शनिवार, 29 जून 2019

कैमरा! जान से जानलेवा तक का सफ़र!

यूँ तो मानव मस्तिष्क ही अपने-आप में सारी स्मृतियों को समेटे रखने के लिए पर्याप्त है. आँख मूँदकर बैठो तो बचपन से लेकर अब तक के सारे पलों की तस्वीर खिंचती चली जाती है. हँसी-ख़ुशी के पल, नाच-गाना, भाई-बहिनों के साथ मारकुटाई, झगड़ा, दोस्तों के साथ मस्ती और भी जाने क्या-क्या; सब किसी लाइट एन्ड साउंड शो की तरह चलने लगते हैं. लेकिन फिर भी तस्वीरों की अपनी एक ख़ास अहमियत होती है कि इसे आप सबके साथ बाँट सकते हैं. जब जी चाहे, देख सकते हैं. याद है न जब घर में album खोलकर बैठते हैं तो कैसे सारा घर इकट्ठा होकर हर तस्वीर की कहानी सुनाने बैठ जाता है और फिर घंटों उन्हीं स्मृतियों के पृष्ठ पलटते गुजर जाते हैं. कितना अच्छा महसूस होता है उस एल्बम को देखने के बाद!
सच! तस्वीरों ने हम सबको जोड़ रखा है. समुंदर पास की कहानी, पहाड़ पर चढ़ने की कहानी, जंगल में पेड़ की शाखा से झूलने के किस्से, पार्क, बाज़ार, फिल्म या यायावरी से जुड़ी तमाम बातें बस एक ही क्लिक से सामने आ जाती हैं. तभी तो कहते हैं, 'तस्वीरें बोलती हैं'.
  
कैमरा!! कितना सहज, सरल उपकरण लगता है लेकिन दो दशक पहले तक आम आदमी के लिए ये भी लक्ज़री ही था. इसकी विकास यात्रा के हम सब साक्षी हैं. विशिष्ट अवसरों पर सपरिवार फोटो खिंचाने जाना एक इवेंट की तरह होता था या फिर विवाह योग्य होते ही लड़के-लड़की की तस्वीर स्टूडियो में खींची जाती थी. बैकग्राउंड के लिए कश्मीर की सुरम्य वादियों से लेकर नकली ताजमहल तक के परदे उपलब्ध होते थे वहाँ.  ब्याह-शादी में तीन-चार किलो की भारी-भरकम एल्बम बनती (अभी भी बनती है) थी जिसे देखने का सब ख़ूब बेसब्री से इंतज़ार करते. 

बहुत बड़े या फिर मूवी कैमरे हुआ करते थे जिनका प्रयोग आसान नहीं था. कहीं घूमने जाते (दुर्लभ था उन दिनों) तो टूरिस्ट स्पॉट पर फोटोग्राफर हुआ करते थे. उनसे ही विभिन्न अदाओं में तस्वीरें खिंचवाई जातीं. बाक़ी किस्से बिना तस्वीरों के ही मसाला डाल सुना दिए जाते थे. आनंद और उत्साह से छलकते उन किस्सों का भी एक अलग रस था. अब उनमें वो मजा नहीं और उन फोटोग्राफरों का  व्यवसाय भी समाप्तप्राय: है.
बाद में बच्चों के लिए टॉय कैमरा आया और हैंडी कैमरा आने के बाद हम जैसे अनाड़ी भी स्वयं को फोटोग्राफर समझने की गफ़लत में रहने लगे. राह अब भी आसान नहीं थी. फोटो खींचने के बाद, नेगेटिव के रोल को डेवलप कराने स्टूडियो देने जाना पड़ता और फिर वही हफ़्तों का चक्कर. ये चक्कर उतने ही दुखदायी होते थे जितने कि दर्ज़ी लोग लगवाते हैं. देखने के बाद और दुःख होता क्योंकि आधे फोटो तो ख़राब ही हो जाते पर पैसे पूरे लगते. इस तरह यह शौक़, बहुधा शोक में भी बदल जाया करता था. 
डिजिटल कैमरे के आगमन ने क्रांति ला दी. तब तक लोन कंपनियों ने भी अच्छी पैठ बना ली थी. मध्यम वर्ग के लिए अब कैमरा भी भौतिक प्राथमिकताओं की सूची में प्रवेश कर चुका था. 

इस समय हम मोबाइल के महान दौर में जी रहे हैं जहाँ मोबाइल खरीदते समय बाक़ी सुविधाओं से ज्यादा अच्छे कैमरे पर जोर दिया जाने लगा है, पिक्चर क्वालिटी, ज़ूम इत्यादि. स्वार्थ की हद ही समझिये इसे कि अब सभी का फोकस स्वयं पर अधिक रहता है.  सेल्फी इसी का परिणाम है. अब किसी को किसी की ज़रूरत ही नहीं! बस, मुँह बिचकाया और क्लिक कर दिया.  
कहीं-कहीं मोबाइल कैमरा निजता का हनन भी करता है और इससे सम्बंधित कोई कानून शायद बना ही नहीं है.
मोबाइल के इसी कैमरे से कितनी घटनाएँ वायरल होने लगी हैं. नेताओं की गद्दी पर बन आई है तो कहीं अपराध को बढ़ावा भी मिलने लगा है. अगर ये कहा जाए कि कुछ लोग इसे हथियार की तरह उपयोग में लेने लगे हैं तो भी ग़लत न होगा!
इंटरनेट के सुविधाजनक ऑफर्स के कारण कैमरे का प्रयोग आवश्यकता से अधिक होने लगा है और यह दिनचर्या का अटूट हिस्सा बन चुका है. पर कहते हैं कि अति हर चीज़ की बुरी होती है. हालत यह है कि सेल्फी के चक्कर में पिछले सात वर्षों में हमारे देश के 259 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. ये उपकरण जो हम सबका प्यारा हुआ करता है, अब जानलेवा भी हो गया है. लेकिन दोष किसका है? कहाँ से कहाँ आ गए हैं हम?
कैमरा हमारे सुखद पलों को सँजोने के लिए है कि हम उम्रभर उस उल्लास को बनाए रखें. आज 'राष्ट्रीय कैमरा दिवस' पर ढूँढ निकालिए अपनी सबसे शानदार तस्वीर या फिर सामने वाले से मुस्कुराकर कहिये कि बोलो cheese, कुछ यहाँ भी 'श्री' बोलने की सिफ़ारिश करते हैं. मैं कहती हूँ दांत निपोरते हुए 'ही ही' बोलिए जी!
- प्रीति 'अज्ञात'
#राष्ट्रीय_कैमरा_दिवस

शुक्रवार, 21 जून 2019

बाबा की बेंत

बाबा की चमचमाती, सुन्दर, गोल घुण्डीनुमा बेंत जाने कितने ही काम आती थी। शैतान बच्चों की टोली इसकी खटखट सुनते ही गद्दों और चारपाई के नीचे साँसें रोक दुबक जाती, फिर इसी बेंत की घुंडी में उनकी टांग फँसाकर उन्हें बाहर निकाला जाता। उसके बाद पूरा घर किलकारियों से घंटों यूँ गूँजता रहता जैसे कि दीवारों ने हँसी ने घुँघरू पहन रखे हों। बच्चे डरते कहाँ थे इस बेंत से, उन्हें तो इसे थामे दादाजी का स्नेह भरा हाथ और भी लम्बा लगता था। वे कभी बाबा की पीठ पर झूला झूलते तो कभी उनकी गोदी में जा बैठते। 

उन दिनों ये बेंत सबके लिए बहुत उपयोगी हुआ करती थी। कभी बिल्ली तो कभी बन्दर भगाने के भी खूब काम आती। कौन विश्वास करेगा भला कि तब रेगुलेटर खराब होने पर इससे घुमाकर पंखा तक चल जाया करता था! वैसे इसकी पहुँच दूर-दूर तक थी। पड़ोस वाले अंकल जी के बेटे राहुल को जब-जब बगिया से आम या नींबू तोड़ने होते तो तुरंत आवाज देता, "छोटू, जरा बेंत तो दे यार!"
छोटू अपनी महत्ता देख तुरंत गर्व से भर उठता। दौड़कर दादाजी के पास जाता और अपनी गोल-गोल आँखों में प्रसन्नता के हजार पंख लिए पूछता, "बाबा, ले जाऊँ न?"
यह प्रश्न पूछना एक औपचारिकता भर ही होती थी। बाबा के उत्तर देने की प्रतीक्षा करे बिना ही वह बेंत लेकर भाग उठता। बाबा भी अरे, अरे कह उसे रोकने का नाटक भर करते और दिल में खूब आशीष देते।

छोटू जिस तीव्र गति से जाता, उतनी ही गति से लौट भी आता था। वो हमेशा शर्ट को गोलमोल करता ही लौटता और उन तहों को खोलते ही सब तरफ फल बिखर जाते।
बाबा हमेशा टोकते, "क्यों रे, बेंत देने गया था या फल लेने?"
छोटू सीना चौड़ाकर इतराता, "पता है, राहुल भैया ने दिए हैं। बेंत के हुक में कट से अटकाकर झट से इत्ते सारे फल तोड़ लेते हैं। सारे अकेले कैसे खाएंगे?" उसके भोलेपन और गोल बटननुमा आँखों को मटकाते हुए चहकने के अंदाज़ पर बाबा निहाल हो उठते। 

इधर घर की बहुएँ भी इसकी ठकठक सुन 'बाबूजी आ गए' कह सहज ही घूँघट खींच खुसपुस ख़ूब चुहलबाज़ियाँ करतीं। उनके लिए ये बाबा की उपस्थिति की सूचक थी, सम्मान थी। 
दरअस्ल ये बेंत, बस बेंत भर नहीं थी और न बाबा का सहारा थी। उन्हें तो इसकी आवश्यकता तक न थी पर दादी के गुजर जाने के बाद इससे एक रिश्ता-सा जोड़ लिया था उन्होंने। इसे खूब चमकाकर रखते। जहाँ भी जाते, हमेशा साथ ले जाते। उनके जीवन का जरुरी हिस्सा बन गई थी ये। 

बाबा अब बीमार रहने लगे थे। लेकिन अपनी बेंत को सिरहाने रख सोना कभी न भूलते। कभी रह भी जाती तो तुरंत ही किसी न किसी को आवाज़ दे पास रखवा लेते, तब ही उन्हें चैन की नींद आती। छोटे बच्चे गुदगुदाते हुए कहते कि "बाबा, ये बेंत लोरी भी सुनाती है क्या? जैसे दादी हमें सुनाया करती थीं?" दादी का ज़िक्र आते ही बाबा की आँखें 
भर आतीं और रुंधे गले से हमेशा एक ही उत्तर देते, "बेटा, तेरी दादी  सा कोई न हो सकेगा। चकरघिन्नी सी लगी रहती थी दिन-रात। न जाने फिर भी इतना हँस कैसे लेती थी!" बाबा की उदासी देख बच्चे उनसे लिपट जाया करते थे। यूँ वो इन गहरी बातों का मर्म ज्यादा समझ तो नहीं पाते थे। 

बेंत थी, तो जैसे ऊर्जा थी घर में! घर दिन-रात चहकता। बड़ा मान, बड़ा रौब था इसका। इससे जुड़ी शैतानियाँ थीं, अनगिनत किस्से-कहानियाँ थीं। 
फिर एक दिन बाबा ऐसे सोये कि उठे ही नहीं! बाबा गए तो जैसे बेंत की आत्मा भी चली गई। बच्चों को तोड़फोड़ में मजा कम आने लगा। छोटू को अब फल तोड़ने में कोई आनंद नहीं आता था। बहुएँ चुपचाप अपनी-अपनी रसोई बनातीं और कमरे में चली जातीं। धीरे-धीरे हर बात पर लड़ाई-झगड़े होने लगे और कभी किलकारियों से गूँजता ये घर अब गहन उदासीनता से भर सायं-सायं कर काटने को दौड़ता।

एक दिन वसीयत पढ़ी गई। हर वस्तु का बँटवारा हुआ।
लेकिन उसके बाद सीढ़ियों के नीचे बने खाँचे में उपेक्षित पड़ी, वर्षों धूल खाती रही ये बेंत।  
फिर एक दिन माली काका ने इसे भुतहा घोषित कर दिया गया। 
-प्रीति 'अज्ञात' 

गुरुवार, 20 जून 2019

प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी

प्रकृति के इंद्रधनुष से सजी इस सृष्टि को जब-जब निहारते हैं, इसे दाता के रूप में ही पाते आये हैं। सदियों से ये धरती हम सबका भार सह रही है। नदी, पहाड़, झरने, वनस्पति इन सभी ने मिलकर जीवन संभव किया। सूरज ने ऊर्जा भरी सुबह देकर हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी तो चाँद ने थके हुए मनुष्य को अपनी नर्म बाँहों की सुकून भरी थपकी देकर उसकी हर थकान को दूर किया। प्राणवायु साँसों को अबाध गति प्रदान करती रही। सदियों से अडिग खड़े पहाड़ों को देख इच्छाशक्ति को और भी दृढ़ता प्राप्त होती है एवं इनसे गुज़रती हिमनदी हृदय में भीतर ग़ज़ब का आत्मविश्वास भर देती है। बहते पानी की आवाज़ किसी नवजात शिशु की किलकारी बन खूब हिलोरें मारती है। इन रास्तों से गुज़रते हुए हॅंसते-झूमते फूलों और चहकते पक्षियों का दर्शन जीवन के प्रफुल्लित भाव और सुन्दर होने की अनुभूति का जीवंत प्रमाण बन प्रस्तुत होता है। कभी जंगलनुमा स्थानों में भटककर देखें तो यहाँ सारे पेड़ किसी बातूनी दोस्त की तरह गले मिलते हैं। उन पर फुदकते पक्षी कुछ इस तरह से मस्ती और उल्लास से भरे लगते हैं जैसे मायके आकर लड़कियाँ चहकती, इतराती घूमती हैं। कभी-कभी तो यूँ भी महसूस होता है कि किस्से-कहानियों से निकल; वो अलादीन का जिन्न या कोई सुन्दर-सी परी भी अभी सामने आ खड़ी होगी और हाथ थाम; हमें वहाँ की सबसे अनोखी मीठी झील के पास छोड़ आएगी।
वस्तुतः प्रकृति ने हर तरफ से अपने स्नेहांचल में हमें घेरे रखा है। फल-फूल से लदी झुकी हुई डालियाँ और उन पर मंडराते हुए भँवरे किसका मन नहीं मोह लेते! नदी के किनारे घंटों यूँ ही बैठे रहना, कभी आसमान में टहलते बादलों की आकृतियों को समझना तो कभी पानी में उनकी छवि निहारना, प्रकृति प्रेमियों के हृदय को अपार शीतलता प्रदान करता है।
मनुष्य जाति पर यह वो ऋण है, जो हम कभी चुका नहीं सकते लेकिन इसको सहेजकर धन्यवाद अवश्य दे सकते हैं। 

दुर्भाग्यपूर्ण है कि धन्यवाद देना तो दूर, हम तो इसका उचित प्रकार से संरक्षण भी न कर सके। आज धरती का अस्तित्व ख़तरे में है। वायुमंडल में जो भीषण प्रतिकूल परिवर्तन हुए हैं और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में जिसका परिणाम विश्वभर को झेलना पड़ रहा है, वह मानव के कुकृत्यों की ही देन है। 
हमने तालाबों का पानी चुरा लिया, उन्हें पाटकर भवन बना लिए। रसायनों के बहाव से नदियों को विषैला कर दिया, बारिश से उसके हिस्से की माटी छीन उस ज़मीन पर सीमेंट-कंक्रीट से भर अपना पट्टा लगा लिया, पानी के तमाम जलस्त्रोतों को नष्ट कर दिया। जंगलों को ऊँची इमारतों की तस्वीर दे दी, कीटनाशकों के अधिकाधिक प्रयोग, मिलों, कारखानों, वाहनों से बाहर निकलने वाले धुएं तथा विषैली गैसों से वायु को प्रदूषित किया। प्रकृति का जितना और जिस हद तक दोहन कर सकते थे; किया। अब हमारे पास अपना कहने को अधिक कुछ शेष नहीं है।

ये मासूम पक्षी; जो हर वृक्ष को अपना घर समझ हमारी सुबह-शाम रोशन करते हैं। जो सुबह की पहली धूप के साथ हमारे आँगन में चहचहाहट बन उतरते हैं, जो किसी बच्चे की तरह खिड़कियों से लटक सैकड़ों करतब किया करते हैं, जो अलगनी को अपने बाग़ का झूला समझ दिन-रात फुदकते हैं। हमने इन्हें क्या दिया? आधुनिकीकरण और विकास के नाम पर हम इनके भी घर छीन रहे हैं। जंगलों को काटकर हमने न जाने कितने जीव-जंतुओं को बेघर कर दिया। समाचार में देखकर चिंता व्यक्त करते हैं कि "जानवर शहर में घुस आया!" नहीं! वो उसका ही घर था। उनकी जमीन पर अतिक्रमण के दोषी हम हैं। जब जंगल लगातार कटते जायेंगे तो कहाँ जायेंगे ये जीव-जन्तु? इनके बिना ये दुनिया कितनी सन्नाटे भरी होगी, इसकी कल्पनामात्र सिहरा देने के लिए काफ़ी है। इनकी प्रजातियाँ यूँ ही विलुप्त नहीं हो रहीं। अपितु मानवीय स्वार्थ की बलि चढ़ रही हैं। पारिस्थितिक तंत्र के इस असंतुलन ने ही पर्यावरण सम्बन्धी समस्त समस्याओं को जन्म दिया है।

इस हरियाली का जीवन कितना नि:स्वार्थ है। हरीतिमा से आच्छादित, फूल-फल से लदे वृक्ष बिन कहे ही सकारात्मक सन्देश दे जाते हैं। ये मुसाफिरों को छाया देते हैं, अपनेपन का एहसास कराते हैं, बिन किराए, कुछ पल निश्चिंतता से बैठने की सुविधा देते हैं। इन्हें अपने होने का मतलब पता है, ये शिकायत नहीं करते, ये जानते हुए भी कि कोई राहगीर पलटकर उनकी तरफ वापिस कभी नहीं आएगा। उन्हें यह भी पता है कि दिन की चटक रोशनी में ही हमें उनकी ज़रूरत महसूस होती है और एक दिन कुल्हाड़ी के तीक्ष्ण प्रहार से उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। लेकिन फिर भी उसकी शाखाएँ सदैव आलिंगन की मुद्रा में ही दिखेंगी। वृक्ष बचेंगे तो डालियों से झूलते झूले की परंपरा बनी रहेगी और बच्चों का खिलंदड़पन नित नई उड़ान भरेगा। संस्कृति जगमगा उठेगी। 

पानी की कितनी कमी है और जल-स्तर भी लगातार घटता जा रहा है, इस दुखद तथ्य से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। लेकिन औद्योगीकरण और बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए एक अदद घर का रोना लेकर हम इस बात को भूलते हुए लगातार जंगल काटते आ रहे हैं कि वृक्ष और मिट्टी के बिना बारिश का पानी पक्की ज़मीन कहाँ से सोखेगी? ऐसे में जल-स्तर घटना तय ही है जब उसे बढ़ाने के सारे माध्यमों का मुँह हम ही बंद कर रहे हैं। जल के प्रदूषित होने और गाँवों-शहरों में इसके निकास की समस्या और उससे पनपती बीमारियों की जो गाथा है सो अलग! यह इस भू-मंडल पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है कि उसे पीने के लिए स्वच्छ जल मिले लेकिन विडंबना देखिये कि मनुष्य ही इसकी अनुपलब्धता के लिए उत्तरदायी भी है। दो-ढाई दशक पूर्व की ही बात करें तो हमारे देश में 'पानी के व्यवसाय' का अस्तित्त्व तक नहीं था और न ही इसके शुद्धिकरण की कोई आवश्यकता ही थी। कब धीरे-धीरे हम सबके घरों में प्यूरीफायर लग गए या बोतलबंद पानी आने लगा; पता भी नहीं चला। पानी को शुद्ध बनाने, इसकी पैकेजिंग और इसे बेचने के लिए तमाम कम्पनियाँ बनती चली गईं और इसके विज्ञापन भी सराहे जाने लगे। लेकिन मूल समस्या अब भी जस-की-तस है। विकास के नाम पर जितना शोषण इस धरती का किया गया है उसके दुष्परिणाम अब दृष्टिगोचर होने लगे हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह स्थिति जितनी भयावह होगी, इससे निबटना उतना ही दुष्कर भी रहेगा। 

पर्यावरण से सामंजस्य बिठाये बिना मानव सभ्यता के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। प्रत्येक क्षेत्र विशेष में वहाँ की परिस्थितियों के अनुकूल ही वनस्पतियों का विकास तथा जीव-जंतुओं का आवास तय होता है। प्रतिकूल पर्यावरण में पादप-समूहों तथा जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं अथवा उनकी प्राकृतिक क्रिया में अवरोध उत्पन्न होता है। इस विषम परिस्थिति का सीधा प्रभाव वहाँ की कृषि, अन्य उद्योग एवं मानवीय जीवन पर पड़ता है। जितनी लापरवाही से हम सब नष्ट करते जायेंगे उतने ही दुरूह परिणामों का मिलना भी तय है। 

प्रकृति की प्रकृति में कुछ भी नहीं बदला। बस, मनुष्य ही खोटा निकला! हमें प्रकृति जैसा बनना होगा। इससे जीने की प्रेरणा लेनी होगी।
आसमान सिखाता है कि माँ के आँचल का अर्थ क्या है।
पहाड़ सच्चे दोस्त की तरह, किसी अपने के लिए डटकर खड़े रहने की बात कहते हैं।
सहनशक्ति धरती से सीखनी होगी।
प्रेम क्या होता है और बिना किसी अपेक्षा के अगाध स्नेह कैसे किया जाता है, किसी के दुख में साथ कैसे दिया जाता है; इस कला को पशु-पक्षियों से बेहतर कोई नहीं जानता।
कट-कटकर गिरने के बाद फिर कैसे बार-बार उठना है, आगे बढ़ना है; जीवन का यह पाठ पौधे सिखाते हैं। जब तक ये जीवित हैं  प्राणवायु भी देते हैं कि हमारे अस्तित्त्व को ख़तरा न रहे!
धूप, हवा, पानी से दान की प्रसन्नता महसूस करनी होगी। 
सभ्यता, बीजों और माटी से समझनी होगी जो उगने के लिए धूप और पोषक तत्त्व साझा करते हैं। 

यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो ही मनुष्यता को पा सकेंगे। उसके पश्चात् ही प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षित होने की आशा रख सकते हैं। सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं जब तक कि हम मनुष्यों की सोच निज हितों से ऊपर न उठे। जिन कारणों से पर्यावरण को हानि पहुँच रही है उन क्रियाकलापों का उचित प्रबंधन होना आवश्यक है साथ ही पर्यावरण संरक्षण हेतु जनमानस को जागरूक एवं सचेत भी करना होगा। 
सृष्टि ने हमें वो सब दिया जो इस धरती को स्वर्ग बना सकता था लेकिन हम उसे प्लास्टिक और विषैले पदार्थों से भर अपनी असभ्यता का परिचय देते रहे। परिस्थितियाँ इतनी विकट हो चुकी हैं कि अब वैश्विक स्तर पर यह घनघोर चिंता का विषय बन चुका है। यहाँ तक कि पृथ्वी के समाप्त होने की तिथि भी आये दिन घोषित होने लगी है। 

समय तेजी से आगे बढ़ रहा है पर अभी बीता नहीं! हम सब को अपनी इस धरा से प्रेम है और जब तक ये प्रेम जीवित है तब तक पृथ्वी के बचे रहने की उम्मीद क़ायम है। यदि प्रेम ही ख़तरे में है तो फिर यूँ ही जीकर करेंगे भी क्या और किसके लिए! झरनों में जो संगीत है, नदी की जो कलकल है, पहाड़ों से लिपटी जो बर्फ़ है, तारों से खिलखिलाता जो आकाश है, ये बाँहें फैलाए जो वृक्ष खड़े हैं और फूलों की ये सुगंध जिसे घृणा की हजारों जंजीरें भी अब तक बाँध नहीं सकी हैं, ये पक्षी जो आसपास फुदकते, चहचहाते हैं..यही प्रेम है, यही हमारी प्यारी पृथ्वी है। यह हमारी वो विरासत है जिसे हमें आने वाली नस्लों के लिए सुरक्षित रख छोड़ना है कि वे जब इस दुनिया में आयें तो ये उन्हें भी इतनी ही सुन्दर दिखाई दे जिसके प्रत्यक्षदर्शी हम सब रहे हैं। 
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चलते-चलते: मुज़फ्फरपुर में मस्तिष्क ज्वर (इंसेफेलाइटिस) के शिकार बच्चों की असमय मृत्यु ने व्यवस्था का एक और कुरूप चेहरा प्रस्तुत किया है जहाँ प्रशासन या तो मौन है या फिर 'लीची' को दोषी ठहराकर हाथ झाड़े जा रहे हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि कोई फल नहीं बल्कि उस पर हुए कीटनाशकों या फिर जहाँ ये उगाई जा रहीं हैं; उन क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक कीटनाशकों का प्रयोग इन मौतों का कारण हो सकता है। 2014 में कुपोषण भी इसका ज़िम्मेदार ठहराया गया था। उस समय टीकाकरण तथा अस्पतालों में और सुविधाएँ देने की तमाम घोषणाएँ भी की गईं थीं। अगर वे कागज़ी घोषणाएँ न होतीं तो शायद  मुज़फ्फरपुर की ये तस्वीर इतनी दुखदायी नहीं होती! 
आम जनता बार-बार भूल जाती है कि घोषणाएँ, चुनाव जीतने के लिए की जाती हैं और इनका यथार्थ से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता! काश! सरकार और प्रशासन से बस इतना भर ही हो सके कि देश का कोई बच्चा भूखा न सोये, उसके शरीर में पानी की कमी न हो और आसपास का वातावरण स्वच्छ हो! इसके लिए जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा। 
वे बच्चे जिनको लेकर माँ-पिता हजार सपने पाल लेते हैं और बुजुर्ग जिनको पुचकार रोज बलैयाँ लेते हैं। आज उनके घरों में सिसकियाँ हैं, मातम है और सिस्टम से न भिड़ पाने की अंतहीन बेबसी! वे अपनी उस ग़रीबी को भी बारम्बार कोस रहे होंगे जिसकी नियति में अव्यवस्थाओं के चलते केवल और केवल अपनी बलि देना लिखा है। अगले चुनाव की पहली आहट पर, संवेदनहीन नेता इनका प्रयोग पक्ष/विपक्ष के लिए अवश्य करेंगे। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं होना! हाँ, बस ये मौतें आँकड़ा बन रह जानी है, भविष्य में तुलनात्मक अध्ययन के लिए।
-©प्रीति अज्ञात
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* हस्ताक्षर जून 2019 सम्पादकीय

https://hastaksher.com/world-environment-day/


बुधवार, 12 जून 2019

ए मेरे दिल कहीं और चल!

जब कभी पहाड़ों को देखती हूँ तो अपनी इच्छाशक्ति को और भी दृढ़ होते हुए पाती हूँ। इनसे गुजरती हिमनदी भीतर ग़ज़ब का आत्मविश्वास  भर देती है। बहते पानी की आवाज़ किसी नवजात शिशु की किलकारी बन खूब हिलोरें मारती हैं। इन रास्तों से गुजरते हुए जब हॅंसते झूमते फूलों और चहकते पक्षियों को देखती हूँ तो जीवन के खुशनुमा होने का अहसास जीवंत हो उठता है।
लेकिन दस दिनों के बाद जब असल दुनिया में वापिस लौटती  हूँ तो लगता है कि ये जाने कहाँ आ गई हूँ। वो कौन सी दुनिया थी जहाँ के पेड़, पौधे, नदी, पहाड़ सब खुश थे और जहाँ जाकर मैं फिर कहीं और नहीं जाना चाहती! और ये कौन सी दुनिया है जहाँ की तस्वीर में हर बार और भी बदसूरत और बदनुमा दाग लगे मिलते हैं! लेकिन जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा इसी में काटना है।
यक़ीन मानिये तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी जीवन जंगलों में है, नदी में है, पहाड़ों में है। उसके अलावा जो भी है सब बेहद विकृत, स्वार्थी कुटिल मानसिकता और बेहूदगी से भरा पड़ा है। हम सब इस बेहूदगी के जिम्मेदार हैं और कुछ हद तक सहभागी भी।
हमने प्रेम को नफ़रतों में बदलना सीख लिया है लेकिन नफ़रत को प्रेम में बदलने की कोशिश कभी नहीं की। जिन्होंने की, वे भावुक मूर्ख माने गए और गहरे अवसाद में डूबते चले गए। 
धीरे-धीरे ये सबके साथ होगा!
अन्याय, अधर्म और असत्य के विरुद्ध चीखते रहने के बाद एक वो भी दौर आएगा जब हम हारकर चुप्पी साध लेंगे या अपनी आवाज़ खो बैठेंगे।
मुझे लगता है हम इसी गूँगे-बहरे समाज की स्थापना की ओर अग्रसर हो रहे हैं। ऐसा नहीं कि हमें फ़र्क नहीं पड़ता.....बहुत पड़ता है। लेकिन इसने हमारा सुख चैन छीन लिया है।
अगर चैन से जीना है तो अपना नंबर लगने तक पत्थर हो जाइए।
- प्रीति 'अज्ञात'

#नेपालयात्रा-1

बहुत सालों पहले एक फ़िल्म आई थी, 'महान'. उस फ़िल्म में ऐसा कुछ भी महान नहीं था पर चूँकि अपने लंबू की थी तो देखना जरूरी ही था। उसी का एक गीत 'प्यार में दिल पे मार दे गोली, ले ले मेरी जान' उन दिनों बेहद पॉपुलर हुआ था। टोटल बक़वास गीत था पर थोड़ा सकुचाते हुए स्वीकार कर ही लेती हूँ कि उस समय मुझे भी ये ख़ूब पसंद था। मुझे इस गाने की लोकेशन ने प्रभावित किया था और तबसे मैंने ठान लिया था कि अपने को भी एक दिन इसी जगह खड़े होकर ये वाला गीत गाना है। खी खी मत कीजियेगा, बच्चे थे अपन तब। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इसी का एक और गीत 'जिधर देखूँ तेरी तस्वीर नज़र आती है' का Sad version तब भी शानदार लगता था और अब भी। लिंक दे रही हूँ, समय मिले तो सुन लीजियेगा। 
पर हाँ, उस समय बात और ख़्वाहिश दोनों आई गई हो गई।

बाद में पता चला कि ये मूवी नेपाल में शूट हुई है तो जैसे उम्मीद पर घड़ों पानी फिर गया क्योंकि उन दिनों प्लेन में बैठना तो दूर उसे देखना भी बड़ा मुश्किल हुआ करता था। मुझे याद है कि जैसे ही हेलीकॉप्टर या प्लेन के गुजरने की आवाज सुनाई देती थी, मैं और मेरा भाई पूरी ताक़त और गति के साथ सीढ़ियों से दौड़ते हुए छत पर जा पहुँचते थे और फिर धुँए की लक़ीर देखकर ही खुश हो जाते थे कि देखो इधर से गया था।
ख़ैर! ये सब तो पुरानी बात थी। इसके बाद तीन वर्ष फ्लोरिडा(अमेरिका) में रही। फिर बैंकॉक, दुबई की यात्राएँ भी हुईं लेकिन नेपाल जाने की तमन्ना बरक़रार रही। आलम ये था कि एक दिन मैंने पतिदेव से कहा कि लिखकर दो 'अपन नेपाल चलेंगे' और लिखवाकर वो पर्ची भी अगली लड़ाई में इस्तेमाल करने के इरादे से संभालकर रख ली थी।
अबकी मम्मी पापा के विवाह की पचासवीं वर्षगाँठ पर हम सबने साथ घूमने का प्लान किया। मेरी प्राथमिकता सूची में मिज़ोरम या हिमाचल प्रदेश थे पर साहब की छुट्टियों की दुविधा के कारण कुछ तय नहीं हो पा रहा था। बेटा भी अपना प्रोजेक्ट निबटाकर 3 जून रात को यहाँ आने वाला था, 4 उसे तैयारी के लिए चाहिए था और बेटी के स्कूल 10 जून से खुल रहे थे। मैं स्वयं अपनी पुस्तक के सिलसिले में बाहर थी तो 5 से पहले मेरा जाना भी संभव नहीं था। अब इतने कम समय में कहाँ जाएँ और कब घूमें! 
ऐसे में अचानक पतिदेव का ये कहना कि "चलो, नेपाल चलते हैं। वही ट्रिप संभव है।" सुनकर मेरी तो बाँछें ही खिल गईं और वर्षों पुरानी तमन्ना अचानक ही पूरी हो गई वो भी तब जबकि वो मेरी सूची में थी भी नहीं!
यात्रा और घुमक्कड़ी के अपने तमाम मीठे-नमकीन किस्से हैं। धीमे-धीमे कभी वो भी लिख ही डालूँगी। ये बात तो बस ये बताने को लिखी है कि "किसी चीज़ को शिद्दत से चाहो तो....... ब्लाह ब्लाह ब्लाह।"
- प्रीति 'अज्ञात' #नेपालयात्रा #काठमांडू #Nepal #Kathmandu
#Nepal_trip_part_1

https://www.youtube.com/watch?v=6H3ZX-w7sVQ

सोमवार, 27 मई 2019

माता नी पछेड़ी

"कई दशकों से हमारा परिवार 'कलमकारी' की इस विशेष कला 'माता नी पछेड़ी' को समर्पित है। हमें कई पुरस्कार मिले हैं, लगभग सभी हस्तकला मेलों में सहभागिता रही है। NID और कई विशिष्ट संस्थानों में इसकी जानकारी देने जाते हैं और वहाँ के विद्यार्थियों को इसका प्रशिक्षण भी देते हैं। लेकिन इस सबके बाद वो अपनी जगह चले जाते हैं और हम अपने 10 X 10 के घर में वापिस आ जाते हैं। बच्चे कई बार पूछते हैं कि "इस कला ने आपको क्या दिया?" हमारे पास सटीक उत्तर तो नहीं होता पर फिर भी हमें गर्व है कि तमाम परेशानियों के चलते जब इस बस्ती के पैंतीस परिवारों ने यह व्यवसाय छोड़कर कोई न कोई नौकरी पकड़ ली है; तब भी हमारे परिवार ने इसे नहीं छोड़ा। कलमकारी तो कुछ और लोग भी करते हैं पर इसमें 'माता नी पछेड़ी' बनाने वाला इस देश का एकमात्र परिवार हमारा ही है। हम जब तक जीवित हैं तब तक यह कला भी जीवित रहेगी।"  
विलुप्तता के कग़ार पर खड़ी एक कला से अपनी जीविका चलाने वाले चितारा परिवार के दूसरे बेटे किरण भाई, अपनी पत्नी सुमन जी के साथ बैठे हुए बड़े ही गर्व से यह बात कहते हैं।

अहमदाबाद रिवरफ्रंट बनने से यह परिवार इसलिए प्रसन्न है क्योंकि इससे उनका अपना शहर और भी सुन्दर दिखने लगा है लेकिन कहीं-न-कहीं ये क़सक भी है कि इसे बनाते समय उन धोबियों और कलमकारी तथा ब्लॉक प्रिंटिंग से जुड़े लोगों के लिए भी कुछ व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी, जिनका पूरा धंधा इस नदी के बहाव की लय पर तय था। वे आगे बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले इन सबके लिए चर्चा हुई थी और फिर वादे भी किये गए। सब कुछ पक्का था पर आखिरी मिनटों में यह कह दिया गया कि तुम सबमें ही भीतर फूट है, इसलिए कुछ नहीं मिलेगा!

किरण भाई आगे बताते हैं, "कई बार हमें बड़े आर्डर मिलते हैं लेकिन कहाँ फैलाकर काम करें? न धोने के लिए जगह है और न सुखाने को। इसी कमरे के ऊपर वो वर्कशॉप है हमारी और पानी तो आपने देखा ही है।"
ये मेहनतक़श लोग हैं। वहाँ की सुंदरता को धब्बा न लगे इसलिए उन्होंने और आगे जाना मंज़ूर कर लिया। इसके अलावा और विकल्प भी क्या था! लेकिन आगे भी जो पानी है वहाँ एक साथ कई कपड़े नहीं धुल सकते। सुखाने की भी पर्याप्त जगह नहीं है। मैंने स्वयं इनके साथ बीते दस दिनों में कलमकारी की प्रक्रिया को प्रारम्भ से अंत तक देखा, समझा है। उस बदहाल घाट तक भी गई जहाँ इन्हें रंगने के बाद नदी की बहती धारा में धोया जाता है।

ये वे लोग हैं जिन्हें अपने देश की माटी, कला और संस्कृति से बेहद प्यार है। तभी तो इस छोटे से घर के एक कमरे में जहाँ उनका किचन, बैडरूम, ड्रॉइंग रूम, स्टोर सब कुछ समाया है; वहीं एक लोहे की रैक पर रखी अटैचियों को खोलते हुए वे मुस्कुराते हुए मुझे वह क़िताब दिखाते हैं जो किसी जापानी ने इस कला पर कभी लिखी थी और इसकी एक कॉपी उन्हें भेजी थी क्योंकि इनकी बनाई आर्ट की तस्वीर भी है उसमें।  NID की एक विद्यार्थी का प्रोजेक्ट भी है जिसमें उसने बड़े ही सुन्दर तरीके से इस परिवार की कलमकारी द्वारा बनाई विविध तस्वीरों को जीवंत कर दिया है। ये प्रोजेक्ट उनके 'शिल्प गुरु' पापा के योगदान के बारे में है। पन्नों को पलटते हुए सुमन बेन अनायास ही कह उठती हैं कि "मुझे पेंटिंग का बहुत शौक़ था और देखिये मेरा विवाह इतने अच्छे घर में हुआ कि अब मैं इसे अपना पूरा समय दे सकती हूँ। मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानती हूँ।" दिल से कही गई उनकी यह सच्ची बात मुझे न केवल ख़ुशी दे गई बल्कि सुख की परिभाषा की जीती-जागती तस्वीर बन कई दिनों तक जगमगाती रही।

इस परिवार के साथ अनौपचारिक वातावरण में कैमरे के अलावा जो बात हुई उसमें इस कला को बनाये रखने पर गंभीर विमर्श भी हुआ। सार यह निकला कि यदि कला के विद्यार्थियों के लिए चित्रकला, मूर्तिकला की तरह ही 'कलमकारी', 'माता की पछेड़ी' और ऐसी कई अन्य हस्तकलाओं को भी विषय के रूप में रख दिया जाए तो न केवल इससे जुड़ी पुस्तकें लिखी-पढ़ी जायेंगीं बल्कि इन परिवारों के सदस्यों को शिक्षकों के रूप में रोज़गार भी मिलेगा। वो पीढ़ी जो असुरक्षित भविष्य के कारण इस कला से दूर होने का मन बना रही है वो वापिस लौट आएगी और हमारी संस्कृति की इस अद्भुत पहचान की साख़ भी सदियों तक बनी रहेगी। वरना इनकी आगे की पीढ़ियों ने यदि इस कला को अपनाने से इंकार कर दिया तो यह स्वतः समाप्त हो जायेगी। 

मैं जानती हूँ कि मेरी पहुँच बस मेरी लेखनी तक ही है और मैं इस देश की अदनी सी नागरिक हूँ जिसे अपनी माटी से बेइंतहाँ प्यार है। उसी नागरिक की हैसियत से मैं यह चाहती हूँ कि हस्तशिल्प से जुड़े सभी परिवारों को वो सारी सुविधाएँ मिलें जो किसी नायक को मिलती हैं। मुझे नहीं मालूम कि मेरी आवाज़ आप तक पहुँचेगी या नहीं पर फिर भी न जाने किस उम्मीद से उनके कंधे पर तसल्ली का हाथ थपथपा आई हूँ। बदले में उनकी जो मुस्कान मिली, काश! वो हमेशा सलामत रहे!
बस थोड़ी सी ज़मीं और एक बोरवैल की जरुरत पूरी हो जाए तो हमारे देश की यह अद्भुत कला थोड़ी सुकून भर साँस और ले सकेगी। 
- प्रीति 'अज्ञात'
*मुझे नहीं मालूम कि इसके लिए कहाँ संपर्क करना होगा इसलिए उन्हें tag करने की गुस्ताख़ी कर रही हूँ जिनके हाथों ने इस देश की बाग़डोर सँभाल रखी है। 



#नरेन्द्र मोदी #अमित शाह #विजय रुपानी #माता नी पछेड़ी #शिल्पकला #अहमदाबाद 

शनिवार, 25 मई 2019

#सूरत_अग्निकांड

वे लोग जो सूरत हादसे का वीडियो बनाकर upload कर रहे हैं...क्षमा कीजिये पर मुझे आपसे घिन होती है। किसी के कलेज़े के टुकड़े को आग की लपटों में घिरे हुए, ऊपर से गिरते, चीत्कार मारते हुए देख किसी का भी कलेज़ा छलनी हो जाए। वो इंसान दौड़ेगा, चीखेगा, इधर-उधर भागेगा, अपनी बेबसी पर सिर पीटेगा और इस परेशानी में पल भर भी सोच पाया तो क़रीबी घरों से चादर लाकर भीड़ से उसे थामने की गुहार करेगा। वो रोयेगा, हारकर बैठ जाएगा पर वीडियो तो फिर भी नहीं बनाएगा।
उचित सुरक्षा व्यवस्था एवं आपातकालीन दरवाजा न होने के कारण संस्थान तो दोषी है ही, साथ ही आग को बुझाने में प्रशासन और अग्निशमन विभाग की जो लापरवाही हुई है वह भी बेहद शर्मनाक और दुखदायी है। न सीढ़ियाँ हैं, न नेट है तो इनमें और तमाशबीनों में क्या अंतर?
इन बच्चों के परिवार पर क्या बीत रही होगी, उसका अनुमान भर भी लगा लें तो रूह काँप जाती है। उन आँखों में सूनापन है, सवाल हैं और उम्र भर की निराशा! अब दोषियों को ढूँढ निकालने के लिए समितियाँ बनेंगी और न्याय दिलाने के हजार वादे भी जरूर होंगे पर जिन बच्चों ने असहनीय पीड़ा से झुलसते हुए इस धरती को अलविदा कह दिया, उनकी चीख़ें आसमान में गूँजती रहेंगीं।
सुनो, ईश्वर! अब तुम रिटायर क्यों नहीं हो जाते!
- प्रीति 'अज्ञात'
#सूरत_अग्निकांड

बुधवार, 15 मई 2019

चाँद की कहानी

"चाँद सृष्टि को उसके जन्मदिन पर उपहार में मिला चांदी का गोल सिक्का है  जिसे उसने अपनी अलगनी पे झूलती आसमानी चादर पे इक रोज़ मुस्कुराकर टाँक दिया था। ये चादर दिन की भागती ज़िन्दगी को सुकून की ठंडी छाँव देती है। अपने-आप से हारते हुए आदमी की आँखों में उम्मीद के तमाम सपने भरती है। ये नीला बिछौना जब शाम समंदर में अपना चेहरा देख शरमाकर गुलाबी हो जाता है तभी खिलखिलाते तारे मिलकर इसे घेर लेते हैं। उस रात ख़ुशी के हजार रंग रातरानी का रूप धर ख़ूब महकते हैं।
जब तक आसमान पर ये सिक्का टिका है न....प्रेम को कोई डिगा नहीं सकता!" 
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 9 मई 2019

मेरा #रूह_अफज़ा



लगभग दो महीने पुरानी बात है। महीने भर का राशन लेने सुपरस्टोर गई हुई थी। सूची में लिखे सब सामान के आगे टिक लग गया था सिवाय रूह-अफज़ा के। Cash-counter पर जो लड़का था, उससे पूछा तो उसने कहा कि "स्टॉक में ख़त्म हो गया होगा मेम।" मैं भी यही मान रही थी तो उसकी बात सही लगी। कुछ दिन बाद एक Grocery-shop पर जाकर पूछा तो वहाँ भी नहीं था। दुकानदार ने जब बताया कि "बेन, अभी आपको कहीं नहीं मिलेगा!" तो जैसे एक झटका- सा लगा। शरबत तो नहीं बनाती पर मिल्कशेक और लस्सी की तो ये जान रहा है। "नहीं मिलेगा माने? भैया, फिर कैसे चलेगा काम।" मेरे ये कहते ही उसने Mapro की इसी फ्लेवर वाली बोतल coolz sharbat मेरे सामने रखते हुए कहा, "ये बिलकुल वैसा ही है।" 
"अच्छा! ठीक है! यही दे दीजिये।" कहते हुए मेरी आवाज में विश्वास की कमी थी और लग रहा था जैसे मैं अपने बचपन के साथी के साथ धोखा कर रही हूँ। Mapro के उत्पादों से मेरी कोई दुश्मनी नहीं और इनका Ginger-lemon syrup मेरा favourite है। महाबलेश्वर-पंचगनी यात्रा के दौरान तो मैं इनकी स्ट्रॉबेरी फार्म पर भी गई थी। पर भई.... रूह-अफज़ा तो रूह-अफज़ा है! किसी की क्या मज़ाल जो इससे मुक़ाबला करने का सोचे भी! मुझे तो इसे पाना मेरा संवैधानिक अधिकार लगता है, जी! ये आपसे मुझसे नहीं छीन सकते! एक पल को तो शक़ भी हुआ कि "कहीं......!" पर तुरंत ही अपनी इस सोच पर शर्मिंदा हो स्वयं को धिक्कारते हुए टोकरा भर लानतें भेजने में हमने जरा सी भी देरी नहीं की। 😔

सुनने में ये हँसी की बात लगती है पर रूह-अफज़ा और पारले-जी दो ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें मैं सृष्टि की देन मानती आई हूँ। ये प्राकृतिक संसाधनों सरीखे प्रतीत होते हैं। जैसे सूरज है, चाँद है, आसमान है, तारे हैं...वैसे ही रूह-अफज़ा है। इसे सदा सामने ही पाया है। नानी के यहाँ, दादी के यहाँ, उनकी भी नानी-दादी के यहाँ। कोई बताये, कहाँ नहीं था ये? कब नहीं था ये? 😋
ये अलग बात है तब लाड़ में सब इस बिल्लू, टिल्लू की तरह इसका भी नाम बिगाड़कर रुआब्ज़ा बोलते थे। 

गर्मियों में जब भगोने में चम्मच के बजने की आवाज आती तो कोई यूँ नहीं कहता था कि शरबत बन रहा है बल्कि सब जानते थे कि मीठी-मीठी सुगंध लिए चीनी संग रूह-अफज़ा घुल रहा है। उस पर छप्प से बर्फ़ का गिरना....अहा! जाओ रे! अब जी न जलाओ तुम! 😥
जैसे मिनरल वाटर का पर्याय बिसलेरी हो गया है वैसे शरबत मतलब रूह-अफज़ा! हाँ, यहाँ शिकंजी की महत्ता को कम न आंकियेगा...उससे जुड़ी प्रेम कहानी भी कोई कम हसीं नहीं! 😍

खैर! दुकानदार ने यह भी बताया था कि अभी हमदर्द के बाक़ी उत्पाद जैसे साफ़ी, सिंकारा भी नहीं मिलेंगे! "उंह! साफ़ी लेने की जब उमर थी तब न ली तो अब क्या!" सिंकारा का भी इत्तू सा दुःख न हुआ। बस इसका विज्ञापन और ब्रेक डांस वाले प्रतिभाशाली पर इस ad में महा सींकड़ी जावेद ज़ाफरी जी अवश्य याद आ गये। फिर याद को continue करते हुए "बोल बेबी बोल रॉक एंड रोल" और "बूगी- वूगी" ने भी प्रवेश किया। 
आजकल पढ़ने-सुनने में आ रहा कि कंपनी में कुछ अंदरूनी खटपट है या फिर इससे जुड़ी अन्य वस्तुओं की कमी के कारण यह बाज़ार में उपलब्ध नहीं है। जो भी है, समस्या को निबटाओ और रूह-अफज़ा को भारतीयों के जीवन में वापिस लाओ। नहीं तो क्रांति होगी!

एक जरुरी बात - 😜इसके लिए हमारे नेता लोग क़तई दोषी नहीं है और देखना उन्हीं के प्रयासों से रूह-अफज़ा इठलाती हुई फिर आएगी। आखिर चुनावी गर्मी के माहौल में थोड़ी ठंडक की दरकार उन्हें भी तो होगी न!
तब तक गाते रहो - 😄
गर्मी की जान!   रूह-अफज़ा!!
जब आएँ मेहमान! रूह-अफज़ा!!
न हिन्दू, न मुसलमान!  रूह-अफज़ा!!
घर-घर की आन! रूह-अफज़ा!!
भारत की शान! रूह-अफज़ा!!
MORAL: इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब तक कोई हमारे साथ बना रहता है, तब तक उसकी उपस्थिति या क़ीमत का एहसास नहीं होता! फिर बाद में ऐसी बातें करनी पड़ती हैं। 😞
- © 2019 #प्रीति_अज्ञात
#रूह_अफज़ा #Roohafza #हमदर्द #hamdard

लानत है!

अलवर में जो गैंगरेप की घटना हुई वो फिर वही सारे प्रश्न खड़े करती है जिनके उत्तर कभी नहीं मिलने वाले! ये घटनाएँ केवल हमारे आपके शहर के, राज्य के, देश के लिए ही शर्मनाक नहीं है ये मनुष्य होने का भी अपमान हैं. मानवता के मस्तक पर लगा कलंक है. ये वो दाग़ भी है जिसे हमारा न्याय-तंत्र कभी अपने दामन से छुड़ा नहीं सकता! सोचिये जरा, जब लोग पूछेंगे कि सामने तस्वीरें आ जाने के बाद भी आपके हाथ कौन बाँध देता है तो आप क्या जवाब देंगे? किसी की अस्मिता को तार-तार कर देने के बाद भी इन दरिंदों का जी नहीं भरता और वे उसे वायरल कर देते हैं. इन साइट्स और लोगों पर लगाम कौन कसेगा जो चंद लोगों के बीच हुई निकृष्टतम घटना और उसके क्रूरता भरे दृश्य पूरी दुनिया के सामने परोसने में एक पल को भी नहीं हिचकते! सोचिये, यदि यह स्त्री आपके परिवार की होती तो भी क्या न्याय की गुहार लगाते हुए आप उसकी तस्वीरें साझा करते? स्त्री होने की सजा आप कितनी बार उसे देंगे? इस एक जीवन में उसे और कितनी बार मरना होगा?

कड़वा सच यह है कि जब तक अपराधियों को तुरंत मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा तब तक कोई भी उम्मीद रखना व्यर्थ ही है! स्पष्ट है कि जिसमें वीडियो बनाने की हिम्मत है उसे किसी का डर नहीं! न समाज का, न पुलिस का, न न्याय-तंत्र का! देखने वाली बात यह है कि इनमें यह हिम्मत आती कहाँ से है? जब इस तरह के अपराधों की सूची निकाली जायेगी और अपराधियों को पूरे गाज़ेबाजे के साथ समाज के बीच ससम्मान बैठा देखा जाएगा तब इस देश की न्यायव्यवस्था को देखकर दुःख भी होगा और शर्मिंदगी भी. लेकिन तब भी अफ़सोस के अलावा और कुछ नहीं कर पायेंगे हम! अब भी क्या करे ले रहे हैं! खीजो, चीखो, चिल्लाओ..चुनावी मौसम में ये सब कौन सुनता-समझता है. आप तो बस ये मान लो कि सुरक्षा कमाल की है!

रेपिस्ट हो या तेज़ाब डालने वाले लोग....आख़िर इन्हें बचाता कौन है? चुनावों में इन विषयों पर बात करने से नेतागण बचते क्यों हैं? नागरिकों की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी है? अपराधियों को दंड देना किसका कर्त्तव्य है? क्या आप चाहते हैं कि देशवासी रोज रोते हुए आपसे अपनी सुरक्षा की भीख माँगें और आप चुनावी वायदों की आँच में उसे मक्खन की तरह अपनी वोट की रोटियों पे लपेटने के बाद ही कुछ वक्तव्य दें? आप इन घटनाओं का दर्द समझ पाते हैं क्या? या फिर ये चाहते हैं किअब अपने न्याय के फ़ैसले जनता अपने हाथों में ले ले?
और उस पर तेरी पार्टी, मेरी पार्टी की राजनीति! लानत है इन लोगों पर!
- प्रीति 'अज्ञात' 
#respectwomen #demandjustice #अलवर #अपराध #चुनाव #न्याय #रेप #एसिडअटैक 
तस्वीर: गूगल से साभार 

मंगलवार, 7 मई 2019

#एकला चलो रे!

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ऐसे पल कई-कई बार आते हैं जब परिस्थितियों से जूझते समय वह हताश हो उठता है और उसे लगने लगता है कि किसी से कुछ कहने-सुनने का मतलब दीवारों से सिर फोड़ना है। रिश्तों के साथ भी ऐसा होता आया है कि सब कुछ समर्पित कर देने के बाद भी उसे निराशा ही हाथ लगती है और वह यह मान बैठता है कि उसकी उपस्थिति का कोई मूल्य नहीं! समाज में हो रहे अन्याय के विरुद्ध उसकी आवाज़ कभी नहीं काँपती लेकिन जब वह पलटकर देखता है तो अपनों की भीड़ में स्वयं को नितांत अकेला और असहाय महसूस करता है। कभी उसके स्वर मंद पड़ जाते हैं तो कभी वह भी इसी स्वार्थी और भयाक्रांत भीड़ का हिस्सा बनने को विवश हो जाता है।

लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंत तक हार नहीं मानते और सारी अपेक्षाओं को परे रख अकेले यात्रा पर चल पड़ते हैं।  ये अकेलापन उन्हें प्रेरणा देता है और यह समझ भी कि किसी को उम्र भर पुकारते रहने से बेहतर है अकेले चलना! 'कोई बचाने आएगा' यह सोच प्रतीक्षा करने से कहीं श्रेष्ठ है, अपनी राहों के कंटकों से स्वयं जूझना! जब चारों दिशाओं में काली स्याह रात सा अँधेरा छाया हो तो उससे भयभीत हुए बिना अपनी अंतरात्मा की पुकार की स्वरलहरी पर अपने क़दमों को गति देना! जब-जब मेरा इन विचारों से साक्षात्कार होता है, तब-तब जो चेहरा सामने आ खड़ा होता है, वह है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का। 

यदि टैगोर ने 'एकला चलो रे' न लिखा होता तो न जाने कितनी उदासियाँ अँधेरों की चादर ओढ़े कहीं खो चुकी होतीं! न जाने कितने निराश चेहरे हमसे विदा ले चुके होते! न जाने कितनी मुस्कानें अब तक पत्थर बन गई होतीं!

1905 में, यानी आज से सौ वर्ष से भी कहीं अधिक समय पूर्व लिखा गया रवींद्र संगीत पर आधारित यह देशभक्ति गीत आज भी इतना प्रासंगिक होगा, यह अनुमान तो स्वयं गुरुदेव को भी न हुआ होगा! यूँ तो यह गीत मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया है लेकिन समय-समय पर इसके अनुवाद भी होते रहे हैं। यहाँ एक रोचक तथ्य यह भी है कि हममें से अधिकांश इसका मुखड़ा ही जानते हैं पर उसके बावजूद भी ये तीन शब्द 'एकला चलो रे' मनुष्य के डूबते ह्रदय में प्राणवायु का संचार करते हैं। यह गीत व्यक्ति के जीवन में अथाह आत्मविश्वास और उत्साह भर देता है। इसके बोल भीतर तक स्पर्श करते हैं और ठहरे हुए जीवन में अबाध गति प्रदान करते हैं।
 
भाषा की जानकारी न होते हुए भी यह मेरा सबसे पसंदीदा गीत रहा है। इन्टरनेट की सुविधा ने इस तक पहुँच भी आसान कर दी है। आज पहली बार इस पर लिखते हुए अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
इस गीत को you-tube पर सुनकर, लिखने का प्रयास किया है। वीडियो भी साझा कर रही हूँ। भाषा की अनभिज्ञता के कारण, यदि कोई ग़लती हुई हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ पर आपसे सुधार का अनुरोध अवश्य रहेगा। 

जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!
जोदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
केऊ कथा ना कोय
जोदि शोबाई थाके मुख फिराय,  शोबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।

जोदि शोबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
जोदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।

जोदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
जोदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!
जोदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
- प्रीति 'अज्ञात' 
*यह तस्वीर मैंने गोवा के एक संग्रहालय में दो-तीन वर्ष पूर्व क्लिक की थी। 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

स्वीटू

उन दिनों जब मैं यह मान ही चुकी थी कि कोई भी दोस्ती सच्ची नहीं होती और प्रेम झोंका भर है ग्रीष्म के छलछलाते माथे को पोंछती अनायास बहती हवा का, ठहरता है बस उतना ही जितना देहरी पर ठहरती है धूप, पत्तों पर टिकती है ओस, फूलों में बसती है सुगंध; तब तुम्हीं ने मुझे बताया कि मेरी ये सोच कितनी ग़लत थी और यह भी समझाते रहे कि प्रेम हर कहीं साथ-साथ चलता है. संभवतः तितलियों के सारे रंगों से सजे और रुई के फ़ाहे से भी नरम तुम उन देवताओं के द्वारा ही मुझ तक भेजे गए थे जिनसे मैं अपनी अभिशप्त रेखाओं के लिए प्रतिदिन लड़ा करती थी और फिर.... तुम्हारी उपस्थिति से ही मेरी श्वांसों की गति तय होती रही, तुम मेरे हर सुख-दुःख के साथी बने. मेरी हँसी पर तुम हँसते हुए मेरे गले झूल जाते थे और मेरे आँसू तुम्हारी ख़ूबसूरत आँखों में उदासियाँ कुछ इस तरह भरते कि मैं अपनी हर पीड़ा पर शर्मिंदा हो तुम्हें चूमकर सीने से लगा घंटों सिसकती। तब तुम मेरे हाथों से फ़िसल मुझे एकटक देखते और अपनी नाजुक उँगलियों से मेरा चेहरा थाम नम पलकों को सहलाने लगने। मैं यकायक फफककर रो पड़ती थी। तब तुम मेरे कानों में सुख के तमाम गीत गुनगुनाते हुए 
अचानक बोल उठते, 'म्मी, पानी पी लो'
तुम मम्मी बोलने में अटक जाते थे न बुद्धू!

पर न जाने इतनी समझदारी तुमने कहाँ से सीखी! तुम मेरे कितने लाड़ले थे, ये तुम भी जानते थे। तभी तो मैं बच्चों को हमेशा चिढ़ाती
"तुम दोनों भविष्य के लिए जहाँ भी जाना चाहोगे...रोकूँगी नहीं पर मेरा स्वीटू मेरे ही पास रहेगा, किसी को नहीं दूँगी।"
फिर मैं हँसकर इतराती हुई तुम्हारी ओर देखती और तुम भी अपनी मीठी आवाज़ में 'मेरा प्यारा बेटू' कहकर गर्दन मटका मुझसे घंटों लिपटे रहते। तुम्हारी यही अदा मेरी आश्वस्ति बन चुकी थी।  
शायद यह भी ईश्वर की कोई चाल ही रही होगी कि उस दिन जब मैं ख़ूब खिलखिलाकर हँसी थी और तुम्हें पूरे घर में घुमाती झूम रही थी, उसी पल मेरी और तुम्हारी ख़ुशी के बीच कहीं कोई बद्दुआ फल रही थी और....उसके बाद तुम ऐसे सोये कि फिर कभी उठ ही न सके। मेरी चीखें, मेरा विलाप भी तुम्हें टस-से-मस न कर सका। मैं जानती हूँ, अंतिम साँस लेते हुए तुम भी इस असहनीय दर्द और तड़प से गुजरे होगे..उन दस मिनटों में तुम्हारे क़रीब न हो पाना और तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए खो देना मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुःख है। यह मलाल अब उम्र भर साथ रहेगा। 
एक ही पल में जैसे किसी ने मुझे सुख के आसमान से उछालकर दुःख की गहरी खाई में पटक दिया था. मैं रोज तुम्हें याद करती हूँ और रोज ही अपने-आप से ये वादा भी लेती हूँ कि आँखें नम नहीं करुँगी पर यहाँ मैं एक बार फिर हार जाती हूँ। 
जानते हो! तुम्हारे जाने के बाद, तुम्हारी सबसे प्यारी दोस्त वो गिल्लू, तीन दिन तक तुम्हारी राह तकती रही। वो नियत समय पर बालकनी में आ अपने पैरों पर खड़े हो तुम्हें ढूँढती रहती और फिर बिना कुछ खाए ही चुपचाप लौट जाती।  Sun bird के चूज़े भी तुम्हारे पुचुर-पुचुर दुलार की प्रतीक्षा में घोंसले से टुकुर-टुकुर ताकते रहे। पीछे वाली बालकनी में भी तुम्हारे सारे दोस्त गौरैया, बुलबुल, फ़ाख्ता, गिलहरी के बच्चे और वो babbler भी जिसकी आवाज़ तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी; वो सब आते, ठहरते, गला फाड़ चिल्लाते और बिना खाए चले जाते। फिर धीरे- धीरे मेरी आँखों में उन्होंने तुम्हारी अनुपस्थिति को पढ़ लिया था। लेकिन वो पक्षी जो तुम्हारा नाम लेना सीख गया था वो अब भी सुबह-शाम तुम्हें रोज पुकारता है। मैं अब तक उसे नहीं समझा सकी कि तुम नींबू के पेड़ के पास की माटी में गहरे सोये पड़े हो। तुम्हारे सारे दोस्त शाम को यहीं इकट्ठे होते थे न बेटू! उनकी आवाज़ें तो तुम तक पहुँचती ही होंगीं!
हाँ, वो दोस्त अब भी आते हैं। बहुत से और नए दोस्तों को लेकर और अब अच्छे से खाते भी हैं। मैं उनको तुम्हारे पसंदीदा दाने ही खिलाती हूँ क्योंकि मुझे लगता है उन्हें तुमने ही मेरे लिए भेजा होगा। अब भी मम्मा की बहुत चिंता रहती है न तुम्हें! मेरे साथ भी यही होता है,रोज होता है। एक बार देखना चाहती हूँ...तुम जहाँ भी हो, ठीक तो हो न!

कई बार सोचती हूँ स्वीटू, मेरे पास तुम्हारी हजारों तस्वीरें हैं वीडियो हैं और याद करने को ढेरों बातें, जिन्हें मैं वर्षों अनवरत लिखती रह सकती हूँ। काश! तुम भी होते! कभी-कभी यह भी लगता है कि मेरे पास कुछ तो है....तुम न जाने अब कहाँ होगे! अपनी मी को ढूँढते कितनी दफ़ा उदास हो जाते होगे! कौन गोदी में लेकर पुचकारता होगा मेरे लाड़ले को। मैं तुम्हारा वो चेहरा भी कभी नहीं भूल पाती जब मुझे आने में लेट हो जाता तो तुम balcony से गेट की ओर एकटक देखते और मेरे आते ही गुस्सा कर झूठा कोहराम मचा देते और फिर एक पल न छोड़ते थे। मेरे पीछे तुम सामने रखे खाने को भी नहीं छूते थे और पानी फैला देते थे। लेकिन मेरी शक़्ल देखते ही किसी भुक्खड़ की तरह सब पचर-पचर खाने लगते। तब तुम्हारी खाने की स्पीड देखकर मुझे हँसी आती थी और रोना भी क्योंकि उस समय एक ही बात दिमाग में घूमती थी कि कहीं मुझे कुछ हो गया तो मेरे इस बच्चे का ध्यान कौन रखेगा! ये तो सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम ही....! बहुत जीना था स्वीटू तुम्हें! ये समय नहीं था जाने का!

तुम्हारे बिना जैसे इस घर ने एक ख़ामोशी ओढ़ ली है। ख़ुशियों के सारे पल मायूस हो प्रतिदिन तुम्हारी उपस्थिति की माँग करते हैं। हर बात में तुम्हारा ज़िक्र आता है और फिर गहरा सन्नाटा दीवारों से टकरा प्रतीक्षा बन वहीं पसर जाता है। सब जानते हैं कि जाने वाला कभी लौटकर नहीं आता! पर इस बात को कह देना जितना आसान है, मान लेना उतना ही मुश्किल! हाँ, मुझे भी पता है कि तुम जिस दुनिया में गए हो वहाँ जाकर कोई भी वापिस नहीं आया, कभी नहीं आया....पर न जाने ये कैसी उम्मीद है कि अब भी हर रोज मेरी निगाहें आसमान को ताकती हुई तुम्हें ढूँढती हैं और लगता है कि किसी दिन अचानक पहले की ही तरह तुम धप्प से आकर मेरे कंधे पर बैठ मुझे चौंका दोगे।  

ईश्वर से क्या कहूँ उसे तो हर बार सिर्फ छीनना ही आया है! जब कभी कुछ पाने का सुख रत्ती भर दिया भी, तो तुरंत ही खोने का दुःख जन्म-जन्मांतर तक के लिए मेरी झोली में डाल दिया। पर तुम उसे भी इतना ही प्यार दोगे, ये भी जानती हूँ। 
बहुत सारा प्यार तुम्हें, बेटू। 
आज तुम्हें गए एक साल हुआ। Missing you...My Sweetu
- प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 30 मार्च 2019

देश मेरा रंगरेज़ है बाबू

मेरा जन्म गूगल युग से दो दशक पहले ही हो गया था और तब स्कूल के अलावा ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र सुलभ माध्यम पुस्तकें ही थीं। हाँ, दूरदर्शन ने भी चाहे-अनचाहे मस्तिष्क की माँसपेशियों को उद्वेलित करना प्रारम्भ कर दिया था। रामायण, महाभारत ने न केवल हमें उन घटनाओं की बारीक़ियों से परिचित कराया बल्कि सामाजिकता का प्रथम पाठ भी मैंनें यहीं से सीखा है। यहाँ मैं उस सीरियल की नहीं अपितु उस माहौल की चर्चा कर रही हूँ जो उन दिनों बना करता था। तब सबके घरों में टीवी भले ही नहीं होता था पर अपनेपन की डोर इतनी सहज थी कि सब अपने-आप नियत समय पर इकट्ठे हो जाते।

औपचारिकताओं की शुष्क मरुभूमि से कोसों दूर हर व्यक्ति के बैठने के लिए जगह रखी जाती। बड़े बुज़ुर्ग लोगों के लिए सोफ़ा स्वतः ही छोड़ दिया जाता, महिलायें पीछे दीवान पर बैठ जातीं और बच्चे फ़र्श पर अपनी-अपनी सीट निर्धारित कर लेते। ब्रेक में सब रायचंद बनते और साथ में ख़ूब हँसते थे। कुछ बच्चे सरपट दौड़ते हुए जाते और फिर निक्कर पकड़े-पकड़े दौड़े आते कि कहीं कुछ छूट न गया हो! भुक्खड़ बच्चे हाथ में पुंगी बनाकर कचर-पचर खाते रहते पर क्या मज़ाल कि हिल भी जाएँ! 😜बस सब दम साधे देखते और ख़त्म होते ही प्रसन्न मन से विदा लेते।

हम लोग तब एक मकान में फर्स्ट फ़्लोर पर रहते थे। यहाँ हमसे और भी किरायेदार थे। रविवार शाम को सब आते थे। ठीक से याद नहीं पर शायद शाम 6 के आसपास फ़िल्म शुरू होती थी और उसके 10 मिनट पहले से सबकी आवाजाही। सबसे प्यारी बात ये थी कि हमारे ठीक पीछे वाले घर के लोग भी अपनी छत पर बैठ वहीं से टीवी के कार्यक्रम देखते थे क्योंकि हमारे ड्रॉइंग रूम का पीछे का दरवाजा उस ओर ही खुलता था। इसलिए हम लोग बैठने की व्यवस्था कुछ इस तरह से भी करते कि कोई उनको अड़े नहीं। हालाँकि गर्दन के दायें-बायें ज्यादा घुमाने पर वो निस्संकोच टोक ही दिया करते कि 😟"थोड़ा साइड में हो जाओ, देखने में दिक़्क़त आ रही।" और वो इंसान तुरंत ही अपनी पोजीशन एडजस्ट कर भी लेता था। 
रामायण, महाभारत और पिक्चर के समय दो इंसान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते थे। एक तो वो जो टीवी के बग़ल में स्टूल डालकर बैठता। उसका एक ही सवाल रहता था, "अब ठीक आ रहा है?" जिसके छह अलग-अलग उत्तर उसे हर बार मिलते पर अधिकांश लोग यही बोलते, "बस, थोड़ा और!" इस थोड़े और के करते ही बुज़ुर्ग अंकल जी (जो बाद में फूफा बने) की टिप्पणी आती, "पहले ज्यादा सही आ रहा था।" 😑उस समय स्टूल वाले बन्दे के भुनभुनाने की मद्यम ध्वनि अहसासों की जीवंतता बनाये रखती। 
दूसरा महत्त्वपूर्ण इंसान वो होता था जो दरवाजे के पास बैठता था। इसका काम था कि जैसे ही कोई दरवाजा खटखटाये, इसे दौड़कर जाना है और सेकंड के हजारवें हिस्से में वापिस आकर फिर चुपचाप बैठ जाना है। वो आँखों के इशारे से बता देता कि कौन आया था पर बेचारे को बोलने की अनुमति ब्रेक में ही मिलती थी। यहाँ यह भी स्पष्ट करती चलूँ कि इन कार्यक्रमों के दौरान आये हुए व्यक्ति को (जिसे टीवी नहीं देखना होता था) अत्यंत हिक़ारत भरी नज़रों से देखा जाता था और उसे घड़ों भर-भर बददुआएँ भी मिलतीं। 😠मतलब कुछ ऐसा कि "कौन है ये नामुराद जो ये देखता ही नहीं!" तब छोटे घर थे भई और टीवी रूम जैसी बात मध्यम वर्ग की कल्पना से भी परे थे।
मैच के दौरान भी कुछ ऐसा ही समां बँधता।

अरे हाँ, एक और बंदा जिसके बिना टीवी देखने की ये पूरी परिकल्पना ही निरर्थक सिद्ध होती! वो था एंटीना ठीक करने वाला लड़का। ये घर के सबसे छोटे पर सक्रिय बच्चे हुआ करते थे। जिनका बचपन एंटीना घुमाते-घुमाते ही जवानी की दहलीज़ तक पहुँचा है। इन्हें न दिन का होश, न रात का। न कड़ी धूप, न बारिश का। ठिठुरती सर्द रातों में भी कम्बल ओढ़े छत तक जाना ही इनका प्रारब्ध रहा। 😝उस पर बोरी भर-भर लानतें भी इनके ही हिस्से आतीं। ध्यान से देखियेगा यदि आपको अपने आसपास कोई जलकुकड़ा, बात-बात में भिनकने वाला, पतला-दुबला, सुराहीदार गर्दन धारण किये पुरुष दिखाई दे तो समझ जाइये कि ये वही एंटीना ठीक करने वाला बालक है जो अब तक इस अभिशाप से मुक्त नहीं हो सका है। उसकी गर्दन को ये कमनीयता एंटीना को महबूबा की तरह देखने से प्राप्त हुई है और अगरबत्तीनुमा काया उस यात्रा का प्रमाण हैं जो उसे घरवालों के कहने पर एंटीना ठीक करने के लिए अरबों-ख़रबों बार सीढ़ियों से चढ़ने-उतरने के कौशल के चलते हासिल हुई है। 'स्किल इंडिया' का कॉन्सेप्ट तो तबका है जी। 
अच्छा! यदि आप यह जानना चाहते हैं कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने या ततैया के काटने से कैसा महसूस होता है तो एक बार इस व्यक्ति के पास जाकर बस इतना कह दें कि "भैया, जरा एंटीना ठीक करोगे?" 😛
नारायण, नारायण 
है दखे येलिके टवकारु (उल्टा बोलने की जो हमारी कला है वो भी दूरदर्शन की ही देन है)
विराम! रोटी भी बेलनी हैं अभी! 😞
- प्रीति 'अज्ञात'

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

#अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस



भाषा, संवाद का जरिया है अहसासों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है. हम किसी भी माध्यम में पढ़ें हों, पर जहाँ बचपन गुजरा वहाँ की भाषा से लगाव हो जाना स्वाभाविक है. फिर हम कितने भी साब-मेमसाब बन जाएँ लेकिन जब भी उस भाषा को बोलने का अवसर मिले; चूकते नहीं! आंचलिक शब्दों की मिठास ही अलग होती है, इसे अपनी माटी से मोह भी समझा जा सकता है.
आजकल प्रादेशिक भाषाओं के प्रचार पर बहुत जोर दिया जा रहा है. अच्छी बात है, बस इसका उद्देश्य अपनी भाषा को सर्वश्रेष्ठ एवं अन्य को कमजोर सिद्ध करने से कहीं ज्यादा उसके संरक्षण में होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह केवल इतिहास के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए. प्रत्येक भाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसका बोला एवं लिखा जाना एक अनिवार्य तत्त्व है. अपनी भाषा को बोलने में संकोच कैसा!
भाषा जोड़ने का काम करती है और सृजन में कोई भी कमतर-बेहतर नहीं होता! सबकी अपनी-अपनी सुंदरता, मधुरता है तथा स्थान के अनुसार प्रत्येक की उपयोगिता भी होती ही है. हम मित्रों के साथ जिस सहजता,अपनेपन और अनौपचारिक ढंग से बात करते हैं वहाँ तू, तेरा जैसे शब्द भी कितने प्रेम भरे लगते हैं वहीं कार्यस्थल में बात करने की एक अलग ही प्रशिक्षित शैली होती है. अति-संभ्रांत वर्ग में तमाम औपचारिकताओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओँ का छौंक लगाना सभ्यता का मानक समझा जाने लगा है. वहीं किसी बड़े mall के सेल्समेन से बात करते समय और ठेलेवाले से सब्जी लेते समय हमारी भाषा में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है. इंसान हम वही हैं बस स्थानानुसार, सबकी सहूलियत के आधार पर ज़बान बदल लेते हैं. 
मंत्र यही है कि भाषा कोई भी हो, इसको बोलने का तरीक़ा ही सब कुछ तय करता है. भाषा के साथ-साथ उचित शब्दों का चयन ही बात बनाता और बिगाड़ता है. 
अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं पर हृदय में जो भी भाव उठें, जैसी भी अनुभूति हो, उसे हम व्यक्त ज़रूर करें. माध्यम कोई भी हो इससे अंतर नहीं पड़ता, महत्त्वपूर्ण यह है कि मानसिकता सही रहे...स्नेह-भाव जीवित रहे! और क्या! 😍
हर भाषा का अपना मज़ा है, सबको अपने बच्चों जैसा प्यार करना चाहिए. मेरा बस चले तो सब सीख लूँ. वैसे हमें तो हिन्दी ही ठीक से आती है और सपने में भी इसी भाषा में बात करते रहे हैं. अंग्रेज़ी, गुजराती और संस्कृत गुजारे लायक आती है. बस, इतनी ही कि किसी जानकार के सामने नहीं बोल सकते. :D 
 MORAL: 'संवाद' जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है. संवादहीनता रिश्तों को तिल-तिलकर मरने को छोड़ देती है, वहीं कुछ पलों का संवाद इसी गहरी खाई को कब भर दे, पता भी नहीं चलता!
और हाँ, 'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' का मूल उद्देश्य भाषाई विविधता और विकास पर बल देना है. अपनी वाली को महान बताने के  लिए कुश्ती नहीं लड़नी है. 😜
- प्रीति 'अज्ञात' 
#अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

प्रेम और ठंडी चाय

वो दोनों, जिनके ह्रदय में अभी-अभी किसी सुनहरे ख़्वाब ने जन्म लिया है और जिन्हें लगता है कि उन्हें एक-दूसरे से बेपनाह इश्क़ है; पहले आप....की रस्म को निभाते हुए कल तक बेचैनी में प्रतीक्षा की हज़ार करवटें बदलेंगे। एक नया प्रेमपत्र लिखकर पहले वाले को नष्ट कर देंगे। वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शब्दों की खोज में जुट जायेंगे। फिर शायद उनमें से कोई एक पहल कर ही दे, लेकिन उस पल ये सारी तैयारियाँ धरी की धरी रह जायेंगी और वही तीन पुरातन शब्द उनका काम आसान कर देंगे। तब ओपन रेस्टॉरेंट की टेबल पर रखे गुलाबों में एक अलग ही महक़ होगी। बहती हुई हवा सुगंध से भर किसी नई नवेली दुल्हन सा इस क़दर शरमायेगी कि गमले में लगे पनसेटिया की सारी पत्तियाँ एक साथ ही सुर्ख़ लाल हो उठेंगी, उस समय हरसिंगार पर फुदकते पक्षियों की आवाज़ 'इक प्यार का नग़मा है' से किसी प्रेमगीत सरीख़ी गुनगुनाती महसूस होगी। 

उधर जो पार्क में बेंच पर कोने में सिमटा दाएँ-बाएँ झाँकता प्यारा सा जोड़ा है न! उसे भूख ही नहीं लगती। वो आज हाथ थाम अपने सपनों को रंगबिरंगे पंख देगा। लड़की संजोये हुए सारे पंख जोड़ना चाहेगी पर लड़का उसका गाल थपथपाकर समझाएगा कि धीरे-धीरे सब अच्छा हो जायेगा, हमें ज्यादा फ़िक्र नहीं करनी चाहिए। लड़की को लड़के की हर बात सच्ची लगती है, वो पगली इस बार भी ख़ुशी से उसके गले लिपट बेवज़ह रो देगी। पार्क उम्मीदों की हरी रौशनी से जगमगा उठेगा और फूलों पर मचलती तितलियाँ लाख़ कोशिशों से भी किसी के हाथ न आएँगी। वहीं पास ही टहलता हुआ एक वृद्ध जोड़ा अपने दिनों को याद कर अनायास ही मुस्कुरा देगा।

कुछ ऐसे अभागे भी होंगे कहीं....जिनकी हथेलियों में इश्क़ की लक़ीरें बनते ही मिट चुकी हैं या जिन्होंने उसे हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया है। वे उस दिन आसमां से बातें करेंगे, चाँद के आगे अपनी वे सभी अर्ज़ियाँ एक बार फिर भरेंगे जिनकी क़िस्मत में खारिज़ होना ही लिखता आया है। उनकी दर्द भरी चीखें कहीं, किसी पार्टी के शोर-शराबे में दबकर रह जायेंगीं। वो इस सदी की सबसे लंबी रात होगी; जहाँ इनकी सर्द आहों से अगली सुबह का कोहरा और भी घना छा जाएगा। उनके ग़म को समझता सूरज भी हताश होकर फ़िर कई दिनों तक काली चादर ओढ़ चुपचाप सो जायेगा और किसी को अपना मुँह तक नहीं दिखायेगा।

इकतरफ़ा इश्क़ के मारे लोग, चाय की गर्म प्याली का पहला सिप भरते हुए उन बातों की स्मृतियों में खो जायेंगे; जब लिपटकर प्रेम का इज़हार किया जा सकता था या उसे किसी और की तरफ़ बढ़ने से रोका जा सकता था। वो उन पलों को भी कोसेंगे जब सुख की नन्ही तस्वीर से उसकी हँसी छीनकर किसी ने गाढ़ी स्याही से अथाह दुःख गोद दिया था। बीती तमाम स्याह होती एकाकी रातों की पीड़ा उनके चेहरे पर ठहर क्रूर अट्टहास करेगी। बदलते रिश्तों के इस दौर में उनकी हर साँस से अब भी दुआ ही निकलेगी लेकिन सच्चे प्रेम पर अपने विश्वास को चकनाचूर होते देख, यक़ायक उनकी निराश आँखों में हरी घास पर पसरी ओस की सारी बूँदें समा जायेंगी और उस दिन की घुटन भरी गहरी प्रतीक्षा, ठंडी चाय के प्याले में डूबकर अपनी जान दे देगी।   
- © प्रीति 'अज्ञात'

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

सुनो! प्रेम...तुम तब भी उम्मीद की तरह साथ बने रहना!

प्रेम, रात के काले साए को अपनी रौशनी से जगमग कर देने वाला ऐसा अनोखा मनमोहक जादूगर है जिसकी अदृश्य टोपी में ख़ुशियों के सैकड़ों उत्साही ख़रगोश सरपट दौड़ते नज़र आते हैं. यह आसमां से झांकता वो दूधिया चाँद भी है जो बेहद प्यारा और सारे जहाँ से  निराला है. भले ही यह कभी पूरा, कभी आधा और कभी टिमटिमाकर गायब हो जाता है लेकिन अपनी उपस्थिति का अहसास सदैव ही बनाए रखता है.
यह रमज़ान की ईद है, विवाहिताओं का करवा-चौथ है. प्रेमियों की स्वप्निल उड़ान है. रात की नदी में डूबकर इठलाता, झिलमिलाता दीया है. बच्चे की उमंगों भरी मुस्कान है. स्याह अँधेरे के आदी मुसाफ़िर की आँखों में अचानक भरी चमकीली, सुनहरी उम्मीद है. यह अहसास इतना लुभावना और आकर्षक है कि मन पूछ बैठता है, "चाँद, तुम 'प्रेम' हो या 'प्रेम' तुम चाँद हो?"

प्रेम, दो जोड़ी आँखों से झांकता एक अदद सपना भी है. कहते हैं, प्रेम पाने नहीं खोने का नाम है. प्रेम दो पावन दिलों के एक हो जाने का नाम है. प्रेम का हर रंग सच्चा, हर रूप अच्छा; पर प्रेम बेसबब कितनी ख़्वाहिशें जगाता है! प्रेम, उदास रातों में अनगिनत तारे गिनाता है.
प्रेम, यादें है, अहसास है, ख़ुशी के छलकते आँसू है, उदासी की घनघोर घटा है, दर्द का बहता दरिया है, फूल है, ख़ुश्बू है, मुट्ठी में भरा आसमान है, बेवज़ह उभरती मासूम मुस्कान है. प्रेम कभी किसी बच्चे की तरह शैतान लगता है तो कभी उसका ही मासूमियत भरा भोला चेहरा भी ओढ़ लेता है. 

कैसे परिभाषित करें इसे? शायद यह चंद मख़मली शब्दों में लिपटी गुदगुदाती, नर्म  कोमल अनुभूति है. स्पर्श के बीज से उगी उम्मीद की लहलहाती फसल है. आँखों के समंदर में डूबती कश्ती की गुनगुनाती पतवार है. प्रेम, अकेलेपन का साथी है, दर्द है तो दवा भी. इसके बिना जीवन कैसा? यह तो प्रकृति की रग-रग में बसा है. भूखे को रोटी से प्रेम होता है और अमीर को पैसे से. माँ का प्रेम उसका बच्चा और बच्चे का प्रेम इक खिलौना. प्रेम हर रूप, हर रंग में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करता आया है. हर विशेषण इसके साथ जुड़ा और इसके असर से  कोई भी न बच पाया है.

तभी तो सभी के जीवन में कोई न कोई ऐसा इंसान अवश्य ही होता है जिससे अपार स्नेह हो जाता है, दिल उसे हमेशा प्रसन्न देखना चाहता है और हर दुआ में उसका नाम ख़ुद-ब-ख़ुद शामिल होता जाता है. यद्यपि यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि उस इंसान की भावनाएँ भी आपके प्रति ठीक ऐसी ही हों. ऐसा होना अपेक्षित भी नहीं होता है पर फिर भी कभी-कभी कुछ बातें गहरे बैठ जाती हैं. दुःख देती हैं लेकिन धड़कनें तब भी हर हाल में उसी लय पर थिरकती हैं. उसकी तस्वीर को घंटों निहार कभी ख़ुशी तो कभी उदासी के गहरे कुएँ की तलहटी तक उतर जाती हैं. न जाने यह बेवकूफ़ी है....पागलपन या इस शख़्स का नितांत एकाकीपन कि अब तक वो यादें साँसों से लिपटी रहती हैं जब उसने अपने जीवन का प्रथम और अंतिम स्नेहिल स्पर्श किसी का हाथ थाम महसूस किया था. क्या पल भर की मुलाक़ात, चंद अल्फ़ाज़ और एक प्यारी-सी हंसी भी प्रेम की परिभाषा हो सकती है? होती ही होगी...वरना कोई इतने बरस, किसी के नाम यूँ ही नहीं कर देता! तुम इसे इश्क़/ मोहब्बत /प्यार  /प्रेम या कोई भी नाम क्यूँ न दे दो.. इसका अहसास वही सर्दियों की कोहरे भरी सुबह की तरह गुलाबी ही रहेगा. इसकी महक जीवन के तमाम झंझावातों, तनावों और दुखों के बीच भी जीने की वज़ह दे जाएगी.

'इश्क़' के लिए तो एक पल ही काफ़ी है, ज़नाब! उसके बाद जो होता है वो तो इसको संभालकर रखने की रवायतें हैं. यद्यपि सारे प्रेम सच्चे हैं पर स्त्री-पुरुष के मध्य हुए प्रेम को ओवररेटेड किया गया है. सामाजिक प्रतिष्ठा से इसे जोड़ना प्रेमी युगल के सहज रिश्ते में उलझन, तनाव उत्पन्न कर देता है. परिवार, मान-मर्यादा की दुहाई दो हँसते-खेलते इंसानों का जीवन तबाह भी कर देते हैं. 
वैसे देखा जाए तो,  'प्रेम' दीये की फड़फड़ाती लौ की तरह प्रारम्भ में और अंतिम समय में तीव्रता से अपनी चमक के साथ महसूस होता है परन्तु बीच की सारी प्रक्रिया तो इस लौ को जीवित बनाए रखने की जद्दोज़हद में ही निकल जाती है. कभी भावनाओं का तेल ख़त्म होता दिखाई देता है तो कभी बाती समय की आँधियों से जूझती थकी-हारी, निढाल नज़र आती है. यदि दोनों समय रहते अपने स्नेह को साझा करते रहें तो क्या मज़ाल कि उनकी दुनिया रोशन न हो! पर होता यह है कि तेल और बाती दोनों ही शेष रह जाते हैं और जोत जलती ही नहीं! धीरे-धीरे यह घुप्प अँधेरा रिश्तों को लीलने लगता है. जब बात समझ आती है तब समेटने को मात्र अफ़सोस रह जाता है लेकिन यह उत्तरदायित्व दोनों का है कि लौ जलती रहे. अन्यथा बाती दीये की उसी परिधि पर मुँह बिसूरे टिकेगी, जलेगी, प्रतीक्षा करेगी और अचानक बुझ जाएगी!

'प्रेम' की सारी बातें बेहद अच्छी हैं पर एक उतनी ही बड़ी ख़राबी भी है इसमें कि यह आता तो सबके हिस्से है पर ठहरता कहीं-कहीं ही है.....!
आज जबकि सियासी चालों, स्वार्थ और नफ़रतों के दौर में प्रेम करना सबसे बड़ा गुनाह है, सुनो! प्रेम...तुम तब भी उम्मीद की तरह हम सबके साथ बने रहना!
- प्रीति 'अज्ञात'

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

चिट्ठी न कोई संदेस


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'जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा'
शायद ही कोई ऐसा संगीत-प्रेमी होगा, जिसने अपने जीवनकाल में यह पंक्ति न गुनगुनाई होगी! यह जादूगरी केवल जगजीत सिंह को ही आती थी कि दुःख के समय में वे हर किसी के अपने हो जाते थे. उन्होंने ही यह यक़ीन भी दिलाया कि पीड़ा से भरी इस पंक्ति की हर ध्वनि अनगिनत प्रतीक्षाओं का मौन प्रत्युत्तर है और किसी के चले जाने के बाद भी उसके प्रेम में डूबे रहना ख़ुदा की इबादत से कम नहीं होता! ग़ालिब के अल्फ़ाज़ और उस पर जगजीत की आवाज ईश्वर की भेजी कोई बहुमूल्य चिट्ठी सी लगती है. प्रेमियों ने जब-जब प्रेम की पीड़ा को भीतर तक महसूस किया है तो उसे स्वर जगजीत ने ही दिए हैं और उनकी ये ग़ज़लें तो प्रेमियों ने घोलकर पी ली हैं - 'प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगी', 'तेरे ख़ुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे', 'कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है'.  मोहब्बत में धड़कते दिलों ने 'तुमको देखा तो ये ख़्याल आया', 'झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं' , 'ये तेरा घर ये मेरा घर' गुनगुनाकर ही इश्क़ की मुश्क़िल मंज़िलें तय की हैं.

मैं जब अपने-आप के बारे में सोचती हूँ तो जगजीत एक परछाई की तरह साथ हो लेते हैं. वो मेरे सुख से हँसते हैं और दुःख में सिर पर सदा ही स्नेह भरा हाथ फेर पूछते आये हैं, 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो'. कोई ताज़्जुब नहीं कि वो जब क़िताबों में डूबे रहने और खेलने का समय था, मुझे और मुझ जैसे न जाने कितनों को उनसे इश्क़ हो गया था. हम सब पागलपन की हद तक उनकी मखमली आवाज़ के दीवाने थे और उनकी गायी ग़ज़लों का अच्छा-ख़ासा कलेक्शन था हमारे पास. लड़कियाँ जब बाज़ार में सौंदर्य प्रसाधन ढूँढा करती थीं, हम चुपके से किसी म्यूजिक स्टोर पर जाकर उनकी नई एल्बम तलाश करते थे.

आज उन्हीं सब सिरफ़िरों की तरफ़ से एक स्नेह और अपनापन भरा पत्र है तुम्हारे लिए -
ओह! जगजीत..तुमको शुक्रिया उन सबकी तरफ़ से, जिनके दर्द को तुमने स्वर दिए हैं, जिनके ज़ख़्मों पर अपनी आवाज का मरहम लगाया है. तुमको क्या पता! कि महबूब से मिलने की हर उम्मीद जब-जब टूटी है तुमने उन टूटे दिलों को अपनी शरण दी है, उनके आँसुओं को गले लगाया है, उनकी पीड़ा को समझ उनकी पीठ पर तसल्ली का स्नेहिल हाथ फेरा है. 
दर्द को जब कोई न समझ सका तो वहाँ तुम थे, बिछोह का दुख जब-जब एकांत में चीत्कारें भर बिलखता था, तो वहाँ तुम थे, जीवन की निराश घड़ियाँ जब ख़ुद की भी एक बात तक नहीं सुनतीं थीं तो तुम्हीं ने आकर हाथ थामा.  जाने कितनी उदास रातों की तन्हा आवाज हो तुम, पीड़ा में डूबते हर हृदय की एकल पुकार हो तुम! 
यह भी तुम्हीं ने सिखाया कि चाहत किसी को अपने दिल मे जगह देने का नाम है, क़ैद करने का नहीं!
जब भी 'वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी' सुनती हूँ.स्मृतियों का हर सुनहरा भीगता पृष्ठ ख़ुद-ब-ख़ुद पलटता चला जाता है.

जीवन से जुड़े बस तीन ही मलाल रहे हैं उनमें से एक तुमसे न मिल पाने का भी है. मैंने तुमको तबसे सुना है, जब प्रेम समझती भी नहीं थी पर फिर भी तुम्हारी दीवानी थी. अब जबकि इस शब्द को जीने लगी हूँ तो तुम नहीं हो.कहीं भी नहीं हो! एक आवाज बन तुमने जो मेरा साथ निभाया है उस पर हज़ार ज़िंदगियाँ क़ुर्बान!
मुझे तुमसे कितना प्रेम है यह जताना भी बेतुका लगेगा.  बस इतना समझ लो कि जिसके भी पास दिल है उसकी हर दुआ में पहला नाम तुम्हारा है. उसकी धड़कनों में लहू के साथ मोहब्बत की तरह बहते हो तुम. उसके दुःख के सहरा में दवा की तरह रहते हो तुम. जैसे एक दोस्त की तरह कह रहे हो, 'ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी'. 

आज जबकि प्रेम के इस सप्ताह में तुम्हारा जन्मदिवस है तो तुम्हारी ही  डूबती आवाज़ में डूबती चली जा रही हूँ 'चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन से देस जहाँ तुम चले गए'
मैं जानती हूँ जैसे कि मैं इसे कानों में लगाए नींद के आग़ोश में चली जाती हूँ वैसे ही तुम्हारी गोदी में सिर रखकर इन दिनों ख़ुदा को भी चैन की नींद आती होगी. काश! मेरी हर दुआ और शुक्रिया तुम तक पहुंचे! यूँ ईश्वर से शिक़ायत तो इस बार भी है!
- प्रीति 'अज्ञात'


शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

प्रेमफरवरी-1

कई बार किसी प्रेम कहानी का हिस्सा न होते हुए भी, प्रेम का हर दर्द भोगना होता है। हर रिसते घाव का साक्षी बनना होता है। किसी की आहों में अपनी धड़कनों को भस्म होते हुए चुपचाप देखना होता है। तभी तो उधर जब कोई किसी के विरह की आग में जलता है, विलाप करता है तो इधर किसी और के हृदय में उठती प्रेम की लहरें साहिल से माथा टकरा-टकराकर पीड़ा के उसी समंदर में पुनः लौट जाती हैं जहाँ से कभी उम्मीद की आँखोँ में हज़ारों ख़्वाब भर साहिल तक की दूरी बड़े जतन से तय की थी। अति विश्वास में भरे प्रेमी अक़्सर यह भूल जाते हैं कि टूटना, बिखरना, भुला दिया जाना हर स्वप्न की नियति है और समंदर की नियति है प्रतीक्षा में डूब उम्र भर सिसकते रहना। उसका खारापन उसके जन्म से मृत्यु तक की अथाह पीड़ा और बेचैनी का सार है। लेकिन सृष्टि ने उस बदनसीब के माथे पर गति का चंदन लपेट दिया है। सो उसे बहना है, मुस्कुराना है, सबका हौसला भी बनना है। स्वयं सागर के हिस्से में क्या आता है, यह पलटकर देखने का वक़्त किसी के पास नहीं होता!
एकतरफ़ा प्रेम सिवाय पीड़ा के और कुछ नहीं देता। यह एक धीमी आत्महत्या है। 
#प्रेमफरवरी-1 
- © प्रीति 'अज्ञात'

शनिवार, 26 जनवरी 2019

#गणतंत्र_दिवस

एक पुरानी फ़िलम है 'गोलमाल',अपने अमोल पालेकर वाली. उसके सपने वाले गाने में एक बड़ी क्यूट लाइन है..."इक दिन सपने में देखी सपनी"..... तो आज हमने भी एक सपनी देखी कि हम स्कूल के बच्चों की उस लाइन में खड़े हैं जो बूँदी के लड्डू पाने को अपनी बारी की बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं.
आँख खुली तो इधर घर के सदस्य इस प्रतीक्षा में थे कि महारानी उठें तो चाय नसीब हो! 😂उस पर बेटी ने भी याद दिलाया कि हाफ डे है सो स्कूल में फुल मील की बजाय टिफ़िन भी आधा ही चाहिए. अपन भी गणतंत्र दिवस की भोर में आलू का पराँठा बनाने किचन को प्राप्त हुए.😎
आप सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ और छुट्टी की असीम बधाई. साथ ही उन लोगों के प्रति भी हार्दिक संवेदनाएँ व्यक्त करती हूँ जो गणतंत्र दिवस, फ़ोर्थ सैटरडे के दिन पड़ने के कारण एक छुट्टी डूबने के सदमे से अब तक उबर नहीं सके हैं. भई, अभी तो अउर डूबना है 😜.....छुटंकी गुमटी से लेकर amazon तक सब SALE लगाये बैठे हैं. सुनो, अब नहा-धोकर शॉपिंग को निकल ही लो...देशभक्ति के सुर में डूबा ये समां कहाँ रोज-रोज देखने को मिलता है! झंडा है, गुब्बारे हैं, कप हैं और इस बार तो बड़ी प्यारी कैप भी launch हुई है. फोटू लगाए हैं. 😍
- प्रीति 'अज्ञात' 
#गणतंत्र_दिवस #Republic_day

रविवार, 13 जनवरी 2019

#मकरसंक्रांति #उत्तरायण

संक्रांति के पावन पर्व पर जहाँ आसमान में लहराती, बलखाती हजारों पतंगें एक ख़ूबसूरत तस्वीर जड़ती हैं वहीं पक्षियों के बीच एक अजीब क़िस्म की बदहवासी फ़ैल जाती है. कई-कई दिन ये इमारतों की मुंडेरों से चिपक सहमे बैठ जाते हैं और जो हिम्मत कर निकलते भी हैं तो उनके सुरक्षित लौट आने की सम्भावना प्रायः कम ही होती है. जनवरी माह इन पक्षियों के लिए सबसे मनहूस समय होता है. जहाँ दाना-पानी की तलाश में सुबह को निकले ये मासूम मुसाफ़िर शाम को घर लौट ही नहीं पाते! इनके टूटे-फूटे, कटे पंख, क्षतविक्षत शरीर और उससे बहता लहू मनुष्य की उमंग और उत्साह की बलिवेदी पर प्रतिदिन क़ुर्बान होता है.  उल्लास और मेल-मिलाप में भरे हम मनुष्य छत पर पतंग उड़ा पूरी, मिठाई और तिल के बने विविध व्यंजनों का सेवन करते हैं और इधर किसी घोंसले में अंडे से झाँकते नन्हे चूज़े प्रतीक्षा की आँख आसमां पर टिका किसी और लोक की ओर भूखे ही प्रस्थान कर जाते हैं. हमें इनका भी सोचना है जो सुबह की पहली धूप के साथ हमारे आँगन में चहचहाहट बन उतरते हैं, जो किसी बच्चे की तरह खिड़कियों से लटक सैकड़ों करतब किया करते हैं, जो अलगनी को अपने बाग़ का झूला समझ दिन-रात फुदकते हैं.

पक्षियों के बिना ये दुनिया कैसी सन्नाटे भरी होगी, इसकी कल्पनामात्र सिहरा देने के लिए काफ़ी है. हमने तालाबों का पानी चुरा लिया, नदियों को विषैला कर दिया, बारिश से उसके हिस्से की माटी छीन उस जमीं पर सीमेंट-कंक्रीट से भर अपना पट्टा लगा लिया, जंगलों को ऊँची इमारतों की तस्वीर दे दी, प्रकृति का जितना और जिस हद तक शोषण कर सकते थे, किया. अब हमारे पास अपना कहने को ज्यादा कुछ शेष नहीं है. आसमां पर दीवारें खड़ी हो सकतीं तो अब तक इसका भी बँटवारा हो गया होता! ये मासूम पक्षी ही हैं जो सबके आँगन में एक सी ख़ुशी लेकर उतरते हैं, हर वृक्ष को अपना घर समझ हमारी सुबह-शाम रोशन करते हैं. इनकी राहें उसी आसमां से होकर गुजरती हैं जहाँ हम काँच लगे मांज़े का नेटवर्क बिछाते हुए पल भर भी नहीं हिचकते!

मैं पतंग उड़ाने या उत्सव को पूरे हर्षोल्लास से मनाने का पूरी तरह समर्थन करती हूँ पर हर वर्ष यह पतंगबाज़ी कितने निर्दोष पक्षियों को घायल करती है, उनकी जान ले लेती है; इस बात से भी वाकिफ़ हूँ. दुपहिया वाहनों या पैदल चलते राहगीरों के लिए भी ये कई बार जानलेवा साबित होता है और पतंग लूटते हुए बच्चों की दुर्घटनाओं के हृदयविदारक किस्से भी हर बार सामने आते हैं. इनमें से कई घटनाओं को सावधान रहने और बच्चों को समझाने भर से रोका जा सकता है. जहाँ तक पक्षियों और नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न है तो निम्नलिखित बातों को अपनाकर हादसों को कम किया जा सकता है -

सुबह और शाम के समय पतंग उड़ाने से बचा जाए क्योंकि यह पक्षियों की आवाजाही का समय होता है. 
काँच लगा मांज़ा इस्तेमाल न करें. 
उड़ाते समय यदि कोई पक्षी इसकी चपेट में आ जाता है तो डोर खींचने की बजाय ढीली छोड़ दें.
घायल पक्षियों की रक्षा/ देखभाल करने वाली संस्थाओं के संपर्क नंबर अपने पास रखें. 
टू-व्हीलर पर लोहे का गार्ड लगवा लें तथा वाहन चलाते समय हेलमेट पहनें. इसकी गति भी बहुत तेज न रखें. बच्चा अगर साथ में हो तो उसे आगे खड़ा न रखकर पीछे ही बिठाएँ. 
पैदल चलते समय अपनी गर्दन और सिर पर दुपट्टा/मफ़लर लपेट लें.
बहुत आवश्यक हो तो ही बाहर निकलें. 
यह सब सुनिश्चित करने के बाद पूरी, जलेबी, उंधियु और तिल के बने स्वादिष्ट व्यंजनों का अपने परिवार और मित्रों के साथ भरपूर स्वाद लें. त्योहार को पूरे जोश और उल्लास के साथ मनायें.
मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
- प्रीति 'अज्ञात' 

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#मकरसंक्रांति और पक्षी #Rescued



परसों सुबह की ही बात है. बालकनी में बैठ मम्मी से फ़ोन पर बात कर रही थी कि अचानक नज़र बिजली के तार से झूलते एक कबूतर पर पड़ी, जो कि बुरी तरह से मांज़े में फँसा हुआ था. उसके शरीर में कोई भी हरक़त नहीं हो रही थी. एक पल को तो लगा शायद वह जीवित ही नहीं! यह सोच भी मुझे काफ़ी घबराहट दे रही थी. दौड़कर नीचे गई और मेरी बेटी को बताते हुए घर के बाहर निकल गई. तार इतना ऊँचा था कि सबसे बड़े वाले स्टूल के ऊपर खड़े होकर भी हम वहाँ नहीं पहुँच सकते थे. तभी हमने देखा कि मांज़े का दूसरा हिस्सा भी लटक रहा है. थोड़ी उम्मीद बंधी और मैंने धीरे से उसे नीचे खींचा. खींचते ही कबूतर इतनी बुरी तरह फड़फड़ाया कि हमारे तो होश ही उड़ गए और लगा कि शायद खींचने से उसकी गर्दन पर दबाव और बढ़ रहा है. फिर दोबारा ऐसा करने की हिम्मत ही न हुई. तब तक अड़ोस-पड़ोस के दरवाजे-खिड़कियों से लोगों का झाँकना प्रारंभ हो चुका था. कुछ बर्ड रेस्क्यू टीम को बुलाने की सलाह भी दे रहे थे जो कि उचित भी थी. पर उस समय किसी को कॉल लगाना भी समय नष्ट करने जैसा लग रहा था क्योंकि यह कबूतर काफ़ी देर से जूझ रहा था.

उसे कितना दर्द हो रहा था, इसका अनुमान लगा पाना भी बेहद मुश्किल था क्योंकि मूलतः कबूतर अत्यंत  शांत स्वभाव के पक्षी होते हैं और जितना मुझे याद आता है उसके आधार पर मैंने इन्हें कभी भी चिल्लाते हुए नहीं देखा. बिल्ली को देखकर जहाँ सभी पक्षी चींचीं कर सारा घर सर पर उठा लेते हैं और उस दुष्ट बिल्ली को भगाने तुरंत आना ही पड़ता है, तब भी मैंने इन कबूतरों को बस सहमा हुआ ही पाया. सच कहूँ तो प्यारी गुटरगूं के अलावा मैंने इनकी कोई अन्य आवाज कभी सुनी ही नहीं अब तक. इनकी आँखों में बला की मासूमियत और चाल में एक विशेष अदा सदा ही मेरा मन लुभाती आई है. आज वही पिज्जू इतनी परेशानी में था.

तभी सामने एक महिला दिखाई दीं, वे मुझे ही आवाज देकर पूछ रहीं थीं कि "बेन, क्या हुआ?" मॉर्निंग वाक के लिए जाते समय ये अक्सर गायों को घुमाती हुई दिखती हैं. यूँ हम एक-दूसरे के नाम नहीं जानते पर हमारे बीच एक मुस्कुराहट का आदान-प्रदान हुआ करता है. बस, यही मुस्कान का रिश्ता आज पुकार बन सामने था.
मैं कुछ जवाब देती तब तक वे आकर वस्तुस्थिति समझ चुकी थीं. बिना डरे, उन्होंने मांज़े को झटका दिया और वो कबूतर उसी फँसी हुई अवस्था में मांज़े के साथ नीचे की ओर गिरने लगा जिसे उनके मजबूत हाथों ने बेहद सलीक़े से थाम लिया. तब तक बेटी घर से कैंची ले आई थी. पहले तो पिज्जू भयभीत था और फड़फड़ा रहा था पर बाद में समझ गया और एक-एक करके उसके पंखों, पैरों, गर्दन में लिपटी डोरियों को चुपचाप हटवाता रहा. गले में दो फंदे इतने टाइट थे कि हम तीनों में से कोई वहाँ कट कर ही नहीं पा रहा था. तभी दो बाइक सवार वहाँ से निकले और स्वतः ही रुक गये. उनकी सहायता से पिज्जू अब स्वतंत्र हो चुका था. कुछ सेकंड्स हथेली में रहने के बाद उसने पुनः अपनी उड़ान भरी.

लगभग 50 मिनट चले इस रेस्क्यू ऑपरेशन का सुखद अंत बेहद सुकून भरा अवश्य था पर ये भी जानती हूँ कि हर बार ऐसा नहीं होता!
- प्रीति 'अज्ञात' 

#विश्व_पुस्तक_मेला

लेखकों की दुनिया में 'विश्व पुस्तक मेला' एक बहुत बड़ा आयोजन माना जाता है. लेखक, प्रकाशक, पाठक तीनों से यदि एक साथ मुलाक़ात करनी हो तो इससे बेहतर कोई स्थान नहीं! पुस्तकों के विमोचन और प्रचार-प्रसार के साथ अलग-अलग शहरों में रहने वाले मित्रों से एक साथ मिल पाना भी यही संभव है. इसी कारण इस मेले को लेकर ख़ासा उत्साह बना रहता है. सोशल मीडिया पर भी 9-10 दिनों तक इसकी ख़ूब धूम मची रहती है.

लेकिन दिल्ली से बाहर के लोगों के लिए पुस्तक मेले में जाना बिटिया के ब्याह जैसा है. पहले तो सभी उपलब्ध शुभ तिथियों में से एक को चुनकर दिवस सुनिश्चित किया जाता है. उसके बाद जान-पहचान वालों, दूर-पास के रिश्तेदार, मित्र आदि को इसकी पूर्व सूचना दे दी जाती है. तत्पश्चात विविध प्रसंगों और मौसम के हिसाब से वस्त्रों का चयन होता है. महिलाओं को ब्यूटी पार्लर जाना पड़ता है तो पुरुष भी युवाओं की श्रेणी में पिछले 50 वर्षों से अपना स्थान पक्का करते हुए इस बार भी स्लेटी बालों को काले में बदलने हेतु गार्नियर men का डिब्बा चुपके से ख़रीद लाते हैं. सेलेब्रिटी लुक को प्राथमिकता देने के बाद अब कुछ लोगों को इस बात की परेशानी से भी दो-चार होना पड़ता है कि गोष्ठी में ऐसा क्या धांसू पढ़ें कि श्रोताओं की आँखों से आँसू बहने लगें.

जुगाड़-तंत्र और अव्यवस्था के विरुद्ध क्रांतिकारी पोस्टों से पाठकों का सीना छलनी कर उन्हें भावुकता के सागर में डुबोने वाले साहित्यकार तय रचनाओं के अतिरिक्त अपनी 8 अन्य रचनाएँ उन गोष्ठियों के लिए बैकअप में रखते हैं जहाँ बिन बुलाये बेधड़क घुसा जा सकता है. उपहारस्वरुप देने के लिए अपनी उन पुस्तकों का Gift wrap बना गट्ठर तैयार कर लिया जाता है जिनके प्रकाशक महोदय इस बार stall लगाने की भारी-भरकम राशि देने में असमर्थ रहे. ये ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई बड़ा-बूढ़ा अस्वस्थता के कारण ब्याह में न जाने पर लिफ़ाफ़ा भिजवा दिया करता है.

इन सारी तैयारियों के बाद घटनास्थल से सीधा प्रसारण प्रारंभ होता है. प्रथम चरण में रेलवे स्टेशन या एअरपोर्ट के विहंगम दृश्य के साथ कुछ पंक्तियाँ नज़र आती हैं जिन्हें पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ तक आने के लिए इस इंसान ने जिन भीषण कठिनाइयों का सामना किया, उतना तो देश को आज़ाद कराते वक़्त हमारे परमपूज्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी नहीं हुआ होगा. सहानुभूति और प्रेम की ठंडी छाँव से भरी प्रतिक्रियाएँ यह सुनिश्चित कर पाने में सफ़ल होती हैं कि कौन-कौन उससे दिल से मिलना चाहता है और कौन बच निकलना!
द्वितीय चरण में ट्रेन की बर्थ पर बैठ खाने के फोटो, मोबाइल बैटरी के ख़त्म होने के मार्मिक किस्से, टैक्सी इत्यादि बातों पर सार्थक चर्चा होती है. कभी-कभी विषयांतर हेतु बाथरूम की ख़स्ता हालत पर अफ़सोस और रेलवे का निंदा रस भी चलता है.
इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हौले-हौले अब ये नाजुक क़दम तृतीय चरण की ओर बढ़ते हैं और अंततः वह घड़ी आ ही जाती है जहाँ चेहरे पर हीरो-हीरोइन की माफ़िक मुस्कान धारण करते हुए गेट नंबर 7 से प्रवेश करना होता है. अरे हाँ, उससे पहले मुख्य द्वार पर लगे पुस्तक मेले के होर्डिंग के साथ चित्र खिंचाना भी प्रोटोकॉल में आता है. शादी के venue पर पहुँचकर फोटुआ नहीं खिंचाते क्या, बुड़बक?

चतुर्थ चरण में नेत्र और नेट के द्वारा संपर्क किया जाता है और एक-एक कर उन सभी के गले लग प्रसन्नता का वह भाव जागृत होता है जैसा कि अपने चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहिन को देखकर उत्पन्न होता आया है. वही हँसी, ठहाके और पीठ पर धौल जमाकर  मस्ताना कि बाक़ी लोग भी पलटकर देखने लगें. 
उसके बाद वह अमृत पेय मँगाया जाता है जो इस बंधन को सदा के लिए जोड़ देता है. जी हाँ, चाय चाय चाय.
तत्पश्चात एक stall से दूसरे stall पर फुदकने, पुस्तकें ख़रीदने, विमोचने, बड़े-छोटे, ऊँचे-नीचे सभी प्रकार के मनुष्यों के साथ सेल्फियाने का सुन्दरतम दौर चलता है.
अंतिम चरण में भारी मन और ख़ाली जेब के साथ पुस्तकों के थैले को घसीटते हुए बस पर चढ़ाने का समय आ जाता है और नम आँखों से हॉल नंबर 12-A को विदाई दी जाती है. वैसे यहाँ ये स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेले में इसके अलावा भी कई हॉल हैं पर चूँकि वहाँ के अपडेट नहीं दिखते तो उन्हें गिना ही नहीं जाता. जैसे घर के छोटे सदस्य भी तो शादी के समय कितनी दौड़भाग करते हैं पर मंच पर दूल्हा-दुल्हिन को निहारते, प्रशंसा करते लोगों के बीच उनका यह योगदान वीरगति को प्राप्त होता है.
और हाँ, जो टिकट कराने के बाद भी जा नहीं पाता...उसकी हालत उस इंसान की तरह होती है जिसकी सगाई होने के कुछ ही दिन बाद रिश्ता टूट गया हो. और वो अपने दुःख से दुखी होने की बजाय इस सदमे से इसलिए नहीं उबर पाता कि लोग क्या कहेंगे!
- प्रीति 'अज्ञात'
#विश्व_पुस्तक_मेला

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