गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आह.…मेरे सपनों का भारत!

इतिहास गवाह है, धार्मिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा पाप और अत्याचार होते आए हैं। 
अब 'प्रतिबंध' की राजनीति को लेकर सब कटिबद्ध हैं। सोशल-साइट्स पर बैन, फिल्मों पर बैन, पुस्तकों पर बैन और कुछ न बचा तो नौबत खाने-पीने तक आ गई है। वैसे ये शुरुआत 'मैगी' से हो चुकी है, पर तब कारण जायज़ था। इन दिनों शाकाहार बनाम माँसाहार का द्वंद्व, भारत/पाकिस्तान क्रिकेट मैच से भी ज्यादा टी.आर.पी. बटोर रहा है।
 
देखा जाए तो इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और कोई घटना हो ही नहीं सकती! जहाँ आपके पड़ोसी या राजनीतिक दलों को आपकी थाली में परोसे भोजन की परवाह है। यदि बर्दाश्त नहीं तो सब अपना-अपना खाइए। न तो एक पक्ष को दूसरे की रसोई में माँस का लोथड़ा घुमाने की आवश्यकता है और न ही दूसरे पक्ष को उनकी थाली से उठाकर बाहर फेंकने की। एक-दूसरे के बर्तनों में झाँकने की तुक ही क्या है? जब जी करे, साथ बैठकर खाईये; न करे तो एक-दूसरे को न तो उलटी करवाएँ और न ही निवाला छीनने की कोशिश करें। फिर भी न समझ आये तो साथ बैठकर खाने की सभ्यता और उल्लास स्कूल के बच्चों से सीखें।
 
सभ्यता, संस्कृति और विकास की बातों के बीच इस तरह की घटनाएँ मन विचलित कर देती हैं। अवसरवादी संगठनों का देशभक्ति की बीन पर, हर बार की तरह इस मुद्दे पर भी ज़हर उगलने का प्रयास जारी है। सिर्फ एक राज्य के जय-जयकारे से, न तो आप आगे बढ़ेंगे और न ही राष्ट्र को बढ़ने देंगे! सवाल यह है कि ओछी मानसिकता वाले इन लोगों पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगता? देश को सुधारने का ठेका लेने वाले कभी खुद 'सुधार-गृह' की सैर पर जाकर जरूर देखें। ताज़ा हवा, उनके मन-मस्तिष्क को एक नई ताज़गी देगी और सकारात्मक सोच की कलियाँ भी अवश्य प्रस्फुटित होंगीं। 
 
'धर्म' के नाम पर हत्या का समर्थन करने वाले लोगों की धार्मिकता का अंदाज़ा उनके इस व्यवहार और दक़ियानूसी सोच से ही लगाया जा सकता है। जिस 'धर्म' की आड़ में ये हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं, उन धार्मिक ग्रंथों के पन्ने भी तड़पकर रोज फड़फड़ाते होंगे और 'ईश्वर' स्वयं इनके गुनाहों को देख सन्न रह जाता होगा।
अपराधी, 'अपराधी' ही है। बहस, उसके जघन्य कृत्य पर होनी चाहिए। उसके नाम के पीछे क्या लगा है, वो उसे परिभाषित नहीं करता। दोषी या निर्दोष होना क्या अब धर्म तय करेगा? लेकिन अब तक की सभी घटनाओं का सर्वाधिक दुखद पक्ष यही है कि लोग अपराधी की ज़ात पर पहले गौर करते हैं और उसकी बर्बरता की चर्चा बाद में होती है। 
 
साधु, संत, बाबा, महात्मा, देवी और इस टाइप के सभी अति आदरणीय, महान एवं विशिष्ट देशभक्तों की बढ़ती पैदावार देखकर यह सिद्ध होता है कि इन्हें खाद-पानी देने वाले ज्ञानियों की भी कमी नहीं! इन महाऋषियों के शांत और संयमित स्वभाव का चित्रहार आये दिन किसी-न-किसी चैनल पर प्रसारित होता ही रहता है। बेहतर है इसे भी 'इंडस्ट्री' घोषित कर दिया जाए। जिसे जो बेहतर लगे, उसकी भक्ति में सराबोर होता रहे। फिर जनता को अपने 'लुटे' जाने का इतना अफ़सोस नहीं होगा। सब अपनी मर्ज़ी से फ़ीस चुकाकर बेवकूफ़ बनते रहेंगे। वैसे भी अंत में ये ठीकरा अशिक्षित और मूर्ख जनता के नाम पर ही फोड़ा जाता रहा है। शिक्षित वर्ग की 'क्लास' तो कभी ली ही नहीं गई।  
 
इधर एक दलित परिवार को सरेआम निर्वस्त्र करने की घटना जितनी शर्मनाक और घृणित है उतना ही इसे बार-बार सोशल मीडिया पर शेयर करना भी निंदनीय है। वर्षों से यही होता आ रहा है। जो उन्होंने एक बार किया, आप वही लगातार दोहराकर किस नैतिकता का परिचय दे रहे हैं? कुछ लोग इसके समर्थन में ये बोलते भी दिखाई दिए कि बिना ऐसा करे हमें इनका दर्द समझ नहीं आएगा। सोचिये, यदि ऐसा आपके परिवार के साथ होता तो क्या तब भी आप इतनी ही संवेदनहीनता दिखा पाते? क्या तब आप इन नग्न तस्वीरों और वीडियो से सहानुभूति बटोरने या न्याय मिलने की उम्मीद रखते? नहीं न! सुनते ही मन कैसे बौखला जाता है!
 
क्योंकि यह एक निर्धन और कमजोर वर्ग का किस्सा है, इसलिए इसका तमाशा बनाना सहज है। कोई बड़ा नेता, अभिनेता या उद्योगपति होता तो पैसों और ताक़त के बल पर इसे डिलीट करवा चुका होता। गरीबों का रहनुमा कोई नहीं होता! इस बार भी भीड़ न तो हटी, न ही किसी को रोकने की हिम्मत जुटा पाई। हाँ, निर्लज्जता से इस पूरी घटना को रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी उसे अच्छे से याद रही।

न तो किसी राजनीतिक दल को इस मुद्दे में दिलचस्पी होगी और न ही डिबेट के नाम पर दिन-रात चिंघाड़ने वाले मीडिया हाउस कोई पैनल बनाकर इस पर चर्चा करने वाले हैं। खुद को दबंग और जुझारू कहने वाले अधिकतर पत्रकार भी इन जगहों से चुपचाप निकल आना ज्यादा पसंद करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर और निर्बल वर्ग की चिंता सिर्फ एक चुनावी सुविधाजनक विषय है। चूँकि इसमें न तो आमदनी है और न ही ख़बरों को बेचने के लिए आवश्यक मसाला, इसीलिए ये ख़बरें अब अत्यधिक आम हो चली हैं। न तो इनकी जांच होगी, न अपराधी को जेल होगी और न ही यहाँ किसी मुआवजे की उम्मीद है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इनका केस लड़ने कोई वकील आगे नहीं आता, कोई F.I.R. दर्ज़ नहीं होती! चीरहरण करने वाले इन दुशासनों के बीच रहते हुए ऐसे न जाने कितने परिवार, कब ख़त्म हो जाते हैं, कब उस घर की महिलाओं की अस्मत के साथ खिलवाड़ होता है , कब उन्हें चाकू से गोदकर उनकी लाश वहीँ सड़ते रहने को छोड़ दी जाती है, इसकी फ़िक्र करने वाला कोई नहीं। इस तरह के 'हादसों' की कहीं कवर स्टोरी नहीं बनती!
 
'न्याय' अब एक बहुमूल्य शब्द है, बिलकुल कोहिनूर हीरे की तरह! इसे पाने की उम्मीद लिए न जाने कितने जीवन नष्ट हो चुके या मौन कर दिए गए! कोई नहीं जानता। जानने से होगा भी क्या? संख्या बढ़ती ही रहेगी और हम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों को पलट, कुछ पल शून्य की तरफ निहारते हुए, मौन हो, भारी मन से उस पुस्तक को पुन: जगमगाते काँच की अल्मारी में रख उदासी-उदासी का पुराना खेल खेलेंगे।
अभी ही टेलीविज़न पर एक 'ब्रेकिंग न्यूज़' फ्लेश हुई, जिसका सार है…"कहीं संगीत को सीमाओं में बाँधने का काम जारी है!"
सामने दिख रही उस पुस्तक का शीर्षक अभी भी अपनी सार्थकता तलाशने को मुँह बाए खड़ा है…'मेरे सपनों का भारत!'
- प्रीति 'अज्ञात'
 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, अक्टूबर, 2015 अंक का संपादकीय

शनिवार, 7 नवंबर 2015

नुक्कड़ वार्ता

(दो दोस्त, पॉपकॉर्न खाते हुए) 
उफ्फ, ये कचरा कहाँ फेंकूँ?
वो देख न उधर.…एक खाली रैपर पड़ा है, वहीँ डाल दे.
और नहीं तो क्या! एक हमारे डस्टबिन में डाल देने से कौन सी गंदगी साफ़ होने ही वाली है!
हम्म, वोई तो!
और बता, क्या चल रहा है? 
बस, जी रहे हैं. जैसे-तैसे!
अच्छा, सुन..... पिछले वर्ष जो अपहरण और बलात्कार वाली घटना हुई थी, उसका क्या हुआ ? 
कुछ नहीं, मामला अदालत में है!
हे,हे,हे.....अब तो इलास्टिक की तरह खिंचेगा रे भैया! जोर लगा के हईशा!
हा,हा,हा...पर बड़ी दया आती है न कभी-कभी?
एक हमारे अच्छे बनने से कौन-सा सुधार आने वाला है! जब हम नहीं सुधरे, तो देश क्या सुधरेगा!
सही पकडे हैं!
और वो उसके दो बरस पहले जो वृद्ध जोड़े को लूटपाट के बाद मार दिया था?
उसका भी वही हाल! तारीख़ें, बढ़ती जा रहीं हैं!
सात वर्ष पहले जो ज़िंदा जलाने वाला कांड हुआ था, किसको सज़ा मिली ?
पता नहीं, सुनते हैं एक गवाह मर गया और दूसरा मुक़र गया!
पच्चीस साल पुराना वो जघन्य हत्या का मुक़दमा?
अरे! उसके तो जज़ की ही हत्या हो गई और परिवार वाले न्याय के इंतज़ार में ही चल बसे!
ओह्ह्ह...क्या होगा, हमारे देश का?
हर दिन का अख़बार, अपराधों से भरा होता है.
अरे, फ़िल्में जिम्मेवार हैं इसकी!
पर वो तो समाज का आईना होती हैं न!
हाँ, सो तो है!
दरअसल, सारा दोष system का है, देखो न भ्रष्टाचार कितना बढ़ता जा रहा है? कोई कुछ करता ही नहीं! सब हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं.
तुम्हारे बेटे के एडमिशन का क्या हुआ?
होना क्या था, एक लाख दिए..हो गया! दूसरे लोगों ने तो दो-तीन लाख तक दिए थे!
ओह्ह, फिर तो सस्ते में हो गया!
न जाने रिश्वतखोरों से कब इस देश को मुक्ति मिलेगी?
क्या करें मित्र, बड़ी प्रॉब्लम हैं!
ग़रीबी, घटती नहीं और महंगाई बढ़ती जा रही है! 
उस दिन गाँव फ़ोन किया था, काका को?
किया तो था.
मैनें पूछा, क्या हाल हैं भाई? अबकी फ़सल तो अच्छी हुई न?
आँखों में पानी भर बोला...."हुई तो थी, पर बारिश ने सब लील लिया"
यहाँ 'सब' का मतलब मात्र 'फ़सल' ही नहीं...'आस', भी चली गई, वर्ष भर की रोजी-रोटी का जुगाड़ भी, अब वहां चूल्हा नहीं जलेगा, थका मन और शरीर loan को चुकाने की क़िस्तों में गुजर जाएगा !
कुछ घटेगा कहीं तो किसानों की संख्या!
सुना है, हर सरकार की प्राथमिकता सूची में पहला नाम इन्हीं का होता है!
इतने दशकों से सुन ही तो रहे हैं.
एक मिनट, घर से फ़ोन आ रहा है.
हाँ, मम्मी!
अच्छा, ठीक है. हाँ, सुपरस्टोर से ही लाऊँगा.
सुन, मॉल जा रहा हूँ. बाय
ओके, बाय
कल मिलते है. मैसेज कर देना मुझे.
हम्म्म, ओके बॉस!

चलिये, तब तक हम और आप अपने शहरी होने को celebrate करते हैं....बाक़ी फ़िक्र तब करेंगे, जब हमारी प्लेट खाली होगी!
हाँ, हेलो...Please, Take my order ! One large Mushroom Pizza with extra cheese........!
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 
Pic : Clicked By Preeti 'Agyaat'

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

'रिश्ते' या 'प्रशस्ति-पत्र?'

'रिश्ते' कुछ नहीं, एक प्रशस्ति-पत्र के सिवा! जब तक पढ़ते रहो, रहेंगे और पीड़ा बाँटते ही छिटककर दूर खड़े हो जाते हैं! या कि मानव-मस्तिष्क की बनावट ही कुछ ऐसी है जहाँ स्नेह के सैकड़ों पत्र एक सरसरी निगाह डाल डिलीट कर दिए जाते हैं और शिकायतें हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं! 
ये कैसी आभासी दुनिया है जहाँ अपनों का अपमान करते आप, जरा भी नहीं हिचकते 
ये कैसे लोग हैं जो अपना बनकर बात करते हैं और पलटते ही छुरा घोंप देते हैं 
ये कैसे रिश्ते हैं, जो रिश्तों की मर्यादा ही नहीं समझते 
तो क्या हुआ.…जो आपने उनके दुःख को समझा 
तो क्या हुआ....जो आप हर घडी, हर पहर  किसी को अपना समझ उसके लिए बाहें फैलाये तत्पर खड़े रहे 
तो क्या हुआ...जो आपने अपना जीवन उनके नाम कर दिया 
मकान दिखते हैं.....लेकिन पैसे कमाने में घर कहीं खो गया है 
सदस्य दिखते हैं..... पर gadgets की भीड़ में परिवार व्यस्त हो गया है 
ये  कैसे रिश्ते हैं, जहां आंसू पोंछने को कोई नहीं होता और पीड़ा पहुंचाने में किसी को जरा भी दर्द नहीं होता 
जहाँ आप सबके मंन के दुःख को समझें,  दूर करने की भरसक कोशिश भी करें पर 
आप की बात सुनने वाला....…कोई नहीं!
जब आप गिरें तो संभालने वाला....कोई नहीं!

दर्द अकेले ही सहना होता है! गैरों  की क्या कहिए, जब अपने ही रिश्तों में सिर्फ़ प्रशंसा सुनने को आतुर रहते है, उनकी एक ग़लती की तरफ इशारा तो कीजिये और सब कुछ ख़त्म.
आपकी तकलीफ का मोल....कुछ नहीं!
आँसुओं का मोल...कुछ नहीं!
खोई मुस्कानों का मोल...कुछ नहीं!  
जो अपना होने का भरम देता रहा, उसके ही द्वारा अकेला छोड़ जाने का मोल.....कुछ नहीं! 

गर दस्तक देनी है तो दिलों पर दो! 
जो रहना चाहते हो यादों में तो किसी के ह्रदय पर अपना नाम अंकित कर दो! 
दर्द देने का वक़्त  है तो बांटने के लिए भी निकालो!
क्या हमेशा ही हम सही और सामने वाला ग़लत होता है? आपके अलावा किसी में कोई भी अच्छाई नहीं? आप परफ़ेक्ट हैं और दूसरा इंसान एक डिफेक्टिव पीस? ग़लती न होने पर भी कोई 'रिश्ते' को बचाने की ख़ातिर हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी माँगता रहे और आप उसे कोसते रहें, झिड़कते रहें....इसका मतलब कि आपको न तो उस इंसान में दिलचस्पी है और न ही रिश्ते को बचाने में. ये भी संभव है कि आप सब कुछ ख़त्म करने के लिए सिर्फ़ एक बहाने की तलाश में हैं.

इसका यह तात्पर्य हुआ कि दरअसल कोई किसी का है ही नहीं..और न होगा कभी! संबंधों को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय 'मौन' ही है, जहाँ रोज ही घुट-घुटकर एक मौत होती है पर शरीर ज़िंदा रहता है; दिखाई देता है  आभासी मुस्कानों को लपेटकर अपने जीवित होने का भरम बनाए रखना भी तो आवश्यक होता है न! 
पर ये सवाल अब भी अनुत्तरित ही रहा ----
"क्या रिश्ते मात्र 'प्रशस्ति-पत्र' बनकर रह गये हैं?"
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

कवि को जूझना आता है.....

रचनाकार केवल उतना ही नहीं होता, जितना दिखाई देता है! उसकी रचनाएँ एक जीवन की पूरी कहानी कहती हैं, उसकी सोच उसके आसपास के वातावरण, सामाजिक व्यवस्था और संस्कारों का प्रतिबिम्ब होती है। यूँ ही कोई कवि / कवयित्री नहीं बन जाता, जब तक उसने संघर्षों को करीब से देखा न हो, महसूस न किया हो! कुछ लोग संघर्ष को आर्थिक परिस्थितियों से जोड़ लिया करते हैं पर बहुधा यह मानसिक और व्यवस्था के विरुद्ध चल रहा अंतर्द्वंद्व भी होता है।जहाँ कुछ न कर पाने की विवशता, मुट्ठी भींचने पर मजबूर कर देती है। इन हालातों से अकेले ही जूझते रहना, आसपास के लोगों द्वारा किये गए हर ताने को बर्दाश्त करना, अपनों का भयाक्रांत हो साथ छोड़ जाना और इन सबसे घायल ह्रदय और उसकी पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए अपने 'होने' को और इस 'जीवन' को सार्थक करने का जूनून ही सही मायनों में एक संवेदनशील और भावुक इंसान को रचनाकार में तब्दील कर देता है।

लेखक कभी आत्महत्या नहीं करते, हाँ उनकी हत्या अवश्य हो जाती है। कवि को जूझना आता है, टूटना आता है, हर पीड़ा को सहना आता है, वो जीते भले ही न पर मैदान छोड़ भागता नहीं, उसे डटकर खड़े रहना आता है और इन सबसे भी ऊपर एक और बात..उसे हर हाल में मुस्कुराना आता है! 
आह..यही उसके जीवन भर की कमाई और आय-व्यय का लेखा-जोखा है ! :D
भ्रम में बने रहने से बेहतर है डूबना या पार कर जाना! लेकिन उस पार पहुँचने के बाद आवाजों को अनसुना करना भी सीखना होगा. ये हुनर सबमें कहाँ, हमें डूब जाने का डर है और उन्हें उम्मीद! :)
-प्रीति 'अज्ञात'

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

बनारस

बनारस से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है, इतना कि मुझे खुद भी याद नहीं! पहली बार वहाँ जाना तब हुआ था जब नानी जी को cancer था और मिर्ज़ापुर के डॉक्टरों ने उन्हें बी.एच.यू. ले जाने की सलाह दी थी. वहीँ रहे थे हम लोग, अब तो मालूम नहीं लेकिन उन दिनों बी.एच.यू. का कैंपस खूब हरा-भरा हुआ करता था. वो एक उदास समय था, इसलिए तब उसमें खेलने-कूदने में कोई आनंद नहीं आता था.

उसके कई वर्षों बाद फिर जाना हुआ, तब नाना मिर्ज़ापुर कॉलेज से रिटायर होने के बाद यहाँ पीएचडी गाइड थे. मैं और मम्मी-पापा 'विश्वनाथ मंदिर' देखने गए थे. बहुत ही संकरी गलियों और अत्यधिक भीड़भाड़ के बीच चलते हुए हम वहां तक पहुंचे थे. दर्शन के बाद लौट ही रहे थे कि अचानक किसी ने मुझे खींच लिया. मैं जोर से चिल्लाई और तुरंत ही माँ-पापा ने भी देख लिया. वो भाग चुका था लेकिन हम सब घबरा गए और सीधे घर वापिस आ गये थे.

तीसरी बार की यात्रा अत्यधिक सुखद रही. वो भी स्कूल के दिनों की ही बात है. हम सब वहां दशाश्वमेध घाट पर गए, बहुत देर तक बैठे रहे थे. अच्छा लगा था वहाँ सीढ़ियों पर बैठे हुए पानी को उछालते रहना! कोई अस्सी घाट नाम से भी कुछ था. पर मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित वहां के तुलसी मानस मंदिर ने किया था. अगर मुझे ठीक से याद है तो ये वही स्थान है जहाँ मैनें पहली बार मंत्रोच्चारण और बोलती मूर्तियों को देखा था. तब कई दिनों तक उनकी स्मृतियाँ मुझे अचरज में डालती रहीं थीं और मैं सबका खूब दिमाग खाती. हर बार यही सवाल करके कि...वो मूर्तियां बोल कैसे रहीं थीं!

मैं मिठाई की शौक़ीन कभी नहीं रही लेकिन वहाँ जाकर लगा था कि मिठाई के बिना ये लोग जी ही नहीं सकते (ये अतिश्योक्ति हो सकती है, पर तब मैनें ऐसा ही पाया था). ये 30 वर्ष पुरानी बात है, आजकल तो नहीं खाते होंगे. मुझे ये मेले टाइप फीलिंग वाली जगहें बहुत पसंद हैं, छोटी-छोटी दुकानों, ठेले वालों के पास बहुत सुन्दर वस्तुएं होती हैं. लकड़ी के रंगीन खिलौने, कारीगरी के सामान और भी न जाने क्या-क्या! बनारस में ये सब कुछ हुआ करता था. हमने खूब खरीददारी भी की थी. वहाँ की बोली बड़ी ही मीठी, प्यारी-सी है. अगर मुझे कोई बात नापसंद थी तो वो वहां के लोगों का पान खाकर यहाँ-वहाँ पिचकारी बना देना. 
पता नहीं...तब और अब के बनारस में कितना अंतर आया होगा! आज न्यूज़ में वहाँ शांति की ख़बरें देखकर जहाँ मन को एक तसल्ली मिली वहीँ कुछ कच्ची-पक्की यादें भी ताजा हो आईं।
  
इसके साथ ही मिर्ज़ापुर भी याद आ गया...जाना है वहाँ एक दिन, कई दिनों के लिए! कब, कैसे और क्यों ये भी पता नहीं! बस, जाना है एक दिन! कुछ नहीं तो नाना-नानी के घर को और उस बगीचे को छूकर लौट आऊँगी, जहाँ की आवाज़ें इन दिनों बहुत पुकार रही हैं! 
मुझे कलकत्ता और बोध गया जाना है, लखनऊ, मुंबई भी जाना है....और इसी जीवन में जाना है, ऊपर जाने के बहुत पहले!
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 7 सितंबर 2015

'सच' तो ये.... 'सच' कुछ भी नहीं !

क्या मैं हमेशा सच बोलती हूँ ? या बोल पाती हूँ ? यह बात ही सच की सच्चाई को बयां कर रही है. हाँ, मैं सच बोलना पसंद करती हूँ, पर हर बार सत्य ही बोल सकूँ, यह संभव नहीं हो पाता, क्योंकि उसमें किसी को आहत कर देने का भय भी समाहित होता है. और यदि मेरे बोले सच से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचे तो मैं असत्य का सहारा लेने की बजाय मौन हो जाना ज़्यादा पसंद करती हूँ. पर यदि न्याय और अन्याय के बीच जंग छिड़ी हो, तो मैं बेझिझक सच का दामन थाम लेती हूँ, फिर चाहे सामने वाला इंसान कितना ही प्रतिष्ठित और ताक़तवर क्यूँ न हो !

'सच' की सबसे बड़ी सुंदरता यह है, कि वो एक ही होता है और स्थाई भी, उसके साथ कहानियाँ गढ़ने का परिश्रम नहीं करना पड़ता, उसे याद नहीं रखना होता ! 'झूठ' को हमेशा संभालना होता है, किन परिस्थितियों में किससे, कब, क्या और क्यों कहा था, इन सभी बातों से मस्तिष्क इतना ज़्यादा बेचैन हो जाता है कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति खुद भूल जाता है और आसानी से पकड़ में आ जाता है.

'सच' के साथ हमेशा रह पाना उतना आसान भी नहीं, मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूँ जो बड़े ही गर्व से खुद को 'सत्यवादी' कहलाना पसंद करते हैं. पर जब कोई और उनका सच कहे तो, तिलमिला उठते हैं. मेरी नज़रों में असली सत्यवादी वही है जो दूसरों का सच बोलने के साथ-साथ अपनी सच्चाई भी नि:संकोच स्वीकार कर सके. वरना वो 'सत्यवादी' नहीं 'आलोचक' ही कहलाएगा ! ध्यान रखने योग्य बात यह भी है, कि सच बोलने के पहले उसके होने की पुष्टि ज़रूर की जाए और जब यह तय हो जाए कि वही सामने वाले का सच है, उसे तभी ही बोला जाए ! कई बार लोग आधी-अधूरी बात से या पूर्वाग्रह से वशीभूत हो स्वयं ही पूरी कथा बुन लेते हैं, इससे बचना चाहिए. 'आधा सच' भी 'आधा झूठ' ही होता है !

सत्य की एक विडंबना यही है कि ये अक़्सर ही अकेला होता है, जबकि झूठ के साथ पूरा मेला होता है. सच बहुधा उदास हो, कोने में छुपा अकेला सूबकता है जब लोग झूठ की तलाश में व्यस्त रहते हैं ! सत्य कायर नहीं है ,ये ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही आशावादी हैं, तभी तो चुप हो बैठ जाता है, और झूठ की प्रतिरोधक-क्षमता इससे कहीं ज़्यादा दिखाई पड़ती है. जो दिखता है, उसे ही दुनिया भी सच मान लेती है, क्योंकि असली मज़ा तो उन्हें झूठ ही देता है. एक सरल, सच के साथ चलने वाला जीवन 'झूठ' की छत्रछाया में हताश और उम्र-भर संघर्षरत रहता है. आजकल 'झूठ' ज़्यादा बेबाक और 'इन' है, और 'सच' अकेला ही अपने अस्तित्व की तलाश में खिसियाता-सा हाथ-पाँव मारता दिखाई देता है. लेकिन मैंनें न हार मानी है और न मानूँगी, 'सच' के साथ, बिना किसी के सहारे, नि:स्वार्थ आगे बढ़ना है, जिसे जो सोचना है सोचे....वो उनकी स्वतंत्रता है. मैं लोगों के बार-बार झूठ से व्यथित अवश्य होती हूँ और बेहद विचलित भी, पर यही तो जीवन है !
वर्तमान परिवेश, समाज और व्यवस्था को देखते हुए यही कहना चाहूँगी कि - 

झूठ, झूठ और सिर्फ़ झूठ ! 
सारे रिश्ते-नाते...झूठ ! 
दोस्ती के वादे....झूठ ! 
अपनेपन के दिखावे..झूठ ! 
प्यार की वो बातें....झूठ ! 
सारे ख़्वाब सुनहरे....झूठ ! 
खुशियों के वो पल भी कृत्रिम, 
चेहरे की मुस्कानें......झूठ ! 
झूठी बस्ती, झूठा जमघट, 
ये लगता, रिश्तों का मरघट ! 
मायावी इंसान यहाँ पर, 
एहसासों की बातें.....झूठ ! 
स्वार्थ भरा, अब हर धड़कन में, 
दिल ना समझे, इनकी चाल ! 
कब तक गिनता, अपनी साँसें, 
ज़ज़्बातों का ये कंकाल ! 
झूठ ही सब पर हावी है,अब 
सच क्या है, मालूम नहीं, 
शब्दकोष का हिस्सा है, बस 
'सच' तो ये.... 'सच' कुछ भी नहीं !

You can also read it here -
http://parikalpnaa.blogspot.in/2015/07/blog-post_25.html

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

अनुशासन

दो दशकों से भी ज्यादा पुरानी बात है ! तब जो भी बच्चा कक्षा में ज्यादा बात (बोले तो disturb ) करता था, उसे या तो आखिरी में दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा कर दिया जाता था या फिर बेंच के ऊपर दोनों हाथ करके ! ज्यादा दिलदार टीचर जी हुए तो कान पकड़ के मुर्गे बनने का मनोरम दृश्य भी यदा-कदा दिखाई पड़ जाता था या फिर बच्चा सबकी नजरों से अदृश्य यानि कि सीधे कक्षा से बाहर!
उस समय वो बच्चा तो असहाय दिखता ही था, अंदर बैठे उसके दोस्तों को भी धुकधुकी लगी रहती थी....हाइला , कहीं हमारा नाम न बोल दे ! दुनिया का रिवाज़ है, कि "गेंहूँ के साथ घुन भी पिसता ही है ", सो कई मासूम चेहरे उस बच्चे के अपराध की भेंट चढ़ा दिए जाते थे ! अब जो बचे, उनसे न हँसा जाए और न ही रोया ! "इधर कुआँ उधर खाई टाइप सिचुएशन!"

खैर.... सुधरा कोई भले ही न हो ! पर टीचर जी और सर जी का ख़ौफ़ ज़बरदस्त रहता था ! दिक्क़त बस तभी होती थी, जब ये जिम्मेदारी निरीह 'मॉनिटर' के पल्ले पड़ती थी ! कुछ अपने दोस्तों को भारी डिस्काउंट के लालच (यहाँ इसका तात्पर्य नोट्स से है) में बचा लिया करते थे और कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी सबकी बराबर क्लास लेता था ! अपनी-अपनी क़िस्मत है भैया !

माराकूटी, बटन तोडना, पेन फेंक देना, पानी फैलाकर निकल लेना जैसी हिंसक और निकृष्ट घटनाओं के लिए एक नियत समय था ! जिसे 'ब्रेक' के आत्मिक नाम से जाना जाता था !
हर शहर, हर स्कूल में लगभग यही प्रथा थी ! वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार इनमें फेरबदल भी प्रचलन में था ! 

घर में बताओ तो डबल कुटाई का डर! सो, आपसी सहमति से सब चुप्पी लगा जाते ! माता-पिता भी ये तो नहीं कहते न कि"बेटा, ख़ूब टेबल-कुर्सियाँ तोड़ो! कॉपी-क़िताब के पन्ने फाड़ो और फिर अगले दिन शान से अपने टाइप के लोगों के साथ कक्षा में प्रवेश करो! उसके बाद मैम की शिकायत, प्रिंसिपल से कर आओ !"

MORAL :  'अनुशासन', आज भी उतना ही आवश्यक है जितना २० वर्ष पहले हुआ करता था ! ये अलग बात है कि लोग न तब सीखे और न अब कोई चांस हैं ! बच्चे इस कहानी से क्या शिक्षा लेंगे, पता नहीं …बस, आज यूँ ही याद आ गई ! हम कौन, एवीं खामखाँ मरे जा रहे !
© 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

इंटरनेट देवता जी

हमारे परमपूज्य श्री श्री 1008 इंटरनेट देवता जी का निवास-स्थान कहाँ है ? :O
मेरा उनसे विनम्र अनुरोध है कि वर्षा ऋतु में भी नियमितता बनाये रखें। जिससे कुछ गरीबों को सन्देश के आदान-प्रदान में असुविधा न हो ! आपकी उपस्थिति के बिना जीवन व्यर्थ है और दूरभाष पर होने वाले आर्थिक और मानसिक व्यय को बचाने में भी आप नितांत उपयोगी सिद्ध हुए हैं ! :)

हे, जन-जन के कष्ट निवारक! 
समीपता और दूरी के समानता से संचालक! 
मनोरंजनकर्ता, सबके मस्तिष्क के स्वामी ! 
आज के पावन दिवस पर आपको कोटिश: प्रणाम एवं ह्रदय से आभार ! :)

दक्षिणास्वरुप कुछ पुराने मोबाइल और माउस रख दिए हैं !
कृपादृष्टि बनाये रखना, बाबा !
आशीर्वाद दीजिये न बाबा ! :(
अरे हाँ,  वो कष्ट-निवारण मन्त्र का जाप करते समय समोसा, एक खाऊँ या दो ? :P
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मोरल : मेरा पूरे विश्व से निवेदन है कि आदरणीय सम्मानित श्री अंतर्जालीय देवता और सूचना संपादक परम भक्त श्रीमान गूगल देवता जी  की पूजा-अर्चना के लिए एक धार्मिक स्थल का  निर्माण किया जाए ! लेकिन :/ टेंशन यही है कि वो किस धर्म का होगा ! उफ्फ्फ, यहाँ तो सबका आना-जाना है, फिर अपन के लड़ने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं रहेगा ! हुँह, तो क्या फायदा रे ! :/ :(
- © 2015 प्रीति 'अज्ञात'. सर्वाधिकार सुरक्षित 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

'सौदामिनी', जीवन के आख़िरी पन्नों से......

कितना आसान है ये कह देना, "बस तुम खुश रहो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए ! अगर ये मेरे बिना सही, तो वो भी मंज़ूर है मुझे!"
पर दिल क्या सचमुच मंज़ूर कर पाता है इसे ?
उसकी एक हल्की-सी आहट, उसकी मौज़ूदगी का अहसास भर सिहरा देता है ! उम्मीद और डर के बीच झूलता हुआ ये मन साँसे रोक कर इंतज़ार करता है कि अब कोई पलटकर पूछेगा, "कैसी हो तुम?"
अब कोई सिर पर हाथ फेरेगा और कहेगा, "अरे, उदास क्यों हो भई?" आँखें ये सोचकर ही भीगने लगतीं हैं, गला रुंध-सा जाता है और मस्तिष्क स्वयं को उन जवाबों के लिए तैयार करता है लेकिन तब तक वो चेहरा ओझिल हो चुका होता है ! 
मैं तो यही कहती कि "ठीक हूँ!" तुम्हारा पूछना भर ही मेरा दिन बना देता !
पर अब सचमुच अहसास होने लगा है कि तुम खुश हो मेरे बिना !
सॉरी,लेकिन मैं इतनी महान नहीं कि आसानी से कह सकूँ..."बस तुम खुश रहो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए! 
क्योंकि मुझे तुम्हारी मौज़ूदगी चाहिए!
तुम्हारी वो मुस्कान चाहिए जो मुझे देख ही तुम्हारी आँखों की झीलों में खुशबुओं-सी तैरने लगती थी !
मुझे मेरे इस दुनिया में होने की एकमात्र वज़ह चाहिए! 
हाँ, इसके अलावा मुझे वाक़ई कुछ नहीं चाहिए !
वो अगले जन्म के साथ का वादा भी नहीं! 
जो जीते-जी न मिल सका, मर जाने के बाद उसकी उम्मीद रखूँ; अब इतनी बेवक़ूफ़ भी नहीं रही मैं!
यूँ जानती तो ये भी हूँ कि मेरी बातों का कोई मोल नहीं!
याद है एक दिन तुमने गुस्से में कहा था कि "मैं पछतावा हूँ तुम्हारी ज़िंदगी का, प्रताड़ित करती है मेरी उपस्थिति तुम्हें !"
बहुत रोई थी मैं उस दिन... और अभी भी तो !
पर हर बार की तरह तुम्हें 'बेनेफिट ऑफ डाउट' दे दिया था ! तुम्हारा गुस्सा और मूड, तुम खुद भी कहाँ जान सके हो अब तक!
हर बार आखिरी पत्र मानकर लिखती हूँ! पर लौट आती हूँ खुद ही, बिन बुलाये !
न जाने क्या शेष है अभी !
उम्मीद नहीं है ये!
इंतज़ार भी नहीं!
चाहत तो यूँ भी दोतरफ़ा ही जायज़ होती है !
पीड़ा बेतहाशा है !
पता नहीं क्यों, दिल आज भी इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि "तुम सचमुच खुश हो मेरे बिना !"
तुम ख़ुद शांत मन से एक बार कह दो न मुझे, कुछ इस तरह कि विश्वास कर सकूँ और उसके बाद तुम देखना, आवाज़ तक नहीं दूंगी कभी!
हाँ, एक तसल्ली हो जायेगी हमेशा के लिए !
उसके बाद क्या होगा ?
क्या करोगे जानकर ?
"फ़टी-पुरानी, बिना ज़िल्द वाली पीली क़िताबों का आख़िरी पृष्ठ अक़्सर गायब ही रहता है !"
(एक अंश - 'सौदामिनी', जीवन के आख़िरी पन्नों से, से )
© प्रीति 'अज्ञात'
Pic Credit : प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 13 जुलाई 2015

आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी 
सादर अभिवादन
आज भी रोज की तरह समाचार देख-पढ़ मन व्यथित हुआ और लगा कि आम भारतीय नागरिक की तरह मुझे भी अपने 'मन की बात' कह ही देनी चाहिए!

* एक समाचार से ज्ञात हुआ कि कुछ लोग जातिगत जनगणना के पक्ष में हैं! मैं राजनीति बिल्कुल भी नहीं जानती पर इतना ज़रूर समझती हूँ, कि गर ऐसा हुआ तो सही नहीं होगा! यूँ भी हमारे देश में समस्याओं की जड़ ये 'जाति' और 'धर्म' ही तो रहा है! वरना ये दंगे-फ़साद किसके नाम पर हो रहे हैं?

*सोचिए ज़रा, कितना अच्छा होता....अगर चुनाव 'इंसान' और उसके द्वारा किए गये कार्यों के आधार पर हो! लोग 'जाति' नहीं 'इंसान' को चुनें, उसके नेक कार्य और अच्छी सोच पर भरोसा रखें न कि उनकी 'कास्ट' को आगे ले जाने के अशोभनीय आश्वासनों पर!

* क्या यह संभव नहीं कि हर नेता या चुनाव उम्मीदवार की जाति बताई ही न जाए, निष्पक्षता तो तभी तय होगी! पहचान के लिए उनके स्कूल, कॉलेज के प्रमाण-पत्र बनाये रखने में कोई बुराई नहीं!

* मैं किसी पार्टी के समर्थन या विरोध में नहीं हूँ, बल्कि आम भारतीय नागरिक की तरह अपने देश के विकास की पक्षधर हूँ!
* मैं 'जातिगत' आरक्षण की नहीं बल्कि हर उस विद्यार्थी की पक्षधर हूँ जो 80% अंक से भी अधिक लाने पर उदास है क्योंकि उसी के सामने 60% अंक वालों को प्रवेश मिल जाता है और वो अपने 'सामान्य-श्रेणी' में होने को कोस रहा होता है!

क्या 'शिक्षा' या ज्ञान का पैमाना, 'बुद्धिमत्ता' नहीं होना चाहिए ?
* मैं हर उस इंसान की, हर उस जाति की, हर उस धर्म की पक्षधर हूँ जहाँ एक बुद्धिमान बच्चा, पैसों के अभाव में शिक्षा से वंचित रह जाता है....... मैं ऐसे हर एक 'भारतीय' को उसका, हक़ दिलाने की पक्षधर हूँ! मैं एक क़ाबिल इंसान को उसकी योग्यता के आधार पर चुनने की पक्षधर हूँ!

* मैं विरोधी हूँ उस हर इंसान की जो योग्य न होने के बावजूद भी जाति या डोनेशन ( जी हाँ, यह भी रईसों का सुगम मार्ग है) के बल पर प्रवेश पा लेता है, डॉक्टर या इंजीनियर भी बन जाता है...और कुछ वर्षों बाद हम समाचार पढ़ते हैं, 'डॉक्टर की लापरवाही से मरीज़ की मौत' या फिर 'कमजोर पुल टूटने से बस खाई में गिरी, मरने वालों की संख्या सैकड़ों में'...पर यदि गहराई से सोचा जाए तो पता चलता है कि इस लापरवाही का ज़िम्मेदार वो 'प्रवेश-द्वार' है जहाँ इन्हें होना ही नहीं चाहिए था!

* 'बुद्धिमत्ता', 'जाति' से तय नहीं होती! कमजोर व पिछड़े वर्गों को ऊपर उठाने का मतलब उन्हें ये सुविधा देना नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा के प्रति रूचि बढ़ाना है. उन्हें सब कुछ निशुल्क दें और जो बेहतर होंगे वो स्वयं ही हर परीक्षा उत्तम अंकों से उत्तीर्ण कर लेंगे, उनके लिए अलग से व्यवस्था करने की क्या आवश्यकता है?
 "जब विरासत दिखती है, तो कौन मेहनत करता है भला!"

* दो-टूक़ बात तो ये है कि हमें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि 'सरकार' किस पार्टी की है! हमें तो देश के विकास से मतलब है, हम तो यही चाहते हैं कि जब कहीं बाहर जाएँ तो हमारे पूर्वजों की तरह उसी शान से कह सकें कि "हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है!"
'गंगा सफाई अभियान', 'स्वच्छता अभियान', 'बेटी बचाओ अभियान' और ऐसे ही अन्य सकारात्मक योजनाओं को देख एक उम्मीद जगी है!

भारतवासियों में बहुत ताक़त है, बहुत हिम्मत है, हर मुश्किल घड़ी से निपटने का हुनर भी खूब आता है! 'सती-प्रथा' और 'बाल-विवाह' जैसी कुरीतियों को हम सबने ही दूर भगाया है! 'कन्या-भ्रूण हत्या' और कितने ही 'आपराधिक' मामलों के विरोध में सारा देश एकजुट हुआ है! तो, ये 'जाति-प्रथा' दूर करना भी मुश्किल नहीं...
"ज़रूरत सिर्फ़ एक 'मुहर' की है!"

धन्यवाद!
प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 22 मई 2015

'वृद्ध-आश्रम' होने चाहिए या नहीं?

अपेक्षाओं और उम्मीद के परे भी एक जीवन है यहाँ...! जीने के लिए न कोई शर्तें हैं और न ही स्नेह को पाने के लिए व्यर्थ के बने कायदे-कानून !  ये सब तो स्वार्थी समाज की सुविधा के लिए उगाई गई फसलें हैं; जहाँ हर बरस नए रिश्तों और मौकों की खेती होती है और पुराने स्नेह बीजों को खरपतवार समझ उखाड़ फेंक देना ही आपके समझदार और व्यवहारिक होने का प्रामाणिक तथ्य माना जाता है।

यहाँ न सपने हैं न ख्वाहिशें। उम्मीदों की टूटन, रिश्तों की सघन गर्मी, मन की उष्णता, ह्रदय की घुटन और इस सबको भुलाने की नाक़ाम कोशिशों में लगे तमाम अनुभवों की ठिठुरन है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाकर और कर्तव्यों के आगे स्व की तिलांजलि देने के बाद जो शेष है वही इनका जीवन है. अपनों का दूर जाना जितना आसान  है उन्हें भूल पाना उतना ही जटिल। इसीलिए अब भी कहीं, मायूसी के भंवर से जूझते हुए एक झिझक भरी निग़ाह दरवाजे की तरफ देख न जाने क्या टटोला करती है....!

यही वो दरवाजा है जहाँ आप थोडा संकोच के साथ कुछ लोगों को मुस्कान देने के ज़ज़्बे के साथ प्रवेश करते हैं और उनके गले लग स्वयं के वजूद को बेहद बौना पाते हैं। पता ही नहीं चलता कि कब चेहरे की सलवटों से झांकती एक जोड़ी आँखों की टिमटिमाती रोशनी, आपके ह्रदय को भीतर तक रोशन कर जाती है ! मन में पैदा हुई कुछ ख्वाहिशें जो यूँ भी बेबुनियाद ही ठहरीं, हंसती हैं अपने होने पर ! मन कचोटने लगता है, ह्रदय से एक आह निकलती है, पीड़ा असहनीय है लेकिन जीवन के प्रति अगाध स्नेह आपको हैरत में डाल देता है. एक कमरे से सुरीले गीत की ध्वनि, कहीं बैसाखी की थाप पर चलती ज़िंदगी, ढोलक का मधुर संगीत और एक साथ बजती तालियां ! भजन ढोलक और सिर्फ दो वक़्त की रोटी की जरुरत।

एक प्रश्न उठता है मन में.....! क्या वाक़ई इससे अधिक की आवश्यकता है ? पैसे कमाने की जद्दोजहद में लगे लोगों के पास शेष क्या रहेगा ?  मैं पलटकर फिर उस दरवाजे की ओर देखती हूँ। उसी गीत को बार-बार रिवाइंड कर सब एक साथ थिरक रहे हैं......... " अपने लिए जिए तो क्या जिए... " मेरा पसंदीदा गीत और उन खामोश चेहरों की हंसी दिल को गहरी तसल्ली दे जाती है ! हालांकि इसके भीतर की मायूसी भी अपनी उपस्थिति का अहसास बख़ूबी कराती है। मैं सर झुका, प्रणाम कर वहां से निकल पड़ती हूँ।  दिमाग में अब भी वही बारह-तेरह वर्षों से घुमड़ती उथल-पुथल बरक़रार है कि "वृद्ध आश्रम होने चाहिए या नहीं?". मेरा मूरख दिल आज भी इसके पक्ष और विपक्ष में बराबर की गवाही देता है !
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

जो 'दर्द' लिखता है , सोचो.....उसकी रगों में कितना बहता होगा !


जो 'दर्द' लिखता है , सोचो.....उसकी रगों में कितना बहता होगा ! जो बढ़कर गले न लगा सको तो ,भूले से भी कभी उसके कंधे पर हाथ न रख देना कि फिर उम्र-भर रिसता रहेगा ये। सागर का पानी यूँ ही खारा नहीं होता ! अरमानों के इतने मचलते उफान के साथ दौड़ती चली आती हैं जो, उन लहरों की साहिल पे सर पटकने की मायूसी देखी है कभी ? थके-हारे क़दमों से उनका लौट जाना जीकर तो देखो !

टूटा ही सही....पर फिर भी जुटा लेती है ज़िद्दी हौसला और कुछ सीप, कुछ मोती अपने गीले आँचल में भर तुम्हारी देहरी पर छोड़ आती है। डूब जाती है, फिर उसी खारे समुन्दर में। निहारती है कुछ पल, धुंधली आँखों से। वक़्त की रफ़्तार में भागते चेहरे ठिठककर चुन लेते हैं, मोतियों को।  लहरों की उदासी किसने महसूसी है कभी ! रुदाली का रुदन सबने देखा और उसे दोषी ठहरा चलते बने ! 
रुदाली....तुम कब हंसती हो !

आसान है, कह देना
'चले जाओ ' 
पर कोई, 'जाता कहाँ है' !
छोड़ जाता है इक हिस्सा 
दर्द को सहलाने के लिए 
गहराते हैं ज़ख्म 
कभी न भर पाने  लिए 
खुद ही रीतता जाता है 
इच्छाओं का समंदर 
जिसमें तड़पकर
आस की अनगिनत मछलियाँ 
चुपचाप दम तोड़ देती हैं ! 
 
अभिशप्त जीवन 
अधूरी श्वांस की 
टूटी बैसाखी 
कोई भूले भी तो, भूले कैसे 
कि बस वर्ष बदलते हैं
लोग बदलते हैं  
तारीखें और दिन तो 
वहीँ-के-वहीँ 
फूटे भाग्य-से  
ठिठककर रह जाते हैं !
- प्रीति 'अज्ञात'
Pic : Google

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

अरे, खिड़कियाँ तो बंद करवा सकते हो !

बिहार में परीक्षाओं के हाल पर एक अधिकारी ने अभी कहा कि..."क्या करें, इन्हें गोली तो मार नहीं सकते!"
सहमत, क्योंकि गोली तो आप खुलेआम क़त्ल करने वाले अपराधी को भी नहीं मार पाते, ये तो बेचारे, बच्चों के उजियारे भविष्य की चाह में, लटकने को मजबूर, निरीह माँ-बाप ठहरे ! छि:..धिक्कार है !

आपकी मासूमियत पे तरस आता है, सर जी ! अरे, खिड़कियाँ तो बंद करवा सकते हो ! 
* अंदर से ज़्यादा, बाहर की पहरेदारी तो करवा सकते हो ! 
* जो अभिभावक लटके हैं, उनके बच्चों की परीक्षाएँ तो निरस्त करवा सकते हो !
* सबसे आसान, शिक्षा का स्तर तो सुधार सकते हो !
* CCTV कैमरे का इस्तेमाल कब करोगे, साहेब ? 

अध्यापक अच्छे से पढ़ाएँ और विद्यार्थी नियमित आते रहें, तो ये शर्मनाक स्थिति पैदा ही न हो ! दुख ऐसे अभिभावकों को देखकर भी होता है, ऐसी शिक्षा और डिग्री दिलवाकर आप जैसे लोग ही 'बेरोज़गारी' को ज़िंदा रखे हो और फिर चले आओगे आंदोलन लेकर ! जितनी मेहनत आप कर रहे हो, उसके लिए कभी बच्चों को ही प्रेरित कर दिया होता !

लेकिन ये भी सच है, कि तस्वीर भले ही यही सामने आई हो, पर सिर्फ़ बिहार ही नहीं, ऐसे तमाशे और भी कई राज्यों में शिक्षा की मिट्टी पलीद किए हुए हैं ! 
यही भारत देश है मेरा......! :( 
- प्रीति 'अज्ञात'

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

मज़हब नहीं सिखाता....!

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना....
फिर ये 'मज़हब' है ही क्यों ?
क्योंकि ये जो नहीं सिखाता, वही तो सब सीखते आए हैं !
'धर्म' न होता तो लड़ने के लिए कौन सा मुद्दा होता ?  देश में जितने भी दंगे-फ़साद , आगजनी, हत्याएँ और इस तरह के असंख्य अमानवीय कृत्य होते रहे हैं , इनका जिम्मेदार कौन है ? क्या सचमुच 'धर्म' ही इसकी वज़ह है या उन अराजकीय तत्वों  की मानसिकता, जिन्हें 'घृणा' से 'प्रेम' है ? पर फिर भी जनता बेवकूफ बनती आ रही है, ये 'जनता' भोली नहीं रही, बल्कि चंद सिक्कों के लिए आसानी से अपना ईमान बेचना सीख गई  है।  इन लोगों को होश तभी आता है, जब स्वयं पर बीतती है, इनके ही 'धर्म' की आड़ में जब इन पर प्रहार होता है। 

'धर्म' का इंसान से कोई भी सीधा सम्बन्ध नहीं सिवाय इसके कि ये जन्म के साथ आपको 'बोनस' में मिलता है. बात इसके सही इस्तेमाल की है. इंसानियत पैदाइशी नहीं होती, ये आपको सीखनी होती है. आप 'इंसान' बनें रहें, 'धर्म' कहीं नहीं जाने वाला ! एक इंसान, अच्छा या बुरा हो सकता है, धर्म का उसकी सोच से क्या संबंध ? क्या किसी धर्म ने बुरा व्यक्ति बनने के रास्ते दिखाए हैं ? संवेदनहीनता, हिंसा, अमानवीय और पाश्विक व्यवहार का समर्थन कौन सा धर्म करता है ? और यदि धर्म के कारण ऐसा हो रहा है, तो फिर ये 'धर्म' ही हर परेशानी की जड़ है ! इसे हटाने की हिम्मत जुटानी होगी ! पर अगर सारे धर्मों के लोगों के अपराधों का हिसाब-क़िताब लगाया जाए, तो हरेक के हिस्से में हर तरह का अपराध आएगा ! फिर तो सारे ही धर्म, अत्याचार के समर्थक हुए ? जो धर्म जितना बड़ा, उसका हिस्सा उतना ही ज़्यादा ? ये भी संभव है कि जो धर्म छोटा, उस पर अत्याचार ज़्यादा ? दुनिया की रीत है, पलटवार करने वाले से सब भयभीत रहते  हैं और दुर्बल को सताने में सबको अपार आनंद की अनुभूति होती है ! लेकिन जब 'दुर्बल' की सहनशक्ति टूट जाती है, तो उसके सामने कोई नहीं टिक पाता. ये इंसानी फ़ितरत है. पुनश्च, इसका आपके 'धर्म' से कोई ताल्लुक़ नहीं !

अपराधी, 'अपराधी' ही है. बहस, उसके जघन्य कृत्य पर ही होना चाहिए. उसके नाम के पीछे क्या लगा है, वो उसे परिभाषित नहीं करता. पर इस  सुशिक्षित, सभ्य समाज का  सर्वाधिक दुखद पक्ष यही है, कि लोग अपराधी की जात पर पहले गौर करते हैं, और उसकी बर्बरता की चर्चा बाद में होती है. दुर्भाग्य की बात है कि अपराध के विरोध और समर्थन में दो गुटों का निर्माण उसी वक़्त हो जाता है।

अगर समाज में परिवर्तन चाहते हैं, तो 'उपनाम' के मोह से बचें ! ज़्यादातर लोग धर्म के नाम पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं. आपकी इज़्ज़त, आपका रूतबा, आपके प्रति लोगों का नज़रिया...आपके व्यवहार पर निर्भर करता है. दूसरे के बुरे व्यवहार को अपनी क़ौम पर हमला न समझें. वो बुरा है, इसलिए उसने ऐसा किया. वो आपको मारना चाहता है, इंसानियत का विरोधी है, आप 'उसका' विरोध करें, पर अपने धर्म की महानता का बखान करे बिना. क्योंकि जब गिनाने की बात आएगी, तो आप बगलें झाँकते नज़र आएँगे ! सच तो यह है कि सबका हृदय जानता है, कि धर्म हमें सही राह दिखाते हैं और सभी धर्म 'सर्वश्रेष्ठ' हैं ! विचारणीय बात यह है  कि इसके बावज़ूद भी आतंक का इतना गहरा साया क्यूँ है. बाहरी ताक़तों की बात तो समझ आती है, पर जो घर में होता आ रहा है उसका क्या ? ये सब, कौन करवा रहा है ? कहीं राजनीतिक पार्टियां , वोट बैंक की लालसा में आम जनता को ही बलि का बकरा तो नहीं बना रहीं ? गरीबी-भुखमरी, अशिक्षा , बेरोजगारी ; इन  समस्याओं का निवारण हो गया है क्या ? या इनकी चर्चा 'आउटडेटेड' है !

इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण आप लोगों ने भी अवश्य देखे  होंगे कि कई घरों में ऐसी घटनाओं की निंदा करते समय ऐसे वाक्य सुनने को मिलते हैं....'इनकी तो जात ही ऐसी है' 'ये लोग बहुत कट्टर होते हैं, किसी को नहीं छोड़ते', 'इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए' वग़ैरह-वग़ैरह ! अगले दिन, उन घरों के बच्चे यही बात अपने साथियों से कह रहे होते हैं, बिना किसी प्रामाणिक तथ्य के। ये आगामी पीढ़ी के 'सोच' के पतन की शुरुआत है ! हमें इन्हें, यहीं से रोकना होगा ! अन्यथा ये समस्या जस-की-तस रहेगी !

यदि आप ईश्वर में सचमुच विश्वास रखते हैं तो  अपने-अपने घरों में, अपने बच्चों को सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाएं ! यदि नास्तिक हैं तो यह आपकी स्वतंत्रता है पर किसी और को सोच बदलने के लिए बाध्य न करें। हर इंसान को धर्म, जाति  से ऊपर उठकर अपनी एक पहचान बनाने का अवसर दें यही एक तरीका है, आने वाली नस्लों को हैवानियत से बचाने का !

एक सवाल, स्वयं से भी करें ! आप कौन हैं ? आप किस  रूप में याद किये जाना पसंद करेंगे या अपने धर्म से ही अपनी पहचान बनाएंगे ? वो पहचान जो पहले से ही तय की जा चुकी है , तो फिर आपके होने-न-होने का मतलब ही क्या ? क्या धर्म , इंसानियत से भी बड़ा होता है ?

विमर्श करें -
'मैं कौन हूँ'
मेरा उठना-बैठना
खाना-पीना, रहन-सहन
बातचीत का तरीका
स्वभाव,शिक्षण,व्यवसाय
विवाह की उम्र
शिष्टाचार,जीवन-शैली
यहाँ तक कि
मौत के बाद की
विधि भी,
सब कुछ तय है
मेरे जन्म के समय से.

पैदा होते ही तो लग जाता है
ठप्पा उपनाम का
जुड़ जाता है धर्म 
पिछलग्गू बन 
नाम के साथ ही
और उसी पल हो जाती है
सारी राष्ट्रीयता एक तरफ.
आस्था हो, न हो
विश्वास हो, न हो
पर इंसान को जाने बिना ही
समाज निर्धारित कर लेता है
उसके गुण-अवगुण,
चस्पा कर दी जाती हैं
उसके व्यक्तित्व पर
कुछ सुनिश्चित मान्यताएँ.

सीमाएँ लाँघने पर 
तीक्ष्णता-से घूरती हैं 
एक साथ कई निगाहें
फिर समवेत स्वर में उसे
नास्तिक करार कर दिया जाता है,
उन्हीं लोगों के द्वारा
जिन्होंने संकुचित कर रखी है
अपनी विचारधारा !
अपने धर्म की परिधि के भीतर ही
ये बुहारा करते हैं, रोज ';अपना'; आँगन 
सँवारते हैं, उसे
गीत गाते हैं मात्र उसी के हरदम.
धर्म-विधान के नाम पर
हो-हल्ला मचाते
ये तथाकथित संस्कारी लोग
रख देते हैं अपनी भारतीयता 
ऐसे मौकों पर, दूर कहीं कोने में.

राष्ट्र-हित की आड़ में 
बातें करने वालों ने
बो दिया है ज़हरीला बीज
तुम्हें खुद ही तोड़ने का
और हो गये हैं सभी सिर्फ़
अपने-अपने धर्म के अधीन.
तो फिर स्वतंत्र कौन है ?
मैं कौन हूँ?
तुम कौन हो?
जो वाकई चाहते हो स्वतंत्रता
तो तोड़ना होगा सबसे पहले
धर्म और प्रांत का बंधन.

ईश्वर एक ही है
मौजूद है, हर शहर, हर गली
हर चेहरे में,
हटा दो मुखौटा
और देखो
एक ही खुश्बू है
हर प्रदेश की मिट्टी की
हरेक घर का गुलाब 
एक-सा ही महकता है
महसूस करना ही होगा
तुम्हें  ये अपनापन,
तभी पा सकोगे 
दंगे-फ़साद, आगज़नी-तोड़फोड़
सारी अराजकताओं से दूर
एक स्वतंत्र-भारत !

- प्रीति 'अज्ञात'
*राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, 'वर्तमान मीडिया' , फरवरी'२०१५ अंक में प्रकाशित
चित्र - गूगल से साभार

बुधवार, 19 नवंबर 2014

मानें या न मानें :)

मुझे पूरा विश्वास है, ऐसे और भी हैं..मानें या न मानें

मुझे अंधेरे से डर लगता है, भूत-प्रेत में बिल्कुल यक़ीन नहीं करती, पर रात में पेड़-पौधे भी ऐसी ख़तरनाक इमेज बनाते हैं कि सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है. उस समय, 'विज्ञान गया तेल लेने' और एक पल में ही सारे भगवान याद आ जाते है. जितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करूँ, उतने ही भयंकर टाइप के विचार चौतरफ़ा धावा बोल देते हैं और लगता है.....कहीं भूत आ गया तो ! :O  पहाड़ पर चढ़ने में खूब मज़ा आता है, पर ऊँचाई से देखते ही जान सूखने लगती है, चक्कर आते हैं और यही डर कि... पैर फिसल गया तो !:O बोटिंग पसंद है और तैरना आता नहीं, इसलिये जब तक किनारे वापिस नहीं आ जाऊं, धुकधुकी लगी रहती है...सोचती हूँ, डूब गई तो ! :O हवाई जहाज़ से यात्रा कभी पसंद नहीं आई, बैठते ही 'एअर होस्टेस' डराना शुरू कर देती है और फिर लैंडिंग तक यही बात दिमाग़ में घूमती रहती है कि 'क्रेश' हो गया तो ! :O बस या ट्रेन में 'ज़िंदा' रहने की फिर भी थोड़ी गुंजाइश होती है ! घूमने का बहुत शौक़ है, पर यात्रा से डरती हूँ. काश, कोई ऐसा तरीका ईज़ाद हो जाए....कि बस एक क्लिक से ही एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश पहुँच जाएँ ! और हाँ, ऐसा हो सकता है ! पहले कभी सोचा था कि दूर बैठे अपनों को इस 'स्टुपिड माध्यम' से देख सकेंगे, बातें कर सकेंगे, पर हुआ न ! तो, ये भी ज़रूर होगा ! विज्ञान ने खूब तरक़्क़ी कर ली है, पर उफ्फ्फ, कब तक सपने बुनते रहें...वैज्ञानिकों, जल्दी करो....हम मर गये तो ! :P

जानती हूँ, किसी के चले जाने से किसी का जीवन रुकता नहीं ! लेकिन क्या करें, खुद से नहीं, 'ज़िंदगी' से ग़ज़ब का इश्क़ है ! वैसे भी इस जीवन में कुछ लोगों को इत्ता पकाया है, कि अगले जन्म में कीड़े-मकोडे ही बनेंगे ! आप लोग भी ज़्यादा खुश मत होना, कहीं आप भी वही बन गये तो ? :D
विशेष - सबसे अजीब बात ये भी है कि जब कोई और डर रहा हो, तब न जाने कहाँ से इतना हौसला आ जाता है कि हमारे मारे, डर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है. ये भी एक कला है, पर हमें इसका ज़रा भी घमंड नहीं ! :P :D

-प्रीति 'अज्ञात'
चित्र : गूगल से साभार

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

रिक्शावाला


'रिक्शा' या तीन पहियों पर चलने वाली साईकिल, नाम सुनते ही आज भी एक अजीब-सी शर्मिंदगी होने लगती है. अपराध-बोध का अनुभव होता है. दु:ख होता है न, ये देखकर कि आदमी ही, आदमी को खींचकर ले जा रहा है. पर जब स्कूल जाया करती थी, उन दिनों आने-जाने का यही एकमात्र साधन था. मुझे हमेशा से ही इस पर बैठना बुरा लगता रहा है, चलाने वाला पसीने में तर-बतर और हम बेशरम-से उस पर लदे हुए ! पैदल जाने के हिसाब से उम्र कम थी और दूरी ज़्यादा, सो और कोई विकल्प ही नहीं था. ४ बच्चे आगे और ३ पीछे लटके हुए, और उस पर उनके बेग भी...१०-१२ बच्चों का वजन वो काका कैसे खींचा करते होंगे , पता नहीं ! पर मैं, एक भी अतिरिक्त 'नोटबुक' नहीं ले जाती थी, कि कुछ तो वजन कम हो ! मन हमेशा ग्लानि से भरा रहता था. जैसे ही सातवीं कक्षा में आई, फिर इससे स्कूल जाना तो छोड़ दिया था. लेकिन 'रिक्शा' फिर भी नहीं छूटा, बस स्टैंड या मार्केट जाते समय फिर उस पर लद जाते, जब साथ की सहेली उन्हें जल्दी चलाने को बोलती, तो मैं सर झुकाए उसका हाथ खींचकर टोक देती, "क्या यार, देख तो..कितनी मेहनत लगती है इसमें !"

एक बार, सामान कुछ ज़्यादा ही था...तो मैंनें 'रिक्शे वाले' को थेन्क यू और सॉरी भैया, दोनों बोला. उन्होंनें चौंककर मुझे कहा, "थेन्क यू तो समझा, पर सॉरी किसलिए ?" मैंनें खिसियाते हुए जवाब दिया, "वो आप को हमारी वजह से इतनी मेहनत करनी पड़ी न, इसलिए ! मुझे रिक्शे में बैठने में अफ़सोस होता है, पर मजबूरी में बैठना पड़ता है" मेरी बात सुनकर वो हँसे भी और उनकी आँखें भी भीग गईं. फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, अगर ऐसा ही सब सोचने लगे, तो हम कमाएँगे कैसे गुड़िया ? मैं चुप हो, सोच में पड़ गई ! उसके बाद जब भी दूर जाना होता, निगाहें उन्हें ही ढूँढा करतीं. वो भी देखते ही तेज़ी से आ जाते थे. मम्मी ने भी एक दिन पूछा, कि "तुझे जानते हैं ?" और मैंनें गर्व से 'हाँ' बोल दिया ! :)

समय का पहिया चलता रहा.....जगह बदलती रहीं ! ७-८ वर्ष पूर्व की बात है, मैं मायके गई हुई थी. मम्मी और अपनी बेटी के साथ मार्केट जाने को निकली ही थी, कि एक रिक्शा अचानक आकर रुका और वही आवाज़.."बैठो, गुड़िया". मैं तो जैसे खुशी से पगला ही गई. अरे, आप ! आपने मुझे पहचान भी लिया ? मम्मी तुरंत बोलीं, तुम्हारी शादी के बाद से ये मुझे भी लेके जाते हैं और तुम्हारे हाल-चाल भी पूछा करते हैं ! उन्होंनें बड़े स्नेह के साथ, मेरी बेटी को गोदी में लेकर उसे रिक्शे में बैठाया और बोले "ये है, हमारी गुड़िया की गुड़िया, बिल्कुल हमारी गुड़िया जैसी !" उसे आशीर्वाद दिया . ज़िद करने पर भी उन्होनें एक रुपया तक नहीं लिया, बोले "बेटियों से भी कोई लेता है क्या?"
घर पहुँचकर, बेटी ने पूछा, " मम्मी आप उन अंकल जी को जानती थी क्या ?" मैंनें उसी गर्व के साथ जवाब दिया, और नहीं तो क्या ! पर इस बार मेरी पलकें भीगीं थीं. :)
- प्रीति 'अज्ञात'

* आज नेट पर 'रिक्शे' की इतनी सुंदर तस्वीर देखकर ये पुरानी बात याद आ गई और साझा करने का मन हुआ !

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

Bigg Boss

चित्र : गूगल से साभार !

कलर्स पर आने वाले कार्यक्रम, 'बिग बॉस' के बारे में सभी लोगों के अलग-अलग विचार होंगे. लेकिन मैंनें महसूस किया है, कि देशहित के लिए ऐसे कार्यक्रमों का होना अत्यंत ही आवश्यक है. बीते आठ वर्षों में इसके अभूतपूर्व योगदान और शिक्षा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ! आइए, अब निम्न बिंदुओं पर नज़र डालते हैं (ध्यान रहे, 'नज़र' लग न जाए)  :P -

* 'बिग बॉस' का पहला और सबसे ज़रूरी नियम है, 'हिन्दी में बात करना' ! यहाँ सिर्फ़ इस नियम का पालन ही नहीं होता, बल्कि इसका उल्लंघन करने वाले को कड़ी-से-कड़ी सज़ा देने की भी उचित व्यवस्था की गई है. कहीं और देखा है, ऐसा ? :)
* यहाँ स्त्री-पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं होता, और दोनों को ही घरेलू कामकाज...जैसे कपड़े धोना, बर्तन मांजना, झाड़ू-पोंछा करना उत्तम तरीके से सिखाया जाता है. ये न केवल इनके भविष्य के लिए उपयोगी सिद्ध होगा अपितु देशव्यापी सफाई-अभियान में भी इनके योगदान को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है. :D
* किसी भी प्रकार की 'हिंसा' के लिए यहाँ कोई जगह नहीं, और यदि आप ऐसा करते हुए पाए गये तो आपके निष्कासन का कड़ा प्रावधान भी है. क़सम से, बड़ी बेइज़्ज़ती होती है ! ;)
* यहाँ सिर्फ़ 'सॉरी' कह देना ही काफ़ी नहीं, आपको आत्मग्लानि के समंदर में भीतर तक डूबना होता है, उसके बाद ही माफ़ी पर विचार किया जाता है. 'गाली-गलौज़' की भी जमकर भर्त्सना होती है. यानी आपके अंदर अच्छे संस्कार रहे, इस पक्ष पर भी पूरा ध्यान दिया गया है. :)
* ये कार्यक्रम 'शेअरिंग' भी सिखाता है, कम सामग्री होने पर उसका बँटवारा कैसे किया जाए. भूखे पेट कैसे रहा जाए इत्यादि. त्याग और बलिदान की अमर कहानियाँ भी इसमें अक़्सर देखने को मिलती हैं.
* यह आलस को बिल्कुल बढ़ावा नहीं देता, दिन में सोने की अनुमति किसी को भी नहीं मिलती. इसी कारण, कार्य करने के लिए अधिक समय मिलता है और फिटनेस भी बनी रहती है.
* इससे हमें 'राष्ट्रीय एकता' का संदेश भी मिलता है, विभिन्न प्रांतों, व्यवसायों, धर्मों और अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानने वाले यहाँ एकजुट होकर रहते हैं. साथ में खाते-पीते, उठते-बैठते, नाचते-गाते हैं. इस कार्यक्रम में गीत-संगीत और नृत्य कला को भी महत्वपूर्ण माना गया है.
* चुगली करने वालों और झूठ बोलने वालों को यहाँ, हिक़ारत भरी नज़रों से भेदा जाता है, और फिर उनका सच सबको दिखाकर यह भी सिखाते हैं कि 'झूठ बोलना गंदी बात है' :P
*यह कार्यक्रम टीवी. मोबाइल, कंप्यूटर एवं इसी तरह के अन्य 'समय बर्बादू उपकरणों' के इस्तेमाल का घोर विरोध करता है, जिससे न केवल विद्धूत और समय की बचत होती है, बल्कि यह भी सीख मिलती है कि इन सबके बिना भी ज़िंदा रहा जा सकता है !
* यह संयुक्त परिवार में रहना सिखाता है और इंसानों को कुसंगतियों से दूर रहने की शिक्षा भी देता है.

इस तरह हम कह सकते हैं कि 'बिग बॉस' जैसे कार्यक्रम हमारे व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करते हैं. ये हमें न सिर्फ़ जीवन जीना सिखाते हैं बल्कि विषम परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा भी देते हैं. ऐसे कार्यक्रम हमेशा चलते रहें और इनका उपयोग हर भारतीय नागरिक के लिए किया जाए, जिससे वो जब तीन माह बाद इस घर से बाहर आएँ तो एक उत्तम नागरिक बन, समाज के निर्माण और देश के विकास में पूरा सहयोग करें.
:)
* इस प्रेरणात्मक निबंध का 'कलर्स' या किसी और से कोई लेना-देना नहीं है. इस पर केवल हमारा ही कॉपीराइट बनता है. चुराए जाने पर 'जेल' जाना पड़ सकता है और वो भी असली वाली ! :P
- प्रीति 'अज्ञात' द्वारा जनहित में जारी !

'सरल' या 'क्लिष्ट' ?


चित्र : गूगल से साभार !

'भाषा' क्या है और 'साहित्यिक भाषा' इससे कितनी अलग होनी चाहिए. इस बात पर बुद्धिजीवी कभी भी एकमत नहीं होते. पूरी तरह से किसी एक पक्ष का समर्थन देने में उनका संकोच स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है.. कुछ भाषाई क्लिष्टता को ही साहित्यिक रचना की प्रथम गुणवत्ता मानते हैं, जबकि कुछ इससे भिन्न सोच रखते हैं. मेरा स्वयं का तो यही मानना है, कि कठिनता, काव्य की सरसता में बाधा पैदा करती है. भाषा वही हो, जो अभिव्यक्ति में रुकावट न डाले. सरल, सहज भाषा यदि जनमानस के हृदय को सीधे-सीधे छू जाती है, तो इसका एकमात्र कारण यही है, कि ये न सिर्फ़ आसानी से समझ में आने वाली भाषा है, बल्कि इससे वह खुद को जुड़ा हुआ भी महसूस करता है. कठिन शब्दों के जान-बूझकर किए गये प्रयोग उस रचना के भाव को ही ख़त्म कर देते हैं, और पाठक अर्थ की खोज में उलझकर, लाचार अनुभव करता है.

यहाँ ये जान लेना भी अत्यंत आवश्यक है, कि 'क्लिष्टता' है क्या ? इसकी कोई परिभाषा है भी या नहीं ? हम जा रहे हैं या प्रस्थान कर रहे हैं, भोजन कर लिया है या खाना खा लिया है, आने-जाने के साधन या आवागमन के, नीर या जल या केवल पानी ही, स्नान करना या नहा लेना.....हमारे रोज़मर्रा के जीवन में आसानी से घुले हुए शब्द ! जो कि किसी भी मायने में क्लिष्ट नहीं. लेकिन फिर भी संभव है कि आंग्ल भाषा में पढ़े हुए व्यक्ति को आवागमन, स्नान, भोजन, प्रस्थान जैसे शब्द कठिन लगें. पर ये इन शब्दों का दोष नहीं, अपितु पाठक का इनसे अपरिचित होना है. यहाँ इस बात की संभावनाएँ अधिक प्रबल हैं , कि हमारी अल्पज्ञता या अनभिज्ञता को हम दूसरे की क्लिष्टता का नाम देकर उस पर दोषारोपण का प्रयास कर रहे हों. ऐसी स्थिति में हमें तुरंत ही अपने शब्दकोष में वृद्धि करने की आवश्यकता है भाषाई व्यापकता हमेशा लाभकारी ही रहती है, और ज्ञान ने कभी किसी का नुकसान नहीं किया.

आजकल यह भी देखने में आता है, कि बहुत बड़े साहित्यकार, भाषा-विशारद और हर तरह से खुद को श्रेष्ठ मानने वाले लेखक कहीं-न-कहीं कुंठा के शिकार होते जा रहे हैं. क्योंकि उन्हें अपने से कम जानकार लोगों का प्रसिद्ध होना, पुरूस्कार पाना या वाह-वाही लूटना सहन नहीं होता. लेकिन वो ये नहीं समझ पाते, कि आम जनता वही पढ़ना चाहती है, जो उसे न सिर्फ़ अपना-सा लगे बल्कि जिसे पढ़ते समय उसे शब्दकोष न खोलना पड़े. भागते-दौड़ते जीवन में समयाभाव सबसे बड़ा रोना है, ऐसे में यदि कोई फ़ुर्सत के कुछ पल चुराकर लिखना-पढ़ना चाहे; वही बहुत बड़ी उपलब्धि है, और ऐसे में भाषाई अड़चन उसे साहित्य से विमुख भी कर सकती है. यहाँ यह कह देना भी प्रासंगिक होगा कि डेविड धवन सरीखे फिल्मकार बॉक्स-ऑफीस पर चाहे कितनी भी कमाई कर लोकप्रिय हो जाएँ, खूब धूम भी मचाएँ ; पर राष्ट्रीय पुरूस्कार सत्यजीत रॉय को ही मिलता है  इसलिए नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने में कंजूसी न दिखाएँ, क्योंकि प्रतिभावान इंसान का स्थान इससे नहीं डिगता ! अपने अंदर छुपी प्रतिभा को मारने वाले हम स्‍वयं ही होते हैं, कभी निराशा में तो कभी कुंठाग्रस्त होकर ! सूरज की रोशनी से सारी दुनिया जगमगाती है, लेकिन यही सूरज डूबने के बाद चाँद को रोशन कर देता है, पर महत्व दोनों का ही एक-दूसरे से है. प्रकाश दोनों से ही मिलता है, कोई जीवन देता है, तो कोई मरहम सा बनकर मन शीतल कर देता है.

लेखन में हिन्दी, उर्दू, अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रयोग भी सहजता से हो रहा है, यदि यह काव्य की माँग है, तो रचना के अंत में उन शब्दों के अर्थ लिखकर न सिर्फ़ पाठक को परेशान होने से बचाया जा सकता है बल्कि उसकी रूचि भी बढ़ाई जा सकती है. 
टीवी और समाचार पत्रों की लोकप्रियता इसीलिए अब तक बनी हुई है, क्योंकि ये जनमानस की भाषा में बात करते और लिखते हैं. इनकी विशिष्टता इनकी सर्वजन सुबोधता और लचीला होना ही है. ये विज्ञान और प्रोद्धौगिकी की भाषा में बात नहीं करते. इसीलिए आम जनता इनसे आज भी उतनी ही जुड़ी हुई है, जितना कि वर्षों पहले हुआ करती थी.

ज़रा सोचकर देखिए, यदि हमारे ग्रंथों के सरल भाषा में अनुवाद उपलब्ध न होते, साधारण शब्दों में उनकी व्याख्या न की गई होती, तो कितनों ने उन्हें पढ़ा होता ? पहले समाज में हर वर्ग का एक निश्चित कार्य हुआ करता था, विभाजन बेहद स्पष्ट था. संभवत: ज्ञान पाकर, उस पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए भी उस समय इसका क्लिष्टीकरण एक अहम मुद्दा रहा होगा ! पर अब परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, पर इतना परिवर्तन तो आ ही चुका है, कि शिक्षा और भाषाई स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त हो चुकी है, लेकिन हाँ, हमें भाषा का स्तर नहीं गिराना चाहिए बल्कि इसके प्रयोगवादी स्वरूप को और विकसित करने में अपना पूरा योगदान देना चाहिए. हरेक के लेखन की अपनी एक शैली होती है और वही उसकी पहचान भी बनती है, ऐसे में सबको अपने तरीके से अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है. बस, भाषाई नीरसता से बचें, पर इसकी पवित्रता पर आँच भी न आने दें.  यह अपने मूल उद्देश्य संप्रेषण में पूरी तरह से सक्षम बनी रहे. और समयानुसार समृद्ध भी होती रहे.

भाषा न तो अभिजात्य वर्ग की बपौती है और न ही शब्दों की फ़िज़ूलखर्ची ! तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी......जो भी हैं, सब भाषा है, पाठक से करीबी रिश्ता बनाने के लिए ईमानदार, और संवेदनशील होना बेहद ज़रूरी है, उससे बतियाना भी ज़रूरी है. बस यही प्रयत्न कीजिए, कि भाषा पर संकट न आए, हमारा आपका उससे करीबी रिश्ता बना रहे, अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं पर हृदय में जो भी भाव उठें, जैसी भी अनुभूति हो, उसे व्यक्त ज़रूर करें. चाहे सरल हो या क्लिष्ट; वही भाषा अपनाएँ, जो आपकी अपनी हो. क्योंकि बनावटी सामान ज़्यादा दिन नहीं चलता और उसकी असलियत भी सबके सामने आते देर नहीं लगती. पाठक और लेखक के बीच भी एक रिश्ता बन जाता है, जहाँ नियमित पाठक, बिना व्याख्या के ही चंद पंक्तियों से सब कुछ समझ जाते हैं. ये भी एक तरह का संवाद ही तो हुआ ! 'संवाद' जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है. संवादहीनता रिश्तों को तिल-तिलकर मरने को छोड़ देती है, वहीं कुछ पलों का संवाद इसी गहरी खाई को कब भर दे, पता भी नहीं चलता.....'लेखन' और 'रिश्ते' जबरन संभव नहीं, इनके लिए दिल से जुड़ा होना पहला नियम है और शायद आख़िरी भी ! ईमानदारी और समर्पण के बिना इन्हें ज़्यादा दिनों तक नहीं खींचा जा सकता ! ईश्वर आपका लेखन और जीवन सफल बनाए,, आपका घर-परिवार हमेशा खुशियों से भरा रहे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ

- प्रीति 'अज्ञात'
* 'साहित्य रागिनी वेब पत्रिका' मई अंक (2014), के लिए लिखा गया, मेरा संपादकीय :)
http://www.sahityaragini.com/rachna.php?id=320

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

एक सीधा, खूबसूरत, हरियाली से आच्छादित रास्ता, कि जिसे देख उम्र-भर चलते रहने का ही मन करे ! मंज़िल तक पहुँचने के बाद, पाने के लिए और बचता भी क्या है ! दु:ख तब होता है, जब इन्हीं सुंदर राहों पर अचानक ही कोई घुमावदार मोड़ आ जाए. ऐसे में ये लाचार, बेबस मन, भौंचक्का-सा आँखें फाडे जीवन की भूल-भुलैइयाँ को समझने की हर असफल कोशिश में हताश हो उठता है. पर अब इन गलियों में भटकते रहने के सिवाय और कोई उपाय ही नहीं. न साथ कोई, जो हौसला दे. खूबसूरत राहें भी तन्हा कहाँ सुहाती हैं, दिल ख़ालीपन से भर डूबने लगता है, बेचैन हो मचलता भी है......और एक दिन, ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है, उन्हीं अंधेरी, संकरी गलियों में, जहाँ अपनी परछाई भी साथ नहीं देती. उस समय बचपन में हज़ारों बार सुनी एक बात के मायने समझ आने लगते हैं, कि 'जो जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं'....पर कहते हैं, न 'जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है' सो ये भटकन भी वापिस उसी तरफ खींच लाती है, जहाँ से 'जीवन' कभी शुरू हुआ था. सीख भी मिलती है, कि कुछ लोगों का जन्म, दूसरों के लिए ही हुआ है. उदासी तो यूँ भी व्यक्तिगत ही हुआ करती है, कौन महसूस कर पाया है, इसे ? दूर भी वही कर सकता है, जिसकी वजह से ये उदासी है या फिर हम स्वयं ही !

लेकिन ये घने, छायादार वृक्ष, बिन कहे ही कितना कह जाते हैं, इस हरियाली का जीवन कितना नि: स्वार्थ है ! ये हरीतिमा, फूल-फल से लदे वृक्ष, मुसाफिरों को छाया देते हैं, अपनेपन का एहसास कराते हैं , बिन किराए, कुछ पल चैन से बैठने की तसल्ली देते हैं. इन्हें अपने होने का मतलब पता है, ये शिकायत नहीं करते, ये जानते हुए भी, कि कोई राहगीर पलटकर उनकी तरफ वापिस कभी नहीं आएगा. उन्हें ये भी पता है कि, दिन की चटक रोशनी में ही हमें उनकी ज़रूरत महसूस होती है. रात के काले, गहरे अंधेरे के छाते ही, यही भयावह दिखने लगता है, असल ज़िंदगी की तरह !

सीखना ही होगा, इस वृक्ष से.... जिसकी ज़िंदगी अपनी नहीं, खुशियाँ अपनी नहीं...निराशा के अंधेरे, आँखों की नमी को दूसरों की मुस्कान में तब्दील होता देखकर ही सुकून पाता रहा है, जब तक ये जीवित है, प्राणवायु भी देता है कि हमारे अस्तित्व को ख़तरा न रहे !

न जन्म अपना है और न मृत्यु पर वश है, तो इन राहों पर भी अधिकार क्यूँ जताएँ हम, 
बेहतर है, आख़िरी बार भी हारकर खुद से ही
आओ, चलो.... अब 'वृक्ष' बन जाएँ हम ! :)
- प्रीति 'अज्ञात'

* 'ताजमहल' परिसर भी उतना ही खूबसूरत है, जितना 'ताजमहल' है और ये चित्र वहीं का है, ज़रा सोचिए अगर ये 'ताजमहल' किसी रेगिस्तान में होता, तब भी क्या इतना ही कीमती लगता ? कहने का तात्पर्य बस यही है, कि 'सौन्दर्य' यूँ ही नहीं निखरता...आसपास का सकारात्मक वातावरण भी उसमें सहयोग देता है ! :) 
BE POSITIVE !

बुधवार, 24 सितंबर 2014

मुझे 'प्रेम' से 'प्रेम' है !

प्रेम' क्या है ? अहसासों की अभिव्यक्ति, अनुभूति, दर्द, टीस, जीने की वजह या ज़रूरत से ज़्यादा ही इस्तेमाल होने वाला महज एक शब्द। जो कभी सच्चा, कभी झूठा, कभी स्वार्थ-निहित, कभी मजबूरी भी हो जाया करता है। क्या प्रेम को समझने के लिए 'प्रेम' करना जरूरी है? शायद हाँ, इसे आत्मा को छूना जरूरी है, इसका रूह तक पहुँचना भी जरूरी है। न जाने कितने आडंबरों से घिरा हुआ है ये 'प्रेम'। पर यह किसी भी कोण से मात्र स्त्री-पुरुष के शारीरिक-आकर्षण तक ही सीमित नहीं। यह भी सच है कि जब इश्क़ की बात आए तो हम सभी लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल की बातें करते हैं। कभी चर्चा होती है, राधा-किशन की तो कभी मीरा-घनश्याम की। यानी ये भी सदियों से तय है कि प्रेम में प्राप्य की इच्छा रखना बेमानी है। तो फिर हम सभी 'प्रेम' से 'प्रेम' क्यूँ नहीं करते? क्यूँ आजकल लोग मोहब्बत के नाम पर ख़ुद को तबाह कर लिया करते हैं और कुछ तो ऐसे भी किस्से होते हैं, जहाँ उम्र-भर साथ निभाने का वादा करने वाले आशिक़ अस्वीकृत हो जाने पर अपने ही प्रेमी/प्रेमिका को बर्बाद करने से नहीं चूकते। प्रेम का यह रूप कितना वीभत्स और घिनौना है। दरअसल ये 'प्रेम' है ही नहीं।

'प्रेम' को परिभाषित करना आसान नहीं, पर मेरा तो यही मानना है कि जीवन-अभिव्यक्ति का सबसे सार्थक रूप प्रेम ही है। यदि इस अहसास को पूरी तरह से जी लिया जाए, तो आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या, कटुता, मन-मुटाव जैसे भाव स्वत: ही समाप्त हो जाएँगे। प्रेम एक सुखद अनुभूति है, जिसमें हमें पाने से ज़्यादा देने में सुख का अनुभव होता है। जिससे हम स्नेह करते हैं, उसकी खुशी अपनी-सी लगती है और उसकी ज़रा-सी परेशानी से मन जार-जार रोता है। उन पलकों से आँसू गिरने के पहले ही दुख को भाँप लेना और उसे दूर करने के लिए दिन-रात एक कर देना भी तो इसी प्यार का ही एक सुनहरा रूप है। आँखों में हर वक़्त अपने प्रिय की छवि और उसकी चाहत को दिल में बसाते हुए जीना कितना सुंदर अहसास होता है। 'प्रेम' मानव-जीवन की एक मिठास है, जिसकी प्रथम अनुभूति माता-पिता के अपार स्नेह और देखभाल से होती है। कहते हैं, जो हम दुनिया को देते हैं; हमें भी वही मिलता है तो फिर क्यूँ न हम सब स्नेह भरी वाणी से ही इस दुनिया का दिल जीत लें। कोशिश तो की ही जा सकती है, न ! जितनी वरीयता हम दूसरों को अपनी ज़िंदगी में देंगे, उतनी या उससे ज़्यादा प्राथमिकता शायद वो भी हमें दे दें ! न भी दें, पर हम तो अपना कार्य निश्छलता से करें. समर्पण भी तो प्रेम का एक व्यापक रूप ही है। बच्चों की परवरिश में प्रेमपूर्ण वातावरण एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मार के ऊपर प्यार का पलड़ा हमेशा भारी रहा है। कभी इन्हीं नन्हे-मुन्नों पर आज़माकर देखिए।

स्त्री-पुरुष का प्रेम जितना सुंदर है, उतना ही क्लिष्ट भी। यहाँ अपेक्षाएँ रिश्तों पर हावी हो जाया करती हैं। कहीं अहंकार तो कहीं अवसाद घुन बनकर सारी सुंदरता को नष्ट कर देते हैं। संभवत: इसीलिए ज़्यादातर प्रेम-कहानियों का अंत दुखद ही होता है। मन से किसी से जुड़ना, विचारों-भावों का मिलन, साथ बीते कुछ हंसते-हँसाते पल इतना प्रेम ही काफ़ी है, जीवन जीने के लिए लेकिन इसके बिना भी तो जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इस ढाई आखर के शब्द ने पूरा साहित्य रच डाला है। 'प्रेम' न होता, तो किस पर लिखते? क्या लिखते? कैसे लिखते? न कविता होती, न कहानी, न गीत, न ग़ज़ल। हम सबके पास ऐसे न जाने कितने पल हैं, जो जीना सिखा देते हैं और अनायास ही हम उन्हें चाहने भी लगते हैं फिर लिख डालते हैं, इन्हीं मधुर-स्मृतियों को प्रेम की स्याही में डुबोकर। कभी मन भावुक हो उठता है, तो कभी प्रसन्न। कभी आँखें दुःख में बरसती है, तो कभी खुश हो छलकती हैं। 'प्रेम' ही 'साहित्य' है और 'साहित्य' ही 'प्रेम' है। 'प्रेम' शिक्षक भी तो है। यही हमें सिखाता है कि सब दिन एक से नहीं होते। सुख और दुःख दोनों ही को समान रूप से लेना चाहिए। परिस्थितियों में समय के साथ परिवर्तन अवश्य होता है, पर इंसान भीतर से वही रहता है। प्रेम विश्वास भी सिखाता है। दुनिया में कितनी खूबसूरती व्याप्त है, इसे सिर्फ़ एक स्नेहिल हृदय ही महसूस कर सकता है। अपने अंतर्मन से पूछिए,

क्या आपको प्रेम है -

बारिश की बूँदों से,
मिट्टी की खुश्बू से,
नदिया की कलकल से,
लहरों की हलचल से,
जंगल के हिरणों से
सूरज की किरणों से,
बहते इन झरनों से
पलते इन सपनों से
फूलों और कलियों से
गाँव और गलियों से
होली के रंगों से
घर के हुड़दंगों से
दीपक की बाती से
बगिया की माटी से
पेड़ों के झूलों से
कच्चे इन चूल्हों से
बच्चों की टोली से
मीठी उस बोली से...... और न जाने ऐसे कितने ही अद्भुत क्षण।

प्रकृति ने हर तरफ से अपने स्नेहांचल में ही तो हमें घेरे रखा है। हरे-भरे वृक्ष से झुकी हुई डालियां, उन पर बैठे खुशी में फुर्र से इधर-उधर फुदकते पंछी और फूलों पर मंडराते हुए भंवरे किसका मन नहीं मोह लेते। झील के किनारे घंटों यूँ ही बैठे रहना, कभी आसमान तो कभी पानी में उसकी छवि निहारना, सब कुछ शामिल है, इस प्रेम में।

हाँ, मुझे इस 'प्रेम' से 'प्रेम' है और आपको??

- प्रीति 'अज्ञात'
* 'साहित्य-रागिनी' वेब पत्रिका के लिए, फ़रवरी'२०१४ में लिखा गया मेरा 'संपादकीय' http://www.sahityaragini.com/rachna.php?id=209