत कि देवी जी एक तरफ तो नयनों को दरी की तरह बिछा चुकी हैं उस पर पत्र का आग्रह भी कर रहीं हैं! बिना आँखों के वह उसके पत्र को कैसे पढ़ सकेगी? कैसे मुलाक़ात होगी? क्या वह अब प्रपोज़ कर सकेगा? इसी चिंता में घुल-घुलकर वह खर्राटे लेने लगा और प्रेमिका मोतियों के हार के स्वप्न में झूलकर ख़ुद ही मोटी हो गई!
प्रसाद - कृपया ताजा गुलाब की पंखुड़ियों को निहारें. हप्प, तोडना नहीं!
सार -   कृपया प्रसाद पुनः ग्रहण करें.  
मोरल - डाक द्वारा गुलाब भेजने से उसके सूख जाने की आशंका बनी रहती है. कृपया ऑनलाइन ऑर्डर कर बुक़े भेजो जी!
- प्रीति 'अज्ञात'
#Rose_day
#गीतकार इंदीवर जी, गायक,  लता - मुकेश जी, संगीतकार- कल्याणजी आनंदजी से साष्टांग दंडवत क्षमा याचना सहित 
#इंडिया टुडे ओपिनियन वेबसाइट ichowk में प्रकाशित 

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

वैलेंटाइन महायज्ञ - Rose Day

साप्ताहिक महायज्ञ - जैसा कि आप सबको विदित ही है कि आज की पावन बेला में वैलेंटाइन महायज्ञ का सुंदर शुभारम्भ हो चुका है. आइये पवित्र पंडाल की ओर प्रस्थान करें-

प्रथम चरण: इसका प्रारम्भ हम, इस मंत्र जाप से करेंगे -
अल्लाह रोज़ दे, रोज दे, रोज दे दे, मालिक रोज़ दे 
रोज ही हम पौधे को लाते, प्यार से ख़ूब लगाते 
फूटी कुछ क़िस्मत ही ऐसी, पौधे सब मर जाते 
चाय की पत्ती, खाद भी डाली मिनरल वाटर डाला 
पर फिर भी हिस्से में आता सूखा-सूखा जाला
आँखें भीग रहीं अब मेरी, दिखता सब कुछ काला
इतनी भीषण पीड़ा में अब कैसे खाऊँ निवाला
अल्लाह रोज़ दे, रोज दे, रोज दे दे, मालिक रोज़ दे

संदर्भित दंत कथा - हे ईश्वर! हमने इस एकमुश्त ज़िन्दग़ी में बस एक ही दफ़ा, एक बन्दे का रोज़ क़बूल नहीं किया था क्योंकि उस दुष्ट ने वह हमाए ही बग़ीचे के, हमाए ही गमले और उसमें हमाए ही द्वारा लगाए गए पौधे में से तोड़कर दिया था. बताओ, यह प्रेम था या ख़ालिस बदतमीज़ी? हम तो मारे गुस्सा के आगबबूला हो गए और नथुने सिगड़ी के धधकते कोयले की तरह लाल अंगारे बन गए थे कि मेरी ही आँखों के सामने तुमाई हिम्मत कैसे हुई फूल तोड़ने की! 
तब हम पिरेम समझते ही नहीं थे और ये बात तो क़तई गले नहीं उतरती थी कि गुलाब देने से यह सन्देश पहुँचाने को जो इतना फड़फड़ा रहा है, उसके गले में ऐसी कौन-सी पिरोब्लम आ गई कि ससुरा बोल ही न फूट रहे!
कह तो रहे न कि हमको उस बात को समझ न पाने की भारी पीड़ा हुई थी जब बाद में पता चला कि वो मुआ गुलबवा तो हमरे ही लिए था. ये पीड़ा उस बन्दे को हुई परेशानी के कारण ही थी. पियार-वियार तो हमें बस क़िताबों, पेड़-पौधों से ही हुआ करता था बाक़ी कुछ समझने का न भेजा था न इच्छा! ख़ैर, इस अनावश्यक भूमिका का कोई औचित्य तो नहीं था पर अब लिख दिए तो लिख दिए. हाँ, उसका श्राप जरूर ऐसा लगा कि तब से लेकर आज तक किसी ने हमें गुलाब दिया ही नहीं और अब तो बग़ीचे में भी सब कुछ उगता है सिवाय गुलाब के!

सार: परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल/ अनुकूल क्यों न हों...हमें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहना चाहिए.
प्रसाद: कृपया यू ट्यूब पर जाकर आदरणीय मोहम्मद अज़ीज़ जी के द्वारा स्वरबद्ध किया हुआ यह गीत स्वयं को समर्पित कर धन्य महसूस करें .."फूल गुलाब काआआ, लाखों में हजारों में, इक चेहरा ज़नाब का आआआ"
पर उसके तुरंत बाद यह गाना अवश्य सुन लीजिएगा.. "हमसे का भूल हुई जो ई सज़ा हमका मिली!" 
#ये_रोज_रोज़_के _दुखड़े  #Roseday 
- प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

दुःख का दुःख

दुःख बाँटने से कम हो जाता है, ऐसा मैं बिल्कुल नहीं मानती। बल्कि किसी से साझा करने के बाद हम अपने साथ-साथ उसके भी पुराने ज़ख्मों को अनजाने में बेतरह छेड़ देते हैं और फिर उदासी के घनेरे बादल, ह्रदय से निकली हर आह की तरह दोनों को ही पुन: घेर लेते हैं। नतीजतन अपने-अपने हिस्से की नमी की परतें कुछ और बढ़ जाती है और मन की दीवारों पर दर्द की सीलन पाँव जमाकर बैठ जाती है। 
परिस्थिति तब भी नहीं बदलती ..जीवन तब भी नहीं बदलता और सब कुछ पूर्ववत ही चलायमान रहता है। कोई और विकल्प भी कहाँ शेष होता है!
....पर खुशियाँ बाँट लेने और संग-साथ हँस लेने से जिस भव्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, दर्द के हिस्से इसका ठीक विपरीत आता है। इसमें समय की गति मद्धम पड़ने लगती है और मन सायं-सायं करने लगता है। वस्तुत: हमारा दुःख हमें ही मारता है, मानसिक और शारीरिक रूप दोनों से ही। इसे चीरकर बाहर निकल आने में ही समझदारी है।
 
अतएव हे राजपुत्र /पुत्री...Just chill, chill..just chill
MORAL: भेजे की सुनेगा तो मरेगा कल्लू  
- प्रीति 'अज्ञात'
 

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

पुस्तक का मनोविज्ञान - 2

विश्व पुस्तक मेला- क़िताबें, बातें, मुलाक़ातें और जलवा-ए-सेल्फ़ी

हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास को खंगालेंगे तो राजेंद्र कुमार जी के दशक की फ़िल्मों में एक बात कॉमन थी कि नायक-नायिका के बीच की इश्क़ियाहट क़िताबों के गिरने और फिर साथ-साथ उठाए जाने से प्रारंभ होती थी. आंखों-आंखों में हुआ ये प्यार इतना सशक्त हो जाता था कि बगिया के फूलों की डाली को झुकाकर और नदी की बहती धारा से अठखेलियाँ करते हुए जमाने भर से लड़ने की ताक़त एकत्रित कर लेता था और फिर क्लाइमेक्स में उसे अपने क़दमों में झुकाकर ही मानता था.

राजधानी के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले की रौनक भी बारम्बार उसी युग में ले जा रही है. संयोगवश यहां भी नायक-नायिका की उम्र लगभग वही है. मतलब किशोरावस्था-सी कार्यशैली तो है पर उम्र... उफ्फ्फ, बहुत लेट हो गया न! पर ऐसा नहीं कि यह सोशल मीडिया से उपजी दोस्ती और फिर उस दोस्ती के प्रेम में बदल जाने के बाद मिलने की तमाम संभावित जगहों में सबसे सुरक्षित शरणस्थली है और यहां केवल प्रेमी युगल ही आते हैं.

न, न यदि आप ऐसा समझ रहे हैं तो अपनी सोच को दुरुस्त कीजिए (नहीं करेंगे, तो भी कोई ज़िद नहीं). हां, पर माहौल इतना ही ख़ूबसूरत और ज़ालिम लगता है. क़िताबें, सुंदर-प्रसन्नचित्त चेहरे, हरी-भरी घास, छायादार वृक्ष, फूल, कविताएं-कहानी.... "मेरे मेहबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम" की याद दिलाने लगते हैं. बदलते समय और पगले विकास के साथ अब इसमें चाय और दनादन सेल्फियां (बहुवचन यही होगा न) भी शामिल हो चुकी हैं.

पुस्तक मेला है तो स्पष्ट ही है कि वहां पुस्तकें होंगी. चर्चायें होंगी. लेखक-प्रकाशक होंगें. विमोचन, काव्य-पाठ के सैकड़ों दौर होंगे.

लेकिन इसके अतिरिक्त भी कई ऐसी बातें हैं जो संभवत: जनमानस को ज्ञात न होंगीं. कृपया धैर्य रखें, हम इस पवित्र धरा पर यही बताने को अवतरित हुए हैं. तो मेहरबानों और बेक़दरदानों-

* यही वो पावन स्थान है जहां से साथ-साथ मुस्कुराते हुए लेखक-प्रकाशक की दुर्लभ तस्वीर प्राप्त की जा सकती है.

* यहां आने वालों में लेखकों की संख्या का अनुपात पाठकों की संख्या का बीस गुना होना दर्ज़ किया गया है. तात्पर्य यह है कि मूलत: लेखकों को ही एक-दूसरे की पुस्तक खरीदनी होती है. कुछ-कुछ फेसबुक के लाइक, कमेंट, शेयर का मंचीय प्रस्तुतिकरण ही समझिए. अगर उसने आपको अपनी पुस्तक गिफ्ट दी थी तो स्वप्न में भी न सोचें कि वो आपकी खरीदने वाला है, इसलिए चुपचाप भेंटाय दीजिए. जो आपसे कहे कि "यहां से ले जाने में दिक़्क़त होगी, अमेज़न से मंगा लेंगे." समझ लीजिए कि उसने बड़े ही सलीक़े से आपकी आकस्मिक बेइज़्ज़ती कर दी है.

* विशुद्ध पाठक पूरी गंभीरता से अलग-अलग स्टॉल पर जाकर अपने पसंद की पुस्तकें तलाश करता था. परन्तु अब वह स्टॉल पर बैठे हुए भाई या भगिनी द्वारा जबरन अपनी पुस्तक की रसीद काट देने से आतंकित हो (दुर्भाग्य से इस विचित्र रसीदी दृश्य के हम स्वयं साक्षी रहे हैं) दो फुट की दूरी बनाकर रखता है. वैसे इन पाठकों की संख्या नगण्य के बराबर एवं विलुप्त होने के कग़ार पर है.

* मेले में आए हुए स्त्री-पुरुष लेखक स्वयं को सुपरस्टार से कम नहीं मानते. अपने पसंदीदा स्टॉल के कोने में खड़े होकर उनकी निगाहें उसी मुर्गे-मुर्गी (भक्त के प्रयोग से पॉलिटिकल लगेगा) के लिए बेक़रार नज़र आती है जो उन्हें देखते ही दौड़ा चला आए और कहे, "अरे, सर /मैडम आप! आज तो आना सफल हो गया." लेकिन इनकी बुभुक्षा इतने पर भी शांत नहीं होती और ये बड़े ही कोमल भाव से उसे याद दिलाते हैं कि सुनो, जब ये फोटो शेयर करो तो मुझे टैग कर देना. ये इनकी विनम्रता नहीं बल्कि वो ललक है कि लोगों को पता चले, "हम किसी से कम नहीं!"

* अगले ही मिनट में ये ऊपर वाले लेखक किसी असल बड़े लेखक को देखते ही अपना झोला उठा उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं. खींसे निपोरते हुए परिचय देते हैं और फिर अपनी पुस्तक उसे जबरन थमाकर वही निवेदन करते हैं जिसकी अपेक्षा पिछले बिंदु में ये स्वयं के लिए कर रहे थे. इस तरह छोटा, उससे बड़ा, बड़े से भी बड़ा और फिर सेलिब्रिटी तक ये खेला इसी क्रम में उलट-पुलट हो अनवरत जारी रहता है. वैसे अच्छा रोचक कार्यक्रम लगता है.

* सबसे अधिक आनंदित और गर्व के साथ अगर कोई यहां दिखाई देता है तो वो है प्रकाशक. प्रकाशक के क़द के हिसाब से लेखकों की भीड़ होती है. नए-नए 'तत्काल' टाइप लेखक इन बड़े प्रकाशकों के बैनर के आगे अपनी फोटुआ खिंचवाकर सपनों की नींव की पहली ईंट सरका आते हैं. उधर अंदर बैठे ये वरिष्ठ प्रकाशक आशीर्वाद की मुद्रा में निर्मल बाबा के समोसे विथ चटनी की याद दिलाते हैं. (सर/मैडम जी गुस्सा मत हो जइयो, हमउ उहां से छपेंगे एक दिन).

* यहां पत्रिकाओं के प्रचार के लिए भी सब आते हैं और जहां 4-5 ठीकठाक लोग दिखाई दिए, वहीं 'फटाफट पत्रिका वितरण समारोह' का आयोजन कर डालते हैं. फ्री में देने के कारण यह बहुधा सफ़ल ही होता है. लोग पेटदर्द की तक़लीफ तब जाहिर करते हैं जब बात सदस्यता तक पहुंचने लगे. अरे, भई... मंदिर का प्रसाद है क्या? मुफ़्त में ही चाहिए सब कुछ?

* देश के बाहर के हिन्दी रचनाकार भी आपको यहीं सुलभता से प्राप्त हो जाएंगे. यूं भी अपने यहां 'foreign return' को सम्मान से देखने की सुखद परंपरा सदियों से है ही. ये आप दोनों के लिए सुनहरा अवसर है, पूरा लाभ उठाएं.

MORAL: जरुरी नहीं कि सब मरने के बाद ही फ़ेमस होते हैं. यह मेला आपको जीते-जी इश्शटार बनाकर ही दम लेगा.

अत: दोस्तों से मिलने जाएं, स्नेह से जाएं, स्वार्थ से जाएं, सक्रियता दिखाने के लिए जाएं या कुनकुनी सर्दी की गुनगुनी चाय पीने जाएं.... खाली हाथ जाएं और ख़ूब किताबें लाएं... बीनकर नहीं, छीनकर नहीं, मांगकर तो बिल्कुलै नहीं, खरीदकर लाएं! फिर उस किताब के साथ सेल्फ़ी लें और क़हर ढायें.... SWAG से करेंगे सबका स्वागत!
- प्रीति 'अज्ञात' 
इसे ichowk की इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है -

https://www.ichowk.in/…/world-book-fair-2…/story/1/9443.html
#विश्व_पुस्तक_मेला #ichowk

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

पुस्तक का मनोविज्ञान - 1

पुस्तक से जुड़ी विशेष और सच्ची बात यह है कि प्रत्येक लेखक चाहता है कि उसकी पुस्तक न केवल प्रतिष्ठित साहित्यकारों द्वारा पढ़ी जाए बल्कि वे उस पर एक सार्थक प्रतिक्रिया भी अवश्य दें. संभवतः अपनी कृति के प्रति यह मोह ही उसे उन तक अपनी पुस्तकें पहुंचाने के लिए विवश कर देता है क्योंकि वह यह भी समझता है कि बिना नाम / जान-पहचान /प्रकाशक के कहे बिना नामी लोग उसकी पुस्तक खरीदने का सोचेंगे भी नहीं! यद्यपि भेंट की गई पुस्तकें भी प्राप्ति की सूचना से वंचित रह जाती हैं और लेखक संकोचवश मौन धारण कर लेता है. लेकिन अगली बार के लिए वह एक पक्का सबक़ सीख लेता है. यहाँ यह स्वीकार कर लेना भी बेहद आवश्यक है कि एक-दो प्रतिशत ऐसे लोग भी हैं जो इन खेमेबाज़ियों और 'तू मुझे क़बूल, मैं तुझे क़बूल' की प्रथा से दूर रहकर सतत निष्ठा एवं समर्पण से कार्य कर रहे हैं. इनका हार्दिक अभिनन्दन एवं धन्यवाद.


देखने वाली बात यह भी है कि इन वरिष्ठों में से कुछ यह भी चाहते हैं कि आप उनकी पुस्तकें खरीदें, पढ़ें और शीघ्रातिशीघ्र उन पर अपनी प्रतिक्रिया भी दें ही. लगे हाथों प्रचार भी करते जाएँ.


अब सबसे मज़ेदार बात यह है कि वे लोग (मासूम/स्वार्थी दोनों) जो इनके लिए ये सब कुछ करते आए हैं (कभी दिल से कभी जबरन), उनकी पुस्तकों पर 100 रुपए खर्च करना भी इन्हें जंचता नहीं लेकिन ये अपनी पुस्तक के लिए उनसे वही उम्मीद दोबारा रखना बिल्कुल नहीं भूलते.



MORAL-1: प्रतिक्रिया के लिए किसी से अपेक्षा न रखें. आपके पाठक और सच्चे मित्र सदैव आपके साथ रहते ही हैं. 


MORAL-2: पुस्तक मेले में जाएँ तो पुस्तकें खरीदें. उपहार की आशा न रखें. लेखक, पहले से ही प्रकाशक और इस दुनिया से निराश बैठा है. उस पर आप भी....! 


- प्रीति 'अज्ञात'


#विश्व_पुस्तक_मेला 

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दिलचस्प दिसंबर

दिसंबर बड़ा ही दिलचस्प महीना है। यही वो ज़ालिम माह है जिसमें सी.आई.डी. के आखिरी दो मिनटों की तरह बीते ग्यारह महीनों के सारे गुनाहों की लंबी फ़ेहरिस्त आँखों के आगे इच्छाधारी नागिन की तरह फुफकारती नज़र आती है और सभी झूठे/ धोखेबाज़ लोग अपने कानों को पकड़, उठक-बैठक करते हुए ये प्रण लेते हैं कि अब वे सज्जन बनकर ही रहेंगे।
* सभी सज्जन/ दयालु /संवेदनशील लोग इस बैरी दुनिया की चोटों से आहत हो दर्पण के सामने अपना उदास मुखड़ा लटकाते हुए गर्दन में अचानक ही भयंकर वाला ट्विस्ट मारकर खुद को लाचारगी से देखते हैं और बिन मौसम बारिश की तरह अकस्मात् ही अपनी दोनों मुट्ठियाँ भींचकर गुस्से टाइप नकली फड़फड़ाता मुंह लिए ये भीषण प्रतिज्ञा करते हैं कि अब तो प्रैक्टिकल बनके ही रहेंगे। खूब झेल लिए दुनिया के जुल्मो-सितम। ये इनका हर साल का fixed episode है। 
* सारे साल न पढ़ने वाले बच्चे आगामी बचे-खुचे महीनों में दिल लगाकर पढ़ने की विद्या क़सम खा लेते हैं। मार्च फीवर यहाँ से प्रारम्भ होने लगता है। 
* सभी मोटे-मोटियाँ (ऊप्स, अतिरिक्त स्वस्थ) मॉर्निंग वाक की शुरुआत की तिथि एक जनवरी तय करते हुए चुपचाप ही कैलेंडर पर पेंसिल से बिलकुल अपने ही जैसा एक प्यारा-सा गोला बना देते हैं, कुछ इस तरह कि बस उन्हें ही दिखे! :D
* हाफ़ सेंचुरी तक पहुंचे लोग अब नौकरी के बचे-खुचे दस वर्षों में नौकरी पर जाने से पहले नियमित रूप से ईश्वर को हेल्लो/हाय करने का महान धार्मिक फैसला लेते हैं कि फिर बाद में पेंशन की अर्ज़ियाँ खारिज़ होने की कोई आशंका शेष न रहे!
* लड़ाकू सास-बहू मन ही मन शांति वार्ता या चुप्पा-संधि का क्रांतिकारी उद्घोष करती हैं पर ये कश्मीर मुद्दे-सा उलझा मसला है कि चाहते तो हैं पर कर नहीं पाते। 
* शैतान बच्चे पड़ोसी की बगिया से फूल न तोड़ने और बेमतलब घंटी बजाकर उन्हें डिस्टर्ब न करने का और तुरंत ही इसके बदले कोई और नया तरीका ईज़ाद करने का खुसपुस प्लान करते हैं।
* भावुक लोग एक्स्ट्रा सेंटियाने लगते हैं। (जैसे हम अभी हो रहे) :P
* प्रेम में हारे बंटी और बबली अब भी हिम्मत नहीं हारते और वे अपने टूटे हुए दिल की बची-खुची इश्कियाहट को दोबारा भुनाने के लिए वेटिंग लिस्टेड मुरीदों के प्रोफाइल की दूरी बिना झिझक दिन में सैकड़ों क्लिक करके जस्ट चेक इन का आइसपाइस गेम खेलते हैं।
* फूडी बंदे, अब होम डिलीवरी में कम फ़ूड पैक मंगाने का लाचार, बेबस निर्णय लेते हैं.
* सिक्स पैक लिए इठलाता मेहनती मानव अब एट पैक बनाने की उम्मीद लिए फेफड़ों में जोरों से पसलियों के भीतर तक वर्ष के अंतिम दिन की अंतिम ऑक्सीजन खींच स्वयं को दर्पण में देख मुग्धावस्था प्राप्त करता है. 

मने जो भी हो, जनवरी में सबको नहा-धो के, चमचमाते चेहरों पे हंसी का पलस्तर चढ़ाके ही एकदम हीरो-हिरोइनी टाइप एंट्री मारनी है। थिंग्स टू डू एंड नॉट टू डू की सूची दिसम्बर की पहली तारीख़ से बनना शुरू हो जाती है और 31 दिसंबर तक तमाम मानवीय कम्पनों और हिचकिचाहटों से गुजरते हुए एक भयंकर भूकंप पीड़ित अट्टालिका की तरह भग्नावशेष अवस्था में नज़र आती है। मुआ, पता ही न चलता कि क्या फाइनल किया था और क्या लिखकर काट दिया था। आननफानन में एक नई तालिका बनाकर तकिये के कवर के अंदर ठूँस दी जाती है और फिर होठों को गोलाई देते हुए, उनके बीच के रिक्त स्थान से बंदा उफ्फ़ बोलते हुए भीतर की सारी कार्बन डाई ऑक्साइड यूँ बाहर फेंकता है कि ग़र ये श्रेष्ठतम कार्यों की सूची न बनती तो इस आभासी सुकून के बिना रात्रि के ठीक बारह बजे हृदयाघात से उसकी मृत्यु निश्चित थी। 
और इसी तरह भांति-भांति के मनुष्य अपने मस्तिष्क के पिछले हिस्से की कोशिकाओं का विविधता से उपयोग करते हुए अत्यंत ही नाजुक पर मुमकिन-नामुमकिन के बीच पेंडुलम-सा लटकता पिलान बना ही डालते हैं। तो भैया, जे तो थी Exam की तैयारी। अरे हाँ, exam अर्थात परीक्षा वह दुर्दांत घटना या कृत्य है जो जाता तो अच्छा है पर आता नहीं! ;)
-  प्रीति 'अज्ञात

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

बस, यही अंतिम इच्छा कि काश! प्रवेश द्वार पर ये द्वारपाल न हों!

अब चूंकि नववर्ष में प्रवेश तय है और हर बार की तरह सभी अपनी-अपनी योजनाओं में व्यस्त हैं (जिनका वैसे होना कुछ भी नहीं है), ऐसे में कुछ बिन्दुओं पर मेरी स्थिति अत्यंत ही चिंताजनक बनी हुई है. जब तक इनका निवारण नहीं हो जाता, मैं अन्नजल दो बार और ग्रहण करुँगी.
आह! दुख्खम-दुक्ख की अविरल धारा है ये! अब नया वर्ष क्या, किसी भी वर्ष में तनावमुक्त जीवन जी पाना संभव नहीं!
क्या आप जानते हैं कि इन दिनों अधिकांश लोग अचानक ही चिड़चिड़े, खूंखार और लड़ाकू गुणों से समृद्ध कैसे होते जा रहे हैं? क्यों वे हर बात में आपको काट खाने को दौड़ते हैं? दरअस्ल इस समस्या का मुख्य और एकमात्र कारण वह प्रजाति है जो स्वजनित, स्वचालित गतिविधियों को संचालित कर, दिन-प्रतिदिन अपने गुणसूत्रों का बहुविभाजन कर अमीबा की तरह फैलती ही जा रही है. यदि आप विज्ञान के विद्यार्थी न हों तो 'अमीबा' के स्थान पर इसका आपातकालीन पर्यायवाची 'सुरसा का मुँह' रखें, भावार्थ समान ही आएगा. ख़ैर, निम्नलिखित गुणधर्मों, वाक्यांशों और संदेशों के आधार पर आप इन्हें पहचान सकते हैं-

13 मेरा 7 रहे- ये यूरेका-सा अविष्कार और अलौकिक साथ की चर्चा तो अवश्य होगी पर पहले ये बताओ कि ऐसे जी मितलाने वाले सन्देश आखिर बनाता कौन है? वैसे मुझे आशंका है कि ये वही महापुरुष हैं जिन्होंने 12-12-12 को 12 के पहाड़े में लिखकर अपने आचार्य जी की चरण पादुकाओं का सर्वप्रथम रसास्वादन किया था. तत्पश्चात ये  9-2-11 होने का उच्चतम कीर्तिमान स्थापित कर पाने में सफल भी हुए थे और अब जब उस दौरे (टूर नहीं अचेतनावस्था) से उबरें हैं तो सीधे वाट्स एप्प की स्वछन्द, उन्मुक्त, ज्ञान-गंगा की पावन वादियों में आ गिरे हैं. यद्यपि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था है, पर हमें अपनी मानसिक शांति के लिए इन्हें स्वयं ही क्षमा कर आगे बढ़ जाना होगा. पर हे ईश्वर! इन्हें क़तई माफ़ नहीं करना क्योंकि ये जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं!

नंबर टच करो, मैजिक होगा - आज जबकि जन्म लेने के साथ ही बच्चा तक रिमोट और मोबाइल का उपयोग सीख जाता है, उस जमाने में आप ऐसे वाक्यों का प्रयोग कर किसे मूर्ख बनाने की कुचेष्टा कर रहे हैं? हाँ, माना कि धूम्रपान की तरह इस सम्बन्ध में दी गई वैधानिक चेतावनी की अवज्ञा करते हुए कुछ लोग फिर भी दी गई संख्या को टाइप या टच करते ही हैं पर इससे उनका यह कृत्य क्षम्य नहीं हो जाता. अत: यदि संभव हो तो कृपया अपना दाहिना गाल आगे बढ़ाएं और स्मरण रहे कि अगली बार टच लिखते ही एक हजार किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से किसी की दुरंतो इन पर पंचामृत की दुर्लभ, दैदीप्यमान छवि छोड़ जायेगी.

इसे कम से कम नौ समूहों में पहुंचाना, कोई इच्छा अवश्य पूरी होगी - बस, आपकी ही प्रतीक्षा में तो ये नयन पथराए हैं. क़सम से, उस समय तो प्रथम और अंतिम इच्छा यही होती है कि इसे भेजने वाले का गर्दन से कनेक्टेड एकमात्र शीश नौ-सौ बार पृथ्वी पर पटक-पटक एक ही झटके में समस्त पापियों का समूल विनाश कर दें कि 'न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी'

यदि सच्चे...हो तो इसे इतना शेयर करना कि यह बात हर देशवासी तक पहुंचे - अहा! इन्हें तो 'विष शिरोमणि' रत्न से अलंकृत करने का मन करता है. अरे, अपने धर्म का झंडा चिपकाकर देश का सत्यानाश कर राक्षसी अट्टहास करने वालों, आप जैसे तथाकथित भारतीय जब तक जीवित रहेंगे हमें दुश्मनों की क्या जरुरत? आप हैं न, हमारी हरियाली को झूमते गजराज की तरह तहस-नहस करने के लिए, आम भारतीयों के जीवन में उच्चरक्तचाप की दवाई की तरह प्रतिदिन का डोज़ देकर विषाक्त करने के लिए! आपकी झूठी देशभक्ति की जड़ों में जितनी जल्दी संभव हो, कीटनाशक डाल लीजिए, स्वयं पर भी छिड़क सकते हैं. पर एक बात अपने स्मृतिपटल पर सदा के लिए अंकित कर लो कि जो सच्चा भारतीय होता है न, वो तोड़ने नहीं...जोड़ने की बात करता है. आग बुझाता है, उसमें घी नहीं डालता. 

बच्चन जी की कविता - हर हाथ लगी कविता को अमृता प्रीतम, बच्चन जी और गुलज़ार के नाम से वायरल करवाने की निकृष्ट कोशिश करने वालों को 'दवा नहीं दुआ की जरुरत है.'  क्योंकि इनकी बौद्धिकता पर पाला पड़ते देख ककहरा भी पीला पड़ चुका है और बारहखड़ी खड़ी अवस्था में ही मूर्छित पड़ी है.

ये बच्चा खो गया है - क्षमा कीजिए पर वो खोया हुआ बच्चा अब शादीशुदा है और उसके बच्चे के गुमशुदा होने की उम्र आ चुकी. बल्कि अब तो उसने ही साक्षात् उपस्थित हो इस पोस्ट को जड़ से मिटाने की भरसक कोशिशों में स्वयं को समर्पित कर दिया है पर आम जनता!! 'न, जी न! ऐसे ऐसे छोड़ दें! हम तो मिलवा के ही मानेंगे!' वैसे ये अपने जूते की दुर्गन्धयुक्त कंदराओं में दुबके मोजे तक नहीं ढूंढ पाते और हर बात में मम्मी-मम्मी करते हैं पर इस बच्चे के बजरंगी भाईजान बन जाना इनका ध्येय वाक्य बन चुका है. इन शुभचिंतकों से दंडवत प्रणाम के साथ यही विनम्र अनुरोध है कि ये कृपया भगवान् के लिए बस एक बार ही बता कर और उसके पश्चात जीवन त्याग इस धरा को पवित्र कर दें..  ...'नासपीटों! कहाँ से लाएं वो बच्चा? जो अब बच्चा नहीं रहा.'

आप पिछले जन्म में क्या थे? - इस जन्म का तो अब तक क्लियर हुआ नहीं और ये पिछले का बताने आ गए. वैसे भी इस तरह की लिंक यह भ्रांति उत्पन्न कर रहीं हैं कि पूर्वजन्म में सभी या तो राजघराने से थे या फिर महापुरुष, वो न हुए तो सुप्रसिद्ध बॉलीवुड कलाकार.  इससे यह तात्पर्य भी निकलता है कि महान बनने से कुछ विशेष लाभ नहीं होता, क्योंकि अगले जन्म में फेसबुक, व्हाट्स एप्प पर स्वयं को ढूंढते ही नज़र आना है. भावार्थ यह है कि आपने इस समय 'कचरे' के रूप में जन्म लिया है जबकि स्वच्छता अभियान अपनी प्रगति पर है. स्पष्ट शब्दों में कहूं तो 'दुर्गति वही, जगह नई.' अब आप नीले डिब्बें में गिरेंगे या हरे में, यह निर्णय स्वयं लेने का सौभाग्य प्राप्त करें. 

कौन आपसे सच्चा प्यार करता है? आपकी तस्वीर आपके बारे में क्या कहती है? - सुभानअल्लाह! बस यही दिन देखने शेष रह गए थे. अब इन बातों के उत्तर जानने के लिए हमें इन लिंक्स पर निर्भर रहना होगा? इनके बारे में हमसे बेहतर और कौन जान सकता है! लेकिन एक सुझाव है कि ये लोग कुछ धनराशि लेकर ही जवाब बताएं. दो ही दिन में करोड़पति बन जाएँगे क्योंकि जनता इस हद तक उत्सुक रहती है. इश्श, भोली जनता!

कौन आपका प्रोफाइल चोरी-छुपे देखता है? पिछले जन्म में आपकी मृत्यु कैसे हुई थी? कौन आपको मारना चाहता है? - बहुत ख़ूब! यही जानने को ही तो हम इस धरती पर पुन: अवतरित हुए हैं. कर्णपटल की गुफाओं में धंसे रुई के फाहों को निकालकर ध्यानपूर्वक सुनो और समझो ... हमें बताने से एक ग्राम भी लाभ न होगा. इतने चिंतित हो तो कृपया इसकी रिपोर्ट सीबीआई को भेजो. वैसे उनको बताकर भी कुछ विशेष नहीं होने वाला! :P

इस लिंक पर क्लिक करो आपके एकाउंट में 299 आएंगे- अच्छा! अबकी बार आपने जले पर नमक ही नहीं छिड़का बल्कि नींबू भी कसकर निचोड़ डाला है. वैसे ही कड़की के दिन चल रहे, अब बचे खुचे सिक्के इन चोर-उचक्कों को और लुटवा दें! जिन बेचारों पर नोटबंदी ने क़हर ढाया था वे अब तक उसके भीषण सदमे से उबर नहीं सके हैं. सुनो, ये बताओ...तुम उन्हें सीधे ही गोलियों से भून क्यों नहीं देते??  

समस्याएँ और भी हैं अतएव जो इस 'टॉप टेन' में स्थान नहीं पा सके, वे प्रसन्न न हों एवं अपना जीवन विशुद्ध निरर्थक ही समझें. 
बस, यही अंतिम इच्छा है कि काश! जनवरी के प्रवेश द्वार पर ये द्वारपाल न हों! यक्ष प्रश्न...क्या, 2018 में इन संतापों से मुक्ति मिलेगी?
भारी ह्रदय से यही बताना चाहूंगी कि बेरोज़गारी का दुःख इतना विशाल नहीं, जितना यह बन गया है. अब कुल मिलाकर इन सबसे मुक्ति ही इस मासूम जीवन का एकमात्र लक्ष्य रह गया है इसलिए आप इस पोस्ट को 9 समूहों में भेजकर, इतना शेयर करो, इतना शेयर करो कि मेरा आपका 7, 7 जन्मों तक रहे..... और, हाँ ... इस लिंक पर क्लिक करके शेयर बटन को हौले-से टच करना, ग़ज़ब मैजिक होगा..... हीहीही  :D :D
- प्रीति 'अज्ञात'

#इंडिया टुडे ग्रुप के ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म, ichowk पर प्रकाशित
https://www.ichowk.in/humour/how-social-media-is-making-our-life-complicated-and-how-we-can-tackle-the-various-problems/story/1/9342.html

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

संपादकीय - जनवरी 2017 ( हस्ताक्षर वेब पत्रिका) : क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं?

ये कैसी होनी है, जिसे हम विधाता पर डाल निश्चिन्त हो जाते हैं! उन बच्चों ने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी। कितनों की अधूरी ड्रॉइंग उनकी कल्पनाओं के रंग भरे जाने की प्रतीक्षा कर रही होगी, किसी की माँ ने उसके स्कूल से लौटने के बाद उसकी पसंदीदा डिश बनाकर रखी होगी, किसी के पिता उसे सरप्राइज देने के लिए उसका वही खिलौना खरीदकर लाये होंगे, जिसके लिए उसने बीते सप्ताहांत पूरा घर सिर पर उठा रखा था, दादा-दादी ने आज उसे सुनाने के लिए परियों वाली कहानी सोच रखी होगी। कितना दर्दनाक होता है वो मंज़र, जहाँ बच्चे के इंतज़ार में बैठे माता-पिता को उसके कभी न आने की सूचना दी जाती है, जहाँ गूँजती किलकारियों की आवाज़ गहरे सन्नाटे में बदल जाती है, जहाँ पलंग पर पड़ा बेतरतीब सामान किसी की राहें तकता है, जहाँ प्रतीक्षा उम्रभर का दर्द बन घर की चौखट से लिपट जाती है। आह, कई बार शब्द ही नहीं होते, जो किसी का दर्द बयां कर सकें। वो शब्द भी कहाँ बने, जो किसी का दर्द बाँट सके हों कभी!

बस दुर्घटना, ट्रेन दुर्घटना, स्त्रियों के प्रति अपराध जब-जब होते हैं
हम दुःख जताते हैं, अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। इसके अतिरिक्त अभिव्यक्ति का और कोई माध्यम भी नहीं! उधर अधिकारी मामले की पूरी जाँच का आश्वासन देते हैं। यदि घटना से कोई बड़ा नाम जुड़ा है, तो जाँच आयोग बैठा दिया जाएगा। हंगामा या आंदोलन हुआ, तो सरकार द्वारा मामले को जाँच के लिए सीबीआई को सौंप दिया जाएगा। पीड़ित को ढाँढस बंधाने के लिए कुछ रुपए दिए जाएँगे और इस तरह बात ख़त्म हो जाएगी। पर मेरा सवाल यह है कि समस्या कब ख़त्म होगी? क्या हम सचमुच समाधान ढूँढने में सक्षम नहीं? या कि हम सभ्यता के पाशविक काल में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं?

किसी इंसान की उसके ही घर में घुसकर हत्या कर दी जाती है लेकिन उसकी मृत्यु और उस परिवार के प्रति संवेदना के स्थान पर चर्चा इस बात की होती है कि फ्रिज़ में रखा माँस किसका था? 'मृत्यु' एक तमाशा भर बनकर रह जाती है!
लड़कियों को भरे बाज़ार परेशान किया जाता है तो कहीं उनका बलात्कार होता है, तलाश अपराधी की नहीं इस बात की होती है कि आख़िर वो घर से क्यों, किसके साथ और किन वस्त्रों को धारण करके निकली थी। यानी हम यह मानकर ही चलें कि पुरुषों की जन्मजात प्रवृत्ति तो ऐसी ही है और उनके सुधरने की तथा कुत्सित मानसिकता को त्यागने की कोई उम्मीद नहीं। इसलिए स्त्रियाँ ही स्वयं को क़ैद करके रखें? क्या इस सोच का कभी अंत होगा या कि हर मुद्दा, भुनाए जा सकने के लिए ही जीवित रखा जाता है?

जलीकटटू हुआ या कि चिंकारा या कोई भी अन्य जानवर। उनके प्रति हिंसा का विरोध होता है, होना भी चाहिए! उनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा है, लगना ही चाहिए। ऐसे मामलों में पूरा देश एक साथ खड़ा होता है, ये उससे भी अच्छी बात है कि हमारी संवेदनाएँ अब तक जीवित हैं। लेकिन जब किसी इंसान की लाश न्यूज़ बन सड़क पर पड़ी रहती है, किसी को दिन-दहाड़े गोली मार दी जाती है, किसी बच्चे को बुरी तरह पीटा जाता है तब मनुष्यता कहाँ चली जाती है? हर मौत के विरोध में आवाजें कहाँ ग़ुम हो जाती हैं? काश, मानवीय हिंसा पर प्रतिबन्ध हो!....हैवानियत पर प्रतिबन्ध हो! हर मृत्यु को गंभीरता से लिया जाए!

दरअसल दोषी के सुधरने की उम्मीद तो तब हो....जब किसी को भय हो। यदि बलात्कार की सज़ा, तुरंत फाँसी हो और वो भी एक सप्ताह के भीतर ही तय कर दी जाए तो क्या मजाल किसी की हिम्मत भी हो, लड़की को छूने की। पर ऐसा होता नहीं और न ही होने वाला है क्योंकि आधे तो नेता ही इसमें लटक जाएँगे और बाक़ी उनकी छत्रछाया में जीने वाले।
नोटबंदी से कुछ अच्छा जरूर हुआ होगा, सहमत हूँ। पर अब बढ़ते अपराध और गंदगी को मिटाना आवश्यक है, ये भ्रष्टाचार से भी ज्यादा जहरीले हैं। देश के विकास के लिए नोटमुक्त से कहीं अधिक, भयमुक्त समाज की आवश्यकता है। जब आधी आबादी घर में बंद है, तो विकास पूर्ण रूप से होने की आशा करना बेमानी लगता है।

कितना हास्यास्पद है कि लोग शौचालय बनाने के लिए भी सरकार की मनुहार की प्रतीक्षा करते हैं। कचरे को कचरेदान में डालना भी अब दूसरों को सिखाना पड़ रहा है, वो भी इस उम्र में आकर! कोई सेलिब्रिटी समझाएगा, तो ही समझ पाएँगे। थूकना, पिचकारी मार सार्वजनिक स्थानों को दूषित करना बदस्तूर जारी है। पहले हम इस सब से उबरें, फिर बात बने!

नए वर्ष में आप साईकल चलाएँ, हाथ मिलाएँ या फूल खिलाएँ....बस घर से निकले को, शाम उसके घर तक सकुशल पहुँचाएँ।
फुटपाथ पर सोये, ठिठुरते बचपन को उसका मौलिक अधिकार शिक्षा दिलाएँ।
अपराध को पैसे नहीं, सजा के बल पर ख़त्म कराएँ।
वाहन चालन का लाइसेंस उन्हें मिले, जिन्हें सचमुच वाहन चलाना आता हो क्योंकि ये सिर्फ उनके ही नहीं, कई लोगों के जीवन का मामला है।
कंक्रीट होते शहरों में कहीं-कहीं मिट्टी छुड़वाएँ कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन और साँस चलती रहे।
आओ, भारत को हम-आप, सुरक्षित सुंदर बनाएँ!
इन्हीं चली आ रही कभी सूखी-कभी हरी उम्मीदों के साथ-
नववर्ष मुबारक़!
गणतंत्र मुबारक़!

चलते-चलते: जब कुंभ मेला लगता है तो तमाम चित्रों से सबकी टाईमलाईन भरी रहती है। व्यापार मेला लगता है, तब भी यही दृश्य देखने को मिलता है। विश्वकप में तो भावुकता अपने चरम पर होती है लेकिन पुस्तक मेले के लगते ही एक विशिष्ट वर्ग को साँप सूंघ जाता है। क्यों, भई? एक अभिनेता हर चैनल में जाकर अपनी फिल्म का प्रचार करता है। खिलाड़ी भी विज्ञापन के माध्यम से अपना चेहरा जनता को याद दिलाते रहते हैं। संगीतकार और गायक भी अब पार्श्व में नहीं रहे। कंपनियों के विज्ञापन के जिंगल सब एक सुर में गाते हैं। नेता अपनी पार्टी के प्रचार और दूसरी के दुष्प्रचार का कोई मौका कभी नहीं छोड़ते। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री जी भी रेडियो पर अपनी बात सुनाने लगे हैं। तो फिर इस 'पुस्तक मेले' से ही किस बात की चिढ़? जिसे जाना है, जाए। जिसे नहीं जाना, वो न जाए! आप इतने कुंठित क्यों हैं?
दुःख इस बात का है कि पुस्तक मेले का सबसे ज्यादा सम्मान जिस वर्ग को करना चाहिए (करते भी हैं), वही इसका अपमान करने में भी पीछे नहीं रहता। यही हाल कुछ लोगों ने हिंदी का भी किया है। जिसकी घर में ही इज़्ज़त न हो तो गैरों से कैसी उम्मीदें? दुःखद है, बाक़ी उन्हें सोचना है जिनके कारण सवाल उठते हैं।
- प्रीति अज्ञात